मंगलवार, अगस्त 11, 2026

आत्म ज्योतिर्लिंग देवघर और संथाल

बाबा आत्मलिंगम ज्योतिर्लिंग रावणेश्वर ज्योतिर्लिंग देवघर  , झारखंड 
वासुकीनाथ , जरमुंडी , दुमका , झारखंड 
सावन माह  और आत्मलिंगम वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग 
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
भारत की सनातन परंपरा मात्र पूजा-पद्धति की एक व्यवस्था नहीं, अपितु मन्वंतर काल से अक्षुण्ण प्रवाहित होती आ रही दार्शनिक, ऐतिहासिक एवं सामाजिक चेतना की अविरल धारा है। इस संस्कृति के केंद्र में भगवान शिव का तत्त्व स्थापित है, जिन्हें 'काल के भी काल' महाकाल और 'कल्याणकारी' माना गया है।
आषाढ़ के अंत के साथ ही जब श्रावण (सावन) मास का आगमन होता है, तो संपूर्ण आर्यावर्त शिवमय हो उठता है। सावन मास का प्रत्येक दिन, विशेषकर इसके सोमवार, प्रकृति और पुरुष के एकात्म भाव, तप, त्याग और लोक-कल्याण के उत्सव के रूप में मनाए जाते हैं। सावन का दूसरा सोमवार इस शृंखला में अत्यंत विशेष माना गया है, क्योंकि यह साधना की पराकाष्ठा, जल-अर्पण की परंपरा और समुद्र मंथन की लोक-कल्याणकारी कथा से सीधा संबंध रखता है।। सावन माह के दूसरे सोमवार की पौराणिक व ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, शैव-शाक्त व नाग संस्कृति के अंतरसंबंध, 12 ज्योतिर्लिंगों एवं उप-ज्योतिर्लिंगों के साम्राज्यिक , नाथ संप्रदाय के योगदान तथा बिहार-झारखंड के प्रमुख शैव तीर्थों (बैद्यनाथ, बासुकीनाथ, और अजगैबीनाथ है।
पौराणिक कालक्रम के अनुसार, सावन माह का सीधा संबंध मन्वंतर कालीन समुद्र मंथन से है। श्रीमद्भागवत पुराण एवं शिव पुराण के अनुसार, जब देवों और असुरों द्वारा क्षीरसागर का मंथन किया जा रहा था, तब चौदह रत्नों से पूर्व अत्यंत दाहक 'हलाहल' नामक विष निकला। इस विष की ज्वाला से तीनों लोक जलने लगे। सृष्टि की रक्षा हेतु भगवान शिव ने बिना किसी संकोच के उस विष का पान कर लिया और उसे अपने कंठ में रोक लिया, जिससे वे 'नीलकंठ' कहलाए। विष के तीव्र ताप से शिवजी के शरीर में उत्पन्न जलन को शांत करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने उत्तरवाहिनी नदियों और पवित्र जलाशयों से लाकर उन पर जल अर्पित किया। यह घटना सावन मास में घटी थी। तभी से सावन के प्रत्येक सोमवार, विशेष रूप से द्वितीय सोमवार को, भगवान शिव पर जलाभिषेक और दुग्धाभिषेक करने की सनातन परंपरा का प्रादुर्भाव हुआ।
वैदिक एवं पौराणिक काल से निकलकर जब शिव-उपासना ऐतिहासिक कालखंडों में पहुँची, तो भारत के विभिन्न राजवंशों ने शैव स्थलों को स्थापत्य और संस्कृति के केंद्र के रूप में स्थापित किया।।गुप्त साम्राज्य (4वीं-6ठी शताब्दी ई.): गुप्त काल को हिंदू धर्म के पुनर्जागरण का युग माना जाता है। इस काल में त्रिपुरी, भूमरा, और नचना कुठार में प्रथम बार पत्थर के सुव्यवस्थित शिव मंदिरों का निर्माण हुआ। चोल एवं पल्लव राजवंश: दक्षिण भारत में चोल शासक राजा राज चोल प्रथम ने तंजौर में 'बृहदेश्वर मंदिर' का निर्माण कराकर शैव स्थापत्य को वैश्विक पहचान दी। राष्ट्रकूट साम्राज्य: राजा कृष्ण प्रथम ने एलोरा में एक ही चट्टान को ऊपर से नीचे काटकर विश्व प्रसिद्ध 'कैलाश मंदिर' का निर्माण कराया, जो स्थापत्य कला का अद्भुत चमत्कार है। परमार एवं चंदेल वंश: मालवा के राजा भोज ने धार और भोजपुर में भव्य शिव मंदिरों की नींव रखी, जबकि चंदेल शासकों ने खजुराहो में कंदरिया महादेव का निर्माण कराया। मराठा साम्राज्य एवं अहिल्याबाई होल्कर: 18वीं शताब्दी में जब मध्यकालीन आक्रमणों के कारण भारत के अधिकांश ज्योतिर्लिंग और शिव धाम क्षतिग्रस्त हो चुके थे, तब मालवा की महारानी पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर ने सोमनाथ, काशी विश्वनाथ, ओंकारेश्वर, घृष्णेश्वर और त्र्यंबकेश्वर का पुनरुद्धार करवाकर सनातन संस्कृति को नया जीवन दिया।
. शैव, शाक्त एवं नाग संस्कृति - भारतीय धर्मदर्शन में शैव (शिव के उपासक), शाक्त (शक्ति/देवी की उपासक) और नाग संस्कृति कोई पृथक धाराएं नहीं हैं, बल्कि ये एक ही वैदिक सत्य के विभिन्न आयाम है।  शिव 'चेतना' (पुरुष) हैं और शक्ति 'ऊर्जा' (प्रकृति)। बिना शक्ति के शिव 'शव' समान हैं और बिना शिव के शक्ति अनियंत्रित ऊर्जा है। सावन मास में जहाँ सोमवार को भगवान शिव की पूजा होती है, वहीं मंगलवार को देवी पार्वती के निमित्त 'मंगला गौरी व्रत' रखा जाता है। यह परंपरा शैव और शाक्त धारा के अटूट संबंध का प्रत्यक्ष प्रमाण है। 'अर्धनारीश्वर' रूप इसी दार्शनिक सत्य को अभिव्यक्त करता है।
नाग संस्कृति - नाग संस्कृति भारत की प्राचीनतम मूलनिवासी और लोक-संस्कृतियों में से एक रही है। भगवान शिव ने विषधर नागों को अपने गले का हार बनाकर यह संदेश दिया कि जो समाज में उपेक्षित, त्याज्य या विषैले माने जाते हैं, शिव उन्हें भी अपने हृदय से लगाते हैं। सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को 'नागपंचमी' के रूप में मनाना शैव और नाग संस्कृति के ऐतिहासिक समन्वय को दर्शाता है।
भारत की भौगोलिक एवं सांस्कृतिक एकता को एक सूत्र में पिरोने का कार्य 12 ज्योतिर्लिंगों ने किया है। ये ज्योतिर्लिंग केवल धार्मिक केंद्र नहीं हैं, बल्कि विभिन्न ऐतिहासिक साम्राज्यों के राजकीय संरक्षण के गवाह भी रहे हैं।.ज्योतिर्लिंग - सोमनाथगिर सोमनाथ, गुजरातचालुक्य (सोलंकी) राजवंश, अहिल्याबाई होल्कर एवं स्वतंत्र भारत में सरदार पटेल द्वारा पुनरुद्धार। मल्लिकार्जुनश्रीशैलम, आंध्र प्रदेशकाकतीय राजवंश, विजयनगर साम्राज्य (राजा हरिहर एवं बुक्का)।।महाकालेश्वरउज्जैन, मध्य प्रदेशअवंती साम्राज्य, परमार वंश, एवं सिंधिया राजवंश।
ओंकारेश्वर खंडवा, मध्य प्रदेशपरमार राजवंश तथा होल्कर साम्राज्य। केदारनाथरुद्रप्रयाग, उत्तराखंडआदि शंकराचार्य द्वारा पुनरुद्धार, कत्यूरी एवं गढ़वाल राजवंश। भीमाशंकर पुणे, महाराष्ट्र मराठा साम्राज्य (छत्रपति शिवाजी महाराज के पिता शाहजी भोसले व पेशवा काल)। काशी विश्वनाथ वाराणसी, उत्तर प्रदेशगुप्त काल, कल्याणी के चालुक्य, और अहिल्याबाई होल्कर (1777 ई.)। त्र्यंबकेश्वर नासिक, महाराष्ट्रपेशवा बालाजी बाजीराव (नानासाहेब पेशवा) द्वारा निर्मित। वैद्यनाथ देवघर, झारखंडगुप्त काल, गिद्धौर राजवंश (राजा पूरन मल)। नागेश्वर द्वारका, गुजरातस्थानीय सेतबंध राजवंश व गुप्तकालीन प्रभाव। रामेश्वरम रामनाथपुरम, तमिलनाडुचोल, पांड्य साम्राज्य एवं सेटुपति (रामनाड) राजा। घृष्णेश्वर औरंगाबाद (छत्रपति संभाजीनगर), महाराष्ट्रमालोजी राजे भोसले (शिवाजी महाराज के दादा) व अहिल्याबाई होल्कर है। 
12 उप-ज्योतिर्लिंग - शिव पुराण (कोटिरुद्र संहिता) के अनुसार, मुख्य ज्योतिर्लिंगों के आभामंडल के अंतर्गत 12 उप-ज्योतिर्लिंगों की भी मान्यता है: अंतकेश (सोमनाथ का उप-ज्योतिर्लिंग) , रुद्रेश्वर (मल्लिकार्जुन का उप-ज्योतिर्लिंग) , दुग्धेश्वर (महाकालेश्वर का उप-ज्योतिर्लिंग) , कर्दमेश्वर (ओंकारेश्वर का उप-ज्योतिर्लिंग) , भूतेश्वर (केदारनाथ का उप-ज्योतिर्लिंग) , भीमेश्वर (भीमाशंकर का उप-ज्योतिर्लिंग) , त्रिलोचन (काशी विश्वनाथ का उप-ज्योतिर्लिंग) , बाणेश्वर (त्र्यंबकेश्वर का उप-ज्योतिर्लिंग) , वक्रेश्वर (वैद्यनाथ का उप-ज्योतिर्लिंग) , भुजंगेश्वर (नागेश्वर का उप-ज्योतिर्लिंग) , गुहेश्वर (रामेश्वरम का उप-ज्योतिर्लिंग) , व्याघ्रेश्वर (घृष्णेश्वर का उप-ज्योतिर्लिंग) है । 
नवनाथ (9 नाथ) एवं नाथ संप्रदाय - हठयोग, तंत्र और शिव-साधना को जन-जन तक पहुँचाने में नाथ संप्रदाय का योगदान ऐतिहासिक रहा है। नाथ परंपरा के आदिगुरु स्वयं भगवान शिव (आदिनाथ) माने जाते हैं।
