गुरुवार, जुलाई 02, 2026

गंगा और संगम की संस्कृति

बिहार की जीवनरेखा गंगा: ऐतिहासिक संगम, सांस्कृतिक चेतना
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
विहंगम वैचारिक पृष्ठभूमि में बिहार की भौगोलिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान गंगा और उसकी सहायक नदियों के प्रवाह पथ से निर्धारित होती है। यह केवल एक जलमार्ग नहीं, बल्कि महाजनपदों के उदय, ऋषियों की वैचारिक क्रांति और आधुनिक पर्यावरणीय चेतना की केंद्रीय धुरी है। प्रस्तुत आलेख गंगा बेसिन की विशालता, इसके तटों पर बसे ऐतिहासिक नगरों के साम्राज्यिक महत्व और इसके पुनरुद्धार में लगी संस्थाओं के अवदान का एक समग्र दस्तावेजीकरण है। बिहार में गंगा बेसिन की व्यापकता एवं जनसांख्यिकीय विन्यास - भौगोलिक और जलीय दृष्टि से संपूर्ण बिहार राज्य गंगा नदी के जलग्रहण क्षेत्र (कैचमेंट एरिया) का हिस्सा है। केंद्रीय जल आयोग और सेंटर फॉर गंगा रिवर बेसिन मैनेजमेंट एंड स्टडीज) के आधिकारिक नदी एटलस के अनुसार, बिहार के सभी ३८ जिले किसी न किसी उप-बेसिन  के माध्यम से गंगा से संबद्ध हैं।
, मुख्य गंगा नदी के तट पर सीधे तौर पर १२ जिले स्थित हैं: बक्सर, भोजपुर, सारण, पटना, वैशाली, समस्तीपुर, बेगूसराय, लखीसराय, खगड़िया, मुंगेर, भागलपुर और कटिहार। वर्ष २०११ की जनगणना और राज्य नीति आयोग के भू-स्थानिक आंकड़ों के समन्वय के आधार पर, बिहार के इस समृद्ध गंगा बेसिन क्षेत्र के अंतर्गत कुल ३९,१६४ राजस्व गांव  आते हैं। ये गांव मुख्य रूप से जलोढ़ मैदान पर स्थित हैं, जहाँ गंगा द्वारा लाई गई उपजाऊ मिट्टी कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का आधार है।
मुख्य गंगा तटीय क्षेत्र में : पटना, भोजपुर, बक्सर, बेगूसराय, कटिहार, भागलपुर, खगड़िया, लखीसराय, समस्तीपुर, वैशाली, सारण। पुनपुन और सोन बेसिन क्षेत्र: जहानाबाद, अरवल, औरंगाबाद। किउल-हरोहर एवं फल्गु/पंचाने प्रवाह क्षेत्र: गया, नवादा, नालंदा। कर्मनाशा और दक्षिण-पश्चिमी सोन क्षेत्र: रोहतास, कैमूर , बूढ़ी गंडक मुजफ्फरपुर है। 
 नदी-संगम और साम्राज्यिक नगरों का उद्भव - बिहार का इतिहास नदियों के संगम पर बने नगरों और उनके सामरिक-व्यापारिक विकास का इतिहास है। विभिन्न साम्राज्यों के काल में इन संगमों पर विशिष्ट नगरों की स्थापना की गई: . गंगा और सोन नदी का संगम: मनेर , शेरपुर एवं दानापुर (पाटलिपुत्र का अग्रभाग) -  साम्राज्यिक काल: हर्यंक राजवंश (५ वीं सदी ईसा पूर्व) से लेकर मुगल और सूर वंश (१६वीं सदी)। मूल रूप से पाटलिपुत्र की नींव मगध सम्राट अजातशत्रु के पुत्र उदायिन ने रखी थी। सोन और गंगा के इस प्राचीन संगम क्षेत्र (मनेर) को मध्यकाल में सूफी संतों ने अपनी चेतना का केंद्र बनाया। बाद में शेरशाह सूरी ने इस पूरे तटीय क्षेत्र के सामरिक महत्व को समझते हुए आधुनिक पटना की प्रशासनिक किलेबंदी की।।मनेर शरीफ सूफी संस्कृति का महान केंद्र बना, जो गंगा-जमुनी तहजीब और जल-व्यापार का मुख्य नाका था।
