मंगलवार, जुलाई 21, 2026

भारतीय परंपरा और पर्यावरण संस्कृति

 भारतीय परंपरा और आधुनिक समाज: जड़ों से शिखर तक 
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
भारत केवल एक भू-भाग या देश नहीं है, बल्कि यह एक निरंतर प्रवाहमान जीवंत सभ्यता है। भारतीय संस्कृति और परंपरा का इतिहास सहस्त्राब्दियों पुराना है। युग बदले, शासक बदले, और समय-समय पर भौगोलिक व राजनीतिक सीमाएं बदलीं, लेकिन भारतीय परंपरा की चेतना आज भी अक्षुण्ण है। २१वीं सदी में, जब वैश्विक दुनिया तेज़ी से बदल रही है, औद्योगिक क्रांति, वैश्वीकरण और डिजिटल युग ने हमारे जीवन को नए ढांचे में ढाल दिया है। ऐसे समय में एक सवाल उठना स्वाभाविक है—"क्या प्राचीन भारतीय परंपराएं आज के आधुनिक समाज में प्रासंगिक हैं, या ये केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित रह गई हैं?" वास्तविकता यह है कि भारतीय परंपरा और आधुनिक समाज के बीच का संबंध संघर्ष का नहीं, बल्कि एक अनोखे और सुंदर समन्वय का है। भारत की परंपरा कोई जड़ या पत्थर की लकीर नहीं है, बल्कि यह एक बहती हुई नदी की तरह है, जिसने समय-समय पर नई धाराओं और विचारों को अपने में समाहित किया है।
भारतीय परंपरा का आधार केवल कर्मकांड, रीति-रिवाज या धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं। इसके मूल में एक गहरा जीवन-दर्शन और मानवीय मूल्यों का ढांचा है, जिसने भारत को हमेशा एक सशक्त सामाजिक पहचान दी है:
वसुधैव कुटुंबकम (वैश्विक बंधुत्व): "अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुंबकम्॥" अर्थात 'यह मेरा है और यह पराया है, ऐसी सोच संकीर्ण मन वालों की होती है। उदार हृदय वालों के लिए तो संपूर्ण पृथ्वी ही एक परिवार है।' यह विचार भारतीय समाज की वैश्विक सौहार्द और समावेशिता की नींव है। भारतीय मनीषा ने जीवन को व्यवस्थित करने के लिए चार स्तंभ तय किए—धर्म (नैतिकता व कर्तव्य), अर्थ (भौतिक संसाधन), काम (इच्छाएं व सुख), और मोक्ष (आत्म-साक्षात्कार)। यह मॉडल सिखाता है कि धन और इच्छाएं गलत नहीं हैं, यदि वे धर्म और नीति के दायरे में हों। प्राचीन काल से ही भारत में वृक्षों, नदियों, पशुओं और पर्वतों की पूजा का विधान रहा है। यह केवल अंधविश्वास नहीं, बल्कि पर्यावरण के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने का वैज्ञानिक जीवन-मूल्य था। पाश्चात्य संस्कृति में जहां 'व्यक्तिवाद'  को प्राथमिकता दी जाती है, वहीं भारतीय परंपरा में 'सामूहिकता' और 'परिवार' को केंद्र में रखा जाता है।
यदि हम गहराई से विश्लेषण करें, तो पाएंगे कि आधुनिक समाज जिन चुनौतियों से जूझ रहा है, उनके समाधान के लिए वह पुनः भारतीय परंपराओं की ओर लौट रहा है। आज की आधुनिक जीवनशैली भौतिक रूप से जितनी समृद्ध है, मानसिक रूप से उतनी ही तनावग्रस्त है। ऐसे में प्राचीन भारतीय योग और ध्यान पूरे विश्व के लिए एक वरदान सिद्ध हुए हैं। पतंजलि के अष्टांग योग को आज दुनिया भर में मानसिक शांति, तनाव प्रबंधन और शारीरिक फिटनेस के लिए अपनाया जा रहा है। आयुर्वेद और सात्विक जीवनशैली को अब केवल पारंपरिक ज्ञान नहीं, बल्कि एक निवारक स्वास्थ्य प्रणाली के रूप में देखा जा रहा है। आधुनिक समाज में जो 'वेलनेस इंडस्ट्री'  उभर रही है, उसकी जड़ें प्राचीन भारत की जीवनशैली में ही हैं।
आधुनिकता ने शहरों का विस्तार किया और 'एकल परिवारों' का चलन बढ़ाया। इसके बावजूद, भारतीय समाज की यह खूबी है कि संकट के समय आज भी पूरा परिवार और रिश्तेदार एक साथ खड़े होते हैं। बुजुर्गों का आदर, बच्चों को पारंपरिक संस्कार देना, और दुखों को बांटना—ये ऐसे मूल्य हैं जो आधुनिक समाज को अवसाद और अकेलेपन  की भयावह समस्या से बचाते हैं। भारत के विविध त्योहार , दशहरा , दीपावली, होली, छठ , कर्मा , क्रिसमस , ईद, पोंगल, ओणम केवल धार्मिक गतिविधियां नहीं हैं, बल्कि ये सामाजिक समरसता, भाईचारे और आर्थिक चक्र को गति देने के महान साधन हैं।
