गुरुवार, जून 11, 2026

बाल कहानी आलेख

प्रकृति की पाठशाला
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
जून  का महीना था और सूरज देवता अपने पूरे तेवर में थे। स्कूलों में गर्मी की छुट्टी हो चुकी थी। ८ वर्ष का डुग्गू, ६ वर्ष का पुच्चू और उनकी छोटी बहन ५ वर्ष की पीहू, तीनों शहर की भागदौड़ से दूर अपने गांव ‘हरीपुर’ आए थे। उनके लिए गांव का मतलब था—मम्मी-पापा के साथ ढेर सारी मस्ती और दादाजी का वह पुराना, हवादार और बड़ा सा दालान। दादाजी का दालान कोई साधारण जगह नहीं थी। वहाँ ठंडी-ठंडी हवा चलती थी, मिट्टी की सोंधी खुशबू आती थी और सबसे बढ़कर, वहाँ दादाजी की ज्ञान की पोटली खुलती थी।
एक सुबह, दालान में पीपल और बरगद के विशाल पेड़ों की ठंडी छांव बिखरी हुई थी। तभी अचानक कहीं से जोर-जोर से कांव-कांव की आवाज आने लगी। पीहू ने चिढ़कर अपने कान बंद कर लिए, "धत्तरे की! यह कौवा कितना गंदा गाता है। मुझे यह बिल्कुल पसंद नहीं।"
पास ही बैठे दादाजी मुस्कुराए और पीहू को अपनी गोद में बिठाते हुए बोले, "अरे छोटी बिटिया, ऐसा नहीं कहते। भले ही कौवे की आवाज सुरीली नहीं होती, लेकिन वह हमारा बहुत अच्छा दोस्त है। वह हमारे आसपास की गंदगी साफ करता है। और जानते हो, वह बहुत बुद्धिमान और मिलनसार भी होता है।"
"सच में दादाजी?" डुग्गू और पुच्चू भी अपनी कॉमिक्स छोड़कर पास आ गए।
"हाँ बच्चों! और जरा सामने देखो, उस शीशम की डाल पर कौन बैठा है?" दादाजी ने इशारा किया।
वहाँ एक हरे रंग का तोता और एक भूरे रंग की मैना आपस में गुटरगू कर रहे थे। कुछ ही दूरी पर एक सुंदर मोर अपने पंख समेटे खड़ा था। मम्मी रसोई से ठंडे-ठंडे आम और अमरूद काटकर लाईं। पापा ने कहा, "बच्चों, यह देखो, यह फल हमारे बगीचे के हैं। इस गर्मी में पेड़ हमें मीठे फल भी देते हैं और ठंडी हवा भी।" पुच्चू ने अमरूद का टुकड़ा मुंह में डालते हुए पूछा, "पापा, क्या पेड़ सिर्फ फल देते हैं?" पापा ने समझाया, "नहीं पुच्चू, ये जो पीपल, बरगद और शीशम के पेड़ हैं, ये हमें ऑक्सीजन देते हैं जिससे हम सांस लेते हैं। और वह देखो, दूर जो महुआ के पेड़ हैं, उनके फूलों से दवाइयां और स्वादिष्ट पकवान बनते हैं।"
दोपहर ढलने लगी तो दादाजी ने कहा, "चलो बच्चों, आज तुम्हें गाँव की असली पाठशाला ले चलते हैं—प्रकृति की पाठशाला!"पापा ने गाड़ी तैयार की और सब घूमने निकले। थोड़ी दूर जाने पर उन्हें ऊंचे-ऊंचे पर्वत दिखाई दिए। पर्वत इतने ऊंचे थे मानो आसमान को छू रहे हों। पर्वतों के बीच से एक कलकल करती नदी बह रही थी।
डुग्गू ने पूछा, "दादाजी, यह नदी कहाँ से आती है?" दादाजी ने बताया, "डुग्गू, ये नदियाँ इन ऊंचे पर्वतों पर जमी बर्फ के पिघलने से बनती हैं। नदी का पानी मीठा होता है, जो खेतों की प्यास बुझाता है और हमें पीने का पानी देता है।" नदी के किनारे हरी-भरी घास चर रही गाय, मजबूत बैल और पानी में आनंद लेती भैंस दिखाई दीं। वहीं पास में एक सफेद घोड़ा शान से दौड़ रहा था। दादाजी ने बच्चों को बताया, "यह गाय हमें पौष्टिक दूध देती है। बैल खेतों में किसान की मदद करते हैं और भैंस भी दूध देती है। ये सब हमारे वफादार साथी हैं।"
तभी दालान का रखवाला, उनका पालतू कुत्ता 'शेरू' भी दौड़ता हुआ वहाँ आ गया और अपनी पूंछ हिलाने लगा। पीहू ने उसे प्यार से सहलाया।
शाम होने को आई थी। सूरज की किरणें अब हल्की और सुनहरी हो गई थीं। पापा उन्हें नदी के पास ही बने एक बड़े से सरोवर (तालाब) के पास ले गए।।सरोवर का जल बिल्कुल साफ और शांत था। पानी में रंग-बिरंगी मछली तैर रही थीं। पीहू पानी में मछलियों को देखकर ताली बजाने लगी। तभी पुच्चू चिल्लाया, "देखो-देखो, पानी पर नाव जैसी कोई चीज तैर रही है!"
