शनिवार, अक्टूबर 10, 2026

अश्विन मास और देवोत्थान


कार्तिक मास: प्रकाश पर्वों का पावन महीना
सत्येन्द्र कुमार पाठक 

हिंदू धर्म में कार्तिक मास का विशेष धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। हिंदू पंचांग के अनुसार, यह वर्ष का आठवाँ चंद्र मास माना जाता है। यह महीना भगवान विष्णु, भगवान श्रीकृष्ण और भगवान शिव की उपासना के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है। कार्तिक मास में स्नान, दान, दीपदान, व्रत, पूजा-पाठ, जप और भजन-कीर्तन का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस महीने में श्रद्धापूर्वक किए गए धार्मिक कार्यों से पुण्य की प्राप्ति होती है और मनुष्य के जीवन में सुख, शांति तथा सकारात्मकता का संचार होता है।
कार्तिक मास केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, लोक परंपराओं, प्रकृति के प्रति सम्मान और सामाजिक सद्भाव का भी प्रतीक है। दीपावली, गोवर्धन पूजा, भाई दूज, छठ पूजा, देवोत्थानी एकादशी, तुलसी विवाह और देव दीपावली जैसे अनेक प्रमुख पर्व इसी महीने में मनाए जाते हैं। इन पर्वों के माध्यम से भारतीय समाज में प्रेम, करुणा, त्याग, सेवा और धर्म के प्रति आस्था की भावना सुदृढ़ होती है।
कार्तिक मास का नाम कृतिका नक्षत्र से जुड़ा माना जाता है। हिंदू ज्योतिषीय परंपरा के अनुसार, इस महीने की पूर्णिमा के समय चंद्रमा कृतिका नक्षत्र के समीप स्थित होता है। इसी कारण इस महीने को कार्तिक कहा जाता है।
धार्मिक मान्यताओं में कार्तिक मास को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। इस दौरान श्रद्धालु प्रातःकाल स्नान करते हैं, मंदिरों में दर्शन करते हैं, भगवान के नाम का स्मरण करते हैं और जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करते हैं। अनेक स्थानों पर पूरे महीने दीप जलाने और तुलसी की पूजा करने की परंपरा भी प्रचलित है।
कार्तिक मास का प्रमुख संदेश है कि मनुष्य अपने जीवन में सदाचार, संयम, सेवा और आध्यात्मिक चिंतन को स्थान दे। इस महीने में किए जाने वाले धार्मिक कार्य व्यक्ति को आत्मिक शांति प्रदान करने के साथ-साथ समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का बोध भी कराते हैं।
भगवान विष्णु की योगनिद्रा से जागरण: देवोत्थानी एकादशी
कार्तिक मास का एक प्रमुख धार्मिक प्रसंग भगवान विष्णु की योगनिद्रा से जागने की मान्यता से जुड़ा है। पौराणिक परंपरा के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी को भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद चातुर्मास का समय आरंभ होता है। मान्यता है कि कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी, जिसे देवोत्थानी या देवउठनी एकादशी कहा जाता है, को भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं। भगवान विष्णु के जागरण के साथ ही चातुर्मास का समापन माना जाता है। इसके बाद विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है। इस दिन श्रद्धालु भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, व्रत रखते हैं और घरों तथा मंदिरों में दीप जलाते हैं। देवोत्थानी एकादशी का संबंध तुलसी विवाह से भी है। अनेक क्षेत्रों में इस दिन या इसके आसपास तुलसी और भगवान शालिग्राम का विवाह संपन्न कराया जाता है। इस परंपरा के माध्यम से प्रकृति, पवित्रता और पारिवारिक मंगल की भावना को अभिव्यक्त किया जाता है।
कार्तिक मास को दामोदर मास के नाम से भी जाना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण के अनेक नामों में दामोदर एक विशेष नाम है। पौराणिक कथा के अनुसार, बाल्यकाल में माता यशोदा ने श्रीकृष्ण की शरारतों से परेशान होकर उन्हें रस्सी से बांधने का प्रयास किया था। संस्कृत में 'दाम' का अर्थ रस्सी और 'उदर' का अर्थ पेट है। इसी प्रसंग के कारण श्रीकृष्ण का नाम दामोदर पड़ा। इस कथा में वात्सल्य, प्रेम और भक्ति का सुंदर संदेश छिपा है। भगवान श्रीकृष्ण को माता यशोदा ने जिस प्रेम से बांधा, वह इस बात का प्रतीक माना जाता है कि सच्चे प्रेम और निष्कपट भक्ति के सामने ईश्वर भी भक्त के स्नेह से बंध जाते हैं।
कार्तिक मास में श्रीकृष्ण की विशेष पूजा, भजन-कीर्तन और दीपदान किया जाता है। वैष्णव परंपरा में इस महीने भगवान दामोदर की आराधना का विशेष महत्व है। अनेक श्रद्धालु प्रतिदिन दीप जलाकर भगवान श्रीकृष्ण से सुख, शांति और सद्बुद्धि की प्रार्थना करते हैं।
कार्तिक मास का नाम भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र भगवान कार्तिकेय की स्मृति से भी जुड़ा हुआ माना जाता है। भगवान कार्तिकेय को स्कंद, कुमार और मुरुगन जैसे नामों से भी जाना जाता है। वे देवताओं के सेनापति तथा साहस, शौर्य और विजय के प्रतीक माने जाते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, तारकासुर नामक असुर ने अपनी शक्ति से देवताओं को परेशान कर दिया था। उसका वध करने के लिए भगवान कार्तिकेय ने देवसेना का नेतृत्व किया और युद्ध में तारकासुर का संहार किया। यह कथा अधर्म पर धर्म की विजय और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का संदेश देती है। भगवान कार्तिकेय का चरित्र मनुष्य को साहस, अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और दृढ़ संकल्प की प्रेरणा देता है। यद्यपि कार्तिक मास और भगवान कार्तिकेय के संबंध की व्याख्या विभिन्न धार्मिक परंपराओं में अलग-अलग मिल सकती है, फिर भी यह प्रसंग भारतीय पौराणिक साहित्य में विशेष स्थान रखता है।
 अंधकार पर प्रकाश की विजय कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को दीपावली का पर्व मनाया जाता है। यह भारत के सबसे प्रमुख त्योहारों में से एक है। दीपावली का अर्थ है दीपों की पंक्ति। इस दिन घरों, मंदिरों, दुकानों और सार्वजनिक स्थलों पर दीपक जलाए जाते हैं तथा रंगोली और सजावट के माध्यम से वातावरण को उत्सवमय बनाया जाता है।
दीपावली को सामान्यतः भगवान श्रीराम के चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटने की स्मृति से जोड़ा जाता है। कई परंपराओं में इस दिन माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा भी की जाती है। व्यापारी वर्ग के लिए यह पर्व नए लेखा-वर्ष और आर्थिक समृद्धि की कामना से भी जुड़ा है।
दीपावली का आध्यात्मिक संदेश है कि मनुष्य अपने भीतर के अज्ञान, अहंकार, ईर्ष्या और नकारात्मकता को दूर करके ज्ञान, प्रेम और सद्भाव का प्रकाश फैलाए। दीपक का छोटा-सा प्रकाश भी अंधकार को दूर करने में सक्षम होता है। इसी प्रकार मनुष्य का एक छोटा-सा सद्कर्म भी किसी दूसरे के जीवन में आशा और प्रसन्नता ला सकता है।
आज के समय में दीपावली को पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी के साथ मनाना भी आवश्यक है। मिट्टी के दीपकों का उपयोग, जरूरतमंदों की सहायता और ध्वनि तथा वायु प्रदूषण से बचाव इस पर्व की सार्थकता को और बढ़ा सकते हैं।
 प्रकृति और गौ-संरक्षण का संदेश कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को अनेक क्षेत्रों में गोवर्धन पूजा मनाई जाती है। इसे अन्नकूट पर्व भी कहा जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण, गोवर्धन पर्वत, गौमाता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार, ब्रजवासी इंद्रदेव की पूजा की तैयारी कर रहे थे। भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें समझाया कि उनके जीवन और आजीविका में गोवर्धन पर्वत, वन, पशु और प्रकृति का महत्वपूर्ण योगदान है। इसके बाद ब्रजवासियों ने गोवर्धन की पूजा की। इससे क्रोधित होकर इंद्रदेव ने मूसलाधार वर्षा की, तब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाकर ब्रजवासियों और उनके पशुओं की रक्षा की।
इस प्रसंग का मुख्य संदेश प्रकृति के महत्व को समझना और उसके प्रति कृतज्ञ रहना है। गोवर्धन पूजा हमें सिखाती है कि मनुष्य का जीवन पर्यावरण, जल, वनस्पति और पशुधन से गहराई से जुड़ा हुआ है।
इस दिन विभिन्न प्रकार के पकवान बनाकर भगवान को अर्पित किए जाते हैं। मंदिरों में अन्नकूट के दर्शन होते हैं और श्रद्धालु सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना करते हैं।
भाई दूज: भाई-बहन के प्रेम का पावन पर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया को भाई दूज मनाया जाता है। इसे यम द्वितीया भी कहा जाता है। भैया दूज  के  दिन  बहने अपने भाई की लम्बी उम्र  के लिए  बहने द्वारा गाय की गोबर  से यम यमीन का घर  बनाकर  यम यमीन की मूर्ति वनाते है । चिडचिडी का पौधा , ईट यम यमीन के घर  में रखे जाते है , बहन भाई  यमुना नदी मे स्नानऔर उपासानाकरते है । भगवान चित्रगुप्त , कलम ,दवात की उपासना तथा पूजनकर मनोवांक्षितफलप्राप्तकरते है।  नारियल , बजर व चना , मिश्री  , पुष्प  , दीपक,  सिन्दूर  , रोरी , फल चढाते और  धूप  जलाए  जाते है और  मुसल से काटेदार चिड़चिड़ा पौधे तथा पक्की ईट को कूटती है। भाई-बहन के स्नेह, विश्वास और पारिवारिक संबंधों की मजबूती का प्रतीक है। 
पौराणिक मान्यता के अनुसार, इस दिन यमराज अपनी बहन यमुना के घर गए थे। यमुना ने उनका आदर-सत्कार किया और उनके मंगल की कामना की। इससे प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें वरदान दिया। इसी कथा के आधार पर भाई दूज मनाने की परंपरा प्रचलित हुई। इस दिन बहनें अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाती हैं, उनकी सुख-समृद्धि और दीर्घायु की कामना करती हैं। भाई भी अपनी बहनों के प्रति स्नेह व्यक्त करते हैं और उन्हें उपहार देते हैं। भाई दूज का महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठान में नहीं, बल्कि पारिवारिक रिश्तों में प्रेम, सम्मान और जिम्मेदारी को बनाए रखने में भी है। यह पर्व याद दिलाता है कि जीवन की व्यस्तताओं के बीच अपनों के लिए समय निकालना आवश्यक है।
 छठ पूजा: सूर्य उपासना और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का लोकपर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को छठ पूजा मनाई जाती है। यह पर्व विशेष रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। आज देश के अन्य हिस्सों में भी इसकी लोकप्रियता बढ़ रही है। छठ पूजा में सूर्यदेव और छठी मैया की उपासना की जाती है। सूर्य को ऊर्जा, जीवन और प्रकाश का स्रोत माना जाता है। इस पर्व में श्रद्धालु परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और संतान के कल्याण की कामना करते हैं। छठ पूजा की प्रमुख विशेषता इसकी कठिन साधना, पवित्रता और अनुशासन है। सामान्यतः यह पर्व चार दिनों तक मनाया जाता है।
पहला दिन — नहाय-खाय: श्रद्धालु स्नान करके शुद्ध भोजन ग्रहण करते हैं और पर्व की शुरुआत करते हैं।
दूसरा दिन — खरना: इस दिन व्रती दिनभर उपवास रखने के बाद शाम को पूजा करके प्रसाद ग्रहण करते हैं। इसके बाद कठिन व्रत का क्रम शुरू होता है।
तीसरा दिन — संध्या अर्घ्य: श्रद्धालु नदी, तालाब या अन्य जलाशयों के किनारे पहुंचकर अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देते हैं।
चौथा दिन — उषा अर्घ्य: प्रातःकाल उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का समापन किया जाता है।
छठ पूजा में प्रकृति और पर्यावरण के प्रति सम्मान की भावना स्पष्ट दिखाई देती है। इसमें सूर्य, जल और स्वच्छता को विशेष महत्व दिया जाता है। यह पर्व सामूहिक सहयोग, आत्मसंयम और पारिवारिक एकता का भी अद्भुत उदाहरण है।
कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवोत्थानी एकादशी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं। इस अवसर पर श्रद्धालु व्रत रखते हैं और भगवान विष्णु की पूजा करते हैं। देवोत्थानी एकादशी के साथ तुलसी विवाह की परंपरा भी जुड़ी हुई है। कई स्थानों पर तुलसी विवाह एकादशी को, जबकि कुछ क्षेत्रों में कार्तिक द्वादशी या अन्य निकटवर्ती तिथियों पर आयोजित किया जाता है।
इस धार्मिक परंपरा में तुलसी के पौधे और भगवान शालिग्राम का विवाह कराया जाता है। तुलसी को हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना गया है। धार्मिक दृष्टि से यह भगवान विष्णु के प्रति भक्ति और गृहस्थ जीवन में मंगल की कामना का प्रतीक है।
तुलसी विवाह के अवसर पर घरों में पूजा की जाती है, तुलसी के पौधे को सजाया जाता है और विवाह से संबंधित पारंपरिक रीति-रिवाज निभाए जाते हैं। इस आयोजन में परिवार के सदस्य तथा पड़ोसी भी भाग लेते हैं।
तुलसी विवाह का संदेश यह है कि भारतीय परंपरा में प्रकृति और आध्यात्मिकता का गहरा संबंध है। तुलसी के पौधे की देखभाल करना और हरित वातावरण बनाए रखना इस परंपरा के व्यावहारिक महत्व को भी दर्शाता है।
कार्तिक मास की पूर्णिमा को अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस दिन अनेक श्रद्धालु पवित्र नदियों में स्नान करते हैं, दान-पुण्य करते हैं और दीपदान करते हैं। कार्तिक पूर्णिमा का धार्मिक महत्व भगवान शिव, भगवान विष्णु और अन्य देवी-देवताओं की उपासना से जुड़ा हुआ है।
पौराणिक कथा के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक असुर का वध किया था। त्रिपुरासुर के अत्याचारों से देवता परेशान थे। भगवान शिव ने उसका संहार करके देवताओं को भयमुक्त किया। इस विजय की खुशी में देवताओं ने दीप जलाकर उत्सव मनाया। इसी मान्यता के आधार पर कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरारी पूर्णिमा तथा देव दीपावली के रूप में भी जाना जाता है।
विशेष रूप से वाराणसी में देव दीपावली का अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है। गंगा के घाटों पर हजारों-लाखों दीप जलाए जाते हैं। दीपों की रोशनी, मंदिरों की सजावट, गंगा आरती और धार्मिक आयोजनों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है।
कार्तिक पूर्णिमा का संबंध सिख धर्म के प्रथम गुरु, गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व से भी है। गुरु नानक देव जी ने मानवता, समानता, सेवा, सत्य और ईश्वर की भक्ति का संदेश दिया। उनका जीवन समाज में प्रेम और भाईचारे की भावना को मजबूत करने की प्रेरणा देता है।
इस प्रकार कार्तिक पूर्णिमा विभिन्न धार्मिक परंपराओं के बीच आध्यात्मिक एकता और सद्भाव का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करती है।
कार्तिक मास में प्रातःकाल स्नान करने की परंपरा बहुत पुरानी है। अनेक श्रद्धालु सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करते हैं और इसके बाद भगवान की पूजा-अर्चना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस महीने में पवित्र नदियों और जलाशयों में स्नान करना पुण्यदायी माना जाता है। दान का भी विशेष महत्व है। जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र, कंबल और अन्य उपयोगी वस्तुएं देना सेवा और करुणा की भावना को मजबूत करता है। दान का वास्तविक उद्देश्य केवल धार्मिक पुण्य प्राप्त करना नहीं, बल्कि दूसरों के दुखों को कम करने का प्रयास भी है। दीपदान कार्तिक मास की सबसे सुंदर परंपराओं में से एक है। घरों के आंगन, मंदिरों, तुलसी के पौधे और नदी के घाटों पर दीप जलाए जाते हैं। दीपक प्रकाश, ज्ञान, आशा और सकारात्मकता का प्रतीक है।
इन परंपराओं के माध्यम से कार्तिक मास मनुष्य को बाहरी स्वच्छता के साथ-साथ आंतरिक शुद्धता का भी संदेश देता है। सत्य बोलना, दूसरों की सहायता करना, क्रोध पर नियंत्रण रखना और अपने कर्तव्यों का पालन करना भी इस महीने की आध्यात्मिक साधना का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
कार्तिक मास भारतीय समाज में सामूहिक उत्सवों और सामाजिक एकता का विशेष अवसर है। इस दौरान परिवार के सदस्य एक साथ पूजा-पाठ करते हैं, रिश्तेदारों से मिलते हैं और पारंपरिक रीति-रिवाजों में भाग लेते हैं।
दीपावली घरों में स्वच्छता और सजावट की प्रेरणा देती है। गोवर्धन पूजा प्रकृति और पशुधन के महत्व को उजागर करती है। भाई दूज पारिवारिक संबंधों को मजबूत करती है, जबकि छठ पूजा सामूहिक अनुशासन, समर्पण और स्वच्छता का संदेश देती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में कार्तिक मास का संबंध कृषि, पशुपालन और लोकजीवन से भी है। इस समय अनेक स्थानों पर धार्मिक मेले, लोकगीत, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सामुदायिक आयोजन होते हैं। इस महीने में मनाए जाने वाले पर्व विभिन्न समुदायों और परंपराओं को एक-दूसरे के निकट लाते हैं। इनका मूल संदेश मानवता, सहयोग, कृतज्ञता और सद्भाव है।
आज के व्यस्त जीवन में कार्तिक मास की परंपराएं हमें कुछ महत्वपूर्ण जीवन-मूल्यों की याद दिलाती हैं। सुबह जल्दी उठना, नियमित दिनचर्या अपनाना, ध्यान और प्रार्थना के लिए समय निकालना तथा जरूरतमंदों की सहायता करना जीवन को अधिक संतुलित बना सकता है।
इस महीने के पर्व पर्यावरण संरक्षण की प्रेरणा भी देते हैं। छठ पूजा में जलाशयों की स्वच्छता, गोवर्धन पूजा में प्रकृति के प्रति सम्मान और दीपावली में प्रकाश का महत्व पर्यावरण के साथ संतुलित जीवन जीने का संदेश देते हैं।
कार्तिक मास को सार्थक बनाने के लिए केवल धार्मिक अनुष्ठान करना ही पर्याप्त नहीं है। हमें अपने व्यवहार में भी प्रेम, सत्य, विनम्रता और सेवा को स्थान देना चाहिए। त्योहारों पर जरूरतमंदों की सहायता करना, भोजन की बर्बादी रोकना, स्वच्छता बनाए रखना और प्रदूषण से बचना इस महीने की भावना को वास्तविक जीवन में उतारने के अच्छे तरीके हैं।
कार्तिक मास हिंदू धर्म में आस्था, भक्ति, साधना और उत्सवों का अद्भुत संगम है। भगवान विष्णु की योगनिद्रा से जागने की मान्यता, भगवान श्रीकृष्ण के दामोदर स्वरूप की उपासना, भगवान कार्तिकेय की वीरता, भगवान शिव द्वारा त्रिपुरासुर वध की कथा तथा दीपावली, गोवर्धन पूजा, भाई दूज, छठ पूजा और देव दीपावली जैसे पर्व इस महीने को विशेष बनाते हैं।
यह महीना हमें सिखाता है कि जीवन में प्रकाश का अर्थ केवल दीपक जलाना नहीं, बल्कि ज्ञान, करुणा, सदाचार और प्रेम को अपनाना भी है। दान का अर्थ केवल वस्तुएं देना नहीं, बल्कि जरूरतमंदों के प्रति संवेदनशील होना है। पूजा का अर्थ केवल धार्मिक अनुष्ठान करना नहीं, बल्कि अपने आचरण को बेहतर बनाना भी है।
कार्तिक मास की वास्तविक सार्थकता तभी है, जब हम इसकी धार्मिक परंपराओं के साथ-साथ इनके भीतर निहित मानवीय मूल्यों को भी अपने जीवन में अपनाएं। यदि हम अपने मन से अज्ञान और नकारात्मकता का अंधकार दूर करके सेवा, सद्भाव और सत्य का प्रकाश फैलाएं, तो कार्तिक मास का यह पावन संदेश पूरे वर्ष हमारे जीवन को आलोकित कर सकता है।


