शनिवार, जून 13, 2026

बाण भट्ट और प्रीतिकूट की विरासत

महागाथा प्रीतिकूट (पीरू) 
: सत्येंद्र कुमार पाठक 
बिहार की पावन धरा इतिहास के किसी एक कालखंड या किसी एक विचारधारा की बपौती नहीं रही है, बल्कि यह वह अनंत कैनवास है जहाँ मानव सभ्यता के विकास के विभिन्न सोपानों ने एक साथ आकार लिया। मगध और भोजपुर की सांस्कृतिक सीमाओं को स्पर्श करता हुआ, वर्तमान औरंगाबाद और अरवल जिलों के मिलन-बिंदु पर स्थित 'प्रीतिकूट' (जिसे मध्यकाल से आज तक 'पीरू' या 'अबू नसीरपुर' कहा जाता है) भारत की उसी बहुरंगी और बहुसांस्कृतिक आत्मा का जीवंत प्रतीक है। यह केवल एक गाँव या 620 हेक्टेयर (6.2 वर्ग किलोमीटर) में फैला एक भौगोलिक भू-भाग नहीं है; यह एक ऐसा ज्ञान-तीर्थ और सांस्कृतिक महासंगम है, जहाँ एक ओर वैदिक ऋचाओं का सस्वर पाठ हुआ, तो दूसरी ओर सूफी संतों की रूहानी कव्वालियों ने दिलों को जोड़ा। यह वह भूमि है जिसने संस्कृत साहित्य के सार्वभौमिक सम्राट महाकवि बाणभट्ट को जन्म दिया, और यह वही भूमि है जहाँ बगदाद के सूफी संतों ने आकर प्रेम और मानवता का संदेश फैलाया। समुद्र तल से 93 मीटर (305 फीट) की ऊंचाई पर अवस्थित यह क्षेत्र 2011 की जनगणना के अनुसार 8537 की आबादी (जिसमें 4372 पुरुष और 4165 स्त्रियां 1334 परिवारों में निवासरत हैं) के साथ आज भी अपनी उस गौरवशाली विरासत को संजोए हुए है, जिसने हर्षवर्धन काल से लेकर मुगल काल और आधुनिक काल तक भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास को गहरे तक प्रभावित किया। प्रस्तुत विस्तृत आलेख विभिन्न ऐतिहासिक साक्ष्यों, साहित्यिक संदर्भों और लोक-परंपराओं के आधार पर प्रीतिकूट के सौर, शाक्त, ब्रह्म, शैव, वैष्णव, ऋषि, पितृ और सूफी अवदानों का एक प्रामाणिक दस्तावेजीकरण है।  किसी भी महान सभ्यता या सांस्कृतिक केंद्र के उदय के पीछे वहाँ की भौगोलिक स्थिति और प्राकृतिक संसाधनों का बहुत बड़ा हाथ होता है। प्रीतिकूट के साथ भी यही नियम लागू होता है।
प्राचीन प्रीतिकूट आज के प्रशासनिक मानचित्र पर बिहार राज्य के औरंगाबाद जिले के हसपुरा प्रखंड के अंतर्गत आता है, परंतु इसकी सीमा अरवल जिले के कलेर प्रखंड से ठीक 4 किलोमीटर की दूरी पर मिलती है। यह दोनों सांस्कृतिक क्षेत्रों (मगध और प्राचीन शोण-तटीय संस्कृति) का संधिकाल है। 620 हेक्टेयर के विस्तीर्ण क्षेत्र में फैले इस ऐतिहासिक स्थल की ऊंचाई समुद्र तल से 93 मीटर (305 फीट) है, जो इसे भौगोलिक दृष्टि से सुरक्षित और शांत बनाती थी। इसी सुरक्षा और शांति के कारण प्राचीन मनीषियों ने इसे अपनी साधना के लिए चुना।
प्राचीन ग्रंथों और महाकवि बाणभट्ट की स्व-लिखित कृति 'हर्षचरितम' के अनुसार, यह क्षेत्र पवित्र 'हिरण्यबाहु नदी' के तट पर अवस्थित था। 'हिरण्यबाहु' (जिसका शाब्दिक अर्थ है - सोने की बाहों वाली) वास्तव में 'शोण' या आधुनिक सोन नदी की ही एक प्राचीन, अत्यंत पवित्र उप-धारा थी, जो स्वर्ण-कणों को अपने साथ बहाकर लाती थी। नदी के कछार की उपजाऊ मिट्टी ने जहाँ एक ओर कृषि को समृद्ध किया, वहीं इसके शांत और शीतल किनारों ने तपस्वियों को आकर्षित किया। आज भले ही हिरण्यबाहु नदी समय के थपेड़ों और भौगोलिक परिवर्तनों के कारण विलुप्त हो चुकी है, लेकिन इसके पुरातात्विक और साहित्यिक साक्ष्य आज भी इस भूमि की प्राचीनता को प्रमाणित करते हैं।
प्रीतिकूट के नामकरण और इसके एक महान ज्ञान-केंद्र के रूप में स्थापित होने की कहानी सीधे तौर पर वैदिक ऋषि संस्कृति से जुड़ी हुई है। हिरण्य प्रदेश के  भृगु वंशीय ऋषि च्यवन एवं सुकन्या के पुत्र प्रीतिकुट के आदि संस्थापक वात्स्यान गोत्र के प्रवर्तक ऋषि वतस के वंशज पीढ़ियों का अनवरत ज्ञान प्रवाह करने वाले वेदांत चित्रभानु एवं राजदेवी के पुत्र 7 वीं सदी ई का संस्कृत साहित्य गद्यकार बाण भट्ट की जन्म स्थली थी । 
हर्षचरितम के प्रथम उच्छ्वास (अध्याय) के अनुसार, प्रीतिकूट के मूल संस्थापक ऋषि वत्स ही थे। ऋषि वत्स, भृगुवंशीय महान महर्षि च्यवन और सुकन्या के प्रत्यक्ष वंशज थे। उन्हीं के नाम पर इस वंश को 'वात्स्यायन गोत्र' कहा गया। ऋषि वत्स ने ही ज्ञान, तपस्या और वैदिक ऋचाओं के सस्वर पाठ के लिए इस पवित्र क्षेत्र को चुना और यहाँ एक समृद्ध गुरुकुल तथा पावन बस्ती की स्थापना की। चूँकि यह स्थान अपनी प्राकृतिक सुंदरता, नदियों के संगम और शांत वातावरण के कारण सभी को अत्यंत प्रिय था, इसलिए इसका नाम 'प्रीतिकूट' (अर्थात प्रीति या प्रेम का शिखर/घर) पड़ा।