आज पूरा विश्व 'जलवायु परिवर्तन'  के भयानक दौर से गुजर रहा है। पश्चिमी सभ्यता के अत्यधिक उपभोगवाद ने धरती के संसाधनों को सुखा दिया है। ऐसे समय में भारतीय परंपरा का 'अपरिग्रह' (ज़रूरत से ज़्यादा जमा न करना) और प्रकृति के प्रति आदर का भाव ही सतत विकास का रास्ता दिखाता है। भारतीय रसोई में स्थानीय व मौसमी खान-पान, कपड़ों में खादी व सूत का उपयोग, और प्राकृतिक संसाधनों का आदर आज के ईकोफ्रेंड ' आंदोलनों का मूल रूप हैं। परंपरा और आधुनिकता के बीच का द्वंद्व में परंपरा और आधुनिकता का मिलन हमेशा पूरी तरह सहज नहीं होता। कई स्तरों पर वैचारिक संघर्ष और मतभेद भी पैदा होते हैं । जाति व्यवस्था, रूढ़िवादिता और पदानुक्रम समतावाद, व्यक्तिगत योग्यता और समानता कुप्रथाओं का अंत और मानवीय मूल्यों की रक्षा , समाज और परिवार की इच्छा को प्राथमिकता अभिव्यक्ति, करियर और विवाह में व्यक्तिगत पसंद आपसी संवाद और अंतर-पीढ़ीगत सम्मान , सोच व दृष्टिकोण आस्था, रीति-रिवाज और अंधविश्वास वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तर्क और प्रश्न पूछने की छूट तार्किक परंपरा को अपनाना और अंधविश्वास को छोड़ना भारतीय परंपरा के नाम पर सदियों से चली आ रही जातिगत असमानता, दहेज प्रथा, लिंग-भेद और अंधविश्वास को आज का शिक्षित और आधुनिक समाज स्वीकार करने को तैयार नहीं है। आधुनिक शिक्षा ने लोगों को सवाल पूछने और इन बुराइयों के खिलाफ आवाज़ उठाने की शक्ति दी है। आधुनिक युवा वर्ग स्वतंत्रता, निजता और अपने जीवन के फैसले खुद लेने में विश्वास रखता है। वहीं, पुरानी पीढ़ी परंपरा और सामाजिक मर्यादाओं का हवाला देती है। इससे परिवारों में वैचारिक मतभेद देखने को मिलते हैं।
"परंपरा हमारी जड़ें हैं, और आधुनिकता हमारे पंख। यदि जड़ें काट दी जाएं तो पंख काम नहीं आएंगे, और यदि पंख न हों तो जड़ें हमें एक ही जगह बांधकर रख देंगी।" भविष्य के सशक्त समाज का निर्माण परंपरा और आधुनिकता में से किसी एक को चुनकर नहीं, बल्कि दोनों के विवेकपूर्ण समन्वय से ही संभव है।  हमें राजा राममोहन राय और स्वामी विवेकानंद जैसे समाज सुधारकों के विचारों पर चलना होगा। परंपरा का वह भाग जो संकीर्ण, अमानवीय और शोषणकारी है (जैसे जातिवाद व अंधविश्वास), उसे बिना झिझक त्याग देना चाहिए।
परंपरा से हमें 'सहानुभूति, नैतिकता, मानसिक ठहराव और पारिवारिक संबल' मिलना चाहिए, जबकि आधुनिकता से हमें 'वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तकनीकी उन्नति, समानता और मानवाधिकार' अपनाने चाहिए। भारतीय परंपरा और आधुनिक समाज एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। आधुनिकता यदि हमें गति, सुविधा और तकनीक प्रदान करती है, तो परंपरा हमें दिशा, अर्थ और आत्मिक संतुष्टि देती है। एक भारतवासी के रूप में हमारी सबसे बड़ी सफलता इसी बात में है कि हम चंद्रमा और मंगल तक पहुंचने की आधुनिक तकनीक भी विकसित करें, और साथ ही अपनी जड़ों, मानवीय संवेदनाओं और महान सांस्कृतिक मूल्यों को भी जीवंत रखें। यही संतुलन भारत को एक नई और सशक्त दिशा प्रदान करेगा।

 भारतीय ज्ञान परंपरा और पर्यावरण: संतुलन और सतत विकास
प्रकृति केवल मानव के जीवन का आधार ही नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक चेतना की आत्मा है। आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, पारिस्थितिक असंतुलन और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन जैसे गंभीर संकटों से जूझ रही है, तब समाधान की खोज में वैश्विक समुदाय की दृष्टि प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा की ओर टिकती है। वेदों, उपनिषदों, अरण्यकों और पुराणों में प्रकृति को किसी निर्जीव, यांत्रिक या केवल भोग्या वस्तु के रूप में नहीं, बल्कि ईश्वर के सजीव और चेतन स्वरूप में देखा गया है। आधुनिक पश्चिमी दृष्टिकोण जहाँ प्रकृति पर विजय प्राप्त करने और उसके असीमित दोहन को विकास की कुंजी मानता आया है, वहीं भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र प्रकृति के साथ 'सह-अस्तित्न , पूरकता' और 'संतुलन' बनाए रखना है। आज की आधुनिक शब्दावली में जिसे 'सतत विकास' कहा जाता है, वह भारतीय जीवन-शैली में सदियों से समाहित एक सहज विचार रहा है। 
भारतीय दर्शन की यह आधारभूत मान्यता है कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड और मानव शरीर एक ही संरचनात्मक सिद्धांतों से निर्मित हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा है:
"क्षिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम शरीरा॥"