मत्स्येंद्रनाथ (मछंदरनाथ): नाथ परंपरा के प्रथम मानुषी गुरु। इनका प्रभाव क्षेत्र नेपाल, असम (कामरूप) और दक्षिण भारत रहा। गोरखनाथ (गोरक्षनाथ): संप्रदाय के मुख्य संगठक। इनका केंद्र गोरखपुर (उत्तर प्रदेश), पंजाब, गढ़वाल और नेपाल रहा। गहनीनाथ (गाहणीनाथ): महाराष्ट्र के आलंदी और त्र्यंबकेश्वर क्षेत्र में हठयोग का प्रसार किया। (ये संत ज्ञानेश्वर के दादागुरु थे)। जालंधरनाथ: पंजाब (जालंधर शहर इन्हीं के नाम पर है) एवं हिमाचल प्रदेश। काणिफनाथ: बंगाल, ओडिशा और महाराष्ट्र के सीमावर्ती क्षेत्र। भर्तरीनाथ (राजा भर्तृहरि): उज्जैन (मध्य प्रदेश) एवं अलवर (राजस्थान)। रेवणनाथ: कर्नाटक और दक्षिण महाराष्ट्र क्षेत्र। नागनाथ: महाराष्ट्र (नागनाथ औंढा और मराठवाड़ा क्षेत्र)। चरपटीनाथ: हिमाचल प्रदेश (चंबा) और नेपाल का पर्वतीय क्षेत्रहै ।
नेपाल के मल्ल राजवंश, मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश, मारवाड़ के राठौड़ राजवंश (राजा मानसिंह के समय) और गढ़वाल के शाह शासकों ने नाथ सिद्धों को राजकीय संरक्षण प्रदान किया और अनेक नाथ मठों की स्थापना की।
झारखंड के सिद्ध पीठ: देवघर (बैद्यनाथ) एवं बासुकीनाथ - पूर्वी भारत में संताल परगना का क्षेत्र शैव साधना का सबसे बड़ा केंद्र है। यहाँ बैद्यनाथ धाम और बासुकीनाथ धाम की जोड़ी अद्वितीय है। झारखंड राज्य का देवघर जिला मुख्यालय देवघर में  वैद्यनाथ मंदिर के गर्भगृह में रावणेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थापित है । इन्हें बाबाधाम , बैजनाथ , बैजूनाथ , बोल बम कहा गया है । बिहार राज्य  का भागलपुर जिले के जहांगरा व सुल्तानगंज स्थित उत्तरवाहिनी गंगा में शैव संस्कृति उपासक अजगैबीनाथ नाथ को साक्षी मानकर उत्तरवाहिनी गंगा में स्नान ध्यान एवं जलभर कर सावन कांवर यात्रा 105 किमी  पैदल चल कर डाक बंब एवं सामान्य बंब के रूप में झारखंड राज्य का देवघर जिले के  बाबा बैद्यनाथ  का जलाभिषेक  करते है । वैद्यनाथ धाम के बाबा वैद्यनाथ  के जलाभिषेक करने के बाद  श्रद्धालुओं द्वारा विभिन्न वाहनों के माध्यम से 45 किमी की यात्रा करने के बाद दुमका जिले का का जरमुंडी स्थित बाबा बासुकीनाथ पर उपासक  जलाभिषेक कर अपनी मनोकामना पूर्ति करते हैं। 
त्रेतायुग व रामायण काल में लंकापति रावण ने कैलाश पर कठोर तपस्या कर भगवान शिव से 'आत्मलिंग' प्राप्त किया। शिवजी ने शर्त रखी कि रास्ते में यदि इसे पृथ्वी पर रखा, तो यह वहीं स्थापित हो जाएगा। देवघर के समीप रावण को विष्णु जी की माया से तीव्र लघुशंका हुई। उसने लिंग 'बैजू' नामक ग्वाले (भगवान विष्णु/वरुण देव के अंश) को थमा दिया। भार अधिक होने पर ग्वाले ने लिंग भूमि पर रख दिया। रावण के अनेक प्रयासों के बाद भी लिंग उखड़ नहीं सका। 'वैद्यनाथ' नामकरण: रावण द्वारा काटे गए अपने दस सिरों का उपचार भगवान शिव ने एक वैद्य की भाँति किया, इसलिए यह 'वैद्यनाथ' कहलाए। स्थानीय संथाल परंपरा में 'बैजू ग्वाला' की भक्ति के कारण इन्हें 'बाबा बैजनाथ' भी कहा जाता है। ऐतिहासिक मंदिर निर्माण (1596 ई.): ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, वर्तमान मुख्य मंदिर के भव्य शिखर और प्रांगण का निर्माण गिद्धौर राजवंश के 5वें राजा राजा पूरन मल  द्वारा 1596 ई. में कराया गया था। मंदिर के शीर्ष पर स्थित त्रिपुंड और पंचशूल इसी काल की स्थापत्य कला के प्रतीक हैं।
बाबा बासुकीनाथ धाम जरमुंडी, दुमका जिला, झारखंड (देवघर से लगभग 42 किमी) पर स्थित है ।पौराणिक पृष्ठभूमि: मान्यता है कि समुद्र मंथन में रस्सी बने नागराज वासुकी ने मंथन के पश्चात अपने शरीर के दाह और कष्ट को शांत करने के लिए यहाँ भगवान शिव की आराधना की थी। लोककथा के अनुसार, 'बासु' नाम के एक स्थानीय निर्धन चरवाहे को कंद-मूल खोदते समय एक शिला से रक्त बहता दिखा। उसने उसकी पूजा की, जिससे उस स्थान का नाम 'बासुकीनाथ' पड़ा।।मंदिर की वर्तमान संरचना का निर्माण 16वीं से 18वीं शताब्दी के मध्य स्थानीय जमींदारों एवं मराठा काल के दौरान हुआ।।'दीवानी' और 'फौजदारी' दरबार का सिद्धांत: देवघर (बैद्यनाथ): इसे शिव की 'दीवानी अदालत' माना जाता है, जहाँ भक्त अपनी मनोकामनाओं की अर्जी दाखिल करते हैं। बासुकीनाथ: इसे शिव की 'फौजदारी अदालत' कहा जाता है, जहाँ त्वरित सुनवाई और न्याय की मान्यता है। कांवड़ यात्रा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती जब तक भक्त बैद्यनाथ के बाद बासुकीनाथ में जल अर्पित न कर दें।
अजगैबीनाथ धाम (सुलतानगंज) -  सावन मास में विश्व की सबसे लंबी पैदल धार्मिक यात्रा (105 किमी) सुलतानगंज से प्रारंभ होती है, जहाँ उत्तरवाहिनी गंगा से जल उठाकर कांवड़िया देवघर की ओर प्रस्थान करते हैं। अजगैबीनाथ मंदिर: स्थापना व निर्माण  सुलतानगंज, भागलपुर जिला, बिहार (गंगा नदी के मध्य स्थित प्राकृतिक ग्रेनाइट चट्टान पर)। है। पौराणिक उत्पत्ति: भगवान शिव के 'अजगव' नामक धनुष के नाम पर इस स्थान का नाम 'अजगैबीनाथ' पड़ा। यह महर्षि जाह्नु (Jahnu) की तपोभूमि थी। जब भगीरथ के पीछे आ रही गंगा का वेग महर्षि के आश्रम को बहाने लगा, तो मुनि ने संपूर्ण गंगा का आचमन कर लिया। बाद में भगीरथ की प्रार्थना पर महर्षि ने अपनी जांघ काटकर गंगा को मुक्त किया, जिससे गंगा 'जाह्नवी' कहलाईं। यहाँ गंगा का उत्तर दिशा की ओर मुड़ना (उत्तरवाहिनी) इसे अत्यंत पवित्र बनाता है। 
पाल काल (8वीं-12वीं शताब्दी): मंदिर का प्राथमिक ऐतिहासिक ढांचा और चट्टानों पर उकेरी गई मूर्तियाँ पाल राजवंश के समय की हैं। चट्टानों पर गुप्तकालीन शैली की नक्काशी भी दिखाई देती है।
आधुनिक पुनरुद्धार (1885 ई.): वर्तमान मंदिर के मुख्य ढांचे का जीर्णोद्धार 1885 ई. में रानी कलावती और बनैली/गिद्धौर रियासत के सहयोग से कराया गया था। प्राचीन नाम ('जहांगीरा'): सुलतानगंज का प्राचीन पौराणिक और ऐतिहासिक नाम 'जहांगीरा' था। यह शब्द वास्तव में संस्कृत के 'जह्नु-गिरि' (महर्षि जाह्नु का पर्वत) या 'जह्नु-गृह' का अपभ्रंश रूप है। : वैदिक काल में यह महर्षि जाह्नु के आश्रम के रूप में बसा जिसे जहांगरा , जाह्नू नगर कहा गया है । महाभारत काल में यह अंगराज कर्ण के अंग प्रदेश का भाग थ।
('सुलतानगंज'): मुस्लिम सल्तनत काल एवं मुगल काल (16वीं-17वीं सदी) के दौरान व्यापारिक और प्रशासनिक गतिविधियों के कारण 'जहांगीरा' के समीप के बाजारी क्षेत्र का नाम बदलकर 'सुलतानगंज' (सुलतान का बाजार) कर दिया गया, जो कालान्तर में संपूर्ण नगर का नाम बन गया।
सावन माह का दूसरा सोमवार केवल एक व्रत या पूजा का दिन नहीं है, बल्कि यह मन्वंतर काल से चली आ रही भारतीय चेतना, प्रकृति संरक्षण और समाज के अंतिम व्यक्ति तक को शिव-तत्त्व से जोड़ने का प्रतीक है। प्राचीन भारत के राजवंशों (गुप्त, चोल, राष्ट्रकूट, परमार, मराठा) ने मंदिर स्थापत्य के माध्यम से जिस सांस्कृतिक ताने-बाने को बुना था, वह आज भी सुलतानगंज से देवघर और बासुकीनाथ तक की कांवड़ यात्रा में जीवंत दिखाई देता है।।शैव, शाक्त, नाग और नाथ परंपराओं का यह संगम भारत की 'अनेकमेव अद्वैत' (विभिन्नता में एकता) की दार्शनिक भावना को सिद्ध करता है।
. संदर्भ -  व्यास, वेद. शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता एवं कोटिरुद्र संहिता). गीता प्रेस, गोरखपुर. श्रीमद्भागवत महापुराण (अष्टम स्कंध - समुद्र मंथन प्रसंग). गीता प्रेस, गोरखपुर., पी. सी. रॉय. चौधरी  (1965). बिहार जिला गजेटियर: संताल परगना. बिहार सरकार, पटना., डॉ. राजबलि पांडेय . (2018). भारतीय हिंदू संस्कृति और इतिहास. मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली., उपिंदर. सिंह  (2008). ए हिस्ट्री ऑफ एंशिएंट एंड अर्ली मेडिवल इंडिया: फ्रॉम द स्टोन एज टू द 12 थ सेंचुरी. पीयर्सन एजुकेशन. , आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी . नाथ संप्रदाय. राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली., झारखंड पर्यटन एवं सांस्कृतिक विकास बोर्ड. देवघर एवं बासुकीनाथ धाम का ऐतिहासिक व पुरातात्विक सर्वेक्षण दस्तावेज.