गंगा और पुनपुन नदी का संगम: फतुहा - प्राचीन मगध काल से लेकर मध्यकालीन कबीर पंथ का उत्कर्ष काल में  पटना से पूर्व में जहाँ पुनपुन, मढ़र और गंगा का मिलन होता है, उस त्रिवेणी पर फतुहा नगर का विकास हुआ। यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही वस्त्र उद्योग (सूती वस्त्र) और कृषि व्यापार का बड़ा केंद्र रहा। धार्मिक रूप से इसे कबीरपंथियों का प्रमुख गढ़ माना गया, जहाँ प्रतिवर्ष विशाल सांस्कृतिक समागम होते आए हैं।
गंगा और गंडक नदी का संगम: हाजीपुर और सोनपुर - साम्राज्यिक काल: वज्जि संघ (वैशाली काल) और मध्यकालीन बंगाल सल्तनत में  १४वीं शताब्दी में बंगाल के सुल्तान हाजी इलियास शाह ने गंडक और गंगा के इस सामरिक मुहाने पर हाजीपुर शहर की स्थापना की। इसके ठीक सामने सारण तट पर सोनपुर स्थित है।
: यह संगम स्थल प्राचीन काल से ही 'हरिहर क्षेत्र' के रूप में विख्यात है। पौराणिक मान्यताओं में यह गज-ग्राह की मोक्ष भूमि है, जिसने कालांतर में विश्व के सबसे बड़े पशु मेले का रूप लिया।  गंगा और सरयू (घाघरा) नदी का संगम: छपरा है। साम्राज्यिक काल: गुप्त काल, पाल काल और ब्रिटिश व्यापारिक काल में डोरीगंज के समीप सरयू नदी का गंगा में विलय होता है। इस संगम क्षेत्र के प्रभाव से छपरा एक विशाल व्यापारिक मंडी के रूप में विकसित हुआ। शोरा नमक , और अफीम के व्यापारिक काल में डच, फ्रांसीसी और ब्रिटिश जहाजों के लिए यह गंगा मार्ग का मुख्य पड़ाव था।. गंगा और कोसी/बूढ़ी गंडक का संगम: खगड़िया और कुरुसेला (कटिहार) का साम्राज्यिक काल में  अंग महाजनपद और पाल राजवंश है। खगड़िया में बूढ़ी गंडक और कुरुसेला में कोसी का गंगा से मिलन होता है। ये क्षेत्र जल-परिवहन और जलीय जैव-विविधता (जैसे गांगेय डॉल्फिन) के ऐतिहासिक गवाह रहे हैं।
बिहार की भूमि केवल राजनीतिक साम्राज्यों की ही नहीं, बल्कि वैश्विक आध्यात्मिक क्रांतियों की जननी रही है। यहाँ छह प्रमुख धार्मिक धाराओं का अद्भुत समन्वय देखा जा सकता है: । 
सौर संस्कृति (सूर्य उपासना): बिहार की आत्मा में रची-बसी सौर संस्कृति का सबसे प्रदीप्त उदाहरण महापर्व छठ है। यह किसी मूर्ति की नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष प्रकृति और ऊर्जा के स्रोत सूर्य की आराधना का पर्व है, जो वैदिक कालीन ऋचाओं के व्यावहारिक जीवंत रूप को दर्शाता है। औरंगाबाद का त्रेतायुगीन देव सूर्य मंदिर और गया का सूर्यपोखर इसके पुरातात्विक साक्ष्य हैं।
शाक्त संस्कृति: शक्ति पूजा के अंतर्गत ५१ शक्तिपीठों में शुमार पटना की पटन देवी, मुंगेर का चंडिका स्थान (सती की बाईं आँख गिरने की मान्यता), और सारण का आमी (अम्बिका भवानी) मंदिर इस क्षेत्र की तांत्रिक और शाक्त साधना की प्राचीनता को प्रमाणित करते हैं।
ब्रह्म (ऋषि परंपरा): बक्सर की धरती महर्षि विश्वामित्र की तपोभूमि रही, जहाँ उन्होंने सनातन संस्कृति के संरक्षकों (राम-लक्ष्मण) को अस्त्र-शस्त्र और ब्रह्मज्ञान की शिक्षा दी। मिथिला क्षेत्र में महर्षि याज्ञवल्क्य (उपनिषद कालीन दार्शनिक), गौतम ऋषि और उनकी पत्नी अहिल्या का प्रसंग न्याय दर्शन की तार्किकता को रेखांकित करता है। कपिल मुनि का आश्रम सांख्य दर्शन का प्रणेता बना।
