बुधवार, सितंबर 30, 2026

जीतीया और माँ की ममता

बिहार की  माटी ; माँ की ममता 
सत्येंद्र कुमार पाठक 
जितिया: बिहार की माटी में जीवित जीमूतवाहन की त्याग-कथा
मातृत्व, लोकविश्वास और करुणा का वह पर्व, जिसमें सदियों पुरानी कथा आज भी सांस लेती है
बिहार  की सांस्कृतिक स्मृति में कुछ पर्व ऐसे हैं, जिनकी पहचान केवल पूजा-पद्धति से नहीं, बल्कि लोककथा, लोकगीत और पीढ़ियों से चली आ रही सामूहिक स्मृतियों से होती है। जितिया, जिसे जीवित्पुत्रिका या जिउतिया भी कहा जाता है, ऐसा ही एक पर्व है। संतान के दीर्घ जीवन, आरोग्य और मंगल की कामना से किया जाने वाला यह व्रत विशेष रूप से माताओं के बीच आस्था का बड़ा पर्व है। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई-मधेश के अनेक हिस्सों में इसकी परंपरा आज भी दिखाई देती है।बिहार  में जितिया का संसार और भी आत्मीय है। यहाँ यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि माँ की ममता, स्त्री की साधना, लोकगीतों की मिठास और पारिवारिक-सामुदायिक स्मृति का उत्सव बन जाता है। इसके केंद्र में है राजा जीमूतवाहन की वह कथा, जिसमें एक राजा ने किसी अपने स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि एक दूसरे प्राणी के जीवन की रक्षा के लिए अपना जीवन तक संकट में डाल दिया।
यही कारण है कि जितिया की कथा सुनते समय मिथिला की माताओं के लिए जीमूतवाहन केवल पौराणिक पात्र नहीं रह जाते; वे त्याग और करुणा के प्रतीक बन जाते हैं।
कथा का नायक कौन है जीमूतवाहन?
जीमूतवाहन का उल्लेख संस्कृत साहित्य की महत्वपूर्ण परंपरा में मिलता है। महाकवि हर्ष के संस्कृत नाटक ‘नागानन्द’ में उनकी कथा प्रमुख रूप से सामने आती है। इसके अतिरिक्त कथासरित्सागर की कथा-परंपरा में भी जीमूतवाहन का प्रसंग मिलता है।
इन साहित्यिक आख्यानों में जीमूतवाहन को विद्याधर वंश का राजा बताया गया है। भारतीय पौराणिक कल्पना में विद्याधर ऐसे दिव्य या अलौकिक प्राणी माने गए हैं, जिनके पास असाधारण शक्तियाँ होती हैं। कथा के अनुसार जीमूतवाहन के पिता का नाम जीमूतकेतु था। वे एक धार्मिक और प्रजावत्सल राजा थे। जीमूतवाहन स्वयं भी राजसी वैभव से अधिक धर्म, दया और परोपकार को महत्व देते थे। उनका राज्य कांचनपुर बताया गया है। लेकिन जीवन में एक ऐसा मोड़ आया, जब उन्होंने राजपाट और सांसारिक वैभव से दूरी बना ली और पिता के साथ मलय पर्वत की ओर चले गए। यहीं उनके जीवन में मलयवती का प्रवेश हुआ। कथा के अनुसार मलयवती सिद्धों के राजा विश्वावसु की पुत्री थीं। दोनों का विवाह हुआ। किंतु विवाह और गृहस्थ जीवन के बाद भी जीमूतवाहन का मूल स्वभाव—दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझना—बदला नहीं।
एक माँ का विलाप और बदल गया इतिहास है ! मलय पर्वत के आसपास की कथा में एक दिन जीमूतवाहन की दृष्टि एक अत्यंत दुखी युवक पर पड़ी। वह नागकुमार शंखचूड़ था।
नागों और गरुड़ के बीच वैर की पौराणिक कथा भारतीय साहित्य में प्रसिद्ध है। जीमूतवाहन ने देखा कि शंखचूड़ की बारी गरुड़ के सामने जाने की थी। उसकी वृद्ध माता अपने पुत्र को मृत्यु के मुख में जाता देखकर विलाप कर रही थी।
यह दृश्य जीमूतवाहन को भीतर तक विचलित कर गया।
राजा होने के बावजूद उन्होंने अपने पद, अपने जीवन और अपने भविष्य के बारे में नहीं सोचा। उन्होंने सोचा—एक माँ के सामने उसके पुत्र की मृत्यु हो रही है और यदि मैं उसे बचा सकता हूँ तो मुझे ऐसा करना चाहिए। यहीं से जीमूतवाहन की कथा त्याग की ऐसी मिसाल बन जाती है, जिसे भारतीय लोकस्मृति ने सदियों तक सँजोकर रखा।
नागकुमार के स्थान पर स्वयं लेट गए ,जीमूतवाहन ने शंखचूड़ को उसके घर जाने के लिए कहा और स्वयं उसके स्थान पर जाने का निर्णय लिया। उन्होंने नागकुमार के स्थान पर स्वयं को प्रस्तुत कर दिया। गरुड़ वहाँ पहुँचा और जीमूतवाहन को नाग समझकर अपने पंजों में उठा लिया। कथा का सबसे मार्मिक पक्ष यही है कि जीमूतवाहन ने अपने प्राण बचाने का कोई प्रयास नहीं किया।
जब गरुड़ को उनके वास्तविक परिचय और त्याग का पता चला, तो वह भी इस असाधारण करुणा से प्रभावित हुआ। कथा के अनुसार अंततः नागों की बलि की परंपरा समाप्त हुई और अनेक प्राणियों के जीवन की रक्षा का मार्ग खुला।
इस कथा का संदेश केवल इतना नहीं कि एक राजा ने अपना जीवन दाँव पर लगाया। इसका बड़ा संदेश यह है कि सच्चा धर्म वह है जिसमें दूसरे के दुःख को देखकर मनुष्य निष्क्रिय न रहे।
जितिया में क्यों याद किए जाते हैं जीमूतवाहन?
