बुधवार, सितंबर 30, 2026

कैमूर की यात्रा वृतांत

कैमूर की इतिहास के बीच मेरी यात्रा
सत्येंद्र कुमार पाठक 
यात्राएँ केवल रास्तों की दूरी तय करने का नाम नहीं होतीं। कई बार यात्रा हमें उन जगहों तक ले जाती है, जहाँ पहुँचकर लगता है कि हम किसी भूगोल को नहीं, बल्कि अपने भीतर के किसी अनजाने हिस्से को देख रहे हैं।
27 सितंबर 2026—विश्व पर्यटन दिवस की सुबह मेरी यात्रा इसी भाव के साथ आरंभ हुई। कैमूर की पहाड़ियों, उसके झरनों, नदियों, मंदिरों और इतिहास को करीब से देखने की इच्छा पहले से थी। इस बार उस इच्छा को यात्रा का रूप मिला। मेरे साथ थे जिला औरंगाबाद के जीविका ट्रेनिंग ऑफिसर श्री प्रवीण कुमार पाठक। साथ होने वाला एक परिचित व्यक्ति यात्रा को केवल यात्रा नहीं रहने देता; रास्ते में दिखाई देने वाले दृश्य, ठहराव और अनुभवों को साझा करने वाला कोई हो तो यात्रा की स्मृति और गहरी हो जाती है।
हमारी यात्रा का क्रम करपी, अरवल, जहानाबाद और औरंगाबाद से होते हुए भभुआ की ओर बढ़ा। यह केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने का रास्ता नहीं था। रास्ते बदल रहे थे, भू-दृश्य बदल रहा था और धीरे-धीरे मैदान से पहाड़ी अंचल की ओर बढ़ती यात्रा अपने भीतर एक अलग कहानी रच रही थी।
27 सितंबर का दिन था—विश्व पर्यटन दिवस। पर्यटन दिवस का अर्थ मेरे लिए केवल पर्यटन-स्थलों की सूची देखना नहीं है। पर्यटन का असली अर्थ तब समझ में आता है, जब किसी स्थान के प्राकृतिक सौंदर्य के साथ उसके इतिहास, संस्कृति और वहाँ रहने वाले लोगों के जीवन को भी महसूस किया जाए।
करपी से आगे बढ़ते हुए यात्रा ने अरवल और फिर जहानाबाद की दिशा पकड़ी। सड़क के दोनों ओर बदलता ग्रामीण दृश्य लगातार साथ चलता रहा। खेत, गाँव, छोटे बाजार, सड़क किनारे की दुकानें और लोगों की अपनी रोजमर्रा की दुनिया—इन सबके बीच से गुजरते हुए महसूस हुआ कि बिहार को समझने के लिए केवल उसके बड़े शहरों को देखना पर्याप्त नहीं है।
यहाँ की असली पहचान उसके गाँवों, खेतों, नदियों और उन रास्तों में भी छिपी है जिनसे होकर लोग पीढ़ियों से आते-जाते रहे हैं।
औरंगाबाद पहुँचना इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। यहीं हमारी यात्रा का रात्रि-विश्राम हुआ। दिन भर के रास्ते के बाद ठहरना आवश्यक भी था और उपयोगी भी। यात्रा में रात का विश्राम केवल शरीर को आराम देने के लिए नहीं होता; वह अगले दिन के अनुभवों के लिए मन को भी तैयार करता है।
औरंगाबाद की रात और अगले दिन का रास्ता
औरंगाबाद में रात बिताने के बाद यात्रा फिर आगे बढ़ी।
अगले दिन कैमूर की दिशा में बढ़ते हुए मन में सबसे अधिक उत्सुकता उन पहाड़ियों को लेकर थी, जिनके बारे में लंबे समय से सुनता आया था।
बिहार के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से का यह भूभाग मैदान से अलग दिखाई देता है। कैमूर का पठारी क्षेत्र अपने जंगलों, पहाड़ियों, जलप्रपातों और ऐतिहासिक स्थलों के कारण अपनी अलग पहचान रखता है। भभुआ की ओर बढ़ते हुए धीरे-धीरे यह अंतर अधिक स्पष्ट होने लगा।
भभुआ, आज के कैमूर जिले का मुख्यालय, इस क्षेत्र की यात्रा के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र है। जिला प्रशासन के अनुसार भभुआ ग्रैंड ट्रंक रोड से लगभग 14 किलोमीटर दक्षिण स्थित है और सड़क मार्ग से भभुआ रोड रेलवे स्टेशन से जुड़ा है।
मेरे लिए भभुआ केवल यात्रा का एक पड़ाव नहीं था। यह उस कैमूर का प्रवेश-द्वार था जिसे मैं इस यात्रा में समझना चाहता था—एक ऐसा कैमूर जहाँ मैदान समाप्त होते हुए पहाड़ शुरू होते हैं और जहाँ इतिहास तथा प्रकृति एक-दूसरे से अलग दिखाई नहीं देते।
माँ मुंडेश्वरी : पहाड़ी पर इतिहास का मौन - भभुआ से आगे भगवानपुर की दिशा में जाते हुए कैमूर की पहाड़ियों का स्वरूप अधिक स्पष्ट होने लगा। यहीं है माँ मुंडेश्वरी मंदिर, जो पंवरा/पियरा पहाड़ी के शिखर पर स्थित है। पहाड़ी की ऊँचाई लगभग 600 फीट बताई जाती है। मंदिर तक पहुँचते हुए मन में सबसे पहले जो भाव आया, वह भव्यता से अधिक प्राचीनता का था।
इतिहास हमेशा किसी संग्रहालय में बंद नहीं रहता। कभी-कभी वह पत्थरों में रहता है, कभी किसी पुराने मंदिर की दीवारों में और कभी किसी पहाड़ी की चुप्पी में। माँ मुंडेश्वरी का मंदिर इसी तरह इतिहास को अपने भीतर सँजोए हुए है। इसका अष्टकोणीय स्थापत्य, पत्थर की प्रतिमाएँ और प्राचीन धार्मिक परंपरा इस स्थान को विशिष्ट बनाती हैं। मंदिर के संबंध में प्राचीनता की तिथियों को लेकर विभिन्न आधिकारिक स्रोतों में अलग-अलग उल्लेख मिलते हैं। इसलिए इसे किसी एक निश्चित वर्ष से बाँधने के बजाय इतना कहना अधिक उचित है कि यह भारतीय उपमहाद्वीप के अत्यंत प्राचीन सक्रिय मंदिरों में गिना जाता है और इसकी स्थापत्य तथा पुरातात्त्विक परंपरा बहुत पुरानी है। माँ मुंडेश्वरी परिसर में खड़े होकर मुझे लगा कि यात्रा का अर्थ केवल देखना नहीं, बल्कि समय के सामने कुछ देर ठहरना भी है।