शैव संस्कृति: सुलतानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा के बीच स्थित अजगैबीनाथ मंदिर शैव साधना का अप्रतिम उदाहरण है। इसके अतिरिक्त, सोनपुर का हरिहरनाथ मंदिर भारतीय धर्म की वह अनूठी धरोहर है जहाँ शैव (शिव) और वैष्णव (विष्णु) मतों के ऐतिहासिक संघर्ष को समाप्त कर दोनों की संयुक्त पूजा की परंपरा शुरू की गई।
वैष्णव संस्कृति: गया का विष्णुपद मंदिर और फल्गु नदी का तट वैष्णव मत का वैश्विक केंद्र है। यह पितृपक्ष के दौरान पूरे विश्व के सनातन धर्मावलंबियों के लिए मोक्ष और पिंडदान का एकमात्र सर्वोपरि स्थल है
बौद्ध संस्कृति: 'बिहार' शब्द की उत्पत्ति ही बौद्ध भिक्षुओं के 'विहार' करने से हुई है। बोधगया में निरंजना (फल्गु) नदी के तट पर सिद्धार्थ को बुद्धत्व की प्राप्ति हुई। इसके बाद राजगीर, वैशाली और नालंदा बौद्ध दर्शन, शून्यवाद और अंतरराष्ट्रीय शिक्षा (नालंदा विश्वविद्यालय) के वैश्विक दीपस्तंभ बने।
जैन संस्कृति: जैन धर्म के अंतिम और २४वें तीर्थंकर भगवान महावीर की जन्मस्थली वैशाली का कुंडलपुर है और उनकी निर्वाण स्थली नालंदा का पावापुरी (जल मंदिर) है। राजगीर की पंच पहाड़ियों पर स्थित जैन मंदिर इस बात के जीवंत प्रमाण हैं कि बिहार की माटी ने संसार को अपरिग्रह और अहिंसा का पहला पाठ पढ़ाया।
वर्तमान सदी में गंगा नदी के अस्तित्व, इसकी अविरलता और निर्मलता को बनाए रखने के लिए विभिन्न स्तरों पर संस्थागत और सामाजिक प्रयास किए जा रहे हैं। इनमें तीन संस्थाओं और मिशनों का योगदान सबसे महत्वपूर्ण है: । जीवनधारा नमामि गंगे - केवल एक सरकारी परियोजना नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना का आंदोलन है। इसके तहत निम्नलिखित कार्य प्रमुखता से किए जा रहे हैं । गंगा में गिरने वाले शहरी सीवेज (गंदे पानी) को रोकने के लिए 'एसटीपी' (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट) की स्थापना।  गंगा की महत्ता को जन-जन तक पहुँचाने के लिए घाटों का आधुनिकीकरण और 'गंगा आरती' जैसे सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से पर्यटन और आस्था को जोड़ना। नदी-तटीय कृषि: गंगा के दोनों किनारों पर जैविक खेती को बढ़ावा देना ताकि रासायनिक उर्वरकों का रिसाव नदी के जल को दूषित न करे।
नमामि गंगे की ओर से चलाए जा रहे परियोजना द्वारा गंगा के पवित्र अविरल धारा को स्वच्छ संरक्षण एवं सम्वर्द्धन और पर्यावरण का संरक्षण प्रारम्भ है । 
. दिव्य गंगा  सेवा  मिशन - इस मिशन का मुख्य ध्यान गंगा के आध्यात्मिक वैभव की पुनर्स्थापना और उसकी जलीय जैव-विविधता के संरक्षण पर है ।  सुल्तानगंज से कहलगंव (भागलपुर) के बीच स्थित 'विक्रमशिला गांगेय डॉल्फिन अभयारण्य' की देखरेख और राष्ट्रीय जल जीव (डॉल्फिन/सोंस) के संरक्षण में इस मिशन ने बड़ी भूमिका निभाई है।  गंगा के जलस्तर को बनाए रखने के लिए इसके जलग्रहण क्षेत्रों और सहायक नदियों (जैसे सोन, पुनपुन, बूढ़ी गंडक) के किनारों पर व्यापक स्तर पर वनीकरण  अभियान चलाना है। 