ऋषि वत्स द्वारा प्रीतिकूट की स्थापना का समय वैदिक और उत्तर-वैदिक काल का संधिकाल माना जाता है। यह काल ईसा पूर्व की सदियों पुराना है, जो रामायण और महाभारत कालखंड के समानांतर चलता है। ऐतिहासिक रूप से, ऋषि वत्स द्वारा स्थापित यह वंश और स्थान गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद और हर्षावर्धन काल (589-645 ईस्वी) तथा भवभूति काल (630-640 ईस्वी) में अपने चरमोत्कर्ष पर था। ऋषि वत्स ने प्रीतिकूट को मात्र एक रिहायशी इलाका नहीं बनाया, बल्कि इसे एक 'ब्रह्मपुरी' (विद्वानों की नगरी) के रूप में विकसित किया। यहाँ सामवेद और यजुर्वेद के मंत्रों का अनवरत पाठ होता था। ऋषि वत्स का मत था कि ज्ञान के साथ-साथ जीवन में मर्यादा और सात्विक समृद्धि भी जरूरी है। उनके इस अवदान के कारण ही प्रीतिकूट सदियों तक (पाल, सेन और मुगल काल तक) एक विशिष्ट सांस्कृतिक और बौद्धिक पहचान बनाए रखने में सफल रहा। आज भी यहाँ स्थित संस्कृत विद्यालय इसी प्राचीन ज्ञान परंपरा की अटूट कड़ी है।
. महाकवि बाणभट्ट की जन्म और कर्म स्थली: संस्कृत साहित्य का स्वर्णिम युग में 7वीं सदी ईस्वी में प्रीतिकूट ने वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान दर्ज कराई, जब यहाँ वात्स्यायन गोत्र के वैदिक मनीषी चित्रभानु और उनकी भार्या विदुषी राजदेवी के घर बाणभट्ट का जन्म हुआ। बाणभट्ट बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। उनकी माता राजदेवी का उन पर गहरा प्रभाव था, जो स्वयं एक विदुषी महिला थीं। बाणभट्ट ने शास्त्र और संगीत शास्त्र के प्रकांड ज्ञाता भरकू भारद्वाज को अपना गुरु बनाया। भरकू भारद्वाज के सान्निध्य में रहकर बाणभट्ट ने न केवल वेदों और उपनिषदों का गहन अध्ययन किया, बल्कि संगीत, कला और लोक-संस्कृति में भी असाधारण निपुणता हासिल की।।बाणभट्ट ने प्रीतिकूट की माटी को ही अपनी कर्मस्थली बनाया और यहीं बैठकर विश्व साहित्य के दो महान ग्रंथों की रचना की: हर्षचरितम: भारतीय इतिहास का पहला ऐतिहासिक आख्यान  है, जिसमें उन्होंने अपने संरक्षक राजा हर्षवर्धन के जीवन और उनके कालखंड (589-645 ईस्वी) का सजीव चित्रण किया है। इसके शुरुआती अध्यायों में बाणभट्ट ने स्वयं अपने गाँव प्रीतिकूट, अपनी कुल-परंपरा और हिरण्यबाहु नदी का अत्यंत सुंदर वर्णन किया है। कादंबरी:  दुनिया का पहला उपन्यास (Novel) माना जाता है। गद्य काव्य की यह ऐसी विधा है जिसके बारे में कहा जाता है कि "बाणोच्छिष्टं जगत्सर्वम्" अर्थात संस्कृत साहित्य में जो कुछ भी है, वह बाणभट्ट की जूठन मात्र है। बाणभट्ट की विद्वत्ता से प्रभावित होकर सम्राट हर्षवर्धन ने उन्हें अपने दरबार में 'प्रधान राजकवि' का स्थान दिया। राजा के दरबार में रहने के बावजूद बाणभट्ट का अपनी जन्मभूमि प्रीतिकूट से लगाव कभी कम नहीं हुआ, और वे बार-बार यहाँ आते रहे।
प्रीतिकूट की धार्मिक और सांस्कृतिक बनावट अत्यंत विलक्षण रही है। यह स्थान सनातन धर्म के विभिन्न मतों के बीच कभी भी विवाद का कारण नहीं रहा, बल्कि यहाँ सभी मतों का सुंदर समन्वय (Syncretism) देखने को मिलता है। हिरण्यबाहु (सोन) नदी के तट पर अवस्थित होने के कारण प्रीतिकूट में प्राचीन काल से ही सूर्य पूजा (सौर मत) की गहरी जड़ें रहीं। उदीयमान और अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने की यह परंपरा आज भी बिहार के महापर्व 'छठ' के रूप में इस क्षेत्र में अक्षुण्ण बनी हुई है। विदुषी राजदेवी (बाणभट्ट की माता) की बौद्धिक स्वतंत्रता और बाद के कालखंडों में महिलाओं की आदरणीय स्थिति इस बात का प्रमाण है कि यहाँ 'शक्ति' को ज्ञान और सामर्थ्य के रूप में पूजा गया। मध्यकाल में जब स्थानीय शासकों (जैसे राजा जवाला महाराणा) और उजैनिया राजपूतों का प्रभाव बढ़ा, तो कुलदेवी के रूप में माँ भवानी (दुर्गा) की उपासना यहाँ की संस्कृति का अनिवार्य हिस्सा बन गई। भारतीय धर्म इतिहास में अक्सर शैव (शिव के उपासक) और वैष्णव (विष्णु के उपासक) मतों में द्वंद्व देखने को मिलता है, लेकिन प्रीतिकूट में दोनों का सह-अस्तित्व था: शैव मत: महाकवि बाणभट्ट स्वयं भगवान शिव के परम भक्त थे। 