गुरुवार, मई 14, 2026

मलमास और मदसरवा

पुरुषोत्तम मास, च्यवन ऋषि और मदसर्वां का सांस्कृतिक मंथन
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
काल, संस्कृति और मगध का संगम का भारतीय मनीषा में 'काल' को केवल समय की गणना नहीं, बल्कि साक्षात् ईश्वर का स्वरूप माना गया है। प्राचीन भारतीय वाङ्मय के पन्नों में असुर, ऋषि और राजर्षि संस्कृतियों का संगम इतिहास के उन स्वर्णिम पृष्ठों में अंकित है, जहाँ आध्यात्मिकता और भौतिक शक्ति का अनवरत संघर्ष और समन्वय हुआ। मगध की पावन धरा, विशेषकर वर्तमान अरवल जिले का सोन तटीय क्षेत्र (प्राचीन हिरण्य प्रदेश), इस महामंथन का केंद्र रहा है। यहाँ की मिट्टी में 'मलमास' की शुद्धि, 'पुरुषोत्तम' की भक्ति और 'मदसर्वां' की तपोशक्ति का अद्भुत समावेश है। काल गणना का विज्ञान: मलमास से पुरुषोत्तम मास तक - प्राचीन भारतीय ऋषियों ने खगोल विज्ञान और आध्यात्म को जोड़कर 'अधिकमास' की अवधारणा विकसित की। यह सौर वर्ष (365 दिन) और चंद्र वर्ष (354 दिन) के बीच के 11 दिनों के वार्षिक अंतर को पाटने का एक विशुद्ध वैज्ञानिक तरीका है। मलमास का नामकरण: जब हर तीन साल में यह अंतर लगभग एक माह का हो जाता है, तो उसे 'मलमास' कहा गया। चूंकि इस माह में सूर्य की संक्रांति नहीं होती, इसलिए इसे मांगलिक कार्यों के लिए 'मलिन' (अशुद्ध) मान लिया गया था। भगवान विष्णु का वरदान: पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब इस मास को समाज और शास्त्रों ने उपेक्षित किया, तब भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम देकर 'पुरुषोत्तम मास' बनाया। उन्होंने घोषणा की कि इस माह में किया गया जप, तप और दान अक्षय पुण्य प्रदान करेगा।  यह मास इस सत्य का प्रतीक है कि जिसे संसार 'मल' (व्यर्थ) मानकर त्याग देता है, उसे ईश्वर अपनाकर 'पुरुषोत्तम' बना देते हैं।
मदसर्वां और मदमास: अहंकार के दमन की गाथा अरवल जिले के कलेर प्रखंड स्थित 'मदसर्वां' (मद-सरवा) का क्षेत्र असुर संस्कृति और ऋषि शक्ति के संघर्ष का ऐतिहासिक केंद्र है। यहाँ 'मद' शब्द के दो गहरे अर्थ मिलते हैं—पहला असुर 'मद' और दूसरा अहंकार या नशा। मद असुर की उत्पत्ति: भृगु पुत्र महर्षि च्यवन ने जब अश्विनी कुमारों को यज्ञ में 'सोमपान' का अधिकार दिलाने का प्रयास किया, तब देवराज इंद्र ने वज्र से प्रहार करना चाहा। उस समय च्यवन ऋषि ने अपने तपोबल से 'मद' नामक भयंकर असुर उत्पन्न किया। अहंकार का दमन: मद असुर इतना विशाल था कि उसने इंद्र को ग्रसने का प्रयास किया। यह इस बात का प्रमाण है कि ऋषि शक्ति (ज्ञान) के सामने भौतिक सत्ता (इंद्र) को भी झुकना पड़ता है। जहाँ असुर संस्कृति भौतिक सुख और सत्ता की पराकाष्ठा थी, वहीं ऋषि संस्कृति ने 'मद' (अहंकार) को नियंत्रित करने का मार्ग दिखाया। इसी कारण इस क्षेत्र को 'मदमास' और मलमास के विशेष संदर्भ में पूजा जाता है।