एक ओर वर्तमान था—आने-जाने वाले लोग, सड़क और आज का जीवन। दूसरी ओर वह पत्थर था जिसने सदियों को आते-जाते देखा होगा। मैंने महसूस किया कि पर्यटन यदि हमें केवल तस्वीरें देकर वापस भेज दे तो वह अधूरी यात्रा है। किसी स्थान की आत्मा को समझने की कोशिश ही यात्रा को अर्थ देती है।
कैमूर की ओर बढ़ता रास्ता में  माँ मुंडेश्वरी के बाद यात्रा ने कैमूर के दूसरे रंगों की ओर रास्ता बनाया। कैमूर का भूगोल दो अलग रूपों में दिखाई देता है—मैदानी क्षेत्र और पहाड़ी/पठारी क्षेत्र। जिले के पर्यटन विवरणों में भी इस भौगोलिक विभाजन का उल्लेख मिलता है। मैदानी हिस्से से पहाड़ी इलाके की ओर जाते हुए सड़क का अनुभव बदलता है। पेड़ अधिक दिखाई देने लगते हैं, दूर पहाड़ियों की रेखाएँ उभरती हैं और रास्ते में अचानक कोई घाटी या ऊँचाई सामने आ जाती है। यात्रा के दौरान ऐसे रास्तों पर गति अपने आप धीमी हो जाती है।शायद इसलिए नहीं कि सड़क कठिन है, बल्कि इसलिए कि आँखें बार-बार रास्ते से हटकर आसपास के दृश्य को देखने लगती हैं। कैमूर की पहाड़ियों में यह अनुभव बार-बार हुआ।
चेनपुर : इतिहास की परतें हमारी यात्रा में चेनपुर भी महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। चेनपुर भभुआ से पश्चिम की ओर स्थित है और कैमूर के ऐतिहासिक भूगोल का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहाँ किले, मकबरे और धार्मिक स्थलों से जुड़ी ऐतिहासिक स्मृतियाँ मिलती हैं। जिला प्रशासन के पर्यटन विवरण में चेनपुर के संदर्भ में बख्तियार खान का मकबरा, सूरी/अकबर काल से जुड़े किले और हर्सू ब्रह्म मंदिर का उल्लेख मिलता है। ऐसे स्थानों पर पहुँचकर मुझे हमेशा यह विचार आता है कि इतिहास किताबों में जितना व्यवस्थित दिखाई देता है, जमीन पर उतना ही बिखरा हुआ है। कहीं कोई पुराना पत्थर है, कहीं किसी स्थापत्य का अवशेष, कहीं मंदिर है और कहीं किसी पुराने शासन की स्मृति।
यात्रा इन बिखरी हुई स्मृतियों को जोड़ने का अवसर देती है।
अधौरा : जब कैमूर का असली पहाड़ी रूप सामने आया
कैमूर की यात्रा में अधौरा का नाम अपने आप में एक अलग आकर्षण रखता है।
यह कैमूर पठार का ऊँचा क्षेत्र है। जिला पर्यटन विवरण के अनुसार अधौरा लगभग 2000 फीट की ऊँचाई पर स्थित है और भभुआ से लगभग 58 किलोमीटर की दूरी पर है।
अधौरा की ओर बढ़ते हुए कैमूर का भूगोल एकदम अलग अनुभव देने लगता है। यहाँ पहाड़ केवल दूर दिखाई देने वाली वस्तु नहीं रहते; वे यात्रा के चारों ओर उपस्थित हो जाते हैं।
जंगल, ऊँचाई, घाटियाँ और पहाड़ी रास्ते—इन सबके बीच चलते हुए लगा कि बिहार के बारे में हमारी सामान्य कल्पना कितनी सीमित है।
अक्सर बिहार को मैदान, गंगा और कृषि के संदर्भ में देखा जाता है। लेकिन कैमूर की पहाड़ियाँ बताती हैं कि इसी बिहार के भीतर एक ऐसा भूभाग भी है जहाँ प्रकृति ने अपना दूसरा रूप सँजोकर रखा है।
तेलहर कुंड : पानी की आवाज में पहाड़ हैं ! कैमूर यात्रा का एक अत्यंत आकर्षक पड़ाव था तेलहर कुंड और तेलहर जलप्रपात।
कैमूर जिला प्रशासन के अनुसार तेलहर जलप्रपात की ऊँचाई लगभग 80 मीटर है। बिहार पर्यटन के विवरण में इसे रोहतास पठार के निकट, दुर्गावती नदी क्षेत्र के आसपास का प्राकृतिक स्थल बताया गया है। तेलहर की ओर जाते हुए पहाड़ी रास्तों का अपना आकर्षण है। रास्ता जितना आगे बढ़ता है, उतना ही मन में जलप्रपात को देखने की उत्सुकता बढ़ती जाती है।
और फिर जब पानी सामने आता है, तो कुछ क्षणों के लिए रास्ते की सारी थकान पीछे छूट जाती है। ऊँचाई से गिरता पानी केवल एक दृश्य नहीं होता। वह लगातार चलती हुई ध्वनि है।
पानी के गिरने की आवाज, आसपास की हरियाली और पहाड़ों की निस्तब्धता मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं जिसमें शहर का शोर बहुत दूर छूट जाता है।
मैंने वहाँ यह अनुभव किया कि प्रकृति को देखने और प्रकृति के बीच खड़े होने में बहुत अंतर है। तस्वीर में जलप्रपात सुंदर दिख सकता है, लेकिन उसके सामने खड़े होकर गिरते पानी की आवाज सुनना एक अलग अनुभव है। तेलहर ने मेरी यात्रा में इसी अनुभव को जोड़ा है! 
