मंगलवार, फ़रवरी 24, 2026

हिंदी और नेपाली साहित्य में प्रेम और सद्भावना

हिंदी और नेपाली साहित्य में प्रेम एवं सद्भावना
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
भारत और नेपाल के संबंध केवल दो राजनीतिक सीमाओं के मिलन बिंदु नहीं हैं, बल्कि यह दो ऐसी संस्कृतियों का संगम है जिनका हृदय एक ही लय में धड़कता है। हिमालय की कंदराओं से निकलने वाली नदियाँ जिस प्रकार भारत के मैदानों को सींचती हैं, उसी प्रकार इन दोनों देशों का साहित्य 'प्रेम' और 'सद्भावना' के जल से एक-दूसरे की वैचारिक भूमि को उर्वर बनाता रहा है। हिंदी और नेपाली साहित्य में निहित भक्ति, करुणा और भातृत्व वह अदृश्य धागा है, जो पशुपतिनाथ को काशी विश्वनाथ से और लुंबिनी को बोधगया से जोड़ता है।
. भक्ति साहित्य: प्रेम का आध्यात्मिक शिखर हिंदी और नेपाली दोनों ही साहित्यों का स्वर्ण युग 'भक्ति काल' रहा है। यहाँ प्रेम केवल व्यक्तिगत राग नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और चराचर जगत के प्रति 'ममता' (माया) है।
राम काव्य की मर्यादा: जहाँ भारत में गोस्वामी तुलसीदास ने 'रामचरितमानस' के माध्यम से मर्यादा पुरुषोत्तम राम को घर-घर पहुँचाया, वहीं नेपाल में आदिकवि भानुभक्त आचार्य ने 'भानुभक्त रामायण' लिखकर नेपाली जनमानस को एक नई भाषाई और सांस्कृतिक पहचान दी। दोनों कवियों के लिए राम 'प्रेम और न्याय' के प्रतीक हैं।
कृष्ण प्रेम की माधुरी: हिंदी में सूरदास और रसखान की कृष्ण भक्ति जिस तन्मयता से मिलती है, नेपाली साहित्य में भी कृष्ण काव्य की वही धारा प्रवाहित हुई है। यहाँ 'प्रेम' ईश्वर की प्राप्ति का एकमात्र साधन माना गया है, जिसमें कोई ऊँच-नीच या सीमा नहीं है। . 'प्रेम' और 'माया': नेपाली संवेदना के दो रंग नेपाली साहित्य में प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए दो शब्दों का प्रयोग अत्यंत सुंदर और अर्थपूर्ण है— 'प्रेम' और 'माया'। प्रेम: यह शब्द अक्सर शास्त्रीय, गंभीर और आध्यात्मिक अनुराग के लिए प्रयुक्त होता है। माया: हिंदी में 'माया' का अर्थ प्रायः भ्रम या संसार की असत्यता से लिया जाता है, किंतु नेपाली साहित्य और लोकजीवन में 'माया' का अर्थ अत्यंत पवित्र है। यहाँ 'माया' का अर्थ है—स्नेह, ममता, दया और लगाव। जब एक नेपाली कवि 'माया' की बात करता है, तो वह उस आत्मीयता को दर्शाता है जो एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से जोड़ती है। यही वह मानवीय संवेदना है जो भारत-नेपाल के साझा रिश्तों का आधार है।
करुणा का बुद्धत्व: मानवतावाद का स्वर नेपाली साहित्य में बुद्ध की करुणा और हिंदी साहित्य में गांधी की अहिंसा का गहरा प्रभाव है। महाकवि लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा (नेपाल) और जयशंकर प्रसाद (भारत) जैसे दिग्गजों ने अपने काव्य में 'मानवता' को ही सबसे बड़ा धर्म माना। देवकोटा की कालजयी रचना 'मुनामदन' प्रेम और विरह की वह महागाथा है, जो जाति और वर्ग की सीमाओं को तोड़कर 'मानवीय हृदय' की श्रेष्ठता सिद्ध करती है। हिंदी में 'कामायनी' जिस प्रकार मानवता के विकास की कथा कहती है, नेपाली काव्य भी उसी प्रकार शांति और विश्व-बंधुत्व का संदेश देता है। 'बुद्ध' दोनों देशों के साझा नायक हैं, जिनके माध्यम से करुणा और सद्भावना के स्वर मुखरित होते हैं। . हिंदी: नेपाल के मधेस और पहाड़ों के बीच का सेतु नेपाल में हिंदी भाषा केवल एक विदेशी भाषा नहीं है, बल्कि यह संपर्क, शिक्षा और संस्कृति की भाषा रही है। मधेस क्षेत्र: नेपाल का तराई क्षेत्र हिंदी, मैथिली और भोजपुरी के माध्यम से भारत से सीधे तौर पर जुड़ा है। यहाँ का साहित्य साझा रोटी-बेटी के संबंधों और सांस्कृतिक एकता का जीवंत दस्तावेज है। देवनागरी लिपि ने दोनों भाषाओं के बीच एक 'भाषिक पुल' का कार्य किया है। नेपाल के आधुनिक गद्य लेखन और शिक्षा के विकास में हिंदी साहित्य के महान रचनाकारों (जैसे प्रेमचंद, निराला और रेणु) का गहरा प्रभाव देखा जा सकता है। साहित्य समाज का दर्पण होता है। जहाँ इतिहास युद्धों और विजयों की बात करता है, वहीं साहित्य उन युद्धों से पीड़ित मानवता के घावों पर 'प्रेम' का मरहम लगाता है। नेपाली साहित्य में