मोरहर नदी: मगध की विलुप्त होती जीवनधारा और सभ्यता
सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारत की सभ्यता नदियों के किनारे फली-फूली है। जहाँ गंगा और यमुना जैसी नदियों ने राष्ट्रीय फलक पर अपनी पहचान बनाई, वहीं मगध की धरती पर 'मोरहर' जैसी नदियों ने क्षेत्रीय संस्कृति, कृषि और इतिहास को चुपचाप सींचा है। झारखंड के चतरा जिले के घने जंगलों और पहाड़ियों से निकलने वाली मोरहर नदी केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि सतयुग से लेकर आधुनिक काल तक के मानवीय विकास की मूक गवाह है। आज यह नदी अपने अस्तित्व के लिए छटपटा रही है, जो हमारी साझा विरासत के लिए एक गंभीर चेतावनी है मोरहर नदी का जन्म झारखंड के चतरा जिले के प्रतापपुर प्रखंड में स्थित कुंदा की पहाड़ियों से होता है। स्थानीय भौगोलिक साक्ष्यों के अनुसार, यह ऐतिहासिक राजकिला (कुंदा किला) के समीप से एक अत्यंत पतली जलधारा 'पईन' के रूप में प्रस्फुटित होती है। यहाँ से यह नदी पहाड़ियों को चीरती हुई डुमरिया , इमामगंज प्रखंड की मैदानी इलाकों की ओर बढ़ती है।
यह नदी झारखंड से निकलकर बिहार के गया जिले में प्रवेश करती है। यहाँ यह डुमरिया, इमामगंज, रानीगंज, शेरघाटी, परैया और टिकारी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों से गुजरती है। इसके बाद यह जहाराबाद जिले के मखदुमपुर और रतनी फरीदपुर प्रखंडों को सींचते हुए अरवल के करपी प्रखंड और अंततः पटना जिले के पालीगंज प्रखंड की सीमा पर पुनपुन नदी में समाहित हो जाती है। इमामगंज के समीप मोरहर नदी का टापू भगहर है ।
मोरहर का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह स्वयं में एक विशाल नदी तंत्र को समेटे हुए है। इसे कई छोटी-बड़ी नदियों की जननी माना जाता है: सोरहर और जमुने: ये नदियाँ मोरहर की शक्ति को बढ़ाती हैं। दरधा और बलदईया: सिंचाई के दृष्टिकोण से ये अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।।गंगहर , सोरहर और बूढ़ी नदी: शेरघाटी के पास मोरहर और बुढ़िया (बूढ़ी) नदी का संगम इसे एक विशिष्ट भौगोलिक पहचान देता है। इतिहासकार विजय कुमार दत्त के अनुसार, शेरघाटी शहर इन दो नदियों के आंचल में है।
प्राचीन ग्रंथों और स्थानीय लोकगाथाओं के अनुसार, मोरहर का क्षेत्र 'कीकट' प्रदेश का हिस्सा रहा है। गयासुर की देह पर बसी इस पावन भूमि में मोरहर का स्थान पवित्र माना गया है। त्रेता युग में जब भगवान राम पितृ तर्पण के लिए गया पधारे थे, तब इस क्षेत्र की नदियों का उल्लेख मिलता है। द्वापर युग में मगध नरेश जरासंध के काल में यह नदी सामरिक सुरक्षा का एक प्राकृतिक अवरोध थी।
मौर्य और गुप्त काल: मोरहर के किनारे स्थित बस्तियाँ मौर्यकालीन सैन्य मार्गों का हिस्सा थीं। गुप्त काल में यहाँ ब्राह्मण बस्तियों और मंदिरों का विस्तार हुआ।।हर्षवर्धन काल: चीनी यात्री ह्वेनसांग के वृत्तांतों में वर्णित मगध की समृद्ध कृषि व्यवस्था का मुख्य आधार मोरहर जैसी नदियाँ ही थीं।।मुगलकाल: शेरशाह सूरी के समय 'शेरघाटी' एक प्रमुख प्रशासनिक केंद्र बना। मोरहर के तट पर स्थित ऊँचे टीले सुरक्षा की दृष्टि से आह्लादित है। ब्रिटिश साम्राज्य।ने शेरघाटी को एक व्यापारिक और प्रशासनिक केंद्र (कलेक्टरगंज) के रूप में विकसित किया। जी.टी. रोड (Grand Trunk Road) का निर्माण मोरहर के महत्व को वैश्विक मानचित्र पर ले आया। आज यह नदी आधुनिक सिंचाई परियोजनाओं का आधार है।
मोरहर नदी के घाट विभिन्न धर्मों और संप्रदायों के संगम रहे हैं:। सौर और शैव परंपरा: नदी के किनारे स्थित मेन का कोटेश्वर मंदिर और सूर्य उपासना के केंद्र (छठ पर्व) प्राचीन काल से ही जन-आस्था के केंद्र रहे हैं।।बौद्ध और जैन संस्कृति: शेरघाटी और टिकारी के बीच स्थित घेजन एक महत्वपूर्ण बौद्ध स्थल है। यहाँ से प्राप्त बुद्ध की प्रतिमाएं और अवशेष सिद्ध करते हैं कि यह नदी बौद्ध भिक्षुओं की साधना स्थली रही है। झारखंड का कुंदा और प्रतापपुर क्षेत्र जैन तीर्थंकरों की स्मृति से जुड़ा है। वैष्णव और ब्रह्म संस्कृति: पितृपक्ष के दौरान गया आने वाले श्रद्धालु मोरहर और इसकी सहायक नदियों के तटों पर तर्पण और अनुष्ठान करते हैं।
अस्तित्व का संकट: मोरहर नदी की छटपटाहट में आज मोरहर नदी का वह विशालकाय स्वरूप, जो कभी शेरघाटी और पंचानपुर में दिखता था, लुप्त होने की कगार पर है।।संकट के प्रमुख बिंदु में अवैध बालू खनन: नदी की तलहटी से मशीनों द्वारा बालू की अंधाधुंध खोदाई ने नदी के 'रीचार्ज' होने की क्षमता को खत्म कर दिया है।।नाले में तब्दील होती धारा: जहानाबाद के शकुराबाद तक पहुँचते-पहुँचते मोरहर एक संकरे नाले जैसी दिखने लगती है। यह मानवीय अतिक्रमण और उपेक्षा का चरम है।।लुप्त होती सहायक नदियाँ: जब मुख्य धारा (मोरहर) ही कमजोर हो रही है, तो इसकी सहायक नदियाँ जैसे सोरहर और बलदईया भी सूख रही हैं।।मोरहर नदी केवल एक जलस्रोत नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता का डीएनए (DNA) है। यदि कुंदा के राजकिला से शुरू होकर पालीगंज तक जाने वाली यह जीवनरेखा समाप्त हो गई, तो मगध का कृषि ढांचा और ऐतिहासिक पहचान दोनों नष्ट हो जाता है। बालू के अवैध खनन पर पूर्ण प्रतिबंध।।नदी के उद्गम स्थल (कुंदा) का संरक्षण और उसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करना।।नदी के जलमार्ग से अतिक्रमण हटाना और जन-भागीदारी से 'मोरहर बचाओ' अभियान चलाना। मोरहर की पुकार आज केवल पर्यावरण की पुकार नहीं है, बल्कि यह हमारे इतिहास को बचाने की पुकार है। यदि हम आज नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल इतिहास की किताबों में पढ़ेंगी कि कभी मगध की धरती पर एक विशाल 'मोरहर' बहा करती थी।