नदियाँ : कैमूर की जीवन-रेखाएँ है  ! कैमूर की कहानी उसके जल के बिना पूरी नहीं हो सकती। कर्मनाशा और दुर्गावती इस क्षेत्र की प्रमुख नदियों में हैं। कैमूर के मैदानी भूभाग का भूगोल इन नदियों से गहराई से जुड़ा है। जिले के पूर्वी हिस्से में कुदरा जैसी नदियाँ भी अपने क्षेत्रीय जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यात्रा में नदी को केवल एक जलधारा के रूप में देखना संभव नहीं था। नदी के किनारे बसे गाँव, खेतों की हरियाली और जल पर निर्भर जीवन बताते हैं कि किसी भूभाग का इतिहास केवल राजाओं और मंदिरों से नहीं बनता।
उसका इतिहास पानी भी लिखता है। कर्मनाशा नाम अपने भीतर अनेक लोक-स्मृतियाँ और ऐतिहासिक धारणाएँ लिए हुए है। लेकिन एक यात्री के रूप में मुझे उसके नाम से अधिक उसका भूगोल आकर्षित करता रहा—एक ऐसी नदी जो पहाड़ियों और मैदानों के बीच अपना रास्ता बनाती हुई आगे बढ़ती है।
करकटगढ़ : पानी, पहाड़ और इतिहास है! कर्मनाशा से जुड़ा करकटगढ़ जलप्रपात कैमूर की प्राकृतिक पहचान का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह चेनपुर क्षेत्र में कैमूर की पहाड़ियों के बीच स्थित है और बिहार पर्यटन के अनुसार यह क्षेत्र कभी मगरमच्छों के शिकार से जुड़ा रहा था। ब्रिटिश काल में यहाँ जलप्रपात को देखने के लिए एक डाक बंगले का भी उल्लेख मिलता है। आज करकटगढ़ को प्रकृति और जैव-विविधता के संदर्भ में देखा जाता है। यहाँ का जलप्रपात लगभग 100 फीट ऊँचा और करीब 300 फीट चौड़ा बताया जाता है।
जब मैं इन स्थानों के बारे में सोचता हूँ तो एक बात विशेष रूप से सामने आती है—प्रकृति के सामने मनुष्य का इतिहास कितना छोटा है।
शासन बदले, राजवंश बदले, अंग्रेज आए और चले गए, पर्यटन की अवधारणा बदली; लेकिन पहाड़ और जलप्रपात अपनी जगह बने रहे। यही किसी प्राकृतिक स्थल की सबसे बड़ी ताकत है।
कैमूर की पहाड़ियों में बिखरे झरने है!  कैमूर और आसपास की पहाड़ियों में केवल तेलहर और करकटगढ़ ही नहीं हैं। बिहार पर्यटन के विवरणों में बुधुआ, धन्सा, अमझोर और तुतला भवानी जैसे जलप्रपातों का भी उल्लेख मिलता है। इन सभी स्थानों को एक ही यात्रा में देख पाना संभव नहीं था, लेकिन इनके नाम सुनना और उनके बारे में जानना ही इस क्षेत्र की व्यापकता का एहसास कराता है।
कैमूर की पहाड़ियाँ अपने भीतर जल को सँजोए हुए हैं।
बरसात के बाद पहाड़ी ढलानों से निकलती छोटी-छोटी धाराएँ जब नीचे उतरती हैं तो अनेक जगहों पर झरनों का रूप ले लेती हैं। यही कारण है कि कैमूर का पर्यटन केवल किसी एक मंदिर या एक जलप्रपात तक सीमित नहीं किया जा सकता।
यह एक पूरा प्राकृतिक परिदृश्य है।
वैद्यनाथ और दुरौली : यात्रा में इतिहास के दूसरे पड़ाव में  कैमूर की यात्रा का एक दूसरा पक्ष उसके धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल हैं। वैद्यनाथ मंदिर रामगढ़ क्षेत्र में स्थित है। जिला पर्यटन विवरण इसे प्राचीन परंपरा से जोड़ता है और मंदिर परिसर से ऐतिहासिक सामग्री तथा सिक्कों के मिलने का उल्लेख करता है।
इसी प्रकार दुरौली में पुराने मंदिरों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें स्थानीय इतिहास में चेरो काल से जोड़ा जाता है। इन स्थानों को देखकर यह समझ में आता है कि कैमूर का इतिहास किसी एक कालखंड में बंद नहीं है। यहाँ प्राचीन धार्मिक परंपराएँ हैं, मध्यकालीन स्थापत्य की स्मृतियाँ हैं, स्थानीय लोकविश्वास हैं और आधुनिक समय का बदलता हुआ ग्रामीण जीवन भी है।
एक यात्री के लिए यह विविधता ही सबसे बड़ा आकर्षण है।
प्रवीण कुमार पाठक के साथ यात्रा इस पूरी यात्रा में मेरे साथ प्रवीण कुमार पाठक, जिला औरंगाबाद के जीविका ट्रेनिंग ऑफिसर, रहे।
साथी के साथ की गई यात्रा की अपनी एक सहजता होती है। रास्ते लंबे हों तो भी यात्रा का अनुभव साझा होता रहता है।