गुमानी पंत जैसे कवियों ने राजनीतिक उथल-पुथल के बीच भी प्रेम और सद्भावना को प्रमुखता दी। उन्होंने दिखाया कि विनाश और युद्ध के बजाय जीवन को 'प्रेम' से ही सुंदर बनाया जा सकता है। हिंदी के छायावादी और प्रगतिवादी कवियों की तरह नेपाली कवियों ने भी शोषितों के प्रति 'करुणा' और अत्याचारी के विरुद्ध 'प्रेमपूर्ण प्रतिरोध' का मार्ग चुना। लोक संस्कृति: गीतों में बहती साझा विरासत साहित्य केवल पोथियों में नहीं, बल्कि लोकगीतों में भी जीवित रहता है। नेपाली के 'बारहमासा', 'प्रेमगीत' और 'वीरगीत' हिंदी के लोक साहित्यों (जैसे कजरी, चैती और सोहर) के बहुत करीब हैं। प्रकृति चित्रण में हिमालय का वर्णन दोनों साहित्यों में एक समान गौरव के साथ आता है। पहाड़ की सुंदरता, नदियों का कल-कल और ग्रामीण जीवन की सरलता—ये तत्व दोनों साहित्यों को एक ही धरातल पर लाकर खड़ा कर देते हैं।
आज के दौर में नेपाल में गज़ल विधा का जबरदस्त उभार हुआ है। हिंदी और उर्दू की गज़ल परंपरा ने नेपाली युवाओं को इस कदर प्रभावित किया है कि आज नेपाली में लिखी जा रही गज़लें 'प्रेम और कोमलता' का नया मानक गढ़ रही हैं। समकालीन नेपाली और हिंदी लेखक साझा कार्यशालाओं और साहित्यिक सम्मेलनों के माध्यम से 'भारत-नेपाल भाई-भाई' की भावना को और प्रगाढ़ कर रहे हैं। मन्नू भंडारी की 'यही सच है' जैसी कहानियों में प्रेम की जो सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक परतें हैं, वैसी ही संवेदनशीलता आधुनिक नेपाली कथा-साहित्य में भी दृष्टिगोचर होती है।
हिंदी और नेपाली साहित्य की यह समरूपता केवल शब्दों का मेल नहीं है, बल्कि यह उन साझा मूल्यों का प्रतीक है जिन्हें हमने सदियों से सहेज कर रखा है। 'वसुधैव कुटुंबकम' (विश्व एक परिवार है) की भावना दोनों देशों के साहित्य की आत्मा है। जब तक नेपाल के पहाड़ों में 'माया' के गीत गाए जाते रहेंगे और भारत की गलियों में 'प्रेम' की चर्चा होती रहेगी, तब तक यह सांस्कृतिक सेतु अडिग रहेगा। साहित्य वह प्रकाश है जो नफरत के अंधकार को मिटाकर प्रेम और सद्भावना का मार्ग प्रशस्त करता है। भारत और नेपाल का साहित्यिक संबंध इसी स्थायी प्रेम और अटूट भाईचारे का घोषणापत्र है। "साहित्य समाज का वह दर्पण है, जिसमें दो देश अपनी सीमाओं को भूलकर एक-दूसरे के हृदय की धड़कन सुन सकते हैं।

हिंदी और नेपाली साहित्य में प्रेम और सद्भावना

हिंदी और नेपाली साहित्य में प्रेम एवं सद्भावना
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
भारत और नेपाल के संबंध केवल दो राजनीतिक सीमाओं के मिलन बिंदु नहीं हैं, बल्कि यह दो ऐसी संस्कृतियों का संगम है जिनका हृदय एक ही लय में धड़कता है। हिमालय की कंदराओं से निकलने वाली नदियाँ जिस प्रकार भारत के मैदानों को सींचती हैं, उसी प्रकार इन दोनों देशों का साहित्य 'प्रेम' और 'सद्भावना' के जल से एक-दूसरे की वैचारिक भूमि को उर्वर बनाता रहा है। हिंदी और नेपाली साहित्य में निहित भक्ति, करुणा और भातृत्व वह अदृश्य धागा है, जो पशुपतिनाथ को काशी विश्वनाथ से और लुंबिनी को बोधगया से जोड़ता है।
. भक्ति साहित्य: प्रेम का आध्यात्मिक शिखर हिंदी और नेपाली दोनों ही साहित्यों का स्वर्ण युग 'भक्ति काल' रहा है। यहाँ प्रेम केवल व्यक्तिगत राग नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और चराचर जगत के प्रति 'ममता' (माया) है।
राम काव्य की मर्यादा: जहाँ भारत में गोस्वामी तुलसीदास ने 'रामचरितमानस' के माध्यम से मर्यादा पुरुषोत्तम राम को घर-घर पहुँचाया, वहीं नेपाल में आदिकवि भानुभक्त आचार्य ने 'भानुभक्त रामायण' लिखकर नेपाली जनमानस को एक नई भाषाई और सांस्कृतिक पहचान दी। दोनों कवियों के लिए राम 'प्रेम और न्याय' के प्रतीक हैं।
