रविवार, मार्च 22, 2026

ज्ञान , मोक्ष और गणतंत की भूमि है बिहार

बिहार: विश्व सभ्यता का शाश्वत उद्गम और अमर विरासत
सत्येंद्र कुमार पाठक 
बिहार केवल भारत का एक प्रशासनिक राज्य नहीं है; यह मानवीय चेतना, आध्यात्मिकता और राजनीतिक क्रांति का वह केंद्र है जिसने समय-समय पर विश्व इतिहास की दिशा बदली है। 'विहार' शब्द से उपजा यह नाम बौद्ध भिक्षुओं की तपोभूमि होने का प्रमाण है। लेकिन इसका इतिहास बुद्ध से भी हजारों वर्ष पूर्व 'सतयुग' की गहराइयों तक जाता है। गंगा की निर्मल धारा और मगध की कठोर पहाड़ियों के बीच बसी यह संस्कृति त्याग, तपस्या और तत्वज्ञान का अनूठा संगम है। बिहार की हिंदी , मगही , बज्जिका , मैथिली , भोजपुरी , अंगिका , सोनपरिया , सोन तिरिया क्षेत्रीय , अंग्रेजी , उर्दू  भाषाओं का संगम बिहार है । आर्ष परंपरा और पौराणिक वैभव में बिहार की भूमि ऋषियों के मंत्रों और देवताओं के संकल्पों से सिंचित है। सतयुग और गयासुर का आत्मोत्सर्ग: पौराणिक काल में असुरराज गयासुर ने अपनी देह का दान देकर गया को 'मोक्ष नगरी' के रूप में प्रतिष्ठित किया। भगवान विष्णु के पदचिह्न आज भी यहाँ आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं को पितृ-ऋण से मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि बिहार अनादि काल से ही जन्म और मृत्यु के रहस्यों को सुलझाने वाली भूमि रही है। ऋषि-मुनियों की तपोस्थली: बक्सर के सिद्धआश्रम में महर्षि विश्वामित्र ने न केवल तपस्या की, बल्कि भगवान राम और लक्ष्मण को अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दी। महर्षि च्यवन की तपस्थली (सीवान/छपरा क्षेत्र) आरोग्य का केंद्र बनी, तो लोमश ऋषि और वाल्मीकि ने इस मिट्टी पर बैठकर रामायण जैसे अमर महाकाव्यों का सृजन किया। महर्षि कर्दम और कपिल मुनि के सांख्य दर्शन की गूँज भी इसी क्षेत्र से जुड़ी है। त्रेता की जानकी और द्वापर का शौर्य: सीतामढ़ी का पुनौरा धाम मर्यादा और भक्ति का केंद्र है, जहाँ माता सीता का प्राकट्य हुआ। वहीं द्वापर में, महासम्राट जरासंध ने राजगीर (गिरिव्रज) को अभेद्य दुर्ग बनाया। मुंगेर और भागलपुर (अंग देश) के राजा दानवीर कर्ण का नाम आज भी त्याग की सर्वोच्च पराकाष्ठा के रूप में लिया जाता है।  ज्ञान की प्रखर रश्मियाँ: विदुषी और मनीषी बिहार ने सदैव मेधा और तर्क को प्रधानता दी है। विदुषी परंपरा: राजा जनक की सभा में गार्गी का शास्त्रार्थ और बाद में मंडन मिश्र की धर्मपत्नी भारती द्वारा आदि गुरु शंकराचार्य को पराजित करना, बिहार की नारी शक्ति और बौद्धिक प्रखरता का ऐतिहासिक साक्ष्य है।  बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति (बोधगया) और महावीर स्वामी का जन्म (वैशाली) एवं निर्वाण (पावापुरी)—इन दो महापुरुषों ने बिहार की मिट्टी से पूरी दुनिया को 'अहिंसा परमो धर्म:' और 'मध्यम मार्ग' का संदेश दिया।