लेकिन इस यात्रा में मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि हम कैमूर को केवल घूमने की जगह के रूप में नहीं देख रहे थे।
हम रास्ते, भूगोल, इतिहास, पहाड़, पानी और स्थानीय जीवन—इन सबको एक साथ देखने की कोशिश कर रहे थे।
विश्व पर्यटन दिवस पर शुरू हुई इस यात्रा का मेरे लिए यही सबसे सार्थक पक्ष रहा।
27 सितंबर को शुरू हुई यात्रा के बाद 29 सितंबर 2026 को वापसी हुई। वापसी का रास्ता हमेशा आगे जाने के रास्ते से अलग होता है। जाते समय आँखें आगे देखती हैं—क्या मिलेगा, कैसा होगा, कहाँ रुकेंगे, क्या देखेंगे? वापसी में आँखें पीछे छूटे दृश्यों को याद करती हैं। कैमूर की पहाड़ियाँ पीछे छूट रही थीं, लेकिन यात्रा समाप्त नहीं हुई थी।
तेलहर का पानी, मुंडेश्वरी की पहाड़ी, कर्मनाशा का भूगोल, करकटगढ़ का जलप्रपात और अधौरा की पहाड़ी दुनिया—ये सब मन में अपने-अपने चित्र की तरह बने हुए थे। मुझे लगा कि यात्रा का वास्तविक अंत घर लौटने पर नहीं होता। वह तब समाप्त होती है जब हम उसके अनुभव को भूल जाते हैं।
और कुछ यात्राएँ भूलती ही नहीं हैं।
कैमूर ने मुझे क्या दिया? इस यात्रा से लौटते हुए मेरे मन में कैमूर की कोई एक तस्वीर नहीं थी। कैमूर मेरे लिए एक साथ कई रूपों में था। वह माँ मुंडेश्वरी की पहाड़ी पर खड़ा इतिहास था। वह तेलहर में गिरता हुआ पानी था। वह करकटगढ़ की घाटी में बहती कर्मनाशा थी। वह अधौरा की ऊँचाई और जंगल था।वह भभुआ का मैदानी जीवन था। वह चेनपुर की ऐतिहासिक स्मृतियाँ थीं।और वह उन रास्तों पर दिखाई देने वाला सामान्य ग्रामीण जीवन भी था, जो किसी पर्यटन पुस्तिका में शायद बहुत कम जगह पाता है। विश्व पर्यटन दिवस पर शुरू हुई यह यात्रा मुझे यह समझाकर लौटी कि पर्यटन केवल सुंदर स्थानों को देखने का माध्यम नहीं है। पर्यटन किसी भूगोल को समझने का माध्यम है।
किसी नदी को देखकर उसके किनारे बसे जीवन को समझना, किसी मंदिर को देखकर उसके पीछे की सदियों को महसूस करना, किसी जलप्रपात को देखकर पहाड़ों के जल-संसार को समझना और किसी गाँव से गुजरते हुए वहाँ के लोगों के जीवन की कल्पना करना—यही यात्रा को सार्थक बनाता है।
कैमूर ने मुझे प्रकृति और इतिहास के बीच कोई दीवार दिखाई ही नहीं।यहाँ पहाड़ इतिहास को सँभालते हैं, नदियाँ भूगोल को आकार देती हैं और झरने उन पहाड़ियों की जीवंत आवाज बन जाते हैं।
29 सितंबर को जब वापसी हुई, तब लगा कि मैं केवल कैमूर से लौट नहीं रहा हूँ।मैं अपने साथ कैमूर का एक हिस्सा लेकर लौट रहा हूँ—पहाड़ों की शांति, पानी की आवाज और उन रास्तों की स्मृति, जिन पर चलते हुए बिहार का एक ऐसा चेहरा सामने आया जिसे दूर से देखना संभव नहीं। शायद इसी का नाम यात्रा है।एक रास्ता हमें जहाँ ले जाता है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि लौटते समय वह रास्ता हमारे भीतर क्या छोड़ जाता है।
मेरी कैमूर यात्रा ने मेरे भीतर यही छोड़ा— हाड़ों के बीच बहते पानी की एक आवाज, इतिहास की एक लंबी स्मृति और फिर लौटकर उन रास्तों पर दोबारा जाने की एक शांत इच्छा।
तथ्य-जाँच के आधार: कैमूर जिला प्रशासन के आधिकारिक पर्यटन पृष्ठों में भभुआ, भगवानपुर, चेनपुर, अधौरा, वैद्यनाथ और दुरौली के स्थान-विवरण; माँ मुंडेश्वरी की पहाड़ी व मंदिर; तथा तेलहर और करकटगढ़ जलप्रपात की जानकारी दी गई है। बिहार पर्यटन के आधिकारिक विवरण में कैमूर के पहाड़ी-मैदानी भूगोल, तेलहर, करकटगढ़ और कैमूर की अन्य पहाड़ी जलप्रपात-स्थलियों की जानकारी मिलती है।
एक प्रकाशन के लिए अगला उपयोगी कदम होगा कि इसमें आपकी यात्रा के वास्तविक ठहराव/भोजन, रास्ते में देखे किसी विशेष दृश्य और वापसी के दौरान की एक-दो निजी स्मृतियाँ जोड़ दी जाएँ—इससे लेख और अधिक व्यक्तिगत हो जाएगा, बिना किसी काल्पनिक प्रसंग के।

सोमवार, सितंबर 28, 2026

कैमूर परिभ्रमण

कैमूर  परिभ्रमण
सत्येंद्र कुमार पाठक 