यही प्रश्न जितिया की सांस्कृतिक आत्मा को समझने में मदद करता है। जितिया व्रत संतान के जीवन और मंगल की कामना से किया जाता है। जीमूतवाहन की कथा में भी एक माँ के पुत्र के जीवन की रक्षा सबसे महत्वपूर्ण घटना है।
एक ओर शंखचूड़ की माँ अपने पुत्र को बचाने के लिए व्याकुल है, दूसरी ओर जीमूतवाहन उस माँ के दुःख को समझकर स्वयं को संकट में डाल देते हैं।
इस प्रकार कथा में माँ और पुत्र का संबंध तथा दूसरे के लिए त्याग—दोनों भाव एक साथ दिखाई देते हैं।
लोकपरंपरा ने इन्हीं भावों को अपने तरीके से आत्मसात किया और जीमूतवाहन को जितिया व्रत के साथ जोड़ दिया।
मिथिला में जितिया: व्रत से आगे लोकजीवन
मिथिला में कोई भी बड़ा पर्व केवल धार्मिक विधि नहीं होता। उसके साथ गीत, भोजन, रिश्ते, स्मृतियाँ और स्थानीय लोकाचार जुड़ जाते हैं। जितिया भी इससे अलग नहीं है।
व्रत के दिनों में महिलाओं के बीच इसकी चर्चा, कथा-वाचन और पारंपरिक गीतों की परंपरा रही है। गाँवों में पहले यह दृश्य सामान्य था कि एक घर की बुजुर्ग महिला दूसरी महिलाओं और बच्चों को जितिया की कथा सुनाती थी।
कथा सुनाने की यह परंपरा अपने आप में एक लोक-विद्यालय थी। किताबों में दर्ज इतिहास से अलग, ऐसी कथाओं के माध्यम से परिवार की महिलाएँ आने वाली पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक स्मृति सौंपती थीं।
आज जीवनशैली बदल रही है, लेकिन यह परंपरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। अनेक परिवारों में आज भी जितिया के अवसर पर कथा और पूजा के माध्यम से वही सांस्कृतिक स्मृति दोहराई जाती है।
ओठगन से निर्जला व्रत तक
जितिया की तैयारी और अनुष्ठान में क्षेत्रीय विविधताएँ मिलती हैं। कई स्थानों पर व्रत से पहले ओठगन की परंपरा है। इसके बाद व्रती महिलाएँ कठिन उपवास का संकल्प लेती हैं।
जितिया व्रत का निर्जला स्वरूप विशेष रूप से प्रसिद्ध है। व्रती महिलाएँ संतान के कल्याण की कामना से अन्न और जल का त्याग करती हैं।
यह उपवास केवल शारीरिक संयम नहीं माना जाता, बल्कि लोकविश्वास में इसे संकल्प, श्रद्धा और मातृत्व की परीक्षा के रूप में देखा जाता है।
हालाँकि आधुनिक संदर्भ में स्वास्थ्य का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। लंबे समय तक निर्जला उपवास हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित नहीं हो सकता। इसलिए परंपरा का सम्मान करते हुए भी व्यक्तिगत स्वास्थ्य और चिकित्सकीय सलाह को ध्यान में रखना जरूरी है।
लोकगीतों में उतरती माँ की ममता
मिथिला की पहचान उसके लोकगीतों से है। विवाह हो, सोहर हो, छठ हो या कोई अन्य पर्व—गीतों के बिना मिथिला की लोकसंस्कृति अधूरी लगती है।
जितिया में भी लोकगीतों का अपना संसार है। इन गीतों में संतान के लिए मंगलकामना, माँ की चिंता, परिवार की खुशहाली और व्रत की कठिन साधना के भाव मिलते हैं।
इन गीतों का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इनमें शास्त्रीय भाषा की औपचारिकता नहीं, बल्कि लोकभाषा की सहज आत्मीयता होती है।
एक माँ अपनी संतान के लिए जो भाव मन में रखती है, वही लोकगीतों में स्वर पाता है। इसलिए जितिया के गीतों को केवल धार्मिक गीत कह देना उनके सांस्कृतिक महत्व को छोटा करना होगा। वे मिथिला के स्त्री-जीवन और उसकी भावनात्मक दुनिया के मौखिक दस्तावेज भी हैं।
