शुक्रवार, जून 26, 2026

पाटलिपुत्र से पटना तक की विरासत

पाटलिपुत्र से आधुनिक  पटना।
- सत्येन्द्र कुमार पाठक 
 वैश्विक सभ्यता का पालना और 'पाटलिग्राम' का उदय में बिहार की राजधानी पटना का इतिहास केवल एक नगर की भौगोलिक सीमा का विवरण नहीं है, बल्कि यह भारतीय उपमहाद्वीप के राजनैतिक अभ्युदय, आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की जीवंत गाथा है। गंगा, सोन और गंडक जैसी पवित्र नदियों के संगम पर स्थित यह भूभाग प्राचीन काल से ही वैश्विक ज्ञान और सत्ता का केंद्र रहा है। पाटलिपुत्र  नगर की यात्रा ईसा पूर्व 5वीं शताब्दी (लगभग 450 ई.पू.) में शुरू हुई, जब मगध साम्राज्य के हर्यक वंश के प्रतापी राजा अजातशत्रु ने वैशाली के शक्तिशाली लिच्छवियों के संभावित आक्रमणों से अपने राज्य की सुरक्षा के लिए यहाँ गंगा के तट पर 'पाटलिग्राम' के रूप में एक सैनिक छावनी (जलदुर्ग) का निर्माण करवाया था। अजातशत्रु के दूरदर्शी पुत्र राजा उदयन ने इस स्थान के अद्वितीय सामरिक (Strategic) और व्यापारिक महत्व को समझा। उन्होंने मगध की राजधानी को पहाड़ियों से घिरे 'राजगृह' (राजगीर) से स्थानांतरित कर पाटलिपुत्र में स्थापित किया। आगे चलकर यह नगर मौर्य, शुंग और गुप्त जैसे महान राजवंशों के अधीन अखंड भारत की एक महाशक्तिशाली साम्राज्यिक राजधानी के रूप में प्रदीप्त हुआ, जहाँ चाणक्य, चन्द्रगुप्त, सम्राट अशोक और आर्यभट्ट जैसे युगपुरुषों ने अपनी कर्मभूमि बनाई। 
गुप्त साम्राज्य के अवसान और पाल वंश के बाद समय के थपेड़ों के कारण इस ऐतिहासिक नगर का गौरव कुछ समय के लिए धुंधला पड़ गया था। मध्यकाल में इस खोई हुई भौगोलिक और प्रशासनिक महत्ता को पुनः स्थापित करने का श्रेय अफगान शासक शेरशाह सूरी को जाता है। वर्ष 1541 ईस्वी में शेरशाह सूरी ने प्राचीन पाटलिपुत्र के खंडहरों के समीप गंगा नदी के तट की रणनीतिक स्थिति को पुनः पहचाना। उन्होंने यहाँ एक बेहद मजबूत और भव्य दुर्ग का निर्माण कराया और इसे बिहार की प्रांतीय राजधानी घोषित किया। इसी कालखंड के दौरान, व्यापारिक केंद्रों, घाटों और बंदरगाहों के लिए प्रयुक्त होने वाले संस्कृत शब्द 'पत्तन' से प्रेरित होकर इस नगर का नाम 'पाटलिपुत्र' से बदलकर 'पटना' के रूप में सर्वमान्य और स्थापित हो गया।
. ब्रिटिश काल और आधुनिक बिहार का अभ्युदय (1912) - 20वीं शताब्दी की शुरुआत पटना के आधुनिक इतिहास का सबसे स्वर्णिम और निर्णायक मोड़ साबित हुई। वर्ष 1911 के ऐतिहासिक दिल्ली दरबार में वाइसराय लॉर्ड हार्डिंग द्वारा ब्रिटिश हुकूमत (जॉर्ज पंचम की शाही घोषणा) के माध्यम से बिहार को अलग प्रांत बनाने की रूपरेखा तैयार की गई। परिणामस्वरूप, 22 मार्च 1912 को बिहार और उड़ीसा को बंगाल प्रेसीडेंसी से पृथक कर एक नए राज्य का दर्जा दिया गया।
01 अप्रैल 1912 को तत्कालीन पटना शहर को बिहार  नए राज्य का मुख्य प्रशासनिक केंद्र और राजधानी घोषित किया गया। वर्ष 1936 में उड़ीसा के अलग होने और वर्ष 2000 में झारखंड राज्य के निर्माण के बाद भी पटना निरंतर बिहार के मुख्य प्रशासनिक, आर्थिक, न्यायिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में अडिग और जीवंत बना रहा। प्रशासनिक रूप में 1912 से लेकर भारतीय गणतंत्र के गठन (1950) तक का कालखंड पटना का "स्वर्णिम युग" माना जाता है, जिसमें इसका प्रशासनिक स्वरूप पूरी तरह बदल गया:  क्षेत्रफल का विस्तार और 'न्यू कैपिटल एरिया' 1912 की स्थिति: तत्कालीन पटना मुख्य रूप से पूर्वी हिस्से (आज का सिटी इलाका, बांकीपुर और पुरानी बाज़ार की संकरी सड़कों) तक सिमटा हुआ था, जिसका कुल क्षेत्रफल लगभग 9 से 10 वर्ग मील था।
1950 तक की स्थिति: जब ब्रिटिश सरकार ने पश्चिम की ओर 'न्यू कैपिटल एरिया' (नया प्रशासनिक क्षेत्र) विकसित करना शुरू किया, तो शहर का झुकाव तेजी से पश्चिम की तरफ हुआ। राजभवन, सचिवालय, गोल्फ क्लब और असेंबली (विधानसभा) जैसे क्षेत्रों के निर्माण के बाद 1950 तक पटना नगर पालिका और उसके आसपास के शहरी विकास का कुल क्षेत्रफल बढ़कर लगभग 20 से 22 वर्ग मील (लगभग 52 से 57 वर्ग किलोमीटर) हो गया था। प्रशासनिक सुदृढ़ीकरण और प्रमंडल व्यवस्था -  ब्रिटिश शासनकाल में प्रशासनिक सुगमता के लिए 1829 में कमिश्नरियों का गठन किया गया था, जिसके तहत पटना को प्रमंडल का मुख्यालय बनाया गया। 1912 में बिहार के गठन के बाद इस व्यवस्था को और सुदृढ़ किया गया। कमिश्नर का कार्यालय बांकीपुर (गांधी मैदान के पास) में केंद्रित रहा। : वर्तमान में प्रशासनिक स्वरूप के तहत पटना प्रमंडल के अंतर्गत 6 जिले (पटना, नालंदा, भोजपुर, बक्सर, रोहतास और कैमूर) आते हैं, जबकि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से मगध प्रमंडल के जिले (गया, नवादा, औरंगाबाद, जहानाबाद और अरवल) भी इसके प्रभाव क्षेत्र से निरंतर जुड़े रहे हैं। पटना जिला मुख्यालय: औपचारिक रूप से 1825 के आसपास एक प्रशासनिक जिले के रूप में स्थापित पटना का कलेक्टॉरेट (गंगा तट के किनारे) जिला प्रशासन का मुख्य केंद्र बना रहा, जिसके तहत जिला अदालतों और सिविल लाइंस का विस्तार हुआ था । 