सृष्टि का यह ढाँचा पाँच मूलभूत तत्वों (पंचमहाभूत) पर टिका हुआ है: पृथ्वी (क्षिति): धारक शक्ति, पोषण और धैर्य का प्रतीक। जल: जीवन का संवाहक और शुद्धता का स्रोत।।अग्नि (पावक): ऊर्जा, ताप और रूपांतरण का प्रतीक। वायु (समीर): प्राणशक्ति, जिसके बिना एक क्षण भी जीवन संभव नहीं। आकाश (गगन): विस्तार, शब्द और चेतना का माध्यम है। भारतीय ज्ञान परंपरा यह सिखाती है कि इन पाँचों तत्वों का परस्पर तालमेल ही प्रकृति का संतुलन बनाए रखता है। जब तक मनुष्य इन तत्वों का सम्मान करता है, तब तक सृष्टि में सुख और शांति बनी रहती है। ईशावास्योपनिषद का प्रसिद्ध मंत्र हमें यही संदेश देता है:
"ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥"
अर्थात्, इस जगत् में जो कुछ भी चेतन या अचेतन है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है। इसलिए इसका उपभोग त्यागपूर्वक (ज़रूरत के अनुसार) करो, लालच मत करो; क्योंकि धन और संसाधन किसी एक के नहीं हैं। यह श्लोक आधुनिक उपभोक्तावाद पर सीधा प्रहार करता है और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की प्रेरणा देता है।
प्रकृति का देवत्वीकरण और श्रद्धा भाव - भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण को किसी बाहरी कानून या सरकारी दंड के भय से नहीं, बल्कि 'श्रद्धा', 'संस्कार' और 'कृतज्ञता' के माध्यम से समाज की दिनचर्या में पिरोया गया था। प्रकृति की हर उस इकाई को, जो जीवन का पोषण करती है, देवत्व प्रदान किया गया ।  भारत में नदियाँ केवल जल निकाय नहीं हैं, उन्हें 'लोकमाता' माना गया। गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु और कावेरी जैसी नदियों की पूजा, आरती और उनमें पवित्र स्नान की परंपरा वास्तव में जल निकायों को प्रदूषण से मुक्त रखने और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक सामाजिक माध्यम थी। वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माने जाने वाले पेड़ों को धार्मिक महत्व दिया गया:।पीपल और बरगद (वट): प्रचुर मात्रा में ऑक्सीजन देने वाले और विशाल जैव-विविधता को आश्रय देने वाले इन वृक्षों की पूजा की परंपरा बनाई गई।।तुलसी और नीम: तुलसी को हर घर के आँगन में स्थान दिया गया, जो वायु शोधन और औषधीय गुणों का भंडार है।।अरण्य संस्कृति: हमारे ऋषियों के आश्रम वनों (अरण्यों) में होते थे, जहाँ 'अरण्य संस्कृति' का विकास हुआ। वनों को काटना महापाप माना जाता था। भूमि और पर्वतों के प्रति आदर होती है ।
ऋग्वेद और अथर्ववेद के 'भूमि सूक्त' में कहा गया है:"माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः" (अर्थात् पृथ्वी मेरी माता है और मैं इसका पुत्र हूँ।)।इस भावना ने मनुष्य को कभी भूमि का शोषक नहीं बनने दिया। हिमालय, गोवर्धन जैसे पर्वतों को देवस्वरूप मानकर उनकी अखंडता की रक्षा की गई । आधुनिक विज्ञान आज खाद्य श्रृंखला और पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन की बात करता है। भारतीय ज्ञान परंपरा में यह ज्ञान हजारों वर्षों से आचरण में लाया जा रहा है। जैन, बौद्ध और सनातन परंपरा में जीव मात्र के प्रति दया और अहिंसा को सर्वोच्च नैतिक मूल्य माना गया। देव-वाहन और वन्यजीव संरक्षण: हमारे देवी-देवताओं के वाहनों का अवलोकन करें तो एक अद्भुत पारिस्थितिक संतुलन दिखाई देता है: शिव के साथ वृषभ (बैल) और सर्प। विष्णु के साथ गरुड़। दुर्गा के साथ सिंह। गणेश के साथ मूषक (चूहा)। कार्तिकेय के साथ मयूर है। पीपल , बरगद , आंवला , शाक  वृक्ष एवं पौधों में तुलसी , नदियां  की प्रधानता और पूजन की परंपरा है । 
प्राकृतिक रूप से सर्प और मूषक, या सिंह और बैल एक-दूसरे के विरोधी हैं, लेकिन देव-प्रतिमाओं में वे एक साथ शांति से रहते हैं। यह रूपक समाज को यह संदेश देता है कि प्रकृति में हर जीव का अपना स्थान है और जैव विविधता की रक्षा करना मनुष्य का धार्मिक कर्तव्य है।
प्राचीन भारत में पर्यावरण प्रबंधन केवल दर्शन तक सीमित नहीं था, बल्कि व्यावहारिक तकनीक में भी दिखाई देता था: भारत के विभिन्न हिस्सों में जल संचयन की अद्भुत प्रणालियाँ विकसित की गईं:
