शुक्रवार, अगस्त 07, 2026

ओंकारेश्वर और नर्मदा

मांधाता पर्वत  व नर्मदा की  सांस्कृतिक विरासत का संस्मरण
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
सृष्टि के आरंभ से ही भारतीय महाद्वीप की नदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं रही हैं, बल्कि वे संस्कृति, अध्यात्म, दर्शन और स्थापत्य की प्रवाहमयी धारा रही हैं। मध्य भारत के विशाल भूभाग को सिंचित करने वाली पुण्यतोया नर्मदा (रेवा) की महिमा समस्त पौराणिक साहित्य में अद्वितीय मानी गई है। जहाँ देश की अधिकांश नदियाँ पूर्व की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी में लीन हो जाती हैं, वहीं नर्मदा जी भ्रंश घाटी (Rift Valley) के कठिन मार्गों को भेदती हुई पश्चिम दिशा की ओर अग्रसर होती हैं और अंततः गुजरात के भरूच के समीप खंभात की खाड़ी (अरब सागर) में विलीन होती हैं। नर्मदा के 1,312 किलोमीटर के इस पावन प्रवाह क्षेत्र में अनगिनत तीर्थ, संगम और ऐतिहासिक नगर बसे हैं। किंतु मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में स्थित 'मांधाता पर्वत' (ओंकारेश्वर) का स्थान सर्वाधिक विलक्षण और अलौकिक है। यहाँ नर्मदा नदी और उसकी सहायक धारा 'कावेरी' (मध्य प्रदेश की कावेरी) के अद्वितीय संगम से प्राकृतिक रूप से 'ॐ' (ओंकार) के आकार वाले द्वीप का निर्माण होता है। यह मांधाता द्वीप केवल एक भौगोलिक संरचना नहीं है, बल्कि यह मन्वंतरों की तपोभूमि, पंचदेव परंपरा (सौर, शाक्त, ब्रह्म, शैव, और वैष्णव) का केंद्र तथा विभिन्न महान भारतीय राजवंशों द्वारा निर्मित मंदिर स्थापत्य का जीवन-ग्रंथ है। संस्मरण-आलेख में मांधाता पर्वत के प्राकट्य, इसके पौराणिक मन्वंतर कालीन इतिहास, विभिन्‍न राजवंशों द्वारा निर्मित मंदिरों, नर्मदा के पावन संगमों, और नर्मदेश्वर शिवलिंग के वैशिष्ट्य का विस्तृत, प्रामाणिक और सांगोपांग विवेचन प्रस्तुत किया गया है।
पौराणिक मान्यताओं—विशेष रूप से नर्मदा पुराण, मत्स्य पुराण और स्कंद पुराण (रेवा खंड)—के अनुसार नर्मदा जी का प्राकट्य सत्ययुग में हुआ था। कथा है कि एक बार देवाधिदेव भगवान शिव विंध्याचल और मैकल पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य घोर तपस्या में लीन थे। उनकी काया से उत्पन्न पसीने (स्वेद-बिंदुओं) से एक अत्यंत सुंदर, तेजस्विनी और आनंददायिनी कन्या का प्राकट्य हुआ। भगवान शिव ने कन्या को आनंद प्रदान करने वाली देखकर उनका नाम 'नर्मदा' (नर्म = आनंद, दा = देने वाली) रखा। देवताओं और ऋषियों की प्रार्थना पर पृथ्वीलोक पप्राणियों के पापों के क्षालन तथा उन्हें मोक्ष प्रदान करने हेतु नर्मदा जी को अमरकंठी या 'रेवा' के रूप में प्रवाहित किया गया।
नर्मदा जी की पौराणिक महिमा:"गंगा स्नाने तु पूतानि, काश्यां मरणान्मुक्तिः। स्मरणादेव नर्मदायाः, सर्वपापैः प्रमुच्यते॥"(अर्थात् गंगा में स्नान से, काशी में मरण से मोक्ष मिलता है; किंतु नर्मदा जी के केवल स्मरण मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।)।मांधाता पर्वत का पौराणिक संबंध वैवस्वत मन्वंतर के महान सूर्यवंशी (इक्ष्वाकु वंश) चक्रवर्ती राजा मांधाता से है। राजा मांधाता ने इस पर्वत पर बैठकर सहस्रों वर्षों तक भगवान शिव की उग्र तपस्या की थी। उनके कठोर तपोबल और महायज्ञों से प्रसन्न होकर भगवान आशुतोष ने उन्हें दर्शन दिए और राजा मांधाता के अनुरोध पर लोक-कल्याण हेतु यहाँ ज्योतिर्लिंग रूप में सदा-सर्वदा के लिए विराजमान होना स्वीकार किया। तभी से इस पावन पर्वत को 'मांधाता पर्वत' कहा जाने लगा।
अमरकंटक में नर्मदा कुंड से कुछ ही सौ मीटर की दूरी पर 'सोनमुड़ा' नामक स्थान है, जहाँ से सोन नद (सोन भद्र) का उद्गम होता है। लोककथाओं और पौराणिक प्रसंगों के अनुसार, प्राचीन काल में नर्मदा और सोन भद्र के बीच निश्छल प्रेम था। किंतु किसी कारणवश सोन भद्र के मार्ग बदलने (या दासी जुहिला के मोह में पड़ने) के कारण नर्मदा जी अत्यंत रुष्ट हो गईं। उन्होंने अपना मार्ग बदलकर विपरीत दिशा (पूर्व के बजाय पश्चिम) की ओर एकाकी बहना शुरू कर दिया। यही कारण है कि नर्मदा भारत की एकमात्र ऐसी प्रमुख नदी है जो पूर्व से पश्चिम की ओर कठोर चट्टानों को काटती हुई बहती है ।