मम्मी ने हंसते हुए कहा, "पुच्चू, वह नाव नहीं, हंस है।" शान से तैरते हुए सफेद हंसों का जोड़ा बेहद खूबसूरत लग रहा था। दादाजी ने इस मौके पर बच्चों को एक बहुत बड़ी सीख दी। उन्होंने कहा, "बच्चों, हंस की एक बहुत बड़ी खासियत होती है। इसे 'नीर-क्षीर विवेक' कहते हैं। अगर हंस के सामने दूध और पानी मिलाकर रख दिया जाए, तो वह सिर्फ दूध पी लेता है और पानी छोड़ देता है।" "इसका क्या मतलब हुआ दादाजी?" डुग्गू ने उत्सुकता से पूछा। "इसका मतलब है मेरे बच्चे," दादाजी ने प्यार से डुग्गू का सिर थपथपाते हुए कहा, "कि इस दुनिया में अच्छी बातें भी हैं और बुरी बातें भी। हमें इस हंस की तरह बनना चाहिए—हमेशा अच्छी बातों (दूध) को अपनाना चाहिए और बुरी बातों (पानी) को छोड़ देना चाहिए।"
घर वापसी और ज्ञान का उपहार
रात होने लगी थी। आसमान में तारे टिमटिमाने लगे थे। सब लोग वापस दादाजी के दालान में आ गए। ठंडी हवा चल रही थी और आसमान में चाँद मुस्कुरा रहा था। मम्मी ने सबको खाने के बाद मीठा-मीठा पपीता काटकर दिया। पीहू, डुग्गू और पुच्चू आज बहुत खुश थे। उन्होंने आज किताबों वाली पाठशाला से अलग, प्रकृति की सजीव पाठशाला में बहुत कुछ सीखा था। डुग्गू बोला, "दादाजी, आज मुझे समझ आया कि यह पूरी प्रकृति—ये पर्वत, नदी, सरोवर, पशु-पक्षी और पेड़-पौधे—सब आपस में जुड़े हैं। अगर ये नहीं होंगे, तो हम भी नहीं बचेंगे।"
पुच्चू ने कहा, "और मैं अब से कभी किसी जानवर को तंग नहीं करूँगा और हर साल एक पेड़ जरूर लगाऊँगा।"
छोटी पीहू ने हंसते हुए कहा, "और मैं कल सुबह उठकर सबसे पहले कौवे भैया को रोटी दूँगी और तोते-मैना के लिए दालान में पानी रखूँगी।" दादाजी, मम्मी और पापा बच्चों की यह समझदारी देखकर बेहद खुश हुए। दादाजी ने तीनों को गले से लगा लिया। इस तरह गर्मी की वह छुट्टी सिर्फ खेल-कूद की नहीं, बल्कि ज्ञान और संस्कार की एक अनोखी छुट्टी बन गई।
सीख -  प्रकृति की हर रचना—चाहे वह छोटा सा कौवा हो, विशाल बरगद का पेड़ हो, या बहती हुई नदी—सबका हमारे जीवन में बहुत महत्व है। हमें पर्यावरण की रक्षा करनी चाहिए और हमेशा हंस की तरह केवल अच्छाइयों को ग्रहण करना चाहिए।

धूप, गर्मी और 'लू' के सबक
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
हरीपुर गाँव का वही बड़ा और हवादार दालान आज भी ठंडा था, लेकिन बाहर का नजारा बदला हुआ था। दोपहर के बारह बज रहे थे और सूरज देवता आसमान से जैसे आग बरसा रहे थे। चारों तरफ सन्नाटा था। न तो कोई पक्षी चहक रहा था और न ही कोई बाहर दिख रहा था।
८ वर्ष का डुग्गू, ६ वर्ष का पुच्चू और ५ वर्ष की पीहू दालान में बैठे-बैठे बोर हो रहे थे। डुग्गू ने बाहर झांकते हुए कहा, "यार, चलो न बाहर आम के पेड़ के पास छुपन-छुपाई खेलते हैं!"
पुच्चू भी तैयार हो गया, "हाँ, यहाँ बैठे-बैठे तो पैर दुखने लगे हैं।"।दोनों जैसे ही दालान से बाहर निकलने लगे, तभी रसोई से हाथ में आम का पन्ना (शरबत) लिए मम्मी बाहर आईं। बच्चों को बाहर जाते देख वे चौंककर बोलीं, "रुको बच्चों! इतनी कड़कती धूप में बाहर बिल्कुल नहीं जाना है। बाहर बहुत तेज और गर्म हवा चल रही है, जिसे 'लू' कहते हैं। इस मौसम में दोपहर को बाहर निकलने से तबीयत खराब हो सकती है।"
पीहू ने अपनी मासूम आवाज में पूछा, "मम्मी, यह 'लू' क्या होती है? क्या यह कोई भूत है?"
तभी पास ही आराम कुर्सी पर बैठे दादाजी जोर से मुस्कुराए और बोले, "नहीं पीहू बिटिया! लू कोई भूत नहीं है। जब जून के महीने में सूरज की किरणें बहुत सीधी और तेज पड़ती हैं, तो हवा बहुत गर्म और सूखी हो जाती है। इसी गर्म और थपेड़ेदार हवा को 'लू' कहते हैं। अगर हम इस धूप और लू के संपर्क में आ जाएं, तो हमारे शरीर का पानी सूख जाता है, चक्कर आने लगते हैं और तेज बुखार भी हो सकता है, जिसे 'सनस्ट्रोक' या 'लू लगना' कहते हैं।"
पापा ने सभी बच्चों को पास बुलाया और मम्मी के हाथ से आम के पन्ने के गिलास लेकर बच्चों को दिए। पापा बोले, "इस मौसम में धूप और लू से बचने के लिए यह कच्चे आम का पन्ना, छाछ और नींबू पानी सबसे अच्छे हथियार हैं। यह हमारे शरीर को अंदर से ठंडा रखते हैं।"डुग्गू ने आम का पन्ना पीते हुए कहा, "वाह दादाजी! यह तो बहुत स्वादिष्ट है। पर दादाजी, हम इंसान तो घर के अंदर छिपकर लू से बच जाते हैं, लेकिन हमारी प्रकृति की पाठशाला के बाकी साथी—जैसे वे पक्षी, गाय, और हमारे शेरू भैया, वे इस भयंकर गर्मी और लू से कैसे बचते होंगे?"
दादाजी बच्चों की इस संवेदनशीलता से बेहद खुश हुए। उन्होंने दालान की खिड़की से बाहर इशारा करते हुए कहा, "देखो बच्चों, प्रकृति ने सबको अपनी रक्षा करना सिखाया है। दोपहर के समय सारे पशु-पक्षी घने पेड़ों की छांव में दुबक जाते हैं। वे इंसानों की तरह बेवजह धूप में नहीं घूमते। लेकिन, इस कड़कती धूप में उनके लिए सबसे बड़ी समस्या पानी की होती है।"
तभी पुच्चू को अपनी पिछली सीख याद आई। वह उछलकर बोला, "दादाजी! पिछली बार हमने सीखा था कि हमें हमेशा हंस की तरह अच्छी बातें अपनानी चाहिए। तो क्या हम इस गर्मी में अपने इन मूक दोस्तों के लिए कुछ अच्छा नहीं कर सकते?"