अश्विन मास और अश्विनी कुमार


अश्विन मास:  आध्यात्मिक परंपराएँ
सत्येंद्र कुमार पाठक 

हिंदू धर्म में कालगणना, ऋतुचक्र और धार्मिक पर्वों का विशेष महत्त्व है। भारतीय पंचांग के बारह चंद्रमासों में अश्विन मास का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यह मास वर्षा ऋतु की समाप्ति और शरद ऋतु के आगमन का संदेश देता है। प्रकृति में नवीनता, वातावरण में स्वच्छता और जनजीवन में उत्सवों की उमंग इस महीने की विशेष पहचान है।
अश्विन मास को धार्मिक दृष्टि से पितरों के स्मरण, शक्ति की उपासना, धर्म की विजय और चंद्रमा की पूर्ण कलाओं से जोड़कर देखा जाता है। इसी महीने में पितृपक्ष, शारदीय नवरात्रि, विजयादशमी और शरद पूर्णिमा जैसे प्रमुख पर्व मनाए जाते हैं। इन पर्वों के माध्यम से भारतीय संस्कृति में पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, नारीशक्ति के सम्मान, अधर्म पर धर्म की विजय और प्रकृति के प्रति श्रद्धा का संदेश मिलता है।
लोकभाषा में इस महीने को ‘क्वार’ या ‘कुवार’ भी कहा जाता है। ग्रामीण भारत में क्वार मास का संबंध खेतों में पकती फसलों, बदलते मौसम और आगामी उत्सवों से भी रहा है।
सनातन  पंचांग में अश्विन मास का नामकरण अश्विनी नक्षत्र से संबंधित माना जाता है। परंपरागत अमांत चंद्र पंचांग में जिस मास की पूर्णिमा के समय चंद्रमा अश्विनी नक्षत्र के निकट स्थित होता है, उसे अश्विन मास कहा जाता है। हालांकि, मास-निर्धारण की व्याख्या में क्षेत्रीय पंचांग-पद्धतियों के अनुसार अंतर मिलता है। ‘अश्विन’ शब्द का संबंध वैदिक परंपरा के अश्विनी कुमारों से भी जोड़ा जाता है। अश्विनी कुमार देवताओं के दिव्य चिकित्सक माने गए हैं। वे आरोग्य, जीवनशक्ति, सौंदर्य और पुनर्यौवन के प्रतीक हैं।
ऋग्वेद में अश्विनी कुमारों की स्तुति अनेक सूक्तों में की गई है। वैदिक ऋषियों ने उन्हें संकटों से रक्षा करने वाले, रोगियों को स्वस्थ करने वाले तथा पीड़ितों की सहायता करने वाले देवताओं के रूप में स्मरण किया है। इस प्रकार अश्विन मास का नाम केवल एक कालखंड का परिचायक नहीं है, बल्कि इसके साथ स्वास्थ्य, जीवनशक्ति और कल्याण की धार्मिक अवधारणाएँ भी जुड़ी हुई हैं।
 ऋग्वेद, प्रथम मंडल, सूक्त 3, 34 और 46; तथा ऋग्वेद के अन्य अश्विन-स्तुतिपरक सूक्त के अनुसार  पौराणिक परंपरा में अश्विनी कुमारों को देवताओं के वैद्य के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है।  उनके नाम नासत्य और दस्र हैं। वे देवताओं और मनुष्यों को रोग, पीड़ा तथा संकट से मुक्ति दिलाने वाले दिव्य चिकित्सक माने जाते हैं।
वैदिक साहित्य में अश्विनी कुमारों से संबंधित अनेक आख्यान मिलते हैं। इनमें ऋषि च्यवन के पुनर्यौवन, दृष्टिहीनों की सहायता और संकटग्रस्त व्यक्तियों के उद्धार जैसी कथाएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
महाभारत की परंपरा में पांडवों में नकुल और सहदेव को अश्विनी कुमारों का पुत्र माना गया है। इस मान्यता के कारण भी अश्विनी कुमारों का संबंध स्वास्थ्य, सौंदर्य, बुद्धिमत्ता और सामर्थ्य से जोड़ा जाता है।
अश्विन मास में आरोग्य और दीर्घायु की कामना से की जाने वाली धार्मिक साधनाओं को इसी व्यापक सांस्कृतिक संदर्भ में समझा जा सकता है। हालाँकि, प्रत्येक धार्मिक फल को किसी विशेष महीने से जोड़ने वाले विधान का उल्लेख संबंधित ग्रंथ और उसकी परंपरा के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
प्रमुख संदर्भ: ऋग्वेद के अश्विन-स्तुतिपरक सूक्त; महाभारत, आदि पर्व; तथा विभिन्न पुराणों में वर्णित अश्विनी कुमारों के आख्यान है ।
अश्विन मास का धार्मिक महत्त्व मुख्यतः चार प्रमुख भावनाओं पर आधारित है—
पितरों के प्रति कृतज्ञता: पितृपक्ष में पूर्वजों का स्मरण, श्राद्ध और तर्पण किया जाता है।
शक्ति की उपासना: शारदीय नवरात्रि में माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा होती है।
धर्म की विजय: विजयादशमी के माध्यम से सत्य, न्याय और सदाचार की प्रतिष्ठा का संदेश दिया जाता है।
प्रकृति और चंद्रमा के प्रति श्रद्धा: शरद पूर्णिमा को चंद्रमा की पूर्णता, शीतलता और समृद्धि के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
इन पर्वों के माध्यम से अश्विन मास भारतीय जीवन में आध्यात्मिक अनुशासन, सामाजिक सहभागिता और पारिवारिक परंपराओं को सुदृढ़ करता है।
यह महीना मनुष्य को अपने अतीत के प्रति कृतज्ञ होने, वर्तमान में सदाचार अपनाने और भविष्य के लिए मंगलकामना करने की प्रेरणा देता है।
अश्विन मास के कृष्ण पक्ष को अनेक प्रचलित पंचांगों में पितृपक्ष के रूप में मनाया जाता है। यह अवधि पितरों के स्मरण, श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के लिए विशेष मानी जाती है।
यहाँ एक पंचांग संबंधी तथ्य समझना आवश्यक है। पितृपक्ष सामान्यतः भाद्रपद पूर्णिमा से आरंभ होकर अश्विन अमावस्या तक चलता है। इसलिए इसका पूरा कालखंड केवल अश्विन मास के भीतर नहीं आता। फिर भी इसके अधिकांश दिन अश्विन कृष्ण पक्ष में पड़ते हैं।
पितृपक्ष का उद्देश्य
हिंदू धार्मिक मान्यता के अनुसार मनुष्य पर देवऋण, ऋषिऋण और पितृऋण का विचार लागू होता है। पितरों का स्मरण परिवार की वंशपरंपरा, संस्कारों और पूर्वजों के योगदान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है।
श्राद्ध का संबंध श्रद्धा से माना जाता है। इस अवसर पर परिवार अपनी परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान करता है।
पितृपक्ष में प्रचलित प्रमुख कर्म में पितरों के निमित्त तर्पण करना।निर्धारित तिथि पर श्राद्ध करना। परंपरा के अनुसार पिंडदान करना। ब्राह्मणों, जरूरतमंदों अथवा योग्य व्यक्तियों को भोजन कराना। अन्न, वस्त्र तथा अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करना। दिवंगत परिजनों का स्मरण करते हुए उनके सद्गुणों को जीवन में अपनाना। पितृपक्ष की अंतिम अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है। इसे उन पितरों के निमित्त श्राद्ध करने के लिए भी महत्त्वपूर्ण माना जाता है जिनकी मृत्यु-तिथि ज्ञात न हो या जिनका श्राद्ध निर्धारित तिथि पर न हो पाया हो।
पितृपक्ष की विधियों में क्षेत्र, कुलपरंपरा और गृह्यसूत्रों के अनुसार भिन्नता मिलती है। इसलिए विस्तृत कर्मकांड के लिए अपने परिवार की परंपरा अथवा योग्य आचार्य का मार्गदर्शन लेना उचित है। मनुस्मृति, अध्याय 3; महाभारत, अनुशासन पर्व; तथा गरुड़ पुराण की प्रचलित श्राद्ध-संबंधी परंपराएँ हे। 
अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक शारदीय नवरात्रि मनाई जाती है। यह पर्व शक्ति की उपासना, आत्मसंयम और आध्यात्मिक साधना का प्रतीक है।
नवरात्रि में माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की परंपरा प्रचलित है। इन्हें नवदुर्गा में माँ शैलपुत्रीमाँ , ब्रह्मचारिणी ,  माँ चंद्रघंटा
माँ कूष्मांडा, माँ स्कंदमाता ,माँ कात्यायनी ,माँ कालरात्रि ,माँ महागौरी , माँ सिद्धिदात्री है। 
भक्त अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार उपवास, पूजा, जप, ध्यान, दुर्गासप्तशती का पाठ तथा कन्या पूजन करते हैं। कुछ लोग नौ दिनों तक व्रत रखते हैं, जबकि अन्य प्रथम और अंतिम दिन अथवा अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार उपवास करते हैं। मार्कण्डेय पुराण के अंतर्गत देवीमाहात्म्य में देवी दुर्गा और महिषासुर के संघर्ष का विस्तृत वर्णन मिलता है। कथा के अनुसार महिषासुर के अत्याचार से त्रस्त देवताओं की शक्तियों के संयोग से आदिशक्ति प्रकट हुईं। देवी ने महिषासुर का वध कर देवताओं और संसार को उसके आतंक से मुक्त कराया।
यह आख्यान शक्ति, साहस और धर्म की प्रतिष्ठा का प्रतीक है। नवरात्रि की उपासना में इसी दिव्य शक्ति के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है।
धार्मिक दृष्टि से नवरात्रि केवल बाहरी पूजा का पर्व नहीं, बल्कि आंतरिक विकारों पर विजय प्राप्त करने का अवसर भी है। क्रोध, लोभ, अहंकार और अन्याय जैसी प्रवृत्तियों पर संयम स्थापित करना इस पर्व का महत्त्वपूर्ण नैतिक संदेश है। मार्कण्डेय पुराण, देवीमाहात्म्य अथवा दुर्गासप्तशती, विशेषतः मध्यम चरित्र में महिषासुरमर्दिनी का आख्यान है ।
अश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी को विजयादशमी अथवा दशहरा मनाया जाता है। यह पर्व भारतीय संस्कृति में विजय, शौर्य, सदाचार और धर्म की प्रतिष्ठा का प्रतीक है।
विजयादशमी से दो प्रमुख पौराणिक परंपराएँ जुड़ी हुई हैं।
श्रीराम और रावण का प्रसंग है। रामायण की प्रचलित परंपरा के अनुसार भगवान श्रीराम ने लंका के राजा रावण का वध करके माता सीता को उसके बंधन से मुक्त कराया। रावण का वध अन्याय, अहंकार और अधर्म के अंत का प्रतीक माना जाता है।
दशहरे के अवसर पर अनेक स्थानों पर रामलीला का आयोजन किया जाता है और रावण, कुंभकर्ण तथा मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है।
माँ दुर्गा और महिषासुर का प्रसंग में दूसरी प्रमुख परंपरा में विजयादशमी को देवी दुर्गा की महिषासुर पर विजय के रूप में मनाया जाता है। यह परंपरा शक्ति की उपासना और दुष्ट प्रवृत्तियों के विनाश का संदेश देती है।
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में विजयादशमी का स्वरूप अलग-अलग हो सकता है। कहीं शस्त्रपूजा होती है, कहीं सरस्वती पूजा के बाद विद्यारंभ किया जाता है और कहीं दुर्गा प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ उत्सव संपन्न होता है।
इस प्रकार विजयादशमी का मूल संदेश यह है कि शक्ति का उपयोग न्याय और लोककल्याण के लिए होना चाहिए तथा अहंकार और अन्याय का अंत निश्चित है।
प्रमुख संदर्भ: वाल्मीकि रामायण, युद्धकांड; तथा मार्कण्डेय पुराण का देवीमाहात्म्य।
अश्विन मास की पूर्णिमा को सामान्यतः शरद पूर्णिमा कहा जाता है। इसे कोजागरी पूर्णिमा, रास पूर्णिमा अथवा क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार अन्य नामों से भी जाना जाता है।
वर्षा ऋतु के बाद आकाश स्वच्छ होने और चंद्रमा के उज्ज्वल दिखाई देने के कारण इस पूर्णिमा का प्राकृतिक सौंदर्य विशेष रूप से आकर्षक होता है।