सनातन संस्कृति में एक अत्यंत प्रसिद्ध और सिद्ध मान्यता है—"नर्मदा का हर कंकर, शिव शंकर है।" यह केवल एक लोक-विश्वास नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक और वैज्ञानिक आधार समाहित है। पुराणों के अनुसार, जब नर्मदा जी ने स्वयं कठोर तपस्या की, तो भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि "हे नर्मदे! तुम्हारे जल के वेग में बहने वाला प्रत्येक पत्थर स्वतः ही बिना किसी पृथक प्राण-प्रतिष्ठा के शिवलिंग (नर्मदेश्वर) माना जाएगा।"  नर्मदा नदी विंध्याचल और सतपुड़ा की कठोर चट्टानों के मध्य से तीव्र वेग के साथ बहती है। जल की निरंतर रगड़ और घर्षण से नदी की तलहटी में स्थित पत्थर प्राकृतिक रूप से चिकने, गोलाकार और अंडाकार (शिवलिंग के आकार में) ढल जाते हैं।।दैवीय चिह्नो युक्त  नर्मदेश्वर पत्थरों पर प्राकृतिक रूप से जनेऊ, त्रिशूल, अर्धचंद्र, सूर्य या तिलक जैसी विविध रंगीन आकृतियाँ स्वतः उभर आती हैं। स्मृति ग्रंथों एवं शास्त्रों के अनुसार, नर्मदेश्वर शिवलिंग को घर या देवालय में स्थापित करने के लिए किसी तांत्रिक या वैदिक प्राण-प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि ये प्राकृतिक रूप से 'स्वयंभू' और अनंत शिव-ऊर्जा से ओत-प्रोत माने जाते हैं।
. मांधाता पर्वत पर मन्वंतर से आज तक निर्मित प्रमुख मंदिर एवं निर्माणकर्ता साम्राज्य - मांधाता पर्वत (ओंकारेश्वर) भारतीय स्थापत्य कला, मूर्तिकला और धार्मिक इतिहास का एक ऐसा महाकोश है, जहाँ मन्वंतर कालीन पौराणिक काल से लेकर 18वीं-19वीं शताब्दी के होल्कर साम्राज्य तक लगातार मंदिरों का निर्माण, जीर्णोद्धार और विस्तार होता रहा। यहाँ मुख्य रूप से नागर शैली, भूमिश शैली और मराठा/होल्कर स्थापत्य शैली का अद्भुत संगम दिखाई देता है।
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर (मुख्य मंदिर)।संबद्ध साम्राज्य/शासक: पौराणिक काल में सूर्यवंशी राजा मांधाता; ऐतिहासिक काल में परमार राजवंश (10वीं-13वीं शताब्दी) और तत्पश्चात महारानी अहिल्याबाई होल्कर (18वीं शताब्दी)। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग भारत के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह मंदिर मांधाता पर्वत के निचले हिस्से में नर्मदा तट पर स्थित है। मंदिर पाँच मंजिला है, जिसकी प्रत्येक मंजिल पर अलग-अलग देव विग्रह स्थापित हैं:।प्रथम तल: श्री ओंकारेश्वर (मूल ज्योतिर्लिंग) , द्वितीय तल: श्री महाकालेश्वर तृतीय तल: श्री सिद्धनाथ चतुर्थ तल: श्री गुप्तेश्वर। पंचम तल: श्री ध्वजधारी महादेव। परमार कालीन विशाल नक्काशीदार स्तंभ (Pillars) और गर्भगृह का भूमिश शैली का शिखर इसकी कलात्मक भव्यता को दर्शाता है। 18वीं शताब्दी में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने इसका पुनरुद्धार करवाया और यहाँ प्रतिदिन 1,100 पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजन करने की परंपरा शुरू की।।अमलेश्वर (ममलेश्वर) मंदिर परमार राजवंश (11वीं शताब्दी) तथा चौहान / भील नायक राजा। नर्मदा के दक्षिणी तट (शिवपुरी/अमलेश्वर क्षेत्र) पर स्थित यह मंदिर अत्यंत प्राचीन है। पौराणिक मान्यतानुसार ओंकारेश्वर और अमलेश्वर (ममलेश्वर) दोनों मिलकर एक ही ज्योतिर्लिंग का पूर्ण स्वरूप बनाते हैं ("एकं लिंगं द्विधा भिन्नम्")। यह शुद्ध परमार कालीन नागर/भूमिश स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसके गर्भगृह, सभा मंडप और बाहरी दीवारों पर देव-कन्याओं, नर्तकियों और पौराणिक दृश्यों का सुंदर अंकन है।
सिद्धनाथ (सिद्धेश्वर) मंदिर: परमार राजवंश (10वीं से 12वीं शताब्दी)। यह मंदिर मांधाता पर्वत के ऊपरी पठार पर स्थित है। यद्यपि मध्यकाल में हुए आक्रमणों के कारण यह आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गया था, किंतु इसके अवशेष आज भी इसकी भव्यता की गवाही देते हैं।
 इस मंदिर का आधार (Plinth) हाथियों की उकेरी गई मूर्तियों (गजाधर) से सुसज्जित है। इसके ऊंचे और विशाल स्तंभों पर की गई सूक्ष्म नक्काशी परमार कालीन मूर्तिकला की पराकाष्ठा है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है। ऋणामुक्तेश्वर और ऋणमोचन मंदिर: होल्कर राजवंश एवं स्थानीय मराठा सूबेदार।। नर्मदा और कावेरी के संगम क्षेत्र के निकट स्थित इस मंदिर में दर्शन करने से जीव को पित्र ऋण, देव ऋण और ऋषि ऋण से मुक्ति मिलती है। यहाँ विशेष रूप से कार्तिक और वैशाख मास में श्रद्धालु विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। गौरी सोमनाथ मंदिर (विशाल ममलेश्वर) परमार राजवंश तथा स्थानीय गोंड व चौहान राजा।: मांधाता पहाड़ी पर स्थित यह तीन मंजिला मंदिर एक अत्यंत विशाल शिवलिंग के लिए प्रसिद्ध है। यह शिवलिंग काले चिकने कसौटी पत्थर (Basalt) से निर्मित है, जिसकी ऊँचाई लगभग 6 फीट है। जनश्रुति है कि प्राचीन काल में इस शिवलिंग में देखने पर व्यक्ति को अपने पुनर्जन्म का आभास होता था।
चौबीस अवतार मंदिर और सप्तमातृका मंदिर परमार राजवंश (11वीं-12वीं शताब्दी)। मांधाता पर्वत पर स्थित यह मंदिर समूह सनातन धर्म की वैष्णव और शाक्त (देवी) परंपरा के सुंदर समन्वय को दर्शाता है। यहाँ भगवान विष्णु के 24 अवतारों की अति सुंदर पाषाण प्रतिमाएं उकेरी गई हैं। साथ ही ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इंद्राणी और चामुंडा—इन 'सप्तमातृकाओं' का प्राचीन मंदिर स्थित है।।ओंकार मठ और शंकराचार्य गुफा आदि शंकराचार्य (8वीं शताब्दी) एवं राष्ट्रकूट / गुर्जर-प्रतिहार काल है।
