सत्येन्द्र कुमार पाठक
राष्ट्र निर्माण और शिक्षा की नई दिशा में शिक्षा केवल अक्षर ज्ञान, डिग्रियों के संग्रहण या आजीविका अर्जित करने का सीमित माध्यम नहीं है; यह किसी भी राष्ट्र की चेतना, उसके सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सामाजिक-आर्थिक स्वावलंबन का मूल आधार होती है। भारत जैसे विविध, बहुसांस्कृतिक और विशाल जनसंख्या वाले देश में शिक्षा नीति केवल एक प्रशासनिक ढांचा नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ी के निर्माण की रूपरेखा होती है।
21वीं सदी अभूतपूर्व परिवर्तनों की सदी है। एक ओर जहाँ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस , ऑटोमेशन, डेटा साइंस और त्वरित तकनीकी विकास ने वैश्विक कार्य-संस्कृति को बदल दिया है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक चुनौतियों (जैसे जलवायु परिवर्तन, नैतिक संकट और मानसिक स्वास्थ्य) से निपटने के लिए मानवीय मूल्यों की आवश्यकता रेखांकित हुई है। ऐसे दौर में भारत के सामने यह दोहरी चुनौती थी कि वह अपनी सदियों पुरानी सांस्कृतिक और नैतिक जड़ों को भी सुरक्षित रखे और अपने युवाओं को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के योग्य भी बनाए।
29 जुलाई 2020 को घोषित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इसी वैश्विक और राष्ट्रीय आवश्यकता का ऐतिहासिक उत्तर है। लगभग तीन दशकों (1986 की शिक्षा नीति) के लंबे अंतराल के बाद आई यह नीति भारतीय शिक्षा व्यवस्था को 'रटने की पुरानी पद्धति' से मुक्त कर अनुभवात्मक, कौशल-आधारित, बहु-विषयक और समावेशी दृष्टिकोण की ओर ले जाती है।
: गुरुकुल परंपरा से मैकाले कालीन क्षरण तक भारतीय शिक्षा के नवीन दृष्टिकोण के महत्त्व को पूरी तरह समझने के लिए इसके ऐतिहासिक विकासक्रम को तीन प्रमुख कालखंडों में देखना आवश्यक है। प्राचीन गुरुकुल युग में चरित्र निर्माण एन ई, अनुभव पी 2020 , चरित्र निर्माण मूल्य नवाचार , अनुभवात्मक व मौखिक, लिखित अभ्यास , तकनिक , और प्राचीन मूल्य , स्वावलंबी व प्रकृति से जुड़ाव लक्ष्य था । औपनिवेशिक/मैकाले दौर में परीक्षा व अंक केंद्रित सोच , रटने की पद्धति , लिपिक तैयार करने की सोच और वैश्विक ज्ञान महाशक्ति का लक्ष्य और नवीन दृष्टिकोण (NEP 2020) में कौशल , अनुभवात्मक ज्ञान व आधुनिक स्वावलंबी का लक्ष्य निर्धारित है।
प्राचीन भारत में शिक्षा का मुख्य ध्येय था— “सा विद्या या विमुक्तये” (अर्थात शिक्षा वही है जो अज्ञानता, संकीर्णता और मानसिक दासता से मुक्ति दिलाए)। ज्ञान संस्कृति और नैतिक संस्कृति का प्राचीन गुरुकुलों में ज्ञान केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं था। वहाँ गुरु और शिष्य के बीच संवाद, शास्त्रार्थ और व्यवहार का गहन संबंध था। गणित, खगोलशास्त्र (आर्यभट्ट, वराहमिहिर), आयुर्वेद (चरक, सुश्रुत), दर्शन, योग और स्थापत्य कला के साथ-साथ नैतिक मूल्यों, पर्यावरण-चेतना और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की शिक्षा दी जाती थी।
मौखिक व लिखित परंपरा का संतुलन के लिए गुरुकुलों में श्रुति और स्मृति के माध्यम से स्मरण शक्ति और चिंतन क्षमता का विकास किया जाता था, जिसके बाद लिखित ग्रंथों का गहन अध्ययन होता था। निजीकरण रहित सामाजिक दायित्व का प्राचीन भारत में आज की तरह निजी व्यावसायिक विद्यालय नहीं थे। गुरुकुल समाज और राजाओं के संरक्षण में चलते थे, जहाँ सभी वर्ग के योग्य विद्यार्थियों को समान शिक्षा और जीवन-कौशल सिखाए जाते थे।