आधुनिक पटना के चार स्थापत्य स्तंभ 1912 से 1950 के बीच निर्मित पटना के प्रमुख प्रशासनिक, न्यायिक और शैक्षणिक भवनों का इतिहास केवल वास्तुकला का उदाहरण नहीं है, बल्कि यह आधुनिक बिहार के उदय और उसकी अस्मिता की कहानी है: पटना उच्च न्यायालय  – न्याय का भव्य प्रतीक बंगाल से अलग होने के बाद बिहार को अपने एक स्वतंत्र उच्च न्यायालय की आवश्यकता थी। इसके लिए पटना के पश्चिमी हिस्से (न्यू कैपिटल एरिया) को चुना गया। इसका शिलान्यास 1 दिसंबर 1913 को तत्कालीन वाइसराय लॉर्ड हार्डिंग द्वारा किया गया और 3 फरवरी 1916 को इसका भव्य उद्घाटन हुआ था ।  इसके मुख्य डिजाइनकार न्यूजीलैंड के प्रसिद्ध वास्तुकार जे. एफ. मुिंग्स  थे और सहयोगी के रूप में ए. एम. मिलवुड (A. M. Millwood) ने काम किया। यह भवन 'नियो-क्लासिकल' (Neo-Classical Style) और यूरोपीय पुनर्जागरण काल (Renaissance style) की शैली पर आधारित है। इसे मुख्य रूप से 'E' आकार में डिजाइन किया गया है, जो 'England' या 'Executive' का प्रतीक माना जाता है। इसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश सर एडवर्ड चामियर थे, जबकि बाद में सर सुल्तान अहमद इसके पहले भारतीय मुख्य न्यायाधीश बने।
. पटना सचिवालय – सत्ता और प्रशासन का केंद्र बिहार प्रांत के प्रशासनिक कार्य को एक छत के नीचे लाने के लिए इस विशाल भवन का निर्माण 1913 से 1915 के बीच कराया गया और 1917 तक यह पूरी तरह क्रियाशील हो गया था। इसे भी वास्तुकार  जे. एफ. मुिंग्स ने ही डिजाइन किया था और निर्माण का कार्य कलकत्ता की प्रसिद्ध फर्म 'मार्टिन एंड कंपनी' को सौंपा गया था। यह भवन इण्डो-सारसेनिक  और पुनर्जागरण शैली का अद्भुत मिश्रण है। यह लगभग 716 फीट लंबा है। इसके ठीक पीछे एक विशाल क्लॉक टावर (घंटाघर) बनाया गया था, जो 1934 के विनाशकारी भूकंप में क्षतिग्रस्त हो गया था, जिसे बाद में छोटा किया गया। इसी भवन के मुख्य द्वार के सामने 'शहीद स्मारक' (Martyrs' Memorial) स्थित है, जो 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान सचिवालय पर तिरंगा फहराने की कोशिश में शहीद हुए 7 वीर छात्रों की अमर शहादत की याद दिलाता है।  पटना विश्वविद्यालय  – 'पूर्व का ऑक्सफोर्ड' अक्टूबर 1917 में स्थापित पटना विश्वविद्यालय, भारतीय उपमहाद्वीप का 7वां सबसे पुराना विश्वविद्यालय है। गंगा नदी के सुरम्य तट पर स्थित इसके भवनों का निर्माण शिक्षा के प्रति बिहार के समर्पण को दर्शाता है।  इसके अंतर्गत 1926 में निर्मित 'व्हीलर सीनेट हाउस' विश्वविद्यालय की रीढ़ बना, जिसका नाम तत्कालीन चांसलर सर हेनरी व्हीलर के नाम पर रखा गया था और इसका उद्घाटन राजा देवकी नंदन प्रसाद सिंह के आर्थिक सहयोग से हुआ था। इसके अतिरिक्त पटना कॉलेज (स्थापित 1863) का भवन डच वास्तुकला (Dutch Architecture) से प्रभावित है, जहाँ कभी डच व्यापारियों की फैक्ट्री हुआ करती थी। 1927 में स्थापित 'पटना साइंस कॉलेज' का उद्घाटन 1928 में लॉर्ड इर्विन ने किया था, जिसकी इमारतें यूरोपीय क्लासिकल शैली में बनी हैं। इसकी शैक्षणिक उच्चता के कारण इसे "पूर्व का ऑक्सफोर्ड" कहा जाने लगा।।सिन्हा लाइब्रेरी – ज्ञान और वैचारिक क्रांति की भूमि आधुनिक बिहार के निर्माता डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती राधिका सिन्हा की दूरदर्शिता का परिणाम यह पुस्तकालय है, जिसकी स्थापना 1924 में हुई थी। आधिकारिक तौर पर इसे 'श्रीमती राधिका सिन्हा इंस्टीट्यूशन' कहा जाता है।: डॉ. सिन्हा ने अपनी स्वयं की अर्जित अकूत और दुर्लभ पुस्तकों का संग्रह, अपनी भूमि और भवन इस पुस्तकालय को दान कर दिया। 1930 और 1940 के दशक में यह पुस्तकालय केवल किताबों का घर नहीं, बल्कि बिहार के स्वतंत्रता सेनानियों और राजनेताओं ( जयप्रकाश नारायण, डॉ. श्रीकृष्ण सिंह) की गुप्त बैठकों और वैचारिक विमर्श का मुख्य केंद्र हुआ करता था।