मांधाता पर्वत की तलहटी में वह ऐतिहासिक गुफा स्थित है जहाँ जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने अपने गुरु गोविंद भगवत्पाद से दीक्षा प्राप्त की थी और 'अद्वैत वेदांत' के सिद्धांत को सुदृढ़ किया था। हाल ही में यहाँ 108 फीट ऊँची आदि शंकराचार्य की प्रतिमा ('स्टैच्यू ऑफ वननेस' / एकात्मता की प्रतिमा) का निर्माण कर इस स्थल को अंतरराष्ट्रीय वेदांत केंद्र के रूप में विकसित किया गया है।  नर्मदा तट के प्रमुख ऐतिहासिक साम्राज्य, नगर और संगम - नर्मदा नदी केवल आध्यात्मिक चेतना की वाहक नहीं रही, बल्कि इसके तटों पर भारत के कई प्रतापी राजवंशों का वैभव पनपा। अमरकंटक से लेकर भरूच तक नर्मदा के किनारे कई ऐतिहासिक नगर और संगम स्थित है।माहिष्मती (महेश्वर) हैहय वंश (राजा सहस्रार्जुन), महारानी अहिल्याबाई होल्कर प्राचीन काल एवं 18वीं शताब्दी सहस्रार्जुन की प्राचीन राजधानी; महारानी अहिल्याबाई ने इसे होल्कर साम्राज्य की राजधानी बनाया, नर्मदा तट पर विशाल किला, महेश्वर घाट और रेशमी महेश्वरी साड़ियों की नींव रखी।।ओंकारेश्वर (मांधाता) सूर्यवंश (राजा मांधाता), परमार राजवंश, चौहान मन्वंतर काल, 10वीं–13वीं शताब्दी 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक; मांधाता द्वीप 'ॐ' आकृति में स्थित है।
त्रिपुरी (जबलपुर / तेवर) कलचुरी राजवंश (त्रिपुरी के कलचुरी) 9वीं से 12वीं शताब्दी कलचुरी राजाओं की राजधानी; नर्मदा के तट पर भेड़ाघाट (संगमरमर की चट्टानें), धुआँधार जलप्रपात और प्रसिद्ध 'चौसठ योगिनी मंदिर' का निर्माण। मंडला गोंड राजवंश (राजा हृदय शाह, रानी दुर्गावती) 16वीं–17वीं शताब्दी नर्मदा और बंजर नदी के संगम पर बसा नगर; गोंड राजाओं ने यहाँ मोती महल और अभेद्य दुर्ग बनवाए।
भृगुक्षेत्र (भरूच) मौर्य, गुप्त, सोलंकी/चौहान, मुग़ल प्राचीन काल से मध्यकाल तक प्राचीन 'भड़ौच' या 'भृगुकच्छ'—भारत का एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय समुद्री बंदरगाह, जहाँ से पश्चिम एशिया व रोम के साथ व्यापार होता था। केवड़िया (एकता नगर) आधुनिक भारत 21वीं शताब्दी नर्मदा पर स्थित सरदार सरोवर बाँध और विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' (सदार वल्लभभाई पटेल) का स्थल। है ।
5. नर्मदा की सहायक नदियाँ, प्रमुख संगम और तटवर्ती नगर - नर्मदा नदी के संपूर्ण 1,312 किलोमीटर के प्रवाह क्षेत्र में कुल 41 सहायक नदियाँ आकर मिलती हैं। इनमें से 22 नदियाँ बाएँ तट (सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला) से और 19 नदियाँ दाएँ तट (विंध्याचल पर्वत श्रृंखला) से आकर संगम बनाती हैं।।भ्रंश घाटी में बहने के कारण नर्मदा का प्रवाह अनूठा है। दक्षिण (सतपुड़ा) से आने वाली नदियाँ पहाड़ी वेग और प्रपात बनाती हुई आती हैं, जबकि उत्तर (विंध्याचल) से आने वाली नदियाँ शांत और मंद गति से आकर नर्मदा में विलीन होती हैं। भौगोलिक महत्व तवा नदी  (नर्मदा की सबसे बड़ी सहायक नदी बांद्राभान , जिला नर्मदापुरम (म.प्र.) नर्मदापुरम (होशंगाबाद) यह नर्मदा का सबसे विशाल संगम है। यहाँ प्रतिवर्ष प्रसिद्ध 'बांद्राभान मेला' आयोजित होता है। कावेरी नदी (मध्य प्रदेश वाली) ओंकारेश्वर, जिला खंडवा ओंकारेश्वर (मांधाता) कावेरी और नर्मदा का यह संगम मांधाता द्वीप ('ॐ' आकार) का निर्माण करता है। यहाँ कोटितीर्थ और ऋणमोचन संगम स्थित है। हिरन नदी सांकल / जबलपुर सीमा जबलपुर / पाटन दाएँ तट (उत्तर) से मिलने वाली प्रमुख नदी। जबलपुर का प्रसिद्ध भेड़ाघाट क्षेत्र इस संगम के निकट है। बरना नदी वामन घाट, जिला रायसेन बाड़ी / रायसेन पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यहाँ भगवान विष्णु के 'वामन अवतार' से जुड़ा स्थल स्थित है। तंदोनी नदी पांडवद्वीप, जिला रायसेन रायसेन / सिलवानी क्षेत्र पांडवों के अज्ञातवास से जुड़ा पौराणिक संगम स्थल।।बंजर नदी मंडला, मध्य प्रदेश मंडला शहर बंजर और नर्मदा नदियाँ मंडला नगर को तीन ओर से घेरकर एक प्राकृतिक कुंडल बनाती हैं, जिसके मध्य गोंड किला स्थित है। शेर एवं शक्कर नदी नरसिंहपुर जिला, म.प्र. नरसिंहपुर / गाडरवारा सतपुड़ा की पहाड़ियों से निकलकर नरसिंहपुर के उपजाऊ मैदानी भाग में नर्मदा जी से संगम बनाती हैं। दूधी नदी होशंगाबाद-नरसिंहपुर सीमा पिपरिया / सोहागपुर के पास बाएँ तट से आकर नर्मदा में मिलने वाली प्रमुख सतपुड़ा कालीन नदी। ओरसांग नदी चांदोद, जिला वडोदरा (गुजरात) चांदोद / डभोई गुजरात में नर्मदा और ओरसांग का संगम अत्यंत पवित्र माना जाता है। इसे 'गुजरात का प्रयाग' या प्रमुख 'पितृ-तर्पण स्थल' कहा जाता है। 