औपनिवेशिक काल का प्रभाव और 'रटने की पद्धति' में 19वीं सदी में लॉर्ड मैकाले द्वारा लागू की गई शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य भारतीय संस्कृति को नीचा दिखाना और ब्रिटिश शासन के प्रशासनिक कार्यों के लिए लिपिक क्लर्क तैयार करना था। इस व्यवस्था ने भारतीय युवाओं की मौलिक सोच और स्वतंत्र चिंतन को समाप्त कर दिया एवं सृजनात्मकता ह्रास है। अंक-केंद्रित एवं परीक्षा-आधारित व्यवस्था: शिक्षा का मापदंड केवल परीक्षा में प्राप्त अंक बन गए। छात्र 'क्या सीखना है' के बजाय 'परीक्षा कैसे पास करनी है' पर केंद्रित हो गए, जिससे रटने की पद्धति हावी हो गई।
. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का मूल उद्देश्य भारत को एक वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाना है। यह नीति केवल इस बात पर ध्यान केंद्रित नहीं करती कि विद्यार्थियों को 'क्या पढ़ना है', बल्कि इस बात पर बल देती है कि उन्हें 'कैसे सोचना है' और 'कैसे सीखना है'। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत प्रारंभिक स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा और डिजिटल एकीकरण तक क्रांतिकारी कदम उठाए गए हैं।
स्कूली शिक्षा के पुराने 10+2 ढांचे को पूरी तरह समाप्त कर बाल विकास की विभिन्न मनोवैज्ञानिक और शारीरिक अवस्थाओं के अनुसार 5+3+3+4 मॉडल लागू किया गया है ।फाउंडेशनल 3 वर्ष प्री-स्कूल + कक्षा 1-2 (आयु 3 से 8 वर्ष)खेल-कूद, गतिविधि-आधारित शिक्षण और बुनियादी साक्षरता व संख्याज्ञान (FLN) पर विशेष बल। प्रिपरेटरी कक्षा 3 से 5 (आयु 8 से 11 वर्ष)अनुभवात्मक शिक्षण, खेल और गतिविधियों के माध्यम से भाषा और गणितीय सोच का विकास। मिडिल कक्षा 6 से 8 (आयु 11 से 14 वर्ष)विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान में अमूर्त अवधारणाओं का परिचय और वोकेशनल (व्यावसायिक) स्किल्स।
सेकेंडरी कक्षा 9 से 12 (आयु 14 से 18 वर्ष)गंभीर चिंतन , लचीलापन, विषयों का स्वतंत्र चयन और बोर्ड परीक्षाओं के तनाव में कमी। पारंपरिक शिक्षा प्रणाली में कला , विज्ञान और वाणिज्य के बीच जो कठोर विभाजन था, उसे समाप्त कर दिया गया है। अब यदि कोई छात्र भौतिक विज्ञान पढ़ना चाहता है, तो वह उसके साथ संगीत, चित्रकला, इतिहास या अर्थशास्त्र भी चुन सकता है। संतुलित मस्तिष्क विकास की व्यवस्था विद्यार्थी के विश्लेषणात्मक (Left Brain) और रचनात्मक (Right Brain) दोनों पहलुओं का संतुलित विकास सुनिश्चित करती है। उच्च शिक्षा में ड्रॉप-आउट दर को कम करने और छात्रों के समय/संसाधनों की सुरक्षा के लिए यह एक दूरदर्शी कदम है ।
1 वर्ष पूरा करने पर: प्रमाण पत्र , 2 वर्ष पूरा करने पर: एडवांस डिप्लोमा , 3 वर्ष पूरा करने पर: स्नातक डिग्री ,
4 वर्ष पूरा करने पर: शोध के साथ स्नातक , छात्रों के क्रेडिट्स 'एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट' में डिजिटल रूप से सुरक्षित रहते हैं, जिससे वे अपनी इच्छानुसार ब्रेक लेकर भविष्य में कहीं से भी अपनी शिक्षा पुनः शुरू कर सकते हैं। व्यवसायिक शिक्षा को मुख्य पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया गया है। कक्षा 6 से कोडिंग व वोकेशनल ट्रेनिंग: विद्यार्थियों को शुरुआती उम्र में ही कोडिंग, रोबोटिक्स, कारपेंटरी, बागवानी और वित्तीय साक्षरता जैसे व्यावहारिक कौशल सिखाए जा रहे हैं। 10 दिनों का 'बैगलेस पीरियड' के दौरान विद्यार्थी स्थानीय कारीगरों, शिल्पकारों, वैज्ञानिकों और व्यवसायियों के साथ प्रत्यक्ष कार्य अनुभव प्राप्त करते हैं।
