नाग संस्कृति और नाग पंचमी:
सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारतीय सभ्यता और संस्कृति विश्वात्मक और उदार दृष्टिकोण की परिचायक रही है। यहाँ प्रकृति के प्रत्येक घटक—चेतन और अचेतन—में ईश्वरीय सत्ता का दर्शन किया गया है। इसी सांस्कृतिक यात्रा का एक अत्यंत प्रामाणिक और प्रभावशाली अध्याय है नाग संस्कृति और उससे जुड़ा पावन पर्व नाग पंचमी। नाग संस्कृति केवल पूजा-पाठ या धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं है; यह भारत के प्रागैतिहासिक काल, वैदिक-पौराणिक आख्यानों, ऐतिहासिक साम्राज्यों, स्थापत्य कला, पारिस्थितिकी तंत्र (Ecology) तथा आध्यात्मिक चेतना का एक अभिन्न अंग रही है। प्रस्तुत आलेख में नाग संस्कृति के सृजनकर्ता नागों, मन्वंतर से लेकर आधुनिक युग तक विभिन्न भारतीय राज्यों में नाग साम्राज्यों व मंदिरों के निर्माण, तथा विविध सम्प्रदायों व जीवन-तत्त्वों में नागपंचमी के बहुआयामी महत्व का विश्लेषणात्मक विवेचन किया गया है।
नाग संस्कृति - पौराणिक और वैदिक साहित्य के अनुसार, नाग संस्कृति के बीज प्रचेतस के वंश और महर्षि कश्यप एवं उनकी पत्नी कद्रू के माध्यम से बोए गए थे। कद्रू से उत्पन्न नागवंशियों ने न केवल जल, पाताल और पृथ्वी के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी बस्तियाँ बसाईं, बल्कि उन्होंने भारतीय अध्यात्म, समाज और राजनीति में अपना अमूल्य योगदान दिया।।नाग संस्कृति के सृजन और विस्तार में मुख्य रूप से निम्नलिखित नागों की भूमिका ऐतिहासिक व पौराणिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण रही है:।शेषनाग (अनंत): शेषनाग को नाग संस्कृति में स्थायित्व, धैर्य और ब्रह्मांडीय चेतना का प्रतीक माना जाता है। इन्होंने समस्त भौतिक कामनाओं का त्याग कर तपस्या का मार्ग अपनाया और भगवान विष्णु की शय्या के रूप में क्षीरसागर में अपनी सेवा दी। अध्यात्म में इन्हें पृथ्वी के संतुलन और मेरुदंडीय चेतना का आधार माना गया है।
वासुकी नाग: समुद्र मंथन में 'मंथन-रज्जु' (रस्सी) की भूमिका निभाकर वासुकी नाग ने देवों और असुरों के मध्य संतुलन स्थापित किया। वासुकी भगवान शिव के गले का आभूषण बने और औषधि, समुद्र ज्ञान व जल-स्रोतों की रक्षा के अधिष्ठाता देवता के रूप में पूजे गए।।तक्षक नाग: तक्षक ने नाग जाति को एक सुदृढ़ सैनिक और राजनीतिक पहचान दी। खांडवप्रस्थ (आधुनिक दिल्ली-हरियाणा क्षेत्र) और तक्षशिला पर तक्षक नाग का संप्रभु शासन था। महाभारत काल में राजा परीक्षित और जनमेजय के साथ तक्षक का संघर्ष इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ बना।।कर्कोटक नाग: कर्कोटक को विष-विद्या, जल-तत्व और सुरक्षा का स्वामी माना जाता है। राजा नल की कथा तथा कांगड़ा और कश्मीर घाटी के जल-प्रबंध में कर्कोटक नाग का विशिष्ट संदर्भ आता है।
मणिभद्र और महापद्म: ये नाग धन, समृद्धि और निधियों (खजाने) के रक्षक माने गए। इन्होंने प्राचीन व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा और आर्थिक संरचना के निर्माण में योगदान दिया।
