प्रागज्योतिषपुर से काजीरंगा - माजुली में युग-चेतना
सत्येन्द्र कुमार पाठक
इतिहास केवल पत्थरों की लिखावट या सन-तारीखों का पुलिंदा नहीं होता। इतिहास एक बहती हुई नदी है, जो अपने भीतर युगों की स्मृतियों, ऋषियों के संकल्पों, और राजाओं के उत्थान-पतन को समेटे निरंतर प्रवाहित होती रहती है। जब मैं मगध की ऐतिहासिक और पुरातात्विक धरती से निकलकर पूर्वोत्तर भारत के महाप्राण असम की ओर प्रवृत्त हुआ, तो मेरे भीतर केवल एक यात्री की उत्सुकता नहीं थी, बल्कि एक इतिहासकार और संस्कृति-अन्वेषक की वह व्याकुलता थी जो ब्रह्मपुत्र की लहरों में छिपे सनातन सूत्रों को छूना चाहती थी।
असम, जहाँ प्रकृति अपनी संपूर्ण दिव्यता के साथ प्रकट होती है, जहाँ का मूगा रेशम सूर्य की पहली किरण की तरह चमकता है, और जहाँ बिहू के लोक-गीतों में माटी की सोंधी सुगंध रची-बसी है। इस यात्रा का उद्देश्य असम के तीन सबसे महत्वपूर्ण, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक केंद्रों—गुवाहाटी (प्राचीन प्रागज्योतिषपुर), काजीरंगा और माजुली—की काल-यात्रा का अन्वेषण करना था। ब्रह्मांडीय कालचक्र के स्वायंभुव मन्वंतर से लेकर आधुनिक युग तक, और सौर, शाक्त, ब्रह्म, शैव, वैष्णव मतों से लेकर ऋषि, जल, वृक्ष, नदी और द्वीप संस्कृतियों के अवदान को एक सूत्र में पिरोना ही इस संस्मरण-आलेख का मूल ध्येय है।
गुवाहाटी – नीलाचल की शाक्त चेतना और सरायघाट का शौर्य में मेरी यात्रा का पहला पड़ाव गुवाहाटी था। ब्रह्मपुत्र के दक्षिणी तट पर बसा यह महानगर आधुनिकता की चकाचौंध में भी अपनी पौराणिक गरिमा को अक्षुण्ण रखे हुए है। जैसे ही मैंने इस नगर की सीमा में प्रवेश किया, मुझे लगा कि मैं इतिहास के किसी महाकाव्यात्मक पन्ने को पलट रहा हूँ। गुवाहाटी (प्रागज्योतिषपुर) का त्रिकोण में नीलांचल पर्वत पर शाक्त संस्कृति का मां कामख्या पीठ , चित्रांचल पर्वत पर नवग्रह खगोल केंद्र सौर संस्कृति , संध्याचल पर्वत पर ऋषि संस्कृति का वशिष्ठ ऋषि आश्रम है। इतिहास के पन्नों से बहुत पीछे, जब हम ब्रह्मांड की उत्पत्ति के समय यानी स्वायंभुव मन्वंतर में जाते हैं, तो गुवाहाटी का नाम साक्षात् सृष्टि-सृजन की प्रक्रिया से जुड़ जाता है। तंत्र चूड़ामणि और कालिका पुराण के अकाट्य संदर्भों के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने शिव के विरह-उन्माद को शांत करने के लिए माता सती के पार्थिव शरीर को अपने सुदर्शन चक्र से खंडित किया था, तब यहाँ सती का महामुद्रा (योनि भाग) गिरा था। नीलाचल पर्वत की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए मेरे भीतर एक अजीब सी कंपन थी। यह वही स्थान है जिसे मन्वंतर काल से ही महापीठ कामाख्या कहा गया। यहाँ कोई मूर्ति नहीं है; यहाँ एक प्राकृतिक गुफा के भीतर जल की एक अविरल धारा बहती है, जो एक शिलाखंड को सिंचित करती है। यह शाक्त संस्कृति की वह धारा है जो नारी शक्ति को ब्रह्मांड