कृष्ण प्रेम की माधुरी: हिंदी में सूरदास और रसखान की कृष्ण भक्ति जिस तन्मयता से मिलती है, नेपाली साहित्य में भी कृष्ण काव्य की वही धारा प्रवाहित हुई है। यहाँ 'प्रेम' ईश्वर की प्राप्ति का एकमात्र साधन माना गया है, जिसमें कोई ऊँच-नीच या सीमा नहीं है। . 'प्रेम' और 'माया': नेपाली संवेदना के दो रंग नेपाली साहित्य में प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए दो शब्दों का प्रयोग अत्यंत सुंदर और अर्थपूर्ण है— 'प्रेम' और 'माया'। प्रेम: यह शब्द अक्सर शास्त्रीय, गंभीर और आध्यात्मिक अनुराग के लिए प्रयुक्त होता है। माया: हिंदी में 'माया' का अर्थ प्रायः भ्रम या संसार की असत्यता से लिया जाता है, किंतु नेपाली साहित्य और लोकजीवन में 'माया' का अर्थ अत्यंत पवित्र है। यहाँ 'माया' का अर्थ है—स्नेह, ममता, दया और लगाव। जब एक नेपाली कवि 'माया' की बात करता है, तो वह उस आत्मीयता को दर्शाता है जो एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से जोड़ती है। यही वह मानवीय संवेदना है जो भारत-नेपाल के साझा रिश्तों का आधार है।
करुणा का बुद्धत्व: मानवतावाद का स्वर नेपाली साहित्य में बुद्ध की करुणा और हिंदी साहित्य में गांधी की अहिंसा का गहरा प्रभाव है। महाकवि लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा (नेपाल) और जयशंकर प्रसाद (भारत) जैसे दिग्गजों ने अपने काव्य में 'मानवता' को ही सबसे बड़ा धर्म माना। देवकोटा की कालजयी रचना 'मुनामदन' प्रेम और विरह की वह महागाथा है, जो जाति और वर्ग की सीमाओं को तोड़कर 'मानवीय हृदय' की श्रेष्ठता सिद्ध करती है। हिंदी में 'कामायनी' जिस प्रकार मानवता के विकास की कथा कहती है, नेपाली काव्य भी उसी प्रकार शांति और विश्व-बंधुत्व का संदेश देता है। 'बुद्ध' दोनों देशों के साझा नायक हैं, जिनके माध्यम से करुणा और सद्भावना के स्वर मुखरित होते हैं। . हिंदी: नेपाल के मधेस और पहाड़ों के बीच का सेतु नेपाल में हिंदी भाषा केवल एक विदेशी भाषा नहीं है, बल्कि यह संपर्क, शिक्षा और संस्कृति की भाषा रही है। मधेस क्षेत्र: नेपाल का तराई क्षेत्र हिंदी, मैथिली और भोजपुरी के माध्यम से भारत से सीधे तौर पर जुड़ा है। यहाँ का साहित्य साझा रोटी-बेटी के संबंधों और सांस्कृतिक एकता का जीवंत दस्तावेज है। देवनागरी लिपि ने दोनों भाषाओं के बीच एक 'भाषिक पुल' का कार्य किया है। नेपाल के आधुनिक गद्य लेखन और शिक्षा के विकास में हिंदी साहित्य के महान रचनाकारों (जैसे प्रेमचंद, निराला और रेणु) का गहरा प्रभाव देखा जा सकता है। साहित्य समाज का दर्पण होता है। जहाँ इतिहास युद्धों और विजयों की बात करता है, वहीं साहित्य उन युद्धों से पीड़ित मानवता के घावों पर 'प्रेम' का मरहम लगाता है। नेपाली साहित्य में गुमानी पंत जैसे कवियों ने राजनीतिक उथल-पुथल के बीच भी प्रेम और सद्भावना को प्रमुखता दी। उन्होंने दिखाया कि विनाश और युद्ध के बजाय जीवन को 'प्रेम' से ही सुंदर बनाया जा सकता है। हिंदी के छायावादी और प्रगतिवादी कवियों की तरह नेपाली कवियों ने भी शोषितों के प्रति 'करुणा' और अत्याचारी के विरुद्ध 'प्रेमपूर्ण प्रतिरोध' का मार्ग चुना। लोक संस्कृति: गीतों में बहती साझा विरासत साहित्य केवल पोथियों में नहीं, बल्कि लोकगीतों में भी जीवित रहता है। नेपाली के 'बारहमासा', 'प्रेमगीत' और 'वीरगीत' हिंदी के लोक साहित्यों (जैसे कजरी, चैती और सोहर) के बहुत करीब हैं। प्रकृति चित्रण में हिमालय का वर्णन दोनों साहित्यों में एक समान गौरव के साथ आता है। पहाड़ की सुंदरता, नदियों का कल-कल और ग्रामीण जीवन की सरलता—ये तत्व दोनों साहित्यों को एक ही धरातल पर लाकर खड़ा कर देते हैं।
आज के दौर में नेपाल में गज़ल विधा का जबरदस्त उभार हुआ है। हिंदी और उर्दू की गज़ल परंपरा ने नेपाली युवाओं को इस कदर प्रभावित किया है कि आज नेपाली में लिखी जा रही गज़लें 'प्रेम और कोमलता' का नया मानक गढ़ रही हैं। समकालीन नेपाली और हिंदी लेखक साझा कार्यशालाओं और साहित्यिक सम्मेलनों के माध्यम से 'भारत-नेपाल भाई-भाई' की भावना को और प्रगाढ़ कर रहे हैं। मन्नू भंडारी की 'यही सच है' जैसी कहानियों में प्रेम की जो सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक परतें हैं, वैसी ही संवेदनशीलता आधुनिक नेपाली कथा-साहित्य में भी दृष्टिगोचर होती है।