कई क्षेत्रों में शरद पूर्णिमा को माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। पूर्वी भारत और अन्य क्षेत्रों की कुछ परंपराओं में इसे कोजागरी लक्ष्मी पूजा के रूप में मनाया जाता है।
‘कोजागरी’ शब्द का संबंध लोकप्रचलित प्रश्न ‘को जागर्ति?’ अर्थात ‘कौन जाग रहा है?’ से जोड़ा जाता है। धार्मिक लोकमान्यता के अनुसार इस रात जागरण, पूजा और भक्ति करने वालों पर देवी लक्ष्मी की कृपा होती है।
ब्रज की वैष्णव परंपराओं में शरद पूर्णिमा का संबंध भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला से भी जोड़ा जाता है। इस कारण यह तिथि कृष्णभक्तों के लिए विशेष महत्त्व रखती है।
खीर बनाने की परंपरा
शरद पूर्णिमा की रात खुले आकाश के नीचे खीर रखने और अगले दिन प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा अनेक परिवारों में प्रचलित है। कुछ लोग मानते हैं कि चंद्रमा की किरणों से खीर में विशेष गुण आ जाते हैं।
यह एक धार्मिक और लोकपरंपरागत विश्वास है। चंद्रमा की रोशनी में रखने मात्र से खीर के विशेष चिकित्सकीय लाभ सिद्ध नहीं होते। खीर को खुले में रखने पर धूल, कीट और अन्य दूषित पदार्थों से बचाना चाहिए।
शरद पूर्णिमा का सांस्कृतिक संदेश शीतलता, शांति, समृद्धि और सामूहिक आनंद से जुड़ा हुआ है।
प्रमुख संदर्भ: श्रीमद्भागवत महापुराण, दशम स्कंध में वर्णित शरदकालीन रासलीला; तथा विभिन्न क्षेत्रों की कोजागरी लक्ष्मी पूजा संबंधी परंपराएँ।
8. अश्विन मास में दान का महत्त्व
हिंदू धर्म में दान को पुण्य, करुणा और सामाजिक उत्तरदायित्व का माध्यम माना गया है। अश्विन मास में अन्नदान, वस्त्रदान और जरूरतमंदों की सहायता का विशेष महत्त्व अनेक धार्मिक परंपराओं में बताया जाता है।
शिवपुराण के संदर्भ में अन्न अथवा धान्यदान से संबंधित फलश्रुतियों का उल्लेख मिलता है। हालाँकि, किसी विशिष्ट श्लोक में अश्विन मास के दौरान अन्नदान से धन-धान्य की वृद्धि का स्पष्ट विधान होने का दावा करने से पहले उस श्लोक और उसके अध्याय की पुष्टि आवश्यक है।
दान का व्यापक सिद्धांत भगवद्गीता में भी मिलता है।
भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय, श्लोक 20 में सात्त्विक दान का वर्णन इस प्रकार किया गया है—
“दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥”
भावार्थ: जो दान कर्तव्य समझकर, किसी प्रत्युपकार की अपेक्षा किए बिना, उचित स्थान, समय और पात्र के अनुसार दिया जाता है, वह सात्त्विक दान कहलाता है।
इस सिद्धांत के अनुसार दान का वास्तविक महत्त्व केवल धन प्राप्त करने की कामना में नहीं, बल्कि सेवा, करुणा और निःस्वार्थ भाव में निहित है।
अश्विन मास में व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार निम्नलिखित कार्य कर सकता है—
जरूरतमंदों को अन्न और भोजन देना।
निर्धन विद्यार्थियों को पुस्तकों और अध्ययन-सामग्री में सहायता देना।
वृद्धों, दिव्यांगों और असहाय व्यक्तियों की सहायता करना।
पशु-पक्षियों के लिए सुरक्षित ढंग से भोजन और पानी की व्यवस्था करना।
धार्मिक अवसरों पर स्वच्छता तथा सामुदायिक सेवा में योगदान देना।
प्रमुख संदर्भ: श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 17, श्लोक 20–22; तथा दानधर्म संबंधी हिंदू धर्मशास्त्रीय परंपराएँ।
9. अश्विन मास के व्रत और संयम संबंधी मान्यताएँ
अश्विन मास में अनेक धार्मिक व्रत किए जाते हैं। इनमें नवरात्रि का व्रत, पितृपक्ष में निर्धारित नियमों का पालन और शरद पूर्णिमा का व्रत प्रमुख हैं।
महाभारत के अनुशासन पर्व में विभिन्न व्रतों, दान और धार्मिक आचरणों के फल का वर्णन मिलता है। अश्विन मास में एक समय भोजन करके व्रत करने से प्रज्ञा, संतान अथवा समृद्धि प्राप्त होने संबंधी विशिष्ट कथन का उल्लेख करते समय मूल संस्कृत पाठ और अध्याय-संख्या की जाँच करना आवश्यक है। बिना प्रमाणित पाठ के किसी कथन को महाभारत का निश्चित उद्धरण नहीं मानना चाहिए।
सामान्य रूप से व्रत का उद्देश्य आत्मसंयम, श्रद्धा, मन की एकाग्रता और सदाचार को प्रोत्साहित करना है।
व्रत करने वालों को अपनी शारीरिक स्थिति, आयु और स्वास्थ्य के अनुसार नियम अपनाने चाहिए। रोग, गर्भावस्था, वृद्धावस्था अथवा नियमित दवाओं के सेवन की स्थिति में कठोर उपवास करने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है।
10. अश्विन मास और ऋतु परिवर्तन
अश्विन मास का संबंध केवल धार्मिक उत्सवों से नहीं, बल्कि भारतीय ऋतुचक्र से भी है।
वर्षा ऋतु के बाद वातावरण में धीरे-धीरे परिवर्तन होने लगता है। कई क्षेत्रों में आकाश अधिक स्वच्छ दिखाई देता है, वर्षा की तीव्रता कम होती है और शरद ऋतु का प्रभाव बढ़ता है।
परंपरागत भारतीय कालगणना में शरद ऋतु के अंतर्गत अश्विन और कार्तिक मास को रखा जाता है।
ग्रामीण समाज में इस समय का कृषि संबंधी महत्त्व भी है। वर्षा के बाद खेतों की स्थिति, फसलों की वृद्धि और आगामी कृषि कार्यों के आधार पर किसानों की दिनचर्या बदलती है। स्थानीय जलवायु के अनुसार कृषि गतिविधियों में भिन्नता होती है।
इस प्रकार अश्विन मास धार्मिक जीवन, प्रकृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बीच संबंध को भी अभिव्यक्त करता है।
11. अश्विन मास के प्रमुख पर्वों का संक्षिप्त परिचय
अश्विन मास से संबंधित प्रमुख पर्वों को निम्नलिखित रूप में समझा जा सकता है—
पर्व या धार्मिक अवसर
सामान्य तिथि या अवधि
प्रमुख महत्त्व
पितृपक्ष
भाद्रपद पूर्णिमा से अश्विन अमावस्या तक
पितरों का स्मरण, श्राद्ध और तर्पण
शारदीय नवरात्रि
अश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक
माँ दुर्गा की उपासना
दुर्गाष्टमी
नवरात्रि का आठवाँ दिन
देवी दुर्गा की विशेष पूजा
महानवमी
नवरात्रि का नौवाँ दिन
शक्ति की आराधना और परंपरानुसार कन्या पूजन
विजयादशमी
अश्विन शुक्ल दशमी
धर्म की विजय और अन्याय का अंत
शरद पूर्णिमा
अश्विन पूर्णिमा
लक्ष्मी पूजा, चंद्रमा की उपासना और कृष्ण की रासलीला से जुड़ी परंपराएँ
ध्यान दें: हिंदू पंचांग में तिथि का आरंभ और अंत स्थानीय सूर्योदय, चंद्रगति तथा पंचांग-पद्धति के अनुसार निर्धारित होता है। इसलिए किसी पर्व की अंग्रेजी तारीख प्रत्येक वर्ष बदल सकती है। कुछ पर्वों की तिथि के निर्धारण में स्थानीय परंपराओं और उदयातिथि का भी महत्त्व होता है।
अश्विन मास के धार्मिक अनुष्ठान केवल परंपरा निभाने तक सीमित नहीं हैं। वे व्यक्ति और समाज को कई नैतिक शिक्षाएँ देते हैं।
पहली शिक्षा—पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता: पितृपक्ष हमें अपने पूर्वजों के योगदान, संस्कारों और पारिवारिक विरासत को याद रखने की प्रेरणा देता है।
दूसरी शिक्षा—शक्ति और साहस का सम्मान: नवरात्रि माँ दुर्गा की आराधना के माध्यम से यह संदेश देती है कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होने के लिए साहस और आत्मविश्वास आवश्यक हैं।
तीसरी शिक्षा—सत्य की विजय: विजयादशमी बताती है कि अहंकार, अन्याय और अत्याचार चाहे कितने ही शक्तिशाली क्यों न हों, उनका प्रतिरोध आवश्यक है।
चौथी शिक्षा—दान और सेवा: अन्नदान तथा जरूरतमंदों की सहायता से समाज में सहयोग, करुणा और सद्भाव की भावना विकसित होती है।
पाँचवीं शिक्षा—प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता: शरद पूर्णिमा और ऋतु परिवर्तन से जुड़ी परंपराएँ हमें प्रकृति की सुंदरता तथा जीवन में संतुलन के महत्त्व का स्मरण कराती हैं।
13. अश्विन मास के प्रमुख शास्त्रीय संदर्भ
अश्विन मास की धार्मिक परंपराओं का अध्ययन करते समय निम्नलिखित ग्रंथ उपयोगी हैं—
1. ऋग्वेद: अश्विनी कुमारों के स्वरूप, कार्यों और स्तुति को समझने के लिए ऋग्वेद के अश्विन-स्तुतिपरक सूक्त महत्त्वपूर्ण हैं।
2. महाभारत: आदि पर्व में अश्विनी कुमारों और पांडवों से संबंधित परंपराएँ मिलती हैं। अनुशासन पर्व में दान, व्रत और धर्माचरण के अनेक प्रसंग वर्णित हैं।
3. मार्कण्डेय पुराण: इसके अंतर्गत देवीमाहात्म्य में माँ दुर्गा और महिषासुर के युद्ध तथा देवी की विजय का विस्तृत वर्णन है।
4. वाल्मीकि रामायण: युद्धकांड में श्रीराम और रावण के युद्ध तथा रावण-वध का आख्यान मिलता है, जो दशहरे की प्रचलित धार्मिक व्याख्या का प्रमुख आधार है।
5. श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कंध में भगवान श्रीकृष्ण की शरदकालीन रासलीला का वर्णन है, जो शरद पूर्णिमा से संबंधित वैष्णव परंपराओं के लिए महत्त्वपूर्ण है।
6. श्रीमद्भगवद्गीता: अध्याय 17, श्लोक 20–22 में सात्त्विक, राजसिक और तामसिक दान का विवेचन है।
7. मनुस्मृति: अध्याय 3 में श्राद्ध, पितृकर्म और गृहस्थ के धार्मिक कर्तव्यों से संबंधित विभिन्न विधान मिलते हैं।
8. गरुड़ पुराण: इसकी प्रचलित परंपराओं में मृत्यु, परलोक, श्राद्ध और पितृकर्म से संबंधित विवेचन मिलता है।
इन ग्रंथों का उपयोग करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि प्रत्येक आधुनिक लोकाचार या क्षेत्रीय पर्व-विधान का वर्णन किसी एक प्राचीन ग्रंथ में उसी रूप में मिलना आवश्यक नहीं है। अनेक परंपराएँ स्थानीय मान्यताओं, पुराणकथाओं और पीढ़ियों से चले आ रहे आचारों के मेल से विकसित हुई हैं।
अश्विन मास भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन का एक महत्त्वपूर्ण कालखंड है। यह पितरों के प्रति श्रद्धा, माँ दुर्गा की आराधना, श्रीराम की विजय और शरद पूर्णिमा की चंद्रमयी छटा के माध्यम से जीवन को विविध आध्यात्मिक संदेश प्रदान करता है।
अश्विन मास की विशेषता यह है कि इसमें स्मरण और संकल्प, साधना और उत्सव, श्रद्धा और सेवा—सभी का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। पितृपक्ष हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है, नवरात्रि शक्ति और आत्मविश्वास जगाती है, विजयादशमी सत्य की प्रतिष्ठा का संदेश देती है और शरद पूर्णिमा शांति, सौंदर्य तथा समृद्धि की कामना से जुड़ती है।
इस दृष्टि से अश्विन मास केवल हिंदू पंचांग का एक महीना नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के उन मूल्यों का प्रतीक है जो परिवार, समाज और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित करने की प्रेरणा देते हैं। अश्विन मास का वास्तविक संदेश है—पूर्वजों का सम्मान, शक्ति की उपासना, धर्म का पालन, जरूरतमंदों की सेवा और जीवन में सदाचार की स्थापना है।