2000 वर्ष पुराना जीवित मंदिर : कैमूर जिले के भगवानपुर प्रखंड के रामगढ़ स्थित कैमूर पर्वत समूह की मुण्डेश्वरी श्रृंखला पर स्थित माँ मुण्डेश्वरी धाम से अधौरा प्रखंड के तेल्हार कुण्ड और तेल्हार झरना तक का 3000 शब्दों में विस्तृत इतिहास, आध्यात्मिक चमत्कार और पर्यटन परिभ्रमण - जहाँ गर्भगृह में माता मुण्डेश्वरी और पंचमुखी शिव एक साथ, 510 सीढ़ियों की चढ़ाई, नंदी-नारियल-त्रिशूल-जल की परंपरा, पाषाण मूर्तियों की नक्काशी, हवन कुण्ड की अग्नि और पहाड़ी नदी की कल-कल में बसा है बिहार का गौरव - साहित्यकार व इतिहासकार सत्येन्द्र कुमार पाठक और जिला जीविका प्रशिक्षण अधिकारी प्रवीण कुमार पाठक की ऐतिहासिक यात्रा
आज 27 सितंबर 2026 है। आज विश्व पर्यटन दिवस है। पूरी दुनिया घूमने की बात कर रही है। पर मैं कहता हूँ - यदि घूमना है तो अपना बिहार घूमो। अपना कैमूर घूमो। क्योंकि कैमूर की पहाड़ी पर एक ऐसा मंदिर है जो 2000 साल से लगातार जीवित है, जहाँ पूजा कभी बंद नहीं हुई। नाम है - माँ मुण्डेश्वरी धाम।
आज का परिभ्रमण दो चरणों में हुआ। पहला चरण - भगवानपुर प्रखंड के रामगढ़ स्थित कैमूर पर्वत समूह की मुण्डेश्वरी श्रृंखला पर स्थित मुण्डेश्वरी मंदिर और दूसरा चरण - अधौरा प्रखंड का तेल्हार कुण्ड और तेल्हार झरना।
परिभ्रमण दल में  मैं स्वयं सत्येन्द्र कुमार पाठक  साहित्यकार, इतिहासकार, बाल साहित्य में "सृजन श्रेष्ठ" सम्मान प्राप्त तथा  प्रवीण कुमार पाठक ,  प्रशिक्षण अधिकारी, जिला जीविका, औरंगाबाद है।
कैमूर जिला बिहार का सबसे पश्चिमी जिला है। पहले रोहतास का हिस्सा था, 1991 में अलग जिला बना। इस जिले में कैमूर पर्वत है, जो विंध्य पर्वत श्रृंखला का पूर्वी छोर है। यह पर्वत 100 किलोमीटर लंबा, 50 किलोमीटर चौड़ा है।
मुण्डेश्वरी श्रृंखला -  भगवानपुर प्रखंड में रामगढ़ गांव से 3 किलोमीटर दूर कैमूर पर्वत की सबसे ऊँची चोटी है - ऊँचाई 608 फीट। इसी चोटी को मुण्डेश्वरी श्रृंखला कहते हैं। यहाँ कई छोटी-छोटी पहाड़ियां जुड़ी हैं, इसलिए श्रृंखला कहा जाता है।
मंदिर तक पहुंचने के लिए दो रास्ते हैं ।  नीचे से ऊपर तक 510 पक्की सीढ़ियां। हर 50 सीढ़ी पर विश्राम चबूतरा। युवा, श्रद्धालु इसी से जाते हैं। सड़क मार्ग  चार पहिया और दो पहिया वाहन के लिए सड़क। बुजुर्ग, दिव्यांग, सामान इसी से जाता है। हम लोग द्वीपहिया मोटर साइकिल  से गए।
तेल्हार कुण्ड और झरना -  मुण्डेश्वरी से 40 किलोमीटर दूर अधौरा प्रखंड में है तेल्हार। अधौरा बिहार का सबसे ऊँचा और सबसे दुर्गम प्रखंड है, समुद्र तल से 1500 फीट ऊँचा। इसे अंग्रेजों ने "बिहार का शिमला" कहा था। यहीं है तेल्हार कुण्ड - पहाड़ के ऊपर से पानी गिरता है तो नीचे 100 फीट गहरा प्राकृतिक कुण्ड बन गया है, जो साल भर नहीं सूखता। इसी कुण्ड से आगे 100 फीट नीचे गिरता है तेल्हार झरना । 
पौराणिक युग - चंड-मुंड वध - दुर्गा सप्तशती में कथा है - शुंभ-निशुंभ नाम के दो राक्षस थे। उनके दो सेनापति थे - चंड और मुंड। माँ दुर्गा ने चंड का वध किया तो नाम पड़ा चामुंडा और मुंड का वध किया तो नाम पड़ा मुण्डेश्वरी। कहा जाता है कि इसी पर्वत पर मुंड का वध हुआ था, इसलिए यह पर्वत मुण्डेश्वरी पर्वत कहलाया।
. मौर्य और कुषाण युग - 108 ईस्वी - 1904 में अंग्रेज पुरातत्वविद् ब्लॉच ने यहाँ एक शिलालेख खोजा। उस पर लिखा था "महासामंत महाराज उदयसेन के शासन के 30वें वर्ष में।" अर्थात्  शक संवत 30 । मुण्डेश्वरी मंदिर का इतिहास 4 युगों नई मूर्तियां लगीं। चीनी यात्री ह्वेनसांग जब 635 ईस्वी में यहाँ आया तो उसने लिखा - "कैमूर पर्वत पर एक ऊँचा मंदिर है जहाँ लोग दिन-रात पूजा करते हैं और बलि देते हैं पर जीव हत्या नहीं करते।"
1850 में अंग्रेजों ने इसे खंडहर समझा। 1970 में बिहार सरकार ने इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया। 2000 में सड़क बनी। 2015 में बिहार सरकार ने इसे पर्यटन स्थल घोषित किया है।