 जनजातीय संस्कृति का कालजयी संगम
भारतीय उपमहाद्वीप का पूर्वी अंचल, विशेष रूप से वर्तमान झारखंड राज्य का संथाल परगना प्रमंडल, अनादिकाल से ही अध्यात्म, प्रकृति और संस्कृति का एक अनूठा संगम स्थल रहा है। लगभग 14,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक विशाल भू-भाग में विस्तृत यह क्षेत्र केवल एक प्रशासनिक या भौगोलिक इकाई मात्र नहीं है, बल्कि यह सनातन पौराणिक आख्यानों, उत्तर-गुप्तकालीन शिलालेखों, मध्यकालीन जन-आंदोलनों और भारत की प्राचीनतम जनजातीय सभ्यताओं में से एक—संथाल समाज—की जीवन-दृष्टि का जीवंत दस्तावेज है।
उत्तर में पवित्र गंगा नदी के मैदानी इलाकों से लेकर दक्षिण और पूर्व में छोटानागपुर के वनाच्छादित पठारों तक विस्तृत यह क्षेत्र विविध आध्यात्मिक धाराओं—शैव, शाक्त, वैष्णव, सौर, बौद्ध (वज्रयान), और सरना (प्रकृति पूजा)—का महासंगम स्थल रहा है। इस क्षेत्र का हृदयस्थल है 'देवघर', जिसका शाब्दिक अर्थ ही "देवताओं का घर" (देव + घर) है। देवघर केवल तीर्थयात्रियों का गंतव्य नहीं है, बल्कि यह भारत की प्राचीन सभ्यता, वैदिक परंपरा और जनजातीय स्वशासन व्यवस्था के अंतर्संबंधों को प्रदर्शित करने वाला एक अद्भुत ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक मंच है।
देवघर और संथाल परगना की भू-आकृति केवल पर्वतों, नदियों और वनों का समूह नहीं है, बल्कि प्रत्येक प्राकृतिक संरचना के साथ कई पौराणिक कथाएं, वैदिक संदर्भ और प्रागैतिहासिक तथ्य जुड़े हुए हैं।
देवघर की पर्वत श्रृंखलाएं प्राचीन काल से ऋषियों, मुनियों और आक्रांताओं के आकर्षण का केंद्र रही हैं:। देवघर नगर से लगभग 10 किलोमीटर पूर्व में स्थित त्रिकूट पर्वत तीन प्रमुख शिखरों का समूह है, जिन्हें पौराणिक मान्यता के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और महेश (त्रिदेव) का प्रतीक  है। जनश्रुतियों और क्षेत्रीय आख्यानों के अनुसार, लंकापति रावण का पुष्पक विमान इसी पर्वत मार्ग से होकर गुजरता था।
19वीं और 20वीं सदी में महर्षि द्विपेन्द्रनाथ ठाकुर ने त्रिकूट।पर्वत को अपनी पवित्र तपोभूमि बनाया। यहाँ स्थित त्रिकुटाचल आश्रम आज भी साधकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। तपोवन (तपोवर्धन):प्राकृतिक गुफाओं से आच्छादित यह पहाड़ी स्थल सनातन साधना परंपरा का एक अत्यंत प्राचीन केंद्र रहा है। रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि ने अपनी साधना के कुछ वर्ष यहाँ बिताए थे। आधुनिक काल में स्वामी बालानंद ब्रह्मचारी जी ने इन प्राकृतिक गुफाओं में गहन तपस्या की और सिद्धि प्राप्त की। यहाँ स्थित शिव मंदिर और गुफाएँ आज भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करती हैं। नंदन पहाड़: देवघर नगर के समीप स्थित नंदन पहाड़ी भगवान शिव के वाहन नंदी को समर्पित है। वर्तमान में इसे एक सुंदर मंदिर परिसर और बाल उद्यान के रूप में विकसित किया गया है, जो अध्यात्म और पर्यटन का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है। पुथरा पहाड़ एवं पथरड्डा पहाड़ी:ये पहाड़ियां धार्मिक दृष्टिकोण के साथ-साथ पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यहाँ से प्राप्त शैलचित्र, प्राचीन मृदभांड और पाषाण कालीन उपकरण इस बात की पुष्टि करते हैं कि इस क्षेत्र में प्रागैतिहासिक काल  से ही मानव बसावट विद्यमान थी।
संथाल परगना और देवघर की नदियां केवल जल का स्रोत नहीं हैं; वे इस क्षेत्र की कृषि, अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी की जीवनरेखा हैं। अजय नदी मुंगेर (बिहार) की पहाड़ियां यह देवघर और संपूर्ण संथाल परगना की सबसे प्रमुख जलधारा है। यह दक्षिण-पूर्व की ओर बहती हुई पश्चिम बंगाल में गंगा (भागीरथी) से मिलती है। इसका उल्लेख पौराणिक ग्रंथों में भी मिलता है। मयूरक्षी नदी (मोर नदी) देवघर के समीपवर्ती त्रिकूट पहाड़ी क्षेत्र यह नदी क्षेत्र की सिंचाई प्रणाली का मुख्य आधार है। इस पर बना 'मसांजोर बांध' (कनाडा डैम) पूरे प्रमंडल के लिए ऐतिहासिक महत्व रखता है। जयंती, पथरो एवं धारुआ क्षेत्रीय छोटी नदियां एवं पहाड़ियां ये मौसमी नदियां स्थानीय ग्रामीण पारिस्थितिकी तंत्र और कृषि व्यवस्था का मूल आधार हैं। यमुनाजोर देवघर नगर के समीप प्रवाहित धारा पौराणिक आख्यानों में वर्णित यह एक पवित्र धारा है, जिसका संबंध मंदिर प्रांगण के अनुष्ठानों से रहा है।
बाबा वैद्यनाथ मंदिर परिसर और उसके आसपास स्थित जल निकायों का संबंध सीधे रामायण कालीन कथाओं  और तंत्र साधना से जोड़ा जाता है: शिवगंगा (मानसरोवर): बाबा वैद्यनाथ मंदिर से लगभग 200 मीटर उत्तर में स्थित यह एक विशाल प्राचीन सरोवर है। जब लंकापति रावण भगवान शिव के 'कामना लिंग' को कैलाश से लंका ले जा रहा था, तब उसे यहाँ तीव्र लघुशंका की अनुभूति हुई। उसने शिवलिंग को एक चरवाहे (बैजू) को सौंप दिया। आचमन हेतु जल न मिलने पर वरुण देव के आह्वान से इस सरोवर का निर्माण हुआ। इसे 'मानसरोवर' का ही एक रूप माना जाता है। हरिला जोरी एवं हंसकुण्ड: देवघर के उत्तर में स्थित हरिला जोरी वह पावन स्थल है जहाँ 'हरि' (भगवान विष्णु) और 'हर' (भगवान शिव) का मिलन हुआ था। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु यहाँ देव रूप धारण कर रावण से शिवलिंग पुन: प्राप्त करने की योजना में सम्मिलित हुए थे।
चंद्रकूप: वैद्यनाथ मंदिर प्रांगण के भीतर स्थित यह एक अति प्राचीन कुआँ है। जनश्रुति के अनुसार, रावण ने विश्व के समस्त पवित्र तीर्थों का जल लाकर इस कुएं में संचित किया था ताकि शिवलिंग का अभिषेक किया जा सके। आज भी मंदिर के गुप्त अनुष्ठानों में इसका विशेष महत्व है। रावण खाड़  सरोवर हैं। 
देवघर भारत के उन विरले तीर्थों में से एक है जहाँ एक ही प्रांगण में द्वादश ज्योतिर्लिंग और 51 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ दोनों विद्यमान हैं। बाबा वैद्यनाथ मंदिर (कामना ज्योतिर्लिंग - :रावणेश्वर ज्योतिर्लिंग  भगवान शिव के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इसे 'कामना लिंग' कहा जाता है, अर्थात यहाँ श्रद्धा से मांगी गई प्रत्येक मनोकामना पूर्ण होती है। मंदिर का मुख्य शिखर 72 फीट ऊँचा है और इसके शीर्ष पर पंचशूल स्थापित है। श्रावण मास में यहाँ विश्व का सबसे लंबा (105 किलोमीटर) कांवर मेला लगता है, जहाँ श्रद्धालु सुल्तानगंज से गंगाजल लाकर बाबा का जलाभिषेक करते हैं।
हृदयपीठ / हार्दपीठ (शक्तिपीठ): - मुख्य ज्योतिर्लिंग मंदिर के ठीक सामने माँ पार्वती का भव्य मंदिर स्थित है। पौराणिक मतानुसार, जब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के मृत शरीर के खंड किए थे, तब यहाँ माँ सती का 'हृदय' गिरा था। इसलिए यह स्थान शक्तिपीठ के रूप में पूजनीय है। मुख्य मंदिर और पार्वती मंदिर के शिखरों को लाल धागे से जोड़ना (गठबंधन) यहाँ का एक अनूठा अनुष्ठान है, जो शिव और शक्ति के एकाकार का प्रतीक है।