 आधुनिक पटना के निर्माता: महापुरुषों का अमूल्य योगदान - पटना को बिहार की धड़कन और आधुनिक नागरिक स्वरूप देने में राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर के कई दूरदर्शी राजनेताओं, शिक्षाविदों और समाजसेविदों का अमूल्य योगदान रहा है: सच्चिदानंद सिन्हा: इन्हें "आधुनिक बिहार का निर्माता" कहा जाता है। उन्होंने बंगाल से बिहार को अलग करने की लंबी कानूनी और राजनैतिक लड़ाई लड़ी। शिक्षा के क्षेत्र में उनका अवदान अतुलनीय है। लॉर्ड हार्डिंग (तत्कालीन वाइसराय): 1911 के दिल्ली दरबार में बिहार को अलग प्रांत बनाने की घोषणा कराने और पटना में नए प्रशासनिक भवनों (हाईकोर्ट, सचिवालय) की रूपरेखा तैयार करवाने में इनकी मुख्य भूमिका थी। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद: देश के प्रथम राष्ट्रपति। उन्होंने पटना को अपनी कर्मभूमि बनाया, सदाकत आश्रम (1921) से स्वतंत्रता संग्राम का संचालन किया और पटना विश्वविद्यालय के सीनेट के सक्रिय सदस्य रहकर यहाँ की शैक्षणिक नीतियों को दिशा दी। डॉ. श्रीकृष्ण सिंह (श्रीबाबू) और अनुग्रह नारायण सिंह (बिहार विभूति): 1937 की अंतरिम सरकार और 1946 के बाद मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री के रूप में, इन दोनों नेताओं ने 1950 तक पटना के औद्योगिकीकरण, शैक्षणिक संस्थानों को सुदृढ़ करने और राजधानी के नागरिक ढांचे को आधुनिक बनाने की नींव रखी। मौलाना मज़हरुल हक़: महान स्वतंत्रता सेनानी और सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक। उन्होंने असहयोग आंदोलन के दौरान पटना में सदाकत आश्रम और बिहार विद्यापीठ की स्थापना के लिए अपनी ज़मीन दान कर दी थी। सर सुल्तान अहमद: पटना उच्च न्यायालय के पहले भारतीय मुख्य न्यायाधीश और पटना विश्वविद्यालय के कुलपति थे। उन्होंने पटना में उच्च शिक्षा के स्तर को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहुँचाने में अभूर्व योगदान दिया।
सैयद हसन इमाम: प्रसिद्ध बैरिस्टर और कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। पटना में नागरिक अधिकारों की रक्षा और आधुनिक विचारों के प्रसार में इनका बड़ा नाम था। सर गणेश दत्त सिंह: बिहार के तत्कालीन स्थानीय स्वशासन मंत्री थे। उन्होंने अपने वेतन का एक बड़ा हिस्सा पटना विश्वविद्यालय और पटना मेडिकल कॉलेज और अस्पताल, स्थापित 1925, पूर्व नाम 'प्रिंस ऑफ वेल्स मेडिकल कॉलेज') जैसी संस्थाओं को दान कर दिया, जिससे गरीब छात्रों को छात्रवृत्ति और चिकित्सा शिक्षा को बढ़ावा मिला।
 साहित्यिक पुनर्जागरण, पत्रकारिता और भाषाई साधना - 1912 से 1950 के बीच पटना का विकास केवल ईंट-पत्थरों के भवनों का निर्माण नहीं था, बल्कि यह बिहार की अस्मिता, आधुनिक शिक्षा, और साहित्यिक चेतना के उदय का काल था। इस दौरान पटना हिंदी, संस्कृत और उर्दू साहित्य के एक बड़े गढ़ के रूप में स्थापित हुआ: आचार्य शिवपूजन सहाय (1893–1963): इन्हें हिंदी साहित्य का 'सच्चा सेवादार' और 'भाषा का जादूगर' कहा जाता है। 1912 से 1950 के बीच पटना को हिंदी पत्रकारिता और साहित्य का केंद्र बनाने में इनका सबसे बड़ा हाथ था। इन्होंने पटना से निकलने वाली प्रसिद्ध पत्रिकाओं 'मारवाड़ी सुधार', 'गोलमाल', 'उपन्यास तरंग' और 'बालक' (बच्चों की कालजयी पत्रिका) का संपादन किया। 1947 में स्थापित 'बिहार राष्ट्रभाषा परिषद' (पटना) के निर्माण और उसकी रूपरेखा तैयार करने में इनका ऐतिहासिक योगदान था। इन्होंने रामवृक्ष बेनीपुरी, कंचननाथ झा और पंडित जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी जैसे अनगिनत युवा लेखकों को तराशा।
आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री (1916–2011): छायावादोत्तर काल के महान कवि, गीतकार और संस्कृत के प्रकांड विद्वान। यद्यपि इनका मुख्य केंद्र मुजफ्फरपुर रहा, लेकिन पटना के साहित्यिक समाज को इन्होंने अपने गीतों और काव्यों (जैसे 'काकली', 'रूप अरूप') से अत्यधिक समृद्ध किया। महाप्राण निराला के प्रिय रहे शास्त्री जी ने बिहार में गीति-काव्य की एक नई धारा प्रवाहित की। पंडित रामदयाल पांडेय (1915–1972): बिहार में राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार के पुरोधा और 'बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन' (पटना) के प्रमुख कर्णधारों में से एक थे। इन्होंने 'राष्ट्रभाषा' पत्रिका का कुशल संपादन किया और अपनी ओजस्वी कविताओं से युवाओं में राष्ट्रभक्ति का संचार किया। प्रो. बद्रीनाथ वर्मा (1889–1972): प्रख्यात शिक्षाविद, साहित्य प्रेमी और स्वतंत्रता के बाद बिहार के पहले शिक्षा मंत्री (1946-1961)। शिक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने पटना विश्वविद्यालय को सुदृढ़ किया और 'बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना' तथा 'काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान' की स्थापना कराई, जिसने हिंदी और शोध के क्षेत्र में वैश्विक कीर्तिमान स्थापित किया। बाबू वीर कुंवर सिंह (1777–1858) और जीवधर सिंह का प्रभाव: यद्यपि बाबू वीर कुंवर सिंह 1857 की क्रांति के महानायक थे, लेकिन उनकी वीरता ने आधुनिक बिहार के पूरे साहित्य को प्रेरित किया। 