हिंदी और नेपाली साहित्य की यह समरूपता केवल शब्दों का मेल नहीं है, बल्कि यह उन साझा मूल्यों का प्रतीक है जिन्हें हमने सदियों से सहेज कर रखा है। 'वसुधैव कुटुंबकम' (विश्व एक परिवार है) की भावना दोनों देशों के साहित्य की आत्मा है। जब तक नेपाल के पहाड़ों में 'माया' के गीत गाए जाते रहेंगे और भारत की गलियों में 'प्रेम' की चर्चा होती रहेगी, तब तक यह सांस्कृतिक सेतु अडिग रहेगा। साहित्य वह प्रकाश है जो नफरत के अंधकार को मिटाकर प्रेम और सद्भावना का मार्ग प्रशस्त करता है। भारत और नेपाल का साहित्यिक संबंध इसी स्थायी प्रेम और अटूट भाईचारे का घोषणापत्र है। "साहित्य समाज का वह दर्पण है, जिसमें दो देश अपनी सीमाओं को भूलकर एक-दूसरे के हृदय की धड़कन सुन सकते हैं।

जम्बू द्वीप से शाकद्वीप तक

शाश्वत भारत: जम्बू द्वीप से शाकद्वीप तक
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
 खोज की आदि भूमि सदियों से भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक चेतना का केंद्र रहा है। प्राचीनकाल से ही यूनानी, रोमन और अरबी लोग यहाँ मिट्टी की खोज में नहीं, बल्कि उस 'सत्य' की खोज में आते रहे हैं जो आत्मा को तृप्त कर सके। हिन्दूकुश पर्वतमाला केवल पहाड़ों की एक श्रृंखला नहीं थी, बल्कि दो संस्कृतियों का मिलन स्थल और ज्ञान का द्वार थी। अध्यात्म, चमत्कार और सिद्धियों के बारे में भारत की ख्याति ने इसे विश्व का गुरु बनाया। भारतीय धर्म और दर्शन दुनिया के अन्य मतों से बिल्कुल अलग हैं। यह किसी मरुस्थल की तरह शुष्क या नियमों से बंधा हुआ नहीं है, बल्कि यह हरे-भरे फलों से लदे एक सुव्यवस्थित जंगल की तरह है, जहाँ हर जीव को अपनी प्रकृति के अनुसार विकसित होने की स्वतंत्रता है।
पश्चिमी धर्म और दर्शन अक्सर 'रेडिमेड' उत्तर देते हैं। वहाँ सब कुछ निर्धारित है—ईश्वर एक है, उसका एक संदेशवाहक है, और जीवन केवल एक बार मिलता है। लेकिन भारतीय अध्यात्म प्रश्न को मारने के बजाय उसे जगाता है। : भारतीय दर्शन तब शुरू होता है जब हम आत्मा के स्वतंत्र अस्तित्व और पुनर्जन्म को मानते हैं। यहाँ ईश्वर के होने या न होने के संदेह से अधिक महत्व स्वयं को जानने का है।: उपनिषद् और गीता हमें यह नहीं बताते कि हमें क्या करना है, बल्कि यह सिखाते हैं कि हम 'कौन' हैं। जब हम दूसरों के बताए उत्तरों से मुक्त होते हैं, तभी सच्ची खोज शुरू होती है।
 पश्चिमी धर्मों में प्रलय और न्याय (Judgment Day) की अवधारणा है, जबकि भारत में 'मोक्ष' यानी जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति की प्रक्रिया है।
प्राचीनकाल से ही साधकों के लिए हिमालय सर्वोच्च शरणस्थली रहा है। मुण्डकोपनिषद् के अनुसार, हिमालय की वादियों में सूक्ष्म-शरीरधारी आत्माओं का एक संघ है जिसे 'देवात्मा हिमालय' कहा जाता है।
हिमालय क्षेत्र (जम्मू-कश्मीर, सिक्किम, हिमाचल, उत्तराखंड, असम, अरुणाचल) के लोगों का स्वास्थ्य मैदानी इलाकों की तुलना में बेहतर होता है। यहाँ की शुद्ध वायु और आध्यात्मिक ऊर्जा दमा, टीबी, गठिया और नेत्र रोगों को दूर रखती है। तिब्बत के लोग आज भी निरोगी रहकर 100 वर्ष की औसत आयु प्राप्त करते हैं।
पश्चिमी ग्रंथों में स्वर्ग की कल्पना बर्फ और रेगिस्तान के लोगों की इच्छाओं जैसी है—जहाँ फल, सुंदर स्त्रियाँ और नदियाँ हों। भारत के लिए यह कल्पना नहीं, बल्कि वास्तविकता है। कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल की स्थिति वैसी ही है जैसा कि प्राचीन ग्रंथों में स्वर्ग का वर्णन मिलता है। प्राचीन काल में यहीं ब्रह्मा, विष्णु और शिव का स्थान था और इंद्र का नंदनकानन वन भी यहीं स्थित था।
पौराणिक भूगोल—सप्तद्वीपा वसुंधरा का पुराणों के अनुसार पृथ्वी सात द्वीपों में विभाजित है। इनमें से जम्बू द्वीप और शाकद्वीप का संबंध अत्यंत गहरा है।
. जम्बू द्वीप: कर्म की भूमि हम जिस द्वीप के निवासी हैं, वह जम्बू द्वीप है। इसके मध्य में सुमेरु पर्वत है, जो ब्रह्मांड की धुरी माना जाता है। जम्बू द्वीप को नौ खंडों (वर्षों) में बाँटा गया है: इलावृत वर्ष: केंद्र का भाग जहाँ शिव का निवास है।
भारतवर्ष: सबसे महत्वपूर्ण खंड, जिसे 'कर्मभूमि' कहा गया है। यहाँ जन्म लेकर ही मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।
किम्पुरुष वर्ष: जहाँ हनुमान जी आज भी राम की उपासना करते हैं।
शाकद्वीप: ज्ञान और शुद्धि का प्रतीक शाकद्वीप 'क्षीरसागर' (दूध के समुद्र) से घिरा है। यहाँ की संस्कृति अत्यंत शुद्ध और सात्विक मानी गई है। यहाँ के लोग वायु और सूर्य के माध्यम से ईश्वर की आराधना करते हैं। यहाँ क्रोध, ईर्ष्या और रोग का अस्तित्व नहीं है।