 महर्षि च्यवन: आयुर्वेद और योग के आदि-पुरोधा - मगध का यह क्षेत्र भृगु वंश (भार्गव) का प्रमुख केंद्र रहा है। ऋषि संस्कृति यहाँ केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह अस्त्र-शस्त्र, आयुर्वेद और विज्ञान की प्रयोगशाला थी। कायाकल्प और च्यवनप्राश: महेंदिया के समीप स्थित 'वधु सरोवर' (सुकन्या कुंड) वह स्थान है जहाँ अश्विनी कुमारों ने च्यवन ऋषि को पुनः युवावस्था प्रदान की थी। यहीं से विश्व प्रसिद्ध 'च्यवनप्राश' की उत्पत्ति जुड़ी है। यह घटना सिद्ध करती है कि संयम और तपस्या से मृत्यु और वृद्धावस्था पर विजय प्राप्त की जा सकती है। सुकन्या का सतीत्व: राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या का त्याग और ऋषि के प्रति समर्पण इस क्षेत्र की 'शाक्त' संस्कृति का आधार है।
. हिरण्य प्रदेश और हिरण्यबाहु: एक विलुप्त भौगोलिक वैभव का प्राचीन काल में  'हिरण्यबाहु'  कहा जाता था। यह नदी ब्रह्म संस्कृति और असुर संस्कृति के मिलन स्थल (मगध और आर्यावर्त की सीमा) के रूप में विख्यात थी अरवल जिले  का अरवल करपी, कलेर, औरंगाबाद का गोह, हसपुरा और पटना का पालीगंज क्षेत्र इसी 'हिरण्य प्रदेश' का हिस्सा था। आलवी प्रदेश: बुद्ध काल से पूर्व यह क्षेत्र यक्षों और असुरों के प्रभाव में था, जिसे बाद में ऋषि संस्कृति ने अपनी चेतना से आत्मसात किया।
क्षेत्रीय धार्मिक स्तंभ: आस्था के पांच केंद्र का हिरण्य प्रदेश और आलवी प्रदेश क्षेत्र की स्थापित प्राचीन मंदिरों से और भी प्रगाढ़ हो जाती है: च्यवनेश्वर महादेव (मदसर्वां): स्वयं च्यवन ऋषि द्वारा स्थापित शिवलिंग, जो शैव संस्कृति का स्तंभ है।दूधेश्वर नाथ (देवकुंड): इसे मगध का हरिद्वार माना जाता है, जहाँ का जलाशय कभी सूखता नहीं।जगदंबा स्थान (करपी): शक्ति उपासना का प्राचीन केंद्र, जहाँ पाल कालीन मूर्तिकला के अवशेष मिलते हैं।
सूर्य मंदिर (खटांगी): मगध की 'सौर संस्कृति' का प्रतीक, जो देव (औरंगाबाद) की परंपरा को जीवित रखे हुए है।
किंजर का शिव मंदिर: पुनपुन नदी के तट पर स्थित यह मंदिर जल और आध्यात्म के समन्वय को दर्शाता है।. मलमास मेला: संस्कृतियों का महाकुंभ का जब पुरुषोत्तम मास (मलमास) आता है, तो अरवल के महेंदिया और मदसर्वां में भारी मेला लगता है। यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सौर, शाक्त, शैव, वैष्णव और ब्रह्म संस्कृतियों का संगम है। मगध  के सात प्राचीन कुंडों (मदसुर कुंड) में स्नान का वही पुण्य माना गया है, जो राजगीर की सप्तधाराओं में मिलता है।
स्थानीय ग्रामीण और दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु इस मास में 'मद' (अहंकार) को त्याग कर 'पुरुषोत्तम' की शरण में जाते हैं। आधुनिक सभ्यता के बीज सत्य को रेखांकित करता है कि प्राचीन भारत में असुर संस्कृति भौतिकता का, ऋषि संस्कृति ज्ञान का और राजर्षि शासन का प्रतिनिधित्व करते थे। हिरण्यबाहु जैसी नदियों के तट पर जो वैचारिक मंथन हुआ, उसी से आधुनिक भारतीय सभ्यता की नींव पड़ी। जिस प्रकार इन विलुप्त होते तीर्थों और कथाओं को 'विरासत यात्रा' और 'मगधांचल' जैसी रचनाओं के माध्यम से पुनर्जीवित किया है, वह सराहनीय है। मदसर्वां और महेंदिया का यह परिक्षेत्र आने वाली पीढ़ियों को आयुर्वेद, योग और संयम की प्रेरणा देता रहेगा। यह क्षेत्र आज भी चीख-चीख कर अपनी विरासत की गौरवगाथा सुना रहा है—कि जहाँ तपस्या है, वहीं कायाकल्प है; और जहाँ अहंकार (मद) का अंत है, वहीं पुरुषोत्तम का वास है।