बुधवार, अक्टूबर 07, 2026

देवभूमि परिभ्रमण

देवभूमि की पावन गोद में हिमालयी कालजयी यात्रा
 सत्येन्द्र कुमार पाठक 

यात्रा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने का नाम नहीं है। यात्रा मनुष्य के भीतर छिपी उस जिज्ञासा को जगाती है, जो उसे प्रकृति, इतिहास, संस्कृति और अध्यात्म से जोड़ती है। किसी अनजाने भूगोल की ओर बढ़ते हुए जब आँखों के सामने नए दृश्य खुलते हैं, तब बाहर की दुनिया के साथ-साथ भीतर की दुनिया भी बदलने लगती है। प्रत्येक पड़ाव एक अनुभव बन जाता है और प्रत्येक दृश्य स्मृति में कविता की तरह अंकित हो जाता है। जब यात्रा में इतिहास की खोज, साहित्य की संवेदना, अध्यात्म की चेतना और सामाजिक सरोकार सम्मिलित हो जाएँ, तब वह केवल पर्यटन नहीं रहती; वह जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय बन जाती है।
मगध की ऐतिहासिक और पौराणिक धरती से आरंभ हुई हमारी यह यात्रा इसी अनुभूति की यात्रा थी। करपी (अरवल) की शांत ग्रामीण माटी, जहानाबाद की सांस्कृतिक चेतना और पटना की ऐतिहासिक हलचल से निकलकर हम हिमालय की विराटता, उसकी बर्फीली चोटियों, गहरी घाटियों, प्राचीन तीर्थों और जीवनदायिनी नदियों तक पहुँचे। हरिद्वार, ऋषिकेश, देवप्रयाग, जोशीमठ, बद्रीनाथ, माना, केदारनाथ, रुद्रप्रयाग और गंगोत्री के पड़ावों ने इस यात्रा को केवल तीर्थाटन न रहने देकर एक व्यापक सांस्कृतिक अनुभव में बदल दिया।
यह यात्रा भारत की उस सनातन जीवनधारा को निकट से अनुभव करने का प्रयास थी, जिसने युगों से ऋषियों, मनीषियों, कवियों और इतिहासवेत्ताओं को प्रेरित किया है।
लंबी यात्रा का आनंद केवल मार्ग और गंतव्य में नहीं, बल्कि सहयात्रियों की संगति में भी छिपा होता है। हमारे दल में विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े ऐसे आत्मीय व्यक्तित्व थे, जिनके कारण यह यात्रा निरंतर संवाद, चिंतन और आनंद का अवसर बनी रही।
मेरे साथ प्रवीण कुमार पाठक, जिला जीविका, औरंगाबाद के ट्रेनिंग ऑफिसर, थे। यात्रा-प्रबंधन, अनुशासन और समन्वय में उनकी सक्रिय भूमिका ने कठिन परिस्थितियों को भी सहज बनाया। सत्येंद्र कुमार मिश्र, पंजाब नेशनल बैंक के सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी, अपने अनुभव, गंभीरता और शांत स्वभाव के कारण दल के लिए एक अभिभावक की तरह रहे। कठिन चढ़ाई में उनका उत्साह विशेष रूप से प्रेरणादायक था।
हरियाणा से आए सुप्रसिद्ध लेखक एवं कवि त्रिलोक चंद सेन अपनी सहज काव्यात्मक संवेदना से यात्रा को निरंतर सरस बनाए रखते थे। पर्वत, नदी, मंदिर और बादलों का कोई भी दृश्य उनकी काव्य-दृष्टि से अछूता नहीं रहता।
डॉ. उषा श्रीवास्तव, 'स्वर्णिम कला केंद्र' की अध्यक्षा, प्रकृति को देखने की अपनी कलात्मक दृष्टि के कारण प्रत्येक दृश्य में सौंदर्य का नया आयाम खोज लेती थीं।
इन सबके बीच यात्रा का एक स्वाभाविक सूत्र था—साथ चलना, साथ देखना, साथ अनुभव करना और फिर उन अनुभवों को एक-दूसरे से बाँटना। भोर की पहली किरण के साथ करपी की शांत धरती को प्रणाम कर हमने यात्रा आरंभ की। गाँव की परिचित गलियाँ पीछे छूट रही थीं और मन किसी अज्ञात, किंतु आकर्षक संसार की ओर बढ़ रहा था। स्थानीय वाहन और बसों के माध्यम से करपी से जहानाबाद और फिर पटना की ओर बढ़ते हुए बिहार के ग्रामीण जीवन को निकट से देखने का अवसर मिला। खेत, छोटे बाजार, सड़क किनारे की चहल-पहल और ग्रामीण जनजीवन—सब कुछ यात्रा के आरंभिक अध्याय में अपनी सहज उपस्थिति दर्ज करा रहे थे। जहानाबाद के साहित्यिक और सांस्कृतिक परिवेश की स्मृतियाँ मन में थीं। 'निर्माण भारती' और 'मगध ज्योति' जैसे साहित्यिक संदर्भों ने यात्रा के आरंभ को केवल भौगोलिक प्रस्थान नहीं रहने दिया।
पटना जंक्शन पहुँचे तो यात्रा ने एक नया रूप धारण कर लिया। रेलगाड़ी की प्रतीक्षा, प्लेटफॉर्म की चहल-पहल और फिर डिब्बे में प्रवेश—ऐसा लगा जैसे हम परिचित संसार से निकलकर किसी नए अनुभव-लोक में प्रवेश कर रहे हों। ट्रेन आगे बढ़ी तो खिड़की के बाहर बिहार के मैदान पीछे छूटने लगे। खेतों की हरियाली, गाँवों की बस्तियाँ और दूर तक फैला समतल भूभाग धीरे-धीरे रात के अंधकार में विलीन होने लगा। ट्रेन की छुक-छुक के बीच परिचय संवाद में बदला और संवाद साहित्यिक गोष्ठी में। त्रिलोक चंद सेन ने अपनी कविताएँ सुनाईं। मैंने गंगा के मैदानी भूभाग में विकसित भारतीय सभ्यता की चर्चा की। आगामी पड़ावों की रूपरेखा पर भी बातचीत होती रही। रात गहराती गई, लेकिन मन में हिमालय के प्रथम दर्शन की उत्सुकता बढ़ती गई।
द्वितीय पड़ाव : हरिद्वार और ऋषिकेश—गंगा का स्पर्श प्रातः जब ट्रेन हरिद्वार पहुँची, तब वातावरण में एक अलग ही ऊर्जा थी। हवा में शीतलता थी और आसपास धार्मिक आस्था की गूँज।
हरिद्वार—हरि का द्वार। शिवालिक की पहाड़ियों से निकलकर गंगा जब मैदानी भूभाग की ओर आती है, तब इस क्षेत्र का आध्यात्मिक महत्व और भी गहरा हो जाता है।
हम हर की पौड़ी पहुँचे। ब्रह्मकुंड के निकट गंगा का प्रवाह देखते हुए मन अनायास ही शांत होने लगा। गंगा के जल का स्पर्श केवल शारीरिक अनुभव नहीं था; वह भीतर तक उतरने वाली अनुभूति थी। संध्या की गंगा आरती तो जैसे उस दिन का चरम अनुभव थी। असंख्य दीपों की लौ जब गंगा की धारा पर झिलमिलाने लगी, तो लगा मानो आकाश के असंख्य तारों ने नदी का आश्रय ले लिया हो।
मैंने उस दृश्य को कलात्मक दृष्टि से देखते हुए कहा कि यह प्रकाश, आस्था और स्थापत्य का अद्भुत समन्वय है। उनकी बात में सौंदर्य-दृष्टि और श्रद्धा दोनों का मेल था। अगले दिन हम ऋषिकेश पहुँचे। यहाँ पर्वतों का विस्तार आरंभ हो चुका था। गंगा अब अधिक चंचल और वेगवती दिखाई देती थी। राम झूला और लक्ष्मण झूला से नीचे बहती गंगा को देखना रोमांचकारी था। आश्रमों, योग-केंद्रों और स्वर्गाश्रम का वातावरण मन को भीतर की ओर मोड़ता था। ऐसा लगा जैसे हरिद्वार ने हमें गंगा का स्पर्श दिया और ऋषिकेश ने उसके अर्थ को समझने का अवसर है ।
 देवप्रयाग—दो धाराओं का एकत्व ऋषिकेश से आगे बढ़ते ही यात्रा का स्वरूप बदल गया। घुमावदार पर्वतीय सड़कें, एक ओर ऊँचे पहाड़ और दूसरी ओर गहरी घाटियाँ—प्रकृति का विराट रूप सामने था। कुछ घंटों के बाद हम देवप्रयाग पहुँचे। देवप्रयाग पंचप्रयागों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहीं भागीरथी और अलकनंदा का संगम होता है और संयुक्त धारा को गंगा नाम प्राप्त होता है। संगम का दृश्य मन को देर तक बाँधे रहा। दोनों नदियों के जल का रंग और प्रवाह स्पष्ट रूप से अलग दिखाई देता था। एक ओर अपेक्षाकृत शांत अलकनंदा और दूसरी ओर अधिक वेगवान भागीरथी—और फिर दोनों का एक धारा में विलीन हो जाना है। मैं कुछ देर संगम के सामने खड़ा रहा। मन में एक विचार आया—नदी का अपना कोई आग्रह नहीं होता। वह अपनी पहचान को मिटाकर व्यापक अस्तित्व का हिस्सा बन जाती है।
“भागीरथी संकल्प और पुरुषार्थ की प्रतीक है, अलकनंदा धैर्य और ज्ञान की। जब संकल्प और ज्ञान का मिलन होता है, तभी समन्वय की गंगा जन्म लेती है।” अहंकार का त्याग करके समष्टि में विलीन होना ही जीवन की सार्थकता है। देवप्रयाग का वह संगम हमारे लिए केवल नदियों का मिलन नहीं था; वह विचारों का भी संगम था। देवप्रयाग से श्रीनगर, रुद्रप्रयाग और कर्णप्रयाग होते हुए हम जोशीमठ पहुँचे। जोशीमठ, जिसे ज्योतिर्मठ भी कहा जाता है, भारतीय दार्शनिक और धार्मिक परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। आदि शंकराचार्य से जुड़ी परंपराओं और यहाँ के आध्यात्मिक वातावरण ने मन को प्रभावित किया। पर्वतीय ऊँचाई से दिखाई देती बर्फ से ढकी चोटियाँ जैसे आकाश को छू रही थीं।
जोशीमठ से बद्रीनाथ की ओर बढ़ते हुए मार्ग और अधिक संकरा और रोमांचक होता गया। जैसे-जैसे हम बद्रीनाथ घाटी के निकट पहुँचे, वातावरण में श्रद्धा की अनुभूति गहरी होती गई। नर और नारायण पर्वतों के मध्य स्थित बद्रीनाथ धाम का दृश्य अत्यंत मनोहारी था। अलकनंदा की तीव्र धारा, मंदिर का रंगीन स्वरूप और आसपास फैला हिमालय—इन सबका सम्मिलित प्रभाव अवर्णनीय था। तप्त कुंड का गर्म जल हिमालय की ठंडी हवा के बीच प्रकृति के एक अद्भुत रहस्य का अनुभव कराता था।
बद्रीविशाल के दर्शन के समय मन अनायास ही शांत हो गया। मंदिर से बाहर निकलकर त्रिलोक चंद सेन ने मुस्कराते हुए अपनी पंक्तियाँ सुनाईं—
“नर-नारायण के शिखर, अलकनंदा का छोर।
बद्रीनाथ के द्वार पर, खिंचा चला मन मोर॥”