स्त्रियों का अपना सांस्कृतिक संसार
जितिया में स्त्रियाँ केवल व्रती नहीं होतीं। वे इस पर्व की मुख्य वाहक भी हैं।
व्रत की तैयारी, पूजा, कथा, गीत और अगली पीढ़ी को परंपरा से परिचित कराने की जिम्मेदारी मुख्यतः उन्हीं के माध्यम से आगे बढ़ती रही है।
इस दृष्टि से जितिया मिथिला की स्त्रियों की सांस्कृतिक भूमिका को समझने का भी एक महत्वपूर्ण अवसर है।
घर के भीतर होने वाला यह अनुष्ठान दरअसल व्यापक सामाजिक स्मृति का निर्माण करता है। एक पीढ़ी की दादी जिस कथा को अपनी पोती को सुनाती है, वह केवल कथा नहीं होती—उसमें उस परिवार और समाज की कई पीढ़ियों का अनुभव छिपा होता है।
एक जरूरी ऐतिहासिक सावधानी
जीमूतवाहन के नाम को लेकर एक महत्वपूर्ण भ्रम भी मिलता है।
जितिया की कथा वाले जीमूतवाहन को 12वीं शताब्दी के प्रसिद्ध धर्मशास्त्री जीमूतवाहन से अलग समझना चाहिए। मध्यकालीन भारत के धर्मशास्त्रकार जीमूतवाहन को दायभाग के रचयिता के रूप में जाना जाता है। उनका संबंध बंगाल की विद्वत् परंपरा से था।
इसके विपरीत जितिया की कथा के जीमूतवाहन साहित्यिक-पौराणिक परंपरा के विद्याधर राजा हैं, जिनकी कथा नागानन्द और कथासरित्सागर जैसी रचनाओं में मिलती है।
समान नाम के कारण दोनों को एक ही व्यक्ति मानना उचित नहीं है।
बदलते समय में जितिया
आज मिथिला का सामाजिक जीवन तेजी से बदल रहा है। संयुक्त परिवारों की जगह छोटे परिवार ले रहे हैं। गाँवों से शहरों की ओर पलायन हुआ है। लोकगीतों की जगह कई बार मोबाइल फोन और सोशल मीडिया ने ले ली है।
फिर भी जितिया का सांस्कृतिक महत्व समाप्त नहीं हुआ।
बल्कि नए माध्यमों ने इसके गीतों और कथाओं को दूर-दराज के लोगों तक पहुँचाने का नया रास्ता खोल दिया है। विदेशों में रहने वाले मिथिलावासी भी अपने घर-परिवार की परंपराओं को डिजिटल माध्यमों से जोड़ रहे हैं।
इस बदलते समय में चुनौती यह है कि परंपरा केवल कर्मकांड बनकर न रह जाए। उसके पीछे छिपे करुणा, त्याग, मातृत्व और लोक-स्मृति के मूल भाव भी अगली पीढ़ी तक पहुँचें।
जीमूतवाहन की कथा का आज के लिए अर्थ
जीमूतवाहन की कथा को आज पढ़ते हुए उसका अर्थ केवल धार्मिक विश्वास तक सीमित नहीं रहता।
एक ऐसे समय में जब समाज में व्यक्तिगत स्वार्थ और प्रतिस्पर्धा की चर्चा अक्सर होती है, जीमूतवाहन का चरित्र दूसरे के जीवन को अपने जीवन से अधिक महत्व देने की कल्पना सामने रखता है।
उन्होंने यह नहीं पूछा कि सामने वाला किस जाति, समुदाय या कुल का है। उन्होंने केवल इतना देखा कि एक माँ अपने पुत्र को खोने वाली है और उसके दुःख को कम करने के लिए वे कुछ कर सकते हैं।
यही इस कथा की सबसे मानवीय शक्ति है।
निष्कर्ष
जितिया मिथिला की मिट्टी में रचा-बसा ऐसा पर्व है, जिसमें धर्म और लोकजीवन एक-दूसरे से अलग नहीं दिखाई देते। व्रत है, तो उसके साथ कथा है; कथा है, तो उसके साथ लोकगीत हैं; और लोकगीत हैं, तो उनमें माँ की ममता और परिवार की स्मृति जीवित है।
राजा जीमूतवाहन की कथा इस पूरे पर्व को एक गहरा नैतिक अर्थ देती है। उन्होंने एक नागकुमार के प्राण बचाने के लिए स्वयं को गरुड़ के सामने प्रस्तुत किया। उनका त्याग लोकस्मृति में इसलिए अमर हुआ क्योंकि उसमें किसी पुरस्कार या स्वार्थ की अपेक्षा नहीं थी।