संदर्भ सूत्र: भृगु संहिता एवं च्यवन पुराण के क्षेत्रीय आख्यान , मगध का ऐतिहासिक भूगोल: सोन और पुनपुन तटीय सभ्यता , 'विरासत' एवं 'मगध क्षेत्र की विरासत' ,क्षेत्रीय लोकश्रुतियाँ और मदसर्वां के प्राचीन कुंडों का इतिहास

बुधवार, मई 13, 2026

मगध की मोरहर नदी

मोरहर नदी: मगध की विलुप्त होती जीवनधारा और सभ्यता 
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
भारत की सभ्यता नदियों के किनारे फली-फूली है। जहाँ गंगा और यमुना जैसी नदियों ने राष्ट्रीय फलक पर अपनी पहचान बनाई, वहीं मगध की धरती पर 'मोरहर' जैसी नदियों ने क्षेत्रीय संस्कृति, कृषि और इतिहास को चुपचाप सींचा है। झारखंड के चतरा जिले के घने जंगलों और पहाड़ियों से निकलने वाली मोरहर नदी केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि सतयुग से लेकर आधुनिक काल तक के मानवीय विकास की मूक गवाह है। आज यह नदी अपने अस्तित्व के लिए छटपटा रही है, जो हमारी साझा विरासत के लिए एक गंभीर चेतावनी है मोरहर नदी का जन्म झारखंड के चतरा जिले के प्रतापपुर प्रखंड में स्थित कुंदा की पहाड़ियों से होता है। स्थानीय भौगोलिक साक्ष्यों के अनुसार, यह ऐतिहासिक राजकिला (कुंदा किला) के समीप से एक अत्यंत पतली जलधारा 'पईन' के रूप में प्रस्फुटित होती है। यहाँ से यह नदी पहाड़ियों को चीरती हुई डुमरिया , इमामगंज प्रखंड की मैदानी इलाकों की ओर बढ़ती है।
यह नदी झारखंड से निकलकर बिहार के गया जिले में प्रवेश करती है। यहाँ यह डुमरिया, इमामगंज, रानीगंज, शेरघाटी, परैया और टिकारी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों से गुजरती है। इसके बाद यह जहाराबाद जिले के मखदुमपुर और रतनी फरीदपुर प्रखंडों को सींचते हुए अरवल के करपी प्रखंड और अंततः पटना जिले के पालीगंज प्रखंड की सीमा पर पुनपुन नदी में समाहित हो जाती है। इमामगंज के समीप मोरहर नदी का टापू भगहर है । 
मोरहर का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह स्वयं में एक विशाल नदी तंत्र को समेटे हुए है। इसे कई छोटी-बड़ी नदियों की जननी माना जाता है: सोरहर और जमुने: ये नदियाँ मोरहर की शक्ति को बढ़ाती हैं। दरधा और बलदईया: सिंचाई के दृष्टिकोण से ये अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।।गंगहर , सोरहर और बूढ़ी नदी: शेरघाटी के पास मोरहर और बुढ़िया (बूढ़ी) नदी का संगम इसे एक विशिष्ट भौगोलिक पहचान देता है। इतिहासकार विजय कुमार दत्त के अनुसार, शेरघाटी शहर इन दो नदियों के आंचल में  है।
प्राचीन ग्रंथों और स्थानीय लोकगाथाओं के अनुसार, मोरहर का क्षेत्र 'कीकट' प्रदेश का हिस्सा रहा है। गयासुर की देह पर बसी इस पावन भूमि में मोरहर का स्थान पवित्र माना गया है। त्रेता युग में जब भगवान राम पितृ तर्पण के लिए गया पधारे थे, तब इस क्षेत्र की नदियों का उल्लेख मिलता है। द्वापर युग में मगध नरेश जरासंध के काल में यह नदी सामरिक सुरक्षा का एक प्राकृतिक अवरोध थी।