की मूल सृजनात्मक ऊर्जा (Universal Creative Energy) के रूप में प्रतिष्ठित करती है। आषाढ़ मास में यहाँ होने वाला अंबुबाची मेला जल और पृथ्वी के रजस्वला होने का प्रतीक है, जो सीधे तौर पर जल और कृषि संस्कृति का आदिम उत्सव है। गुवाहाटी के एक कोने में स्थित संध्याचल पर्वत पर जाते ही महानगरीय कोलाहल अचानक शांत हो गया। यहाँ सतयुग में ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने अपनी दीर्घ तपस्या की थी। राजा सौदास के शाप से मुक्ति पाने और आत्म-साक्षात्कार के लिए वशिष्ठ मुनि इस घने वन में आए थे। मैंने वहाँ बहती हुई त्रिवेणी धाराओं को देखा—संध्या, ललिता और कांता। इन पतली, कल-कल करती पहाड़ी नदियों के किनारे बैठकर ऋषियों ने वेदों के मंत्रों का पाठ किया होगा। यह स्थान इस बात का जीवंत प्रमाण है कि भारत की ऋषि संस्कृति और जल संस्कृति कभी एक-दूसरे से अलग नहीं रहीं। ऋषियों ने हमेशा वहीं अपने आश्रम बनाए, जहाँ नदियाँ और वृक्ष कल्पवृक्ष की तरह मानव चेतना को पोषण देते थे। त्रेता युग में इस नगर को प्रागज्योतिषपुर के नाम से ख्याति मिली। महाप्रतापी राजा नरकासुर (जो भगवान विष्णु के वाराह अवतार और पृथ्वी का पुत्र था) ने इस नगर को अपनी राजधानी बनाया। 'प्राग' का अर्थ है पूर्व और 'ज्योतिषपुर' का अर्थ है नक्षत्रों और खगोल विज्ञान का नगर।
नगर के मध्य स्थित चित्राचल पर्वत पर बने नवग्रह मंदिर की चौखट पर खड़े होकर जब मैंने क्षितिज को देखा, तो मुझे प्राचीन भारत के वैज्ञानिक ऋषियों की मेधा पर गर्व हुआ। महर्षि कश्यप और भारद्वाज की परंपरा के आचार्यों ने यहाँ बैठकर सूर्य और अन्य आठ ग्रहों की गतियों की गणना की थी। यहाँ की सौर संस्कृति ने प्राचीन काल में पूरे आर्यावर्त को पंचांग और काल-गणना का ज्ञान दिया। नरकासुर ने ही कामाख्या मंदिर के चारों ओर पत्थरों के भव्य सिंहद्वारों का निर्माण कराया था, जो आज भी वास्तुकला के प्राचीनतम चमत्कार हैं।
द्वापर युग में प्रागज्योतिषपुर का इतिहास महाभारत के महायुद्ध से जुड़ जाता है। जब नरकासुर का अत्याचार अत्यधिक बढ़ गया और उसने देवमाता अदिति के कुंडल चुरा लिए, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ गरुड़ पर सवार होकर यहाँ आक्रमण किया और नरकासुर का वध किया। नरकासुर के वध के बाद श्रीकृष्ण ने उसके धार्मिक पुत्र भगदत्त को कामरूप का सिंहासन सौंपा। भगदत्त की वीरता का वर्णन महाभारत के द्रोण पर्व में विस्तार से मिलता है। भगदत्त के पास 'सुप्रतीक' नाम का एक विशाल और अजेय हाथी था। कुरुक्षेत्र के मैदान में बूढ़े राजा भगदत्त ने कौरवों की ओर से लड़ते हुए अर्जुन को भीषण टक्कर दी थी। यह कालखंड वैष्णव और शैव मतों के सांस्कृतिक आदान-प्रदान का काल था, क्योंकि भगदत्त भगवान शिव के अनन्य भक्त थे, जबकि उनके रक्षक स्वयं विष्णु-स्वरूप कृष्ण बने।