नौलाखा मंदिर: - स्वामी बालानंद आश्रम के समीप स्थित यह मंदिर स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है। 146 फीट ऊँचे इस राधा-कृष्ण मंदिर का निर्माण 20वीं सदी के प्रारंभ में पथरिया घाट की रानी चारुशीला देवी के दान से हुआ था। उस समय इसके निर्माण में ₹9 लाख का व्यय आया था, जिसके कारण लोकवाणी में इसे 'नौलाखा मंदिर' कहा जाने लगा।
सत्संग नगर: - परमप्रेममय श्रीश्री ठाकुर अनुकूलचंद्र जी द्वारा स्थापित यह विश्व प्रसिद्ध आध्यात्मिक और सामाजिक केंद्र है। यहाँ संपूर्ण भारत और विदेशों से लाखों अनुयायी आत्म-उन्नति, सह-अस्तित्व और मानवता का संदेश प्राप्त करने आते हैं।
बासुकीनाथ मंदिर: - यद्यपि यह स्थान देवघर जिले की सीमा से सटे दुमका जिले में स्थित है, परंतु धार्मिक परंपरा के अनुसार वैद्यनाथ धाम में जलाभिषेक करने के उपरांत बासुकीनाथ में पूजा-अर्चना किए बिना यह यात्रा अपूर्ण मानी जाती है। लोक परंपरा में वैद्यनाथ को 'दीवानी' और बासुकीनाथ को 'फौजदारी' दरबार माना गया है।
देवघर और संथाल परगना का इतिहास केवल पौराणिक मान्यताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्राचीन शिलालेखों और पुरातात्विक साक्ष्यों से भी प्रमाणित है: मगध साम्राज्य के सीमावर्ती क्षेत्र में स्थित होने के कारण इस क्षेत्र पर गुप्त और उत्तर-गुप्त सम्राटों का गहरा प्रभाव रहा। उत्तर-गुप्त सम्राट आदित्यसेन के काल के ऐतिहासिक शिलालेख और स्थापत्य अवशेष देवघर तथा समीपवर्ती मंदार (बांका व संथाल परगना सीमा) क्षेत्र में आज भी देखे जा सकते हैं।
पाल एवं सेन राजवंश (8वीं से 12वीं शताब्दी): का पाल काल में यहाँ शैव मत के साथ-साथ बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा और तंत्र साधना का अभूतपूर्व विकास हुआ। देवघर तंत्र साधना के एक प्रमुख केंद्र के रूप में उभरा। यहाँ से प्राप्त बौद्ध मूर्तियाँ और तंत्र-साधना के अवशेष इस बात के प्रमाण हैं। गिद्धौर राजवंश (1596 ई.): का 16वीं शताब्दी में गिद्धौर के राजा पूरनमल ने बाबा वैद्यनाथ मंदिर के मुख्य शिखर और अग्रभाग का भव्य जीर्णोद्धार कराया था। मंदिर के शिलालेख में राजा पूरनमल के इस योगदान का उल्लेख स्पष्ट रूप से मिलता है। नागवंशी एवं चेरो शासक: का झारखंड के स्थानीय नागवंशी और चेरो राजवंशों ने इस पूरे वनांचल भू-भाग को बाह्य आक्रांताओं के आक्रमणों से सुरक्षित रखा और यहाँ की सांस्कृतिक स्वायत्तता को बनाए रखा।
देवघर का नामकरण विभिन्न कालखंडों में इसकी भौगोलिक और सांस्कृतिक विशेषताओं के आधार पर परिवर्तित होता रहा है: वैदिक काल में  हरीतकीवन एवं केतकीवन (हर्रे के सघन वनों और केतकी पुष्पों की प्रचुरता के कारण) , त्रेतायुग , [रामायण ,  रावण काल में रावणवन या चिताभूमि (रावण कथा एवं तंत्र-साधना हेतु श्मशान भूमि होने के कारण , लोक परंपरा  वैद्यनाथ धाम / बैजू धाम (संथाल/भील चरवाहे 'बैजू' द्वारा शिवलिंग की सेवा का लोक-आख्या , आधुनिक प्रशासनिक काल ,  देवघर ("देवताओं का निवास स्थान" है। 
: संथाल परगना का बहु-सांस्कृतिक एवं बहु-धार्मिक महासंगम - संथाल परगना क्षेत्र किसी एक विशिष्ट धार्मिक धारा या जाति तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह विविध संस्कृतियों का एक समन्वयात्मक केंद्र रहा है:
सौर संस्कृति (सूर्य उपासना): यहाँ सनातन परंपरा का महान पर्व 'छठ पूजा' अत्यंत निष्ठा से मनाया जाता है। वहीं दूसरी ओर, क्षेत्र की प्राचीन पहाड़िया जनजातियों में प्राचीन काल से ही 'बेरू' (सूर्य) की पूजा का विधान रहा है।।शाक्त एवं तंत्र संस्कृति:।कामाख्या और तारापीठ के मध्य स्थित होने तथा स्वयं शक्तिपीठ होने के कारण देवघर तंत्र-साधना का केंद्र रहा है। यहाँ महाविद्याओं की पूजा और सती-उपासना जन-जीवन का अभिन्न अंग है।
शैव एवं वैष्णव ('हरि-हर') परंपरा: शिव और विष्णु की संयुक्त पूजा का अद्भुत समन्वय हरिला जोरी, बैद्यनाथ मंदिर और नौलाखा मंदिर की संस्कृति में स्पष्ट दिखाई देता है। असुर एवं धातु-शिल्प संस्कृति: पौराणिक संदर्भों में यह क्षेत्र रावण, बाणासुर और ताड़का वध से जुड़े दंडकारण्य का भाग माना गया है। इस वनांचल की प्राचीन धातु-शिल्प और लौह-प्रौद्योगिकी का संबंध प्राचीन 'असुर' जनजाति से जोड़ा जाता है। नाग, तरु एवं जल संस्कृति: लोक-जीवन में मनसा देवी (नाग पूजा), कर्म वृक्ष की पूजा (करम परब), तथा नदियों और पोखरों को जीवंत देव मानने की परंपरा सनातन और जनजातीय संस्कृतियों के सहज मिश्रण को दर्शाती है।
संथाल समाज भारत का सबसे बड़ा और प्राचीन समरूप जनजातीय समुदाय है। इनकी अपनी विशिष्ट भाषा, संस्कृति, दर्शन और एक सुदृढ़ सामाजिक-गणतांत्रिक संरचना है।।प्रजातीय समूह: नृवैज्ञानिक दृष्टि से संथाल समाज मुख्य रूप से प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉइड प्रजातीय समूह से संबंधित है। इनकी मातृभाषा संथाली है, जो भाषा-परिवार की दृष्टि से ऑस्ट्रो-एशियाटिक (Austro-Asiatic) परिवार की 'मुंडा' उप-शाखा के अंतर्गत आती है।।ओल चिकी लिपि: संथाली भाषा की अपनी स्वतंत्र लिपि 'ओल चिकी' (Ol Chiki) है। इसका आविष्कार महान भाषाविद पंडित रघुनाथ मुर्मू ने वर्ष 1925 में किया था। इसी समृद्ध लिपि और साहित्य के बल पर संथाली भाषा को भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल किया गया।
संथालों की वाचिक परंपरा के अनुसार, संपूर्ण मानव जाति की उत्पत्ति 'हंस-हंसली' नामक दो पवित्र पक्षियों के अंडों से हुई है। इन अंडों से प्रथम पुरुष पिलछू हड़ाम तथा प्रथम स्त्री पिलछू बूढ़ी (Pilchu Burhi) का जन्म हुआ।।इस प्रथम दंपति से 7 पुत्र और 7 पुत्रियों का जन्म हुआ, जिनसे संथाल समाज के 12 मुख्य गोत्रों (किली - Kili) का विकास हुआ। संथाल समाज में जन्म आधारित कोई ऊँच-नीच या जातिप्रथा नहीं है; यह एक पूर्णतः समतावादी (Egalitarian) समाज है। संथाल समाज में समगोत्री विवाह (एक ही किली में विवाह) पूर्णतः वर्जित है।
संथाल गोत्रों की पारंपरिक सामाजिक भूमिकाएं:- मुर्मू  किल ब गोत्र के लोग   पुजारी, गुरु, ठाकुर, बौद्धिक वर्ग है  जिनके द्वारा शिक्षा, धर्म और आध्यात्मिक मार्गदर्शन दिया जाता है। सोरेन गोत्र किल के लोग सिपाही, योद्धा, सैन्य बल के द्वारा  समाज और क्षेत्रीय सीमाओं की रक्ष , हेम्ब्रम गोत्र किल द्वारा  राजा, शासक वर्ग के लोग  प्रशासकीय दायित्व और न्याय व्यवस्था , ,मरांडी गोत्र किल के लोग किसान, व्यापारी द्वारा आर्थिक और कृषि प्रबंधन , ,किस्कू  पारंपरिक राजा/प्रशासक, टूडू  संगीतकार, ढोल वादक, शिल्प कला ,बास्के (Baske) भोजन विश्लेषक, कृषि प्रसंस्करण बेसरा, चौड़े, बेदिया, पौरिया, हाँसदा कृषि, शिकार, सुरक्षा, लोक-कला एवं अन्य सामाजिक दायित्व है। 