1912 से 1950 के बीच पटना और बिहार के कवियों ( मनोरंजन प्रसाद सिंह की कविता "नमन करूँ मैं उस वीर को...") ने कुंवर सिंह को केंद्र में रखकर वीर रस के अप्रतिम साहित्य की रचना की। स्वतंत्रता सेनानी जीवधर सिंह ने भी अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों और वैचारिक लेखों से तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं और लोक-साहित्य को गहराई से प्रभावित किया। राजसी रियासतें और उनका साहित्यिक 1912 से 1950 के संक्रमण काल में जब हिंदी और संस्कृत के साहित्यकारों के पास आजीविका का संकट था, तब बिहार की समृद्ध रियासतों ने आर्थिक उदारता दिखाकर साहित्य, प्रेस और शिक्षा को जीवित रखा:
दरभंगा राज और महाराजा सर कामेश्वर सिंह (1907–1962): दरभंगा राज भारत में संस्कृत, मैथिली और हिंदी साहित्य का सबसे बड़ा संरक्षक था। महाराजा कामेश्वर सिंह ने पटना से निकलने वाले प्रसिद्ध अंग्रेजी समाचार पत्र 'The Searchlight' (द सर्चलाइट) और 'The Indian Nation' (द इंडियन नेशन) तथा हिंदी के 'आर्यावर्त' को आर्थिक संरक्षण और जीवन दिया। उनके दरबार और संरक्षण से महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' और राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' जैसे दिग्गज जुड़े रहे।
टिकारी राज (गया / पटना क्षेत्र): गया और पटना की सीमा पर स्थित टिकारी राज के महाराजाओं ने कला, संगीत और साहित्य को खूब बढ़ावा दिया। प्रसिद्ध छायावादी कवि महाराज गोपाल शरण सिंह (जिन्होंने 'माधवी', 'कादम्बिनी' जैसी कृतियाँ लिखीं) इसी राज परिवार से थे। इनके काल में खड़ी बोली हिंदी के कई कवियों को राज्याश्रय मिला और टिकारी राज ने पटना के कई प्रकाशनों को आर्थिक मदद दी।
बेतिया राज की महारानी जानकी कुंवर के समय में इस राज ने उत्तर बिहार और पटना के साहित्यिक आयोजनों को हमेशा आर्थिक संबल दिया। बेतिया राज के संरक्षण में 'बेतिया घराना' (ध्रुपद गायन) फला-फूला, जिसने संगीत शास्त्र और कला पर कई महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना करवाई।  बड़ौदा राज गुजरात में था, लेकिन इसके महान शासक महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय का आधुनिक बिहार और पटना के निर्माताओं से गहरा संबंध था। उन्होंने डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा के प्रयासों और बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर की उच्च शिक्षा में आर्थिक मदद की थी। बड़ौदा राज की 'गायकवाड़ ओरिएंटल सीरीज' से प्रेरित होकर ही पटना में प्राच्य (Oriental) और ऐतिहासिक ग्रंथों के संपादन-प्रकाशन की प्रेरणा मिली।
 1912 से 1950 के बीच का पटना केवल एक प्रशासनिक राजधानी मात्र नहीं था, बल्कि यह बिहार की अस्मिता, न्याय, आधुनिक शिक्षा, और प्रखर राजनीतिक व साहित्यिक चेतना के अभ्युदय का जीवंत कालखंड था। सच्चिदानंद सिन्हा से लेकर डॉ. श्रीकृष्ण सिंह तक के दूरदर्शी राजनैतिक नेतृत्व; दरभंगा राज और टिकारी राज जैसी रियासतों की आर्थिक उदारता; बद्रीनाथ वर्मा की प्रशासनिक दूरदर्शिता और आचार्य शिवपूजन सहाय, रामदयाल पांडेय, जानकी बल्लभ शास्त्री तथा रामधारी सिंह दिनकर जैसे महामनीषियों की निश्छल और अनवरत साहित्याराधना का ही यह सामूहिक अवदान था, जिसने पटना को एक ऐसा मजबूत सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और बौद्धिक आधार दिया, जिस पर आज का आधुनिक बिहार गर्व से खड़ा है।

मंगलवार, जून 23, 2026

उमंगा पर्वत समूह की सांस्कृतिक विरासत

देवालयों और सांस्कृतिक संगम उमंगा पर्वत समूह 
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