ऐतिहासिक कालक्रम में जब हम आगे बढ़ते हैं, तो मौर्य साम्राज्य के समय यह क्षेत्र अपनी भौगोलिक दुर्गमता और स्वायत्तता के कारण मगध के सीधे नियंत्रण से बाहर रहा, परंतु सांस्कृतिक रूप से मगध की कला और यहाँ की किरातों की वन-संस्कृति में गहरा आदान-प्रदान हुआ। समुद्रगुप्त के प्रयाग प्रशस्ति-अभिलेख में कामरूप को एक सीमांत राज्य (प्रत्यन्त राज्य) के रूप में वर्णित किया गया है, जिसने गुप्त साम्राज्य की अधीनता और मैत्री को स्वीकार किया था। गुप्त काल में यहाँ वास्तुकला और मूर्तिकला की एक नई शैली का जन्म हुआ, जिसे कामरूप शैली कहा जाता है।।सातवीं शताब्दी में, जब राजा हर्षवर्धन कन्नौज के सिंहासन पर आसीन थे, तब कामरूप में वर्मन राजवंश के महान राजा कुमार भास्करवर्मन का शासन था। भास्करवर्मन और हर्षवर्धन की कूटनीतिक मित्रता ने इतिहास को एक नई दिशा दी। इसी समय चीनी बौद्ध भिक्षु और यात्री ह्वेनसांग (युवान च्वांग) ने कामरूप की यात्रा की थी। ह्वेनसांग ने अपने ग्रंथ 'सी-यू-की' में लिखा था:
"कामरूप के लोग सीधे, सच्चे और विद्याप्रेमी हैं। यहाँ की नदियाँ स्वच्छ हैं, जल प्रचुर मात्रा में है और यहाँ के लोग आम और कटहल के वृक्षों की विशेष पूजा करते हैं।"ह्वेनसांग का यह विवरण सिद्ध करता है कि उस काल में भी यहाँ जल और वृक्ष संस्कृति लोगों के दैनिक जीवन और धार्मिक आचरण का अभिन्न हिस्सा थी।
सेन काल और मध्ययुगीन तंत्र का चरम में ११वीं और १२वीं शताब्दी में बंगाल के सेन राजवंश (जैसे विजयसेन और लक्ष्मणसेन) के प्रभावकाल में, कामरूप में तांत्रिक बौद्ध धर्म (सहजयान, वज्रयान) और शाक्त मत का एक अद्भुत सम्मिश्रण हुआ। गुवाहाटी इस समय तांत्रिकों की वैश्विक स्थली बन चुका था। तिब्बत, चीन और भारत के कोने-कोने से साधक यहाँ तंत्र की गुप्त सिद्धियाँ प्राप्त करने आते थे।
मुगल काल में गुवाहाटी असम और मुगलों के बीच वर्चस्व की लड़ाई का मुख्य केंद्र बन गया। औरंगज़ेब की विस्तारवादी नीति के तहत राजपूत राजा रामसिंह के नेतृत्व में मुगलों की एक विशाल सेना ने असम पर कब्ज़ा करने के लिए कूच किया। ब्रह्मपुत्र नदी के ऊपर लड़ा गया सरायघाट का युद्ध (1671 ई.) सैन्य इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है। अहोम साम्राज्य के सेनापति लचित बोरफुकन अत्यधिक बीमार होने के बावजूद नाव पर सवार होकर युद्धभूमि में उतरे। उन्होंने अपने मामा का वध सिर्फ इसलिए कर दिया था क्योंकि उन्होंने रक्षा-प्राचीर (मिट्टी का बांध) बनाने में ढिलाई बरती थी। लचित ने कहा था—"देश कतई मोमाइकैत कै डांगोर नहय" (मेरा मामा मेरे देश से बड़ा नहीं हो सकता)। सरायघाट के युद्ध में मुगलों की नौसेना को ब्रह्मपुत्र के पानी में डुबो दिया गया। यह नदी और जल संस्कृति के रणनीतिक उपयोग की दुनिया की सबसे बड़ी मिसाल है।