मुण्डेश्वरी मंदिर का सबसे बड़ा आश्चर्य है गर्भगृह। आमतौर पर भारत में या तो शक्तिपीठ होता है या शिव मंदिर। पर मुण्डेश्वरी में दोनों एक साथ हैं।
गर्भगृह में माता मुण्डेश्वरी काले पत्थर की चतुर्भुजी मूर्ति, महिषासुरमर्दिनी रूप में। मूर्ति कई बार खंडित हुई, मुस्लिम आक्रमण में तोड़ी गई, फिर हिंदू राजाओं ने जोड़ी। आज भी मूर्ति पर जोड़ के निशान दिखते हैं। पंचमुखी शिवलिंग - माता के ठीक बगल में। यह उत्तर भारत का एकमात्र पंचमुखी शिवलिंग है जो देवी के साथ है। चार मुख चार दिशाओं में और पांचवां मुख ऊपर। चार मुख चार वेदों - ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद के प्रतीक हैं और पांचवां मुख मोक्ष का। इसलिए कहा जाता है - जो शिव को पूजेगा उसे शक्ति मिलेगी और जो शक्ति को पूजेगा उसे शिव मिलेंगे। यही अद्वैत का सिद्धांत है।
मंदिर परिसर में  नंदी, नारियल, जल, त्रिशूल, पाषाण मूर्तियां और हवन कुण्ड है।  "मुण्डेश्वरी मंदिर परिसर में नंदी, नारियल, जल, त्रिशूल तथा शिवलिंग पर समर्पित किया जाता है एवं अनेक पाषाण युक्त मूर्ति एवं पाषाण पर नक्काशीदार है। हवन-पूजन कुण्ड है।"  मंदिर के मुख्य द्वार के सामने जाली के अंदर नंदी महाराज बैठे हैं। यह नंदी 7वीं सदी का है। नंदी पर लाल चुनरी और गेंदे की माला। नंदी सीधे गर्भगृह के शिवलिंग को देख रहे हैं। आपकी तस्वीर में जाली पर हजारों चुनरियां बंधी हैं, वही नंदी का स्थान है। नारियल स्थल  परिसर में बोर्ड लगा है - "नारियल स्थल - कृपया नारियल यहीं फोड़े।" यह बहुत अच्छी व्यवस्था है। पहले लोग गर्भगृह में ही नारियल फोड़ते थे, जिससे गंदगी होती थी। अब ट्रस्ट ने अलग स्थान बनाया है। नवरात्र में यहाँ रोज 5000 से ज्यादा नारियल फोड़े जाते हैं।
 जल, त्रिशूल, शिवलिंग पर समर्पण हेतु भक्त तीन चीजें चढ़ाते हैं - जल (कर्मनाशा और सोन नदी का जल), त्रिशूल (छोटा लोहे का त्रिशूल, मन्नत पूरी होने पर) और नारियल। शिवलिंग पर जल, बेलपत्र और भस्म चढ़ता है। अनेक पाषाण युक्त मूर्तियां और नक्काशीदार पत्थर  यह मंदिर का सबसे बड़ा खजाना है। मंदिर नागर शैली में बना है, अष्टकोणीय आकार में। बिना सीमेंट-चूना के, केवल पत्थर पर पत्थर रखकर। दीवारों पर - प्रवेश द्वार पर द्वारपाल की मूर्तियां - हाथ में गदा। गंगा-यमुना, गणेश, विष्णु, सूर्य, नवग्रह की मूर्तियां।  छत पर कमल और कीर्तिमुख की नक्काशी। जाली पर बंधी 10 हजार से ज्यादा मन्नतों की चुनरियां। हर चुनरी एक कहानी है।
हवन-पूजन कुण्ड - मंदिर के सामने बड़ा हवन कुण्ड है। यहाँ चैत्र और शारदीय नवरात्र में 9 दिन तक अखंड हवन होता है। कहा जाता है कि इस कुण्ड की राख को खेत में डालने से फसल अच्छी होती है।
 आध्यात्मिक चमत्कार - जो विज्ञान भी नहीं समझ पाया मुण्डेश्वरी के 5 चमत्कार प्रसिद्ध हैं - रंग बदलने वाला शिवलिंग -  गर्भगृह में पंचमुखी शिवलिंग दिन में 3 बार रंग बदलता है - सुबह सुनहरा, दोपहर में हल्का काला, शाम को फिर सुनहरा। वैज्ञानिक इसे सूर्य के प्रकाश का प्रभाव कहते हैं, पर पुजारी कहते हैं - यह शिव की लीला है। अहिंसक बलि - दुनिया में कहीं नहीं है । यहाँ बकरे की बलि दी जाती है, पर बकरा मरता नहीं। यह दुनिया में इकलौता मंदिर है जहाँ अहिंसक बलि होती है। पुजारी बकरे को माता के सामने लाते हैं, मंत्र पढ़ते हैं, अक्षत (चावल) फेंकते हैं। बकरा बेहोश हो जाता है, गिर जाता है। लोग समझते हैं कि माता ने बलि स्वीकार कर ली। फिर बकरे को छोड़ दिया जाता है। 2000 साल से यह परंपरा चल रही है। ह्वेनसांग ने भी इसका उल्लेख किया है।
 मन्नतों की चुनरी जाली पर बंधी चुनरियों की संख्या 10 हजार से ज्यादा है। मान्यता है कि सच्चे मन से चुनरी बांधने पर मन्नत पूरी होती है। मन्नत पूरी होने पर फिर से आकर चुनरी बांधनी होती है। आपकी तस्वीर में यही चुनरियां दिख रही हैं।