 सत्ता और शास्त्र का संगम में प्राचीन काल में मगध विश्व की राजनीतिक राजधानी थी। चाणक्य और चंद्रगुप्त: पाटलिपुत्र के दुर्ग से आचार्य चाणक्य ने 'अर्थशास्त्र' की रचना की और चंद्रगुप्त मौर्य के माध्यम से भारत को एक सूत्र में पिरोया। सम्राट अशोक और धम्म: अशोक महान ने कलिंग विजय के बाद 'युद्ध घोष' को 'धम्म घोष' में बदल दिया। उनके शिलालेखों ने अफ़गानिस्तान से लेकर श्रीलंका तक शांति का प्रकाश फैलाया। विज्ञान का स्वर्ण युग: आर्यभट्ट ने पटना के समीप 'तारेगना' (खगोल) में बैठकर ग्रहों की गति नापी और शून्य की अवधारणा देकर आधुनिक विज्ञान का आधार रखा। बाणभट्ट की 'कादंबरी' और मयूर भट्ट के 'सूर्यशतक' ने संस्कृत साहित्य को विश्वव्यापी पहचान दी। 
मध्यकाल में बिहार ने सत्ता के बड़े शेरशाह सूरी का उदय: सासाराम की धरती से निकले शेरशाह सूरी ने हुमायूँ को पराजित कर दिल्ली पर अधिकार किया। उन्होंने 'रुपया' चलाया, 'डाक प्रणाली' विकसित की और प्रसिद्ध 'ग्रैंड ट्रंक रोड' (सड़क-ए-आज़म) बनवाई, जो आज भी एशिया की जीवनरेखा है। मुगल काल और पटना: मुगल काल के दौरान पटना (अजीमाबाद) व्यापार और सूफी संस्कृति का बड़ा केंद्र बना। गुरु गोविंद सिंह जी का जन्म स्थान होने के कारण पटना साहिब सिखों के लिए श्रद्धा का केंद्र बना। ब्रिटिश काल और विद्रोह: 1764 के बक्सर युद्ध के बाद बिहार अंग्रेजों के अधीन हुआ, लेकिन संघर्ष की ज्वाला कभी ठंडी नहीं हुई। 1857 में जगदीशपुर के वीर कुंवर सिंह ने 80 वर्ष की उम्र में अपनी भुजा काटकर गंगा को अर्पित कर दी, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे साहसी गाथा है। आधुनिक बिहार: साहित्य और संकल्प का सूर्योदय आधुनिक बिहार का उदय बौद्धिक और राजनीतिक चेतना के साथ हुआ। चंपारण और गांधी: 1917 में नीलहे गोरों के खिलाफ चंपारण सत्याग्रह ने भारतीय राजनीति को 'अहिंसा' का अचूक अस्त्र दिया। स्वतंत्रता के शिल्पी: डॉ. राजेंद्र प्रसाद की विद्वता और सादगी, डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा की दूरदर्शिता (आधुनिक बिहार के निर्माता) और महाराजा कामेश्वर सिंह का शिक्षा के प्रति दान, बिहार के गौरव को पुनः स्थापित करने वाले स्तंभ बने। लोकनायक जयप्रकाश नारायण: 1974 की 'संपूर्ण क्रांति' ने लोकतंत्र की मर्यादा को नई परिभाषा दी। साहित्यिक आकाश के नक्षत्र में  बिहार की भूमि ने हिंदी साहित्य को वह प्राणवायु दी, जिसके बिना वह अधूरा है। विद्यापति: मैथिल कोकिल ने श्रृंगार और भक्ति को एक धरातल पर ला खड़ा किया। आधुनिक रत्न: राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' की हुंकार, रामवृक्ष बेनीपुरी की शब्द-चित्रकारी, शिवपूजन सहाय की भाषाई शुचिता, जानकीवल्लभ शास्त्री की काव्य-चेतना और रामदयाल पाण्डेय जैसे मनीषियों ने बिहार को 'साहित्य का मक्का' बना दिया। मोहनलाल महतो 'वियोगी' की रचनाओं ने समाज की संवेदनाओं को छुआ।