काजीरंगा – अरण्य संस्कृति और प्रकृति संरक्षण की ऋचाएँ स्थल गुवाहाटी की ऐतिहासिक गलियों से विदा लेकर मैं पूर्व की ओर बढ़ा। असम के खूबसूरत, हरे-भरे चाय बागानों के बीच से गुजरते हुए मैं काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान पहुँचा। काजीरंगा पहुँचते ही ऐसा लगा मानो कलयुग का अंत हो गया हो और मैं पुनः प्रकृति के आदिम और शुद्ध रूप यानी सतयुग में लौट आया हूँ। काजीरंगा की जैव आध्यात्मिक यात्रा के तहत आरंभिक युग में ऋषि श्रृंग की तपस्या स्थल , मध्यकाल की अरण्य संस्कृति और 1905 ई में मेरी कर्जन का संकल्प स्थल , यूनेस्को का विश्व विरासत है।
त्रेतायुग में काजीरंगा का क्षेत्र पौराणिक काल में अत्यंत दुर्गम और सघन वनों से घिरा हुआ था। वाल्मीकि रामायण और महाभारत के वनपर्व के अंतर्निहित संदर्भों के अनुसार, महर्षि कश्यप के वंशज ऋषि विभांडक और उनके पुत्र महर्षि ऋष्यशृंग का संबंध इस पूरे कछारीय वन्य भूभाग से रहा है। ऋष्यशृंग, जिन्होंने राजा दशरथ के लिए 'पुत्रेष्टि यज्ञ' संपन्न कराया था, पूर्णतः प्रकृति और जीवों के बीच पले-बढ़े थे। इस क्षेत्र की वृक्ष और जीव संस्कृति इतनी समृद्ध थी कि ऋषियों ने यहाँ पशुओं के साथ सह-अस्तित्व का सिद्धांत प्रतिपादित किया। काजीरंगा की माटी में आज भी वह अरण्य-चेतना व्याप्त है, जहाँ मनुष्य और हिंसक पशु एक ही पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) का हिस्सा बनकर रहते हैं।
. ब्रिटिश काल: विनाश का दौर और लेडी मैरी कर्जन का ऐतिहासिक हस्तक्षेप से १९वीं शताब्दी में जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने असम पर पूरी तरह कब्ज़ा कर लिया (१८२६ की यैंडाबू संधि के बाद), तो काजीरंगा के भाग्य पर ग्रहण लग गया। अंग्रेज अधिकारियों और स्थानीय शिकारियों ने अपने मनोरंजन और 'ट्रॉफी' के लिए यहाँ के राजसी एक सींग वाले गैंडों (Rhinoceros unicornis) और हाथियों का अंधाधुंध शिकार शुरू कर दिया। २०वीं सदी की शुरुआत तक स्थिति यह हो गई कि गैंडों की संख्या घटकर मात्र कुछ दर्जन रह गई।
तभी इतिहास ने एक करवट ली। वर्ष १९०४ में भारत के वायसराय लॉर्ड कर्जन की पत्नी लेडी मैरी कर्जन काजीरंगा के वनों की सुंदरता देखने यहाँ आईं। उन्होंने बहुत प्रयास किया, लेकिन उन्हें एक भी गैंडा दिखाई नहीं दिया। स्थानीय प्रकृति-प्रेमियों (जैसे कि भालू बरुआ) ने उन्हें बताया कि यदि शिकार न रुका, तो यह अद्भुत जीव हमेशा के लिए धरती से विलुप्त हो जाएगा। मैरी कर्जन ने दिल्ली लौटते ही अपने पति लॉर्ड कर्जन से इसके संरक्षण के लिए कड़े कानून बनाने का आग्रह किया। फलस्वरूप, १ जून १९०५ को काजीरंगा को 'प्रस्तावित आरक्षित वन' (Proposed Reserve Forest) घोषित करने की प्रक्रिया शुरू हुई, जो १९०८ में पूर्ण हुई।
पी.डी. स्ट्रेसी का अवदान और आधुनिक संरक्षण संस्कृति वर्ष १९५० में असम के मुख्य वन संरक्षक और दूरदर्शी पर्यावरणविद् पी.डी. स्ट्रेसी ने एक क्रांतिकारी कदम उठाया। उन्होंने अनुभव किया कि 'गेम सैंक्चुअरी' (Game Sanctuary) शब्द में 'शिकार' की बू आती है। इसलिए उन्होंने इसका नाम बदलकर काजीरंगा वन्यजीव अभयारण्य (Kaziranga Wildlife Sanctuary) कर दिया। यह नाम परिवर्तन केवल शाब्दिक नहीं था, बल्कि यह भारत की प्राचीन जीव और वृक्ष संस्कृति की पुनर्स्थापना थी, जहाँ जीवों को 'शिकार की वस्तु' न मानकर 'सह-जीव' माना गया।