जिला गंगा समिति -  राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन की जमीनी स्तर पर कार्य करने वाली सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक और जन-भागीदारी इकाई है। बिहार के सभी १२ गंगा तटीय जिलों के जिलाधिकारियों की अध्यक्षता में गठित ये समितियां स्थानीय स्तर पर काम करती हैं:।: जिला स्तर पर ठोस कचरा प्रबंधन  को देखना और यह सुनिश्चित करना कि औद्योगिक अपशिष्ट सीधे नदी में न जाएँ।।स्थानीय युवाओं, मछुआरों और स्वयंसेवी संस्थाओं को 'गंगा दूत' के रूप में संगठित करना। प्लास्टिक मुक्त गंगा अभियानों का संचालन करना और घाटों की स्वच्छता बनाए रखना।
सहायक नदियों का पुनरुद्धार: मुख्य गंगा को साफ रखने के लिए ज़िला स्तर पर मिलने वाली छोटी बरसाती नदियों और नालों की जियो-टैगिंग व सफाई सुनिश्चित करना जरूरी है। बिहार का अतीत, वर्तमान और भविष्य गंगा बेसिन के जल प्रबंधन और इसकी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर निर्भर है। प्राचीन काल में जहाँ उदायिन और हाजी इलियास शाह जैसे शासकों ने नदी तटों पर साम्राज्यों की स्थापना की, वहीं याज्ञवल्क्य, बुद्ध और महावीर ने इसके मैदानों में विचारों की अमर फसल उगाई। आज के युग में, जब पर्यावरण संकट गहरा रहा है, 'जीवनधारा नमामि गंगे', 'दिव्य गंगा मिशन' और 'जिला गंगा समिति' जैसी संस्थाएं आधुनिक तकनीक और जन-भागीदारी के माध्यम से इस महान नदी के पुनरुद्धार के संकल्प को सिद्ध कर रही हैं। गंगा की निर्मलता ही बिहार की समृद्धि और इसकी सांस्कृतिक चेतना की दीर्घायु का एकमात्र मार्ग है।

नाथ संप्रदाय और योगी संप्रदाय

नाथ और योगी संप्रदाय: उद्भव 
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
भारतीय आध्यात्मिक वांग्मय में 'नाथ संप्रदाय' और 'योगी (जोगी) संप्रदाय' अंतश्चेतना को जाग्रत करने वाली एक अत्यंत प्रभावशाली और जीवंत परंपरा रहे हैं। यह संप्रदाय केवल कंदराओं में बैठकर समाधि लगाने वाले साधुओं का समूह मात्र नहीं है, बल्कि इसने भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक, भाषाई और दार्शनिक परिदृश्य को आमूलचूल परिवर्तित किया है। तात्विक रूप से 'नाथ' और 'योगी' संप्रदाय एक ही सिक्के के दो पहलू हैं—जहाँ 'नाथ' इस पंथ की दार्शनिक प्रतिष्ठा और गुरु-परंपरा को दर्शाता है, वहीं 'योगी' या 'जोगी' इसके व्यावहारिक स्वरूप और साधकों के क्रियात्मक जीवन का परिचायक है।
नाथ और योगी संप्रदाय की स्थापना के इतिहास को समझने के लिए हमें इसे दो दृष्टिकोणों से देखना होगा:
धार्मिक ग्रंथों और संप्रदाय की आंतरिक मान्यताओं के अनुसार, इस संप्रदाय के आदि-प्रवर्तक स्वयं भगवान शिव हैं, जिन्हें 'आदिनाथ' कहा जाता है। 'नाथ चरित' और 'सिद्ध सिद्धांत पद्धति' के अनुसार, सृष्टि के प्रारंभ में भगवान शिव ने योग और तंत्र के जिन गूढ़ रहस्यों का प्रतिपादन माता पार्वती के समक्ष किया था, वही ज्ञान परंपरा आगे चलकर धरा पर प्रवाहित हुई। इस दृष्टि से यह संप्रदाय अनादि और शाश्वत है