मौर्य और गुप्त काल: मोरहर के किनारे स्थित बस्तियाँ मौर्यकालीन सैन्य मार्गों का हिस्सा थीं। गुप्त काल में यहाँ ब्राह्मण बस्तियों और मंदिरों का विस्तार हुआ।।हर्षवर्धन काल: चीनी यात्री ह्वेनसांग के वृत्तांतों में वर्णित मगध की समृद्ध कृषि व्यवस्था का मुख्य आधार मोरहर जैसी नदियाँ ही थीं।।मुगलकाल: शेरशाह सूरी के समय 'शेरघाटी' एक प्रमुख प्रशासनिक केंद्र बना। मोरहर के तट पर स्थित ऊँचे टीले सुरक्षा की दृष्टि से आह्लादित है। ब्रिटिश साम्राज्य।ने शेरघाटी को एक व्यापारिक और प्रशासनिक केंद्र (कलेक्टरगंज) के रूप में विकसित किया। जी.टी. रोड (Grand Trunk Road) का निर्माण मोरहर के महत्व को वैश्विक मानचित्र पर ले आया। आज यह नदी आधुनिक सिंचाई परियोजनाओं का आधार है।
मोरहर नदी के घाट विभिन्न धर्मों और संप्रदायों के संगम रहे हैं:। सौर और शैव परंपरा: नदी के किनारे स्थित मेन का कोटेश्वर मंदिर और सूर्य उपासना के केंद्र (छठ पर्व) प्राचीन काल से ही जन-आस्था के केंद्र रहे हैं।।बौद्ध और जैन संस्कृति: शेरघाटी और टिकारी के बीच स्थित घेजन एक महत्वपूर्ण बौद्ध स्थल है। यहाँ से प्राप्त बुद्ध की प्रतिमाएं और अवशेष सिद्ध करते हैं कि यह नदी बौद्ध भिक्षुओं की साधना स्थली रही है। झारखंड का कुंदा और प्रतापपुर क्षेत्र जैन तीर्थंकरों की स्मृति से जुड़ा है। वैष्णव और ब्रह्म संस्कृति: पितृपक्ष के दौरान गया आने वाले श्रद्धालु मोरहर और इसकी सहायक नदियों के तटों पर तर्पण और अनुष्ठान करते हैं।
अस्तित्व का संकट: मोरहर  नदी की छटपटाहट में आज मोरहर नदी का वह विशालकाय स्वरूप, जो कभी शेरघाटी और पंचानपुर में दिखता था, लुप्त होने की कगार पर है।।संकट के प्रमुख बिंदु में अवैध बालू खनन: नदी की तलहटी से मशीनों द्वारा बालू की अंधाधुंध खोदाई ने नदी के 'रीचार्ज' होने की क्षमता को खत्म कर दिया है।।नाले में तब्दील होती धारा: जहानाबाद के शकुराबाद तक पहुँचते-पहुँचते मोरहर एक संकरे नाले जैसी दिखने लगती है। यह मानवीय अतिक्रमण और उपेक्षा का चरम है।।लुप्त होती सहायक नदियाँ: जब मुख्य धारा (मोरहर) ही कमजोर हो रही है, तो इसकी सहायक नदियाँ जैसे सोरहर और बलदईया भी सूख रही हैं।।मोरहर नदी केवल एक जलस्रोत नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता का डीएनए (DNA) है। यदि कुंदा के राजकिला से शुरू होकर पालीगंज तक जाने वाली यह जीवनरेखा समाप्त हो गई, तो मगध का कृषि ढांचा और ऐतिहासिक पहचान दोनों नष्ट हो जाता है। बालू के अवैध खनन पर पूर्ण प्रतिबंध।।नदी के उद्गम स्थल (कुंदा) का संरक्षण और उसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करना।।नदी के जलमार्ग से अतिक्रमण हटाना और जन-भागीदारी से 'मोरहर बचाओ' अभियान चलाना। मोरहर की पुकार आज केवल पर्यावरण की पुकार नहीं है, बल्कि यह हमारे इतिहास को बचाने की पुकार है। यदि हम आज नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल इतिहास की किताबों में पढ़ेंगी कि कभी मगध की धरती पर एक विशाल 'मोरहर' बहा करती थी।
संदर्भ:।स्थानीय गजेटियर और ऐतिहासिक अभिलेख (गया एवं चतरा जिला) इतिहासकार विजय कुमार दत्त के शोध लेख पुरातात्विक साक्ष्य (घेजन बौद्ध स्थल और कुंदा राजकिला) समकालीन समाचार रिपोर्ट (मोरहर नदी के अस्तित्व पर संकट)