आस्तिक मुनि (नाग-संरक्षक): यद्यपि आस्तिक ऋषि महर्षि जरत्कारु और नागकुमारी मनसा के पुत्र थे, परंतु वे नाग संस्कृति के सबसे बड़े रक्षक सिद्ध हुए। उन्होंने राजा जनमेजय के विनाशकारी 'सर्प सत्र यज्ञ' को रोककर नाग जाति को समूल नष्ट होने से बचाया था। नाग पंचमी का त्योहार श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। इसका इतिहास महाभारत काल से लेकर श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं तक फैला हुआ है:राजा जनमेजय का सर्प सत्र और आस्तिक मुनि की है। महाभारत के अनुसार, राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के दंश से हुई थी। पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने हेतु उनके पुत्र राजा जनमेजय ने 'सर्प सत्र यज्ञ' का आयोजन किया। इस महायज्ञ के मन्त्रों के प्रभाव से संसार के समस्त सर्प आहुति बनकर यज्ञ-कुण्ड में गिरने लगे। नाग जाति पर आए इस महासंकट को देखकर माता मनसा के पुत्र आस्तिक मुनि ने जनमेजय के दरबार में प्रवेश किया। ऋषि आस्तिक ने अपने ज्ञान, वेदों की स्तुति और नीतिपूर्ण वचनों से राजा जनमेजय को अत्यंत प्रसन्न किया। जब जनमेजय ने उनसे वर मांगने को कहा, तो आस्तिक मुनि ने सर्प सत्र यज्ञ को तत्काल समाप्त करने का वरदान मांगा। जिस दिन यह यज्ञ समाप्त हुआ और नागों को प्राणदान मिला, वह श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि थी। उसी दिन से नागों की रक्षा और पूजा के प्रतीक रूप में नाग पंचमी पर्व का आरंभ हुआ। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, यमुना नदी को अपने भयानक विष से दूषित करने वाले कालिया नाग का दमन भगवान श्रीकृष्ण ने श्रावण शुक्ल पंचमी को ही किया था। श्रीकृष्ण ने कालिया नाग के फन पर नृत्य कर उसका घमंड तोड़ा और उसे यमुना छोड़कर रमणक द्वीप जाने का आदेश दिया। कालिया को जीवनदान मिलने की स्मृति में भी यह दिन उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
. भारत के राज्यों में नाग साम्राज्य का अवदान एवं प्रमुख नाग मंदिर - भारत का इतिहास साक्ष्य देता है कि नाग केवल पौराणिक पात्र नहीं थे, बल्कि वे एक पराक्रमी मानव जाति और राजवंश (नागवंश) थे, जिन्होंने कुषाणों और शकों जैसी विदेशी शक्तियों को परास्त कर भारत की स्वतंत्रता और सनातन संस्कृति की रक्षा की थी।. उत्तर प्रदेश नाग साम्राज्य: मथुरा, कांतिपुरी और प्रयाग भारशिव-नाग राजाओं के प्रमुख केंद्र थे। राजा नवनाग और वीरसेन ने शकों को हराकर 10 अश्वमेध यज्ञ किए थे। प्रयागराज का नाग वासुकी मंदिर और वाराणसी का तक्षकेश्वर मंदिर। इन मंदिरों का जीर्णोद्धार मराठा काल और गुप्त काल में हुआ।. मध्य प्रदेश नाग साम्राज्य: पद्मावती (आधुनिक ग्वालियर/पवाया) नागवंशियों की राजधानी थी। उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर परिसर में स्थित नागचंद्रेश्वर मंदिर। परमार राजाओं द्वारा निर्मित यह मंदिर केवल नाग पंचमी के दिन (24 घंटे के लिए) खुलता है। इसके अलावा पचमढ़ी में गोंड राजाओं द्वारा संरक्षित नागद्वार गुफा मंदिर स्थित है। बिहार और झारखंड।नाग साम्राज्य: मगध क्षेत्र में प्राचीन नाग शासकों का प्रभाव था। वहीं झारखंड में नागवंशी साम्राज्य की स्थापना प्रथम शताब्दी में राजा फणिमुकुट राय ने की थी। झारखंड राज्य का दुमका जिले के जरमुंडी प्रखंड में स्थित वासुकीनाथ मंदिर में बाबा बासुसुकी नाग शिवलिंग स्थापित है ।