 भूगोल, नदियाँ और सांस्कृतिक वैभव में  बिहार की नदियों ने न केवल भूमि को सींचा है, बल्कि सभ्यता को पाला है। नदी तंत्र:में  गंगा यहाँ की जीवनधारा है, तो सोन और पुनपुन मगध की संस्कृति का आधार हैं। गंडक, बागमती, कोसी और फल्गु (अंतःसलिला) का आध्यात्मिक और आर्थिक महत्व अतुलनीय है। मुजफ्फरपुर की लीची, भागलपुर का सिल्क, मिथिला की पेंटिंग और वैशाली का लिच्छवी गणतंत्र (विश्व का प्रथम लोकतंत्र)—ये सब मिलकर एक विविधतापूर्ण बिहार का निर्माण करते हैं। बिहार की विरासत और हमारा उत्तरदायित्व आज 22 मार्च 2026 को, जब हम 114वाँ बिहार दिवस मना रहे हैं, हमें यह समझना होगा कि हमारी विरासत केवल पत्थरों और भग्नावशेषों में नहीं, बल्कि हमारे विचारों में है। नालंदा और विक्रमशिला के पुस्तकालय भले ही जल गए हों, लेकिन बिहार की मेधा  आज भी आईएएस परीक्षा से लेकर वैश्विक स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही है। बिहार क्षेत्र की विरासत' को संजोना केवल इतिहास का संरक्षण नहीं है, बल्कि भविष्य के निर्माण का ब्लूप्रिंट है। आइए, ऋषियों की इस तपोभूमि और क्रांतिकारियों की इस कर्मभूमि को पुनः विश्व गुरु बनाने का संकल्प लें।
"जहाँ बुद्ध मुस्कुराए, महावीर स्वामी  जहाँ अशोक ने शांति पाई, गणतंत्र  की पावन भूमि मेरा बिहार है।"

शनिवार, मार्च 21, 2026

हिरण्य प्रदेश और हिरण्यबाहु

हिरण्यबाहु का स्वर्ण तट और च्यवनांचल  का वैभव
 सत्येंद्र कुमार पाठक
भारतीय वांग्मय में मगध केवल एक साम्राज्य का नाम नहीं, बल्कि एक शाश्वत विचार है। यह वह पुण्यभूमि है जहाँ ज्ञान की रश्मियाँ ऋषियों के आश्रमों से प्रस्फुटित होकर सम्राटों के प्रासादों तक पहुँचीं। जब हम मध्य मगध के आधुनिक जिलों—अरवल, जहानाबाद, औरंगाबाद और गया—का सूक्ष्म अवलोकन करते हैं, तो हमारे सामने एक ऐसी कालजयी सभ्यता उभरती है, जो मन्वंतरों की प्राचीनता को समेटे हुए, विक्रम संवत के वैभव से होती हुई आधुनिक 'एंगल संवत' (ब्रिटिश काल) तक निरंतर प्रवाहित है। इस सभ्यता की धुरी दो महान नदियाँ रही हैं: हिरण्यबाहु (सोन) और कीकट (पुनपुन)।  हिरण्यबाहु से 'बहा व  बह  तक का मगही , हिंदी भाषाई और भौगोलिक सफर - प्राचीन काल में जिस नद को 'हिरण्यबाहु' (सोने जैसी भुजाओं वाली) या 'शोणभद्र' कहा गया, उसे आज का जनमानस सहज भाव से 'बहा' कहता है। 