"बिल्कुल कर सकते हैं!" पापा ने गर्व से कहा।
पापा और बच्चों ने मिलकर तुरंत एक योजना बनाई। पापा घर के अंदर से मिट्टी के कुछ बड़े-बड़े कटोरे (सकोरे) ले आए। डुग्गू और पुच्चू ने उन कटोरों में साफ और ठंडा पानी भरा। पीहू ने उसमें थोड़े से चावल के दाने डाल दिए। फिर दादाजी की देखरेख में, उन्होंने उन कटोरों को दालान के बाहर, पेड़ों की घनी छांव में और दीवार के कोनों पर सुरक्षित रख दिया, जहाँ धूप न पहुँचती हो। पानी रखने के कुछ ही देर बाद, एक प्यासा कौवा उड़ता हुआ आया। उसने पहले चारों तरफ देखा, फिर मजे से सकोरे से पानी पीने लगा। पानी पीकर उसने अपनी चोंच को पानी में डुबोया और पंख फड़फड़ाकर अपनी गर्मी शांत की। उसे देखकर तोते और मैना का जोड़ा भी वहाँ आ गया।
यह देखकर पीहू ताली बजाकर नाचने लगी, "देखो-देखो! कौवे भैया की गर्मी भाग गई!"
शाम को जब सूरज की तपिश कम हुई और ठंडी हवा चलने लगी, तब दादाजी ने बच्चों को गले लगाते हुए कहा, "बच्चों, आज तुम सबने प्रकृति की पाठशाला का एक और बड़ा अध्याय सीख लिया। तेज धूप और गर्मी हमें सहनशीलता सिखाती है, और इस मौसम में दूसरों की प्यास बुझाना सबसे बड़ा पुण्य का काम है।"
डुग्गू, पुच्चू और पीहू ने मिलकर कसम खाई कि वे पूरी गर्मी में हर रोज सुबह-शाम इन सकोरों में पानी बदलेंगे। इस तरह, उन्होंने न सिर्फ खुद को लू से बचाया, बल्कि प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्य को भी बखूबी निभाया।
सीख: भीषण गर्मी और लू के दिनों में हमें खुद को सुरक्षित रखने के साथ-साथ बेजुबान पशु-पक्षियों के दाने-पानी का भी ध्यान रखना चाहिए। प्रकृति की रक्षा में ही हमारी सुरक्षा है।

बाल साहित्य: सतरंगी बचपन
"किसी समाज की सबसे बड़ी पूँजी उसके बच्चे होते हैं, और उन बच्चों के मानसिक व नैतिक विकास की सबसे मजबूत आधारशिला बाल साहित्य है।" बाल साहित्य केवल मनोरंजन या अक्षरों का जमावड़ा नहीं है, बल्कि यह वह मार्गदर्शक है जो किसी बच्चे को पहली बार दुनिया की जटिलताओं, मानवीय मूल्यों, विज्ञान के चमत्कारों और अपनी संस्कृति से बेहद सरल और रोचक तरीके से परिचित कराता है। यह वह साहित्य है जो बच्चों के मानसिक स्तर, उनकी असीम रुचि, अकल्पनीय कल्पनाशीलता और बाल मनोविज्ञान को केंद्र में रखकर रचा जाता है। इसका मूल उद्देश्य बालकों का स्वस्थ मनोरंजन करने के साथ-साथ उनमें नैतिक मूल्य, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और जीवन-कौशल विकसित करना होता है।
बाल साहित्य की परंपरा उतनी ही प्राचीन है जितनी कि इंसानी सभ्यता। समय के साथ इसके स्वरूप में बड़े बदलाव आए हैं, जिन्हें हम दो मुख्य चरणों में देख सकते हैं। प्रारंभ में बाल साहित्य का प्रसार लिखित रूप में न होकर मौखिक रूप में हुआ। यह दादी-नानी की कहानियों, रात्रिकालीन लोरियों और स्थानीय लोकगीतों के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता रहा। भारत की समृद्ध परंपरा में 'पंचतंत्र', 'हितोपदेश' और 'जातक कथाएं' इसी मौखिक और लोक परंपरा की अनमोल देन हैं। इन कहानियों में पशु-पक्षियों और प्रकृति को माध्यम बनाकर बच्चों को नीति और चतुराई की बातें सिखाई जाती थीं, जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। 
वैश्विक संदर्भ: आधुनिक रूप में बाल साहित्य का उदय 18वीं शताब्दी में यूरोप में हुआ। लंदन के प्रसिद्ध प्रकाशक जॉन न्यूबेरी को बाल साहित्य का जनक माना जाता है, जिन्होंने पहली बार व्यावसायिक और रचनात्मक रूप से बच्चों के लिए विशेष पुस्तकें छापना शुरू किया। हिन्दी बाल साहित्य की शुरुआत: हिन्दी में बाल साहित्य की औपचारिक शुरुआत भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा संपादित और 1882 में प्रकाशित 'बाल दर्पण' पत्रिका से मानी जाती है। इसके बाद महावीर प्रसाद द्विवेदी के युग में 'बालसखा' जैसी युगांतरकारी पत्रिका का प्रकाशन हुआ। आगे चलकर 'वानर', 'मनमोहन', 'चंदामामा', 'नंदन', 'चंपक' और 'पराग' जैसी पत्रिकाओं ने हिन्दी बाल साहित्य को हर घर के ड्राइंग रूम और बच्चों के दिलों तक पहुँचाया।