संथाल जीवन दर्शन का मूल आधार प्रकृति के साथ तादात्म्य है। इनके धर्म को 'सरना धर्म' या प्रकृति पूजा कहा जाता है। इसमें ईश्वर और प्रकृति अलग-अलग नहीं हैं; प्रकृति ही ईश्वर का दृश्य रूप है। प्रमुख देवी-देवता एवं पवित्र स्थल: में मारंग बुरु (Marang Buru): संथाल समाज के सर्वोच्च आराध्य देव हैं। इन्हें 'महान पर्वत देव' तथा पूरी सृष्टि का रक्षक माना जाता है।।जाहेर एरा (Jaher Era): ये संथालों की ग्राम देवी हैं। इनका निवास गाँव के बाहर सखुआ/साल के पवित्र वृक्षों के कुंज में होता है, जिसे 'जाहेर थान' कहा जाता है। जाहेर थान में कोई मूर्ति नहीं होती, केवल पवित्र वृक्षों की पूजा की जाती है। मोड़ेको-तुरुईको: सीमा और लोक-कल्याण की रक्षा करने वाले पंच-देवता।।मांझी हड़ाम: संथालों के पूर्वज देव, जिनकी पूजा गाँव के मुख्य चौपाल यानी 'मांझी थान' पर की जाती है। वे सामाजिक न्याय के प्रतीक हैं।
प्रकृति-केंद्रित प्रमुख पर्व में सोहराय संथालों का सबसे बड़ा त्योहार है, जो फसल कटने की खुशी में (पौष/कार्तिक मास में) मनाया जाता है। इसमें मवेशियों (गाय-बैल) की पूजा और उनके प्रति आभार व्यक्त किया जाता है। बाहा (Baha): यह वसंतोत्सव है। जब तक जाहेर थान में सखुआ (साल) के नए फूलों और पत्तों को प्रकृति माँ को समर्पित नहीं किया जाता, तब तक कोई भी संथाल नया फूल या फल नहीं तोड़ता। यह पर्यावरण संरक्षण का अनूठा उदाहरण है। करम व करमा - कृषि समृद्धि, भ्रातृ-प्रेम और प्रकृति की उपजाऊ शक्ति की पूजा का पर्व है। 
 'दामिन-इ-कोह' एवं हूल क्रांति संथाल समुदाय का इतिहास निरंतर संघर्ष, प्रवास और अपनी स्वायत्तता की रक्षा का इतिहास रहा है। संथालों की लोक-परंपरागत स्मृतियों के अनुसार उनका प्रवास मार्ग निम्नलिखित रहा है:
अहिरी पिपरी (हजारीबाग/मध्य भारत) ,चायचंपा (छोटा नागपुर पठार , स्वतंत्र किले एवं स्वर्ण काल) ➔ साओंत/सामंतभूम (बंगाल) ➔ दामिन-इ-कोह (संथाल परगना) , अहिरी पिपरी एवं चायचंपा: संथाल लोकगीतों के अनुसार उनका प्रारंभिक समृद्ध निवास 'अहिरी पिपरी' था। तत्पश्चात वे 'चायचंपा' में बसे, जिसे संथाल इतिहास का 'स्वर्ण युग' माना जाता है जहाँ उनके स्वतंत्र किले थे।
साओंत से 'संथाल' नामकरण: मुगलों और अन्य बाहरी शासकों के दबाव में वे बंगाल के 'सामंतभूम' (साओंत क्षेत्र, वर्तमान बांकुड़ा व मिदनापुर) चले गए। इसी 'साओंत' शब्द के आधार पर इस समुदाय को 'संथाल' कहा जाने लगा।
दामिन-इ-कोह की स्थापना (1832 ई.) 18वीं शताब्दी के अंत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने राजमहल की पहाड़ियों में निवास करने वाली उग्र 'पहाड़िया जनजाति' को नियंत्रित करने और राजस्व बढ़ाने के उद्देश्य से संथालों को यहाँ बसने के लिए आमंत्रित किया। वर्ष 1832 में अंग्रेजों ने राजमहल की पहाड़ियों के लगभग 14,000+ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को 'दामिन-इ-कोह' (Damin-i-Koh) घोषित कर दिया। संथालों ने अपने अथक परिश्रम से इस बीहड़ वनांचल को उपजाऊ कृषि भूमि में परिवर्तित कर दिया। शोषण के विरुद्ध महासंग्राम: हूल क्रांति में जब ब्रिटिश शासन, उनके पिट्ठू जमींदारों और बाहरी महाजनों (जिन्हें संथाल 'दिकू' कहते थे) ने संथालों की ज़मीनों पर कब्ज़ा करना और उनका आर्थिक-शारीरिक शोषण करना शुरू किया, तो संथालों ने सशस्त्र विद्रोह का बिगुल फूंका।. तिलका मांझी विद्रोह (1784-1785 ई.): बाबा तिलका मांझी (तिलका मुर्मू) भारत के प्रथम जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी माने जाते हैं। उन्होंने 1784 में भागलपुर में अंग्रेज क्लीवलैंड को अपने तीर से मार गिराया। 1785 में उन्हें धोखे से पकड़कर भागलपुर में बरगद के पेड़ पर फांसी दे दी गई।
. महान संथाल हूल (30 जून 1855): ऐतिहासिक जनसभा: 30 जून 1855 को साहिबगंज जिले के भोगनाडीह गाँव में 50,000 से अधिक संथाल एकत्र हुए।  सिद्धू, कान्हू, चांद और भैरव (चारों भाई) तथा उनकी वीरांगना बहनों फूलों और झानो ने इस महाविद्रोह का नेतृत्व किया।
संथाल स्वराज की घोषणा: सिद्धू को 'राजा', कान्हू को 'मंत्री', चांद को 'सेनापति' और भैरव को 'प्रशासक' चुना गया। उन्होंने अंग्रेजों को लगान देने से इनकार कर दिया और अपनी संप्रभुता की घोषणा की। विद्रोह का दमन एवं परिणाम: अंग्रेजों ने इस विद्रोह को दबाने के लिए मार्शल लॉ लागू किया और भयंकर दमनचक्र चलाया जिसमें 20,000 से अधिक संथाल शहीद हुए। यद्यपि सिद्धू-कान्हू शहीद हो गए, परंतु इस विद्रोह ने 1857 की क्रांति की नींव रखी।: इस विद्रोह के दबाव में अंग्रेजों को विवश होकर 'संथाल परगना' नामक अलग जिला बनाना पड़ा और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (SPT Act) लागू करना पड़ा, जिसने जनजातीय भूमि के हस्तांतरण पर रोक लगाई ।  संथाल समाज की सबसे बड़ी विशेषता उनकी लोकतांत्रिक, पारदर्शी और विकेंद्रीकृत स्वशासन व्यवस्था है, जिसे 'मांझी-परगना शासन व्यवस्था' कहा जाता है। यह व्यवस्था आज भी संथाल परगना में प्रशासनिक और सामाजिक रूप से प्रासंगिक है।
प्रशासनिक संरचना एवं पदसोपान:[गाँव स्तर: मांझी हड़ाम   देश स्तर 5-10 गाँव: देश मांझी परगना स्तर/15-20 गाँव: परगणैत , मांझी हड़ाम : गाँव का प्रमुख प्रशासनिक और न्यायिक प्रमुख। गाँव के सभी सामाजिक और पारिवारिक विवादों का निपटारा मांझी हड़ाम की अध्यक्षता में होता है।।जोग मांझी: मांझी हड़ाम का सहायक, जो युवाओं के नैतिक आचरण और विवाह संबंधी मामलों की देखरेख करता है। प्रामाणिक (उप-मांझी): मांझी हड़ाम की अनुपस्थिति में गाँव का कार्यभार संभालता है।
गोड़ैत: गाँव का संदेशवाहक या सचिव, जो बैठक की सूचना ग्रामीणों तक पहुँचाता है। नायके: गाँव का धार्मिक प्रमुख या पुजारी, जो जाहेर थान में पूजा-अर्चना संपन्न कराता है। कुड़ाम नायके: गाँव की बाहरी सीमाओं पर दुष्ट आत्माओं से रक्षा हेतु पूजा करने वाला उप-पुजारी। परगणैत: 15 से 20 गांवों के समूह (परगना) का प्रमुख। जब कोई मामला गाँव स्तर पर नहीं सुलझता, तो उसे परगणैत के पास भेजा जाता है।।बिटलाहा: संथाल समाज में सामाजिक नियमों (विशेषकर समगोत्री विवाह या गंभीर सामाजिक अपराध) का उल्लंघन करने पर दिया जाने वाला सबसे कठोर दंड 'बिटलाहा' (सामाजिक बहिष्कार) है।  संपूर्ण संथाल परगना का यह भू-भाग केवल एक भौगोलिक क्षेत्र मात्र नहीं है, बल्कि यह भारत की प्राचीन सनातन परंपरा और स्वाभिमानी जनजातीय जीवन-दर्शन का कालजयी संगम है। एक तरफ जहाँ बाबा वैद्यनाथ धाम का ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ आध्यात्मिक चेतना को ऊर्जा प्रदान करते हैं, वहीं दूसरी ओर संथाल समाज का प्रकृति-केंद्रित जीवन, उनकी समतावादी गोत्र व्यवस्था, ऐतिहासिक हूल क्रांति का शौर्य और मांझी-परगना जैसी स्वशासन प्रणाली भारत के वास्तविक गणतांत्रिक मूल्यों को रेखांकित करती है।
यह पावन भूमि हमें सिखाती है कि किस प्रकार अध्यात्म और प्रकृति, आधुनिकता और परंपरा, तथा सनातन धर्म और जनजातीय संस्कृति एक साथ सह-अस्तित्व में रहकर एक समृद्ध और अखंड भारतीय संस्कृति का निर्माण करते हैं।