प्रमुख मंदिर: बिहार के राजगीर में स्थित मनियार मठ गुप्तकालीन बेलनाकार ईंटों से बना प्राचीन नाग मंदिर है। झारखंड में रांची के निकट सुतियांबे और जगन्नाथपुर नाग पीठ प्रसिद्ध हैं। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश।नाग साम्राज्य: गढ़वाल और कुमाऊँ क्षेत्र में कत्युरी राजवंश के समय नाग जातियों का व्यापक प्रभाव रहा। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में बेरीनाग, धौलीनाग, कालीनाग और फेनिनाग मंदिर स्थित हैं।. राजस्थान और गुजरात नाग साम्राज्य: राजस्थान में नागवंशी वीरों का संबंध लोक-देवताओं से जुड़ा है। ददरेवा (चूरू) और खड़नाल में गोगाजी और तेजाजी महाराज के मंदिर हैं जहाँ उन्हें नाग-अवतार माना जाता है। गुजरात के कच्छ में भुजिया नाग मंदिर (भुज किला) और द्वारका में नागनाथ मंदिर स्थापित हैं। महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ का नाग साम्राज्य: छत्तीसगढ़ के कवर्धा में फणि-नागवंश ने 11वीं शताब्दी में शासन किया। छत्तीसगढ़ में भोरमदेव मंदिर समूह नागवंशी वास्तुकला का अनुपम उदाहरण है। महाराष्ट्र के सांगली में बत्तीसा शिराला नाग पूजा का एक ऐतिहासिक स्थल है।. दक्षिण भारतीय राज्य (कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना का नाग साम्राज्य: कदंब, गंग, चोल और त्रावणकोर राजवंशों ने नाग संस्कृति को राजसी संरक्षण दिया। केरल: अलप्पुझा का मन्नारसला नागराज मंदिर 16 एकड़ के प्राकृतिक नाग-वन (सर्पकावु) में फैला है जहाँ 30,000 से अधिक सर्प प्रतिमाएँ हैं। कर्नाटक: कुक्के सुब्रमण्यम मंदिर जहाँ वासुकी नाग की शरणस्थली मानी जाती है।।तमिलनाडु: कन्याकुमारी का नागरकोविल नागराज मंदिर। आंध्र प्रदेश: कृष्णा जिले का मोपिदेवी नाग मंदिर। जम्मू और कश्मीर एवं नागालैंड का नाग साम्राज्य: कश्मीर में 7वीं-8वीं शताब्दी में कार्कोट नाग साम्राज्य (महाराजा ललितादित्य मुक्तापीड) का शासन था, जिन्होंने कश्मीर को जल-प्रबंध और विद्या का केंद्र बनाया। अनंतनाग और वेरीनाग कुंड मंदिर। नागालैंड का नामकरण और वहाँ की जनजातीय परंपराएँ प्राचीन नाग संस्कृति का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। पंजाब, दिल्ली और हरियाणा का असन्ध (आसंदिवत) क्षेत्र महाभारत कालीन सर्प यज्ञ की भूमि माना जाता है। दिल्ली के मेहरौली क्षेत्र में तोमर राजाओं के समय से पाताल-नाग और योगमाया स्थल नाग परंपरा से जुड़े हैं।
संप्रदायों, धार्मिक दर्शनों एवं जीवन-तत्वों में नागपंचमी का महत्व - नाग संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सर्वसमावेशी प्रकृति है। यह भारत के प्रत्येक संप्रदाय, दर्शन और प्रकृति के तत्वों के साथ गहराई से रची-बसी है: शैव संप्रदाय: भगवान शिव 'नागभूषण' हैं। उनके गले में वासुकी नाग विराजमान हैं। नागपंचमी के दिन शिव और नाग की संयुक्त पूजा जीव और ईश्वर के अभेद संबंध को दर्शाती है। वैष्णव संप्रदाय: भगवान विष्णु शेषनाग पर शयन करते हैं। द्वापर युग में शेषनाग ही श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता बलराम के रूप में अवतरित हुए। नागपंचमी पर बलराम जी और शेषनाग की पूजा वैष्णव परंपरा का मुख्य अंग है। शाक्त संप्रदाय: शाक्त दर्शन में मानव शरीर के भीतर स्थित कुंडलिनी