: राजस्थान और गुजरात जैसे शुष्क क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन के लिए कलात्मक बावड़ियों ( रानी की वाव, चाँद बावड़ी) का निर्माण किया गया, जो भू-जल स्तर को बढ़ाती थीं। बिहार , झारखंड उत्तरप्रदेश उड़ीसा , बंगाल में जल संचयन एवं जल संरक्षण एवं सम्बर्धांके लिए सरोवर , आहार , कूप का निर्माण तथा वृक्षारोपण  किया जाता था ।  जोहड़, तालाब और आहाड़-पाइन: सामुदायिक भागीदारी से जल का संग्रहण और कृषि के लिए कुशल उपयोग किया जाता था। भारत के कई राज्यों ( मेघालय में 'लॉ लिंगदोह', महाराष्ट्र में 'देवराई', केरल का  'कावू') में जंगलों के बड़े हिस्सों को देवताओं के नाम पर आरक्षित रखा जाता था। इन पवित्र उपवनों में लकड़ी काटना, शिकार करना या पेड़ की पत्ती तोड़ना भी वर्जित था। आज ये उपवन विलुप्तप्राय औषधीय पौधों और वन्यजीवों के लिए प्राकृतिक बायोस्फीयर रिज़र्व के रूप में काम कर रहे हैं।
आधुनिक युग की भौतिकवादी दौड़ ने प्रकृति के साथ हमारे इस रिश्ते को तोड़ा है, जिसके दुष्परिणाम आज प्रदूषण, चक्रवात, बेमौसम बारिश और नई बीमारियों के रूप में सामने आ रहे हैं। इस संकट काल में भारतीय जीवन-पद्धतियाँ विश्व के लिए मार्गदर्शक बनी हैं: आयुर्वेद: केवल चिकित्सा पद्धति नहीं है, बल्कि प्रकृति के नियमों के अनुसार जीने की कला है। यह ऋतुचर्या और प्राकृतिक जड़ी-बूटियों के माध्यम से शरीर और पर्यावरण के सामंजस्य पर जोर देता है।।योग मनुष्य की चेतना को सूक्ष्म से विराट (प्रकृति) के साथ जोड़ता है।: भारतीय चिंतन हमेशा 'जरूरत' (Need) पर आधारित जीवन का समर्थन करता है, न कि 'लालच' पर प्राचीन संस्कृत श्लोक में संपूर्ण ब्रह्मांडीय संतुलन की प्रार्थना की गई है:
"प्रकृतिः पंचभूतानि ग्रहाः लोकाः स्वरास्तथा।
दिशः कालश्च सर्वेषां सदा कुर्वन्तु मंगलम्।।"
(अर्थात्: त्रिगुणात्मक प्रकृति, पाँचों महाभूत, नवग्रह, तीनों लोक, सातों स्वर, दसों दिशाएँ और काल — ये सभी घटक आपस में संतुलित व्यवहार करते हुए समस्त ब्रह्मांड का सदा मंगल करें।)
पर्यावरण के बिना मानव सभ्यता के अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती। पश्चिमी औद्योगिक मॉडल ने भौतिक समृद्धि तो दी, लेकिन पृथ्वी को विनाश के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। इस वैश्विक संकट का समाधान केवल नई तकनीक में नहीं, बल्कि हमारी सोच और जीवन-शैली के परिवर्तन में है। भारतीय ज्ञान परंपरा हमें सिखाती है कि प्रकृति हमारी दासी नहीं, बल्कि हमारी माता है। यदि हमें आने वाली पीढ़ियों के लिए एक हरित और सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित करना है, तो हमें अपनी सनातन जड़ों की ओर लौटना होगा। 'उपभोग' के स्थान पर 'सह-अस्तित्व' और 'शोषण' के स्थान पर 'पोषण' के इस भारतीय दृष्टिकोण को अपनाकर ही हम संपूर्ण विश्व और पर्यावरण का कल्याण कर सकते है ।

गुरुवार, जुलाई 16, 2026

पुरुषोत्तम क्षेत्र जगन्नाथ पूरी

पावन पुरुषोत्तम क्षेत्र: श्री जगन्नाथ पुरी का सांस्कृतिक। वैभव
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
भारतीय चेतना का स्पंदन केंद्र पूरी है। भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म के इतिहास में जिन चार परम पावन धामों की परिकल्पना की गई है, उनमें पूर्वी तट पर स्थित श्री जगन्नाथ पुरी (ओडिशा) का स्थान अद्वितीय है। महोदधि (बंगाल की खाड़ी) के नील जल तरंगों से प्रक्षालित पूरी  पावन नगरी न केवल एक प्रमुख तीर्थस्थल है, बल्कि यह भारतीय दर्शन, इतिहास, वास्तुकला, कला और लोक-आस्था का एक ऐसा सघन संगम है, जिसने सदियों से संपूर्ण विश्व को अपनी ओर आकर्षित किया है। पौराणिक ग्रंथों और शास्त्रों में पुरी को 'पुरुषोत्तम क्षेत्र', 'शंख क्षेत्र', 'श्रीक्षेत्र', 'नीलांचल' और 'नीलाद्रि' पूरी , जगन्नाथ पूरी जैसे अनेक दिव्य नामों से विभूषित किया गया है। यहाँ के अधिष्ठाता देव स्वयं जगत् के स्वामी 'श्री जगन्नाथ' हैं, जो अपनी बहन सुभद्रा और अग्रज बलभद्र (बलराम) के साथ रत्नसिंहासन पर विराजमान हैं। जगन्नाथ संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता इसका समन्वयकारी चरित्र है, जहाँ आदिवासी परंपराओं से लेकर वैदिक ऋचाओं तक, और बौद्ध-जैन दर्शन से लेकर मध्यकालीन भक्ति आंदोलन तक की धाराएं एकाकार हो जाती हैं।
भौगोलिक दृष्टि से पुरी भारत के पूर्वी राज्य ओडिशा का एक तटीय जिला और शहर है। यह 19.81 ∘  N अक्षांश और 85.83 ∘  E देशांतर पर स्थित है। इसके पूर्व में बंगाल की खाड़ी का अनत विस्तार है, जो इस धर्मनगरी को एक विशिष्ट प्राकृतिक सौंदर्य और नैसर्गिकता प्रदान करता है। शंख क्षेत्र: पुरी का भौगोलिक आकार एक शंख की भांति माना गया है, जिसका नाभि-केंद्र स्वयं श्री जगन्नाथ का मुख्य मंदिर है।।पुरुषोत्तम क्षेत्र: 'पुरुषोत्तम' का अर्थ है पुरुषों में उत्तम अर्थात् स्वयं विष्णु। स्कंद पुराण के अनुसार, यह क्षेत्र आदि काल से विष्णु का अत्यंत प्रिय निवास स्थान रहा है। नीलांचल/नीलाद्रि: प्राचीन काल में यहाँ एक नीला पर्वत (नीलाद्रि) था, जिसके ऊपर नीलमणि से निर्मित नीलमाधव की पूजा की जाती थी।