साहित्य के संदर्भ में 'अवधान' का अर्थ योगदान या विशेष ध्यान केंद्रित करना है। बाल साहित्य लिखना किसी वयस्क के लिए गंभीर साहित्य रचने से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण कार्य है। बाल साहित्यकारों के अवधान और इसकी मूल अवधारणा के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:  बाल साहित्य की सबसे बड़ी शर्त यह है कि लेखक को अपनी उम्र, अनुभव और 'बड़प्पन के अहंकार' को छोड़कर पूरी तरह से बच्चे के दृष्टिकोण और उसकी मासूम कल्पना के स्तर पर उतरना पड़ता है। "बच्चे की आँख से दुनिया को देखना" ही बाल साहित्य का मूल मंत्र है। सहज, सरल और संगीतात्मक भाषा विधा के लेखकों का सबसे बड़ा योगदान इसकी भाषा को बोधगम्य बनाना रहा है। यहाँ वाक्य छोटे होते हैं, शब्द-विन्यास आसान होता है और भाषा में एक आंतरिक लय या संगीतात्मकता होती है, जिससे बच्चा पढ़ते समय जुड़ाव महसूस करे। : बाल साहित्य मनोरंजन और शिक्षा का एक अनूठा मिश्रण है। बच्चे स्वभाव से विद्रोही और जिज्ञासु होते हैं; उन्हें सीधे उपदेश (जैसे- "सदा सत्य बोलो") पसंद नहीं आते। इसलिए, लेखक कहानियों, कविताओं और रूपकों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से उनके अवचेतन मन में अच्छी बातें रोपित करते हैं।
आज का बाल साहित्य बहुआयामी हो चुका है। बच्चों की विभिन्न रुचियों को ध्यान में रखते हुए इसे कई विधाओं में विभाजित किया जा सकता है: बाल कविता एवं लोरियाँ में तुकबंदी, लयबद्धता और सहज संगीत। भाषाई क्षमता का विकास और याददाश्त को मजबूत करना। बाल कहानी व लघुकथा रोचक पात्र (पशु, जासूस, राजा-रानी या आम बच्चे)। कल्पनाशीलता, तार्किकता और निर्णय लेने की क्षमता का विकास।।विज्ञान कथाएँ अंतरिक्ष, रोबोटिक्स, भविष्य की तकनीक पर आधारित। अंधविश्वास से मुक्ति और वैज्ञानिक दृष्टिकोण या कौतूहल जगाना। बाल नाटक व एकांकी संवादात्मक शैली और मंचन योग्य। बच्चों में आत्मविश्वास, टीम वर्क और अभिव्यक्ति की कला का विकास। आधुनिक विधाएँ (जैसे हाइकु) कम शब्दों (जैसे जापानी विधा हाइकु) में बड़ी बात कहना। संक्षिप्तता और गहरी सोच को बढ़ावा देना है। 
आज का युग डिजिटल युग है, जहाँ बचपन स्मार्टफोन की स्क्रीन, वीडियो गेम्स और सोशल मीडिया रील्स के चक्रव्यूह में फँस गया है। ऐसे समय में बाल साहित्य की महत्ता और आवश्यकता कई गुना बढ़ गई है । 
 अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों में चिड़चिड़ापन और एकाग्रता की कमी पैदा कर रहा है। किताबें पढ़ने से बच्चों के मस्तिष्क में न्यूरॉन्स का बेहतर विकास होता है, जिससे उनकी एकाग्रता और रचनात्मकता बढ़ती है। संस्कार और सामाजिक सरोकार में एकल परिवारों के बढ़ते चलन के कारण आज बच्चों को दादा-दादी या नाना-नानी का सान्निध्य नहीं मिल पा रहा है, जो कभी लोककथाओं के माध्यम से संस्कार देते थे। बाल साहित्य इस खालीपन को भरता है और बच्चों को सहानुभूति, सहिष्णुता, साहस और पर्यावरण संरक्षण जैसे मूल्य सिखाता है। जिज्ञासा और तर्कशक्ति को धार में  बाल साहित्यकार बच्चों के भीतर छिपे "क्यों, कहाँ, कैसे" जैसे प्रश्नों को दबाते नहीं, बल्कि उन्हें सही दिशा देकर उनकी जिज्ञासा और तर्कशक्ति को बढ़ाते हैं।
वर्तमान में बाल साहित्य के क्षेत्र में कई सराहनीय और प्रगतिशील कदम उठाए जा रहे हैं। मातेश्वरी  विद्या देवी बाल साहित्य शोध संस्थान सिरसा , हरियाणा की अखिल भारतीय बाल साहित्य सम्मेलन के संरक्षक संस्थापक राजकुमार निजात और जयपुर राजस्थान  से हिंदी मासिक बच्चों का देश ' के संपादक संजय जैन , हरियाणा के  त्रिलोक चंद फतेहपुरी की पुस्तक बाल सौरभ , तेलगाना के प्रसाद राव जामी की संपादित बाल साहित्य , दरभंगा , बिहार के सतीश चंद्र भगत , मुजफ्फरपुर , बिहार के डॉ ऊषा श्रीवास्तव की बज्जिका भाषा m बज्जिका बाल कविता संरक्ष  जैसे प्रबुद्ध चिंतकों व संस्थाओं द्वारा इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किए जा रहे हैं। आज के नए और स्थापित बाल साहित्यकारों को न केवल पारंपरिक विधाओं, बल्कि बाल कहानी, नाटक, कविताओं, हाइकु, एकांकी और लघुकथाओं पर लिखने के लिए निरंतर प्रोत्साहित किया जा रहा है, जो कि बाल साहित्य के विकास का एक अत्यंत स्वागत योग्य कदम है। : आज की पीढ़ी 'डिजिटल नेटिव' है। हमें बाल साहित्य को केवल कागज़ की किताबों तक सीमित न रखकर ई-बुक्स , ऑडियो बुक्सऔर सचित्र एनिमेटेड कॉमिक्स के रूप में भी प्रस्तुत करना होगा। : आज के बच्चे को केवल राजा-रानी या परियों की कहानियों से संतुष्ट नहीं किया जा सकता। उन्हें साइबर सुरक्षा, कोडिंग, जलवायु परिवर्तन और मानसिक स्वास्थ्य जैसे समकालीन विषयों पर उनकी भाषा में साहित्य चाहिए।
बाल साहित्य केवल बचपन का मनोरंजन करने का साधन नहीं है, बल्कि यह एक प्रबुद्ध, संवेदनशील और प्रगतिशील राष्ट्र के निर्माण का सबसे सशक्त माध्यम है। एक अच्छा बाल साहित्यकार बच्चों का सबसे अच्छा दोस्त और उनका अनौपचारिक शिक्षक होता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि स्कूलों की प्राथमिक कक्षाओं से लेकर पारिवारिक स्तर तक बाल पत्रिकाओं और पुस्तकों को अनिवार्य रूप से पहुँचाया जाए। जब बच्चों के हाथों में गैजेट्स की जगह रंग-बिरंगी, ज्ञानवर्धक और कल्पनाशीलता से भरी किताबें होंगी, तभी हमारा बचपन सुरक्षित, समृद्ध और सतरंगी बना रहेगा।  