बिहार  की माताएँ जब जितिया के दिन संतान की दीर्घायु के लिए संकल्प लेती हैं, तो उनके हाथों में केवल पूजा की सामग्री नहीं होती—उनके साथ सदियों पुरानी एक कथा भी होती है।
वह कथा कहती है कि जीवन का मूल्य केवल अपने लिए जीने में नहीं, बल्कि किसी दूसरे के जीवन की रक्षा करने में भी है।
और शायद यही कारण है कि समय बदलता रहा, पीढ़ियाँ बदलती रहीं, गाँवों की संरचना बदली, जीवन की गति बदली—लेकिन जीमूतवाहन की त्याग-कथा और जितिया की लोकआस्था आज भी मगध , अंग,   बज्जी , भोजपुर , मिथिला की स्मृति में जीवित है।

कैमूर की यात्रा वृतांत

कैमूर की इतिहास के बीच मेरी यात्रा
सत्येंद्र कुमार पाठक 
यात्राएँ केवल रास्तों की दूरी तय करने का नाम नहीं होतीं। कई बार यात्रा हमें उन जगहों तक ले जाती है, जहाँ पहुँचकर लगता है कि हम किसी भूगोल को नहीं, बल्कि अपने भीतर के किसी अनजाने हिस्से को देख रहे हैं।
27 सितंबर 2026—विश्व पर्यटन दिवस की सुबह मेरी यात्रा इसी भाव के साथ आरंभ हुई। कैमूर की पहाड़ियों, उसके झरनों, नदियों, मंदिरों और इतिहास को करीब से देखने की इच्छा पहले से थी। इस बार उस इच्छा को यात्रा का रूप मिला। मेरे साथ थे जिला औरंगाबाद के जीविका ट्रेनिंग ऑफिसर श्री प्रवीण कुमार पाठक। साथ होने वाला एक परिचित व्यक्ति यात्रा को केवल यात्रा नहीं रहने देता; रास्ते में दिखाई देने वाले दृश्य, ठहराव और अनुभवों को साझा करने वाला कोई हो तो यात्रा की स्मृति और गहरी हो जाती है।
हमारी यात्रा का क्रम करपी, अरवल, जहानाबाद और औरंगाबाद से होते हुए भभुआ की ओर बढ़ा। यह केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने का रास्ता नहीं था। रास्ते बदल रहे थे, भू-दृश्य बदल रहा था और धीरे-धीरे मैदान से पहाड़ी अंचल की ओर बढ़ती यात्रा अपने भीतर एक अलग कहानी रच रही थी।
27 सितंबर का दिन था—विश्व पर्यटन दिवस। पर्यटन दिवस का अर्थ मेरे लिए केवल पर्यटन-स्थलों की सूची देखना नहीं है। पर्यटन का असली अर्थ तब समझ में आता है, जब किसी स्थान के प्राकृतिक सौंदर्य के साथ उसके इतिहास, संस्कृति और वहाँ रहने वाले लोगों के जीवन को भी महसूस किया जाए।
करपी से आगे बढ़ते हुए यात्रा ने अरवल और फिर जहानाबाद की दिशा पकड़ी। सड़क के दोनों ओर बदलता ग्रामीण दृश्य लगातार साथ चलता रहा। खेत, गाँव, छोटे बाजार, सड़क किनारे की दुकानें और लोगों की अपनी रोजमर्रा की दुनिया—इन सबके बीच से गुजरते हुए महसूस हुआ कि बिहार को समझने के लिए केवल उसके बड़े शहरों को देखना पर्याप्त नहीं है।
यहाँ की असली पहचान उसके गाँवों, खेतों, नदियों और उन रास्तों में भी छिपी है जिनसे होकर लोग पीढ़ियों से आते-जाते रहे हैं।
औरंगाबाद पहुँचना इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। यहीं हमारी यात्रा का रात्रि-विश्राम हुआ। दिन भर के रास्ते के बाद ठहरना आवश्यक भी था और उपयोगी भी। यात्रा में रात का विश्राम केवल शरीर को आराम देने के लिए नहीं होता; वह अगले दिन के अनुभवों के लिए मन को भी तैयार करता है।
औरंगाबाद की रात और अगले दिन का रास्ता
औरंगाबाद में रात बिताने के बाद यात्रा फिर आगे बढ़ी।
