अरवल के ऐतिहासिक 'डीह' और हिरण्य प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत
सत्येन्द्र कुमार पाठक
मगध की पावन भूमि का इतिहास केवल बड़े साम्राज्यों, राजाओं और युद्धों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका वास्तविक इतिहास यहाँ की मिट्टी, प्राचीन टीलों (डीहों), विलुप्त होती नदियों और लोक-परंपराओं में सांस लेता है। वर्तमान बिहार का अरवल जिला (जो कभी प्राचीन मगध साम्राज्य का हृदय स्थल था) अपने भीतर एक ऐसी सांस्कृतिक और पुरातात्विक संपदा समेटे हुए है, जो प्रागैतिहासिक काल से लेकर मध्यकाल तक की कड़ियों को जोड़ती है। सोन (प्राचीन हिरण्यबाहु) और पुनपुन नदी के दोआब क्षेत्र में स्थित करपी डीह, उसरी डीह, कुरथा डीह और शहरतेलपा डीह केवल मिट्टी के ढेर नहीं हैं, बल्कि ये मानव सभ्यता के क्रमिक विकास के जीवंत दस्तावेज हैं। यह वह भूमि है जहाँ एक ओर चक्रवर्ती राजाओं की राजशाही का वैभव दिखा, तो दूसरी ओर महर्षि च्यवन जैसे ऋषियों की तपोभूमि ने आयुर्वेद को जन्म दिया। यह आलेख इन प्राचीन डीहों के ऐतिहासिक स्वरूप, विभिन्न कालखंडों में उनकी भूमिका, च्यवन-सुकन्या की पौराणिक गाथा और यहाँ प्रवाहित होने वाली छह प्रमुख सांस्कृतिक धाराओं का एक विस्तृत और प्रामाणिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। प्राचीन 'डीह' का स्वरूप और पुरातात्विक महत्व - पुरातात्विक और ऐतिहासिक शब्दावली में 'डीह' (Mound or Tell) का अर्थ उस ऊंचे स्थान या मिट्टी के टीले से होता है, जिसके नीचे कोई प्राचीन समृद्ध बस्ती, दुर्ग, मंदिर या नगर समय के थपेड़ों (बाढ़, युद्ध, महामारी) के कारण जमींदोज हो चुका हो। अरवल जिले के करपी, उसरी, कुरथा और शहरतेलपा ऐसे ही प्राचीन सभ्यता के केंद्र हैं। भौगोलिक दृष्टि से ये सभी स्थल नदियों के निकट ऊंचे स्थानों पर स्थित हैं। प्राचीन काल में जब नदियां अपनी दिशा बदलती थीं या विनाशकारी बाढ़ आती थी, तब ये ऊंचे टीले ही मानव बस्तियों के लिए सबसे सुरक्षित शरण-स्थल बनते थे।
करपी डीह: यह क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। यहाँ की मिट्टी के भीतर आज भी मौर्यकालीन और गुप्तकालीन ईंटें, मृदभांड (Pottery) और पाल-सेन युगीन मूर्तियाँ बिखरी पड़ी हैं। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि करपी प्राचीन काल में एक सुव्यवस्थित नागरिक बस्ती या प्रशासनिक केंद्र था।
शहरतेलपा और उसरी डीह: बौद्ध और पाल युगीन कला के दृष्टिकोण से ये स्थल अत्यंत समृद्ध रहे हैं। स्थानीय स्तर पर कृषि कार्यों या सामान्य खुदाई के दौरान मिलने वाले पुरातात्विक अवशेष यह दर्शाते हैं कि यहाँ कभी भव्य बौद्ध विहार या सामंतों के गढ़ हुआ करते थे।