बुधवार, जून 10, 2026

आचार्यकुल सम्मेलन मुजफ्फरपुर

 वैचारिक चेतना का महाकुंभ: मुजफ्फरपुर में 'बिहार राज्य आचार्यकुल सम्मेलन 
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
बिहार की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और बौद्धिक चेतना की अत्यंत समृद्ध भूमि मुजफ्फरपुर में 'बिहार राज्य आचार्यकुल' के दो दिवसीय प्रदेश सम्मेलन का एक अभूतपूर्व, भव्य और युगांतरकारी आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। दिनांक 30 और 31 मई 2026 को मुजफ्फरपुर के हृदय स्थल सरैयागंज स्थित प्रतिष्ठित श्री नवयुवक समिति ट्रस्ट के सभागार में आयोजित इस अधिवेशन ने न केवल बिहार, बल्कि संपूर्ण देश के शीर्ष विचारकों, मूर्धन्य साहित्यकारों, निष्पक्ष पत्रकारों और समर्पित समाजसेवियों को एक साझा ऐतिहासिक मंच पर लाकर खड़ा कर दिया। यह सम्मेलन ऐसे समय में आयोजित हुआ जब संपूर्ण विश्व और भारतीय समाज तीव्र तकनीकी प्रगति के बीच गंभीर नैतिक और सांस्कृतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। इस महासम्मेलन का मुख्य उद्देश्य आचार्यकुल के मूल सिद्धांतों—सत्य, अहिंसा, करुणा, सर्वोदय और भूदान आंदोलन की प्रासंगिकता को आधुनिक युग में पुनर्स्थापित करना और भावी पीढ़ी के लिए एक नैतिक मार्गदर्शिका तैयार करना था। दो दिनों तक चले इस गहन वैचारिक समागम में वर्तमान सामाजिक चुनौतियों, मानवीय मूल्यों के निरंतर हो रहे ह्रास, पर्यावरण संकट और उनके व्यावहारिक समाधान में आचार्यों (शिक्षकों, बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, और पत्रकारों) की भूमिका पर अत्यंत गंभीर, सारगर्भित और दिशा-परक विमर्श हुआ।
सम्मेलन का विधिवत और गरिमामय उद्घाटन आचार्यकुल के राष्ट्रीय अध्यक्ष, देश के प्रख्यात चिंतक, मनीषी एवं पूर्व कुलपति आचार्य डॉ. धर्मेंद्र द्वारा पारंपरिक वैदिक रीति और दीप प्रज्वलन के साथ किया गया। जैसे ही दीपशिखा प्रज्वलित हुई, पूरा सभागार वैचारिक चेतना और करतल ध्वनि से गुंजायमान हो उठा । अपने मुख्य उद्घाटन भाषण में डॉ. धर्मेंद्र ने आचार्यकुल की स्थापना के मूल उद्देश्यों और आज के समय में इसकी अपरिहार्यता पर अत्यंत गंभीर प्रकाश डाला। उन्होंने जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा: "आज के इस संक्रमण काल में जब संपूर्ण मानव समाज नैतिक और चारित्रिक संकट के दौर से जूझ रहा है, तब आचार्यकुल की जिम्मेदारी और जवाबदेही पहले से कहीं अधिक बढ़ जाती है। 'आचार्य' शब्द केवल अक्षर ज्ञान देने वाले या जीविकोपार्जन के लिए अध्यापन करने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं है। आचार्य वह है जिसका आचरण अनुकरणीय हो, जो समाज का चरित्र निर्माता हो और जो सत्ता व स्वार्थ से परे हटकर समाज को सत्य का मार्ग दिखाए।" उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि वर्तमान समय की विसंगतियों को केवल कानून या तकनीक के बल पर दूर नहीं किया जा सकता। इसके लिए हमें परम पूज्य संत विनोबा भावे और लोकनायक जयप्रकाश नारायण के क्रांतिकारी विचारों को पुनः आत्मसात करना होगा। उनके सिद्धांतों पर चलकर ही हम एक समतामूलक, शोषणमुक्त, भयमुक्त और प्रेम पर आधारित समाज की परिकल्पना को धरातल पर साकार कर सकते हैं। उद्घाटन सत्र के दौरान मुख्य मंच से राष्ट्र निर्माण में बौद्धिक वर्ग की सहभागिता को बढ़ाने का पुरजोर आह्वान किया गया, जिसने वहाँ उपस्थित प्रत्येक प्रतिनिधि को झकझोर कर रख दिया।
इस उद्घाटन सत्र को और अधिक गरिमामय, ऊर्जावान और भावपूर्ण बनाने में स्वर्णिम कला केंद्र के कलाकारों ने एक अनुकरणीय और अविस्मरणीय भूमिका निभाई। कलाकारों द्वारा प्रस्तुत राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' के सामूहिक और सुमधुर गायन ने संपूर्ण सभागार में देशभक्ति और राष्ट्रीय चेतना का एक अद्भुत ज्वार ला दिया। उपस्थित जनसमूह राष्ट्र के सम्मान में उठ खड़ा हुआ। इसके तुरंत बाद, कलाकारों ने आचार्य विनोबा भावे के वैश्विक बंधुत्व और सार्वभौमिक कल्याण के संदेश को प्रतिध्वनित करते हुए 'जय जगत' गीत की अत्यंत मनमोहक, सुरीली और प्रेरणाप्रद प्रस्तुति दी। इस सांस्कृतिक प्रस्तुति ने वहाँ उपस्थित प्रतिनिधियों के अंतर्मन को छू लिया और यह संदेश स्पष्ट रूप से प्रसारित किया कि आचार्यकुल की वैचारिक यात्रा केवल राष्ट्र की सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रवाद से शुरू होकर संपूर्ण विश्व के कल्याण यानी 'वसुधैव कुटुंबकम्' की महान सनातन अवधारणा तक जाती है।