भारतीय ज्ञान प्रणाली में शिक्षा को देश की जड़ों से जोड़ने के लिए प्राचीन और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक संदर्भों के साथ शामिल किया गया है: आयुर्वेद, योग, प्राचीन भारतीय गणित, पर्यावरण संरक्षण और साहित्य का अध्ययन शामिल किया गया है। मातृभाषा में शिक्षा में प्राथमिक स्तर (कक्षा 5 तक) शिक्षा का माध्यम मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा रखने पर विशेष बल दिया गया है, क्योंकि शोध सिद्ध करते हैं कि बच्चे अपनी मातृभाषा में अवधारणाओं को अधिक सरलता और गहराई से समझते हैं।
डिजिटल एकीकरण और आधुनिक तकनीक में अपार आईडी प्रत्येक विद्यार्थी की एक एकीकृत डिजिटल पहचान जिससे उसके सभी शैक्षणिक रिकॉर्ड, क्रेडिट्स और प्रमाण पत्र एक स्थान पर सुरक्षित रहते हैं।ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स में राष्ट्रीय पोर्टल के माध्यम से देश के दूर-दराज के क्षेत्रों में भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है।
360-डिग्री समग्र प्रगति कार्ड केवल अंकों के स्थान पर विद्यार्थी के व्यवहार, सहपाठियों के फीडबैक , स्व-मूल्यांकन और शिक्षकों के अवलोकन के आधार पर रिपोर्ट कार्ड तैयार किया जा रहा है। तुलना का आधार में प्राचीन गुरुकुल प्रणालीपुराना (औपनिवेशिक/10+2) ढांचानवीन दृष्टिकोण (राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020) मूल उद्देश्य में चरित्र निर्माण, आत्म-साक्षात्कारपरीक्षा उत्तीर्ण करना व रोजगारकौशल विकास, नवाचार व सर्वांगीण विकास शिक्षण विधिअनुभवात्मक, संवाद व चिंतनरटने की पद्धति (Rote Learning)अनुभवात्मक, गतिविधि व डिजिटल आधारित है। विषय संरचनालचीला व जीवनोपयोगीकला/विज्ञान/वाणिज्य की कठोर सीमाबहु-विषयक व लचीला तकनीकमौखिक व ताड़पत्र/पांडुलिपिश्यामपट्ट व सीमित प्रयोगAI, डिजिटल प्लेटफॉर्म व अपार आईडी मूल्यांकनगुरु द्वारा सतत अवलोकनवार्षिक परीक्षा व अंक पत्र360-डिग्री समग्र प्रगति कार्ड
क्रियान्वयन की चुनौतियाँ और समाधान की दिशा - यद्यपि यह नवीन दृष्टिकोण अत्यंत दूरदर्शी और क्रांतिकारी है, परंतु 1.4 अरब की आबादी वाले विविध भारत में इसके सफल क्रियान्वयन के लिए कुछ प्रमुख चुनौतियों का समाधान आवश्यक है:व्यापक शिक्षक प्रशिक्षण: रटने की पुरानी परिपाटी से हटकर अनुभवात्मक और कौशल-आधारित शिक्षण देने के लिए लाखों शिक्षकों को निरंतर प्रशिक्षित करना। डिजिटल विभाजन को कम करना: ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में हाई-स्पीड इंटरनेट, कंप्यूटर और डिजिटल उपकरणों की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करना। वित्तपोषण एवं बुनियादी ढांचा का : शिक्षा क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं,आधुनिक प्रयोगशालाओं और वोकेशनल सेंटर्स के निर्माण के लिए जीडीपी का 6% व्यय करने के लक्ष्य को प्राप्त करना है ।
भारतीय शिक्षा का नवीन दृष्टिकोण केवल एक नीतिगत दस्तावेज या प्रशासनिक फेरबदल नहीं है; यह भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण और 21वीं सदी के तकनीकी उत्थान का महासंगम है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 प्राचीन गुरुकुल परंपरा के नैतिक, ज्ञान और जीवन-मूल्यों तथा आधुनिक युग की डिजिटल तकनीक, एआई और कौशल-आधारित आवश्यकताओं का एक अनूठा संतुलन प्रस्तुत करती है। रटने की संकीर्ण व्यवस्था से मुक्त होकर स्वतंत्र रूप से सोचना, समझना और सृजन करना ही इस नवीन दृष्टिकोण की आत्मा है। यह बदलाव हमारेka युवाओं को केवल आजीविका कमाने के योग्य ही नहीं बनाएगा, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर, संवेदनशील, नवोन्मेषी और जिम्मेदार नागरिक बनाएगा, जो भारत को पुनः विश्व मंच पर 'विश्व गुरु' के रूप में स्थापित करने में अपनी केंद्रीय भूमिका निभाएंगे ।
भारतीय राजनीति और ज्ञान परंपरा