: शाकद्वीप के मग ब्राह्मण और भारत का संबंध इतिहास और पुराणों के अनुसार, शाकद्वीप और भारत (जम्बू द्वीप) का मिलन एक महान रोग के निवारण हेतु हुआ था। साम्ब की कथा और सूर्य उपासना भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को कुष्ठ रोग हुआ। नारद मुनि के परामर्श पर उन्होंने शाकद्वीप से 18 परिवारों के 'मग' ब्राह्मणों को बुलवाया। ये ब्राह्मण सूर्य के अनन्य उपासक और आयुर्वेद के महापंडित थे। मग ब्राह्मणों की विरासत: ये विद्वान अपने साथ ज्योतिष (Astronomy) और सूर्य चिकित्सा का गूढ़ ज्ञान लाए। इन्होंने ही भारत में सूर्य की मूर्ति पूजा और भव्य सूर्य मंदिरों की नींव रखी। अव्यंग और पुर: ये ब्राह्मण आज भी अपने 72 'पुरों' (कुलों) और 'अव्यंग' (विशेष कमरबंद) के माध्यम से अपनी प्राचीन पहचान बनाए हुए हैं।
पूर्वी भारत का शाकद्वीपीय कॉरिडोर (बिहार, झारखंड, ओडिशा, नेपाल) शाकद्वीप से आए इन विद्वानों का मुख्य केंद्र पूर्वी भारत बना। आज भी यहाँ की संस्कृति में शाकद्वीपीय प्रभाव स्पष्ट दिखता है।
. बिहार और मगध 'मगध' शब्द की व्युत्पत्ति ही 'मग' ब्राह्मणों से मानी जाती है। छठ पूजा: बिहार का महापर्व छठ, शाकद्वीपीय सूर्य विज्ञान का जीवंत प्रमाण है। इसमें उगते सूर्य से पहले डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, जो इस दर्शन को दर्शाता है कि अंत ही नए जीवन का बीज है। यह बिना किसी पुरोहित के किया जाने वाला वैज्ञानिक पर्व है।
ओडिशा और कोणार्क ओडिशा का कोणार्क सूर्य मंदिर न केवल स्थापत्य का नमूना है, बल्कि यह खगोलीय गणनाओं की प्रयोगशाला है। यहाँ की सूर्य प्रतिमाओं में पहने गए जूते (उदीच्य वेश) शाकद्वीप की भौगोलिक स्थिति की याद दिलाते हैं। नेपाल का ज्योतिष ज्ञान और झारखंड की औषधीय संपदा इसी ज्ञान परंपरा का हिस्सा है। बुद्ध का 'शाक्य' वंश भी इसी प्राचीन 'शाक' मूल से प्रेरित माना जाता है, जो ज्ञान और करुणा का केंद्र रहा।
सूर्य के 12 नाम और वैज्ञानिक चेतना शाकद्वीपीय संस्कृति ने हमें सूर्य के 12 रूपों का विज्ञान दिया। ये केवल नाम नहीं, बल्कि सौर ऊर्जा के विभिन्न स्तर हैं:
मित्र: मैत्रीपूर्ण ऊर्जा। रवि: ताप का स्रोत। सूर्य: प्रेरक शक्ति। भानु: प्रकाशक। खग: वायुमंडल का शुद्धिकर्ता।
पूषण: पोषक (फसलों के लिए)। हिरण्यगर्भ: ब्रह्मांडीय बीज।  मरीचि: वाष्पीकरण का स्वामी। आदित्य: अमर ऊर्जा।
सवितृ: उत्पत्तिकर्ता। अर्क: औषधि का कारक। भास्कर: बुद्धि का प्रकाशक है।
: प्राचीन गुफाएँ और ऐतिहासिक धरोहर में  भारत के भूगोल में केवल पहाड़ और नदियाँ नहीं, बल्कि इतिहास की परतें भी छिपी हैं। भीमबेटका: मध्यप्रदेश के रायसेन जिले में स्थित 750 गुफाओं का समूह, जहाँ 35,000 वर्ष पुरानी चित्रकारी आज भी हमें आदिमानव की चेतना से जोड़ती है। अजंता-एलोरा और एलीफेंटा: ये गुफाएँ दर्शाती हैं कि कैसे पत्थरों को तराशकर अध्यात्म को ठोस रूप दिया गया। बामियान (अखंड भारत): अफगानिस्तान की गुफाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि भारतीय दर्शन की सीमाएँ कितनी व्यापक थीं  विश्व कल्याण का भारतीय मार्ग
भारत का अध्यात्म केवल व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण अस्तित्व के लिए है। यह हमें सिखाता है कि हम कौन हैं, क्यों हैं और हमारा इस ब्रह्मांड के साथ क्या संबंध है। जम्बू द्वीप की कर्मठता और शाकद्वीप की वैज्ञानिक सात्विकता का संगम ही आज के विश्व को शांति और स्वास्थ्य का मार्ग दिखा सकता है। हिमालय की वादियों से लेकर बिहार के छठ घाटों तक, और कोणार्क के पत्थरों से लेकर भीमबेटका की गुफाओं तक—भारत एक अखंड ग्रंथ है। इसे पढ़ने के लिए केवल आँखों की नहीं, बल्कि उस जिज्ञासा की आवश्यकता है जो हमें हमारे अपने कुओं से बाहर निकाल सके।
हमें एक ऐसे ज्ञान की जरूरत है जो यह न बताए कि क्या मानना है, बल्कि यह सिखाए कि कैसे जानना है। भारत की यह खोज शाश्वत है और हमेशा रहेगी।
यह आलेख प्राचीन ग्रंथों, पौराणिक भूगोल और सांस्कृतिक विरासतों के गहन अध्ययन पर आधारित है।

भारतीय तीज त्यौहार प्रकृति प्रेम

भारतीय तीज त्योहार: प्रकृति, प्रेम 