'हर्षचरितम' की शुरुआत ही उन्होंने शिव स्तुति से की है। इस क्षेत्र के आसपास गुप्तकालीन शिव उपासकों की एक लंबी परंपरा रही है। वैष्णव मत: पाल और सेन राजवंशों (11वीं और 12वीं सदी) के समय इस क्षेत्र में वैष्णव मत का गहरा प्रभाव पड़ा। भगवान विष्णु के अवतारों की पूजा, सात्विकता और कीर्तन परंपरा का प्रसार हुआ, जिसे बाणभट्ट के गुरु भरकू भारद्वाज के संगीत शास्त्र ने और अधिक समृद्ध किया। मगध की भूमि (विशेषकर गया और उसके आसपास का क्षेत्र) पूरे विश्व में पितृ तर्पण और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा के लिए विख्यात है। प्रीतिकूट में भी 'पितृ संस्कृति' का गहरा प्रभाव रहा है। यहाँ के लोकजीवन में अपने पूर्वजों की भूमि को नमन करने और उनके नाम पर लोक-कल्याणकारी कार्य (जैसे कुएं खुदवाना, बाग लगवाना, मजार या स्मारक बनवाना) करने की समृद्ध परंपरा रही है।
अमनरुल्लाह खान की प्रसिद्ध पुस्तक 'पीरू: एक परिचय' में एक अत्यंत मार्मिक ऐतिहासिक घटना का उल्लेख मिलता है। इसके अनुसार, मुगल जागीरदार मोहम्मद शाहनवाज की पुत्री जिन्नत प्रवीण सुदूर क्षेत्रों से यात्रा करके विशेष रूप से अपने पूर्वजों की इस पावन माटी पर आई थीं और उन्होंने यहाँ की मिट्टी को नमन किया था। यह घटना रेखांकित करती है कि पीरू की मिट्टी का आकर्षण ऐसा है कि लोग दुनिया में कहीं भी रहें, अपनी जड़ों (Roots) को कभी नहीं भूलते। इसी तरह, बनतारा में स्थित जागीरदार मुबारक चौधरी का ऐतिहासिक मकबरा भी इसी पितृ-स्मृति और स्थापत्य कला का एक जीवंत साक्ष्य है। मध्यकालीन राजनीतिक परिवर्तन और सूफी अध्यात्म का उदय (13वीं - 16वीं सदी) का 13वीं शताब्दी से लेकर 16वीं शताब्दी के बीच प्रीतिकूट के इतिहास में एक नया और स्वर्णिम अध्याय जुड़ा, जिसने इसे 'पीरू' और 'अबू नसीरपुर' जैसी नई पहचान दी तथा इसे सांप्रदायिक सौहार्द का एक महान केंद्र बना दिया था । 
14वीं सदी में इस क्षेत्र के राजनीतिक परिदृश्य में व्यापक बदलाव आया। इस दौरान यहाँ राजा जवाला महाराणा का शासन था। उनके दरबार में एक अत्यंत चतुर और लोकप्रिय विदूषक थे, जिनका नाम पीरू भोपा था। पीरू भोपा का स्थानीय लोकमानस पर इतना गहरा प्रभाव था कि उनके नाम की गूंज इस क्षेत्र के नामकरण के साथ भी जुड़ गई। साल 1242 ईस्वी में, जब मध्य एशिया में मंगोल साम्राज्य अपने प्रारंभिक और आक्रामक चरण में था, अफगानिस्तान के फराह प्रांत के सिरुगन निवासी अबू नासिर पीरू का आगमन इस क्षेत्र में हुआ। उन्होंने यहाँ आकर शांति, मानवता और सह-अस्तित्व की भावना को बल दिया। उन्हीं के आदर में आगे चलकर इस पूरे परगने को 'अबू नसीरपुर' और संक्षेप में 'पीरू' कहा जाने लगा।।इराक की ऐतिहासिक नगरी बगदाद से महान सूफी संत हजरत सैयदना मो. जिलानी अमझरी कादरी का आगमन प्रीतिकूट की भूमि पर हुआ। उन्होंने तत्कालीन प्रीतिकूट के सघन वनों के बीच स्थित एक अत्यंत रमणीय स्थान 'आम्र झर' (आम का झरना या आम्रकुंज) को अपनी तपोभूमि (खानकाह) के रूप में चुना और यहीं पर सूफी संप्रदाय की आधारशिला रखी।
अबू नासिर पीरू 1242 ईस्वी सिरुगन, फराह (अफगानिस्तान) क्षेत्र को 'अबू नसीरपुर' (पीरू) नाम मिला, शांति की स्थापना की। हजरत सैयदना मो. जिलानी अमझरी कादरी मध्यकाल (निधन: जून 1517) बगदाद (इराक) 'आम्र झर' में सूफी संप्रदाय की नींव रखी; हिंदू-मुस्लिम एकता के सूत्रधार थे । उन्होंने जाति, धर्म और वर्ग से ऊपर उठकर प्रेम और रूहानी सूफी संगीत के माध्यम से लोगों के दिलों को जीता जून 1517 ईस्वी के प्रथम सप्ताह में इस महान सूफी संत का निधन (विसाल) हुआ। उनके निधन के बाद से आज तक इस स्थल को 'पवित्रता का स्थल' माना जाता है, जहाँ हर साल हज़ारों श्रद्धालु मन्नतें मांगने आते हैं। यह स्थल गंगा-जमुनी तहजीब का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर उभरा। मुगल काल, शेरशाह सूरी और जागीरदारी व्यवस्था (16वीं - 18वीं सदी) का उत्तर-मध्यकाल में प्रीतिकूट (पीरू) केवल एक सांस्कृतिक केंद्र नहीं रहा, बल्कि यह सामरिक और प्रशासनिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण हो गया। महान अफगान शासक शेरशाह सूरी के शासनकाल में इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति (सासाराम और पटना के बीच होने के कारण) को देखते हुए इसका तेजी से ढांचागत और व्यापारिक विकास किया गया। यह स्थल सूरी साम्राज्य के प्रभाव में एक प्रमुख व्यापारिक मार्ग के रूप में था । मुगल काल के दौरान, 1657-1659 ईस्वी के बीच, जब शाहजहाँ के बड़े पुत्र और अत्यंत उदारवादी विचारक दारा शिकोह बिहार के सूबेदार (Governor) थे, तब उन्होंने पीरू के ऐतिहासिक और सामरिक महत्व को पहचाना। दारा शिकोह ने पीरू को बकायदा एक 'परगना' (प्रशासनिक इकाई) घोषित कर दिया और इसकी जिम्मेदारी कोकलत उजैनियां को सौंप दी। इससे पहले, 1580 ईस्वी में अकबर के काल में ब्रबल सिंह उजैन को पीरू जागीर का शासक बनाया गया था, जिसके बाद यह पूरा क्षेत्र मुगल सैन्य छावनी और प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन आ गया था।