'बहा' शब्द का निरुक्त और रहस्य - संस्कृत की 'वह' (वहन करने वाली) धातु से निकला 'बहा' शब्द वास्तव में उस निरंतरता का प्रतीक है, जिसने मगध के चार रत्नों को एक भौगोलिक सूत्र में पिरोया है। यूनानी राजदूत मेगास्थनीज ने अपनी पुस्तक 'इंडिका' में जिसे 'सोनास' कहा, वह नदी अपने साथ स्वर्ण कण लाती थी। इसी कारण इस संपूर्ण क्षेत्र को 'स्वर्ण प्रदेश' की संज्ञा मिली। आज भी सोन का पीला बालू अपनी उसी स्वर्ण आभा के लिए निर्माण जगत में विश्वविख्यात है।  हिरण्यबाहु प्रदेश ( जहानाबाद , गया , अरवल, औरंगाबाद, रोहतास , पटना  का क्षेत्र) प्राचीन मगध की 'आर्थिक रीढ़' था। स्वर्ण नद के बालू से स्वर्ण कणों का निष्कर्षण मगध के राजकोष को सदैव आपूरित रखता था। सामरिक दृष्टि से, पाटलिपुत्र की सुरक्षा के लिए यह नदी एक 'जल-दुर्ग' के समान थी। दक्षिण-पथ (South Trade Route) से आने वाले व्यापारियों और आक्रांताओं को इसी 'बहा' क्षेत्र की चुनौतियों को पार करना पड़ता था। अरवल और औरंगाबाद के ऊंचे टीले आज भी उन प्राचीन सैन्य चौकियों के मूक साक्ष्य हैं। च्यवनांचल और देवकुंड—आयुर्वेद की आदि-स्थली - मगध के इस 'बहा' क्षेत्र का हृदय स्थल देवकुंड (औरंगाबाद-अरवल सीमा) है। यह वह भूमि है जिसे वैश्विक मानचित्र पर 'च्यवनांचल' के रूप में प्रतिष्ठित किया जाना चाहिए । ऋषि च्यवन और कायाकल्प का प्रथम वैज्ञानिक प्रयोग मन्वंतरों के संधिकाल में, भृगु पुत्र ऋषि च्यवन ने इसी क्षेत्र में कठोर तपस्या की थी। वायु पुराण और भागवत पुराण के अनुसार, राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या ने अनजाने में ऋषि की आंखों को क्षति पहुंचाई और प्रायश्चित स्वरूप उनसे विवाह किया। यहीं पर अश्विनी कुमारों ने ऋषि के जीर्ण-शीर्ण शरीर को पुनः युवा बनाने के लिए 'लेह' (जो कालांतर में च्यवनप्राश कहलाया) का निर्माण किया था। यह केवल एक पौराणिक कथा नहीं है, बल्कि भारत में 'जेरियाट्रिक्स' (  या वृद्धावस्था चिकित्सा का प्रथम सफल वैज्ञानिक प्रयोग था। देवकुंड की भौगोलिक स्थिति ऐसी है जहाँ सोन का जलोढ़ क्षेत्र और पठारी खनिज मिलते हैं। शोध दर्शाते हैं कि यहाँ की मिट्टी और जल में विशिष्ट गंधक (Sulphur) एवं खनिज तत्व विद्यमान हैं, जो चर्म रोगों और वृद्धावस्था जनित विकारों में प्रभावी हैं  कीकट से पुनपुन तक—ब्रह्मा का संकल्प
ऋग्वेद में मगध को 'कीकट प्रदेश' कहा गया है। यहाँ बहने वाली मुख्य नदी कीकट (पुनपुन) का आध्यात्मिक विस्तार अद्वितीय है। पुनः पुनः" और मोक्ष का मार्ग का सृष्टि विज्ञान के अनुसार, पुनपुन वह स्थान है जहाँ पदार्थ और चेतना का मिलन होता है। ब्रह्मा के मुख से निकले "पुनः पुनः" शब्दों का अर्थ है—बार-बार के जन्म-मृत्यु चक्र से मुक्ति। इसीलिए गया में पिंडदान से पूर्व पुनपुन में तर्पण की अनिवार्यता इसके आध्यात्मिक वर्चस्व को सिद्ध करती है। इसे 'आदि गंगा' माना जात जहानाबाद का बराबर पर्वत (खलतिका पर्वत) और पुनपुन के किनारे मिले मौर्यकालीन अवशेष यह सिद्ध करते हैं कि यह