सत्येंद्र कुमार पाठक 
भारतीय संस्कृति में त्योहार केवल तिथियों का समूह नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक कला हैं। जब तपती गर्मी के बाद आसमान में काले बादल घिरते हैं और मरुधरा से लेकर पहाड़ों तक मिट्टी की सोंधी खुशबू महकने लगती है, तब आगमन होता है 'तीज' का। तीज का त्योहार मुख्य रूप से मानसून के दौरान श्रावण और भाद्रपद मास में मनाया जाता है। यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के पुनर्जीवन, स्त्री शक्ति के संकल्प और सामाजिक समरसता का जीवंत प्रतीक है।: शिव-शक्ति का अटूट बंधन तीज के मूल में भगवान शिव और माता पार्वती की पौराणिक कथा निहित है। माना जाता है कि माता सती के आत्मदाह के बाद शिव समाधि में चले गए थे। सती ने पुनर्जन्म लेकर पार्वती के रूप में 108 वर्षों तक कठोर तपस्या की। उन्होंने अन्न, जल और सुख-सुविधाओं का त्याग कर दिया। अंततः भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन शिव ने उनकी निष्ठा को स्वीकार किया और उन्हें पत्नी रूप में अपनाया। इसीलिए, यह पर्व 'अखंड सौभाग्य' और 'मनवांछित वर' की प्राप्ति के लिए मनाया जाता है।
भारतीय पंचांग के अनुसार, तीन मुख्य तीज मनाई जाती हैं, जिनमें से प्रत्येक का अपना विशेष महत्व है:हरियाली तीज (श्रावण शुक्ल तृतीया): यह सावन की हरियाली और उमंग का उत्सव है। इस दिन महिलाएं हरे रंग के वस्त्र और चूड़ियाँ पहनती हैं, जो प्रकृति के साथ एकाकार होने का प्रतीक है। कजरी तीज (भाद्रपद कृष्ण तृतीया): इसे 'बूढ़ी तीज' या 'सातुड़ी तीज' भी कहते हैं। इसमें नीम की पूजा का विशेष महत्व है और कजरी लोकगीत गाए जाते हैं। हरतालिका तीज (भाद्रपद शुक्ल तृतीया): यह सबसे कठिन व्रत माना जाता है। इसमें महिलाएं निर्जला व्रत रखकर बालू के शिव-पार्वती की पूजा करती हैं।
भारत के विभिन्न राज्यों में तीज भारतीय उपमहाद्वीप के हर कोने में तीज का अपना रंग है। आइए, भारत के विभिन्न राज्यों की तीज परंपराओं की सैर करें: राजस्थान: राजसी वैभव और 'लहरिया' की राजस्थान में तीज का रूप सबसे भव्य होता है। जयपुर की 'तीज माता की सवारी' दुनिया भर में प्रसिद्ध है। यहाँ महिलाएं 'लहरिया' साड़ी पहनती हैं। नवविवाहिताओं के लिए उनके मायके से 'सिंजारा' आता है, जिसमें श्रृंगार सामग्री और घेवर होते हैं। झूला झूलना और लोकगीत गाना यहाँ की परंपरा का अभिन्न हिस्सा है।बिहार और झारखंड: संकल्प की पराकाष्ठा 'हरतालिका तीज' का वर्चस्व है। बिहार की महिलाएं इस व्रत को अत्यंत कठोरता से निभाती हैं। घर-घर में मिट्टी के शिव-पार्वती बनाए जाते हैं। यहाँ का 'पिड़ुकिया' (गुजिया) और 'ठेकुआ' त्योहार की मिठास बढ़ा देते हैं। रात भर जागकर महिलाएं सखियों के साथ लोकगीत गाती हैं, जिसे 'जागरण' कहा जाता है। उत्तर प्रदेश: कजरी और नीमड़ी माता की पूजा में पूर्वी उत्तर प्रदेश में 'कजरी' की गूँज चारों ओर सुनाई देती है। मिर्जापुर और वाराणसी कजरी के केंद्र हैं। यहाँ महिलाएं नीम के पेड़ की पूजा करती हैं जिसे 'नीमड़ी माता' कहा जाता है। सत्तू का भोग लगाना और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देना यहाँ की मुख्य विशेषता है। मध्य प्रदेश और दिल्ली: आधुनिकता और परंपरा का संगम में मध्य प्रदेश के मालवा और बुंदेलखंड अंचल में हरतालिका तीज बड़े उत्साह से मनाई जाती है। वहीं दिल्ली जैसे महानगरों में 'तीज मेलों' का आयोजन होता है, जहाँ पारंपरिक खान-पान और हस्तशिल्प की प्रदर्शनी लगती है। महाराष्ट्र और गुजरात: मंगला गौरी और नृत्य में महाराष्ट्र में श्रावण के मंगलवार को 'मंगला गौरी' पूजा होती है। यह तीज का ही एक रूप है जहाँ महिलाएं 'झिम्मा' और 'फुगड़ी' जैसे पारंपरिक खेल खेलती हैं। गुजरात में इस दौरान गरबा और डांडिया की खनक सुनाई देती है। दक्षिण भारत: स्वर्ण गौरी और आदि पूरम में कर्नाटक: यहाँ इसे 'गौरी हब्बा' कहा जाता है। गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले माँ गौरी का स्वागत किया जाता है। तमिलनाडु: यहाँ 'आदि पूरम' मनाया जाता है, जहाँ मंदिरों में देवी को हज़ारों चूड़ियाँ चढ़ाई जाती हैं और बाद में उन्हें सुहागिन महिलाओं में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।ओडिशा और उत्तराखंड: प्रकृति और पितृ सत्ता का सम्मान का ओडिशा में 'सावित्री व्रत' के रूप में इसे मनाया जाता है, जबकि उत्तराखंड के पहाड़ों में 'हरियाला' पर्व के साथ इसका मेल होता है। यहाँ महिलाएं अपने पारंपरिक 'पिछौड़ा' पहनकर पूजा करती हैं।