स्कंद पुराण के 'उत्कल खंड' में वर्णित कथा के अनुसार, मालव देश के परम प्रतापी और परम विष्णुभक्त राजा इंद्रद्युम्न को स्वप्न में नीलमाधव के दर्शन हुए थे। राजा ने अपने पुरोहित विद्यापति को नीलमाधव की खोज में भेजा। विद्यापति ने खोजी यात्रा के दौरान पाया कि जंगलों में रहने वाले शबर (आदिवासी) कबीले के मुखिया विश्ववासु गुप्त रूप से नीलमाधव की पूजा करते थे।।कालांतर में नीलमाधव की वह दिव्य मूर्ति अंतर्धान हो गई। राजा इंद्रद्युम्न अत्यंत व्याकुल हो उठे। तब आकाशवाणी हुई कि समुद्र में तैरता हुआ एक विशाल देवदारु का काष्ठ (लकड़ी का लट्ठा) प्राप्त होगा, जिससे भगवान की मूर्तियों का निर्माण किया जाए। उस दारु (लकड़ी) को तराशने के लिए स्वयं देव-शिल्पी विश्वकर्मा एक वृद्ध बढ़ई के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने शर्त रखी कि वे २१ दिनों तक बंद द्वार के पीछे मूर्तियों का निर्माण करेंगे और इस बीच कोई भी द्वार नहीं खोलेगा।।परंतु, रानी गुंडिचा की उत्सुकता और आतुरता के कारण राजा ने १५वें दिन ही द्वार खुलवा दिया। अंदर मूर्तियां अधूरी थीं—हाथ-पैर विहीन, केवल धड़ और बड़ी-बड़ी गोल आँखें। शिल्पी अंतर्धान हो चुके थे। राजा को अपनी भूल पर पश्चाताप हुआ, परंतु भगवान ने पुनः स्वप्न में कहा कि वे इसी निराकार-साकार रूप में पृथ्वी पर भक्तों का कल्याण करेंगे। इस प्रकार, 'दारुब्रह्म' के रूप में श्री जगन्नाथ की स्थापना हुई।
 राजवंश, शिलालेख और विकास क्रममें पुरी का इतिहास केवल पौराणिक आख्यानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रामाणिक पुरातात्विक साक्ष्यों, शिलालेखों और ऐतिहासिक दस्तावेजों से भी समृद्ध है। श्री जगन्नाथ मंदिर का विकासक्रम में आदिवासी शबर परंपरा के तहत पुरातन कल से नीलमाधव पूजा व उपासना , उर्वी गंग राजवंश १२ वीं सदी चोड़गंग देव द्वारा वर्तमान जगन्नाथ मंदिर का मुख्य निर्माण एवं गजपति राजवंश द्वारा १५ वीं सदी में सांस्कृतिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था की गई थी ।
मौर्य और गुप्त काल का प्रभाव - यद्यपि पुरी के मुख्य मंदिर का वर्तमान स्वरूप मध्यकाल का है, परंतु मौर्य सम्राट अशोक के कलिंग युद्ध (261 ई.पू.) के समय से ही यह क्षेत्र बौद्ध धर्म के प्रभाव में रहा। कई इतिहासकार मानते हैं कि जगन्नाथ की त्रिमूर्ति में समाहित दर्शन बौद्ध धर्म के त्रिरत्न (बुद्ध, धम्म, संघ) से प्रेरित है। गुप्त काल में वैष्णव धर्म के प्रसार के साथ ही इस क्षेत्र की पहचान एक प्रमुख हिंदू तीर्थ के रूप में सुदृढ़ होने लगी।
पूर्वी गंग राजवंश और अनंतवर्मन चोडगंग देव - वर्तमान गगनचुंबी मंदिर के निर्माण का श्रेय पूर्वी गंग राजवंश के महान शासक महाराज अनंतवर्मन चोडगंग देव (1077–1147 ई. को जाता है। उन्होंने १२वीं शताब्दी की शुरुआत में इस मंदिर का निर्माण कार्य प्रारंभ करवाया। उनके उत्तराधिकारी अनंगभीम देव तृतीय (1211–1238 ई.) ने इस कार्य को पूर्ण कराया और अपने संपूर्ण साम्राज्य को महाप्रभु श्री जगन्नाथ के चरणों में समर्पित कर स्वयं को उनका 'राउत' (सेवक) घोषित किया। यहीं से ओडिशा में 'गजापति' शासन की नींव पड़ी, जहाँ राजा स्वयं को राज्य का वास्तविक शासक न मानकर महाप्रभु जगन्नाथ का प्रतिनिधि या सेवक मानता था।
सुलतान फीरोज शाह तुगलक (1360 ई.) और बाद में काला पहाड़ (बंगाल के सुल्तान का सेनापति, 1568 ई.) जैसे आक्रांताओं ने मंदिर पर भीषण हमले किए और मूर्तियों को नष्ट करने का प्रयास किया। इन संकटकाल के दौरान पुरी के पुजारियों और गजापति राजाओं ने अत्यंत चतुराई से विग्रहों (मूर्तियों) को चिल्का झील के टापुओं और गुफाओं में छिपाकर सुरक्षित रखा। मुगलों और मराठों के शासनकाल में भी मंदिर के प्रशासनिक ढांचे और दैनिक अनुष्ठानों को बनाए रखने के लिए संघर्ष और समझौते किए गए।