सांगठनिक मजबूती, स्वागत और वार्षिक प्रतिवेदन का लेखा-जोखा में सम्मेलन के प्रथम सत्र की अध्यक्षता और स्वागत की कड़ियों ने संगठन के अनुशासन, आंतरिक मजबूती और उसकी दूरगामी दृष्टि को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया। बिहार राज्य आचार्यकुल की उपाध्यक्ष डॉ. संगीता सागर ने अपने स्वागत भाषण में देश के विभिन्न हिस्सों और मुख्य रूप से तीन राज्यों (बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड) से आए सभी शीर्ष पदाधिकारियों, बुद्धिजीवियों, प्राध्यापकों और प्रतिनिधियों का मुजफ्फरपुर की इस पावन, ऐतिहासिक और क्रांतिकारी धरती पर अत्यंत आत्मीय अभिनंदन किया। उन्होंने अपने वक्तव्य में सम्मेलन की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत की और मुजफ्फरपुर में इसके आयोजन के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि यह भूमि सदैव से ही बड़े वैचारिक आंदोलनों की गवाह रही है और यहाँ से उठी आवाज पूरे देश को प्रभावित करेगी।
बिहार राज्य आचार्यकुल की अध्यक्षा डॉ. ऊषा श्रीवास्तव ने पिछले सांगठनिक कार्यकाल का विस्तृत, प्रामाणिक और सिलसिलेवार वार्षिक प्रतिवेदन सदन के सामने प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने प्रतिवेदन में बिहार के विभिन्न जिलों में संगठन द्वारा जमीनी स्तर पर किए गए रचनात्मक कार्यों, बाल कुपोषण के खिलाफ अभियान, समाज सुधार के विविध कार्यक्रमों, नशामुक्ति के प्रयासों और ग्रामीण अंचलों में शैक्षणिक व नैतिक चेतना के प्रसार के लिए किए गए भगीरथ प्रयासों का पूरा ब्यौरा दिया। उन्होंने भविष्य की महत्वाकांक्षी कार्ययोजनाओं को साझा करते हुए संगठन के विस्तार की आवश्यकता पर विशेष बल दिया। डॉ. श्रीवास्तव ने आह्वान किया कि संगठन को अब पंचायत और ग्राम स्तर तक ले जाने का समय आ गया है, ताकि समाज के अंतिम पायदान पर बैठे व्यक्ति तक सर्वोदय का संदेश पहुँचाया जा सके।
इस दो दिवसीय सम्मेलन की सबसे बड़ी विशेषता इसका व्यापक और अंतर्राज्यीय स्वरूप था। इसमें मुख्य रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड के आचार्यकुल तथा भूदान यज्ञ आंदोलन से जुड़े प्रख्यात प्रतिनिधियों, शीर्ष नीति-निर्धारकों, कुलपतियों और वरिष्ठ विचारकों ने हिस्सा लिया। मंच पर उपस्थित प्रमुख विभूतियों ने विभिन्न सत्रों में अपनी बात रखी और समाज को सुधारने के लिए अपने व्यावहारिक सुझाव दिए।
मंच पर उपस्थित विचारकों के वैचारिक योगदान को हम निम्नलिखित तालिका के माध्यम से समझ सकते हैं:
डॉ. जंगबहादुर पांडे राज्याध्यक्ष, झारखंड आचार्यकुल (पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विश्वविद्यालय, रांची) उन्होंने झारखंड में आचार्यकुल के सांगठनिक विस्तार और सबसे महत्वपूर्ण रूप से भूदान आंदोलन के तहत मिली जमीनों के संरक्षण, उन पर भू-माफियाओं के अवैध कब्जों को हटाने और उस भूमि को जन-कल्याणकारी कार्यों में लगाने पर विस्तृत नीतिगत विचार रखे। सत्येन्द्र कुमार पाठक राष्ट्रीय प्रवक्ता, आचार्यकुल उन्होंने राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में संगठन की नीतियों, दर्शन और भावी दिशा का प्रकटीकरण किया। साथ ही उन्होंने मगध क्षेत्र और संपूर्ण बिहार की सांस्कृतिक व ऐतिहासिक विरासत का उल्लेख करते हुए आचार्यों को अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त करने का आह्वान किया। मुक्तिनाथ त्रिपाठी वरिष्ठ प्रतिनिधि (गोरखपुर, उत्तर प्रदेश) उन्होंने उत्तर प्रदेश में सर्वोदय आंदोलन की वर्तमान स्थिति और आचार्यकुल की गतिविधियों के बीच एक मजबूत समन्वय स्थापित करने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि उत्तर भारत के राज्यों को मिलकर काम करना होगा।
कुलपति यति कुलपति, थावे विद्यापीठ उन्होंने भारत की 'नई शिक्षा नीति' (NEP) के आलोक में नैतिक मूल्यों, व्यावहारिक शिक्षा और आचार्यों के वास्तविक दायित्वों पर एक अत्यंत सारगर्भित, दार्शनिक और व्यावहारिक व्याख्यान दिया। डॉ. अनमोल कुमार प्रभारी, पत्रकार प्रकोष्ठ (गया) उन्होंने समकालीन पत्रकारिता की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए समाज में 'सकारात्मक और विकासोन्मुखी पत्रकारिता' की तात्कालिक आवश्यकता और मीडिया के नैतिक उत्तरदायित्वों पर अपनी बात रखी। राकेश दत्त मिश्र संपादक, 'दिव्य रश्मि' (पटना) उन्होंने वैचारिक और साहित्यिक पत्रिकाओं की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज के डिजिटल युग में भी वैचारिक पत्रिकाओं के माध्यम से ही समाज में दीर्घकालिक बौद्धिक चेतना जगाई जा सकती है।