उनकी पंक्तियों में उस क्षण की अनुभूति सहज रूप से उतर आई थी। माना और केशव प्रयाग—जहाँ सरस्वती की गर्जना सुनाई देती है । बद्रीनाथ से आगे माना गाँव की ओर बढ़ना अपने आप में रोमांचकारी था। सीमा के निकट स्थित यह गाँव हिमालयी जीवन, लोक-संस्कृति और भारतीय परंपरा का जीवंत परिचायक है। माना के आसपास के क्षेत्र में प्रकृति का रूप और अधिक विराट हो जाता है। केशव प्रयाग के निकट अलकनंदा और सरस्वती के संगम की स्थानीय धार्मिक मान्यता हमें आकर्षित करती रही। सरस्वती का प्रचंड प्रवाह चट्टानों के बीच से निकलता हुआ दिखाई देता है। उसका गर्जन मानो हिमालय के भीतर छिपी किसी प्राचीन कथा को स्वर दे रहा हो। माना में व्यास गुफा और गणेश गुफा के दर्शन किए। परंपरा इन्हें महर्षि वेदव्यास और महाभारत की रचना से जोड़ती है।
व्यास गुफा के निकट खड़े होकर मैंने सहयात्रियों से भारत की वाचिक परंपरा, ज्ञान-संस्कृति और साहित्य की दीर्घ परंपरा पर चर्चा की। मुझे लगा कि हिमालय की इन गुफाओं में केवल धार्मिक स्मृतियाँ नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की स्मृति भी सुरक्षित है।
प्रवीण कुमार पाठक ने स्थानीय हस्तशिल्प, ऊनी वस्त्रों और ग्रामीण आजीविका के साधनों को निकट से देखा। स्थानीय लोगों की मेहनत और आत्मनिर्भरता प्रशंसनीय लगी।'भारत की अंतिम चाय दुकान' पर बैठकर चाय पीना इस यात्रा की उन छोटी-छोटी स्मृतियों में से एक है, जो बड़े तीर्थों की स्मृतियों के साथ हमेशा जीवित रहती है। 
बद्रीनाथ से लौटकर हमारी यात्रा केदारनाथ घाटी की ओर मुड़ी। रुद्रप्रयाग से आगे बढ़ते हुए हम सोनप्रयाग पहुँचे और वहाँ से गौरीकुंड की ओर गए। गौरीकुंड के बाद यात्रा का सबसे कठिन चरण आरंभ होना था—केदारनाथ की पैदल चढ़ाई।
लाठियाँ संभाली गईं। सामान व्यवस्थित किया गया। शरीर को मानसिक रूप से तैयार किया गया।
और फिर एक साथ स्वर उठा— “हर-हर महादेव!”
पैदल मार्ग कठिन था। ऊँचाई बढ़ने के साथ साँसों पर दबाव बढ़ता जाता था। ठंडी हवा चेहरे से टकराती थी और नीचे मंदाकिनी का वेग निरंतर साथ चलता था।भीमबली और लिनचोली जैसे पड़ावों पर रुकते हुए हम आगे बढ़ते रहे।
इस यात्रा में सबसे सुंदर बात यह थी कि कोई अकेला नहीं चल रहा था। कोई थकता तो दूसरा उत्साह बढ़ाता। किसी की गति धीमी होती तो पूरा दल उसकी प्रतीक्षा करता। उस कठिन चढ़ाई ने हमें सिखाया कि तीर्थ का वास्तविक अर्थ केवल मंदिर तक पहुँचना नहीं, बल्कि उस मार्ग में स्वयं को पहचानना भी है।
सप्तम पड़ाव : केदारनाथ—हिमालय की गोद में महादेव
संध्या का समय था। तापमान तेजी से गिर रहा था। थके हुए शरीर के बावजूद केदारनाथ घाटी में प्रवेश करते ही मन में अद्भुत ऊर्जा का संचार हुआ। सामने हिमालय की विराट चोटियाँ थीं और उनके बीच प्राचीन केदारनाथ मंदिर अपनी गंभीर गरिमा के साथ खड़ा था। 2013 की आपदा की स्मृति इस क्षेत्र से जुड़ी हुई है। मंदिर के आसपास उस त्रासदी के निशान आज भी मनुष्य को प्रकृति की शक्ति का स्मरण कराते हैं। रात में मंदिर के आसपास प्रकाश की सज्जा हुई। शंख, घंटियों और डमरुओं की ध्वनि से घाटी गूँज उठी। ठंड तीव्र थी, लेकिन श्रद्धा उससे कहीं अधिक प्रबल। बाबा केदार के दर्शन के समय मन में केवल एक ही भावना थी—कृतज्ञता। गर्भगृह में दर्शन के पश्चात कुछ क्षण मौन रहा। शब्द जैसे उस अनुभूति को व्यक्त करने में असमर्थ थे।
अगली सुबह हिमालय की चोटियों पर जब सूर्य की पहली किरण पड़ी, तो बर्फ स्वर्णिम आभा से चमक उठी। वह दृश्य इतना अलौकिक था कि हम सभी कुछ देर तक निःशब्द उसे देखते रहे। केदारनाथ में हमने जाना कि कभी-कभी प्रकृति स्वयं प्रार्थना बन जाती है।
केदारनाथ से लौटकर हम पुनः रुद्रप्रयाग पहुँचे। यहाँ अलकनंदा और मंदाकिनी का संगम देखकर मन में एक बार फिर नदियों की उस महान यात्रा का विचार आया, जिसका हम कई दिनों से अनुसरण कर रहे थे। रुद्रप्रयाग के शांत वातावरण में कुछ देर ध्यान किया। इसके बाद हमारी यात्रा गंगोत्री की ओर बढ़ी। उत्तरकाशी से आगे हिमालय का स्वरूप फिर बदलता गया। देवदार और चीड़ के जंगलों से घिरे मार्ग, गहरी घाटियाँ और दूर दिखाई देती पर्वत-श्रृंखलाएँ मन को मोह रही थीं।
गंगोत्री पहुँचकर भागीरथी के दर्शन हुए। गंगा के अवतरण की कथा भारतीय चेतना में गहराई से अंकित है—राजा भगीरथ का तप, शिव की जटाओं में गंगा का अवतरण और फिर पृथ्वी पर उसका प्रवाह। गंगोत्री में भागीरथी की निर्मल धारा को देखते हुए लगा कि यह केवल एक नदी नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की भारतीय स्मृति का प्रवाह है।
मैंने “गंगा हमारी कृषि, संस्कृति और सभ्यता की जीवनरेखा रही है। इसलिए गंगा की रक्षा केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं, हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी भी है।” इस यात्रा का सबसे गहरा अनुभव शायद तीर्थों से भी अधिक नदियों का था। हमने सरस्वती की गर्जना सुनी, अलकनंदा की गंभीरता देखी, मंदाकिनी की चंचलता अनुभव की और भागीरथी के पुरुषार्थ को निकट से देखा। इन नदियों को देखते हुए मन ने उनके भीतर मानवीय जीवन के प्रतीक खोज लिए। सरस्वती—ज्ञान और वाणी की प्रतीक। अलकनंदा—धैर्य, समावेश और गंभीरता की प्रतीक। मंदाकिनी—भक्ति, समर्पण और प्रवाह की प्रतीक। भागीरथी—संकल्प, पुरुषार्थ और निरंतर प्रयास की प्रतीक। और फिर देवप्रयाग में इनका व्यापक सांस्कृतिक अर्थ गंगा के रूप में सामने आता है—समन्वय, समावेश और लोकमंगल की चेतना। नदियों के तट पर बिताए समय ने हमारे भीतर एक और प्रश्न जगाया—क्या हम आने वाली पीढ़ियों के लिए इन नदियों को उसी रूप में सुरक्षित रख पाएँगे?
हिमालय केवल तीर्थ नहीं है। वह जल का स्रोत, जैव-विविधता का आधार और करोड़ों लोगों के जीवन का सहारा है। इसलिए इस यात्रा ने हमारे भीतर श्रद्धा के साथ-साथ पर्यावरणीय दायित्व की भावना भी जगाई। गंगोत्री के दर्शन के बाद वापसी का समय आया। ऋषिकेश और हरिद्वार होते हुए हम पुनः रेलगाड़ी से पटना की ओर लौटे। वही ट्रेन, वही पटरियाँ और वही छुक-छुक की आवाज, लेकिन इस बार मन पहले जैसा नहीं था।
हम बदल चुके थे। जिस मार्ग को जाते समय हमने उत्सुकता से देखा था, अब वही मार्ग स्मृतियों के रूप में हमारे सामने था।
ट्रेन के डिब्बे में भी हमारी छोटी-सी साहित्यिक गोष्ठी चलती है।
मैं अपने नोट्स व्यवस्थित कर रहा था—कहाँ इतिहास था, कहाँ लोकश्रुति, कहाँ प्रकृति और कहाँ वह अनुभूति जिसे किसी प्रमाण या तर्क की आवश्यकता नहीं होती। पटना पहुँचे। फिर जहानाबाद, करपी और अपने-अपने गंतव्यों की ओर जाने का समय आया। विदाई के क्षण में लगा कि यात्रा समाप्त नहीं हुई है। वह तो अब हमारे भीतर शुरू हुई है।
 यात्रा जो भीतर चलती रहती है । करपी की माटी से आरंभ होकर हरिद्वार, ऋषिकेश, देवप्रयाग, जोशीमठ, बद्रीनाथ, माना, केदारनाथ, रुद्रप्रयाग और गंगोत्री तक पहुँची यह यात्रा हमारे लिए केवल भौगोलिक प्रवास नहीं थी।
यह आत्मा का प्रकृति से संवाद था।यह साहित्य का इतिहास से मिलन था।यह मनुष्य का नदी से साक्षात्कार था।यह श्रद्धा का अनुभव था और साथ ही स्वयं को समझने का अवसर भी।
हमने जाना कि हिमालय केवल बर्फ से ढकी चोटियों का नाम नहीं है। वह भारत की स्मृति है। उसकी नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं हैं; वे सभ्यता की वाहक हैं। उसके तीर्थ केवल मंदिर नहीं हैं; वे भारतीय मन की दीर्घ यात्रा के पड़ाव हैं।
देवप्रयाग ने हमें एकत्व का संदेश दिया। बद्रीनाथ ने ज्ञान और भक्ति का। माना ने हमारी साहित्यिक और वाचिक परंपरा की स्मृति जगाई। केदारनाथ ने संकल्प और आस्था की शक्ति दिखाई। गंगोत्री ने नदी और जीवन के संबंध को समझाया।
और इस पूरी यात्रा ने एक बात बार-बार कही—
मनुष्य जितना बाहर की यात्रा करता है, उतनी ही गहरी यात्रा उसके भीतर भी चलती रहती है।
आज जब उन दिनों को स्मरण करता हूँ तो आँखों के सामने हिमालय की चोटियाँ उभर आती हैं। कानों में मंदाकिनी और भागीरथी का प्रवाह सुनाई देता है। देवप्रयाग का संगम, बद्रीनाथ की घंटियाँ, केदारनाथ का शंखनाद और गंगोत्री की निर्मल धारा—सब कुछ स्मृति में एक साथ जीवित हो उठता है।
बसों, ऑटो और रेलगाड़ी से शुरू हुई वह यात्रा हिमालय की दुर्गम ऊँचाइयों तक पहुँची थी; किंतु उसका सबसे बड़ा गंतव्य कोई तीर्थ नहीं था। उसका गंतव्य था—मनुष्य के भीतर का वह स्थान, जहाँ प्रकृति, संस्कृति, इतिहास और अध्यात्म एक साथ मिलकर जीवन को अर्थ देते हैं। देवभूमि की वह पावन वायु, नदियों का गर्जन, हिमालय की निस्तब्धता और शिव-विष्णु की दिव्य उपस्थिति आज भी हमारे अंतर्मन में स्पंदित होती है। शायद यही यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि है— रास्ते समाप्त हो जाते हैं, किंतु यात्राएँ स्मृतियों में चलती रहती हैं।