. धर्म परिवर्तन, जागीरदारी और कयाल गढ़ का इतिहास क्षेत्र में धर्म परिवर्तन और राजनीतिक सत्ता के गठजोड़ की भी अनूठी ऐतिहासिक कहानियाँ मिलती हैं:मथुरा चौधरी से गुलाम मुस्तफा खान: सुल्तान फिरोजशाह तुगलक के काल (14वीं सदी) में अरवल जिले के करपी प्रखंड के बंभई गाँव के निवासी मथुरा चौधरी ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया, जिसके बाद उन्हें गुलाम मुस्तफा खान के नाम से जाना गया। आगे चलकर मुगल शासक मोहम्मद शाहनवाज के समय गुलाम मुस्तफा खान, उनके भाई कमल नारायण सिंह और नसरुद्दीन हैदर खान को संयुक्त रूप से पीरू का जागीरदार नियुक्त किया गया। राजा तिलक धारी चौधरी और बनतारा जागीर: इसी प्रकार, कयाल गढ़ के राजा तिलक धारी चौधरी ने भी इस्लाम धर्म अपना लिया और वे बनतारा जागीर के संस्थापक बने। उनके पुत्र मुबारक चौधरी यहाँ के प्रतापी जागीरदार हुए, जिनका ऐतिहासिक और कलात्मक मकबरा आज भी बनतारा में मौजूद है, जो मध्यकालीन स्थापत्य कला की गवाही देता है।
समय बदला, लेकिन पीरू की मिट्टी ने शिक्षा और बौद्धिक चेतना के प्रति अपने झुकाव को कभी कम नहीं होने दिया। प्राचीन काल का जो गुरुकुल था, उसने आधुनिक काल में पुस्तकालय और तकनीकी शिक्षा का रूप ले लिया।
साल 1936 ईस्वी में पीरू में 'पब्लिक उर्दू लाइब्रेरी' की स्थापना की गई। ब्रिटिश भारत के उस दौर में, इस पुस्तकालय ने क्षेत्र में साक्षरता बढ़ाने, उर्दू व हिंदी साहित्य के संरक्षण और स्थानीय युवाओं में वैचारिक व राष्ट्रीय क्रांति को बढ़ावा देने में अमूल्य भूमिका निभाई। यह पुस्तकालय आज भी इस क्षेत्र की बौद्धिक चेतना का प्रतीक है।  प्रीतिकूट (पीरू) की प्रतिभा केवल बिहार या भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि सात समंदर पार भी अपना परचम लहरा रही है। उदाहरण के तौर पर, इसी मिट्टी के सपूत इंजीनियर सैफुल्लाह खान अजमेरी वर्तमान में कुवैत सरकार के 'विद्युत एवं जल मंत्रालय' (Ministry of Electricity and Water, Kuwait) में एक प्रतिष्ठित और वरिष्ठ इंजीनियर के रूप में कार्यरत हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि ज्ञान की जो रश्मि ऋषि वत्स और बाणभट्ट ने फैलाई थी, वह आज भी आधुनिक रूप में प्रज्वलित है।
बिहार के औरंगाबाद और अरवल की सीमाओं पर बसा यह छोटा सा क्षेत्र 'प्रीतिकूट' यानी 'पीरू' भारत की अमर साझी विरासत, सनातन सहिष्णुता और मध्यकालीन सूफी संप्रदाय का एक जीवंत और धड़कता हुआ उदाहरण है। प्राचीन काल में ब्रह्म संस्कृति के तहत ऋषि वत्स द्वारा गुरुकुल की स्थापना , 7 सदी में महाकवि बाण भट्ट द्वारा कादंबरी और हर्ष चरितम की रचना , 13-16 वीं सदी में सूफी संतों का आगमन , अमझर में खानकाह की स्थापना ,मुगल कल में दारा शिकोह द्वारा पीरू परगना घोषित एवं उजैनिया राजपूतों का शासन , आधुनिक कल 1936 में पब्लिक उर्दू लाइब्रेरी की स्थापना वैश्विकी पहचान , बाण भट्ट संस्कृत विद्यालय  की स्थापना एवं वैश्विक तकनीकी पहचान हुई है।  बाणभट्ट की 'कादंबरी' के क्लिष्ट और सुंदर श्लोकों से लेकर सूफी संतों की रूहानी कव्वालियों, अजानों और भजनों तक; और दारा शिकोह के परगने से लेकर 1936 की आधुनिक लाइब्रेरी और संस्कृत विद्यालय तक—इस स्थान ने इतिहास के हर झोंके को अपने भीतर संजोकर रखा है। यह ऐतिहासिक धरोहर आज की नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़े रहने, संकीर्णताओं से ऊपर उठने तथा ज्ञान व आपसी सद्भाव के रास्ते पर चलने की शाश्वत प्रेरणा देती है।