१९७४ में इसे राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा मिला और वर्ष १९८५ में इसकी अद्वितीय जैव-विविधता के कारण यूनेस्को (UNESCO) ने इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। काजीरंगा की सुबह: एक सींग वाले गैंडे की धरती पर भोर का संस्मरण का सुबह के ठीक साढ़े चार बजे थे। चारों ओर कोहरा छाया हुआ था और कोहिनूर जैसी ओस की बूंदें एलीफेंट ग्रास (हाथी घास) पर चमक रही थीं। मैं हाथी पर सवार होकर जंगल के 'सेंट्रल रेंज' (कोहोरा) में प्रवेश कर रहा था। अचानक, कोहरे की चादर को चीरते हुए लगभग पचास गज की दूरी पर एक विशालकाय, प्रागैतिहासिक काल का जीव प्रकट हुआ—महान भारतीय एक सींग वाला गैंडा।।उसकी त्वचा किसी अजेय योद्धा के कवच जैसी लग रही थी। वह शांत भाव से घास चर रहा था। उसके ठीक पीछे एक दलदली हिरण खड़ा था और उसकी पीठ पर एक बगुला आराम कर रहा था। उस दृश्य को देखकर मुझे लगा कि यही तो उपनिषदों की वह ऋषि संस्कृति है, जो कहती है—"ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्" (इस संसार में जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है)। काजीरंगा ने आधुनिक काल में पूरी दुनिया को सिखाया है कि यदि मनुष्य चाहे, तो वह अपनी गलतियों को सुधारकर प्रकृति को उसका गौरव वापस लौटा सकता है।
माजुली – ब्रह्मपुत्र की गोद में तैरती वैष्णव संस्कृति में काजीरंगा की वन्य सुगंध को अपनी स्मृतियों में समेटे हुए मैं जोरहाट के निमती घाट पहुँचा। यहाँ से मुझे ब्रह्मपुत्र नदी को पार करके विश्व के सबसे बड़े नदी द्वीप माजुली की ओर जाना था। फेरी (नौका) पर सवार होकर जब मैं ब्रह्मपुत्र की विशाल, अगाध जलराशि के बीच से गुजर रहा था, तो मुझे लगा कि मैं किसी जल-महासागर में यात्रा कर रहा हूँ। नदी का दूसरा छोर दिखाई नहीं दे रहा था। यह नदी और जल संस्कृति का साक्षात् विराट रूप था। मंजुली द्वीप का सांस्कृतिक स्थल पर एक शरण नाम धर्म का संस्थापक श्रीमत शंकरदेव का दर्शन , सत्र परंपरा के दखिन पत, आऊंनीआटी , कमला बाड़ी और शिल्प और क्ला का मुखौटा निर्माण , मृदंग स्थल है । चुटिया साम्राज्य की राजधानी 'रत्नापुर' है। माजुली का इतिहास केवल मध्यकाल से शुरू नहीं होता। १५वीं शताब्दी में यह द्वीप चुटिया साम्राज्य का एक समृद्ध हिस्सा था और इसे 'रत्नापुर' कहा जाता था। यह क्षेत्र चारों ओर से नदियों से सुरक्षित होने के कारण एक प्राकृतिक दुर्ग की तरह था। यहाँ के राजाओं ने कृषि और जल-परिवहन को उन्नत किया, जिससे यह द्वीप व्यापार और समृद्धि का केंद्र है।
