सत्येन्द्र कुमार पाठक
प्चेतना का अजस्र प्रवाह में भारतीय वाङ्मय में गंगा को केवल 'नदी' (River) नहीं, बल्कि 'नदीतमा' (नदियों में सर्वश्रेष्ठ) और साक्षात् चेतना कहा गया है। भौगोलिक दृष्टि से यह भारत के भू-भाग को सींचती है, तो सांस्कृतिक दृष्टि से यह भारतीयों के मानस को पवित्र करती है। पहाड़ों की कंदराओं से निकलकर बंगाल की खाड़ी तक की वास्तव में भारत के इतिहास, दर्शन और आर्थिक समृद्धि की यात्रा है। सनातन कालक्रम के अनुसार, गंगा का संबंध किसी एक युग या मन्वंतर से नहीं है, बल्कि यह सृष्टि के आरंभ से ही विभिन्न रूपों में विद्यमान रही हैं। स्वायंभुव मन्वंतर और प्रजापति काल में सृष्टि के प्रथम मन्वंतर (स्वायंभुव) में, जब मानव सभ्यता का बीजारोपण हो रहा था, तब गंगा का मैदानी क्षेत्र और हिमालय की तलहटी (वर्तमान हरिद्वार और पंच प्रयाग) मुख्य केंद्र थे।।महर्षि कश्यप और उनकी पत्नियों का अवदान: ब्रह्मा जी के मानस पुत्र मरीचि के पुत्र महर्षि कश्यप की यह प्रधान तपोभूमि थी। कश्यप जी की पत्नियों—दिति, अदिति और दनू—से क्रमशः दैत्य, आदित्य (देवता) और दानव वंशों का विस्तार हुआ। गंगा घाटी का यह पर्वतीय और मैदानी संधि-स्थल इन सभी संस्कृतियों के सह-अस्तित्व और वैचारिक द्वंद्व का साक्षी रहा है।।दक्ष प्रजापति और सती काल: आधुनिक हरिद्वार का दक्षिणी भाग 'कनखल' प्रजापति दक्ष की राजधानी था। यहीं पर वह ऐतिहासिक दक्ष यज्ञ हुआ था, जिसमें माता सती ने अपने प्राणों की आहुति दी थी। यह कालखंड शिव (वैराग्य) और दक्ष (भौतिक ऐश्वर्य/संसार) के बीच के टकराव और अंततः समन्वय का प्रतीक है।
. वैवस्वत मन्वंतर और सूर्यवंश का पुरुषार्थ में चल रहे सातवें मन्वंतर (वैवस्वत मनु काल) में गंगा का पृथ्वी पर भौतिक अवतरण हुआ। पितृ संस्कृति और मोक्ष की अवधारणा: सूर्यवंश के राजा सगर के ६०,००० पुत्रों को महर्षि कपिल के श्राप से मुक्ति दिलाने और उनकी भस्म को पवित्र कर मोक्ष प्रदान करने के लिए गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाना अनिवार्य था। राजा सगर के वंशज राजा भगीरथ के घोर तप के कारण ही गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ, जिसके कारण इन्हें 'भागीरथी' कहा गया। त्रिदेवों का दिव्य हरिद्वार और पंच प्रयाग में गंगा के उद्गम से लेकर मैदानों में प्रवेश तक की यात्रा में तिथेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) की ऊर्जा समाहित है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित 'पंच प्रयाग' इसके जीवंत उदाहरण हैं। ब्रह्मा का संकल्प (सृष्टि का आरंभ) है। ब्रह्मकुंड (हरिद्वार): मान्यता है कि सृष्टि के सृजन के समय ब्रह्मा जी ने हरिद्वार के इसी स्थान पर यज्ञ और तपस्या की थी, जिसे आज 'हर की पौड़ी' का मुख्य केंद्र माना जाता है। कमंडल का जल: जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार में तीन पगों से संपूर्ण ब्रह्मांड को नाप लिया, तब ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल के जल से विष्णु जी के चरणों का प्रक्षालन किया। वही जल गंगा का मूल स्रोत बना।। विष्णु का चरणामृत (संरक्षण का मार्ग) है। विष्णुप्रयाग: अलकनंदा का उद्गम सतोपंथ ग्लेशियर (भगवान विष्णु के निवास स्थान बद्रीनाथ के ऊपर) से होता है। सर्वप्रथम विष्णुप्रयाग में अलकनंदा का संगम धौलीगंगा से होता है। यह स्थान विष्णु के संरक्षण शक्तियों का प्रतीक है।।