जगन्नाथ मंदिर की स्थापत्य कला एवं वास्तुशिल्प - पुरी का मुख्य मंदिर कलिंग वास्तुकला शैली का सर्वोत्कृष्ट और जीवंत उदाहरण है। यह विशाल मंदिर लगभग ४ लाख वर्ग फुट के क्षेत्र में फैला हुआ है, जो चारों ओर से 'मेघनाद पचेरी' (एक विशाल सुरक्षा दीवार) से घिरा हुआ है। कलिंग शैली के अनुरूप मंदिर को मुख्य रूप से चार विशाल कक्षों या मंडपों में विभाजित किया गया है, जो एक के बाद एक श्रेणीबद्ध रूप से जुड़े हुए हैं: क्रमांकमंडप का नामविवरण एवं धार्मिक महत्व -  विमान  मंदिर का गर्भगृह है जहाँ रत्नसिंहासन पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की काष्ठ मूर्तियां विराजमान हैं। इसकी ऊंचाई धरातल से लगभग २१४ फुट है। जगमोहन गर्भगृह के ठीक सामने स्थित मुख्य प्रार्थना कक्ष या दर्शन मंडप है। यहाँ भक्त एकत्र होकर भगवान की आराधना करते हैं। नाट्य मंडप  नृत्य और संगीत के लिए आरक्षित कक्ष था, जहाँ प्राचीन काल में देवदासियां भगवान के समक्ष ओडिसी नृत्य प्रस्तुत करती थीं। भोग मंडप मंदिर का सबसे बाहरी हिस्सा, जहाँ भगवान को अर्पित किए जाने वाले महाप्रसाद का नैवेद्य रखा जाता है और विशेष अनुष्ठान संपन्न होते हैं।
  नीलचक्र और पतितपावन ध्वज - मंदिर के शिखर पर एक अष्टधातु से निर्मित विशाल चक्र स्थापित है, जिसे 'नीलचक्र' कहा जाता है। इस चक्र पर प्रतिदिन एक नया ध्वज फहराया जाता है, जिसे 'पतितपावन बाना' कहते हैं। इस ध्वज को बदलने की प्रक्रिया अत्यंत रोमांचक होती है; मंदिर का एक विशेष सेवक (चोला) बिना किसी सुरक्षा उपकरण के, हवा के विपरीत बहते हुए २१४ फुट ऊंचे शिखर पर चढ़कर इस ध्वज को बदलता है।
 जगन्नाथ संस्कृति का समन्वयवादी दर्शन: आदिवासी परंपरा से वेदांत तक - जगन्नाथ संस्कृति किसी संकीर्ण मत या संप्रदाय तक सीमित नहीं है। यह भारत की विभिन्न आध्यात्मिक धाराओं का एक अद्भुत संश्लेषण (Synthesis) है:।शबर (आदिवासी) और आर्य परंपरा का मिलन है।
भगवान जगन्नाथ के मुख्य पुजारियों को 'दैतापति' कहा जाता है। ये पुजारी गैर-ब्राह्मण हैं और स्वयं को शबर राजा विश्ववासु का वंशज मानते हैं। प्रतिवर्ष रथयात्रा और 'नवकलेवर' के समय सभी मुख्य अनुष्ठान इन्हीं दैतापतियों द्वारा संपन्न किए जाते हैं। यह इस बात का अनूठा प्रमाण है कि सनातन धर्म में आदिवासियों और वनवासियों को कितना उच्च और केंद्रीय स्थान दिया गया है। बौद्ध और जैन दर्शन का प्रभाव में बौद्ध मत: कई इतिहासकारों का मानना है कि जगन्नाथ मंदिर के गर्भगृह में स्थापित मूर्तियों के भीतर जो 'ब्रह्म पदार्थ' है, वह वास्तव में भगवान बुद्ध का दंत अवशेष है। रथयात्रा की परंपरा भी बौद्धों की संघयात्रा से साम्यता रखती है। जैन मत: जैन धर्म के अनुयायी जगन्नाथ को 'जिन्नाथ' (जैन तीर्थंकर) के रूप में देखते हैं। मूर्तियों का त्रिकोणीय विन्यास और कैवल्य (महाप्रसाद को 'कैवल्य वैकुंठ' भी कहा जाता है) की अवधारणा जैन दर्शन के निकट जान पड़ती है।
विभिन्न संप्रदायों का केंद्र पुरी ने भारत के लगभग सभी महान दार्शनिकों और संतों को आकर्षित किया है। आदि शंकराचार्य: ८वीं शताब्दी में जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने पुरी की यात्रा की और यहाँ 'गोवर्धन पीठ' की स्थापना की, जो भारत के चार प्रमुख मठों में से एक है। रामानुजाचार्य व मध्वाचार्य:  विशिष्टाद्वैत और द्वैतवादी आचार्यों ने पुरी में अपने-अपने मठ स्थापित किए और मंदिर की पूजा पद्धति को सुव्यवस्थित करने में योगदान दिया। श्री चैतन्य महाप्रभु: १६वीं शताब्दी में गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के प्रवर्तक श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने जीवन के अंतिम १८ वर्ष पुरी में ही व्यतीत किए। उन्होंने 'संकीर्तन आंदोलन' के माध्यम से जगन्नाथ भक्ति को जन-जन तक पहुँचाया।
दिव्य विग्रह और अनूठा अनुष्ठान: 'नवकलेवर' - संसार के अधिकांश हिंदू मंदिरों में मूर्तियां पत्थर, अष्टधातु या संगमरमर की होती हैं, जिनकी प्राण-प्रतिष्ठा एक बार होने के बाद उन्हें बदला नहीं जाता। परंतु श्री जगन्नाथ मंदिर में मूर्तियां नीम की लकड़ी (दारु) से बनी होती हैं, जिन्हें एक निश्चित अंतराल पर बदला जाता है। इस अलौकिक अनुष्ठान को 'नवकलेवर' (Nabakalebara) कहा जाता है। नवकलेवर अनुष्ठान सामान्यतः हर ८, १२ या १९ वर्ष के बाद आता है, जब हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास में 'मलमास' (अधिकमास) पड़ता है। इसका आध्यात्मिक अर्थ मानव शरीर के पुनर्जन्म के सिद्धांत से जुड़ा है, जैसा कि श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है: वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