अगले दिन कैमूर की दिशा में बढ़ते हुए मन में सबसे अधिक उत्सुकता उन पहाड़ियों को लेकर थी, जिनके बारे में लंबे समय से सुनता आया था।
बिहार के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से का यह भूभाग मैदान से अलग दिखाई देता है। कैमूर का पठारी क्षेत्र अपने जंगलों, पहाड़ियों, जलप्रपातों और ऐतिहासिक स्थलों के कारण अपनी अलग पहचान रखता है। भभुआ की ओर बढ़ते हुए धीरे-धीरे यह अंतर अधिक स्पष्ट होने लगा।
भभुआ, आज के कैमूर जिले का मुख्यालय, इस क्षेत्र की यात्रा के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र है। जिला प्रशासन के अनुसार भभुआ ग्रैंड ट्रंक रोड से लगभग 14 किलोमीटर दक्षिण स्थित है और सड़क मार्ग से भभुआ रोड रेलवे स्टेशन से जुड़ा है।
मेरे लिए भभुआ केवल यात्रा का एक पड़ाव नहीं था। यह उस कैमूर का प्रवेश-द्वार था जिसे मैं इस यात्रा में समझना चाहता था—एक ऐसा कैमूर जहाँ मैदान समाप्त होते हुए पहाड़ शुरू होते हैं और जहाँ इतिहास तथा प्रकृति एक-दूसरे से अलग दिखाई नहीं देते।
माँ मुंडेश्वरी : पहाड़ी पर इतिहास का मौन - भभुआ से आगे भगवानपुर की दिशा में जाते हुए कैमूर की पहाड़ियों का स्वरूप अधिक स्पष्ट होने लगा। यहीं है माँ मुंडेश्वरी मंदिर, जो पंवरा/पियरा पहाड़ी के शिखर पर स्थित है। पहाड़ी की ऊँचाई लगभग 600 फीट बताई जाती है। मंदिर तक पहुँचते हुए मन में सबसे पहले जो भाव आया, वह भव्यता से अधिक प्राचीनता का था।
इतिहास हमेशा किसी संग्रहालय में बंद नहीं रहता। कभी-कभी वह पत्थरों में रहता है, कभी किसी पुराने मंदिर की दीवारों में और कभी किसी पहाड़ी की चुप्पी में। माँ मुंडेश्वरी का मंदिर इसी तरह इतिहास को अपने भीतर सँजोए हुए है। इसका अष्टकोणीय स्थापत्य, पत्थर की प्रतिमाएँ और प्राचीन धार्मिक परंपरा इस स्थान को विशिष्ट बनाती हैं। मंदिर के संबंध में प्राचीनता की तिथियों को लेकर विभिन्न आधिकारिक स्रोतों में अलग-अलग उल्लेख मिलते हैं। इसलिए इसे किसी एक निश्चित वर्ष से बाँधने के बजाय इतना कहना अधिक उचित है कि यह भारतीय उपमहाद्वीप के अत्यंत प्राचीन सक्रिय मंदिरों में गिना जाता है और इसकी स्थापत्य तथा पुरातात्त्विक परंपरा बहुत पुरानी है। माँ मुंडेश्वरी परिसर में खड़े होकर मुझे लगा कि यात्रा का अर्थ केवल देखना नहीं, बल्कि समय के सामने कुछ देर ठहरना भी है।
एक ओर वर्तमान था—आने-जाने वाले लोग, सड़क और आज का जीवन। दूसरी ओर वह पत्थर था जिसने सदियों को आते-जाते देखा होगा। मैंने महसूस किया कि पर्यटन यदि हमें केवल तस्वीरें देकर वापस भेज दे तो वह अधूरी यात्रा है। किसी स्थान की आत्मा को समझने की कोशिश ही यात्रा को अर्थ देती है।
कैमूर की ओर बढ़ता रास्ता में  माँ मुंडेश्वरी के बाद यात्रा ने कैमूर के दूसरे रंगों की ओर रास्ता बनाया। कैमूर का भूगोल दो अलग रूपों में दिखाई देता है—मैदानी क्षेत्र और पहाड़ी/पठारी क्षेत्र। जिले के पर्यटन विवरणों में भी इस भौगोलिक विभाजन का उल्लेख मिलता है। मैदानी हिस्से से पहाड़ी इलाके की ओर जाते हुए सड़क का अनुभव बदलता है। पेड़ अधिक दिखाई देने लगते हैं, दूर पहाड़ियों की रेखाएँ उभरती हैं और रास्ते में अचानक कोई घाटी या ऊँचाई सामने आ जाती है। यात्रा के दौरान ऐसे रास्तों पर गति अपने आप धीमी हो जाती है।शायद इसलिए नहीं कि सड़क कठिन है, बल्कि इसलिए कि आँखें बार-बार रास्ते से हटकर आसपास के दृश्य को देखने लगती हैं। कैमूर की पहाड़ियों में यह अनुभव बार-बार हुआ।