हरि-द्वार: वैष्णव मत के अनुसार यह 'हरि का द्वार' है। हर की पौड़ी के ब्रह्मकुंड की प्राचीन शिलाओं पर भगवान विष्णु के पद-चिह्न (चरण-पादुका) अंकित हैं, जिसके कारण यहाँ का जल साक्षात् चरणामृत माना जाता है।।शिव का नियंत्रण और कल्याण (वैराग्य का प्रतीक) है। शिव की जटाएँ: स्वर्ग से उतरते समय गंगा का वेग इतना प्रचंड था कि पृथ्वी रसातल में जा सकती थी। तब भगवान शिव ने जनकल्याण के लिए गंगा को अपनी जटाओं में रोक लिया। शिव की जटाओं से नियंत्रित होकर जो धारा निकली, वह शांत और जीवनदायिनी बनी। हरद्वार: शैव संप्रदाय के लोग इसे 'हर का द्वार' कहते हैं, क्योंकि यहीं से केदारनाथ और अमरनाथ जैसी परम शैव पीठों की यात्रा शुरू होती है।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में अलकनंदा नदी के साथ मिलने वाले पाँच पवित्र संगमों को 'पंच प्रयाग' कहा जाता है। इन स्थानों पर प्राचीन काल से ही कत्यूरी, पंवार (शाह) और गुप्त काल के दौरान धार्मिक नगरों और मंदिरों का विकास हुआ है।. विष्णुप्रयाग अलकनंदा + धौलीगंगा पांडवों की यात्रा स्थली; कत्यूरी राजवंश के काल में मंदिरों का निर्माण। 2 नंदप्रयाग अलकनंदा + नंदाकिनी यदुवंश के राजा नंद की तपस्थली; पंवार राजाओं का प्रभाव क्षेत्र।।3. कर्णप्रयाग अलकनंदा + पिंडर नदी महाभारत कालीन दानवीर कर्ण की तपस्थली और कूर्मांचल शासकों का सांस्कृतिक केंद्र। रुद्रप्रयाग अलकनंदा + मंदाकिनी केदारनाथ मार्ग का मुख्य केंद्र; प्राचीन शिव मंदिरों का कत्यूरी राजाओं द्वारा जीर्णोद्धार।. देवप्रयाग अलकनंदा + भागीरथी यहाँ से नदी का नाम आधिकारिक रूप से 'गंगा' पड़ता है। पंवार राजवंश के अधीन प्रमुख धार्मिक केंद्र। संगम (केशव प्रयाग): बद्रीनाथ के समीप 'माना' गाँव में अलकनंदा और सरस्वती नदी का संगम होता है, जिसे केशव प्रयाग कहा जाता है। यहीं पर महर्षि वेदव्यास ने वेदों और महाभारत की रचना की थी। जैसे ही गंगा हरिद्वार के बाद मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है, इसका रूप विशाल हो जाता है। उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल से गुजरते समय इसमें कई बड़ी नदियाँ मिलती हैं, जहाँ भारत के महान साम्राज्यों ने अपनी राजधानियों की नींव रखी। प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) — त्रिवेणी संगम पर गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का यह संगम भारत का वैचारिक केंद्र रहा है। मौर्य, गुप्त और कुषाण काल से ही सांस्कृतिक केंद्र था। बाद में इसकी रणनीतिक और व्यापारिक स्थिति को देखते हुए, मुगल सम्राट अकबर ने १५८३ में यहाँ एक विशाल किले का निर्माण कराया और इसे 'इलाहाबाद' नाम दिया। पाटलिपुत्र / पटना , बिहार जल-जाल और मगध का वैभव में पटना के समीप गंगा, सोन, गंडक और पुनपुन जैसी नदियों का एक अभेद्य