दारु (नीम के पेड़) की खोज  में यह कोई साधारण खोज नहीं होती। दैतापति और वनयाग दल के सदस्य गुप्त संकेतों और कड़े नियमों के आधार पर विशिष्ट नीम के वृक्षों की खोज करते हैं। उन वृक्षों में निम्नलिखित लक्षण होने अनिवार्य हैं:पेड़ पर शंख, चक्र, गदा और पद्म के प्राकृतिक चिह्न होने चाहिए। पेड़ के पास कोई श्मशान या बांबी (सांप का बिल) होना चाहिए और वहाँ कोबरा सांप निवास करता हो। पेड़ के ऊपर कोई चिड़िया का घोंसला नहीं होना चाहिए। पेड़ पर कभी बिजली न गिरी हो।
ब्रह्म परिवर्तन - पेड़ को काटकर अत्यंत आदरपूर्वक पुरी लाया जाता है। मंदिर के भीतर बंद द्वारों के पीछे अत्यंत गुप्त रूप से नई मूर्तियां गढ़ी जाती हैं। आषाढ़ कृष्ण चतुर्दशी की मध्यरात्रि को पूरे पुरी शहर की बिजली काट दी जाती है। चारों तरफ घना अंधकार होता है।।मंदिर के सबसे वृद्ध और प्रधान पुजारी की आँखों पर पट्टी बांधी जाती है और हाथों में कपड़े लपेटे जाते हैं। वे पुरानी मूर्तियों के भीतर से 'ब्रह्म पदार्थ' (विष्णु का हृदय माना जाने वाला रहस्यमयी तत्व) निकालते हैं और उसे नई मूर्तियों में स्थापित करते हैं। इस प्रक्रिया को करने वाले पुजारियों का कहना है कि वह पदार्थ अत्यंत स्पंदनशील और सजीव प्रतीत होता है, जैसे कोई जीवित हृदय धड़क रहा हो। इसके पश्चात् पुरानी मूर्तियों को मंदिर परिसर के 'कोइली वैकुंठ' में भू-समाधि दे दी जाती है।
विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा: भ्रातृ-प्रेम और समरसता का उत्सव।- पुरी की रथयात्रा (Rath Yatra) विश्व का सबसे बड़ा और प्राचीनतम रथ उत्सव है। यह आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को आयोजित की जाती है। इस यात्रा में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा अपने मुख्य मंदिर से निकलकर अपनी मौसी के घर 'गुंडिचा मंदिर' जाते हैं।।तीनों भव्य रथों का विवरण।- रथों का निर्माण प्रतिवर्ष अक्षय तृतीया से शुरू होता है। इसमें किसी भी प्रकार के लोहे के कीलों या औजारों का प्रयोग नहीं किया जाता, केवल पारंपरिक लकड़ी की संधियों  का उपयोग होता है।।रथ का नामदेवतालकड़ी के पहियों की संख्यारथ का रंगऊंचाई (फुट) , नंदीघोष भगवान जगन्नाथ१६पीला और लाल४५.६ ,तालध्वज भगवान बलभद्र१४हरा और लाल४५ , देवदलन , देवी सुभद्रा१२काला और लाल४४.६ , छेरा पहरा की अनूठी परंपरा है। रथयात्रा की सबसे महत्वपूर्ण और प्रेरणादायी रस्म है 'छेरा पहरा'। जब तीनों रथ सज-धजकर तैयार हो जाते हैं, तब पुरी के गजापति महाराज (पारंपरिक राजा) पालकी में सवार होकर आते हैं। वे सोने की झाड़ू से रथों के चबूतरे की सफाई करते हैं और उस पर सुगंधित जल छिड़कते हैं।।यह रस्म यह संदेश देती है कि भगवान के दरबार में कोई राजा या रंक नहीं है; संसार का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति भी जगदीश्वर के सामने केवल एक 'झाड़ू लगाने वाला' (सेवक) है। यह सामाजिक समरसता और अहंकार-मुक्ति का चरम उदाहरण है।
आनंद बाज़ार और महाप्रसाद की महिमा - पुरी मंदिर की रसोई को विश्व की सबसे बड़ी पारंपरिक रसोई माना जाता है। यहाँ प्रतिदिन लगभग ५०,००० से अधिक भक्तों के लिए भोजन तैयार किया जाता है, जिसे 'महाप्रसाद' या 'अबढ़ा' कहा जाता है।।महाप्रसाद बनाने की तकनीक अत्यंत अनूठी और वैज्ञानिक है:।भोजन पकाने के लिए केवल मिट्टी के बर्तनों (कुडुआ) का उपयोग किया जाता है।।चूल्हे पर एक के ऊपर एक, ऐसे कुल ७ मिट्टी के बर्तन रखे जाते हैं। आश्चर्यजनक रूप से, जो बर्तन सबसे ऊपर (सातवें नंबर पर) होता है, उसका भोजन सबसे पहले पकता है, और जो सबसे नीचे आग के सीधे संपर्क में होता है, उसका भोजन सबसे अंत में पकता है। मंदिर परिसर में स्थित 'आनंद बाज़ार' में इस महाप्रसाद की बिक्री और वितरण होता है। सनातन धर्म में सामान्यतः छुआछूत और शुचिता के कड़े नियम रहे हैं, परंतु आनंद बाज़ार में सभी सामाजिक बंधन टूट जाते हैं। यहाँ एक ही पात्र से ब्राह्मण और समाज का सबसे वंचित व्यक्ति एक साथ बैठकर महाप्रसाद ग्रहण करते हैं। महाप्रसाद को कभी अपवित्र नहीं माना जाता; जमीन पर गिरे हुए अन्न को भी मस्तक से लगाकर ग्रहण किया जाता है।