ऐतिहासिक धरातल पर नाथ संप्रदाय को एक सुव्यवस्थित आंदोलन के रूप में स्थापित करने का श्रेय 9वीं-10वीं शताब्दी में गुरु मच्छिंद्रनाथ (मत्स्येन्द्रनाथ) और उनके महान शिष्य महायोगी गोरखनाथ (गोरक्षनाथ) को जाता है। मच्छिंद्रनाथ ने तांत्रिक साधनाओं को परिष्कृत कर लोक-कल्याण के मार्ग पर मोड़ा है। गुरु गोरखनाथ (11वीं-12वीं शताब्दी) ने इस संप्रदाय को अखिल भारतीय स्तर पर संगठित किया। उन्होंने देश के विभिन्न अंचलों में बिखरे हुए योगियों, सिद्धों और साधकों को एक सूत्र में पिरोकर 'बारह पंथी योगी संप्रदाय' की नींव रखी। गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) इस संप्रदाय का केंद्रीय पीठ बना है। नाथ परंपरा में 'नवनाथों' को शिव का अवतार और अजन्मा माना गया है। लोक-कल्याण के लिए समय-समय पर उनका प्राकट्य विभिन्न अद्भुत माध्यमों से हुआ, जो प्रतीकात्मक रूप से प्रकृति और पंचतत्वों पर उनके नियंत्रण को दर्शाता है:।मच्छिंद्रनाथ (मत्स्येन्द्रनाथ): इनका प्राकट्य मछली के उदर से माना जाता है। सागर की तरंगों के बीच शिव-पार्वती के संवाद को श्रवण करने के कारण इन्हें आदिज्ञान प्राप्त हुआ। ये योग और तंत्र के आदि-व्याख्याता हैं।।गोरखनाथ (गोरक्षनाथ): गुरु मच्छिंद्रनाथ के आशीर्वाद स्वरूप एक कल्याणी स्त्री को दी गई भस्म से, बारह वर्ष बाद गोबर के ढेर से इनका प्राकट्य हुआ। 'गोरक्ष' का अर्थ है इंद्रियों की रक्षा करने वाला। ये परम जितेंद्रिय और संगठनकर्ता थे।।जालंधरनाथ: इनका प्राकट्य यज्ञ कुंड के पवित्र जल या अंतरिक्ष से माना जाता है। इनका प्रभाव उत्तर-पश्चिम भारत में सर्वाधिक था।।कनीफनाथ (कानिफनाथ): हाथी के कर्ण (कान) से प्रकट होने के कारण इन्हें कनीफनाथ कहा गया। यह प्रतीकात्मक रूप से श्रवण-साधना (नादानुसंधान) की पराकाष्ठा को दर्शाता है। ये तंत्र विद्या के प्रखर ज्ञाता थे। गाहिनीनाथ (गहिनीनाथ): इनका प्राकट्य नदी तट या कीचड़ (कमल की भांति) से माना जाता है। ये करुणा और औषधि ज्ञान के सागर थे। भर्तृहरिनाथ: ये उज्जैन के प्रतापी परमारवंशी राजा थे, जो अपनी रानी पिंगला के वियोग और संसार की नश्वरता को देखकर वैराग्य की ओर प्रवृत्त हुए और गोरखनाथ के शिष्य बने।।रेवणनाथ: रेवा (नर्मदा) नदी के पावन तट पर प्रकट होने के कारण इनका नाम रेवणनाथ पड़ा। इन्होंने दक्षिण भारत में सिद्धियों का प्रसार किया।।चर्पटनाथ (चर्पटीनाथ): रसायनों और धातुओं से दिव्य औषधियां बनाने की कला (रस-विद्या) के चमत्कार से इनका प्राकट्य संबद्ध है। नागनाथ: इन्हें नागवंशी शक्तियों का प्रतीक माना जाता है, जिन्होंने 'नाग योग' और कुंडलिनी जागरण के रहस्यों को प्रतिपादित किया। भौगोलिक विस्तार और महासिद्धों की कर्मभूमि - नाथ पंथ के संतों ने 'रमता जोगी बहता पानी' के सिद्धांत को जिया। उन्होंने किसी एक स्थान को अपनी सीमा नहीं बनाया, बल्कि संपूर्ण अखंड भारत और उसके पार भी अपनी कर्मभूमि का विस्तार किया:
नाथ संत प्रमुख साधना स्थल एवं कर्मभूमि (भौगोलिक क्षेत्र) में 1 मच्छिंद्रनाथ कामरूप (असम), बंगाल, नेपाल (काठमांडू घाटी) और चंद्रगिरि (दक्षिण भारत)। 2 गोरखनाथ गोरखपुर (उत्तर प्रदेश), टिल्ला जोगियां (झेलम, वर्तमान पाकिस्तान), कछार (गुजरात), कांगड़ा (हिमाचल) और नेपाल।।3 जालंधरनाथ जालंधर (पंजाब), कांगड़ा घाटी, और राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्र। 4 कनीफनाथ मढ़ी (अहमदनगर, महाराष्ट्र), बंगाल और पूर्वी भारत के तांत्रिक क्षेत्र।।5 गाहिनीनाथ नारायणगढ़, चिंचवड (महाराष्ट्र) और गोदावरी नदी का तटवर्ती क्षेत्र। 6 भर्तृहरिनाथ उज्जैन (मध्य प्रदेश), सरिस्का की गुफाएं (राजस्थान) और चुनारगढ़ (उत्तर प्रदेश)। 7 रेवणनाथ विटा-सांगली (महाराष्ट्र) और बीजापुर (कर्नाटक) सहित संपूर्ण दक्षिण भारत। 8 चर्पटनाथ चंबा रियासत (हिमाचल प्रदेश) और तिब्बत की सीमा से लगे हिमालयी क्षेत्र। 9 नागनाथ औंढा नागनाथ (हिंगोली, महाराष्ट्र) और श्रीशैलम (आंध्र प्रदेश) है। 

इतिहासकारों में  डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी और डॉ. पीतांबरदत्त बड़थ्वाल) के अनुसार, नवनाथों का मुख्य सक्रियता काल 8वीं शताब्दी से 13वीं शताब्दी के मध्य रहा है। यह भारतीय इतिहास का वह संधिकाल था जब देश राजनीतिक अस्थिरता और विदेशी आक्रमणों का सामना कर रहा था। इस काल में नाथों ने निम्नलिखित साम्राज्यों के समांतर लोक-चेतना को दिशा दी: पाल और सेन राजवंश (पूर्वी भारत): मच्छिंद्रनाथ और कनीफनाथ का समय बंगाल के पाल राजाओं (जैसे राजा गोपीचंद) के समकालीन था। यहाँ बौद्ध धर्म की बज्रयान शाखा और नाथ पंथ का गहरा अंतर्संबंध स्थापित हुआ। महाराष्ट्र में यादव राजाओं के शासनकाल में गाहिनीनाथ और गोरखनाथ का व्यापक प्रभाव था। गाहिनीनाथ ने ही संत निवृत्तिनाथ को दीक्षा दी, जिन्होंने आगे चलकर संत ज्ञानेश्वर के माध्यम से 'वारकरी संप्रदाय' की नींव रखी। परमार और प्रतिहार राजवंश (मध्य भारत): राजा भर्तृहरि का संबंध उज्जैन के परमार वंश से माना जाता है, जो कला और संस्कृति के महान संरक्षक थे। तुर्क आक्रमण का काल (उत्तर भारत): राजा पृथ्वीराज चौहान के समय और उसके ठीक बाद, जब उत्तर भारत में महमूद गजनवी और मोहम्मद गोरी के आक्रमणों से हिंदू समाज बिखर रहा था, तब गुरु गोरखनाथ ने जाति-पाति से ऊपर उठकर एक सुदृढ़ आध्यात्मिक रक्षा-कवच तैयार किया।
नाथ संप्रदाय का अवदान केवल धार्मिक दीक्षा तक सीमित नहीं था। उन्होंने राष्ट्र के सामाजिक ताने-बाने को पुनर्जीवित करने में युगांतरकारी भूमिका निभाई हैं । भगवान पतंजलि के राजयोग को जनसाधारण के लिए सुलभ बनाने का श्रेय नाथों को है। उन्होंने 'हठयोग' (ह = सूर्य/प्राण, ठ = चंद्र/अपान) का प्रतिपादन किया। गुरु गोरखनाथ कृत 'गोरक्ष संहिता', 'सिद्ध सिद्धांत पद्धति' और बाद में इसी परंपरा में लिखे गए 'हठयोग प्रदीपिका' तथा 'घेरंड संहिता' जैसे ग्रंथ आज पूरे विश्व में योग विज्ञान के प्रामाणिक आधार हैं। प्राणायाम, षटकर्म, मुद्रा और नादानुसंधान की व्यावहारिक विधियां नाथ पंथ की ही देन  है। 