संदर्भ  - , सत्येन्द्र कुमार पाठक (2024), मगध क्षेत्र की विरासत, क्षेत्रीय इतिहास एवं संस्कृति अध्ययन प्रकाशन।   एल.एस.एस.ओ मॉली (1910), बिहार एंड उड़ीसा डिस्ट्रिक्ट गज़ेटियर्स: संथाल परगना, पटना। मुर्मू, पंडित रघुनाथ (1925), ओल चिकी एवं संथाली साहित्य का विकास, आदिवासी शोध संस्थान।।रसैल, आर.वी. एवं हीरालाल (1916), द ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ द सेंट्रल प्रोविंस ऑफ इंडिया, लंदन।।संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (SPT Act, 1949), बिहार सरकार प्रशासनिक अभिलेख।।भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), दक्षिण बिहार एवं संथाल परगना के पुरातात्विक अवशेष रिपोर्ट।

करपी , अरवल , बिहार 804419

सोमवार, अगस्त 10, 2026

आश्विन माह की विरासत

: काल-चक्र की संधि पर आश्विन मास
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
सनातन धर्म की काल-गणना केवल दिनों और महीनों का लेखा-जोखा नहीं है, अपितु यह खगोलीय घटनाओं, प्रकृति परिवर्तन, आध्यात्मिक चेतना और मानव-इतिहास का एक जीवंत ताना-बाना है। हिन्दू पंचांग के बारह महीनों में आश्विन मास (जिसे लोकभाषा में 'क्वार' या 'कुँआर' भी कहा जाता है) को एक अत्यंत विशिष्ट, रहस्यमयी और ऊर्जावान संधि-काल माना गया है। भाद्रपद (भादों) की मूसलाधार वर्षा और उमस के समाप्त होते ही आश्विन मास का आगमन होता है, जो अपने साथ स्वच्छ नीला आकाश, बहती हुई निर्मल हवाएँ, खिली हुई धूप और शरद ऋतु की हल्की सिहरन लेकर आता है। खगोलीय दृष्टि से यह मास शरद विषुव  के समकालीन है, जब दिन और रात संतुलन की अवस्था में होते हैं। धार्मिक दृष्टि से यह वह कालखंड है जहाँ अदृश्य जगत् (पितृलोक, भूत-प्रेत, सूक्ष्म सत्ताएँ) और दृश्य जगत् (मानव सभ्यता, शक्ति-उपासना, राजसत्ता) एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े होते हैं।
आश्विन मास के दोनों पक्षों (कृष्ण एवं शुक्ल पक्ष), तिथि-वार देव व पितृ-समर्पण, बहु-साम्प्रदायिक साधनाओं, वैश्विक संस्कृतियों में इसके अस्तित्व और मन्वंतर काल से लेकर आधुनिक युग तक के ऐतिहासिक व साम्राज्यिक अवदान का एक वृहद् और प्रामाणिक अध्ययन प्रस्तुत करता है। ज्योतिष काल-गणना में महीनों का नामकरण उस मास की पूर्णिमा तिथि को चंद्रमा के नक्षत्र पर निर्भर करता है। आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को चंद्रमा अश्विनी नक्षत्र के निकट या उससे युक्त होता है। इसी कारण इस मास का नाम 'आश्विन' पड़ा। वैदिक साहित्य में इसे 'अश्वयुज' कहा गया है। 'अश्व' गति, ऊर्जा और सूर्य के रथ के घोड़ों का प्रतीक है, जो इस बात का संकेत है कि इस महीने से सूर्य की गति और किरणों का स्वभाव बदलने लगता है।बिहार, , झारखंड ,  उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि में इसे जनभाषा में 'क्वार' या 'कुँआर' कहा जाता है। यह शब्द संस्कृत के 'कन्या' (कन्या राशि में सूर्य का प्रवेश) अथवा 'कुँवार' (नवीनता/स्वच्छता) से व्युत्पन्न माना जाता है।
आश्विन मास से शरद ऋतु का विधिवत आरंभ होता है। कालिदास ने अपने महाकाव्य ऋतुसंहारम् में शरद ऋतु का वर्णन एक नववधू के रूप में किया है। इस महीने में प्रकृति में निम्नलिखित परिवर्तन देखने को मिलते हैं:
 नदियों और तालाबों का गंदला जल शांत होकर शीशे की तरह पारदर्शी हो जाता है। आकाश मेघ-रहित होकर गहरा नीला दिखाई देता है।: खेतों और नदियों के किनारे सफेद कांस के फूल खिल उठते हैं, जो शरद के आगमन की घोषणा करता है । जलाशयों में लाल-सफेद कमल और रात्रि में कुमुद (कुमुदिनी) के पुष्प अपनी सुगंध बिखेरते हैं।: ग्रीष्म की तपन और वर्षा की नमी के बाद आश्विन मास की हवा स्वास्थ्यवर्धक और त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) को संतुलित करने वाली मानी जाती है।
. आश्विन कृष्ण पक्ष: पितृ पक्ष - आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या (महालया) तक के 15 दिनों को पितृ पक्ष, श्राद्ध पक्ष या महालया पक्ष कहा जाता है। सनातन दर्शन मानता है कि मानव शरीर केवल भौतिक नहीं है; यह तीन ऋणात्मक दायित्वों से बंधा है—देव-ऋण, ऋषि-ऋण और पितृ-ऋण। आश्विन कृष्ण पक्ष पितृ-ऋण से मुक्त होने और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का वार्षिक अवसर है।पितृ पक्ष में प्रत्येक तिथि का अपना एक विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व है। व्यक्ति जिस तिथि को मृत्यु को प्राप्त होता है, उसी तिथि को उसके निमित्त तर्पण व पिंडदान किया जाता है। प्रतिपदा नाना-नानी श्राद्ध, प्रथम मृत आत्माएं इस तिथि को माता के पिता (नाना-नानी) के तर्पण का विधान है। इसके अतिरिक्त वर्ष के दौरान मृत हुए स्वजनों का प्रथम तर्पण होता है।
द्वितीया वसु रूप पितर द्वितीय तिथि को दिवंगत हुए परिजनों का पूजन। इसमें पितरों को 'वसु' रूप मानकर जल दिया जाता है।तृतीया रुद्र रूप पितर तृतीया को मृत पूर्वजों के लिए। पितरों का 'रुद्र' रूप में ध्यान किया जाता है।चतुर्थी संकष्टी गणेश व आदित्य रूप पितर गणेश पूजन के साथ इस तिथि को मृत परिजनों हेतु तर्पण। पितरों का 'आदित्य' रूप में आह्वान।पंचमी कुँवारे मृत जन (अविवाहित पितर) उन स्वजनों/परिवारजनों का श्राद्ध जिनकी मृत्यु विवाह से पूर्व (अल्पायु या कुँवारी अवस्था में) हो गई हो।षष्ठी अकाल मृत व अज्ञात पितर दुर्घटना, बीमारी या असमय काल-कवलित हुए परिजनों के निमित्त विशेष धूप-ध्यान व अर्पण।सप्तमी सप्तर्षि एवं ज्ञान-मार्ग के पूर्वज ऋषियों तथा ज्ञान/शिक्षा की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले पूर्वजों का स्मरण।
अष्टमी जीमूतवाहन (जितिया / जिउतिया व्रत) माताएँ अपनी संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य और सर्व-विपत्ति से रक्षा हेतु गंधर्वराज जीमूतवाहन, चील (चील्हो) और सियार (सियारो) की कथा सुनकर कठोर निर्जला व्रत रखती हैं।नवमी मातृ नवमी (अविधवा नवमी) कुल की सभी दिवंगत माताओं, दादियों, नानियों तथा सुहागिन (अविधवा) स्त्रियों का तर्पण। यह तिथि नारी-शक्ति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है।दशमी गृहस्थ पितर घर-परिवार के दिवंगत वरिष्ठ गृहस्थों का श्राद्ध।एकादशी इंदिरा एकादशी (श्रीहरि विष्णु) इस एकादशी का व्रत रखकर उसका पुण्य पितरों को समर्पित किया जाता है, जिससे उन्हें अधोगति से मुक्ति मिलती है।द्वादशी संन्यासी व यति श्राद्ध उन पूर्वजों या गुरुओं का तर्पण जिन्होंने संन्यास ग्रहण कर लिया था या जो यति-साधु थे।
त्रयोदशी बाल-श्राद्ध एवं काक/पीपल पूजन असमय मृत बालकों का श्राद्ध। इस दिन काक (कौवे) और पीपल वृक्ष को विशेष रूप से ग्रास दिया जाता है।चतुर्दशी शस्त्र-हत (अकाल/हिंसा में मृत) श्राद्ध युद्ध, अस्त्र-शस्त्र, दुर्घटना, विष, जल में डूबने, अग्नि या सर्पघात से मृत लोगों का विशेष श्राद्ध। सामान्य मृत पितरों का श्राद्ध इस दिन वर्जित माना गया है।अमावस्या सर्वपितृ अमावस्या (महालया) जिन पितरों की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, या जो भूल-बिसर गए हों, उन सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों, नागों, असुरों, प्रेतों और समस्त जीवों का महा-तर्पण।