तीज केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने का जरिया है:रिश्तों की मिठास: विवाहित महिलाएं तीज पर मायके आती हैं। यह भाइयों और बहनों के बीच प्रेम को ताज़ा करने का अवसर होता है। ससुराल और मायके के बीच उपहारों (सिंधारा) का आदान-प्रदान रिश्तों में नई ऊर्जा भरता है। महिला सशक्तिकरण और सामूहिकता: तीज के दौरान महिलाएं घर के कामकाज से ब्रेक लेकर अपनी सखियों के साथ समय बिताती हैं। सामूहिक रूप से झूला झूलना, मेहंदी लगाना और नृत्य करना उनके मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक जुड़ाव के लिए महत्वपूर्ण है। कला और संस्कृति का संरक्षण: मेहंदी के जटिल डिजाइन, लोकगीतों की अनूठी धुनें और पारंपरिक परिधान (जैसे लहरिया, बनारसी साड़ी, पिछौड़ा) भारतीय कला को जीवित रखते हैं।
तीज के पकवानों के बिना यह लेख अधूरा है। हर राज्य का अपना एक विशेष स्वाद है: घेवर: राजस्थान का गौरव, जो केवल मानसून में ही मिलता है। सत्तू और मालपुआ: उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रमुख व्यंजन। पुरण पोली: महाराष्ट्र की प्रसिद्ध मिठाई। ठेकुआ: झारखंड और बिहार का पारंपरिक प्रसाग तीज हमें प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाता है। झूलों के लिए पेड़ों का चयन, पूजा में मिट्टी और फूलों का उपयोग, और हरियाली की पूजा यह संदेश देती है कि हमारा अस्तित्व इस प्रकृति से ही है। यह पर्व 'इको-फ्रेंडली' उत्सव का प्राचीन भारतीय उदाहरण है। शाश्वत परंपरा का जीवंत रूप आज के आधुनिक युग में भी तीज की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। भले ही उत्सव मनाने के तरीके बदल गए हों, लेकिन इसके पीछे की भावना—प्रेम, श्रद्धा और प्रकृति का सम्मान—आज भी वही है। तीज वह धागा है जो भारत के विभिन्न राज्यों को एक ही सांस्कृतिक माला में पिरोता है। यह उत्सव हमें याद दिलाता है कि जीवन में कठिन तप (व्रत) के बाद ही मधुर फल (मिलन और खुशहाली) की प्राप्ति होती है।जब तक सावन में घटाएं घिरेंगी, जब तक पेड़ों पर झूले पड़ेंगे और जब तक मेहंदी की खुशबू महकेगी, तीज की यह गौरवशाली परंपरा भारतीय हृदय की धड़कन बनी रहे हैं। 

हिमालय का हृदय नेपाल

हिमालय के हृदय की धड़कन: पोखरा की नीली झीलों से मुक्तिनाथ के मोक्ष-शिखर तक की महायात्रा में नेपाल, जिसे दुनिया केवल एवरेस्ट के देश के रूप में जानती है, वास्तव में वह उससे कहीं अधिक गहरा और आध्यात्मिक है। यह वह भूमि है जहाँ पत्थर भी बोले जाते हैं और जहाँ बहती नदियाँ मोक्ष की गाथाएँ सुनाती हैं। हमारी यह यात्रा दो विपरीत ध्रुवों के मिलन की कहानी है—एक ओर 'पोखरा' है, जो अपनी विलासिता और प्राकृतिक शांति के लिए आधुनिक युग का स्वर्ग है, और दूसरी ओर 'मुक्तिनाथ' है, जो 3,800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित वह प्राचीन सत्य है जिसे पाने के लिए ऋषि-मुनियों ने सदियों तक प्रतीक्षा की।
पोखरा केवल एक शहर नहीं, बल्कि एक अहसास है। ऐतिहासिक रूप से, यह पुराने भारत-चीन व्यापार मार्ग का एक मुख्य पड़ाव रहा है। 17वीं शताब्दी में, जब नेपाल छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित था, पोखरा 'चौबीसे' राज्यों में से एक, 'कास्की' राज्य का हिस्सा था। आज भी शहर के पुराने हिस्सों में उस काल की वास्तुकला की झलक मिलती है।
फेवा ताल: जहाँ आकाश जल में उतरता है । पोखरा पहुँचते ही जो पहली छवि मन पर अंकित होती है, वह है फेवा झील। सुबह की पहली किरण जब माछापुछरे (Fishtail) पर्वत की चोटी को चूमती है, तो वह स्वर्ण-शिखर झील के शांत पानी में ऐसे दिखाई देता है मानो साक्षात् महादेव ने जल-समाधि ले रखी हो। ताल बाराही: झील के मध्य स्थित यह द्वि-तलीय पगोडा शैली का मंदिर माँ शक्ति को समर्पित है। यहाँ पहुँचने का एकमात्र जरिया 'डूंगा' (रंगीन नावें) है। लहरों के बीच से गुजरते हुए मंदिर तक पहुँचना, संसार के कोलाहल से भक्ति की शांति की ओर बढ़ने जैसा है।