बिहार की ऐतिहासिक भूमि का नाम आते ही अक्सर हमारा ध्यान नालंदा, सीतामढ़ी , गया , राजगीर, बोधगया या वैशाली की ओर चला जाता है। परंतु मगध के आंचल में कई ऐसे अनमोल रत्न छिपे हैं, जो अपने भीतर सदियों का इतिहास समेटे मौन खड़े हैं। ऐसा ही एक अद्भुत, रहस्यमयी और सांस्कृतिक रूप से अत्यंत समृद्ध स्थल है— औरंगाबाद जिले के मदनपुर प्रखंड में स्थित उमगा (उमंगा) पर्वत समूह। ग्रांड ट्रंक रोड  से महज डेढ़ किलोमीटर दक्षिण की ओर मुड़ते ही आधुनिकता का शोर पीछे छूट जाता है और सामने गर्व से सिर उठाए खड़ी विंध्य श्रृंखला की यह पहाड़ी अपनी बाहें फैलाए आपका स्वागत करती है। उमगा केवल पत्थरों का एक ढेर या कोई साधारण पहाड़ी नहीं है; यह भारत की सनातनी चेतना के सात स्तंभों— सौर (सूर्य), शाक्त (देवी), ब्रह्म (ब्रह्मा), शैव (शिव), वैष्णव (विष्णु), जल और वृक्ष संस्कृति का एक ऐसा सघन और अनूठा संगम है, जिसकी मिसाल पूरी दुनिया में विरली ही मिलती है। स्थापत्य कला के दृष्टिकोण से इसे 'मगध का कोणार्क' या 'दूसरा देव' कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगी। जब हम उमगा की तलहटी में खड़े होकर ऊपर की ओर देखते हैं, तो इसकी विशालता का अहसास होता है। भौगोलिक और पुरातात्विक सर्वेक्षणों के अनुसार, उमगा पर्वत समूह और उसकी तलहटी का मुख्य ऐतिहासिक व पुरातात्विक कोर क्षेत्र  5 से 7 वर्ग किलोमीटर के घेरे में फैला हुआ है। यदि इसके संपूर्ण वन क्षेत्र और ऐतिहासिक भग्नावशेषों के फैलाव को मापा जाए, तो यह लगभग 1,200 से 1,500 एकड़ की विस्तृत और दुर्गम भूमि पर फैला है। इस पूरे पर्वत समूह को ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों के बिखराव के आधार पर मुख्य रूप से तीन वर्ग क्षेत्रों (Zones) में विभाजित कर समझा जा सकता है । यह वह क्षेत्र है जहाँ से पर्वत की चढ़ाई शुरू होती है। यहाँ समतल भूमि पर स्थापत्य कला का सबसे भव्य और सुरक्षित ढांचा विद्यमान है। काले ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित मुख्य सूर्य मंदिर (जो पूर्व में एक भव्य वैष्णव पीठ था), विशाल गरुड़ स्तंभ, राजा भैरवेंद्र का ऐतिहासिक शिलालेख और राजा ऐल के नाम से जुड़ा प्राचीन सूर्य कुंड इसी क्षेत्र की शोभा बढ़ाते है। पहाड़ी की घुमावदार ढलानों, घने जंगलों और झाड़ियों के बीच का यह क्षेत्र प्राचीन काल में 'देव-कानन' (पवित्र वनों) का हिस्सा था। यहाँ कदम-कदम पर पालकालीन और उत्तर-मध्यकालीन 52 मंदिरों के बिखरे हुए पत्थरों के अवशेष, चौखटें, स्तंभ और खंडित मूर्तियाँ दिखाई देती हैं। यहाँ घूमते हुए ऐसा प्रतीत होता है मानो हम किसी प्राचीन मलबे पर नहीं, बल्कि इतिहास के पन्नों पर चल रहे है। उमंगा का राजा दुर्दम पाल द्वारा 1050 ई में 
समुद्र तल से सैकड़ों फीट की ऊंचाई पर स्थित यह क्षेत्र उमगा की आत्मा है। यहाँ तक पहुँचने के लिए लगभग 5 किलोमीटर का कठिन और घुमावदार पहाड़ी रास्ता (ट्रैकिंग रूट) पार करना पड़ता है। यह क्षेत्र अनादि काल से तांत्रिकों, सिद्ध ऋषियों और योगियों की साधना स्थली रहा है। यहीं पर आदि शक्ति माँ उमंगेश्वरी की प्राकृतिक गुफा-पीठ, सहस्त्र लिंगेश्वर महादेव और गौरी-शंकर की रहस्यमयी गुफाएं स्थित हैं। उमंगा' शक्ति, तंत्र और नामकरण की अंतःकथा - इस पर्वत समूह के नाम 'उमगा' या 'उमंगा' के पीछे एक अत्यंत सुंदर आध्यात्मिक और पौराणिक संदर्भ है। 'उमंगा' कोई लौकिक स्त्री या रानी नहीं थीं, बल्कि वे इस पर्वत की अधिष्ठात्री देवी, साक्षात आदि शक्ति माँ उमंगेश्वरी हैं। शब्दार्थ के दृष्टिकोण से 'उमंगा' का अर्थ है— वह चेतना या देवी जो सदैव परम आनंद, उल्लास और उमंग में मग्न रहती हैं। स्थानीय लोक-श्रुतियों और तांत्रिक ग्रंथों के अनुसार, सतयुग में जब माता सती (आदि शक्ति) इस घने विंध्य-मगध वन क्षेत्र से गुजर रही थीं, तो यहाँ की प्राकृतिक छटा और शांत वातावरण को देखकर वे अत्यंत भाव-विभोर और 'उमंग' (प्रसन्नचित्त) मुद्रा में आ गईं। उन्होंने इसी पर्वत को अपनी क्रीड़ा और साधना स्थली चुना। बाद में भगवान शिव स्वयं यहाँ पधारे और उन्हें इस पर्वत की सर्वोच्च चोटी पर ले गए। माँ उमंगेश्वरी का मंदिर कोई आधुनिक ईंट-गारे से बना ढांचा नहीं है। यह प्रकृति द्वारा निर्मित एक अद्भुत चमत्कार है। हजारों टन वजनी विशालकाय पत्थरों की एक प्राकृतिक गुफा के भीतर माता की पिंड-स्वरूप प्रतिमा स्थापित है। यह स्थल अनादि काल से वामाचार और दक्षिणाचार तंत्र साधना का एक गुप्त और अत्यंत जाग्रत केंद्र रहा है। नाथ संप्रदाय के योगियों और सिद्ध संतों ने इस गुफा में बैठकर सदियों तक तपस्या की, जिसके कारण इस पूरे पर्वत का नाम 'उमंगा पर्वत' पड़ा है। 