संदर्भ ग्रंथ सूची - बाणभट्ट कृत 'हर्षचरितम' – प्रथम एवं द्वितीय उच्छ्वास (वात्स्यायन वंश और प्रीतिकूट ग्राम का मूल वर्णन)। बाणभट्ट कृत 'कादंबरी' – प्रकथन एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि। अमनरुल्लाह खान – 'पीरू: एक परिचय' (स्थानीय इतिहास, जागीरदारी व्यवस्था और जिन्नत प्रवीण के आगमन का विवरण)। फ्रांसिस बुकानन की 1812 का भ्रमण । बिहार का गया डिस्ट्रिक्ट गजेटियर 1906,1957  – ऐतिहासिक, भौगोलिक और मध्यकालीन प्रशासनिक परगना विवरण। भारत की जनगणना 2011 – पीरू (अबू नसीरपुर) ग्राम के जनसांख्यिकीय आंकड़े (आबादी: 8537, परिवार: 1334)। स्थानीय लोक-श्रुतियां एवं अभिलेख – राजा जवाला महाराणा, पीरू भोपा (14वीं सदी) और हजरत सैयदना मो. जिलानी अमझरी कादरी (निधन 1517 ई.) से संबंधित ऐतिहासिक कड़ियाँ।

गुरुवार, जून 11, 2026

बाल कहानी आलेख

प्रकृति की पाठशाला
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
जून  का महीना था और सूरज देवता अपने पूरे तेवर में थे। स्कूलों में गर्मी की छुट्टी हो चुकी थी। ८ वर्ष का डुग्गू, ६ वर्ष का पुच्चू और उनकी छोटी बहन ५ वर्ष की पीहू, तीनों शहर की भागदौड़ से दूर अपने गांव ‘हरीपुर’ आए थे। उनके लिए गांव का मतलब था—मम्मी-पापा के साथ ढेर सारी मस्ती और दादाजी का वह पुराना, हवादार और बड़ा सा दालान। दादाजी का दालान कोई साधारण जगह नहीं थी। वहाँ ठंडी-ठंडी हवा चलती थी, मिट्टी की सोंधी खुशबू आती थी और सबसे बढ़कर, वहाँ दादाजी की ज्ञान की पोटली खुलती थी।
एक सुबह, दालान में पीपल और बरगद के विशाल पेड़ों की ठंडी छांव बिखरी हुई थी। तभी अचानक कहीं से जोर-जोर से कांव-कांव की आवाज आने लगी। पीहू ने चिढ़कर अपने कान बंद कर लिए, "धत्तरे की! यह कौवा कितना गंदा गाता है। मुझे यह बिल्कुल पसंद नहीं।"
पास ही बैठे दादाजी मुस्कुराए और पीहू को अपनी गोद में बिठाते हुए बोले, "अरे छोटी बिटिया, ऐसा नहीं कहते। भले ही कौवे की आवाज सुरीली नहीं होती, लेकिन वह हमारा बहुत अच्छा दोस्त है। वह हमारे आसपास की गंदगी साफ करता है। और जानते हो, वह बहुत बुद्धिमान और मिलनसार भी होता है।"
"सच में दादाजी?" डुग्गू और पुच्चू भी अपनी कॉमिक्स छोड़कर पास आ गए।
"हाँ बच्चों! और जरा सामने देखो, उस शीशम की डाल पर कौन बैठा है?" दादाजी ने इशारा किया।
वहाँ एक हरे रंग का तोता और एक भूरे रंग की मैना आपस में गुटरगू कर रहे थे। कुछ ही दूरी पर एक सुंदर मोर अपने पंख समेटे खड़ा था। मम्मी रसोई से ठंडे-ठंडे आम और अमरूद काटकर लाईं। पापा ने कहा, "बच्चों, यह देखो, यह फल हमारे बगीचे के हैं। इस गर्मी में पेड़ हमें मीठे फल भी देते हैं और ठंडी हवा भी।" पुच्चू ने अमरूद का टुकड़ा मुंह में डालते हुए पूछा, "पापा, क्या पेड़ सिर्फ फल देते हैं?" पापा ने समझाया, "नहीं पुच्चू, ये जो पीपल, बरगद और शीशम के पेड़ हैं, ये हमें ऑक्सीजन देते हैं जिससे हम सांस लेते हैं। और वह देखो, दूर जो महुआ के पेड़ हैं, उनके फूलों से दवाइयां और स्वादिष्ट पकवान बनते हैं।"
दोपहर ढलने लगी तो दादाजी ने कहा, "चलो बच्चों, आज तुम्हें गाँव की असली पाठशाला ले चलते हैं—प्रकृति की पाठशाला!"पापा ने गाड़ी तैयार की और सब घूमने निकले। थोड़ी दूर जाने पर उन्हें ऊंचे-ऊंचे पर्वत दिखाई दिए। पर्वत इतने ऊंचे थे मानो आसमान को छू रहे हों। पर्वतों के बीच से एक कलकल करती नदी बह रही थी।
डुग्गू ने पूछा, "दादाजी, यह नदी कहाँ से आती है?" दादाजी ने बताया, "डुग्गू, ये नदियाँ इन ऊंचे पर्वतों पर जमी बर्फ के पिघलने से बनती हैं। नदी का पानी मीठा होता है, जो खेतों की प्यास बुझाता है और हमें पीने का पानी देता है।" नदी के किनारे हरी-भरी घास चर रही गाय, मजबूत बैल और पानी में आनंद लेती भैंस दिखाई दीं। वहीं पास में एक सफेद घोड़ा शान से दौड़ रहा था। दादाजी ने बच्चों को बताया, "यह गाय हमें पौष्टिक दूध देती है। बैल खेतों में किसान की मदद करते हैं और भैंस भी दूध देती है। ये सब हमारे वफादार साथी हैं।"
तभी दालान का रखवाला, उनका पालतू कुत्ता 'शेरू' भी दौड़ता हुआ वहाँ आ गया और अपनी पूंछ हिलाने लगा। पीहू ने उसे प्यार से सहलाया।
शाम होने को आई थी। सूरज की किरणें अब हल्की और सुनहरी हो गई थीं। पापा उन्हें नदी के पास ही बने एक बड़े से सरोवर (तालाब) के पास ले गए।।सरोवर का जल बिल्कुल साफ और शांत था। पानी में रंग-बिरंगी मछली तैर रही थीं। पीहू पानी में मछलियों को देखकर ताली बजाने लगी। तभी पुच्चू चिल्लाया, "देखो-देखो, पानी पर नाव जैसी कोई चीज तैर रही है!"