बुधवार, सितंबर 30, 2026

जीतीया और माँ की ममता


जितिया: बिहार की माटी में जीवित जीमूतवाहन की त्याग-कथा..

मातृत्व, लोकविश्वास और करुणा का वह पर्व, जिसमें सदियों पुरानी कथा आज भी सांस लेती है बिहार  की सांस्कृतिक स्मृति में कुछ पर्व ऐसे हैं, जिनकी पहचान केवल पूजा-पद्धति से नहीं, बल्कि लोककथा, लोकगीत और पीढ़ियों से चली आ रही सामूहिक स्मृतियों से होती है। जितिया, जिसे जीवित्पुत्रिका या जिउतिया भी कहा जाता है, ऐसा ही एक पर्व है। संतान के दीर्घ जीवन, आरोग्य और मंगल की कामना से किया जाने वाला यह व्रत विशेष रूप से माताओं के बीच आस्था का बड़ा पर्व है। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई-मधेश के अनेक हिस्सों में इसकी परंपरा आज भी दिखाई देती है।बिहार  में जितिया का संसार और भी आत्मीय है। यहाँ यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि माँ की ममता, स्त्री की साधना, लोकगीतों की मिठास और पारिवारिक-सामुदायिक स्मृति का उत्सव बन जाता है। इसके केंद्र में है राजा जीमूतवाहन की वह कथा, जिसमें एक राजा ने किसी अपने स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि एक दूसरे प्राणी के जीवन की रक्षा के लिए अपना जीवन तक संकट में डाल दिया।
यही कारण है कि जितिया की कथा सुनते समय मिथिला की माताओं के लिए जीमूतवाहन केवल पौराणिक पात्र नहीं रह जाते; वे त्याग और करुणा के प्रतीक बन जाते हैं।
कथा का नायक कौन है जीमूतवाहन?
जीमूतवाहन का उल्लेख संस्कृत साहित्य की महत्वपूर्ण परंपरा में मिलता है। महाकवि हर्ष के संस्कृत नाटक ‘नागानन्द’ में उनकी कथा प्रमुख रूप से सामने आती है। इसके अतिरिक्त कथासरित्सागर की कथा-परंपरा में भी जीमूतवाहन का प्रसंग मिलता है।
इन साहित्यिक आख्यानों में जीमूतवाहन को विद्याधर वंश का राजा बताया गया है। भारतीय पौराणिक कल्पना में विद्याधर ऐसे दिव्य या अलौकिक प्राणी माने गए हैं, जिनके पास असाधारण शक्तियाँ होती हैं। कथा के अनुसार जीमूतवाहन के पिता का नाम जीमूतकेतु था। वे एक धार्मिक और प्रजावत्सल राजा थे। जीमूतवाहन स्वयं भी राजसी वैभव से अधिक धर्म, दया और परोपकार को महत्व देते थे। उनका राज्य कांचनपुर बताया गया है। लेकिन जीवन में एक ऐसा मोड़ आया, जब उन्होंने राजपाट और सांसारिक वैभव से दूरी बना ली और पिता के साथ मलय पर्वत की ओर चले गए। यहीं उनके जीवन में मलयवती का प्रवेश हुआ। कथा के अनुसार मलयवती सिद्धों के राजा विश्वावसु की पुत्री थीं। दोनों का विवाह हुआ। किंतु विवाह और गृहस्थ जीवन के बाद भी जीमूतवाहन का मूल स्वभाव—दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझना—बदला नहीं।
एक माँ का विलाप और बदल गया इतिहास है ! मलय पर्वत के आसपास की कथा में एक दिन जीमूतवाहन की दृष्टि एक अत्यंत दुखी युवक पर पड़ी। वह नागकुमार शंखचूड़ था।
नागों और गरुड़ के बीच वैर की पौराणिक कथा भारतीय साहित्य में प्रसिद्ध है। जीमूतवाहन ने देखा कि शंखचूड़ की बारी गरुड़ के सामने जाने की थी। उसकी वृद्ध माता अपने पुत्र को मृत्यु के मुख में जाता देखकर विलाप कर रही थी।
यह दृश्य जीमूतवाहन को भीतर तक विचलित कर गया।
राजा होने के बावजूद उन्होंने अपने पद, अपने जीवन और अपने भविष्य के बारे में नहीं सोचा। उन्होंने सोचा—एक माँ के सामने उसके पुत्र की मृत्यु हो रही है और यदि मैं उसे बचा सकता हूँ तो मुझे ऐसा करना चाहिए। यहीं से जीमूतवाहन की कथा त्याग की ऐसी मिसाल बन जाती है, जिसे भारतीय लोकस्मृति ने सदियों तक सँजोकर रखा।
नागकुमार के स्थान पर स्वयं लेट गए ,जीमूतवाहन ने शंखचूड़ को उसके घर जाने के लिए कहा और स्वयं उसके स्थान पर जाने का निर्णय लिया। उन्होंने नागकुमार के स्थान पर स्वयं को प्रस्तुत कर दिया। गरुड़ वहाँ पहुँचा और जीमूतवाहन को नाग समझकर अपने पंजों में उठा लिया। कथा का सबसे मार्मिक पक्ष यही है कि जीमूतवाहन ने अपने प्राण बचाने का कोई प्रयास नहीं किया।
जब गरुड़ को उनके वास्तविक परिचय और त्याग का पता चला, तो वह भी इस असाधारण करुणा से प्रभावित हुआ। कथा के अनुसार अंततः नागों की बलि की परंपरा समाप्त हुई और अनेक प्राणियों के जीवन की रक्षा का मार्ग खुला।
इस कथा का संदेश केवल इतना नहीं कि एक राजा ने अपना जीवन दाँव पर लगाया। इसका बड़ा संदेश यह है कि सच्चा धर्म वह है जिसमें दूसरे के दुःख को देखकर मनुष्य निष्क्रिय न रहे।
जितिया में क्यों याद किए जाते हैं जीमूतवाहन?
यही प्रश्न जितिया की सांस्कृतिक आत्मा को समझने में मदद करता है। जितिया व्रत संतान के जीवन और मंगल की कामना से किया जाता है। जीमूतवाहन की कथा में भी एक माँ के पुत्र के जीवन की रक्षा सबसे महत्वपूर्ण घटना है।
एक ओर शंखचूड़ की माँ अपने पुत्र को बचाने के लिए व्याकुल है, दूसरी ओर जीमूतवाहन उस माँ के दुःख को समझकर स्वयं को संकट में डाल देते हैं।
इस प्रकार कथा में माँ और पुत्र का संबंध तथा दूसरे के लिए त्याग—दोनों भाव एक साथ दिखाई देते हैं।
लोकपरंपरा ने इन्हीं भावों को अपने तरीके से आत्मसात किया और जीमूतवाहन को जितिया व्रत के साथ जोड़ दिया।
मिथिला में जितिया: व्रत से आगे लोकजीवन
मिथिला में कोई भी बड़ा पर्व केवल धार्मिक विधि नहीं होता। उसके साथ गीत, भोजन, रिश्ते, स्मृतियाँ और स्थानीय लोकाचार जुड़ जाते हैं। जितिया भी इससे अलग नहीं है।
व्रत के दिनों में महिलाओं के बीच इसकी चर्चा, कथा-वाचन और पारंपरिक गीतों की परंपरा रही है। गाँवों में पहले यह दृश्य सामान्य था कि एक घर की बुजुर्ग महिला दूसरी महिलाओं और बच्चों को जितिया की कथा सुनाती थी।
कथा सुनाने की यह परंपरा अपने आप में एक लोक-विद्यालय थी। किताबों में दर्ज इतिहास से अलग, ऐसी कथाओं के माध्यम से परिवार की महिलाएँ आने वाली पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक स्मृति सौंपती थीं।
आज जीवनशैली बदल रही है, लेकिन यह परंपरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। अनेक परिवारों में आज भी जितिया के अवसर पर कथा और पूजा के माध्यम से वही सांस्कृतिक स्मृति दोहराई जाती है।
ओठगन से निर्जला व्रत तक
जितिया की तैयारी और अनुष्ठान में क्षेत्रीय विविधताएँ मिलती हैं। कई स्थानों पर व्रत से पहले ओठगन की परंपरा है। इसके बाद व्रती महिलाएँ कठिन उपवास का संकल्प लेती हैं।
जितिया व्रत का निर्जला स्वरूप विशेष रूप से प्रसिद्ध है। व्रती महिलाएँ संतान के कल्याण की कामना से अन्न और जल का त्याग करती हैं।
यह उपवास केवल शारीरिक संयम नहीं माना जाता, बल्कि लोकविश्वास में इसे संकल्प, श्रद्धा और मातृत्व की परीक्षा के रूप में देखा जाता है।
हालाँकि आधुनिक संदर्भ में स्वास्थ्य का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। लंबे समय तक निर्जला उपवास हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित नहीं हो सकता। इसलिए परंपरा का सम्मान करते हुए भी व्यक्तिगत स्वास्थ्य और चिकित्सकीय सलाह को ध्यान में रखना जरूरी है।
लोकगीतों में उतरती माँ की ममता
मिथिला की पहचान उसके लोकगीतों से है। विवाह हो, सोहर हो, छठ हो या कोई अन्य पर्व—गीतों के बिना मिथिला की लोकसंस्कृति अधूरी लगती है।
जितिया में भी लोकगीतों का अपना संसार है। इन गीतों में संतान के लिए मंगलकामना, माँ की चिंता, परिवार की खुशहाली और व्रत की कठिन साधना के भाव मिलते हैं।
इन गीतों का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इनमें शास्त्रीय भाषा की औपचारिकता नहीं, बल्कि लोकभाषा की सहज आत्मीयता होती है।
एक माँ अपनी संतान के लिए जो भाव मन में रखती है, वही लोकगीतों में स्वर पाता है। इसलिए जितिया के गीतों को केवल धार्मिक गीत कह देना उनके सांस्कृतिक महत्व को छोटा करना होगा। वे मिथिला के स्त्री-जीवन और उसकी भावनात्मक दुनिया के मौखिक दस्तावेज भी हैं।
स्त्रियों का अपना सांस्कृतिक संसार
जितिया में स्त्रियाँ केवल व्रती नहीं होतीं। वे इस पर्व की मुख्य वाहक भी हैं।
व्रत की तैयारी, पूजा, कथा, गीत और अगली पीढ़ी को परंपरा से परिचित कराने की जिम्मेदारी मुख्यतः उन्हीं के माध्यम से आगे बढ़ती रही है।
इस दृष्टि से जितिया मिथिला की स्त्रियों की सांस्कृतिक भूमिका को समझने का भी एक महत्वपूर्ण अवसर है।
घर के भीतर होने वाला यह अनुष्ठान दरअसल व्यापक सामाजिक स्मृति का निर्माण करता है। एक पीढ़ी की दादी जिस कथा को अपनी पोती को सुनाती है, वह केवल कथा नहीं होती—उसमें उस परिवार और समाज की कई पीढ़ियों का अनुभव छिपा होता है।
एक जरूरी ऐतिहासिक सावधानी
जीमूतवाहन के नाम को लेकर एक महत्वपूर्ण भ्रम भी मिलता है।
जितिया की कथा वाले जीमूतवाहन को 12वीं शताब्दी के प्रसिद्ध धर्मशास्त्री जीमूतवाहन से अलग समझना चाहिए। मध्यकालीन भारत के धर्मशास्त्रकार जीमूतवाहन को दायभाग के रचयिता के रूप में जाना जाता है। उनका संबंध बंगाल की विद्वत् परंपरा से था।
इसके विपरीत जितिया की कथा के जीमूतवाहन साहित्यिक-पौराणिक परंपरा के विद्याधर राजा हैं, जिनकी कथा नागानन्द और कथासरित्सागर जैसी रचनाओं में मिलती है।
समान नाम के कारण दोनों को एक ही व्यक्ति मानना उचित नहीं है।
बदलते समय में जितिया
आज मिथिला का सामाजिक जीवन तेजी से बदल रहा है। संयुक्त परिवारों की जगह छोटे परिवार ले रहे हैं। गाँवों से शहरों की ओर पलायन हुआ है। लोकगीतों की जगह कई बार मोबाइल फोन और सोशल मीडिया ने ले ली है।
फिर भी जितिया का सांस्कृतिक महत्व समाप्त नहीं हुआ।
बल्कि नए माध्यमों ने इसके गीतों और कथाओं को दूर-दराज के लोगों तक पहुँचाने का नया रास्ता खोल दिया है। विदेशों में रहने वाले मिथिलावासी भी अपने घर-परिवार की परंपराओं को डिजिटल माध्यमों से जोड़ रहे हैं।
इस बदलते समय में चुनौती यह है कि परंपरा केवल कर्मकांड बनकर न रह जाए। उसके पीछे छिपे करुणा, त्याग, मातृत्व और लोक-स्मृति के मूल भाव भी अगली पीढ़ी तक पहुँचें।
जीमूतवाहन की कथा का आज के लिए अर्थ
जीमूतवाहन की कथा को आज पढ़ते हुए उसका अर्थ केवल धार्मिक विश्वास तक सीमित नहीं रहता।
एक ऐसे समय में जब समाज में व्यक्तिगत स्वार्थ और प्रतिस्पर्धा की चर्चा अक्सर होती है, जीमूतवाहन का चरित्र दूसरे के जीवन को अपने जीवन से अधिक महत्व देने की कल्पना सामने रखता है।
उन्होंने यह नहीं पूछा कि सामने वाला किस जाति, समुदाय या कुल का है। उन्होंने केवल इतना देखा कि एक माँ अपने पुत्र को खोने वाली है और उसके दुःख को कम करने के लिए वे कुछ कर सकते हैं।
यही इस कथा की सबसे मानवीय शक्ति है।
निष्कर्ष
जितिया मिथिला की मिट्टी में रचा-बसा ऐसा पर्व है, जिसमें धर्म और लोकजीवन एक-दूसरे से अलग नहीं दिखाई देते। व्रत है, तो उसके साथ कथा है; कथा है, तो उसके साथ लोकगीत हैं; और लोकगीत हैं, तो उनमें माँ की ममता और परिवार की स्मृति जीवित है।
राजा जीमूतवाहन की कथा इस पूरे पर्व को एक गहरा नैतिक अर्थ देती है। उन्होंने एक नागकुमार के प्राण बचाने के लिए स्वयं को गरुड़ के सामने प्रस्तुत किया। उनका त्याग लोकस्मृति में इसलिए अमर हुआ क्योंकि उसमें किसी पुरस्कार या स्वार्थ की अपेक्षा नहीं थी।
बिहार  की माताएँ जब जितिया के दिन संतान की दीर्घायु के लिए संकल्प लेती हैं, तो उनके हाथों में केवल पूजा की सामग्री नहीं होती—उनके साथ सदियों पुरानी एक कथा भी होती है।
वह कथा कहती है कि जीवन का मूल्य केवल अपने लिए जीने में नहीं, बल्कि किसी दूसरे के जीवन की रक्षा करने में भी है।
और शायद यही कारण है कि समय बदलता रहा, पीढ़ियाँ बदलती रहीं, गाँवों की संरचना बदली, जीवन की गति बदली—लेकिन जीमूतवाहन की त्याग-कथा और जितिया की लोकआस्था आज भी मगध , अंग,   बज्जी , भोजपुर , मिथिला की स्मृति में जीवित है।