रात में बजने वाली घंटियां - पुजारी बताते हैं कि रात में जब मंदिर बंद हो जाता है, तब अंदर से घंटियों और शंख की आवाज आती है। कई लोगों ने सुनी है। कहा जाता है कि रात में देवता यहाँ पूजा करते हैं।  माता  मुण्डेश्वरी , भगवान शिव  की पंचमुखी शिवलिंग  का दर्शन एवम  उपासना पूजन से मानसिक शांति तथा आध्यात्मिक उर्जा का  संचार  का अनुभव हुआ।  
तेल्हार कुण्ड का कभी न सूखना - अधौरा का तेल्हार कुण्ड गर्मी में भी नहीं सूखता। जबकि कैमूर के बाकी झरने सूख जाते हैं। कहा जाता है कि इस कुण्ड का संबंध पाताल लोक से है ।
तेल्हार कुण्ड का इतिहास भी मुण्डेश्वरी जितना ही पुराना है। युग  
पांडव काल में अज्ञातवास के समय पांडव यहाँ रुके थे। भीम ने इस कुण्ड को अपने गदा से बनाया था। इसलिए स्थानीय लोग इसे "भीम कुण्ड" भी कहते हैं। आपकी तस्वीर में जो गुफा दिख रही है, उसे "भीम की गुफा" कहा जाता है। इस कुण्ड का पानी कभी खराब नहीं होता। महीनों तक बोतल में रखो, खराब नहीं होगा। वैज्ञानिक इसे मिनरल वाटर कहते हैं। तेल्हार झरना 100 फीट ऊँचा है। बरसात में इसका रूप विकराल होता है। पर यही झरना कैमूर की जीवन रेखा है। नीचे कई गांव इसी के पानी से खेती करते हैं।
 मंदिर के निकास द्वार की तस्वीर कहती है - यहाँ से निकलते ही मोक्ष मिलता है। मुख्य मंदिर की तस्वीर कहती है - 2000 साल से यह पत्थर ऐसे ही खड़ा है। माला पहने श्रद्धालु की तस्वीर (मैं स्वयं) कहती है - पीढ़ी बदल रही है पर आस्था वही है। नंदी और चुनरी की तस्वीर कहती है - हर चुनरी एक मन्नत है। नदी और गुफा की तस्वीर कहती है - कैमूर केवल मंदिर नहीं, प्रकृति भी है। झरना की तस्वीर कहती है - बिहार में भी शिमला जैसा झरना है।
आज 27 सितंबर 2026 को मुण्डेश्वरी धाम से तेल्हार कुण्ड तक का यह परिभ्रमण मेरे जीवन के अविस्मरणीय परिभ्रमणों में से एक है। मुण्डेश्वरी की 510 सीढ़ी, चढ़ते-चढ़ते सांस फूली, पर माता के दरबार में पहुंचते ही, सारी थकान भूली। तेल्हार का पानी कहता है, रुक जाओ दो घड़ी,कैमूर की घाटी कहती है, लिख दो एक और कड़ी।"
मुसहरवा बाबा - तेल्हार कुण्ड  जाने के क्रम  में मुसहरवा  मंदिर  में स्थापित  मुसहरवा बाबा  का दर्शन किया।  यहा  भक्त गण  बीडी  अर्पित कर  बीडी पीते है । प्रसाद में बीडी दिया जाता है  और मनोकामना  पूर्ण करते है ।

 सुअरा नदी और तेल्हार कुण्ड,  भभुआ 
55 किमी लंबी कैमूर की जीवन रेखा सुअरा नदी जिसे सुवरा या सुवरन नदी भी कहा जाता है - तेल्हार कुण्ड और कैमूर पहाड़ियों से निकलकर भभुआ शहर, भगवानपुर और अधौरा के दर्जनों गाँवों को सींचती, अंत में दुर्गावती नदी में मिलती मौसमी नदी का जीर्णोद्धार ही कैमूर के किसानों का भविष्य है - मुण्डेश्वरी धाम से तेल्हार कुण्ड तक के परिभ्रमण में मिला नदी का सच । 
बिहार के कैमूर जिले की चर्चा आते ही लोग मुण्डेश्वरी धाम, तेल्हार कुण्ड और कर्कट जलप्रपात की बात करते हैं। पर कोई यह नहीं बताता कि इन सभी को जोड़ने वाली एक नदी है - सुअरा नदी।
इसे स्थानीय लोग सुवरा व सुअरा नदी और पुराने दस्तावेजों में सुवरन नदी भी कहा जाता है।
27 सितंबर 2026 को विश्व पर्यटन दिवस पर जब हम लोगों ने भगवानपुर प्रखंड के रामगढ़ स्थित मुण्डेश्वरी श्रृंखला से अधौरा प्रखंड के तेल्हार कुण्ड और तेल्हार झरना तक का परिभ्रमण किया, तो इसी नदी के किनारे-किनारे हम द्विपहिया मोटर साइकिल से गए। रास्ते में मुसहरवा बाबा मंदिर में बीड़ी प्रसाद भी चढ़ाया।
आज उसी सुअरा नदी का विस्तृत इतिहास, भूगोल और महत्व आपको बता रहा हूँ। परिभ्रमण दल में   सत्येन्द्र कुमार पाठक, साहित्यकार, इतिहासकार, बाल साहित्यकार, सृजन श्रेष्ठ सम्मान प्राप्त एवं  प्रवीण कुमार पाठक, प्रशिक्षण अधिकारी, जिला जीविका, औरंगाबाद शामिल है। 
सुअरा नदी बिहार के कैमूर जिले की एक प्रमुख छोटी और मौसमी नदी है। मौसमी का मतलब - यह साल भर नहीं बहती। बरसात में उफान पर और गर्मी में पतली धारा बनकर बहती है।