मन्वंतर (पौराणिक काल) से लेकर पाल और सेन राजवंशों के शासनकाल तक, इन डीहों का स्वरूप और उनकी उपयोगिता लगातार बदलती रही। इस ऐतिहासिक यात्रा को निम्नलिखित कालखंडों के माध्यम से समझा जा सकता है: मन्वंतर (पौराणिक काल) - यह युग कबीलाई बस्तियों और आदि-मानव के प्राकृतिक आवासों का था। इस काल में करपी और उसके आसपास के डीह घने जंगलों से घिरे प्राकृतिक ऊंचे स्थान थे। इन्हें बाढ़ से सुरक्षित 'हाईलैंड सेटलमेंट्स' के रूप में उपयोग किया जाता था, जहाँ आदिम मानव संस्कृतियों और कबीलाई समाजों की नींव पड़ी। मौर्य काल (322-185 ईसा पूर्व) - मगध साम्राज्य के चरमोत्कर्ष के समय, पाटलिपुत्र के निकट होने के कारण इन डीहों का रणनीतिक महत्व बढ़ गया। सोन नदी के व्यापारिक मार्ग पर निगरानी रखने के लिए इन्हें सैन्य चौकियों (Military Outposts) या प्रशासनिक उप-केंद्रों के रूप में विकसित किया गया। यहाँ अनाज के बड़े भंडारण (Granaries) भी बनाए गए ताकि अकाल या युद्ध के समय सेना की रसद पूरी की जा सके।
गुप्त काल (चौथी से छठी शताब्दी)।- गुप्त साम्राज्य के 'स्वर्ण युग' में इन डीहों का कायाकल्प हुआ। मिट्टी के कबीलाई ढांचे अब पक्के ईंटों के भव्य मंदिरों और नागरिक आवासों में बदलने लगे। इस काल में करपी का क्षेत्र 'अग्रहार' (धार्मिक और शैक्षणिक बस्तियों) के रूप में उभरा, जहाँ विद्वान ऋषियों और आचार्यों को भूमि दान दी गई। हर्षवर्धन काल (606–647 ईस्वी) - सम्राट हर्षवर्धन के समय केंद्रीय सत्ता का थोड़ा विकेंद्रीकरण हुआ। इस काल में ये डीह स्थानीय सामंतों के गढ़ या रक्षात्मक छोटे दुर्गों (Fortified Villages) के रूप में कार्य करने लगे। चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांतों में मगध के ऐसे कई ऊंचे टीलों का उल्लेख मिलता है, जहाँ बौद्ध भिक्षु और हिंदू सन्यासी सह-अस्तित्व में रहते थे।
पाल एवं सेन काल (9वीं से 12वीं शताब्दी) - यह काल करपी और आसपास के क्षेत्रों के लिए मूर्तिकला और स्थापत्य का स्वर्ण काल साबित हुआ। पाल राजाओं (धर्मपाल और देवपाल) के समय करपी गढ़ तंत्रयान, वज्रयान और हिंदू शाक्त-शैव मत का एक बड़ा केंद्र बना। इस काल में यहाँ काले कसौटी पत्थर (Basalt) की अत्यंत सुंदर और भंगिमामय मूर्तियों का निर्माण और स्थापना की गई।
विभिन्न कालखंडों में डीह के स्वरूप का तुलनात्मक विवरण: डीहबार परंपरा: लोक-संस्कृति और देव उपासना
मागधी लोक-संस्कृति में 'डीहबार' (या डिहवार) की परिकल्पना अत्यंत अनूठी है। डीहबार का शाब्दिक अर्थ होता है — "डीह का स्वामी, स्वामी या रक्षक"। यह परंपरा वैदिक कर्मकांडों से इतर, विशुद्ध रूप से प्रागैतिहासिक और कृषक समाज की देन है।
डीहबार के सामाजिक और धार्मिक कार्य: - भौगोलिक रक्षक ग्रामीणों की अटूट मान्यता है कि डीहबार बाबा गाँव की सीवान (भौगोलिक सीमा) पर पहरा देते हैं। वे बाहरी दुष्ट आत्माओं, प्राकृतिक आपदाओं और महामारियों (जैसे चेचक, हैजा) से गाँव की रक्षा करते हैं।।लोक-अदालत के रूप में डीहबार स्थान को सबसे पवित्र माना जाता था। ग्रामीण आपसी विवादों को सुलझाने के लिए डीहबार बाबा के स्थान पर कसम खाते थे, जिसे अंतिम और सत्य माना जाता था।