भारत की अधिकांश नदियाँ (जैसे गंगा, यमुना, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी) मैदानी भागों से बहते हुए पूर्व दिशा की ओर जाती हैं और बंगाल की खाड़ी में गिरने से पूर्व विशाल डेल्टा (Delta) का निर्माण करती हैं। किंतु नर्मदा नदी का भौगोलिक व्यवहार इससे पूर्णतः भिन्न है:। नर्मदा मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात से होकर पश्चिम दिशा में बहती है।।नर्मदा नदी कठोर चट्टानी भ्रंश घाटियों  के बीच से होकर बहती है। तीव्र ढलान और वेग के कारण यह अपने साथ भारी मात्रा में गाद  जमा नहीं होने देती।  समुद्र में विलीन होते समय नर्मदा जी डेल्टा बनाने के बजाय एश्चुअरी बनाती हैं। जहाँ नदी का ताजा मीठा जल और समुद्र का खारा जल आपस में सीधे टकराते हैं, उसे ज्वारनदमुख कहते हैं।अंतिम महा-संगम: गुजरात के ऐतिहासिक भरूच (Bharuch) जिले के समीप नर्मदा जी 'खंभात की खाड़ी' में जाकर अरब सागर में लीन हो जाती हैं। भरूच का विमलेश्वर और कबीरवड क्षेत्र इस अंतिम महा-संगम का साक्षी बनता है।
मांधाता पर्वत का सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक: पंचदेव परंपरा का केंद्र है।  मांधाता पर्वत केवल स्थापत्य या नदियों के संगम का स्थल नहीं है, बल्कि यह सनातन धर्म की पंचदेव परंपरा और विविध आध्यात्मिक धाराओं का अद्वितीय संगम स्थल रहा है: शैव संप्रदाय: 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के कारण यह अनादि काल से शैव परंपरा का सर्वोच्‍च केंद्र है। वैष्णव संप्रदाय: मांधाता पर स्थित विष्णु के चौबीस अवतारों का मंदिर और लक्ष्मी-नारायण मंदिर वैष्णव भक्तों की आस्था का केंद्र है।।शाक्त संप्रदाय: यहाँ स्थित सप्तमातृका मंदिर, महिषासुरमर्दिनी मंदिर और आनंद भैरवी मंदिर देवी शक्ति के उपासकों की सिद्ध पीठ हैं। सौर संप्रदाय: सूर्यवंशी सम्राट मांधाता की तपोभूमि होने के कारण यह सूर्य उपासना का भी ऐतिहासिक केंद्र रहा है। अद्वैत वेदांत की तपोभूमि: जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने इसी मांधाता पर्वत पर अपने गुरु गोविंद भगवत्पाद के चरणों में बैठकर ज्ञान प्राप्त किया था और यहीं से संपूर्ण भारत में अद्वैत वेदांत का संदेश प्रसारित किया था।
 जीवनदायिनी रेवा और मांधाता की अमर चेतना स्थल अमरकंटक की मैकल पहाड़ियों से प्रादुर्भूत होकर खंभात की खाड़ी तक बहने वाली नर्मदा जी केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक चेतना की रीढ़ हैं। मन्वंतरों से लेकर आज तक मांधाता पर्वत पर परमार, कलचुरी, गोंड और होल्कर जैसे महान राजवंशों द्वारा निर्मित मंदिर स्थापत्य भारतीय शिल्प शास्त्र के स्वर्ण युग को दर्शाते हैं। तवा, कावेरी, बरना, बंजर और ओरसांग जैसी 41 सहायक नदियों को अपने आँचल में समेटती हुई नर्मदा जी जहाँ प्राकृतिक समृद्धि लाती हैं, वहीं इसके तट पर स्थित नर्मदेश्वर पत्थर जन-जन को शिवत्व का बोध कराते हैं। मांधाता पर्वत पर गूंजती "हर हर नर्मदे, हर हर महादेव" की ध्वनि आज भी हर श्रद्धालु के हृदय में वही आनंद उत्पन्न करती है जो सत्ययुग में नर्मदा के प्रथम अवतरण पर उत्पन्न हुआ था। रेवा तट की यह यात्रा वास्तव में समय, इतिहास और अध्यात्म के असीम सागर में डुबकी लगाने के समान है।

बुधवार, अगस्त 05, 2026

क्रांति की पवित्र भूमि बिहार

क्रांति की पावन भूमि बिहार 
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
भारत का स्वतंत्रता संग्राम त्याग, अदम्य साहस, अनगिनत शहादतों और पराक्रम की एक ऐसी अमर गाथा है, जिसमें बिहार की पावन धरा ने सदैव एक केंद्रीय और मार्गदर्शक भूमिका निभाई है। पूर्व में गंगा, सोन, गंडक और कोसी की धाराओं से सिंचित बिहार केवल ज्ञान, संस्कृति और धर्म की भूमि ही नहीं रहा, बल्कि यह विदेशी हुकूमत के विरुद्ध क्रांति का सबसे मजबूत गढ़ भी रहा। 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के प्रथम बिगुल से लेकर 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' की अंतिम तथा निर्णायक ज्वाला तक, बिहार के हर जिले, हर गांव और हर शहर के वीरों एवं वीरांगनाओं ने अपनी मातृभूमि को ब्रिटिश दासता से मुक्त कराने के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। ब्रिटिश साम्राज्य शासन की दमनकारी नीतियों, आर्थिक शोषण, जल-जंगल-जमीन पर कब्जे और अमानवीय अत्याचारों के विरुद्ध बिहार में जन-आंदोलन का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह स्वतंत्रता की प्राप्ति तक कभी मंद नहीं पड़ा। बाबू वीर कुंवर सिंह का 80 वर्ष की आयु में दिखाया गया अभूतपूर्व शौर्य, डॉ. राजेंद्र प्रसाद की बौद्धिक निष्ठा, जयप्रकाश नारायण की क्रांतिकारी रणनीति और हजारों गुमनाम शहीदों का रक्त आज भी भारतीय इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है।