नदी मार्ग केवल तीर्थयात्रियों के लिए नहीं, बल्कि सम्राट अशोक के धम्म-प्रचार का भी प्रमुख पथ था। मगध की आत्मा इसी नदी के जल से सिंचित होकर पल्लवित हुई है। चतुर्थ अध्याय: एंगल संवत और सोन नहर प्रणाली (1874) में मगध के इतिहास में 'एंगल संवत' (ब्रिटिश काल) का आगमन एक युगांतकारी घटना थी। जहाँ मन्वंतर काल में हिरण्यबाहु केवल ऋषियों की तपोभूमि थी, वहीं 19वीं शताब्दी में यह इस क्षेत्र की 'जीवनरेखा' बनी। अकाल से समृद्धि तक 1860 के दशक के भयंकर अकाल के बाद ब्रिटिश इंजीनियरों ने 'हिरण्यबाहु' के जल को नियंत्रित करने का संकल्प लिया। 1874 में डेहरी में इंद्रपुरी बैराज और सोन नहर प्रणाली का निर्माण हुआ। पूर्वी सोन नहर: इसने औरंगाबाद, अरवल और जहानाबाद के शुष्क क्षेत्रों को सींचा। धान का कटोरा: इस सिंचाई क्रांति ने मगध को 'बिहार का धान का कटोरा' बना दिया। यह प्राचीन 'आहार-पाइन' प्रणाली का ही आधुनिक विस्तार था। आधुनिक जिलों का ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्त्व अरवल: यह च्यवनांचल का द्वार है। करपी, कलेर और मधुसर्वा जैसे क्षेत्रों में च्यवनेश्वर शिवलिंग और प्राचीन ऋषि परंपरा के पदचिह्न आज भी मिलते हैं। जहानाबाद: बराबर की गुफाओं के माध्यम से यह जिला मौर्यकालीन स्थापत्य और बौद्ध-आजीवक दर्शन का केंद्र रहा है। औरंगाबाद: देवकुंड और देव के सूर्य मंदिर के कारण यह धार्मिक पर्यटन का महाकुंभ है। गया: यह मोक्ष की चरम भूमि है, जहाँ हिरण्यबाहु और कीकट का आध्यात्मिक संगम मानवता को शांति का मार्ग दिखाता है। प्राचीन हिरण्यबाहु प्रदेश आज भी अपनी पुरातात्विक संपदा को सीने में दबाए हुए है। मगध की यह विरासत हमें सिखाती है कि नदियाँ केवल जल नहीं ढोतीं, वे संस्कृतियाँ ढोती है । हेरिटेज कॉरिडोर: अरवल से गया तक के इस चतुष्कोण को एक 'विरासत गलियारे' के रूप में विकसित किया जाए। आयुर्वेद पर्यटन: देवकुंड को राष्ट्रीय स्तर पर एक 'कायाकल्प केंद्र' के रूप में मान्यता मिले, जहाँ प्राकृतिक चिकित्सा और औषधीय जड़ी-बूटियों पर शोध हो। दस्तावेजीकरण: सोन-पुनपुन दोआब के ऐतिहासिक गाँवों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कर लुप्त हो रही 'मन्वंतर कालीन' स्मृतियों को लिपिबद्ध किया जाए। हिरण्यबाहु का स्वर्ण कण आज भी हमारी प्रतीक्षा में है। यदि हम अपनी इन प्राचीन जलधाराओं और ऋषि-परंपराओं को संजोने में सफल रहे, तभी हम आगामी संवतों में अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को सुरक्षित रख पाएंगे।
संदर्भ सूची: ऋग्वेद (कीकट प्रदेश विवरण) , वायु पुराण एवं भागवत पुराण (च्यवन-सुकन्या प्रसंग) , इंडिका - मेगास्थनीज (सोनास नदी का वर्णन) , मगध क्षेत्र की विरासत - सत्येंद्र कुमार पाठक , फ्रांसिस बुकानन की रिपोर्ट (1812-13)