उमगा पर्वत समूह का इतिहास किसी एक राजा या एक साम्राज्य की कहानी नहीं है। यह मगध के राजनैतिक उत्थान-पतन और सांस्कृतिक बदलावों की एक अनवरत श्रृंखला है । मौर्य काल:में  सामरिक मार्ग और भिक्षुओं का आश्रय - ईसा पूर्व चौथी से दूसरी शताब्दी के दौरान, मौर्य साम्राज्य के समय यह क्षेत्र मगध की राजधानी पाटलिपुत्र के बेहद करीब होने के कारण राजनैतिक और व्यापारिक रूप से महत्वपूर्ण था। यह पहाड़ी उस समय के प्रमुख व्यापारिक मार्गों के समीप स्थित थी। मौर्य काल में बौद्ध और आजीविक भिक्षुओं ने उमगा की प्राकृतिक गुफाओं का उपयोग वर्षावास और एकांत साधना के लिए किया।
गुप्त काल में मूर्तिकला और सनातन धर्म का स्वर्ण युग -चौथी से छठी शताब्दी के गुप्त राजवंश के दौरान, जब पूरे भारत में हिंदू धर्म और कला का पुनरुत्थान हो रहा था, तब उमगा में पत्थरों को तराशने की कला की नींव पड़ी। इसी काल में यहाँ शैव, वैष्णव और सौर मूर्तियों का निर्माण प्रारंभिक रूप में शुरू हुआ। यहाँ मिलने वाले कुछ प्राचीन स्तंभों पर गुप्तकालीन कला की स्पष्ट छाप दिखाई देती है। हर्षवर्धन काल में : धार्मिक सहिष्णुता और तंत्र का विकास -सातवीं शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल में उमगा में बौद्ध धर्म के वज्रयान संप्रदाय और सनातन धर्म के शाक्त मत का अद्भुत समन्वय देखने को मिला। पहाड़ी पर स्थित गुफाएं इस काल में तांत्रिकों के मुख्य केंद्रों के रूप में उभरीं थी । पाल और सेन काल: उमगा का चरमोत्कर्ष युग - 8वीं से 12वीं शताब्दी का पाल काल उमगा के इतिहास का 'स्वर्ण काल' था। पाल राजाओं के संरक्षण में यहाँ मूर्तिकला और वास्तुकला ने अपनी पराकाष्ठा को छुआ। उमगा में जो प्रसिद्ध '52 मंदिरों की श्रृंखला' कही जाती है, उसका अधिकांश हिस्सा इसी काल में निर्मित हुआ था। काले ग्रेनाइट पत्थरों (ब्लॉक्स) को बिना किसी गारे या सीमेंट के, केवल 'इंटरलोकिंग पद्धति' से जोड़कर ऊंचे-ऊंचे भव्य मंदिरों का निर्माण इसी काल की विशेषता थी। इस दौर में उमगा एक अंतरराष्ट्रीय स्तर का धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र था। 
मुगल काल - 17वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, जब मुगल साम्राज्य पर औरंगजेब का शासन था, तब उमगा की विरासत पर सबसे भीषण वज्रपात हुआ। औरंगजेब की कट्टर धार्मिक नीति के तहत गैर-इस्लामिक धार्मिक प्रतीकों को नष्ट करने के लिए एक विशाल सेना मगध भेजी गई। उमगा की पहाड़ी पर स्थित 52 मंदिरों की श्रृंखला को बेरहमी से तोड़ा गया। अनगिनत मूर्तियों के हाथ, पैर और चेहरे खंडित कर दिए गए। परंतु, मुगलों के इस क्रूर कालखंड में ही उमगा के साथ एक ऐसी घटना घटी, जिसने आक्रमणकारियों के हौसले पस्त कर दिए और वे इस मंदिर को एक विशिष्ट नाम देने पर मजबूर हो गए। . "अल्लाह का घर": जब औरंगजेब की सेना को नतमस्तक होना पड़ा - उमगा के इतिहास में "अल्लाह का घर" कहे जाने का प्रसंग बेहद रोमांचक, ऐतिहासिक और चमत्कारिक है। यह घटना लगभग 1660-1670 के दशक की है, जब औरंगजेब के आदेश पर मुगल सेना मगध के प्रसिद्ध देव सूर्य मंदिर को तोड़ने के बाद उमगा की ओर बढ़ी थी। मुगल सैनिक जब उमगा पहाड़ी के निचले हिस्से में स्थित मुख्य भव्य मंदिर (जो उस समय जगन्नाथ जी का वैष्णव पीठ था) परिसर में दाखिल हुए, तो उन्होंने मंदिर की नक्काशीदार दीवारों और गर्भगृह पर हथौड़े और छैनी से प्रहार करना शुरू किया। स्थानीय पुजारियों और संतों ने उन्हें रोकने का प्रयास किया और चेतावनी दी कि इस मंदिर में साक्षात ईश्वरीय ऊर्जा का वास है, इसे न छुएं। परंतु सत्ता के मद में चूर सैनिकों ने उनकी बात अनसुनी कर दी। तभी एक विस्मयकारी घटना घटी। जैसे ही मुख्य स्तंभ पर बड़ा प्रहार किया गया, मंदिर के पत्थरों के जोड़ों से भयंकर, आक्रामक मधुमक्खियों (स्थानीय भाषा में बर्रों) का एक विशाल झुंड निकल पड़ा। इन मधुमक्खियों ने मुगल सैनिकों पर धावा बोल दिया। इसके साथ ही, एक ऐसा अदृश्य प्रभाव हुआ कि जो भी सैनिक मंदिर के मुख्य ढांचे या मूर्तियों को तोड़ने के लिए आगे बढ़ रहा था, उसकी आँखों की रोशनी अचानक गायब होने लगी। देखते ही देखते सैकड़ों सैनिक पूरी तरह अंधे हो गए और परिसर में चीख-पुकार मच गई। सेनापति और सैनिक इस अप्रत्याशित दैवीय मार से बुरी तरह डर गए। तत्कालीन मुगल कमांडरों ने भांप लिया कि यह कोई साधारण मानवीय प्रतिरोध नहीं, बल्कि किसी असीम, पराशक्ति का कोप है। अपनी सेना को पूर्ण विनाश से बचाने, सैनिकों की आँखों की रोशनी वापस पाने और उस भयानक स्थिति से मुक्ति पाने के लिए मुगल सेनापति और सैनिकों ने हाथ जोड़कर घुटने टेक दिए। उन्होंने चिल्लाकर कहा:"यह हिंदुओं का कोई मामूली बुतखाना (मंदिर) नहीं है, बल्कि यह भी पाकीज़ा 'अल्लाह का घर' (खुदा का नूर) है, जहाँ साक्षात परवरदिगार की ताकत निवास करती है।" मुगल सेना द्वारा इस स्थान को 'अल्लाह का घर' स्वीकार करने, वहाँ सजदा करने और भविष्य में उस मुख्य मंदिर को कभी न छूने की कसम खाने के बाद ही, चमत्कारिक रूप से सैनिकों की आँखों की रोशनी वापस आई। इस भय और सम्मान के कारण, मुगल सेना मुख्य मंदिर के भव्य 60 से 70 फीट ऊंचे नागर शैली के शिखर को छुए बिना, उसे वैसा ही छोड़कर वापस लौट गई। यही कारण है कि आज पूरे बिहार में उमगा का मुख्य मंदिर मध्यकाल के थपेड़ों को सहकर भी अपनी पूरी भव्यता के साथ अक्षुण्ण खड़ा है।