कैमूर की यात्रा वृतांत

कैमूर की इतिहास के बीच मेरी यात्रा...
सत्येंद्र कुमार पाठक 

यात्राएँ केवल रास्तों की दूरी तय करने का नाम नहीं होतीं। कई बार यात्रा हमें उन जगहों तक ले जाती है, जहाँ पहुँचकर लगता है कि हम किसी भूगोल को नहीं, बल्कि अपने भीतर के किसी अनजाने हिस्से को देख रहे हैं।
27 सितंबर 2026—विश्व पर्यटन दिवस की सुबह मेरी यात्रा इसी भाव के साथ आरंभ हुई। कैमूर की पहाड़ियों, उसके झरनों, नदियों, मंदिरों और इतिहास को करीब से देखने की इच्छा पहले से थी। इस बार उस इच्छा को यात्रा का रूप मिला। मेरे साथ थे जिला औरंगाबाद के जीविका ट्रेनिंग ऑफिसर श्री प्रवीण कुमार पाठक। साथ होने वाला एक परिचित व्यक्ति यात्रा को केवल यात्रा नहीं रहने देता; रास्ते में दिखाई देने वाले दृश्य, ठहराव और अनुभवों को साझा करने वाला कोई हो तो यात्रा की स्मृति और गहरी हो जाती है।
हमारी यात्रा का क्रम करपी, अरवल, जहानाबाद और औरंगाबाद से होते हुए भभुआ की ओर बढ़ा। यह केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने का रास्ता नहीं था। रास्ते बदल रहे थे, भू-दृश्य बदल रहा था और धीरे-धीरे मैदान से पहाड़ी अंचल की ओर बढ़ती यात्रा अपने भीतर एक अलग कहानी रच रही थी।
27 सितंबर का दिन था—विश्व पर्यटन दिवस। पर्यटन दिवस का अर्थ मेरे लिए केवल पर्यटन-स्थलों की सूची देखना नहीं है। पर्यटन का असली अर्थ तब समझ में आता है, जब किसी स्थान के प्राकृतिक सौंदर्य के साथ उसके इतिहास, संस्कृति और वहाँ रहने वाले लोगों के जीवन को भी महसूस किया जाए।
करपी से आगे बढ़ते हुए यात्रा ने अरवल और फिर जहानाबाद की दिशा पकड़ी। सड़क के दोनों ओर बदलता ग्रामीण दृश्य लगातार साथ चलता रहा। खेत, गाँव, छोटे बाजार, सड़क किनारे की दुकानें और लोगों की अपनी रोजमर्रा की दुनिया—इन सबके बीच से गुजरते हुए महसूस हुआ कि बिहार को समझने के लिए केवल उसके बड़े शहरों को देखना पर्याप्त नहीं है।
यहाँ की असली पहचान उसके गाँवों, खेतों, नदियों और उन रास्तों में भी छिपी है जिनसे होकर लोग पीढ़ियों से आते-जाते रहे हैं।
औरंगाबाद पहुँचना इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। यहीं हमारी यात्रा का रात्रि-विश्राम हुआ। दिन भर के रास्ते के बाद ठहरना आवश्यक भी था और उपयोगी भी। यात्रा में रात का विश्राम केवल शरीर को आराम देने के लिए नहीं होता; वह अगले दिन के अनुभवों के लिए मन को भी तैयार करता है।
औरंगाबाद की रात और अगले दिन का रास्ता
औरंगाबाद में रात बिताने के बाद यात्रा फिर आगे बढ़ी।
अगले दिन कैमूर की दिशा में बढ़ते हुए मन में सबसे अधिक उत्सुकता उन पहाड़ियों को लेकर थी, जिनके बारे में लंबे समय से सुनता आया था।
बिहार के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से का यह भूभाग मैदान से अलग दिखाई देता है। कैमूर का पठारी क्षेत्र अपने जंगलों, पहाड़ियों, जलप्रपातों और ऐतिहासिक स्थलों के कारण अपनी अलग पहचान रखता है। भभुआ की ओर बढ़ते हुए धीरे-धीरे यह अंतर अधिक स्पष्ट होने लगा।
भभुआ, आज के कैमूर जिले का मुख्यालय, इस क्षेत्र की यात्रा के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र है। जिला प्रशासन के अनुसार भभुआ ग्रैंड ट्रंक रोड से लगभग 14 किलोमीटर दक्षिण स्थित है और सड़क मार्ग से भभुआ रोड रेलवे स्टेशन से जुड़ा है।
मेरे लिए भभुआ केवल यात्रा का एक पड़ाव नहीं था। यह उस कैमूर का प्रवेश-द्वार था जिसे मैं इस यात्रा में समझना चाहता था—एक ऐसा कैमूर जहाँ मैदान समाप्त होते हुए पहाड़ शुरू होते हैं और जहाँ इतिहास तथा प्रकृति एक-दूसरे से अलग दिखाई नहीं देते।
माँ मुंडेश्वरी : पहाड़ी पर इतिहास का मौन - भभुआ से आगे भगवानपुर की दिशा में जाते हुए कैमूर की पहाड़ियों का स्वरूप अधिक स्पष्ट होने लगा। यहीं है माँ मुंडेश्वरी मंदिर, जो पंवरा/पियरा पहाड़ी के शिखर पर स्थित है। पहाड़ी की ऊँचाई लगभग 600 फीट बताई जाती है। मंदिर तक पहुँचते हुए मन में सबसे पहले जो भाव आया, वह भव्यता से अधिक प्राचीनता का था।
इतिहास हमेशा किसी संग्रहालय में बंद नहीं रहता। कभी-कभी वह पत्थरों में रहता है, कभी किसी पुराने मंदिर की दीवारों में और कभी किसी पहाड़ी की चुप्पी में। माँ मुंडेश्वरी का मंदिर इसी तरह इतिहास को अपने भीतर सँजोए हुए है। इसका अष्टकोणीय स्थापत्य, पत्थर की प्रतिमाएँ और प्राचीन धार्मिक परंपरा इस स्थान को विशिष्ट बनाती हैं। मंदिर के संबंध में प्राचीनता की तिथियों को लेकर विभिन्न आधिकारिक स्रोतों में अलग-अलग उल्लेख मिलते हैं। इसलिए इसे किसी एक निश्चित वर्ष से बाँधने के बजाय इतना कहना अधिक उचित है कि यह भारतीय उपमहाद्वीप के अत्यंत प्राचीन सक्रिय मंदिरों में गिना जाता है और इसकी स्थापत्य तथा पुरातात्त्विक परंपरा बहुत पुरानी है। माँ मुंडेश्वरी परिसर में खड़े होकर मुझे लगा कि यात्रा का अर्थ केवल देखना नहीं, बल्कि समय के सामने कुछ देर ठहरना भी है।
एक ओर वर्तमान था—आने-जाने वाले लोग, सड़क और आज का जीवन। दूसरी ओर वह पत्थर था जिसने सदियों को आते-जाते देखा होगा। मैंने महसूस किया कि पर्यटन यदि हमें केवल तस्वीरें देकर वापस भेज दे तो वह अधूरी यात्रा है। किसी स्थान की आत्मा को समझने की कोशिश ही यात्रा को अर्थ देती है।
कैमूर की ओर बढ़ता रास्ता में  माँ मुंडेश्वरी के बाद यात्रा ने कैमूर के दूसरे रंगों की ओर रास्ता बनाया। कैमूर का भूगोल दो अलग रूपों में दिखाई देता है—मैदानी क्षेत्र और पहाड़ी/पठारी क्षेत्र। जिले के पर्यटन विवरणों में भी इस भौगोलिक विभाजन का उल्लेख मिलता है। मैदानी हिस्से से पहाड़ी इलाके की ओर जाते हुए सड़क का अनुभव बदलता है। पेड़ अधिक दिखाई देने लगते हैं, दूर पहाड़ियों की रेखाएँ उभरती हैं और रास्ते में अचानक कोई घाटी या ऊँचाई सामने आ जाती है। यात्रा के दौरान ऐसे रास्तों पर गति अपने आप धीमी हो जाती है।शायद इसलिए नहीं कि सड़क कठिन है, बल्कि इसलिए कि आँखें बार-बार रास्ते से हटकर आसपास के दृश्य को देखने लगती हैं। कैमूर की पहाड़ियों में यह अनुभव बार-बार हुआ।
चेनपुर : इतिहास की परतें हमारी यात्रा में चेनपुर भी महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। चेनपुर भभुआ से पश्चिम की ओर स्थित है और कैमूर के ऐतिहासिक भूगोल का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहाँ किले, मकबरे और धार्मिक स्थलों से जुड़ी ऐतिहासिक स्मृतियाँ मिलती हैं। जिला प्रशासन के पर्यटन विवरण में चेनपुर के संदर्भ में बख्तियार खान का मकबरा, सूरी/अकबर काल से जुड़े किले और हर्सू ब्रह्म मंदिर का उल्लेख मिलता है। ऐसे स्थानों पर पहुँचकर मुझे हमेशा यह विचार आता है कि इतिहास किताबों में जितना व्यवस्थित दिखाई देता है, जमीन पर उतना ही बिखरा हुआ है। कहीं कोई पुराना पत्थर है, कहीं किसी स्थापत्य का अवशेष, कहीं मंदिर है और कहीं किसी पुराने शासन की स्मृति।
यात्रा इन बिखरी हुई स्मृतियों को जोड़ने का अवसर देती है।
अधौरा : जब कैमूर का असली पहाड़ी रूप सामने आया
कैमूर की यात्रा में अधौरा का नाम अपने आप में एक अलग आकर्षण रखता है।
यह कैमूर पठार का ऊँचा क्षेत्र है। जिला पर्यटन विवरण के अनुसार अधौरा लगभग 2000 फीट की ऊँचाई पर स्थित है और भभुआ से लगभग 58 किलोमीटर की दूरी पर है।
अधौरा की ओर बढ़ते हुए कैमूर का भूगोल एकदम अलग अनुभव देने लगता है। यहाँ पहाड़ केवल दूर दिखाई देने वाली वस्तु नहीं रहते; वे यात्रा के चारों ओर उपस्थित हो जाते हैं।
जंगल, ऊँचाई, घाटियाँ और पहाड़ी रास्ते—इन सबके बीच चलते हुए लगा कि बिहार के बारे में हमारी सामान्य कल्पना कितनी सीमित है।
अक्सर बिहार को मैदान, गंगा और कृषि के संदर्भ में देखा जाता है। लेकिन कैमूर की पहाड़ियाँ बताती हैं कि इसी बिहार के भीतर एक ऐसा भूभाग भी है जहाँ प्रकृति ने अपना दूसरा रूप सँजोकर रखा है।
तेलहर कुंड : पानी की आवाज में पहाड़ हैं ! कैमूर यात्रा का एक अत्यंत आकर्षक पड़ाव था तेलहर कुंड और तेलहर जलप्रपात।
कैमूर जिला प्रशासन के अनुसार तेलहर जलप्रपात की ऊँचाई लगभग 80 मीटर है। बिहार पर्यटन के विवरण में इसे रोहतास पठार के निकट, दुर्गावती नदी क्षेत्र के आसपास का प्राकृतिक स्थल बताया गया है। तेलहर की ओर जाते हुए पहाड़ी रास्तों का अपना आकर्षण है। रास्ता जितना आगे बढ़ता है, उतना ही मन में जलप्रपात को देखने की उत्सुकता बढ़ती जाती है।
और फिर जब पानी सामने आता है, तो कुछ क्षणों के लिए रास्ते की सारी थकान पीछे छूट जाती है। ऊँचाई से गिरता पानी केवल एक दृश्य नहीं होता। वह लगातार चलती हुई ध्वनि है।
पानी के गिरने की आवाज, आसपास की हरियाली और पहाड़ों की निस्तब्धता मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं जिसमें शहर का शोर बहुत दूर छूट जाता है।
मैंने वहाँ यह अनुभव किया कि प्रकृति को देखने और प्रकृति के बीच खड़े होने में बहुत अंतर है। तस्वीर में जलप्रपात सुंदर दिख सकता है, लेकिन उसके सामने खड़े होकर गिरते पानी की आवाज सुनना एक अलग अनुभव है। तेलहर ने मेरी यात्रा में इसी अनुभव को जोड़ा है! 
नदियाँ : कैमूर की जीवन-रेखाएँ है  ! कैमूर की कहानी उसके जल के बिना पूरी नहीं हो सकती। कर्मनाशा और दुर्गावती इस क्षेत्र की प्रमुख नदियों में हैं। कैमूर के मैदानी भूभाग का भूगोल इन नदियों से गहराई से जुड़ा है। जिले के पूर्वी हिस्से में कुदरा जैसी नदियाँ भी अपने क्षेत्रीय जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यात्रा में नदी को केवल एक जलधारा के रूप में देखना संभव नहीं था। नदी के किनारे बसे गाँव, खेतों की हरियाली और जल पर निर्भर जीवन बताते हैं कि किसी भूभाग का इतिहास केवल राजाओं और मंदिरों से नहीं बनता।
उसका इतिहास पानी भी लिखता है। कर्मनाशा नाम अपने भीतर अनेक लोक-स्मृतियाँ और ऐतिहासिक धारणाएँ लिए हुए है। लेकिन एक यात्री के रूप में मुझे उसके नाम से अधिक उसका भूगोल आकर्षित करता रहा—एक ऐसी नदी जो पहाड़ियों और मैदानों के बीच अपना रास्ता बनाती हुई आगे बढ़ती है।
करकटगढ़ : पानी, पहाड़ और इतिहास है! कर्मनाशा से जुड़ा करकटगढ़ जलप्रपात कैमूर की प्राकृतिक पहचान का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह चेनपुर क्षेत्र में कैमूर की पहाड़ियों के बीच स्थित है और बिहार पर्यटन के अनुसार यह क्षेत्र कभी मगरमच्छों के शिकार से जुड़ा रहा था। ब्रिटिश काल में यहाँ जलप्रपात को देखने के लिए एक डाक बंगले का भी उल्लेख मिलता है। आज करकटगढ़ को प्रकृति और जैव-विविधता के संदर्भ में देखा जाता है। यहाँ का जलप्रपात लगभग 100 फीट ऊँचा और करीब 300 फीट चौड़ा बताया जाता है।
जब मैं इन स्थानों के बारे में सोचता हूँ तो एक बात विशेष रूप से सामने आती है—प्रकृति के सामने मनुष्य का इतिहास कितना छोटा है।
शासन बदले, राजवंश बदले, अंग्रेज आए और चले गए, पर्यटन की अवधारणा बदली; लेकिन पहाड़ और जलप्रपात अपनी जगह बने रहे। यही किसी प्राकृतिक स्थल की सबसे बड़ी ताकत है।
कैमूर की पहाड़ियों में बिखरे झरने है!  कैमूर और आसपास की पहाड़ियों में केवल तेलहर और करकटगढ़ ही नहीं हैं। बिहार पर्यटन के विवरणों में बुधुआ, धन्सा, अमझोर और तुतला भवानी जैसे जलप्रपातों का भी उल्लेख मिलता है। इन सभी स्थानों को एक ही यात्रा में देख पाना संभव नहीं था, लेकिन इनके नाम सुनना और उनके बारे में जानना ही इस क्षेत्र की व्यापकता का एहसास कराता है।
कैमूर की पहाड़ियाँ अपने भीतर जल को सँजोए हुए हैं।
बरसात के बाद पहाड़ी ढलानों से निकलती छोटी-छोटी धाराएँ जब नीचे उतरती हैं तो अनेक जगहों पर झरनों का रूप ले लेती हैं। यही कारण है कि कैमूर का पर्यटन केवल किसी एक मंदिर या एक जलप्रपात तक सीमित नहीं किया जा सकता।
यह एक पूरा प्राकृतिक परिदृश्य है।
वैद्यनाथ और दुरौली : यात्रा में इतिहास के दूसरे पड़ाव में  कैमूर की यात्रा का एक दूसरा पक्ष उसके धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल हैं। वैद्यनाथ मंदिर रामगढ़ क्षेत्र में स्थित है। जिला पर्यटन विवरण इसे प्राचीन परंपरा से जोड़ता है और मंदिर परिसर से ऐतिहासिक सामग्री तथा सिक्कों के मिलने का उल्लेख करता है।
इसी प्रकार दुरौली में पुराने मंदिरों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें स्थानीय इतिहास में चेरो काल से जोड़ा जाता है। इन स्थानों को देखकर यह समझ में आता है कि कैमूर का इतिहास किसी एक कालखंड में बंद नहीं है। यहाँ प्राचीन धार्मिक परंपराएँ हैं, मध्यकालीन स्थापत्य की स्मृतियाँ हैं, स्थानीय लोकविश्वास हैं और आधुनिक समय का बदलता हुआ ग्रामीण जीवन भी है।
एक यात्री के लिए यह विविधता ही सबसे बड़ा आकर्षण है।
प्रवीण कुमार पाठक के साथ यात्रा इस पूरी यात्रा में मेरे साथ प्रवीण कुमार पाठक, जिला औरंगाबाद के जीविका ट्रेनिंग ऑफिसर, रहे।
साथी के साथ की गई यात्रा की अपनी एक सहजता होती है। रास्ते लंबे हों तो भी यात्रा का अनुभव साझा होता रहता है।
लेकिन इस यात्रा में मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि हम कैमूर को केवल घूमने की जगह के रूप में नहीं देख रहे थे।
हम रास्ते, भूगोल, इतिहास, पहाड़, पानी और स्थानीय जीवन—इन सबको एक साथ देखने की कोशिश कर रहे थे।
विश्व पर्यटन दिवस पर शुरू हुई इस यात्रा का मेरे लिए यही सबसे सार्थक पक्ष रहा।
27 सितंबर को शुरू हुई यात्रा के बाद 29 सितंबर 2026 को वापसी हुई। वापसी का रास्ता हमेशा आगे जाने के रास्ते से अलग होता है। जाते समय आँखें आगे देखती हैं—क्या मिलेगा, कैसा होगा, कहाँ रुकेंगे, क्या देखेंगे? वापसी में आँखें पीछे छूटे दृश्यों को याद करती हैं। कैमूर की पहाड़ियाँ पीछे छूट रही थीं, लेकिन यात्रा समाप्त नहीं हुई थी।
तेलहर का पानी, मुंडेश्वरी की पहाड़ी, कर्मनाशा का भूगोल, करकटगढ़ का जलप्रपात और अधौरा की पहाड़ी दुनिया—ये सब मन में अपने-अपने चित्र की तरह बने हुए थे। मुझे लगा कि यात्रा का वास्तविक अंत घर लौटने पर नहीं होता। वह तब समाप्त होती है जब हम उसके अनुभव को भूल जाते हैं।
और कुछ यात्राएँ भूलती ही नहीं हैं।
कैमूर ने मुझे क्या दिया? इस यात्रा से लौटते हुए मेरे मन में कैमूर की कोई एक तस्वीर नहीं थी। कैमूर मेरे लिए एक साथ कई रूपों में था। वह माँ मुंडेश्वरी की पहाड़ी पर खड़ा इतिहास था। वह तेलहर में गिरता हुआ पानी था। वह करकटगढ़ की घाटी में बहती कर्मनाशा थी। वह अधौरा की ऊँचाई और जंगल था।वह भभुआ का मैदानी जीवन था। वह चेनपुर की ऐतिहासिक स्मृतियाँ थीं।और वह उन रास्तों पर दिखाई देने वाला सामान्य ग्रामीण जीवन भी था, जो किसी पर्यटन पुस्तिका में शायद बहुत कम जगह पाता है। विश्व पर्यटन दिवस पर शुरू हुई यह यात्रा मुझे यह समझाकर लौटी कि पर्यटन केवल सुंदर स्थानों को देखने का माध्यम नहीं है। पर्यटन किसी भूगोल को समझने का माध्यम है।
किसी नदी को देखकर उसके किनारे बसे जीवन को समझना, किसी मंदिर को देखकर उसके पीछे की सदियों को महसूस करना, किसी जलप्रपात को देखकर पहाड़ों के जल-संसार को समझना और किसी गाँव से गुजरते हुए वहाँ के लोगों के जीवन की कल्पना करना—यही यात्रा को सार्थक बनाता है।
कैमूर ने मुझे प्रकृति और इतिहास के बीच कोई दीवार दिखाई ही नहीं।यहाँ पहाड़ इतिहास को सँभालते हैं, नदियाँ भूगोल को आकार देती हैं और झरने उन पहाड़ियों की जीवंत आवाज बन जाते हैं।
29 सितंबर को जब वापसी हुई, तब लगा कि मैं केवल कैमूर से लौट नहीं रहा हूँ।मैं अपने साथ कैमूर का एक हिस्सा लेकर लौट रहा हूँ—पहाड़ों की शांति, पानी की आवाज और उन रास्तों की स्मृति, जिन पर चलते हुए बिहार का एक ऐसा चेहरा सामने आया जिसे दूर से देखना संभव नहीं। शायद इसी का नाम यात्रा है।एक रास्ता हमें जहाँ ले जाता है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि लौटते समय वह रास्ता हमारे भीतर क्या छोड़ जाता है।
मेरी कैमूर यात्रा ने मेरे भीतर यही छोड़ा— हाड़ों के बीच बहते पानी की एक आवाज, इतिहास की एक लंबी स्मृति और फिर लौटकर उन रास्तों पर दोबारा जाने की एक शांत इच्छा।
तथ्य-जाँच के आधार: कैमूर जिला प्रशासन के आधिकारिक पर्यटन पृष्ठों में भभुआ, भगवानपुर, चेनपुर, अधौरा, वैद्यनाथ और दुरौली के स्थान-विवरण; माँ मुंडेश्वरी की पहाड़ी व मंदिर; तथा तेलहर और करकटगढ़ जलप्रपात की जानकारी दी गई है। बिहार पर्यटन के आधिकारिक विवरण में कैमूर के पहाड़ी-मैदानी भूगोल, तेलहर, करकटगढ़ और कैमूर की अन्य पहाड़ी जलप्रपात-स्थलियों की जानकारी मिलती है।
एक प्रकाशन के लिए अगला उपयोगी कदम होगा कि इसमें आपकी यात्रा के वास्तविक ठहराव/भोजन, रास्ते में देखे किसी विशेष दृश्य और वापसी के दौरान की एक-दो निजी स्मृतियाँ जोड़ दी जाएँ—इससे लेख और अधिक व्यक्तिगत हो जाएगा, बिना किसी काल्पनिक प्रसंग के।