नई फसल की पहली उपज हमेशा डीहबार को अर्पित की जाती थी ताकि भूमि की उर्वरता बनी रहे।
प्रमुख देव और उपासना पद्धति: - डीहबार के लोग मूलतः प्रकृति और शक्ति के आदिम रूपों की पूजा करते हैं, जिसका बाद में शास्त्रीय धर्म के साथ समन्वय हुआ: बरहम बाबा (ब्रह्म बाबा): इन्हें किसी मूर्ति के रूप में नहीं, बल्कि पीपल या बरगद के वृक्ष के नीचे मिट्टी या पत्थर की 'पिंडी' के रूप में पूजा जाता है। ये गाँव के सर्वोच्च संरक्षक माने जाते हैं। गोरैया बाबा और भुइयाँ बाबा: मगध के लोक-इतिहास में गोरैया बाबा को शौर्य और भूमि का रक्षक देवता माना जाता है। पशुधन और फसल की सुरक्षा के लिए इनकी अनिवार्य पूजा होती है। डीहवारिन माई (ग्राम देवी): डीहबार के साथ मातृशक्ति के रूप में डिहवारिन माई या सती माई की पूजा की जाती है, जो उर्वरता और लोक-कल्याण की प्रतीक हैं। हिरण्य प्रदेश की पौराणिक गाथा: राजा शर्याति, सुकन्या और महर्षि च्यवन - करपी डीह का इतिहास केवल राजाओं के शिलालेखों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध वैदिक काल की महान पौराणिक घटनाओं से है। प्राचीन काल में सोन नदी की मुख्य धारा करपी के निकट से बहती थी, जिसे स्वर्ण कणों की उपस्थिति के कारण 'हिरण्यबाहु नदी' कहा जाता था और इस पूरे क्षेत्र को 'हिरण्य प्रदेश' या 'कारूष देश' के नाम से जाना जाता था।
महर्षि च्यवन की तपोभूमि और मिट्टी का टीला (डीह) - वैदिक ग्रंथों के अनुसार, भृगु वंश के प्रतापी महर्षि च्यवन ने करपी के इसी निर्जन और पवित्र वन क्षेत्र में हजारों वर्षों तक घोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या इतनी निश्चल और दीर्घकालिक थी कि समय के साथ उनके स्थिर शरीर पर दीमकों ने मिट्टी का एक विशाल ढेर बना दिया। वह स्थान मिट्टी के एक टीले (बांबी) में बदल गया, जिसके भीतर से केवल उनकी दो आँखें जुगनू की तरह चमकती थीं। यह पौराणिक घटना इस बात का संकेत है कि 'डीह' शब्द की उत्पत्ति और महत्ता इस क्षेत्र में कितनी प्राचीन है। सुकन्या का कौतूहल और ऐतिहासिक विवाह -वैवस्वत मनु के पुत्र राजा शर्याति अपनी सुंदर और चंचल पुत्री सुकन्या तथा विशाल सेना के साथ इसी हिरण्य प्रदेश के जंगलों में आए थे। घूमते हुए सुकन्या उस मिट्टी के टीले के पास पहुँची। कौतूहलवश उसने एक तीखे कांटे से उस मिट्टी के छिद्र के भीतर चमकती हुई दो वस्तुओं को भेद दिया। वह वास्तव में च्यवन ऋषि की आँखें थीं, जो फूट गईं। ऋषि के अनजाने में हुए इस अपमान के कारण राजा की सेना पर भारी संकट आ पड़ा। जब राजा शर्याति को सत्य का पता चला, तो राजकुमारी सुकन्या ने अपने पिता के अपराध का प्रायश्चित करने के लिए स्वेच्छा से उस वृद्ध, जर्जर और अंधे महर्षि से इसी करपी की धरती पर विवाह कर लिया। राजसी वैभव को त्यागकर एक अंधे ऋषि की सेवा करना सुकन्या के अद्वितीय त्याग और स्वाभिमान का प्रतीक बना।'