मध्यकाल में जब समाज छुआछूत, जातिगत संकीर्णता और खोखले कर्मकांडों में जकड़ा हुआ था, तब नाथ संप्रदाय ने घोषणा की कि परमात्मा की भक्ति पर किसी एक वर्ग का एकाधिकार नहीं है। उन्होंने अंत्यज (पिछड़े) और शोषित समाज को गले लगाया। दीक्षा के समय कान छिदवाकर स्फटिक के कुंडल (मुद्रा) धारण करने के कारण इन्हें 'कानफटा जोगी' कहा गया, जिसमें राजा और रंक का भेद समाप्त हो जाता था। संत कबीर, गुरु नानक देव और संत ज्ञानेश्वर के साहित्य पर नाथों की विचार-सरणि का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है।
नाथ संप्रदाय के संतों, विशेषकर चर्पटनाथ और गाहिनीनाथ ने पारे (पारद), गंधक और विभिन्न धातुओं के शोधन से 'भस्म' और दिव्य औषधियां बनाने की 'रस-विद्या' को चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया। उन्होंने वनों और कंदराओं में रहकर जड़ी-बूटियों के माध्यम से ऐसी चिकित्सा प्रणालियाँ विकसित कीं, जो असाध्य रोगों को दूर करने में सक्षम थीं। लोक-कल्याण के लिए चिकित्सा को अध्यात्म से जोड़ना उनका महान अवदान है। 
नाथों ने अपने उपदेशों के लिए संस्कृत की क्लिष्टता को छोड़कर लोकभाषाओं (अपभ्रंश, सधुक्कड़ी, देशभाषा और पुरानी हिंदी/मराठी) को चुना। गुरु गोरखनाथ की 'सबदियां' और 'पद' हिंदी साहित्य के आदिकाल की अमूल्य धरोहर हैं। उन्होंने समाज को सीधे संवाद की भाषा दी, जिसने आगे चलकर भक्ति आंदोलन की पीठिका तैयार की।।नाथ संप्रदाय ने भारत की भौगोलिक सीमाओं को एक अनूठे सांस्कृतिक सूत्र में पिरोया। एक नाथ योगी उत्तर के टिल्ला जोगियां से चलकर दक्षिण के श्रीशैलम तक और पूर्व के कामरूप से पश्चिम के द्वारका-कछार तक निर्बाध यात्रा करता था। इस 'विरासत यात्रा' ने भारत को एक संप्रभु सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में जीवित रखा। नेपाल और भारत के सांस्कृतिक संबंधों की प्रगाढ़ता में गुरु गोरखनाथ और मच्छिंद्रनाथ का स्थान सर्वोपरि है। नवनाथों द्वारा स्थापित और पोषित नाथ एवं योगी संप्रदाय भारतीय संस्कृति का वह अक्षय वटवृक्ष है जिसकी जड़ें आदिनाथ शिव में हैं और शाखाएं वैश्विक धरातल पर योग के रूप में फैली हुई हैं। उन्होंने तंत्र को अश्लीलता से निकालकर लोक-कल्याण की साधना बनाया, योग को महलों से निकालकर झोपड़ियों तक पहुँचाया और समाज को समरसता का पाठ पढ़ाया। आज भी इस संप्रदाय के मंदिर, धुनियाँ, आश्रम और 'अलख निरंजन' का उद्घोष हमें आंतरिक शुचिता, शारीरिक स्वास्थ्य और आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होने की निरंतर प्रेरणा देते हैं।
संदर्भ ग्- नाथ संप्रदाय — डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ,गोरखबानी — डॉ. पीतांबरदत्त बड़थ्वाल ,सिद्ध सिद्धांत पद्धति — महायोगी गोरखनाथ ,नाथ लीलामत ।