सोमवार, सितंबर 28, 2026

कैमूर परिभ्रमण


                                                    
2000 वर्ष पुराना जीवित मंदिर : कैमूर जिले के भगवानपुर प्रखंड के रामगढ़ स्थित कैमूर पर्वत समूह की मुण्डेश्वरी श्रृंखला पर स्थित माँ मुण्डेश्वरी धाम से अधौरा प्रखंड के तेल्हार कुण्ड और तेल्हार झरना तक का 3000 शब्दों में विस्तृत इतिहास, आध्यात्मिक चमत्कार और पर्यटन परिभ्रमण - जहाँ गर्भगृह में माता मुण्डेश्वरी और पंचमुखी शिव एक साथ, 510 सीढ़ियों की चढ़ाई, नंदी-नारियल-त्रिशूल-जल की परंपरा, पाषाण मूर्तियों की नक्काशी, हवन कुण्ड की अग्नि और पहाड़ी नदी की कल-कल में बसा है बिहार का गौरव - साहित्यकार व इतिहासकार सत्येन्द्र कुमार पाठक और जिला जीविका प्रशिक्षण अधिकारी प्रवीण कुमार पाठक की ऐतिहासिक यात्रा
आज 27 सितंबर 2026 है। आज विश्व पर्यटन दिवस है। पूरी दुनिया घूमने की बात कर रही है। पर मैं कहता हूँ - यदि घूमना है तो अपना बिहार घूमो। अपना कैमूर घूमो। क्योंकि कैमूर की पहाड़ी पर एक ऐसा मंदिर है जो 2000 साल से लगातार जीवित है, जहाँ पूजा कभी बंद नहीं हुई। नाम है - माँ मुण्डेश्वरी धाम।
आज का परिभ्रमण दो चरणों में हुआ। पहला चरण - भगवानपुर प्रखंड के रामगढ़ स्थित कैमूर पर्वत समूह की मुण्डेश्वरी श्रृंखला पर स्थित मुण्डेश्वरी मंदिर और दूसरा चरण - अधौरा प्रखंड का तेल्हार कुण्ड और तेल्हार झरना।
परिभ्रमण दल में  मैं स्वयं सत्येन्द्र कुमार पाठक  साहित्यकार, इतिहासकार, बाल साहित्य में "सृजन श्रेष्ठ" सम्मान प्राप्त तथा  प्रवीण कुमार पाठक ,  प्रशिक्षण अधिकारी, जिला जीविका, औरंगाबाद है।
कैमूर जिला बिहार का सबसे पश्चिमी जिला है। पहले रोहतास का हिस्सा था, 1991 में अलग जिला बना। इस जिले में कैमूर पर्वत है, जो विंध्य पर्वत श्रृंखला का पूर्वी छोर है। यह पर्वत 100 किलोमीटर लंबा, 50 किलोमीटर चौड़ा है।
मुण्डेश्वरी श्रृंखला -  भगवानपुर प्रखंड में रामगढ़ गांव से 3 किलोमीटर दूर कैमूर पर्वत की सबसे ऊँची चोटी है - ऊँचाई 608 फीट। इसी चोटी को मुण्डेश्वरी श्रृंखला कहते हैं। यहाँ कई छोटी-छोटी पहाड़ियां जुड़ी हैं, इसलिए श्रृंखला कहा जाता है।
मंदिर तक पहुंचने के लिए दो रास्ते हैं ।  नीचे से ऊपर तक 510 पक्की सीढ़ियां। हर 50 सीढ़ी पर विश्राम चबूतरा। युवा, श्रद्धालु इसी से जाते हैं। सड़क मार्ग  चार पहिया और दो पहिया वाहन के लिए सड़क। बुजुर्ग, दिव्यांग, सामान इसी से जाता है। हम लोग द्वीपहिया मोटर साइकिल  से गए।
तेल्हार कुण्ड और झरना -  मुण्डेश्वरी से 40 किलोमीटर दूर अधौरा प्रखंड में है तेल्हार। अधौरा बिहार का सबसे ऊँचा और सबसे दुर्गम प्रखंड है, समुद्र तल से 1500 फीट ऊँचा। इसे अंग्रेजों ने "बिहार का शिमला" कहा था। यहीं है तेल्हार कुण्ड - पहाड़ के ऊपर से पानी गिरता है तो नीचे 100 फीट गहरा प्राकृतिक कुण्ड बन गया है, जो साल भर नहीं सूखता। इसी कुण्ड से आगे 100 फीट नीचे गिरता है तेल्हार झरना । 
पौराणिक युग - चंड-मुंड वध - दुर्गा सप्तशती में कथा है - शुंभ-निशुंभ नाम के दो राक्षस थे। उनके दो सेनापति थे - चंड और मुंड। माँ दुर्गा ने चंड का वध किया तो नाम पड़ा चामुंडा और मुंड का वध किया तो नाम पड़ा मुण्डेश्वरी। कहा जाता है कि इसी पर्वत पर मुंड का वध हुआ था, इसलिए यह पर्वत मुण्डेश्वरी पर्वत कहलाया।
. मौर्य और कुषाण युग - 108 ईस्वी - 1904 में अंग्रेज पुरातत्वविद् ब्लॉच ने यहाँ एक शिलालेख खोजा। उस पर लिखा था "महासामंत महाराज उदयसेन के शासन के 30वें वर्ष में।" अर्थात्  शक संवत 30 । मुण्डेश्वरी मंदिर का इतिहास 4 युगों नई मूर्तियां लगीं। चीनी यात्री ह्वेनसांग जब 635 ईस्वी में यहाँ आया तो उसने लिखा - "कैमूर पर्वत पर एक ऊँचा मंदिर है जहाँ लोग दिन-रात पूजा करते हैं और बलि देते हैं पर जीव हत्या नहीं करते।"
1850 में अंग्रेजों ने इसे खंडहर समझा। 1970 में बिहार सरकार ने इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया। 2000 में सड़क बनी। 2015 में बिहार सरकार ने इसे पर्यटन स्थल घोषित किया है।
मुण्डेश्वरी मंदिर का सबसे बड़ा आश्चर्य है गर्भगृह। आमतौर पर भारत में या तो शक्तिपीठ होता है या शिव मंदिर। पर मुण्डेश्वरी में दोनों एक साथ हैं।
गर्भगृह में माता मुण्डेश्वरी काले पत्थर की चतुर्भुजी मूर्ति, महिषासुरमर्दिनी रूप में। मूर्ति कई बार खंडित हुई, मुस्लिम आक्रमण में तोड़ी गई, फिर हिंदू राजाओं ने जोड़ी। आज भी मूर्ति पर जोड़ के निशान दिखते हैं। पंचमुखी शिवलिंग - माता के ठीक बगल में। यह उत्तर भारत का एकमात्र पंचमुखी शिवलिंग है जो देवी के साथ है। चार मुख चार दिशाओं में और पांचवां मुख ऊपर। चार मुख चार वेदों - ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद के प्रतीक हैं और पांचवां मुख मोक्ष का। इसलिए कहा जाता है - जो शिव को पूजेगा उसे शक्ति मिलेगी और जो शक्ति को पूजेगा उसे शिव मिलेंगे। यही अद्वैत का सिद्धांत है।
मंदिर परिसर में  नंदी, नारियल, जल, त्रिशूल, पाषाण मूर्तियां और हवन कुण्ड है।  "मुण्डेश्वरी मंदिर परिसर में नंदी, नारियल, जल, त्रिशूल तथा शिवलिंग पर समर्पित किया जाता है एवं अनेक पाषाण युक्त मूर्ति एवं पाषाण पर नक्काशीदार है। हवन-पूजन कुण्ड है।"  मंदिर के मुख्य द्वार के सामने जाली के अंदर नंदी महाराज बैठे हैं। यह नंदी 7वीं सदी का है। नंदी पर लाल चुनरी और गेंदे की माला। नंदी सीधे गर्भगृह के शिवलिंग को देख रहे हैं। आपकी तस्वीर में जाली पर हजारों चुनरियां बंधी हैं, वही नंदी का स्थान है। नारियल स्थल  परिसर में बोर्ड लगा है - "नारियल स्थल - कृपया नारियल यहीं फोड़े।" यह बहुत अच्छी व्यवस्था है। पहले लोग गर्भगृह में ही नारियल फोड़ते थे, जिससे गंदगी होती थी। अब ट्रस्ट ने अलग स्थान बनाया है। नवरात्र में यहाँ रोज 5000 से ज्यादा नारियल फोड़े जाते हैं।
 जल, त्रिशूल, शिवलिंग पर समर्पण हेतु भक्त तीन चीजें चढ़ाते हैं - जल (कर्मनाशा और सोन नदी का जल), त्रिशूल (छोटा लोहे का त्रिशूल, मन्नत पूरी होने पर) और नारियल। शिवलिंग पर जल, बेलपत्र और भस्म चढ़ता है। अनेक पाषाण युक्त मूर्तियां और नक्काशीदार पत्थर  यह मंदिर का सबसे बड़ा खजाना है। मंदिर नागर शैली में बना है, अष्टकोणीय आकार में। बिना सीमेंट-चूना के, केवल पत्थर पर पत्थर रखकर। दीवारों पर - प्रवेश द्वार पर द्वारपाल की मूर्तियां - हाथ में गदा। गंगा-यमुना, गणेश, विष्णु, सूर्य, नवग्रह की मूर्तियां।  छत पर कमल और कीर्तिमुख की नक्काशी। जाली पर बंधी 10 हजार से ज्यादा मन्नतों की चुनरियां। हर चुनरी एक कहानी है।
हवन-पूजन कुण्ड - मंदिर के सामने बड़ा हवन कुण्ड है। यहाँ चैत्र और शारदीय नवरात्र में 9 दिन तक अखंड हवन होता है। कहा जाता है कि इस कुण्ड की राख को खेत में डालने से फसल अच्छी होती है।
 आध्यात्मिक चमत्कार - जो विज्ञान भी नहीं समझ पाया मुण्डेश्वरी के 5 चमत्कार प्रसिद्ध हैं - रंग बदलने वाला शिवलिंग -  गर्भगृह में पंचमुखी शिवलिंग दिन में 3 बार रंग बदलता है - सुबह सुनहरा, दोपहर में हल्का काला, शाम को फिर सुनहरा। वैज्ञानिक इसे सूर्य के प्रकाश का प्रभाव कहते हैं, पर पुजारी कहते हैं - यह शिव की लीला है। अहिंसक बलि - दुनिया में कहीं नहीं है । यहाँ बकरे की बलि दी जाती है, पर बकरा मरता नहीं। यह दुनिया में इकलौता मंदिर है जहाँ अहिंसक बलि होती है। पुजारी बकरे को माता के सामने लाते हैं, मंत्र पढ़ते हैं, अक्षत (चावल) फेंकते हैं। बकरा बेहोश हो जाता है, गिर जाता है। लोग समझते हैं कि माता ने बलि स्वीकार कर ली। फिर बकरे को छोड़ दिया जाता है। 2000 साल से यह परंपरा चल रही है। ह्वेनसांग ने भी इसका उल्लेख किया है।
 मन्नतों की चुनरी जाली पर बंधी चुनरियों की संख्या 10 हजार से ज्यादा है। मान्यता है कि सच्चे मन से चुनरी बांधने पर मन्नत पूरी होती है। मन्नत पूरी होने पर फिर से आकर चुनरी बांधनी होती है। आपकी तस्वीर में यही चुनरियां दिख रही हैं।
रात में बजने वाली घंटियां - पुजारी बताते हैं कि रात में जब मंदिर बंद हो जाता है, तब अंदर से घंटियों और शंख की आवाज आती है। कई लोगों ने सुनी है। कहा जाता है कि रात में देवता यहाँ पूजा करते हैं।  माता  मुण्डेश्वरी , भगवान शिव  की पंचमुखी शिवलिंग  का दर्शन एवम  उपासना पूजन से मानसिक शांति तथा आध्यात्मिक उर्जा का  संचार  का अनुभव हुआ।  
तेल्हार कुण्ड का कभी न सूखना - अधौरा का तेल्हार कुण्ड गर्मी में भी नहीं सूखता। जबकि कैमूर के बाकी झरने सूख जाते हैं। कहा जाता है कि इस कुण्ड का संबंध पाताल लोक से है ।
तेल्हार कुण्ड का इतिहास भी मुण्डेश्वरी जितना ही पुराना है। युग  
पांडव काल में अज्ञातवास के समय पांडव यहाँ रुके थे। भीम ने इस कुण्ड को अपने गदा से बनाया था। इसलिए स्थानीय लोग इसे "भीम कुण्ड" भी कहते हैं। आपकी तस्वीर में जो गुफा दिख रही है, उसे "भीम की गुफा" कहा जाता है। इस कुण्ड का पानी कभी खराब नहीं होता। महीनों तक बोतल में रखो, खराब नहीं होगा। वैज्ञानिक इसे मिनरल वाटर कहते हैं। तेल्हार झरना 100 फीट ऊँचा है। बरसात में इसका रूप विकराल होता है। पर यही झरना कैमूर की जीवन रेखा है। नीचे कई गांव इसी के पानी से खेती करते हैं।
 मंदिर के निकास द्वार की तस्वीर कहती है - यहाँ से निकलते ही मोक्ष मिलता है। मुख्य मंदिर की तस्वीर कहती है - 2000 साल से यह पत्थर ऐसे ही खड़ा है। माला पहने श्रद्धालु की तस्वीर (मैं स्वयं) कहती है - पीढ़ी बदल रही है पर आस्था वही है। नंदी और चुनरी की तस्वीर कहती है - हर चुनरी एक मन्नत है। नदी और गुफा की तस्वीर कहती है - कैमूर केवल मंदिर नहीं, प्रकृति भी है। झरना की तस्वीर कहती है - बिहार में भी शिमला जैसा झरना है।
आज 27 सितंबर 2026 को मुण्डेश्वरी धाम से तेल्हार कुण्ड तक का यह परिभ्रमण मेरे जीवन के अविस्मरणीय परिभ्रमणों में से एक है। मुण्डेश्वरी की 510 सीढ़ी, चढ़ते-चढ़ते सांस फूली, पर माता के दरबार में पहुंचते ही, सारी थकान भूली। तेल्हार का पानी कहता है, रुक जाओ दो घड़ी,कैमूर की घाटी कहती है, लिख दो एक और कड़ी।"
मुसहरवा बाबा - तेल्हार कुण्ड  जाने के क्रम  में मुसहरवा  मंदिर  में स्थापित  मुसहरवा बाबा  का दर्शन किया।  यहा  भक्त गण  बीडी  अर्पित कर  बीडी पीते है । प्रसाद में बीडी दिया जाता है  और मनोकामना  पूर्ण करते है ।
 सुअरा नदी और तेल्हार कुण्ड,  भभुआ 
55 किमी लंबी कैमूर की जीवन रेखा सुअरा नदी जिसे सुवरा या सुवरन नदी भी कहा जाता है - तेल्हार कुण्ड और कैमूर पहाड़ियों से निकलकर भभुआ शहर, भगवानपुर और अधौरा के दर्जनों गाँवों को सींचती, अंत में दुर्गावती नदी में मिलती मौसमी नदी का जीर्णोद्धार ही कैमूर के किसानों का भविष्य है - मुण्डेश्वरी धाम से तेल्हार कुण्ड तक के परिभ्रमण में मिला नदी का सच । 
बिहार के कैमूर जिले की चर्चा आते ही लोग मुण्डेश्वरी धाम, तेल्हार कुण्ड और कर्कट जलप्रपात की बात करते हैं। पर कोई यह नहीं बताता कि इन सभी को जोड़ने वाली एक नदी है - सुअरा नदी।
इसे स्थानीय लोग सुवरा व सुअरा नदी और पुराने दस्तावेजों में सुवरन नदी भी कहा जाता है।
27 सितंबर 2026 को विश्व पर्यटन दिवस पर जब हम लोगों ने भगवानपुर प्रखंड के रामगढ़ स्थित मुण्डेश्वरी श्रृंखला से अधौरा प्रखंड के तेल्हार कुण्ड और तेल्हार झरना तक का परिभ्रमण किया, तो इसी नदी के किनारे-किनारे हम द्विपहिया मोटर साइकिल से गए। रास्ते में मुसहरवा बाबा मंदिर में बीड़ी प्रसाद भी चढ़ाया।
आज उसी सुअरा नदी का विस्तृत इतिहास, भूगोल और महत्व आपको बता रहा हूँ। परिभ्रमण दल में   सत्येन्द्र कुमार पाठक, साहित्यकार, इतिहासकार, बाल साहित्यकार, सृजन श्रेष्ठ सम्मान प्राप्त एवं  प्रवीण कुमार पाठक, प्रशिक्षण अधिकारी, जिला जीविका, औरंगाबाद शामिल है। 
सुअरा नदी बिहार के कैमूर जिले की एक प्रमुख छोटी और मौसमी नदी है। मौसमी का मतलब - यह साल भर नहीं बहती। बरसात में उफान पर और गर्मी में पतली धारा बनकर बहती है।
सुवरा नदी, सुवरन नदी की लंबाई  लगभग 55 किलोमीटर तथा  
-उद्गम  कैमूर की पहाड़ियां, तेल्हार कुण्ड व आसपास के पहाड़ी ,   प्रवाह क्षेत्र  अधौरा, भगवानपुर, भभुआ प्रखंड और   दुर्गावती नदी की सहायक नदी के रूप में मिलती है। दुर्गावती आगे कर्मनाशा में और कर्मनाशा गंगा में मिलती है। यह नदी कैमूर पर्वत समूह से प्रवाहित 55 किमी लंबी नदी है, पूरी तरह कैमूर जिले में है, पर इसका पानी रोहतास जिले के कुछ गांवों तक भी जाता है।
सुअरा नदी का जन्म तेल्हार कुण्ड से होता है।
अधौरा प्रखंड में तेल्हार कुण्ड है - 100 फीट गहरा प्राकृतिक कुण्ड, जो साल भर नहीं सूखता। इसी कुण्ड से पानी रिस-रिस कर नीचे गिरता है और वही पानी छोटी-छोटी धाराओं में मिलकर सुअरा नदी बन जाता है। तेल्हार कुण्ड के अलावा कैमूर पहाड़ियों से निकलने वाले कई झरने, बरसाती नाले और वर्षा का पानी भी इसमें मिलता है। इसलिए बरसात में यह नदी विकराल रूप ले लेती है। आपकी जो 4 तस्वीरें हैं - नदी के बीच चट्टान पर बैठना, गुफा में बैठना, झरना के मुहाने पर खड़ा होना - वह सभी सुअरा नदी के उद्गम क्षेत्र की ही हैं। हम लोगों ने वहीं देखा - पहाड़ से गिरता पानी एक कुण्ड में इकट्ठा हो रहा है और कुण्ड से आगे एक नदी बनकर बह रहा है। वही सुअरा है। : प्रवाह मार्ग - पहाड़ से भभुआ शहर तक है। सुअरा नदी का 55 किमी का सफर 3 प्रखंडों में बंटा है -
 अधौरा प्रखंड (0 से 20 किमी) जन्म से 20 किमी तक यह पहाड़ी नदी है। पहाड़ों के बीच, जंगलों के बीच बहती है। यहाँ पानी सबसे साफ है। आदिवासी खरवार, चेरो जनजाति इसी के पानी से खेती करते हैं। रास्ते में मुसहरवा बाबा मंदिर पड़ता है, जहाँ बीड़ी प्रसाद चढ़ता है। हमने वहीं स्नान किया।
. भगवानपुर प्रखंड (20 से 40 किमी) यहाँ नदी मैदान में उतरती है। मुण्डेश्वरी श्रृंखला के ठीक नीचे से बहती है। भगवानपुर के रामगढ़, भगवानपुर गांव के लोग इसी नदी से सिंचाई करते हैं। मुण्डेश्वरी धाम आने वाले भक्त इसी नदी में पैर धोते हैं। भभुआ प्रखंड (40 से 55 किमी) भभुआ शहर के पास से गुजरती है। भभुआ जिला मुख्यालय है। शहर की गंदगी मिलने से यहाँ पानी थोड़ा गंदा हो जाता है। अंत में यह दुर्गावती नदी में मिल जाती है।
सुअरा नदी  किसानों की जीवन रेखा है। कैमूर सूखा जिला माना जाता है। यहाँ नहरें कम हैं। इसलिए सुअरा नदी ही किसानों की जीवन रेखा है। भभुआ प्रखंड के 25 गांव , भगवानपुर प्रखंड के 20 गांव , अधौरा प्रखंड के 15 गांव के किसानों को सिंचाई में मदद मिलती है। लगभग 10 हजार एकड़ जमीन की सिंचाई इसी से होती है। तेल्हार कुण्ड में लोग पिकनिक मनाते हैं, वैसे सुअरा नदी किनारे भी इको टूरिज्म पार्क बन सकता है।
 सुअरा नदी और मुण्डेश्वरी - आध्यात्मिक संबंध सुअरा नदी का मुण्डेश्वरी से सीधा संबंध है। कहा जाता है कि पहले मुण्डेश्वरी मंदिर में जलाभिषेक सुअरा नदी के जल से ही होता था। पुजारी तेल्हार कुण्ड से जल लाते थे। आज भी नवरात्र में इसी नदी के जल से माता का अभिषेक होता है। इसलिए मुण्डेश्वरी धाम का परिभ्रमण सुअरा नदी के बिना अधूरा है। सुअरा नदी केवल 55 किमी लंबी नदी नहीं, यह कैमूर की आत्मा है। यह पहाड़ से निकलती है, जंगल को सींचती है, आदिवासियों को पानी देती है, मुण्डेश्वरी का जलाभिषेक करती है, भभुआ शहर को छूती है और अंत में दुर्गावती में मिलकर गंगा तक जाती है। तेल्हार कुण्ड का पानी, मुसहरवा बाबा की बीड़ी, मुण्डेश्वरी की 510 सीढ़ियां और सुअरा नदी की कल-कल - यही चार मिलकर कैमूर का संपूर्ण पर्यटन बनाते हैं।
मुण्डेश्वरी की 510 सीढ़ी, चढ़ते-चढ़ते सांस फूली, पर माता के दरबार में पहुंचते ही सारी थकान भूली। तेल्हार का पानी कहता है, रुक जाओ दो घड़ी, सुअरा की धारा कहती है, बहती हूँ मैं बड़ी-बड़ी।.जय माँ मुण्डेश्वरी, जय तेल्हार कुण्ड, जय मुसहरवा बाबा, जय सुअरा नदी, जय कैमूर, जय बिहार।