उत्तर-मुगल काल और राजा ऐल का ऐतिहासिक अवदान में जब हम उमगा के इतिहास की कड़ियों को जोड़ते हैं, तो राजा ऐल (इला-पुत्र या चंद्रवंशी राजा) का नाम स्वर्ण अक्षरों में सामने आता है। यद्यपि मुख्य मंदिर के द्वार पर उत्कीर्ण शिलालेख के अनुसार राजा भैरवेंद्र (या भरेंद्र सिंह) ने विक्रम संवत 1496 (यानी 1439 ईस्वी) में यहाँ कृष्ण, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों की स्थापना करवाई थी, परंतु जनश्रुतियों और इतिहासकारों ( डॉ. के.के. दत्त) के अनुसार, इस स्थल को 'सौर संस्कृति' से जोड़ने का प्रारंभिक श्रेय राजा ऐल को जाता है।
रोग मुक्ति की अमर कथा में सन 995 ईस्वी के आसपास राजा ऐल गंभीर कुष्ठ रोग (कोढ़) से पीड़ित थे। वे अपनी बीमारी के इलाज के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में भटक रहे थे। जब वे उमगा की इस घने जंगलों वाली पहाड़ी की तलहटी से गुजर रहे थे, तो उन्हें तीव्र प्यास लगी। उनके सैनिकों ने पहाड़ी के पास स्थित एक प्राचीन, शांत जलाशय (कुंड) से जल लाकर उन्हें दिया और राजा ने उस जल से स्नान भी किया। स्नान करते ही एक चमत्कार हुआ— राजा ऐल का वर्षों पुराना कुष्ठ रोग पूरी तरह ठीक हो गया और उनकी काया कंचन जैसी चमकने लगी। इस अकल्पनीय चमत्कार से गद्गद होकर राजा ने उस जलाशय के महत्व को समझा और वहाँ भगवान सूर्य (जो आरोग्य के देवता हैं) की उपासना की। कृतज्ञता स्वरूप उन्होंने 995 ईस्वी में उमगा में एक प्रारंभिक सौर पीठ और जलाशय के जीर्णोद्धार की नींव रखी। यही कारण है कि देव सूर्य मंदिर की तरह ही उमगा के कुंड और मंदिर की महिमा भी राजा ऐल के नाम के साथ अमर हो गई। सन 1742 का सांस्कृतिक पुनर्जागरण में मुगल काल में जब जगन्नाथ जी की मूर्तियाँ अपवित्र या खंडित कर दी गईं, तो सनातन परंपरा के अनुसार खंडित मूर्तियों की पूजा वर्जित मान ली गई। मंदिर सूना पड़ा था। परंतु, मुगलों के कमजोर पड़ते ही सन 1742 ईस्वी के आसपास स्थानीय समाज और जमींदारों ने एक बड़ा निर्णय लिया। चूंकि पूरा मगध क्षेत्र भगवान सूर्य की उपासना (छठ व्रत) के प्रति अगाध श्रद्धा रखता था, इसलिए इस भव्य, खाली पड़े मंदिर को लावारिस होने से बचाने के लिए सन 1742 में इसके गर्भगृह में भगवान सूर्य की एक अत्यंत सुंदर और भव्य प्रतिमा स्थापित की गई। इस प्रकार, जो मंदिर मूलतः एक वैष्णव पीठ के रूप में निर्मित हुआ था, वह उत्तर-मुगल काल में सौर संस्कृति का एक महान केंद्र बन गया।
महर्षि च्यवन , ऋषि और्व  और अगस्त्य: ऋषियों की तपोभूमि और 'जल-वृक्ष संस्कृति' थी ।उमगा पर्वत समूह पर केवल राजाओं का वैभव ही नहीं रहा, बल्कि यह ऋषियों की महान वैज्ञानिक और आध्यात्मिक सोच का भी परिणाम है। पौराणिक संदर्भों के अनुसार, यह पूरा विंध्य-मगध क्षेत्र महर्षि च्यवन और ऋषि अगस्त्य की साधना स्थली रहा है। इन ऋषियों ने यहाँ जो विकास किया, उसे आज हम 'इको-सिस्टम मैनेजमेंट' या 'जल और वृक्ष संस्कृति' कहते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में पानी को रोकना और उसे आम जनमानस व पशु-पक्षियों के उपयोग के योग्य बनाना एक कठिन कार्य था। प्राचीन ऋषियों के मार्गदर्शन में उमगा पहाड़ी पर विभिन्न ऊंचाइयों पर छोटे-बड़े कुंडों और पोखरों का निर्माण किया गया। पहाड़ से बहकर जाने वाले वर्षा के जल को इन कुंडों में संचित किया जाता था। इन कुंडों के जल में औषधीय पौधों के तत्व मिले होने के कारण यह स्वास्थ्य के लिए अमृत समान होता था, जिसका प्रमाण राजा ऐल की रोग-मुक्ति की कथा से भी मिलता है।
वृक्ष संस्कृति  - ऋषियों ने उमगा की पहाड़ियों पर 'देव-कानन' यानी देवताओं के वनों की स्थापना की। यहाँ बेल, पीपल, वटवृक्ष, आंवला और अत्यंत दुर्लभ औषधीय पौधों को रोपा गया। ऋषियों ने समाज को सिखाया कि इन वृक्षों में देवताओं का वास है, इसलिए इन्हें काटना महापाप है। इस धार्मिक दृष्टिकोण के कारण उमगा पहाड़ी सदियों तक सघन और समृद्ध वनों से आच्छादित रही, जिसने स्थानीय पर्यावरण को संतुलित रखा।