च्यवनप्राश' की प्राकट्य भूमि और कायाकल्प कूप - सुकन्या की अनन्य सेवा से प्रसन्न होकर देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमारों का करपी की इस पावन भूमि पर अवतरण हुआ। उन्होंने महर्षि च्यवन के जर्जर शरीर को पुनः युवा और दिव्य बनाने के लिए इस क्षेत्र की दुर्लभ जड़ी-बूटियों और रसायनों से एक दिव्य योग तैयार किया, जिसे आज पूरी दुनिया 'च्यवनप्राश' के नाम से जानती है।।अश्विनी कुमारों ने वहाँ एक दिव्य कूप (सरोवर) का निर्माण किया। जब च्यवन ऋषि ने उस औषधीय जल में डुबकी लगाई, तो वे अत्यंत रूपवान और युवा हो गए। लोक परंपरा में माना जाता है कि करपी डीह में जो प्राचीन कूप हाल के दिनों में विलुप्त कर दिया गया, वह इसी ऐतिहासिक और पौराणिक कायाकल्प की घटना का मूक गवाह था।।च्यवन ऋषि ने इसी भूमि पर राजा शर्याति के माध्यम से एक महान यज्ञ करवाकर देवराज इंद्र के अहंकार को तोड़ा था और अश्विनी कुमारों को यज्ञ में 'सोमपान' का न्यायोचित अधिकार दिलाया था। यह घटना सत्ता पर ज्ञान और तप की विजय की प्रतीक है। करपी डीह का धार्मिक भूगोल और पुरातात्विक संपदा - यदि हम करपी डीह और उसके आसपास के क्षेत्रों का भ्रमण करें, तो हमें इतिहास और आस्था का एक अद्भुत स्थापत्य ग्रिड दिखाई देता है। आपके द्वारा संकलित तथ्य यहाँ के धार्मिक भूगोल की वास्तविक तस्वीर पेश करते हैं: इस मुख्य परिसर के अलावा, आसपास बिखरे अन्य महत्वपूर्ण स्थल इस प्रकार हैं:।जंभेरा तट पर पांच सती स्थान (सती आडा): विलुप्त हिरण्यबाहु नदी की प्राचीन धारा 'जंभेरा' के तट पर स्थित यह स्थान स्त्री शक्ति, सतीत्व और त्याग के लोक-पूजन का केंद्र है, जो सुकन्या के आदर्शों से प्रेरित है।
गौड़धोवा के किनारे ब्रह्म बाबा: यह स्थान ऋषि और ब्रह्म संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है, जहाँ पूज्य पूर्वजों या संतों को समाज के मार्गदर्शक के रूप में पूजा जाता है। बेराउआ सरोवर एवं साहू फुलवारी एवं शिव मंदिर: जल संरक्षण और धार्मिक चेतना का समन्वय है।
रतन सरोवर और बाजार का शिव मंदिर: जन-आस्था के केंद्र जहाँ पीपल की छांव में प्राचीन शिवलिंग और कूप स्थित हैं।आधुनिक निर्माण (सूर्य मंदिर और हनुमान मंदिर): ग्रामीणों के सामूहिक प्रयास से निर्मित ये मंदिर प्राचीन सौर और वैष्णव भक्ति परंपरा को 21वीं सदी में भी निरंतरता प्रदान कर रहे हैं।
छह सांस्कृतिक धाराओं का महासंगम - करपी डीह का संपूर्ण पुरातात्विक और धार्मिक विन्यास भारत की छह प्रमुख वैचारिक और आध्यात्मिक धाराओं के अद्भुत समन्वय को प्रदर्शित करता है:।शाक्त संस्कृति का करपी मूलतः शक्ति साधना की भूमि रही है। करपी जगदंबा स्थान, पिंडी पर देवी की पिंडी, जंभेरा तट पर पांच सती स्थान (सती आडा) इसी शाक्त परंपरा के अंग हैं। पाल काल में यह क्षेत्र तांत्रिक योगिनी 'कुरंगी' की साधना से जुड़ा था। यहाँ शक्ति को केवल संहारक नहीं, बल्कि लोक-रक्षक मातृ रूप में पूजा जाता है।