भारतीय राजनीति की जड़ें केवल आधुनिक औपनिवेशिक इतिहास, पश्चिमी अवधारणाओं या आजादी के बाद बने संवैधानिक ढाँचे तक ही सीमित नहीं हैं। इसका एक अत्यंत प्राचीन, समृद्ध और सुदृढ़ वैचारिक आधार है, जिसे 'भारतीय ज्ञान परंपरा' (Indian Knowledge Systems) के नाम से जाना जाता है। प्राचीन काल से ही भारत में राजनीति को केवल 'सत्ता प्राप्ति' या 'शासन चलाने का साधन' नहीं माना गया, बल्कि इसे समाज में व्यवस्था, धर्म, नीति और 'लोक-कल्याण' की स्थापना का सर्वोच्च माध्यम स्वीकार किया गया। प्राचीन विचारकों ने राजनीति को जीवन के अन्य अंगों से अलग करके नहीं देखा, बल्कि इसे नैतिक मूल्यों और मानवीय कर्तव्यों के साथ जोड़कर देखा। यह ज्ञान परंपरा हज़ारों वर्षों के अनुभव, चिंतन, संवाद और प्रयोगों का परिणाम है, जिसने भारत को न केवल सांस्कृतिक रूप से एकजुट रखा, बल्कि शासन व्यवस्था और न्यायशास्त्र के क्षेत्र में भी दुनिया को एक नई दृष्टि दी।
. 'राजधर्म' और लोक-कल्याण - प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन का केंद्रीय दर्शन 'राजधर्म' की अवधारणा में निहित है। 'राजधर्म' का अर्थ राजा या शासक के वे नैतिक, सामाजिक और राजनीतिक कर्तव्य हैं, जिनका पालन करना शासन के संचालन के लिए अनिवार्य माना गया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र, वेद, उपनिषद, मनुस्मृति, शुक्रनीति तथा महाभारत (विशेषकर 'शांति पर्व') जैसे महान ग्रंथों में राजधर्म की विशद व्याख्या मिलती है। प्रजासुखे सुखं राज्ञः (प्रजा का कल्याण ही राजा का कल्याण है): , कौटिल्य ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ अर्थशास्त्र में राजा के कर्तव्यों को स्पष्ट करते हुए लिखा है:, "प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्। , नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्॥" अर्थात्, प्रजा के सुख में ही राजा का सुख निहित है और प्रजा के हित में ही उसका हित है। राजा का अपना कोई व्यक्तिगत प्रिय या अप्रिय नहीं होता; प्रजा को जो प्रिय और हितकर लगे, वही राजा के लिए भी हितकर है। यह विचार आधुनिक लोकतंत्र के 'जन कल्याणकारी राज्य' (Welfare State) की अवधारणा का मूल आधार है।
प्राचीन ग्रंथों में शासन और न्याय व्यवस्था को बनाए रखने के लिए 'दंडनीति' का विधान किया गया। दंडनीति का अर्थ केवल सजा देना नहीं था, बल्कि समाज में अराजकता (मात्स्यन्याय—जहाँ शक्तिशाली कमजोर को दबाता है) को समाप्त करना था। दंडनीति का प्राथमिक उद्देश्य समाज के हर वर्ग के लिए न्याय सुनिश्चित करना, दुर्बलों की रक्षा करना और नैतिक मूल्यों का संरक्षण करना था ।
प्रायः यह भ्रांति फैलाई जाती है कि लोकतंत्र या गणतांत्रिक व्यवस्था भारत के लिए एक पश्चिमी आयात है। परंतु भारतीय इतिहास और प्राचीन साहित्य इस बात के साक्षी हैं कि भारत में राजतंत्र के साथ-साथ गणतांत्रिक व्यवस्था की भी अत्यंत सुदृढ़ परंपरा रही है। वैदिक काल की संस्थाएं — 'सभा' और 'समिति': - वैदिक काल में राजा की निरंकुशता पर अंकुश लगाने के लिए और सामूहिक निर्णय लेने के लिए 'सभा' और 'समिति' जैसी लोकतांत्रिक संस्थाएं विद्यमान थीं। 'सभा' में समाज के वरिष्ठ एवं प्रबुद्ध लोग शामिल होते थे, जबकि 'समिति' आम जनमानस की प्रतिनिधि सभा होती थी। ऋग्वेद और अथर्ववेद में सामूहिक चिंतन और एकमत होकर निर्णय लेने के महत्व पर बल दिया गया है (समानो मन्त्रः समितिः समानी)।ईसा पूर्व छठी शताब्दी में भारत में वैशाली (लिच्छवि), शाक्य, मल्ल और कंबोज जैसे शक्तिशाली गणराज्य (गणसंघ) अस्तित्व में थे। वैशाली के लिच्छवि गणराज्य को विश्व का पहला गणतंत्र माना जाता है। यहाँ राजा का चुनाव जनता या प्रतिनिधियों द्वारा होता था। संस्थागारों में मतदान, प्रस्ताव प्रस्तुत करने और बहस के माध्यम से निर्णय लेने की एक पूर्ण विकसित और पारदर्शी प्रक्रिया मौजूद थी। भगवान बुद्ध ने भी बौद्ध संघों की कार्यप्रणाली के लिए इन्हीं गणतांत्रिक नियमों को अपनाया था।