. 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम: मगध, भोजपुर और उत्तर बिहार की हुंकार - 1857 का विद्रोह भारतीय उपमहाद्वीप में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के खिलाफ पहला संगठित जन-उभार था। बिहार में इस क्रांति ने एक अत्यंत उग्र और व्यापक रूप धारण किया था। बाबू वीर कुंवर सिंह (जगदीशपुर): जगदीशपुर के 80 वर्षीय परमार राजपूत जमींदार बाबू वीर कुंवर सिंह 1857 की क्रांति के सबसे वयोवृद्ध किंतु सबसे वीर सेनानायक थे। उन्होंने आरा, छपरा, गाजीपुर, आजमगढ़ और बलिया तक अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिए। गुरिल्ला (छापामार) युद्ध कला में माहिर कुंवर सिंह ने ब्रिटिश सेनापति मिलमैन, मार्क और डन्बार की सेना को कई बार परास्त किया। गंगा नदी पार करते समय जब ब्रिटिश सेना की गोली उनकी बांह में लगी, तो उन्होंने बिना झिझक अपनी तलवार से अपनी बांह काटकर गंगा मैया को समर्पित कर दी। 23 अप्रैल 1858 को अंग्रेजों को खदेड़कर अपने जगदीशपुर किले पर वापस तिरंगा (स्वतंत्र झंडा) फहराने के बाद, अत्यधिक रक्तस्राव के कारण 26 अप्रैल 1858 को वे अमर हो गए। बाबू अमर सिंह: कुंवर सिंह के अनुज बाबू अमर सिंह ने अपने भ्राता की मृत्यु के पश्चात क्रांति की मशाल को बुझने नहीं दिया। उन्होंने कैमूर की पहाड़ियों में अपनी एक समानांतर सरकार स्थापित की और रोहतास तथा कैमूर क्षेत्र में लंबे समय तक अंग्रेजों के खिलाफ छापामार युद्ध जारी रखा। बाद में गिरफ्तार किए जाने पर अंग्रेजों द्वारा दी गई भीषण मानसिक व शारीरिक यातनाओं के कारण गोरखपुर जेल में उनका निधन हो गया। अमर शहीद निशान सिंह: रोहतास के निशान सिंह, जो वीर कुंवर सिंह के मुख्य सेनापति थे, को अंग्रेजों ने बंदी बनाकर सासाराम में सरेआम तोप के मुंह से बांधकर उड़ा दिया था, ताकि जनता में खौफ पैदा किया जा सके।
3 जुलाई 1857 को पटना में क्रांति का बिगुल बजा। पटना के गुरहट्टा मोहल्ले के एक साधारण पुस्तक विक्रेता पीर अली खान ने गुप्त रूप से स्वतंत्रता सेनानियों का संगठन तैयार किया और अंग्रेजों पर धावा बोल दिया। इसमें ब्रिटिश अफीम एजेंट डॉ. लायल मारा गया। अंग्रेज कमिश्नर टेलर ने दमन चक्र चलाते हुए पीर अली और उनके 14 साथियों को गिरफ्तार कर लिया। भारी यातनाएं दिए जाने के बावजूद पीर अली ने अपने साथियों के नाम उजागर नहीं किए। अंततः उन्हें पटना में सरेआम फांसी दे दी गई।
मगध क्षेत्र का जन-विद्रोह: बाबू जीवधर सिंह (अरवल) व गया के क्रांतिवीर - बाबू जीवधर सिंह (खमैनी, अरवल): अरवल जिले के खमैनी गांव के निवासी बाबू जीवधर सिंह मगध क्षेत्र में क्रांति के सबसे बड़े नेता थे। वे बाबू वीर कुंवर सिंह के घनिष्ठ सहयोगी थे। जीवधर सिंह ने जहानाबाद, औरंगाबाद, अरवल और गया क्षेत्र में अंग्रेजों की सत्ता उखाड़ फेंकी। उन्होंने गया सेंट्रल जेल पर आक्रमण कर सैकड़ों बंदियों को रिहा कराया और पलामू के जंगलों तक 900 क्रांतिकारियों की सेना के साथ अंग्रेजों पर सतत हमले किए। अप्रैल 1859 में अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर फांसी की सजा दे दी। राजा हेत नारायण सिंह व जोधर सिंह: औरंगाबाद और गया के टिकारी तथा पाली क्षेत्र के जमींदारों एवं किसानों ने ब्रिटिश खजाने को लूटा और अंग्रेजी मालगुजारी व्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।
तिरहुत और मुजफ्फरपुर में सैन्य विद्रोह जुलाई 1857 में मुजफ्फरपुर में स्थित 12वीं कैवेलरी के भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत कर दी। कई अंग्रेज अधिकारियों को मार गिराया गया। हालांकि, बाद में ब्रिटिश सेना की अतिरिक्त टुकड़ियों ने इस विद्रोह को कुचल दिया और दर्जनों विद्रोही सैनिकों को फांसी पर लटका दिया। बंग-भंग, क्रांतिकारी राष्ट्रवाद और आरंभिक शहादतें (1900–1915) - 20वीं सदी के प्रारंभ में बिहार क्रांतिकारी राष्ट्रवाद का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरा। देश के युवा अपने प्राणों की आहुति देकर भारत माता को आजाद कराने के संकल्प के साथ आगे आए ।मुजफ्फरपुर बम कांड और खुदीराम बोस तथा प्रफुल्ल चाकी का आत्मबलिदान बंगाल के अत्याचारी और क्रूर ब्रिटिश मजिस्ट्रेट डगलस किंग्सफोर्ड को मार गिराने की जिम्मेदारी दो तरुण क्रांतिकारियों—खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चंद्र चाकी को सौंपी गई। घटना (30 अप्रैल 1908): मुजफ्फरपुर के क्लब से बाहर निकल रही किंग्सफोर्ड की गाड़ी समझकर दोनों युवाओं ने उस पर बम फेंक दिया। हालांकि, उस गाड़ी में किंग्सफोर्ड नहीं था, बल्कि दो ब्रिटिश महिलाएं (कैनेडी परिवार की माता-पुत्री) थीं, जिनकी इस हमले में मृत्यु हो गई। प्रफुल्ल चाकी की शहादत (1 मई 1908): घटना के बाद प्रफुल्ल चाकी भागकर मोकामा रेलवे स्टेशन पहुंचे। वहां पुलिस सब-इंस्पेक्टर नंदलाल बनर्जी ने उन्हें पहचान लिया। अंग्रेजों द्वारा पकड़े जाने और यातनाएं सहने के स्थान पर प्रफुल्ल चाकी ने अपनी ही रिवॉल्वर से खुद को गोली मारकर अपनी मातृभूमि के लिए प्राण त्याग दिए। खुदीराम बोस की फांसी (11 अगस्त 1908): खुदीराम बोस को वैनी रेलवे स्टेशन (अब खुदीराम बोस पूसा) से गिरफ्तार कर लिया गया। मुजफ्फरपुर जेल में उन पर मुकदमा चलाया गया और अंग्रेजी जज सी. डी. बीचक्रॉफ्ट ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई। 11 अगस्त 1908 को मात्र 18 वर्ष 8 महीने की आयु में हाथ में भगवद्गीता लेकर खुदीराम बोस हँसते-हँसते फांसी के फंदे पर झूल गए। वे भारतीय स्वाधीनता संग्राम के सबसे कम उम्र के अमर शहीदों में से एक बने।