शैव संस्कृति का परिसर में स्थापित पांच शिवलिंग, बेराउआ तालाब के किनारे का शिव मंदिर, बाजार का प्राचीन शिवलिंग और सबसे महत्वपूर्ण — शिव-पार्वती विहार की भंगिमामय मूर्तियाँ शैव मत के गहरे प्रभाव को दर्शाती हैं। गुप्त और हर्षवर्धन काल में यहाँ शिव के सौम्य, गृहस्थ और कल्याणकारी रूप की पूजा को विशेष बढ़ावा मिला।
वैष्णव संस्कृति में मंदिर में स्थापित भगवान चतुर्भुज (चार भुजाओं वाले विष्णु) की अत्यंत कलात्मक मूर्ति गुप्तकालीन वैष्णव चेतना की देन है। जब गुप्त सम्राटों ने 'परम भागवत' की उपाधि धारण की, तब मगध के इन आंचलिक क्षेत्रों में विष्णु पूजा का विस्तार हुआ। ग्रामीणों द्वारा निर्मित आधुनिक हनुमान मंदिर इसी वैष्णव-भक्ति धारा की आधुनिक कड़ी है। ब्रह्म संस्कृति में गौड़धोवा के किनारे 'ब्रह्म बाबा' का स्थान और पीपल की छांव में 'संत टीला' ब्रह्म संस्कृति के जीवंत उदाहरण हैं। यह वैदिक ज्ञान और लौकिक विश्वास का वह अनूठा संगम है जहाँ समाज के उत्थान के लिए जीवन समर्पित करने वाले संतों या श्रेष्ठ पूर्वजों को पूजनीय मानकर समाज का रक्षक बना दिया जाता है।
सौर संस्कृति में ।मगध का क्षेत्र प्राचीन काल से ही 'शाकद्वीपीय ब्राह्मणों' और सूर्य उपासना के लिए विश्वविख्यात रहा है (जैसे देव और उलार के सूर्य मंदिर)। करपी में रतन सरोवर, बेराउआ तालाब जैसे प्राचीन जलाशयों की उपस्थिति और ग्रामीणों द्वारा निर्मित सूर्य मंदिर सौर संस्कृति के प्रति अगाध श्रद्धा को रेखांकित करते हैं। सूर्य पूजा के लिए जल स्रोतों का होना अनिवार्य है, जो यहाँ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे। ऋषि एवं लोक-प्रकृति संस्कृति का हिरण्यबाहु और जंभेरा जैसी नदियों के अवशेष, पीपल के वृक्षों की छांव, प्राचीन कूप और गोरैया स्थान इस क्षेत्र की मूल ऋषि और लोक संस्कृति के परिचायक हैं। च्यवन ऋषि की यह तपोभूमि प्रकृति को ही ईश्वर मानती है। गोरैया स्थान और डीहबार की पूजा प्रागैतिहासिक कबीलाई और कृषक समाज की रीढ़ है, जो आज भी अक्षुण्ण है।
अरवल का करपी डीह और उसके अंतर्गत आने वाले उसरी, कुरथा तथा शहरतेलपा के टीले केवल स्थानीय आस्था के केंद्र नहीं हैं, बल्कि ये भारत के गौरवशाली इतिहास, आयुर्वेद की उत्पत्ति, और छह महान संस्कृतियों के महासंगम के जीवंत पुरातात्विक साक्ष्य हैं। प्राचीन कूपों का विलुप्त होना और ऐतिहासिक नदियों का अवशेष मात्र रह जाना हमारे लिए एक गंभीर चेतावनी है। यदि इन प्राचीन डीहों का वैज्ञानिक उत्खनन और दस्तावेजीकरण किया जाए, तो मगध के इतिहास के कई ऐसे पन्ने सामने आ सकते हैं जो अब तक दुनिया की नजरों से ओझल हैं। इस अनमोल विरासत को सहेजना, इसका संवर्धन करना और इसे वैश्विक पटल पर स्थापित करना वर्तमान पीढ़ी और शोधकर्ताओं का परम कर्तव्य है, ताकि च्यवन, सुकन्या और राजा शर्याति की यह पावन भूमि आने वाली पीढ़ियों को भी अपनी गौरवगाथा सुनाती रहे।