जी एन भट्ट संपादक, 'निर्माण भारती' (हिंदी पाक्षिक) उन्होंने दृढ़ संकल्प व्यक्त किया कि पत्र-पत्रिकाओं और प्रिंट मीडिया के माध्यम से आचार्यकुल के मूल सिद्धांतों (सत्य, अहिंसा, सर्वोदय) को जन-जन तक और हर घर तक पहुँचाना हमारा मुख्य लक्ष्य होना चाहिए। इन सभी मूर्धन्य वक्ताओं ने अलग-अलग सत्रों में अपने विचार रखते हुए इस बात पर गहरी सामूहिक चिंता व्यक्त की कि वर्तमान समय में भूदान आंदोलन की जमीनों की उपेक्षा हो रही है। उन्होंने सर्वसम्मति से कहा कि इन जमीनों का सदुपयोग पूर्णतः लोक-कल्याण, चिकित्सा और शिक्षा के कार्यों में होना चाहिए और इसके लिए देश के आचार्यों को एक होकर एक सक्रिय और निर्णायक भूमिका निभानी होगी।
दो दिनों तक चले इस गहन वैचारिक महाकुंभ में विभिन्न विषयों पर कई समानांतर और मुख्य सत्र आयोजित किए गए। देश भर से आए प्रतिनिधियों के बीच व्यापक विचार-विमर्श, तर्क-वितर्क और गहन मंथन के बाद निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं पर पूर्ण सहमति बनी और दूरगामी प्रभाव वाले चार प्रमुख प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किए गए: सम्मेलन में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था अत्यधिक व्यावसायिक और केवल रोजगारोन्मुखी हो चुकी है, जिससे मानवीय संवेदनाएं समाप्त हो रही हैं। अतः शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन कर उसमें चरित्र-निर्माण, नैतिक मूल्यों, देशप्रेम और स्वावलंबन (महात्मा गांधी की बुनियादी शिक्षा) पर आधारित पाठ्यक्रम को अनिवार्य रूप से जोड़ा जाए। शिक्षा का उद्देश्य केवल उपाधि बांटना नहीं, बल्कि एक संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना होना चाहिए
संत विनोबा भावे द्वारा शुरू किए गए ऐतिहासिक भूदान आंदोलन के तहत मिली लाखों एकड़ जमीनों के वर्तमान रख-रखाव पर चिंता जताई गई। प्रस्ताव पारित किया गया कि सरकार के साथ मिलकर एक उच्च स्तरीय टास्क फोर्स या ठोस नीति बनाने की मांग की जाए, ताकि इन जमीनों का वास्तविक वितरण गरीबों में हो सके और शेष बची जमीनों पर ग्रामीण क्षेत्रों में शैक्षणिक संस्थानों, पुस्तकालयों, कृषि अनुसंधान केंद्रों और सामाजिक कल्याण संस्थानों का विकास किया जा सके।
सर्वोदय के सिद्धांतों के अंतर्गत प्रकृति के संरक्षण को सर्वोपरि माना गया। सम्मेलन में निर्णय लिया गया कि आचार्यकुल के सदस्य ग्रामीण और शहरी दोनों स्तरों पर जाकर स्थानीय नदियों, पारंपरिक जलस्रोतों, तालाबों की रक्षा और वृक्षारोपण के लिए एक व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाएंगे। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में आचार्यों का यह कर्तव्य है कि वे समाज को प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर जीना सिखाएं।
आज के दौर में पीत पत्रकारिता सनसनीखेज खबरों और सोशल मीडिया पर फैलती भ्रामक जानकारियों पर गहरा विमर्श हुआ। प्रस्ताव लिया गया कि समाजोन्मुखी, सत्यनिष्ठ, निर्भीक और मूल्य-आधारित पत्रकारिता को बढ़ावा देने के लिए पत्रकारों का एक राष्ट्रव्यापी मजबूत नेटवर्क तैयार किया जाएगा। मीडिया को पुनः समाज के दर्पण और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में अपनी खोई हुई साख वापस लानी होगी।
सम्मेलन का सबसे भावुक, प्रेरणाप्रद और गौरवशाली क्षण वह था, जब समाज के विभिन्न क्षेत्रों में बिना किसी प्रचार के, मूकनायक की तरह निस्वार्थ भाव से काम करने वाले कर्मयोगियों को सम्मानित किया गया। आचार्यकुल के राष्ट्रीय एवं प्रांतीय नेतृत्व द्वारा देश के कोने-कोने से चुनकर आए 100 उत्कृष्ट आचार्यकुल प्रतिनिधियों, मूर्धन्य साहित्यकारों, निष्पक्ष पत्रकारों और समर्पित समाजसेवियों को मंच पर आमंत्रित कर सम्मानित किया गया।
यह सम्मान समारोह पूरी तरह से भारतीय सनातन परंपरा और मर्यादा के अनुकूल था। सभी सम्मानित विभूतियों को मंच से: सम्मान पत्र (प्रशस्ति पत्र): प्रदान किया गया, जिसमें उनके द्वारा समाज के लिए किए गए उत्कृष्ट और अनुकरणीय कार्यों की सराहना की गई थी। स्मृति चिह्न: भेंट कर इस ऐतिहासिक और युगांतरकारी सम्मेलन की मधुर यादों को उनके हृदयों में संजोया गया। अंगवस्त्र: ओढ़ाकर और तिलक लगाकर भारतीय संस्कृति के अनुसार उनका आदरपूर्वक सत्कार किया गया। इस गरिमामय सम्मान समारोह ने न केवल समाज के वरिष्ठ विचारकों और कर्मयोगियों का हौसला बढ़ाया, बल्कि सभागार में उपस्थित युवा पीढ़ी और छात्रों को भी अपने जीवन में समाज सेवा, नैतिकता और राष्ट्र निर्माण के पथ पर अडिग रहने के लिए गहराई से प्रेरित किया।