चंपारण सत्याग्रह (1917) और असहयोग आंदोलन (1920–1922) - बिहार केवल सशस्त्र क्रांति का ही केंद्र नहीं था, बल्कि इसने महात्मा गांधी के 'अहिंसा और सत्याग्रह' के सिद्धांत को धरातल पर उतारकर राष्ट्रीय राजनीति की दिशा को बदल दिया। चंपारण सत्याग्रह (1917): गांधी जी का प्रथम सफल प्रयोग - राजकुमार शुक्ल का योगदान: चंपारण के स्वाभिमानी किसान नेता राजकुमार शुक्ल ने ब्रिटिश नील बागान मालिकों द्वारा थोपी गई दमनकारी 'तीनकठिया प्रणाली' (जिसके तहत किसानों को अपनी जमीन के 3/20 भाग पर जबरन नील की खेती करनी पड़ती थी) के खिलाफ आवाज उठाई। वे लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन (1916) में महात्मा गांधी से मिले और उन्हें चंपारण आने के लिए राजी किया। गांधी जी का आगमन और बिहार के दिग्गज नेता: अप्रैल 1917 में जब गांधी जी बिहार आए, तब डॉ. राजेंद्र प्रसाद, अनुग्रह नारायण सिंह, ब्रजकिशोर प्रसाद, रामनवमी प्रसाद और आचार्य जे.बी. कृपलानी जैसे युवाओं ने उनका साथ दिया। सत्याग्रह के बल पर ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा, चंपारण एग्रेरियन कमेटी बनी और तीनकठिया प्रथा को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया गया। इसी आंदोलन की सफलता के बाद रवींद्रनाथ टैगोर ने मोहनदास करमचंद गांधी को 'महात्मा' की उपाधि दी थी। असहयोग आंदोलन (1920–1922) और किसान चेतना - मजरूल हक और 'दी सर्चलाइट': असहयोग आंदोलन के दौरान पटना में मजरूल हक ने 'सदाकत आश्रम' की स्थापना की और 'द मदरलैंड' नामक अखबार निकालकर राष्ट्रीय चेतना फैलाई। किसान आंदोलन (स्वामी सहजानंद सरस्वती व यदुनंदन शर्मा):नियामतपुर , बेलागंज  गया और बिहटा (पटना) में स्वामी सहजानंद सरस्वती ने 'बिहार प्रांतीय किसान सभा' की स्थापना की। अरवल, सोनभद्र वंशीसूर्यपुर, जहानाबाद, बक्सर और गया क्षेत्र में पंडित यदुनंदन शर्मा, चक्रधर मिश्र (फखरपुर, अरवल) और अन्य नेताओं ने जमींदारी उत्पीड़न और ब्रिटिश मालगुजारी के खिलाफ किसानों को संगठित कर आंदोलन को अभूतपूर्व शक्ति दी।
सविनय अवज्ञा आंदोलन और 'नंगी हड़ताल' (1930) - 1930 में महात्मा गांधी के डांडी मार्च के साथ ही संपूर्ण बिहार में सविनय अवज्ञा आंदोलन की प्रचंड लहर दौड़ गई। चूंकि बिहार एक भू-वेष्टित (landlocked) प्रदेश था, इसलिए यहाँ समुद्र के पानी से नमक बनाने के स्थान पर 'नमक कानून' और 'चौकीदारी कर' न देने का आंदोलन चलाया गय सारण व छपरा: सारण जिला नमक सत्याग्रह का प्रमुख केंद्र बना। छपरा जेल में बंद स्वतंत्रता सेनानियों ने विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार की मांग को लेकर स्वदेशी कपड़े पहनने से मना कर दिया और नंगे रहकर 'नंगी हड़ताल' की। इस दौरान पुलिस ने कैदियों पर अमानवीय लाठीचार्ज किया और कोड़ों की सजा दी। पटना, मुंगेर व भागलपुर: पटना के नाकहा पिंड पर पंडित जवाहरलाल नेहरू और डॉ. राजेंद्र प्रसाद की मौजूदगी में नमक कानून तोड़ा गया। मुंगेर के गोगरी और भागलपुर के बिहपुर में पुलिस ने सत्याग्रहियों पर बर्बर लाठीचार्ज किया, जिसमें श्रीकृष्ण सिंह (बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री) और अनुग्रह नारायण सिंह गंभीर रूप से घायल हुए।. 1942 का 'भारत छोड़ो आंदोलन': अगस्त क्रांति और दमन का दौर में 8 अगस्त 1942 को बॉम्बे में महात्मा गांधी ने "करो या मरो" का नारा दिया। 9 अगस्त की सुबह ही गांधी जी सहित देश के तमाम बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद बिहार में आंदोलन की कमान युवाओं, छात्रों और किसानों ने संभाल ली। 1942 का वर्ष बिहार के इतिहास में सर्वाधिक खूनी किंतु शौर्यपूर्ण वर्ष रहा।
 गठन  • तारापुर गोलीकांड (13 शहीद) हुए थे ।