पुरी केवल जगन्नाथ मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके आस-पास कई अन्य ऐतिहासिक और प्राकृतिक स्थल हैं जो इसके महत्व को बहुगुणित करते हैं। नरेंद्र सरोवर एक विशाल ऐतिहासिक तालाब है, जिसके मध्य में एक छोटा मंदिर स्थित है। वैशाख मास में यहाँ प्रसिद्ध 'चंदन यात्रा' का आयोजन होता है, जिसमें महाप्रभु की मदनमोहन प्रतिमा को नौका विहार कराया जाता है। स्वर्गद्वार पुरी का पवित्र तट है जहाँ हिंदुओं का अंतिम संस्कार किया जाता है। मान्यता है कि यहाँ प्राण त्यागने वाले या दाह-संस्कार पाने वाले जीव को सीधे मोक्ष (वैकुंठ) की प्राप्ति होती है। पुरी का समुद्र तट - बंगाल की खाड़ी का यह रेतीला तट न केवल पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है, बल्कि यह विश्व प्रसिद्ध 'रेत कला'  के लिए भी विख्यात है। यहाँ के स्थानीय कलाकार सुदर्शन पटनायक ने अपनी सैंड आर्ट से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित की है।।रघुराजपुर - पुरी से लगभग १४ किमी दूर स्थित यह गाँव 'पट्टचित्र'  कला का उद्गम स्थल है। यहाँ का प्रत्येक परिवार पारंपरिक चित्रकला, ताड़ के पत्तों पर नक्काशी और लकड़ी के खिलौने बनाने के कार्य में संलग्न है। यहाँ की सांस्कृतिक विरासत ओडिसी नृत्य के पुरोधा गुरु केलुचरण महापात्र से भी जुड़ी हुई है।
पुरी से जुड़े वैज्ञानिक और अनसुलझे रहस्य - आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के इस युग में भी जगन्नाथ मंदिर से जुड़े कुछ ऐसे प्राकृतिक और भौतिक विस्मय हैं, जिनका वैज्ञानिक सटीक उत्तर देने में असमर्थ रहे हैं:।हवा की विपरीत दिशा में ध्वज का फहराना: सामान्यतः तटीय क्षेत्रों में हवा समुद्र से धरती की ओर चलती है, परंतु मंदिर का मुख्य ध्वज हमेशा हवा की विपरीत दिशा में लहराता है।।गुंबद की परछाई न बनना: विज्ञान के प्रकाश-परावर्तन के नियमों के विपरीत, मुख्य मंदिर के भव्य गुंबद की परछाई दिन के किसी भी समय भूमि पर दिखाई नहीं देती। सिंहद्वार की ध्वनि तकनीक: जैसे ही आप मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार जिसे 'सिंहद्वार' कहा जाता है, में प्रवेश करते हैं, समुद्र की लहरों की गड़गड़ाहट पूरी तरह सुनाई देना बंद हो जाती है। द्वार से एक कदम बाहर आते ही वह ध्वनि पुनः सुनाई देने लगती है। मंदिर के ऊपर से कभी कोई पक्षी या हवाई जहाज उड़ता हुआ दिखाई नहीं देता। इसे 'नो फ्लाई ज़ोन' की तरह माना जाता है, जो प्राकृतिक रूप से घटित होता है।
पूरी शाश्वत शांति और एकात्मता का संदेश है।  श्री जगन्नाथ पुरी केवल एक भौगोलिक स्थान या ईंट-पत्थरों से बना देवालय नहीं है, बल्कि यह समग्र भारतीय अध्यात्म का मूर्त रूप है। यहाँ का दर्शन सिखाता है कि परमात्मा किसी वर्ग, जाति या संप्रदाय का एकाधिकार नहीं है। वे शबर कबीले के नीलमाधव भी हैं, वेदों के पुरुषोत्तम भी हैं, और बौद्धों के बुद्ध भी हैं।।पुरी की रथयात्रा और महाप्रसाद की परंपरामें  वैश्विक भ्रातृत्व (Universal Brotherhood) और समतावादी समाज की अनुपम सीख देती है। आज के इस अशांत और खंडित विश्व में, पुरी की यह उदार, समावेशी और प्रेममयी संस्कृति संपूर्ण मानवता के कल्याण और मानसिक शांति का मार्ग प्रशस्त करती है। नीलाद्रि शिखर पर लहराता हुआ पतितपावन ध्वज सदियों से मानव जाति को यही संदेश दे रहा है कि संकीर्णताओं से ऊपर उठकर जगदीश्वर के चरणों में आत्मसमर्पण करना ही जीवन की वास्तविक पूर्णता है।
संदर्भ - स्कंद पुराण (उत्कल खंड): पुरी के पौराणिक इतिहास, राजा इंद्रद्युम्न की कथा और पुरुषोत्तम क्षेत्र के महात्म्य का मूल संस्कृत स्रोत। मादला पांजी (Madala Panji): पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर का आधिकारिक और ऐतिहासिक दैनिक वृत्तपत्र (Chronicle), जो ताड़ के पत्तों पर प्राचीन काल से लिखा जा रहा है।'ओडिशा का इतिहास' (History of Orissa) - डॉ. हरेकृष्ण महताब: गंग राजवंश के उदय, मंदिर निर्माण के कालखंड और ओडिशा के राजनीतिक-सांस्कृतिक इतिहास की प्रामाणिक पुस्तक।'द कल्ट ऑफ जगन्नाथ एंड द रीजनल ट्रेडिशन ऑफ उड़ीसा' (The Cult of Jagannath and the Regional Tradition of Orissa) - एशमैन, कुल्के एवं त्रिपाठी: जगन्नाथ संस्कृति के सामाजिक, आदिवासी और दार्शनिक पहलुओं पर व्यापक शोध ग्रंथ।भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) रिपोर्ट: जगन्नाथ मंदिर के स्थापत्य, कलिंग शैली के विकास और संरक्षण संबंधी पुरातात्विक प्रलेख।