सुवरा नदी, सुवरन नदी की लंबाई  लगभग 55 किलोमीटर तथा  
-उद्गम  कैमूर की पहाड़ियां, तेल्हार कुण्ड व आसपास के पहाड़ी ,   प्रवाह क्षेत्र  अधौरा, भगवानपुर, भभुआ प्रखंड और   दुर्गावती नदी की सहायक नदी के रूप में मिलती है। दुर्गावती आगे कर्मनाशा में और कर्मनाशा गंगा में मिलती है। यह नदी कैमूर पर्वत समूह से प्रवाहित 55 किमी लंबी नदी है, पूरी तरह कैमूर जिले में है, पर इसका पानी रोहतास जिले के कुछ गांवों तक भी जाता है।
सुअरा नदी का जन्म तेल्हार कुण्ड से होता है।
अधौरा प्रखंड में तेल्हार कुण्ड है - 100 फीट गहरा प्राकृतिक कुण्ड, जो साल भर नहीं सूखता। इसी कुण्ड से पानी रिस-रिस कर नीचे गिरता है और वही पानी छोटी-छोटी धाराओं में मिलकर सुअरा नदी बन जाता है। तेल्हार कुण्ड के अलावा कैमूर पहाड़ियों से निकलने वाले कई झरने, बरसाती नाले और वर्षा का पानी भी इसमें मिलता है। इसलिए बरसात में यह नदी विकराल रूप ले लेती है। आपकी जो 4 तस्वीरें हैं - नदी के बीच चट्टान पर बैठना, गुफा में बैठना, झरना के मुहाने पर खड़ा होना - वह सभी सुअरा नदी के उद्गम क्षेत्र की ही हैं। हम लोगों ने वहीं देखा - पहाड़ से गिरता पानी एक कुण्ड में इकट्ठा हो रहा है और कुण्ड से आगे एक नदी बनकर बह रहा है। वही सुअरा है। : प्रवाह मार्ग - पहाड़ से भभुआ शहर तक है। सुअरा नदी का 55 किमी का सफर 3 प्रखंडों में बंटा है -
 अधौरा प्रखंड (0 से 20 किमी) जन्म से 20 किमी तक यह पहाड़ी नदी है। पहाड़ों के बीच, जंगलों के बीच बहती है। यहाँ पानी सबसे साफ है। आदिवासी खरवार, चेरो जनजाति इसी के पानी से खेती करते हैं। रास्ते में मुसहरवा बाबा मंदिर पड़ता है, जहाँ बीड़ी प्रसाद चढ़ता है। हमने वहीं स्नान किया।
. भगवानपुर प्रखंड (20 से 40 किमी) यहाँ नदी मैदान में उतरती है। मुण्डेश्वरी श्रृंखला के ठीक नीचे से बहती है। भगवानपुर के रामगढ़, भगवानपुर गांव के लोग इसी नदी से सिंचाई करते हैं। मुण्डेश्वरी धाम आने वाले भक्त इसी नदी में पैर धोते हैं। भभुआ प्रखंड (40 से 55 किमी) भभुआ शहर के पास से गुजरती है। भभुआ जिला मुख्यालय है। शहर की गंदगी मिलने से यहाँ पानी थोड़ा गंदा हो जाता है। अंत में यह दुर्गावती नदी में मिल जाती है।
सुअरा नदी  किसानों की जीवन रेखा है। कैमूर सूखा जिला माना जाता है। यहाँ नहरें कम हैं। इसलिए सुअरा नदी ही किसानों की जीवन रेखा है। भभुआ प्रखंड के 25 गांव , भगवानपुर प्रखंड के 20 गांव , अधौरा प्रखंड के 15 गांव के किसानों को सिंचाई में मदद मिलती है। लगभग 10 हजार एकड़ जमीन की सिंचाई इसी से होती है। तेल्हार कुण्ड में लोग पिकनिक मनाते हैं, वैसे सुअरा नदी किनारे भी इको टूरिज्म पार्क बन सकता है।
 सुअरा नदी और मुण्डेश्वरी - आध्यात्मिक संबंध सुअरा नदी का मुण्डेश्वरी से सीधा संबंध है। कहा जाता है कि पहले मुण्डेश्वरी मंदिर में जलाभिषेक सुअरा नदी के जल से ही होता था। पुजारी तेल्हार कुण्ड से जल लाते थे। आज भी नवरात्र में इसी नदी के जल से माता का अभिषेक होता है। इसलिए मुण्डेश्वरी धाम का परिभ्रमण सुअरा नदी के बिना अधूरा है। सुअरा नदी केवल 55 किमी लंबी नदी नहीं, यह कैमूर की आत्मा है। यह पहाड़ से निकलती है, जंगल को सींचती है, आदिवासियों को पानी देती है, मुण्डेश्वरी का जलाभिषेक करती है, भभुआ शहर को छूती है और अंत में दुर्गावती में मिलकर गंगा तक जाती है। तेल्हार कुण्ड का पानी, मुसहरवा बाबा की बीड़ी, मुण्डेश्वरी की 510 सीढ़ियां और सुअरा नदी की कल-कल - यही चार मिलकर कैमूर का संपूर्ण पर्यटन बनाते हैं।
मुण्डेश्वरी की 510 सीढ़ी, चढ़ते-चढ़ते सांस फूली, पर माता के दरबार में पहुंचते ही सारी थकान भूली। तेल्हार का पानी कहता है, रुक जाओ दो घड़ी, सुअरा की धारा कहती है, बहती हूँ मैं बड़ी-बड़ी।.जय माँ मुण्डेश्वरी, जय तेल्हार कुण्ड, जय मुसहरवा बाबा, जय सुअरा नदी, जय कैमूर, जय बिहार।