आधुनिक राष्ट्र-निर्माण और स्वतंत्रता संग्राम पर प्रभाव - भारतीय ज्ञान परंपरा की यह विचार-धारा केवल प्राचीन काल तक सीमित नहीं रही, बल्कि 19वीं और 20वीं शताब्दी के स्वतंत्रता संग्राम में यह राष्ट्रीय चेतना की सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरी। आधुनिक विचारकों ने भारतीय ज्ञान परंपरा के शाश्वत सिद्धांतों को आधुनिक राजनीतिक संघर्ष का आधार बनाया। महात्मा गांधी और सत्य-अहिंसा:महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन को केवल राजनीतिक अधिकार प्राप्त करने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे एक नैतिक आंदोलन बनाया। उन्होंने उपनिषदों, भगवद्गीता और जैन/बौद्ध परंपराओं से 'सत्य', 'अहिंसा' और 'अपरिग्रह' के सिद्धांतों को लिया और इन्हें सत्याग्रह तथा सविनय अवज्ञा जैसे राजनीतिक साधनों के रूप में ढाला। गांधीजी का 'रामराज्य' का विचार वास्तव में सर्वोदय और लोक-कल्याणकारी राजधर्म का ही आधुनिक रूप था।
सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्रीय चेतना में स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविंदो घोष, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और पंडित मदन मोहन मालवीय जैसे विचारकों ने भारतीय ज्ञान परंपरा का गहन अध्ययन किया। स्वामी विवेकानंद ने 'आत्मवत सर्वभूतेषु' (सभी जीवों में स्वयं को देखना) के विचार द्वारा भारत के युवाओं में आत्म-सम्मान और राष्ट्र-सेवा की भावना जगाई। अरविंदो घोष ने भारत को केवल एक भौगोलिक भू-भाग न मानकर एक 'जीवंत सांस्कृतिक इकाई' के रूप में रेखांकित किया। आज के 21वीं सदी के परिदृश्य में, जहाँ पूरी दुनिया राजनीतिक नैतिकता के संकट, भ्रष्टाचार और शासन की जटिलताओं से जूझ रही है, भारतीय ज्ञान परंपरा अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है। आधुनिक सुशासन की अवधारणा में जिन बातों—पारदर्शिता, उत्तरदायित्व, जन-सहभागिता और न्याय—पर जोर दिया जाता है, वे सभी 'राजधर्म' और कौटिल्य के 'सप्तांग सिद्धांत' (राज्य के सात अंग) में पहले से ही समाहित हैं।
वर्तमान में, भारत सरकार का शिक्षा मंत्रालय 'भारतीय ज्ञान प्रणाली' प्रभाग के माध्यम से इस समृद्ध विरासत को आधुनिक शिक्षा, अनुसंधान और नीति-निर्माण में एकीकृत करने का प्रयास कर रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत भी प्राचीन भारतीय चिंतन, राजनीति और अर्थशास्त्र को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जा रहा है, ताकि भावी पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़कर आधुनिक समस्याओं का समाधान खोज सके। भारतीय राजनीति और भारतीय ज्ञान परंपरा का संबंध आत्मा और शरीर के समान है। प्राचीन गणराज्यों की लोकतांत्रिक प्रक्रिया से लेकर महाभारत के राजधर्म और गांधीजी के सत्याग्रह तक—भारतीय राजनीतिक चिंतन हमेशा से मानवता, न्याय और नैतिक मूल्यों के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। आज जब भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में उभर रहा है, तो अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा के आलोक में आधुनिक राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था का संचालन करना न केवल भारत के लिए, बल्कि सम्पूर्ण विश्व कल्याण के लिए एक अनुकरणीय मार्ग सिद्ध हो सकता है।