मम्मी ने हंसते हुए कहा, "पुच्चू, वह नाव नहीं, हंस है।" शान से तैरते हुए सफेद हंसों का जोड़ा बेहद खूबसूरत लग रहा था। दादाजी ने इस मौके पर बच्चों को एक बहुत बड़ी सीख दी। उन्होंने कहा, "बच्चों, हंस की एक बहुत बड़ी खासियत होती है। इसे 'नीर-क्षीर विवेक' कहते हैं। अगर हंस के सामने दूध और पानी मिलाकर रख दिया जाए, तो वह सिर्फ दूध पी लेता है और पानी छोड़ देता है।" "इसका क्या मतलब हुआ दादाजी?" डुग्गू ने उत्सुकता से पूछा। "इसका मतलब है मेरे बच्चे," दादाजी ने प्यार से डुग्गू का सिर थपथपाते हुए कहा, "कि इस दुनिया में अच्छी बातें भी हैं और बुरी बातें भी। हमें इस हंस की तरह बनना चाहिए—हमेशा अच्छी बातों (दूध) को अपनाना चाहिए और बुरी बातों (पानी) को छोड़ देना चाहिए।"
घर वापसी और ज्ञान का उपहार
रात होने लगी थी। आसमान में तारे टिमटिमाने लगे थे। सब लोग वापस दादाजी के दालान में आ गए। ठंडी हवा चल रही थी और आसमान में चाँद मुस्कुरा रहा था। मम्मी ने सबको खाने के बाद मीठा-मीठा पपीता काटकर दिया। पीहू, डुग्गू और पुच्चू आज बहुत खुश थे। उन्होंने आज किताबों वाली पाठशाला से अलग, प्रकृति की सजीव पाठशाला में बहुत कुछ सीखा था। डुग्गू बोला, "दादाजी, आज मुझे समझ आया कि यह पूरी प्रकृति—ये पर्वत, नदी, सरोवर, पशु-पक्षी और पेड़-पौधे—सब आपस में जुड़े हैं। अगर ये नहीं होंगे, तो हम भी नहीं बचेंगे।"
पुच्चू ने कहा, "और मैं अब से कभी किसी जानवर को तंग नहीं करूँगा और हर साल एक पेड़ जरूर लगाऊँगा।"
छोटी पीहू ने हंसते हुए कहा, "और मैं कल सुबह उठकर सबसे पहले कौवे भैया को रोटी दूँगी और तोते-मैना के लिए दालान में पानी रखूँगी।" दादाजी, मम्मी और पापा बच्चों की यह समझदारी देखकर बेहद खुश हुए। दादाजी ने तीनों को गले से लगा लिया। इस तरह गर्मी की वह छुट्टी सिर्फ खेल-कूद की नहीं, बल्कि ज्ञान और संस्कार की एक अनोखी छुट्टी बन गई।
सीख -  प्रकृति की हर रचना—चाहे वह छोटा सा कौवा हो, विशाल बरगद का पेड़ हो, या बहती हुई नदी—सबका हमारे जीवन में बहुत महत्व है। हमें पर्यावरण की रक्षा करनी चाहिए और हमेशा हंस की तरह केवल अच्छाइयों को ग्रहण करना चाहिए।

धूप, गर्मी और 'लू' के सबक
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
हरीपुर गाँव का वही बड़ा और हवादार दालान आज भी ठंडा था, लेकिन बाहर का नजारा बदला हुआ था। दोपहर के बारह बज रहे थे और सूरज देवता आसमान से जैसे आग बरसा रहे थे। चारों तरफ सन्नाटा था। न तो कोई पक्षी चहक रहा था और न ही कोई बाहर दिख रहा था।
८ वर्ष का डुग्गू, ६ वर्ष का पुच्चू और ५ वर्ष की पीहू दालान में बैठे-बैठे बोर हो रहे थे। डुग्गू ने बाहर झांकते हुए कहा, "यार, चलो न बाहर आम के पेड़ के पास छुपन-छुपाई खेलते हैं!"
पुच्चू भी तैयार हो गया, "हाँ, यहाँ बैठे-बैठे तो पैर दुखने लगे हैं।"।दोनों जैसे ही दालान से बाहर निकलने लगे, तभी रसोई से हाथ में आम का पन्ना (शरबत) लिए मम्मी बाहर आईं। बच्चों को बाहर जाते देख वे चौंककर बोलीं, "रुको बच्चों! इतनी कड़कती धूप में बाहर बिल्कुल नहीं जाना है। बाहर बहुत तेज और गर्म हवा चल रही है, जिसे 'लू' कहते हैं। इस मौसम में दोपहर को बाहर निकलने से तबीयत खराब हो सकती है।"
पीहू ने अपनी मासूम आवाज में पूछा, "मम्मी, यह 'लू' क्या होती है? क्या यह कोई भूत है?"
तभी पास ही आराम कुर्सी पर बैठे दादाजी जोर से मुस्कुराए और बोले, "नहीं पीहू बिटिया! लू कोई भूत नहीं है। जब जून के महीने में सूरज की किरणें बहुत सीधी और तेज पड़ती हैं, तो हवा बहुत गर्म और सूखी हो जाती है। इसी गर्म और थपेड़ेदार हवा को 'लू' कहते हैं। अगर हम इस धूप और लू के संपर्क में आ जाएं, तो हमारे शरीर का पानी सूख जाता है, चक्कर आने लगते हैं और तेज बुखार भी हो सकता है, जिसे 'सनस्ट्रोक' या 'लू लगना' कहते हैं।"
पापा ने सभी बच्चों को पास बुलाया और मम्मी के हाथ से आम के पन्ने के गिलास लेकर बच्चों को दिए। पापा बोले, "इस मौसम में धूप और लू से बचने के लिए यह कच्चे आम का पन्ना, छाछ और नींबू पानी सबसे अच्छे हथियार हैं। यह हमारे शरीर को अंदर से ठंडा रखते हैं।"डुग्गू ने आम का पन्ना पीते हुए कहा, "वाह दादाजी! यह तो बहुत स्वादिष्ट है। पर दादाजी, हम इंसान तो घर के अंदर छिपकर लू से बच जाते हैं, लेकिन हमारी प्रकृति की पाठशाला के बाकी साथी—जैसे वे पक्षी, गाय, और हमारे शेरू भैया, वे इस भयंकर गर्मी और लू से कैसे बचते होंगे?"
दादाजी बच्चों की इस संवेदनशीलता से बेहद खुश हुए। उन्होंने दालान की खिड़की से बाहर इशारा करते हुए कहा, "देखो बच्चों, प्रकृति ने सबको अपनी रक्षा करना सिखाया है। दोपहर के समय सारे पशु-पक्षी घने पेड़ों की छांव में दुबक जाते हैं। वे इंसानों की तरह बेवजह धूप में नहीं घूमते। लेकिन, इस कड़कती धूप में उनके लिए सबसे बड़ी समस्या पानी की होती है।"
तभी पुच्चू को अपनी पिछली सीख याद आई। वह उछलकर बोला, "दादाजी! पिछली बार हमने सीखा था कि हमें हमेशा हंस की तरह अच्छी बातें अपनानी चाहिए। तो क्या हम इस गर्मी में अपने इन मूक दोस्तों के लिए कुछ अच्छा नहीं कर सकते?"