डेविस फॉल्स और गुप्तेश्वर: पाताल के रहस्य है। पोखरा की भौगोलिक बनावट विस्मयकारी है। डेविस फॉल्स  का पानी जब एक अंधेरी खाई में गिरकर गायब होता है, तो वह प्रकृति की विनाशकारी और सृजनात्मक शक्ति का अहसास कराता है। इस झरने के ठीक सामने गुप्तेश्वर महादेव गुफा है। गुफा की गहराई में उतरते हुए ऐसा लगता है मानो हम धरती के गर्भ में प्रवेश कर रहे हैं। यहाँ का प्राकृतिक शिवलिंग सदियों से अंधकार में भी प्रकाश की प्रेरणा दे रहा है।
सूर्योदय का दार्शनिक पक्ष पर यदि आप जीवन में नई आशा का अर्थ समझना चाहते हैं, तो आपको भोर के समय सारंगकोट की पहाड़ी पर होना चाहिए। यहाँ से अन्नपूर्णा रेंज और धौलागिरी के विशाल शिखरों का जो विस्तार दिखता है, वह मनुष्य के अहंकार को एक पल में समाप्त कर देता है।  काली गंडकी का चुनौतीपूर्ण मार्ग – शालिग्राम की खोज में  पोखरा की सुखद जलवायु को छोड़कर जब हम मुक्तिनाथ की ओर बढ़ते हैं, तो रास्ता रोमांच और भक्ति की पराकाष्ठा बन जाता है। जोमसोम तक की यात्रा में हिमालय का वह रूप दिखता है जो कठोर है, शुष्क है, लेकिन अत्यंत तेजस्वी है। विश्व की सबसे गहरी घाटी और काली गंडकी - मुक्तिनाथ जाने के मार्ग में हम उस स्थान से गुजरते हैं जिसे 'अंधा गल्छी' कहा जाता है। यह दुनिया की सबसे गहरी खाई है। इसके किनारे बहती काली गंडकी नदी का अपना एक अलग शास्त्र है। शालिग्राम शिला: यह दुनिया की एकमात्र नदी है जहाँ 'शालिग्राम' पत्थर मिलते हैं। ये पत्थर वास्तव में करोड़ों साल पुराने जीवाश्म (Fossils) हैं, जिन्हें हिंदू धर्म में भगवान विष्णु का साक्षात् विग्रह माना जाता है। इन काले, चिकने पत्थरों को नदी के तट पर खोजना अपने आप में एक आध्यात्मिक खोज जैसा ह
3,800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित मुक्तिनाथ (मुस्तांग) वह स्थान है जहाँ पहुँचकर समय थम जाता है। इसे 'मुक्ति क्षेत्र' कहा जाता है, जिसका अर्थ है 'वह स्थान जहाँ मोक्ष प्राप्त होता है'।
मंदिर परिसर के पीछे अर्धवृत्ताकार रूप में 108 कांसे के गौमुखों से पवित्र जल की धाराएं गिरती हैं। 108 का अंक हिंदू ज्योतिष और बौद्ध परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण है शून्य से भी कम तापमान में जब यात्री इन 108 धाराओं के नीचे से दौड़ता है, तो उसका शरीर भले ही कांप रहा हो, लेकिन उसका मन एक असीम शांति से भर जाता है। माना जाता है कि ये धाराएं मनुष्य के संचित पापों का क्षरण कर देती हैं।
मुक्तिनाथ मंदिर के पास ही स्थित ज्वाला माई का मंदिर एक प्राकृतिक चमत्कार है। यहाँ भूमि के भीतर से निकलती एक शाश्वत नीली लौ जलती रहती है। इसके ठीक नीचे से शीतल जल बहता है। अग्नि और जल का यह सह-अस्तित्व दार्शनिक रूप से यह बताता है कि विपरीत स्वभाव के तत्व भी एक साथ अस्तित्व में रह सकते हैमु।मुक्तिनाथ की सबसे सुंदर बात यहाँ की साझा संस्कृति है। यहाँ बौद्ध भिक्षुणियां (Anis) और हिंदू पुजारी एक साथ मंदिर की सेवा करते हैं। बौद्ध इसे 'चुमिग ग्यात्सा' कहते हैं। यह स्थान विश्व को सांप्रदायिक सद्भाव का सबसे बड़ा संदेश देता है। 
मुक्तिनाथ का उल्लेख विष्णु पुराण में विस्तार से मिलता है। यह स्थल 108 दिव्य देशमों में से 105वाँ है। ऐतिहासिक रूप से, थोरोंग ला पर्वत दर्रे की तलहटी में होने के कारण, यह स्थान प्राचीन व्यापारियों और तपस्वियों के लिए एक मुख्य आश्रय स्थल रहा है। यहाँ का 'वृंदा और विष्णु' का प्रसंग हमें सिखाता है कि भक्ति में श्राप भी वरदान बन जाता है और स्वयं भगवान को भी प्रकृति के नियमों शालिग्राम रूप में है । पोखरा और मुक्तिनाथ की यह यात्रा केवल 165 किलोमीटर की दूरी तय करना नहीं है, बल्कि यह अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ने की एक यात्रा है। पोखरा ने हमें सिखाया कि सुंदरता कैसे मन को शांत करती है, और मुक्तिनाथ ने सिखाया कि तपस्या कैसे आत्मा को मुक्त करती है। हिमालय की इन वादियों से लौटते समय, एक यात्री अपने साथ केवल तस्वीरें नहीं लाता, बल्कि वह शालिग्राम की तरह एक ऐसा व्यक्तित्व लेकर लौटता है जो बाहर से कठोर लेकिन भीतर से देवत्व को समेटे होता है।