जल-जाल (Water Network) था। सैन्य और व्यापारिक दुर्ग पाटलिपुत था । हर्यक वंश के राजा अजातशत्रु ने सामरिक महत्व को देखते हुए गंगा और सोन के संगम पर 'पाटलिग्राम' नामक सैन्य दुर्ग बनवाया। बाद में उनके पुत्र उदयन ने इसे 'पाटलिपुत्र' के रूप में व्यवस्थित राजधानी बनाया। यह नगर नंद वंश, मौर्य साम्राज्य (चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक) तथा गुप्त साम्राज्य की वैभवशाली राजधानी बना। नदियों के इस संगम ने मगध को पूरे भारत का सबसे शक्तिशाली साम्राज्य बनाने में व्यापारिक मार्ग के रूप में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है। छपरा (बिहार): में गंगा और घाघरा (सरयू) नदी का संगम होता है। यह क्षेत्र नवपाषाण कालीन स्थल 'चिरांद' के लिए प्रसिद्ध है और बाद में चेदि व गुप्त शासकों के प्रभाव में रहा।।हाजीपुर / सोनपुर (बिहार): में गंगा और गंडक नदी का संगम होता. यह प्राचीन वज्जि संघ (लिच्छवी गणराज्य) का हिस्सा था और मौर्य काल से ही प्रसिद्ध व्यापारिक और सांस्कृतिक केंद्र रहा है।
गंगा नदी भारत के ५ राज्यों से होकर प्रवाहित होती है और लोक-साहित्य में इसके कई नाम हैं:। उत्तराखंड में 'भागीरथी' और 'जाह्नवी', उत्तर प्रदेश-बिहार में 'गंगा' या 'त्रिपथगा' (तीन लोकों में बहने वाली), और पश्चिम बंगाल में दो धाराओं में विभाजन—व्यावसायिक धारा 'हुगली' (भागीरथी-हुगली) तथा बांग्लादेश में प्रवेश करने वाली मुख्य धारा 'पद्मा'। अंततः यह 'गंगासागर' के पास बंगाल की खाड़ी में विलीन होकर विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा (सुंदरवन) बनाती है।।विशाल बेसिन (कछार): भारत में गंगा का बेसिन सबसे बड़ा है, जो लगभग ८,६१,४५२ वर्ग किलोमीटर (भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग २६.३%) क्षेत्र में फैला हुआ है और ११ राज्यों में विस्तृत है। यदि नेपाल, तिब्बत और बांग्लादेश के हिस्सों को भी मिला दिया जाए, तो इसका कुल अंतरराष्ट्रीय क्षेत्रफल लगभग १०,८६,००० वर्ग किलोमीटर हो जाता है। इसके प्रत्यक्ष तटों पर लगभग ५० प्रमुख जिले और ५,००० से अधिक गाँव बसे हैं।
गंगा का मैदान केवल भूगोल नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन, वास्तुकला और मानव-देव-असुर संस्कृतियों के महामिलन की स्थली है। सौर और शाक्त संस्कृति: सूर्य की उपासना (जैसे छठ पर्व या गंगा स्नान के समय अर्घ्य देना) और प्रकृति/शक्ति के रूप में गंगा की पूजा। गंगा स्वयं साक्षात् 'शक्ति' हैं, जिनका प्रवाह तंत्र-साधना के केंद्रों (काशी, चंडी देवी, मनसा देवी) से जुड़ा है। ब्रह्म, शैव और वैष्णव दर्शन: हरिद्वार का 'ब्रह्मकुंड' (ब्रह्मा), 'हरिद्वार' (विष्णु) और 'हरद्वार' (शिव) के रूप में प्रसिद्ध होना यह दर्शाता है कि गंगा ने त्रिदेवों की संस्कृतियों को एक सूत्र में पिरोया और संप्रदायों के आपसी विवादों को हमेशा शांत किया।।प्राकृतिक देवता (वायु, वरुण, आदित्य, अग्नि): गंगा आरती और तटों पर होने वाले यज्ञों के माध्यम से पंचमहाभूतों के संतुलन की सीख मिलती है।