चेनपुर : इतिहास की परतें हमारी यात्रा में चेनपुर भी महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। चेनपुर भभुआ से पश्चिम की ओर स्थित है और कैमूर के ऐतिहासिक भूगोल का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहाँ किले, मकबरे और धार्मिक स्थलों से जुड़ी ऐतिहासिक स्मृतियाँ मिलती हैं। जिला प्रशासन के पर्यटन विवरण में चेनपुर के संदर्भ में बख्तियार खान का मकबरा, सूरी/अकबर काल से जुड़े किले और हर्सू ब्रह्म मंदिर का उल्लेख मिलता है। ऐसे स्थानों पर पहुँचकर मुझे हमेशा यह विचार आता है कि इतिहास किताबों में जितना व्यवस्थित दिखाई देता है, जमीन पर उतना ही बिखरा हुआ है। कहीं कोई पुराना पत्थर है, कहीं किसी स्थापत्य का अवशेष, कहीं मंदिर है और कहीं किसी पुराने शासन की स्मृति।
यात्रा इन बिखरी हुई स्मृतियों को जोड़ने का अवसर देती है।
अधौरा : जब कैमूर का असली पहाड़ी रूप सामने आया
कैमूर की यात्रा में अधौरा का नाम अपने आप में एक अलग आकर्षण रखता है।
यह कैमूर पठार का ऊँचा क्षेत्र है। जिला पर्यटन विवरण के अनुसार अधौरा लगभग 2000 फीट की ऊँचाई पर स्थित है और भभुआ से लगभग 58 किलोमीटर की दूरी पर है।
अधौरा की ओर बढ़ते हुए कैमूर का भूगोल एकदम अलग अनुभव देने लगता है। यहाँ पहाड़ केवल दूर दिखाई देने वाली वस्तु नहीं रहते; वे यात्रा के चारों ओर उपस्थित हो जाते हैं।
जंगल, ऊँचाई, घाटियाँ और पहाड़ी रास्ते—इन सबके बीच चलते हुए लगा कि बिहार के बारे में हमारी सामान्य कल्पना कितनी सीमित है।
अक्सर बिहार को मैदान, गंगा और कृषि के संदर्भ में देखा जाता है। लेकिन कैमूर की पहाड़ियाँ बताती हैं कि इसी बिहार के भीतर एक ऐसा भूभाग भी है जहाँ प्रकृति ने अपना दूसरा रूप सँजोकर रखा है।
तेलहर कुंड : पानी की आवाज में पहाड़ हैं ! कैमूर यात्रा का एक अत्यंत आकर्षक पड़ाव था तेलहर कुंड और तेलहर जलप्रपात।
कैमूर जिला प्रशासन के अनुसार तेलहर जलप्रपात की ऊँचाई लगभग 80 मीटर है। बिहार पर्यटन के विवरण में इसे रोहतास पठार के निकट, दुर्गावती नदी क्षेत्र के आसपास का प्राकृतिक स्थल बताया गया है। तेलहर की ओर जाते हुए पहाड़ी रास्तों का अपना आकर्षण है। रास्ता जितना आगे बढ़ता है, उतना ही मन में जलप्रपात को देखने की उत्सुकता बढ़ती जाती है।
और फिर जब पानी सामने आता है, तो कुछ क्षणों के लिए रास्ते की सारी थकान पीछे छूट जाती है। ऊँचाई से गिरता पानी केवल एक दृश्य नहीं होता। वह लगातार चलती हुई ध्वनि है।
पानी के गिरने की आवाज, आसपास की हरियाली और पहाड़ों की निस्तब्धता मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं जिसमें शहर का शोर बहुत दूर छूट जाता है।
मैंने वहाँ यह अनुभव किया कि प्रकृति को देखने और प्रकृति के बीच खड़े होने में बहुत अंतर है। तस्वीर में जलप्रपात सुंदर दिख सकता है, लेकिन उसके सामने खड़े होकर गिरते पानी की आवाज सुनना एक अलग अनुभव है। तेलहर ने मेरी यात्रा में इसी अनुभव को जोड़ा है! 