2.2 'आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तम्': सार्वभौमिक करुणा की भावना सनातन धर्म का तर्पण केवल अपने सगे-संबंधियों तक सीमित नहीं है। पितृ पक्ष के तर्पण-मंत्रों में कहा गया है:
"आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवाः। तृप्यन्तु पितरः सर्वे मातृमातामहादयः॥"
अर्थात् ब्रह्मा से लेकर तिनके तक, देव, ऋषि, पितर, मानव, भूत, प्रेत, पशु-पक्षी और यहाँ तक कि जल में रहने वाले सूक्ष्म जीव भी इस जलांजलि से तृप्त हों। यह विधान सिखाता है कि आश्विन कृष्ण पक्ष संपूर्ण सृष्टि के पारिस्थितिक और सूक्ष्म-संतुलन का काल है।आश्विन शुक्ल पक्ष: शक्ति-साधना - अमावस्या के बाद जैसे ही सूर्य और चंद्रमा का पुनर्मिलन होकर आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा आती है, वातावरण का शोक और गंभीरता समाप्त हो जाती है। यह पक्ष सृष्टि के पुनरुत्थान, शक्ति के प्राकट्य और अंधकार पर प्रकाश की विजय का पर्व बन जाता है।प्रतिपदा मां शैलपुत्री, घटस्थापना (कलश) शारदीय नवरात्रि का भव्य शुभारंभ। कलश (घट) में ब्रह्मा, विष्णु, महेश, मातृकाओं और समस्त नदियों/समुद्रों का आह्वान किया जाता है। द्वितीया मां ब्रह्मचारिणी अनंत तप, संयम और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी की साधना।तृतीया मां चंद्रघंटा मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र धारण करने वाली देवी, जो साधक को निर्भयता प्रदान करती हैं।चतुर्थी मां कूष्मांडा अपनी मंद हंसी से ब्रह्मांड (अंड) की रचना करने वाली आद्यशक्ति का पूजन। पंचमी मां स्कंदमाता एवं उपांग ललिता व्रत भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता का पूजन। वात्सल्य, वाक्-सिद्धि और संतान-सुख की प्राप्ति।षष्ठी मां कात्यायनी व कात्यायन ऋषि महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रकट देवी। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की दात्री। इस दिन से बंगाल में दुर्गा पूजा का सार्वजनिक उत्सव (बोधन) आरंभ होता है।सप्तमी मां कालरात्रि (महासरस्वती का अवगाहन) अंधकार, भय और काल का नाश करने वाली भयानक रूपी किंतु शुभंकरी देवी। पत्र-पत्रिका (नवपत्रिका) का प्रवेश।अष्टमी मां महागौरी (महाअष्टमी / दुर्गा अष्टमी) महानिशा पूजा, संधि-पूजा (अष्टमी और नवमी का संधि काल)। शक्तिपीठों में बलि व विशेष आहुतियाँ। नवमी मां सिद्धिदात्री (महानवमी) समस्त सिद्धियों को देने वाली देवी का पूजन। नवदुर्गा अनुष्ठान की पूर्णता, कन्या पूजन (नौ बालिकाओं का भोजन), हवन और अपराजिता देवी का विशेष पूजन। दशमी विजयादशमी (दशहरा) / प्रभु श्रीराम / शमी वृक्ष भगवान श्रीराम द्वारा रावण का वध, मां दुर्गा द्वारा महिषासुर का वध। शमी (छेंउकर) वृक्ष पूजन, अपराजिता पूजन और शस्त्र-पूजन। विजय यात्रा का शुभारंभ।एकादशी पापांकुशा एकादशी (भगवान पद्मनाभ/विष्णु) मन रूपी हाथी को भक्ति रूपी अंकुश से नियंत्रित करने और सर्व-पापों के क्षय हेतु श्रीहरि का व्रत।द्वादशी वामन अवतार एवं गोविंद पूजन भगवान विष्णु के वामन रूप का स्मरण और तुलसी-पूजन।त्रयोदशी प्रदोष व्रत (भगवान शिव-पार्वती) सायंकाल में प्रदोष काल के दौरान भगवान शिव के अपराजित और नीलकंठ स्वरूप का अर्चन। चतुर्दशी कामेश्वर शिव व महालक्ष्मी पूर्व-आह्वान शरद पूर्णिमा की पूर्व संध्या पर जागरण और शिव-शक्ति का ध्यान। पूर्णिमा शरद पूर्णिमा (कोजागरी) / महालक्ष्मी / श्रीकृष्ण / अश्विनी कुमार खगोलीय अमृत वर्षा: माना जाता है कि इस रात चंद्रमा 16 कलाओं से पूर्ण होकर अमृत बरसाता है। कोजागरी पूजा: लक्ष्मी जी पूछती हैं "को जागर्ति?" (कौन जाग रहा है?)। श्रीकृष्ण की दिव्य रासलीला का दिन। देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमारों का पूजन। खीर बनाकर खुले आकाश के नीचे रखने की परंपरा।
4. सम्प्रदाय-गत दृष्टिकोण: विविध पंथों में आश्विन मास की साधना
सनातन धर्म की सुंदरता उसकी विविधता में है। आश्विन मास में भारत के विभिन्न दार्शनिक और धार्मिक सम्प्रदाय अपनी-अपनी परंपराओं के अनुसार साधना करते हैं।  शाक्त सम्प्रदाय (शक्ति उपासना) - शाक्तों के लिए आश्विन मास वर्ष का सबसे बड़ा कालखंड है। शारदीय नवरात्रि में दशमहाविद्या (काली, तारा, त्रिपुरसुंदरी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला) और नवदुर्गा का अनुष्ठान किया जाता है। तंत्र साधना में आश्विन की निशाओं (विशेषकर महाअष्टमी और महानिशा) को परम सिद्धिदायक माना गया है।
 वैष्णव सम्प्रदाय - श्रीराम भक्ति: आश्विन मास भगवान श्रीराम के रावण-विजय का समय है। इस पूरे महीने में भारत के कोने-कोने में रामलीला का मंचन होता है। भगवान श्रीकृष्ण एवं रासलीला: आश्विन पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा) को वैष्णव जन 'रास पूर्णिमा' कहते हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार इसी रात्रि को श्रीकृष्ण ने वृंदावन में गोपियों के साथ महारास रचाया था, जो जीवात्मा और परमात्मा के महामिलन का प्रतीक है।शैव संस्कृति : विजयादशमी के दिन भगवान शिव के 'अपराजित' स्वरूप का पूजन होता है। शिव को काल का नियंता मानकर उनसे विजय का वरदान माँगा जाता है। सौर संस्कृति : वर्षा ऋतु के बाद जब सूर्य अपनी किरणों को उग्रता से मुक्त कर सुखद बनाते हैं, तब सौर-मार्गी साधक आश्विन में आरोग्य-प्राप्ति हेतु सूर्योपनिषद् और आदित्यहृदय स्तोत्र का पाठ करते है
अश्विनी कुमार पूजन: वैदिक देवताओं में अश्विनी कुमार 'दिव्य वैद्य' (आयुर्वेद के आचार्य) हैं। स्वास्थ्य और सुंदरता की प्राप्ति के लिए आश्विन में इनका ध्यान किया जाता है। वृक्ष व जल तत्व: विजयादशमी पर शमी (प्रोसोपिस सिनेरेरिया) और अपराजिता के पौधे की पूजा की जाती है। महाभारत के अनुसार पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान अपने अस्त्र-शस्त्र शमी वृक्ष में ही छिपाए थे। कलश स्थापना के माध्यम से जल-तत्व और अखंड ज्योति के माध्यम से अग्नि-तत्व की पूजा संपूर्ण आश्विन मास का मूल आधार है।
आश्विन मास का महत्व केवल भारत की भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं है। खगोलीय दृष्टि से सितंबर-अक्टूबर का यह समय दुनिया की अनेक प्राचीन और मध्यकालीन संस्कृतियों में ऐतिहासिक मोड़ और उत्सवों का समय रहा है:। 
पवारणा दिवस : आश्विन पूर्णिमा को बौद्ध परंपरा में 'पवारणा दिवस' कहा जाता है। आषाढ़ से आश्विन तक तीन महीने बौद्ध भिक्षु 'वर्षावास' (एक स्थान पर रहकर साधना) करते हैं। आश्विन पूर्णिमा को वर्षावास समाप्त होता है और भिक्षु पुनः लोक-कल्याण हेतु धम्म-प्रचार के लिए निकलते हैं। सम्राट अशोक का धम्म-विजय: बौद्ध इतिहास के अनुसार, सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद आश्विन मास के दौरान ही हिंसा का मार्ग त्यागकर बौद्ध धम्म स्वीकार किया था और अपनी सेना को 'दिग्विजय' के स्थान पर 'धम्म-विजय' के लिए भेजा था।