"बिल्कुल कर सकते हैं!" पापा ने गर्व से कहा।
पापा और बच्चों ने मिलकर तुरंत एक योजना बनाई। पापा घर के अंदर से मिट्टी के कुछ बड़े-बड़े कटोरे (सकोरे) ले आए। डुग्गू और पुच्चू ने उन कटोरों में साफ और ठंडा पानी भरा। पीहू ने उसमें थोड़े से चावल के दाने डाल दिए। फिर दादाजी की देखरेख में, उन्होंने उन कटोरों को दालान के बाहर, पेड़ों की घनी छांव में और दीवार के कोनों पर सुरक्षित रख दिया, जहाँ धूप न पहुँचती हो। पानी रखने के कुछ ही देर बाद, एक प्यासा कौवा उड़ता हुआ आया। उसने पहले चारों तरफ देखा, फिर मजे से सकोरे से पानी पीने लगा। पानी पीकर उसने अपनी चोंच को पानी में डुबोया और पंख फड़फड़ाकर अपनी गर्मी शांत की। उसे देखकर तोते और मैना का जोड़ा भी वहाँ आ गया।
यह देखकर पीहू ताली बजाकर नाचने लगी, "देखो-देखो! कौवे भैया की गर्मी भाग गई!"
शाम को जब सूरज की तपिश कम हुई और ठंडी हवा चलने लगी, तब दादाजी ने बच्चों को गले लगाते हुए कहा, "बच्चों, आज तुम सबने प्रकृति की पाठशाला का एक और बड़ा अध्याय सीख लिया। तेज धूप और गर्मी हमें सहनशीलता सिखाती है, और इस मौसम में दूसरों की प्यास बुझाना सबसे बड़ा पुण्य का काम है।"
डुग्गू, पुच्चू और पीहू ने मिलकर कसम खाई कि वे पूरी गर्मी में हर रोज सुबह-शाम इन सकोरों में पानी बदलेंगे। इस तरह, उन्होंने न सिर्फ खुद को लू से बचाया, बल्कि प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्य को भी बखूबी निभाया।
सीख: भीषण गर्मी और लू के दिनों में हमें खुद को सुरक्षित रखने के साथ-साथ बेजुबान पशु-पक्षियों के दाने-पानी का भी ध्यान रखना चाहिए। प्रकृति की रक्षा में ही हमारी सुरक्षा है।

बाल साहित्य: सतरंगी बचपन
"किसी समाज की सबसे बड़ी पूँजी उसके बच्चे होते हैं, और उन बच्चों के मानसिक व नैतिक विकास की सबसे मजबूत आधारशिला बाल साहित्य है।" बाल साहित्य केवल मनोरंजन या अक्षरों का जमावड़ा नहीं है, बल्कि यह वह मार्गदर्शक है जो किसी बच्चे को पहली बार दुनिया की जटिलताओं, मानवीय मूल्यों, विज्ञान के चमत्कारों और अपनी संस्कृति से बेहद सरल और रोचक तरीके से परिचित कराता है। यह वह साहित्य है जो बच्चों के मानसिक स्तर, उनकी असीम रुचि, अकल्पनीय कल्पनाशीलता और बाल मनोविज्ञान को केंद्र में रखकर रचा जाता है। इसका मूल उद्देश्य बालकों का स्वस्थ मनोरंजन करने के साथ-साथ उनमें नैतिक मूल्य, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और जीवन-कौशल विकसित करना होता है।
बाल साहित्य की परंपरा उतनी ही प्राचीन है जितनी कि इंसानी सभ्यता। समय के साथ इसके स्वरूप में बड़े बदलाव आए हैं, जिन्हें हम दो मुख्य चरणों में देख सकते हैं। प्रारंभ में बाल साहित्य का प्रसार लिखित रूप में न होकर मौखिक रूप में हुआ। यह दादी-नानी की कहानियों, रात्रिकालीन लोरियों और स्थानीय लोकगीतों के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता रहा। भारत की समृद्ध परंपरा में 'पंचतंत्र', 'हितोपदेश' और 'जातक कथाएं' इसी मौखिक और लोक परंपरा की अनमोल देन हैं। इन कहानियों में पशु-पक्षियों और प्रकृति को माध्यम बनाकर बच्चों को नीति और चतुराई की बातें सिखाई जाती थीं, जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। 
वैश्विक संदर्भ: आधुनिक रूप में बाल साहित्य का उदय 18वीं शताब्दी में यूरोप में हुआ। लंदन के प्रसिद्ध प्रकाशक जॉन न्यूबेरी को बाल साहित्य का जनक माना जाता है, जिन्होंने पहली बार व्यावसायिक और रचनात्मक रूप से बच्चों के लिए विशेष पुस्तकें छापना शुरू किया। हिन्दी बाल साहित्य की शुरुआत: हिन्दी में बाल साहित्य की औपचारिक शुरुआत भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा संपादित और 1882 में प्रकाशित 'बाल दर्पण' पत्रिका से मानी जाती है। इसके बाद महावीर प्रसाद द्विवेदी के युग में 'बालसखा' जैसी युगांतरकारी पत्रिका का प्रकाशन हुआ। आगे चलकर 'वानर', 'मनमोहन', 'चंदामामा', 'नंदन', 'चंपक' और 'पराग' जैसी पत्रिकाओं ने हिन्दी बाल साहित्य को हर घर के ड्राइंग रूम और बच्चों के दिलों तक पहुँचाया।