उमगा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ भारत की सात प्रमुख सांस्कृतिक धाराएं एक साथ प्रवाहित होती हैं:।सौर संस्कृति: सन 1742 से स्थापित भगवान सूर्य की प्रतिमा और प्रतिवर्ष कार्तिक व चैत्र मास में होने वाला महापर्व छठ, यहाँ की जीवंत सौर संस्कृति का प्रमाण है। शाक्त संस्कृति: पहाड़ी की सर्वोच्च चोटी पर स्थित माँ उमंगेश्वरी का गुफा-पीठ, जो शक्ति पूजा और तंत्र साधना का सर्वोच्च केंद्र है। ब्रह्म संस्कृति: आम तौर पर पूरे भारत में ब्रह्मा जी की पूजा के मंदिर नहीं मिलते (पुष्कर के अतिरिक्त), परंतु उमगा में ब्रह्म संस्कृति के प्रतीक स्वरूप प्राचीन विग्रह और भग्नावशेष मिलते हैं, जो इसकी प्राचीनता को दर्शाते हैं।शैव संस्कृति: पहाड़ के ऊपर स्थित 'सहस्त्र लिंगेश्वर महादेव' का होना इसकी पराकाष्ठा है। यहाँ एक ही विशाल शिला पर अत्यंत सूक्ष्मता से उकेर कर 1000 छोटे-छोटे शिवलिंग बनाए गए हैं। एक बार जल चढ़ाने से एक हजार शिवलिंगों के अभिषेक का पुण्य प्राप्त होता है। वैष्णव संस्कृति: मुख्य मंदिर का स्थापत्य, उसके द्वार पर बने शंख, चक्र, गरुड़ और राजा भैरवेंद्र द्वारा 1439 ईस्वी में स्थापित जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा की स्मृतियाँ यहाँ की वैष्णव जड़ता को दर्शाती हैं। जल संस्कृति: पहाड़ी पर बने प्राचीन औषधीय कुंड और जल संरक्षण की प्रणालियाँ। वृक्ष संस्कृति: पवित्र देव-वृक्षों की पूजा और उनके माध्यम से पर्यावरण का संरक्षण था।
ब्रिटिश काल: उपेक्षा और पुरातत्वविदों की दृष्टि में 19वीं शताब्दी में जब भारत पर ब्रिटिश हुकूमत थी, तब उमगा का यह सुदूर पहाड़ी क्षेत्र प्रशासनिक रूप से गया जिले के अंतर्गत आता था। ब्रिटिश शासकों ने इसके धार्मिक महत्व की उपेक्षा की, लेकिन उनके पुरातत्वविदों और सर्वेक्षकों (फ्रांसिस बुकानन और अलेक्जेंडर कनिंघम के सहयोगियों) ने उमगा का दौरा किया। उन्होंने मुख्य मंदिर के द्वार पर लगे राजा भैरवेंद्र के शिलालेख का गंभीर अध्ययन किया और इसे एशियाटिक सोसाइटी के जर्नल्स में स्थान दिया। इसी काल में दुनिया को पता चला कि झाड़ियों में छिपा यह मलबे का ढेर वास्तव में पालकालीन कला का एक अद्भुत खजाना है।
आजादी के बाद लंबे समय तक उमगा स्थानीय स्तर पर ही सिमटा रहा। परंतु हाल के दशकों में, बिहार सरकार के पर्यटन विभाग और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण  की दृष्टि इस पर पड़ी है। इसे एक 'हेरिटेज और इको-टूरिज्म ज़ोन' के रूप में अधिसूचित किया गया है। आज उमगा केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह इतिहासकारों के लिए शोध का विषय, प्रकृति प्रेमियों के लिए एक बेहतरीन ट्रैकिंग साइट और आम श्रद्धालुओं के लिए अटूट विश्वास का केंद्र है। महाशिवरात्रि, कार्तिक पूर्णिमा और छठ के अवसर पर यहाँ लाखों लोगों का जनसैलाब उमड़ता है। वर्तमान में यहाँ पहाड़ी की चोटी पर स्थित माँ उमंगेश्वरी मंदिर तक श्रद्धालुओं को सुगमता से पहुँचाने के लिए पैदल चलना  है। उमंगा के पुजारी शाकद्वीपीय ब्राह्मण है । 
उमगा पर्वत समूह केवल पत्थरों, मूर्तियों और भग्नावशेषों का एक संग्रह नहीं है। यह मगध की उस अदम्य जिजीविषा का प्रतीक है, जिसने मौर्यों का साम्राज्य देखा, गुप्तों का वैभव जिया, पालों की कला को पल्लवित किया और मुगलों के भीषण विध्वंस के सामने भी घुटने नहीं टेके। जब औरंगजेब की सेना इसे नष्ट करने आई, तो इस मिट्टी की दैवीय ऊर्जा ने उन्हें 'अल्लाह का घर' कहने पर विवश कर दिया। राजा ऐल की रोग-मुक्ति का जल-कुंड हो या ऋषियों की 'वृक्ष-संस्कृति', उमगा हमें सिखाता है कि धर्म केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि प्रकृति और पर्यावरण के साथ तालमेल बिठाकर जीने की एक वैज्ञानिक कला है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम उमगा की इस 52 मंदिरों की विस्मृत विरासत को पहचानें, इसके इतिहास का संरक्षण करें और मगध की इस प्राचीन ज्योति को पूरे विश्व के सामने ससम्मान प्रज्वलित करें। यह संस्मरण उसी गौरवशाली अतीत को एक विनम्र श्रद्धांजलि है।
संदर्भ सूची - गया जिला गजेटियर (बिहार सरकार) 1906 , 1957 , मगध का इतिहास और पुरातत्व — विभिन्न शोध पत्र ,।उमगा मुख्य मंदिर के प्रवेश द्वार पर उत्कीर्ण राजा भैरवेंद्र का शिलालेख (विक्रम संवत 1496 / 1439 ईस्वी) , फ्रांसिस बुकानन की मगध और गया यात्रा की ऐतिहासिक रिपोर्ट (1811-1812) , क्षेत्रीय लोक-श्रुतियाँ, 'मगध ज्योति' ब्लॉग के आलेख , मगध क्षेत्र की विरासत और स्थानीय विरले इतिहासकारों के संकलन ।