 जैन संस्कृति: आत्म-विशुद्धि और स्वाध्याय - जैन धर्म में भाद्रपद के 'पर्युषण पर्व' और क्षमावाणी दिवस के बाद आश्विन मास आत्म-निरीक्षण और स्वाध्याय का काल होता है। इस समय जैन श्रमण अपनी वर्षाकालीन स्थिरता को पूर्ण कर यात्राओं का पुनरारंभ करते हैं यहूदी  एवं पारसी परंपराएं
यहूदी पंचांग -  आश्विन मास के समकालीन यहूदी पंचांग का सातवाँ महीना 'तिशरी' आता है। इसमें यहूदी धर्म के सबसे पवित्र त्यौहार—रोश हशनाह  - नया वर्ष ,  योम किप्पूर  - प्रायश्चित का दिन) और सुकौत  - फसल उत्सव) मनाए जाते हैं। पारसी/इरानी परंपरा : प्राचीन फारस (इरान) में आश्विन के समय 'मेहर' महीने में मेहरगान  उत्सव मनाया जाता था। यह न्याय के देवता 'मिथ्र' (वैदिक मित्र/सूर्य) को समर्पित शरद-उत्सव था। यवन (ग्रीक), ईसाई एवं इस्लाम संस्कृति का संदर्भ ग्रीक व पश्चिमी खगोलशास्त्र: यूनानी सभ्यता में शरद विषुव (Equinox) के समय प्रकृति के संतुलन का उत्सव मनाया जाता था। ईसाई व इस्लामिक कालखंड: मध्यकाल में वर्षा ऋतु के समाप्त होते ही आश्विन (सितंबर-अक्टूबर) के महीने में रेशम मार्ग और समुद्री व्यापारिक मार्ग पूरी तरह खुल जाते थे। ईसाई और इस्लामिक व्यापारी काफिले इस समय यात्राएँ सुगम मानते थे, जिससे विचारों, मसालों और शिल्पकला का वैश्विक आदान-प्रदान होत था। 
सनातन कालक्रम में आश्विन मास केवल एक धार्मिक काल नहीं है; यह युद्ध, राजनीति, सीमा-विस्तार (सीमांतोल्लंघन) और साम्राज्यीय पुनर्गठन का ऐतिहासिक मास रहा है। चाणक्य के अर्थशास्त्र से लेकर मराठा साम्राज्य तक, आश्विन मास की विजयादशमी को 'अभियान की तिथि' माना गया है। राजा सुरथ और समाधि वैश्य: मार्कंडेय पुराण (दुर्गा सप्तशती) के अनुसार, स्वारोचिष मन्वंतर में अपना राज्य गंवाने के बाद राजा सुरथ और समाधि वैश्य ने महर्षि मेधा के आश्रम में रहकर आश्विन मास में ही देवी की मिट्टी की मूर्ति बनाकर शक्ति-साधना की थी, जिससे उन्हें पुनः साम्राज्य प्राप्त हुआ। तुलसीदास और रामचरितमानस: गोस्वामी तुलसीदास जी ने आश्विन मास के ऐतिहासिक व आध्यात्मिक महत्व को लोक-लोकंतर तक पहुँचाने के लिए रामलीला की परंपरा को सुदृढ़ है।: वर्षा ऋतु में चार महीने तक नदियाँ उफान पर होती थीं और कीचड़ के कारण रथ व पैदल सेना का चलना असंभव था। आश्विन मास में भूमि सूख जाती थी। कौटिल्य (चाणक्य) के अर्थशास्त्र के अनुसार, राजाओं को विजयादशमी के दिन अपने शस्त्रों, घोड़ों और हाथियों की पूजा (नीराजन विधि) करके सीमा-विस्तार हेतु 'यात्रा' पर निकलना चाहिए। गुप्त साम्राज्य: सम्राट समुद्रगुप्त और चंद्रगुप्त द्वितीय 'विक्रमादित्य' के समय विजयादशमी को सैन्य परेड और राज्योत्सव के रूप में मनाया जाता है। 
मध्यकालीन भारत में दक्षिण के विजयनगर साम्राज्य में आश्विन मास का 'महानवमी उत्सव' वैभव का चरम बिंदु था। विदेशी यात्रियों का विवरण: पुर्तगाली यात्री डोमिंगो पेस और फ़ारसी राजदूत अब्दुर रज्जाक ने विजयनगर के महानवमी उत्सव का भव्य वर्णन किया है। : हम्पी में स्थित इस विशाल पत्थर के मंच से राजा कृष्णदेवराय नौ दिनों तक देवी पूजा देखते थे, कुश्ती प्रतियोगिताओं, नृत्यों, हाथियों के जुलूस और अपनी चतुरंगिणी सेना के पराक्रम का निरीक्षण करते थे ।।मराठा इतिहास में आश्विन मास की विजयादशमी का स्थान सर्वोच्च है: छत्रपति शिवाजी महाराज: शिवाजी महाराज विजयादशमी के दिन शमी वृक्ष की पूजा करते थे और सोने की पत्तियों (शमी पत्र) का आदान-प्रदान करके अपने किलों से निकलकर मुग़ल क्षेत्रों की ओर सैन्य अभियान शुरू करते थे। इसे मराठी में 'सीमांतोल्लंघन' (राज्य की सीमा लांघना) कहा जाता था।
पेशवा काल: पेशवाओं के समय पुणे में विजयादशमी पर विशाल 'दशहरा दरबार' सजता था, जहाँ मराठा सरदार अपनी निष्ठा व्यक्त करते थे और आगामी वर्ष के युद्ध अभियानों की योजना बनाते थे।  आधुनिक युग में आश्विन मास की दुर्गा पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान न रहकर विश्व कला और संस्कृति का सबसे बड़ा खुला मंच बन चुकी है। वर्ष 2021 में यूनेस्को  ने 'कोलकाता की दुर्गा पूजा' को मानव जाति की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता दी।: कर्नाटका के मैसूर महल में आश्विन मास की दशमी को निकलने वाली जंबू सवारी (हाथियों का जुलूस) प्राचीन विजयनगर की परंपरा को आज भी जीवंत रखे हुए है।: उत्तर भारत में दिल्ली, वाराणसी और अयोध्या से लेकर ट्रिनिडाड, मॉरीशस और फिजी जैसे देशों तक आश्विन मास में रामलीलाओं का मंचन भारतीय प्रवासियों को अपनी जड़ों से जोड़े रखता है। 
भौगोलिक और भाषाई विविधताओं के कारण इस पावन महीने को अलग-अलग क्षेत्रों में विभिन्न नामों से पुकारा जाता है । बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान में : आश्विन, अश्विन, क्वार, कुँआर। संस्कृत व वैदिक साहित्य: अश्वयुज। पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा: आश्विन (Aashwin) — यहाँ यह महालया, दुर्गा पूजा और कोजागरी लक्ष्मी पूजा का पर्याय है।महाराष्ट्र एवं गुजरात: आश्विन (Ashvin) — गरबा, डांडिया और नवरात्रि के गरबो उत्सव का काल।तमिलनाडु (दक्षिण भारत): पुरट्टासी (Purattasi) — तमिल सौर पंचांग का छठा/सातवाँ मास, जो भगवान वेंकटेश्वर (विष्णु) को पूर्णतः समर्पित होता है। इस महीने में तमिलनाडु में सात्विक भोजन और शनिवार व्रत का विशेष नियम है। केरल (मलयि: मल्यालम): कन्नी मासम  — जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करता है। ओडिशा: आश्विन  — दुर्गा पूजा व कोजागरी पूर्णिमा का समय।शरद विषुव काल वैश्विक खगोलशास्त्र में दिन-रात की समानता का समय। तिशरी  यहूदी धर्म पंचांग का सातवां पवित्र मास। मेहर  प्राचीन पारसी/इरानी पंचांग का सातवां मास।: बौद्ध विश्व (श्रीलंका, थाईलैंड, म्यांमार, लाओस) में वर्षावास समाप्ति का मास। पश्चिमी ज्योतिष में सूर्य का कन्या से तुला राशि में संक्रमण है। 
 कालजयी चेतना का महाप्रवाह आश्विन मास केवल कैलेंडर का एक पन्ना नहीं है; यह सनातन चेतना का महासमंदर है जिसमें अध्यात्म, खगोलशास्त्र, प्रकृति, साहित्य, युद्ध-नीति और वैश्विक इतिहास का जल आकर मिलता है। सआश्विन का कृष्ण पक्ष हमें अतीत, अपने पूर्वजों, अपनी जड़ों और यहाँ तक कि अदृश्य सूक्ष्म जीवों के प्रति नम्र होना और कृतज्ञता व्यक्त करना सिखाता है। आश्विन का शुक्ल पक्ष हमें भविष्य, नई ऊर्जा, शक्ति की साधना, असत्य पर सत्य की विजय और जीवन के आनंद उत्सव को मनाने का संदेश देता है।मन्वंतर काल के राजा सुरथ से लेकर विजयनगर के महाराजाओं, छत्रपति शिवाजी और आज के आधुनिक समाज तक—आश्विन मास भारतीय संस्कृति की उस अखंड धारा का प्रतीक रहा है जो कभी सूखती नहीं। यह मास मानव को याद दिलाता है कि जब-जब समाज में अंधकार, अज्ञान और असत्य रूपी महिषासुर या रावण का प्रभाव बढ़ेगा, तब-तब आश्विन की नवरात्रि और विजयादशमी हमें सत्य, न्याय और भगवती शक्ति के पुनर्जागरण का मार्ग दिखाती रहेगी।