साहित्य के संदर्भ में 'अवधान' का अर्थ योगदान या विशेष ध्यान केंद्रित करना है। बाल साहित्य लिखना किसी वयस्क के लिए गंभीर साहित्य रचने से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण कार्य है। बाल साहित्यकारों के अवधान और इसकी मूल अवधारणा के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:  बाल साहित्य की सबसे बड़ी शर्त यह है कि लेखक को अपनी उम्र, अनुभव और 'बड़प्पन के अहंकार' को छोड़कर पूरी तरह से बच्चे के दृष्टिकोण और उसकी मासूम कल्पना के स्तर पर उतरना पड़ता है। "बच्चे की आँख से दुनिया को देखना" ही बाल साहित्य का मूल मंत्र है। सहज, सरल और संगीतात्मक भाषा विधा के लेखकों का सबसे बड़ा योगदान इसकी भाषा को बोधगम्य बनाना रहा है। यहाँ वाक्य छोटे होते हैं, शब्द-विन्यास आसान होता है और भाषा में एक आंतरिक लय या संगीतात्मकता होती है, जिससे बच्चा पढ़ते समय जुड़ाव महसूस करे। : बाल साहित्य मनोरंजन और शिक्षा का एक अनूठा मिश्रण है। बच्चे स्वभाव से विद्रोही और जिज्ञासु होते हैं; उन्हें सीधे उपदेश (जैसे- "सदा सत्य बोलो") पसंद नहीं आते। इसलिए, लेखक कहानियों, कविताओं और रूपकों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से उनके अवचेतन मन में अच्छी बातें रोपित करते हैं।
आज का बाल साहित्य बहुआयामी हो चुका है। बच्चों की विभिन्न रुचियों को ध्यान में रखते हुए इसे कई विधाओं में विभाजित किया जा सकता है: बाल कविता एवं लोरियाँ में तुकबंदी, लयबद्धता और सहज संगीत। भाषाई क्षमता का विकास और याददाश्त को मजबूत करना। बाल कहानी व लघुकथा रोचक पात्र (पशु, जासूस, राजा-रानी या आम बच्चे)। कल्पनाशीलता, तार्किकता और निर्णय लेने की क्षमता का विकास।।विज्ञान कथाएँ अंतरिक्ष, रोबोटिक्स, भविष्य की तकनीक पर आधारित। अंधविश्वास से मुक्ति और वैज्ञानिक दृष्टिकोण या कौतूहल जगाना। बाल नाटक व एकांकी संवादात्मक शैली और मंचन योग्य। बच्चों में आत्मविश्वास, टीम वर्क और अभिव्यक्ति की कला का विकास। आधुनिक विधाएँ (जैसे हाइकु) कम शब्दों (जैसे जापानी विधा हाइकु) में बड़ी बात कहना। संक्षिप्तता और गहरी सोच को बढ़ावा देना है। 
आज का युग डिजिटल युग है, जहाँ बचपन स्मार्टफोन की स्क्रीन, वीडियो गेम्स और सोशल मीडिया रील्स के चक्रव्यूह में फँस गया है। ऐसे समय में बाल साहित्य की महत्ता और आवश्यकता कई गुना बढ़ गई है । 
 अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों में चिड़चिड़ापन और एकाग्रता की कमी पैदा कर रहा है। किताबें पढ़ने से बच्चों के मस्तिष्क में न्यूरॉन्स का बेहतर विकास होता है, जिससे उनकी एकाग्रता और रचनात्मकता बढ़ती है। संस्कार और सामाजिक सरोकार में एकल परिवारों के बढ़ते चलन के कारण आज बच्चों को दादा-दादी या नाना-नानी का सान्निध्य नहीं मिल पा रहा है, जो कभी लोककथाओं के माध्यम से संस्कार देते थे। बाल साहित्य इस खालीपन को भरता है और बच्चों को सहानुभूति, सहिष्णुता, साहस और पर्यावरण संरक्षण जैसे मूल्य सिखाता है। जिज्ञासा और तर्कशक्ति को धार में  बाल साहित्यकार बच्चों के भीतर छिपे "क्यों, कहाँ, कैसे" जैसे प्रश्नों को दबाते नहीं, बल्कि उन्हें सही दिशा देकर उनकी जिज्ञासा और तर्कशक्ति को बढ़ाते हैं।
वर्तमान में बाल साहित्य के क्षेत्र में कई सराहनीय और प्रगतिशील कदम उठाए जा रहे हैं। मातेश्वरी  विद्या देवी बाल साहित्य शोध संस्थान सिरसा , हरियाणा की अखिल भारतीय बाल साहित्य सम्मेलन के संरक्षक संस्थापक राजकुमार निजात और जयपुर राजस्थान  से हिंदी मासिक बच्चों का देश ' के संपादक संजय जैन , हरियाणा के  त्रिलोक चंद फतेहपुरी की पुस्तक बाल सौरभ , तेलगाना के प्रसाद राव जामी की संपादित बाल साहित्य , दरभंगा , बिहार के सतीश चंद्र भगत , मुजफ्फरपुर , बिहार के डॉ ऊषा श्रीवास्तव की बज्जिका भाषा m बज्जिका बाल कविता संरक्ष  जैसे प्रबुद्ध चिंतकों व संस्थाओं द्वारा इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किए जा रहे हैं। आज के नए और स्थापित बाल साहित्यकारों को न केवल पारंपरिक विधाओं, बल्कि बाल कहानी, नाटक, कविताओं, हाइकु, एकांकी और लघुकथाओं पर लिखने के लिए निरंतर प्रोत्साहित किया जा रहा है, जो कि बाल साहित्य के विकास का एक अत्यंत स्वागत योग्य कदम है। : आज की पीढ़ी 'डिजिटल नेटिव' है। हमें बाल साहित्य को केवल कागज़ की किताबों तक सीमित न रखकर ई-बुक्स , ऑडियो बुक्सऔर सचित्र एनिमेटेड कॉमिक्स के रूप में भी प्रस्तुत करना होगा। : आज के बच्चे को केवल राजा-रानी या परियों की कहानियों से संतुष्ट नहीं किया जा सकता। उन्हें साइबर सुरक्षा, कोडिंग, जलवायु परिवर्तन और मानसिक स्वास्थ्य जैसे समकालीन विषयों पर उनकी भाषा में साहित्य चाहिए।
बाल साहित्य केवल बचपन का मनोरंजन करने का साधन नहीं है, बल्कि यह एक प्रबुद्ध, संवेदनशील और प्रगतिशील राष्ट्र के निर्माण का सबसे सशक्त माध्यम है। एक अच्छा बाल साहित्यकार बच्चों का सबसे अच्छा दोस्त और उनका अनौपचारिक शिक्षक होता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि स्कूलों की प्राथमिक कक्षाओं से लेकर पारिवारिक स्तर तक बाल पत्रिकाओं और पुस्तकों को अनिवार्य रूप से पहुँचाया जाए। जब बच्चों के हाथों में गैजेट्स की जगह रंग-बिरंगी, ज्ञानवर्धक और कल्पनाशीलता से भरी किताबें होंगी, तभी हमारा बचपन सुरक्षित, समृद्ध और सतरंगी बना रहेगा।