पटना सचिवालय गोलीकांड: सात अमर तरुण शहीद (11 अगस्त 1942) - 11 अगस्त 1942 को पटना कलेक्टरेट और सचिवालय भवन पर तिरंगा फहराने के लिए हजारों छात्रों का जुलूस निकला। पटना के ब्रिटिश जिलाधिकारी डब्ल्यू. जी. आर्चर ने पुलिस को गोलियां चलाने का आदेश दे दिया। पुलिस की गोलियों के सामने सीना तानकर एक-एक कर छात्र आगे बढ़ते रहे और झंडा फहराने का प्रयास करते रहे। इस गोलीबारी में बिहार के विभिन्न जिलों के 7 तरुण छात्र शहीद हुए: उमाकांत प्रसाद सिंह (राममोहन राय सेमिनरी, मूल निवासी: नरेंद्रपुर, सारण) , रामानंद सिंह (राममोहन राय सेमिनरी, मूल निवासी: शहादत नगर, पटना) , सतीश प्रसाद झा (पटना कॉलेजिएट, मूल निवासी: खडहरा, भागलपुर) , जगतपति कुमार (बिहार नेशनल कॉलेज, मूल निवासी: खराटी, औरंगाबाद) , देवीपद चौधरी (राममोहन राय सेमिनरी, मूल निवासी: सिल्हट / सारण) , राजेन्द्र सिंह (पटना हाई स्कूल, मूल निवासी: बनवारीचक, सारण)।रामगोविंद सिंह (पुनपुन हाई स्कूल, मूल निवासी: दशरथा, पटना) इन सात शहीदों के अमर बलिदान की स्मृति में आज भी पटना सचिवालय के सामने 'सप्त मूर्ति' (शहीद स्मारक) विराजमान है।
 जयप्रकाश नारायण (जेपी) और 'आजाद दस्ता' - 1942 के आंदोलन के दौरान जयप्रकाश नारायण को हजारीबाग सेंट्रल जेल में बंद कर दिया गया था। 9 नवंबर 1942 (दीपावली की रात) को जेपी अपने सहयोगियों (रामानंद मिश्रा, योगेंद्र शुक्ल, सूरज नारायण सिंह, गुलाबी सोनार आदि) के साथ हजारीबाग जेल की ऊंची दीवार लांघकर फरार हो गए। आजाद दस्ता का गठन: जेपी नेपाल के जंगलों (राजबिलास जंगल) पहुंचे और वहां युवाओं को छापामार युद्ध, हथियारों के प्रयोग और ब्रिटिश संचार प्रणालियों (रेल पटरियां, तार प्रणाली, डाकघर) को ध्वस्त करने का प्रशिक्षण देने के लिए 'आजाद दस्ता' का गठन किया। जेपी के इस भूमिगत आंदोलन ने पूरे देश में क्रांति की ज्वाला को बुझने नहीं दिया।
 बिहार के प्रमुख जिलों में शहादते, दमन व यातनाएँ (1857–1942) - 1857 से 1942 के दौरान बिहार का कोई भी जिला ऐसा नहीं था, जहां के वीरों ने रक्त न बहाया हो। नीचे प्रमुख जिलों में हुई प्रमुख शहादतों और अंग्रेजों द्वारा ढाए गए जुल्मों का विस्तृत विवरण दिया गया है: मुजफ्फरपुर व वैशाली अमर शहीद जुब्बा सहनी (16 अगस्त 1942): मुजफ्फरपुर के मीनापुर थाने पर 16 अगस्त 1942 को क्रांतिकारियों ने हमला बोला। जुब्बा सहनी के नेतृत्व में जनता ने अत्याचारी पुलिस अधिकारी वालास को थाने के भीतर ही जिंदा जला दिया। बाद में जुब्बा सहनी को गिरफ्तार कर लिया गया और 11 मार्च 1944 को भागलपुर जेल में फांसी दे दी गई।वैशाली: हाजीपुर और लालगंज में रेलवे स्टेशनों पर कब्जा करने के दौरान पुलिस फायरिंग में दर्जनों युवा शहीद हुए और अक्षयवट राय जैसे नेताओं को कठोर कारावास की सजा मिली।।. सीतामढ़ी व दरभंगा।अमर शहीद रामफल मंडल (23 अगस्त 1943): सीतामढ़ी के बाजपट्टी में 24 अगस्त 1942 को आंदोलनकारियों पर ब्रिटिश पुलिस ने गोलियां चलाईं। जवाब में रामफल मंडल और उनके सहयोगियों ने अंग्रेज अधिकारियों (अनुमंडलाधिकारी और पुलिस इंसपेक्टर) को मार गिराया। रामफल मंडल को गिरफ्तार कर 23 अगस्त 1943 को भागलपुर जेल में फांसी दे दी गई। मुंगेर, भागलपुर व संथाल परगना।तारापुर गोलीकांड (18 अगस्त 1942): मुंगेर जिले के तारापुर थाने पर तिरंगा फहराने पहुंचे निहत्थे देशभक्तों पर ब्रिटिश पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां चलाईं। इस भीषण गोलीकांड में 13 देशभक्त मौके पर ही शहीद हो गए।।भागलपुर: सतीश चंद्र झा और अन्य नेताओं के नेतृत्व में युवाओं ने कलेक्टरेट पर धावा बोला। भागलपुर सेंट्रल जेल अंग्रेजों के दमन और यातनाओं का सबसे बड़ा केंद्र बना, जहाँ हज़ारों सेनानियों को कोड़े मारे गए।चंपारण (पूर्वी व पश्चिमी) बेतिया गोलीकांड (24 अगस्त 1942): भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बेतिया में विशाल जुलूस पर ब्रिटिश सेना ने मशीन गन से फायरिंग की, जिसमें 15 से अधिक निहत्थे नागरिक और छात्र शहीद हो गए। सुगौली और रक्सौल में रेल लाइनें उखाड़ने पर सैकड़ों लोगों को अमानवीय शारीरिक यातनाएं दी गईं।। सारण, सीवान व गोपालगंज।जगलाल चौधरी व छपरा का जन-उभार: छपरा में जगलाल चौधरी के नेतृत्व में जनता ने पुलिस थानों और डाकघरों पर कब्जा कर लिया। अंग्रेजों ने गांव के गांव जला दिए और जगलाल चौधरी को वर्षों तक जेल की सींकचों में बंद रखकर यातनाएं दीं। सीवान (महेंद्रनाथ गोप): सीवान में पुलिस फायरिंग में कई युवा शहीद हुए।  गया, नवादा, औरंगाबाद, जहानाबाद व अरवल गया व हिसुआ (1942): गया और नवादा के हिसुआ में डाकघरों और पुलिस स्टेशनों पर धावा बोलने के दौरान पुलिस गोलीबारी में कई सत्याग्रही शहीद हुए। गया सेंट्रल जेल में बंद कैदियों को पत्थरों की गिट्टी तोड़ने और कोड़े सहने का कठोर श्रम कराया जाता था। जहानाबाद व अरवल: अरवल के खभैनी, मगध और कुर्था क्षेत्रों में रेल पटरियाँ उखाड़ने तथा तार सेवाएं ठप करने पर ब्रिटिश सेना ने गांवों में सामूहिक जुर्माने ठोके, घरों की कुर्की की और किसानों की फसलें जला दीं।भोजपुर, बक्सर, रोहतास व कैमूर बक्सर व डुमरांव (1942): डुमरांव और बक्सर में पुलिस स्टेशन पर तिरंगा फहराने के प्रयास में कपिलदेव सिंह और उनके साथी पुलिस की गोलियों के शिकार होकर शहीद हुए।