अधिवेशन के उत्तरार्ध में आयोजित कवि सम्मेलन, विशिष्ट व्याख्यान और विमर्श सत्रों ने पूरे माहौल को और भी अधिक साहित्यिक, रसमय और जीवंत बना दिया। इस सत्र में देश की जानी-मानी विदुषियों और कवयित्रियों ने हिस्सा लिया, जिनमें नीता सहाय, डॉ. सुधा सिंह, 'जीवन धारा नमामि गंगे' की राष्ट्रीय चीफ सेक्रेटरी दिव्या स्मृति, आशा रघुदेव और प्रो. डॉ. पुष्पा गुप्ता प्रमुख थीं। इन सभी ने अपने ओजस्वी व्याख्यानों और राष्ट्रभक्ति तथा सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करती अपनी मर्मस्पर्शी कविताओं से उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया।
सम्मेलन को वैचारिक रूप से समृद्ध करने में देश भर से आए विभिन्न क्षेत्रों के गणमान्य व्यक्तियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और विभिन्न सत्रों में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाई। इनमें प्रमुख रूप से निम्नलिखित विभूतियाँ शामिल थीं: धार्मिक, सामाजिक एवं प्रशासनिक नेतृत्व: गया से आए पीठाधीश्वर डॉ. श्याम नाथ सिंह (पटना) और मुजफ्फरपुर नगर निगम की लोकप्रिय उप महापौर मोनालिशॉ।, वरिष्ठ पत्रकार, अधिवक्ता एवं प्रबुद्ध बुद्धिजीवी वर्ग: अवधेश कुमार शर्मा (बेतिया), डॉ. भोला प्रसाद (वरिष्ठ अधिवक्ता, पटना), डॉ. रमेश चौबे (पटना), डॉ. राजेश कुमार झा (पटना), पवन कुमार (बेतिया), डॉ. (प्रो०) अरबिंद नाथ तिवारी (बगहा), अंकेश कुमार (पटना), श्री त्रिवेदी जी (पटना), मंजर लाल सत्यम् (बेतिया), राजेश पाण्डेय, सतीश मिश्रा (मुजफ्फरपुर), राहुल कुमार छोटन (मुजफ्फरपुर, झंझट टाइम्स), आदर्श निर्मल (संपादक, सत्याकलन), संतोष तिवारी (मुजफ्फरपुर, शंखनाद)। उत्तर प्रदेश और झारखंड से आए वरिष्ठ प्रतिनिधि व शिक्षाविद्: उत्तर प्रदेश के देवरिया से विशेष रूप से पधारे सौदागर सिंह, रमेश सिंह दीपक, कौशल किशोर मणि, छेदी प्रसाद गुप्त; गोरखपुर से डॉ. नरेंद्र राय, डॉ. ओमप्रकाश मिश्र, नंदलाल मणि त्रिपाठी पीतांबर; वंदना सूर्यवंशी और कुशीनगर से डॉ. ओमप्रकाश द्विवेदी (पूर्व प्राचार्य, पड़ौना)। झारखंड के शीर्ष प्रतिनिधि: देवघर से पधारे कुमार रंजन (राष्ट्रीय प्रभारी, युवा नेतृत्व प्रशिक्षण कार्यक्रम, आचार्यकुल), रांची से डॉ. वासुदेव प्रसाद (पूर्व प्राचार्य), डॉ. ओमप्रकाश (प्राध्यापक, शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय, रांची), सुबोध दुबे (रांची कॉलेज), वाई.बी.एन. यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष डॉ. रामजी भाई और उत्तर प्रदेश आचार्यकुल के सम्मानित ट्रस्टी अभय जिज्ञासु। इन सभी वक्ताओं ने आचार्यकुल के सिद्धांतों, विनोबा जी के विचारों और आज के समय में आचार्यों के सामाजिक उत्तरदायित्वों पर अपने अत्यंत शोधपरक और मूल्यवान व्याख्यान दिए ।
मुजफ्फरपुर के ऐतिहासिक नवयुवक समिति ट्रस्ट के सभागार में संपन्न हुआ यह द्विदिवसीय बिहार राज्य आचार्यकुल सम्मेलन केवल एक औपचारिक वार्षिक आयोजन या बौद्धिक विलासिता का मंच नहीं था, बल्कि यह वास्तव में टूटते हुए सामाजिक मूल्यों को बचाने और समाज को एक नई प्रगतिशील दिशा देने वाला वैचारिक महाकुंभ साबित हुआ। दो दिनों तक चले इस मंथन से जो वैचारिक अमृत निकला, वह आने वाले समय में समाज का मार्गदर्शन करेगा। सम्मेलन के समापन सत्र में आचार्यकुल के राष्ट्रीय प्रवक्ता सत्येन्द्र कुमार पाठक और संपूर्ण प्रांतीय नेतृत्व ने देश के कोने-कोने से आए सभी आगंतुकों, प्रतिनिधियों, कलाकारों और मीडिया कर्मियों के प्रति सहृदय आभार और धन्यवाद व्यक्त किया। इस ऐतिहासिक सम्मेलन से संपूर्ण देश के लिए एक बहुत ही स्पष्ट, सशक्त और कड़ा संदेश निकला: "जब तक देश का बुद्धिजीवी, साहित्यकार, पत्रकार और शिक्षक (आचार्य) जागृत रहेगा, अपनी नैतिक जिम्मेदारी को समझता रहेगा और सत्ता के सम्मुख सत्य बोलने का साहस रखेगा, तब तक इस महान राष्ट्र की प्रगति, अखंडता और नैतिक उत्थान को दुनिया की कोई भी ताकत रोक नहीं सकती।" संपूर्ण सभागार में उपस्थित सैकड़ों लोगों द्वारा किए गए 'जय जगत' के सामूहिक, गगनभेदी और ओजस्वी महाउद्घोष के साथ इस ऐतिहासिक सम्मेलन का समापन हुआ। सभी प्रतिनिधि अपने-अपने राज्यों, जिलों और कार्यक्षेत्रों में आचार्यकुल की इस नैतिक और वैचारिक मशाल को और अधिक तेज करने, सर्वोदय के संदेश को जन-जन तक पहुँचाने और एक बेहतर समाज के निर्माण के पवित्र संकल्प के साथ अपने घरों को विदा हुए। यह सम्मेलन आने वाले कई दशकों तक अपनी वैचारिक ऊर्जा के लिए याद किया जाएगा ।