नाग, गंधर्व और खग संस्कृति: गंगा घाटी के सघन वनों और जलीय तंत्रों में रहने वाले जीवों को इन प्रतीकों के माध्यम से संस्कृति में सम्मानजनक स्थान मिला (जैसे नाग संस्कृति का जल संरक्षण में योगदान)।असुर और दानव संस्कृति: देव-असुर संग्राम की अनेक कथाएँ गंगा तटों (जैसे शुंभ-निशुंभ का वध नील पर्वत पर होना) से जुड़ी हैं, जो समाज में तामसिक प्रवृत्तियों का दमन कर सात्विक प्रवृत्तियों की स्थापना को दर्शाती हैं।।इंद्र और कुबेर (ऐश्वर्य और समृद्धि): इंद्र (वर्षा/कृषि) और कुबेर (धन) का गंगा बेसिन से गहरा नाता है। गंगा का अत्यंत उपजाऊ जलोढ़ मैदान (Alluvial Plain) ही भारत की वास्तविक आर्थिक समृद्धि रहा है, जिसने बड़े साम्राज्यों को भोजन और राजस्व दिया।।पितृ संस्कृति: राजा भगीरथ का मुख्य उद्देश्य ही पितरों का तर्पण था। आज भी हरिद्वार, प्रयागराज और गया संपूर्ण भारत में पितृ-संस्कृति और श्राद्ध-कर्म के सबसे बड़े केंद्र हैं। हरिद्वार के पंडों की बही-खाता प्रणाली आज भी वंश-परंपरा के इतिहास को सहेजने का विश्व का सबसे अनूठा उदाहरण है।
हरिद्वार (प्राचीन नाम: मायापुरी या गंगाद्वार) को किसी एक व्यक्ति ने नहीं बसाया, बल्कि यह प्रागैतिहासिक काल से क्रमिक रूप से विकसित हुआ है:राजा विक्रमादित्य (ईसा पूर्व पहली सदी): उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने अपने भाई 'भर्तृहरि' की स्मृति में यहाँ प्रसिद्ध 'हर की पौड़ी' (ब्रह्मकुंड) का निर्माण कराया था, जहाँ भर्तृहरि ने तपस्या की थी।सम्राट हर्षवर्धन (७वीं सदी): चीनी यात्री ह्वेनसांग ने ६२९ ईस्वी में यहाँ की यात्रा की थी और इसका उल्लेख 'मो-यु-लो' (मयूरपुर/मायापुर) के रूप में किया था। राजा मानसिंह (मुगल काल): १६वीं सदी में आमेर (जयपुर) के राजा मानसिंह ने आधुनिक हरिद्वार की नींव को सुदृढ़ किया, घाटों का जीर्णोद्धार कराया और हर की पौड़ी का पुनरुद्धार करवाया। समुद्र मंथन से निकले अमृत की बूंदें जब हरिद्वार के ब्रह्मकुंड में गिरीं, तभी से यहाँ कुंभ पर्व की परंपरा शुरू हुई। जब बृहस्पति कुंभ राशि में और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करते हैं, तब यहाँ का 'अमृत काल' जाग्रत होता है। गंगा नदी ने भारत की इन सभी विविध, विरोधी और पूरक संस्कृतियों को एक साथ समाहित कर 'भारतीयता' के उस विराट रूप का निर्माण किया है, जो अखंड और शाश्वत है।
संदर्भ - ऋग्वेद संहिता - नदी सूक्त (१०.७५), जहाँ गंगा का आदिम संदर्भ मिलता है।।श्रीमद्भागवत महापुराण - पंचम एवं नवम स्कंध (गंगा अवतरण, राजा सगर और भगीरथ की कथा)। महाभारत (वन पर्व एवं अनुशासन पर्व) - तीर्थ यात्रा उपपर्व और गंगा की महिमा का वर्णन।ह्वेनसांग का यात्रा वृतांत (Si-Yu-Ki) - चीनी यात्री ह्वेनसांग द्वारा सम्राट हर्षवर्धन के काल में हरिद्वार (मो-यु-लो) का ऐतिहासिक विवरण। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) रिपोर्ट - चिरांद (बिहार) और हरिद्वार (मायापुर) के उत्खनन और मौर्य-कुषाण कालीन टेराकोटा संस्कृति के साक्ष्य। ऐन-ए-अकबरी (अबुल फजल) - अकबर द्वारा प्रयागराज (इलाहाबाद) किले के निर्माण और गंगा जल के प्रति सम्मान का ऐतिहासिक दस्तावेज।