नदियाँ : कैमूर की जीवन-रेखाएँ है  ! कैमूर की कहानी उसके जल के बिना पूरी नहीं हो सकती। कर्मनाशा और दुर्गावती इस क्षेत्र की प्रमुख नदियों में हैं। कैमूर के मैदानी भूभाग का भूगोल इन नदियों से गहराई से जुड़ा है। जिले के पूर्वी हिस्से में कुदरा जैसी नदियाँ भी अपने क्षेत्रीय जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यात्रा में नदी को केवल एक जलधारा के रूप में देखना संभव नहीं था। नदी के किनारे बसे गाँव, खेतों की हरियाली और जल पर निर्भर जीवन बताते हैं कि किसी भूभाग का इतिहास केवल राजाओं और मंदिरों से नहीं बनता।
उसका इतिहास पानी भी लिखता है। कर्मनाशा नाम अपने भीतर अनेक लोक-स्मृतियाँ और ऐतिहासिक धारणाएँ लिए हुए है। लेकिन एक यात्री के रूप में मुझे उसके नाम से अधिक उसका भूगोल आकर्षित करता रहा—एक ऐसी नदी जो पहाड़ियों और मैदानों के बीच अपना रास्ता बनाती हुई आगे बढ़ती है।
करकटगढ़ : पानी, पहाड़ और इतिहास है! कर्मनाशा से जुड़ा करकटगढ़ जलप्रपात कैमूर की प्राकृतिक पहचान का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह चेनपुर क्षेत्र में कैमूर की पहाड़ियों के बीच स्थित है और बिहार पर्यटन के अनुसार यह क्षेत्र कभी मगरमच्छों के शिकार से जुड़ा रहा था। ब्रिटिश काल में यहाँ जलप्रपात को देखने के लिए एक डाक बंगले का भी उल्लेख मिलता है। आज करकटगढ़ को प्रकृति और जैव-विविधता के संदर्भ में देखा जाता है। यहाँ का जलप्रपात लगभग 100 फीट ऊँचा और करीब 300 फीट चौड़ा बताया जाता है।
जब मैं इन स्थानों के बारे में सोचता हूँ तो एक बात विशेष रूप से सामने आती है—प्रकृति के सामने मनुष्य का इतिहास कितना छोटा है।
शासन बदले, राजवंश बदले, अंग्रेज आए और चले गए, पर्यटन की अवधारणा बदली; लेकिन पहाड़ और जलप्रपात अपनी जगह बने रहे। यही किसी प्राकृतिक स्थल की सबसे बड़ी ताकत है।
कैमूर की पहाड़ियों में बिखरे झरने है!  कैमूर और आसपास की पहाड़ियों में केवल तेलहर और करकटगढ़ ही नहीं हैं। बिहार पर्यटन के विवरणों में बुधुआ, धन्सा, अमझोर और तुतला भवानी जैसे जलप्रपातों का भी उल्लेख मिलता है। इन सभी स्थानों को एक ही यात्रा में देख पाना संभव नहीं था, लेकिन इनके नाम सुनना और उनके बारे में जानना ही इस क्षेत्र की व्यापकता का एहसास कराता है।
कैमूर की पहाड़ियाँ अपने भीतर जल को सँजोए हुए हैं।
बरसात के बाद पहाड़ी ढलानों से निकलती छोटी-छोटी धाराएँ जब नीचे उतरती हैं तो अनेक जगहों पर झरनों का रूप ले लेती हैं। यही कारण है कि कैमूर का पर्यटन केवल किसी एक मंदिर या एक जलप्रपात तक सीमित नहीं किया जा सकता।
यह एक पूरा प्राकृतिक परिदृश्य है।
वैद्यनाथ और दुरौली : यात्रा में इतिहास के दूसरे पड़ाव में  कैमूर की यात्रा का एक दूसरा पक्ष उसके धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल हैं। वैद्यनाथ मंदिर रामगढ़ क्षेत्र में स्थित है। जिला पर्यटन विवरण इसे प्राचीन परंपरा से जोड़ता है और मंदिर परिसर से ऐतिहासिक सामग्री तथा सिक्कों के मिलने का उल्लेख करता है।
इसी प्रकार दुरौली में पुराने मंदिरों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें स्थानीय इतिहास में चेरो काल से जोड़ा जाता है। इन स्थानों को देखकर यह समझ में आता है कि कैमूर का इतिहास किसी एक कालखंड में बंद नहीं है। यहाँ प्राचीन धार्मिक परंपराएँ हैं, मध्यकालीन स्थापत्य की स्मृतियाँ हैं, स्थानीय लोकविश्वास हैं और आधुनिक समय का बदलता हुआ ग्रामीण जीवन भी है।
एक यात्री के लिए यह विविधता ही सबसे बड़ा आकर्षण है।
प्रवीण कुमार पाठक के साथ यात्रा इस पूरी यात्रा में मेरे साथ प्रवीण कुमार पाठक, जिला औरंगाबाद के जीविका ट्रेनिंग ऑफिसर, रहे।
साथी के साथ की गई यात्रा की अपनी एक सहजता होती है। रास्ते लंबे हों तो भी यात्रा का अनुभव साझा होता रहता है।