विक्रमगंज (रोहतास): रोहतास के विक्रमगंज में सेना की गोलीबारी में कई आंदोलनकारी मारे गए । अमर शहीद चुलहाई यादव (मधेपुरा): 1942 के आंदोलन में मधेपुरा और सहरसा में कलेक्ट्रेट पर हमला बोलते समय चुलहाई यादव और उनके साथियों ने अंग्रेजों की गोलियों का सामना करते हुए वीरगति प्राप्त की।
. नारी शक्ति: बिहार की अमर वीरांगनाएँ - बिहार के स्वतंत्रता संग्राम की सबसे महान विशेषताओं में से एक थी—महिलाओं का अभूतपूर्व और साहसिक योगदान। पुरुषों के जेल चले जाने या शहीद हो जाने के बाद बिहार की नारियों ने न केवल आंदोलन का नेतृत्व संभाला, बल्कि पुलिस की गोलियों का सीना तानकर सामना भी किया ।
प्रभावती देवी जयप्रकाश नारायण की धर्मपत्नी। उन्होंने महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम में रहकर गांधीवादी आदर्शों को अपनाया। पटना में 'महिला चरखा समिति' की स्थापना की। 1930, 1932 और 1942 के आंदोलनों में वे कई बार जेल गईं और पुलिस की बर्बरता सही।।तारा रानी श्रीवास्तव सीवान जिले की अमर वीरांगना। 1942 में अपने पति फूलन प्रसाद श्रीवास्तव के साथ सीवान थाने पर तिरंगा फहराने निकलीं। पुलिस फायरिंग में उनके पति को गोली लग गई। उन्होंने अपनी साड़ी से पति के घाव को बांधा और पति के शव को पीछे छोड़कर तिरंगे को हाथ में लिए आगे बढ़कर थाने पर झंडा फहरा दिया। रामदुलारी सिन्हा बिहार में छात्र आंदोलनों और स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाई। स्वतंत्रता के बाद वे देश की प्रमुख नेता बनीं और बिहार की पहली महिला राज्यपाल के रूप में सेवाएं दीं।
सरस्वती देवी हजारीबाग क्षेत्र में महिलाओं को संगठित कर 1930 के नमक सत्याग्रह और 1942 के आंदोलन का नेतृत्व किया। उन्हें अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार कर बार-बार जेल भेजा गया। अनीस फातिमा पटना की साहसी मुस्लिम महिला, जिन्होंने पर्दा प्रथा को तोड़कर असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लिया। उन्होंने विदेशी वस्त्रों की दुकानों पर धरना दिया और समाज सुधारक के रूप में कार्य किया।. स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों द्वारा 1857 से 1942 के बीच ब्रिटिश हुकूमत ने बिहार के स्वतंत्रता सेनानियों के मनोबल को तोड़ने के लिए दमन की सभी सीमाएं लांघ दी थीं: तोप से उड़ाना व सरेआम फांसी: 1857 में विद्रोहियों में खौफ पैदा करने के लिए निशान सिंह जैसे वीरों को तोप के मुंह से बांधकर उड़ा दिया जाता था और पीर अली जैसे नायकों को चौराहे पर सरेआम फांसी पर लटकाया जाता था।
सश्रम कारावास और कोड़ों की सजा: 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन और 1942 की अगस्त क्रांति में पकड़े गए युवाओं को नग्न करके बेत (कोड़े) मारे जाते थे। भागलपुर, गया और पटना सेंट्रल जेलों में सेनानियों से कड़ा शारीरिक श्रम कराया जाता था।।बाबू वीर कुंवर सिंह से लेकर जयप्रकाश नारायण और जगलाल चौधरी तक, अंग्रेजों ने स्वतंत्रता सेनानियों की जमीनों को जब्त कर लिया, फसलों में आग लगा दी और उनके पैतृक मकानों को तोपों व बुलडोजरों से ढहा दिया। सामूहिक जुर्माना और आगजनी:में  1942 में जब बिहार की जनता ने रेल पटरियां उखाड़ दीं और थानों पर कब्जा किया, तो अंग्रेज सेना (जैसे गोरखा और ब्रिटिश रेजिमेंट) ने जहानाबाद, अरवल, सारण, मुंगेर और चंपारण के कई गांवों को चारों तरफ से घेरकर जला दिया और पूरे-पूरे गांवों पर भारी 'सामूहिक जुर्माना'ठोक दिया ।
1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में जगदीशपुर की मिट्टी से उठी वीर कुंवर सिंह की ललकार से लेकर 1942 के पटना सचिवालय गोलीकांड में अपने प्राण आहुत करने वाले सात किशोर छात्रों के बलिदान तक, बिहार का इतिहास राष्ट्रभक्ति, शौर्य और स्वाभिमान का एक अमर गाथाकोश है।।बिहार के वीर सपूतों और वीरांगनाओं ने यह साबित कर दिया कि स्वतंत्रता की कीमत चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो—चाहे वह प्राणों की आहुति हो, फांसी का फंदा हो, कालापानी की सजा हो या फिर कोड़ों की मार—वे मातृभूमि के आंचल को ब्रिटिश दासता से मुक्त कराने के लिए पीछे नहीं हटने वाले थे।
आज जब हम एक स्वतंत्र, लोकतांत्रिक और समृद्ध भारत में सांस ले रहे हैं, तो यह बिहार के इन अमर शहीदों—बाबू वीर कुंवर सिंह, बाबू अमर सिंह, पीर अली, खुदीराम बोस, प्रफुल्ल चाकी, मंगल पांडे, बाबू जीवधर सिंह, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, जयप्रकाश नारायण, जुब्बा सहनी, रामफल मंडल, तारा रानी श्रीवास्तव, प्रभावती देवी और उन तमाम अनगिनत गुमनाम नायकों के पावन त्याग और शहादत का ही फल है।
"शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशाँ होगा।"
अमर शहीदों का यह बलिदान युगों-युगों तक भारतवर्ष के जन-मन को राष्ट्रसेवा और देशभक्ति की प्रेरणा देता रहेगा।