शक्ति को सुप्त सर्पिणी के रूप में देखा गया है। नागपंचमी पर साधना से यह शक्ति जागृत होती है। इसके अतिरिक्त, देवी मनसा (नागेश्वरी) की पूजा शाक्त परंपरा में विष-निवारण के लिए की जाती है। सौर और ब्रह्म संप्रदाय: सूर्य पुराण के अनुसार, सूर्य देव के रथ की रश्मियों में नागों का निवास है जो ब्रह्मांड में ऊर्जा का संचरण करते हैं। ब्रह्मा जी ने नागों को पाताल लोक का अधिपति बनाकर भूगर्भीय संतुलन का दायित्व सौंपा था। देव, मनु और ऋषि: वैवस्वत मनु ने जलप्रलय के समय अपनी नौका को वासुकी नाग की रज्जु (रस्सी) से बाँधकर मानव जाति के बीज की रक्षा की थी। महर्षि कश्यप और ऋषि आस्तिक नाग संस्कृति के बौद्धिक और नैतिक संरक्षक रहे हैं। जल एवं वायु (पर्यावरण संतुलन): प्राचीन काल से ही नागों को जलस्रोतों (बावड़ी, कुएँ, नदियाँ, कुंड) का रक्षक माना गया है। वैज्ञानिक रूप से भी सर्प भूमिगत पर्यावरण और वायु में बदलाव के प्रति अत्यंत संवेदनशील होते हैं। तरु (वृक्ष) संस्कृति: नागपंचमी का पर्व वृक्ष पूजा से सीधे जुड़ा है। दक्षिण भारत और ग्रामीण भारत में पीपल, नीम और बरगद के वृक्षों के नीचे नाग प्रतिमाओं (नागकल) की स्थापना की जाती है। यह परंपरा वनों के संरक्षण का संदेश देती है।
पौराणिक आख्यानों में नागों का स्थान देवताओं और असुरों दोनों के मध्य एक सेतु का रहा है। समुद्र मंथन के समय वासुकी नाग ने स्वयं को मध्यस्थ बनाकर देवताओं और दानवों दोनों का सहयोग प्राप्त किया। नागपंचमी यह सिखाती है कि विरोधी विचारधाराओं के बीच भी सहयोग है। आधुनिक युग में नाग पंचमी का महत्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित हीं है, बल्कि इसके व्यावहारिक और पारिस्थितिकीय आयाम भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:।पारिस्थितिकी संतुलन एवं कृषक मित्र है। सांप खाद्य श्रृंखला के अत्यंत महत्वपूर्ण घटक हैं। ये खेतों में फसलों को नष्ट करने वाले चूहों और कीटों को नियंत्रित करते हैं। इसलिए नागपंचमी वास्तव में कृषि और पर्यावरण सुरक्षा का पर्व है। नागपंचमी के दिन "भूमि की खुदाई न करने" का प्राचीन नियम लागू होता है। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण यह है कि वर्षा ऋतु (सावन) में सर्पों के बिलों में पानी भर जाता है और वे बाहर या जमीन के ऊपरी स्तर पर होते हैं। खुदाई न करने से इन असहाय जीवों की जान बचती है।: जिस दौर में पश्चिमी दुनिया सर्पों को केवल 'विषैला और पाप का प्रतीक' मानती थी, उस दौर में भारतीय संस्कृति ने विषधर जीव में भी ईश्वर का रूप देखकर उसकी रक्षा का नियम बनाया। नागपंचमी "जियो और जीने दो" का सर्वकालिक संदेश देती है।
मन्वंतर के पौराणिक युग से लेकर आधुनिक काल तक, नाग संस्कृति भारत की उस विशाल चेतना का प्रतीक है जो विष में भी अमृत और भयावह जीवों में भी शिवत्व की खोज कर लेती है। राजा जनमेजय के यज्ञ को रोककर आस्तिक मुनि द्वारा नागों को अभयदान दिलाने की घटना आज के आधुनिक युग में जैव-विविधता और पर्यावरण संरक्षण का सबसे पहला और ऐतिहासिक उदाहरण है। नाग पंचमी केवल नागों की पूजा का दिन नहीं है, बल्कि यह मनुष्य, प्रकृति, जीव-जंतु और धर्म के बीच सह-अस्तित्व के सनातन सूत्र को नया जीवन देने का संकल्प-दिवस है।