लेकिन इस यात्रा में मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि हम कैमूर को केवल घूमने की जगह के रूप में नहीं देख रहे थे।
हम रास्ते, भूगोल, इतिहास, पहाड़, पानी और स्थानीय जीवन—इन सबको एक साथ देखने की कोशिश कर रहे थे।
विश्व पर्यटन दिवस पर शुरू हुई इस यात्रा का मेरे लिए यही सबसे सार्थक पक्ष रहा।
27 सितंबर को शुरू हुई यात्रा के बाद 29 सितंबर 2026 को वापसी हुई। वापसी का रास्ता हमेशा आगे जाने के रास्ते से अलग होता है। जाते समय आँखें आगे देखती हैं—क्या मिलेगा, कैसा होगा, कहाँ रुकेंगे, क्या देखेंगे? वापसी में आँखें पीछे छूटे दृश्यों को याद करती हैं। कैमूर की पहाड़ियाँ पीछे छूट रही थीं, लेकिन यात्रा समाप्त नहीं हुई थी।
तेलहर का पानी, मुंडेश्वरी की पहाड़ी, कर्मनाशा का भूगोल, करकटगढ़ का जलप्रपात और अधौरा की पहाड़ी दुनिया—ये सब मन में अपने-अपने चित्र की तरह बने हुए थे। मुझे लगा कि यात्रा का वास्तविक अंत घर लौटने पर नहीं होता। वह तब समाप्त होती है जब हम उसके अनुभव को भूल जाते हैं।
और कुछ यात्राएँ भूलती ही नहीं हैं।
कैमूर ने मुझे क्या दिया? इस यात्रा से लौटते हुए मेरे मन में कैमूर की कोई एक तस्वीर नहीं थी। कैमूर मेरे लिए एक साथ कई रूपों में था। वह माँ मुंडेश्वरी की पहाड़ी पर खड़ा इतिहास था। वह तेलहर में गिरता हुआ पानी था। वह करकटगढ़ की घाटी में बहती कर्मनाशा थी। वह अधौरा की ऊँचाई और जंगल था।वह भभुआ का मैदानी जीवन था। वह चेनपुर की ऐतिहासिक स्मृतियाँ थीं।और वह उन रास्तों पर दिखाई देने वाला सामान्य ग्रामीण जीवन भी था, जो किसी पर्यटन पुस्तिका में शायद बहुत कम जगह पाता है। विश्व पर्यटन दिवस पर शुरू हुई यह यात्रा मुझे यह समझाकर लौटी कि पर्यटन केवल सुंदर स्थानों को देखने का माध्यम नहीं है। पर्यटन किसी भूगोल को समझने का माध्यम है।
किसी नदी को देखकर उसके किनारे बसे जीवन को समझना, किसी मंदिर को देखकर उसके पीछे की सदियों को महसूस करना, किसी जलप्रपात को देखकर पहाड़ों के जल-संसार को समझना और किसी गाँव से गुजरते हुए वहाँ के लोगों के जीवन की कल्पना करना—यही यात्रा को सार्थक बनाता है।
कैमूर ने मुझे प्रकृति और इतिहास के बीच कोई दीवार दिखाई ही नहीं।यहाँ पहाड़ इतिहास को सँभालते हैं, नदियाँ भूगोल को आकार देती हैं और झरने उन पहाड़ियों की जीवंत आवाज बन जाते हैं।
29 सितंबर को जब वापसी हुई, तब लगा कि मैं केवल कैमूर से लौट नहीं रहा हूँ।मैं अपने साथ कैमूर का एक हिस्सा लेकर लौट रहा हूँ—पहाड़ों की शांति, पानी की आवाज और उन रास्तों की स्मृति, जिन पर चलते हुए बिहार का एक ऐसा चेहरा सामने आया जिसे दूर से देखना संभव नहीं। शायद इसी का नाम यात्रा है।एक रास्ता हमें जहाँ ले जाता है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि लौटते समय वह रास्ता हमारे भीतर क्या छोड़ जाता है।
मेरी कैमूर यात्रा ने मेरे भीतर यही छोड़ा— हाड़ों के बीच बहते पानी की एक आवाज, इतिहास की एक लंबी स्मृति और फिर लौटकर उन रास्तों पर दोबारा जाने की एक शांत इच्छा।
तथ्य-जाँच के आधार: कैमूर जिला प्रशासन के आधिकारिक पर्यटन पृष्ठों में भभुआ, भगवानपुर, चेनपुर, अधौरा, वैद्यनाथ और दुरौली के स्थान-विवरण; माँ मुंडेश्वरी की पहाड़ी व मंदिर; तथा तेलहर और करकटगढ़ जलप्रपात की जानकारी दी गई है। बिहार पर्यटन के आधिकारिक विवरण में कैमूर के पहाड़ी-मैदानी भूगोल, तेलहर, करकटगढ़ और कैमूर की अन्य पहाड़ी जलप्रपात-स्थलियों की जानकारी मिलती है।
एक प्रकाशन के लिए अगला उपयोगी कदम होगा कि इसमें आपकी यात्रा के वास्तविक ठहराव/भोजन, रास्ते में देखे किसी विशेष दृश्य और वापसी के दौरान की एक-दो निजी स्मृतियाँ जोड़ दी जाएँ—इससे लेख और अधिक व्यक्तिगत हो जाएगा, बिना किसी काल्पनिक प्रसंग के।