माजुली के इतिहास का सबसे स्वर्णिम और क्रांतिकारी कालखंड तब शुरू हुआ जब महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव (१४४९-१५६८ ई.) ने यहाँ कदम रखा। उस समय असम का समाज घोर अंधविश्वास, जातिगत भेदभाव, और कर्मकांडों के जाल में फंसा हुआ था। धर्म के नाम पर पशुओं (और कभी-कभी मनुष्यों) की बलि दी जा रही थी।
शंकरदेव ने उपनिषदों और श्रीमद्भागवत महापुराण के सार को निकालकर 'एकशरण नाम धर्म' का प्रतिपादन किया। उन्होंने कहा कि ईश्वर को पाने के लिए किसी जटिल यज्ञ, कर्मकांड या ऊंच-नीच के भेद की आवश्यकता नहीं है; केवल निष्कपट भाव से 'नाम-कीर्तन' करने से ही मोक्ष संभव है। उन्होंने अपने परम प्रिय शिष्य माधवदेव के साथ मिलकर माजुली को अपना मुख्य केंद्र बनाया। उन्होंने यहाँ 'सत्र' (वैष्णव मठों) और 'नामघर' (सामुदायिक प्रार्थना गृह) है। मैं माजुली के प्रसिद्ध आउनीआटी सत्र और दखिनपत सत्र के भीतर गया। वहाँ का वातावरण किसी प्राचीन वैदिक गुरुकुल जैसा था। सत्र के भीतर रहने वाले भिक्षुओं को 'भकत' कहा जाता है। ये भकत आजीवन अविवाहित रहते हैं और ईश्वर की सेवा के साथ-साथ संगीत, नृत्य और शिल्प कला की साधना करते हैं। सत्रिया नृत्य: शंकरदेव ने जिस नृत्य शैली को ईश्वर की आराधना के रूप में जन्म दिया था, वह आज भारत के ८ शास्त्रीय नृत्यों में से एक है। मैंने कमलाबाड़ी सत्र में भकतों को सत्रिया नृत्य करते देखा। उनके पैरों की थाप और हाथों की मुद्राओं में जो भक्ति का रस था, वह अद्भुत था। बोरगीत: यह शंकरदेव और माधवदेव द्वारा रचित शास्त्रीय आध्यात्मिक गीत हैं, जो विशेष रागों और तालों में गाए जाते हैं। नामघर के ऊंचे खंभों के बीच जब बोरगीत की गूंज सुनाई देती है, तो मन शांत हो जाता है।
माजुली की सबसे अनूठी विशेषता है यहाँ की मुखौटा (Mask) कला। मैं सामागुरी सत्र के प्रख्यात शिल्पी और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित कलाकारों के कार्यस्थल पर गया। यहाँ बांस, गोबर, कपड़े और मिट्टी के मिश्रण से रामायण और महाभारत के चरित्रों (जैसे रावण, हनुमान, बकासुर, कालिया नाग) के विशाल और जीवंत मुखौटे बनाए जाते हैं। शिल्पी ने मुझे एक मुखौटा पहनकर दिखाया। उन मुखौटों की विशेषता यह है कि उन्हें पहनने के बाद कलाकार अपनी आँखें और मुंह हिला सकता है। जब इन मुखौटों को पहनकर भकत 'अंकिया नाट' (पारंपरिक नाटक) और 'रासलीला' का मंचन करते हैं, तो द्वापर युग की कृष्ण लीला माजुली की धरती पर सजीव हो उठती है। यह द्वीप और लोक-ऋषि संस्कृति का वह अवदान है, जिसने कला को ही अध्यात्म का मार्ग बना दिया। माजुली आज एक गंभीर भौगोलिक और जल संकट से जूझ रहा है। १८५३ में ब्रिटिश अधिकारी ए.जे. मिफेट मिल्स के सर्वेक्षण के अनुसार, माजुली का कुल क्षेत्रफल लगभग १२४६ वर्ग किलोमीटर था। परंतु, ब्रह्मपुत्र नदी की विनाशकारी बाढ़ और हर साल होने वाले मिट्टी के कटाव (Erosion) के कारण आज इसका क्षेत्रफल घटकर लगभग ४०० वर्ग किलोमीटर ही रह गया है। यह द्वीप हर साल थोड़ा-थोड़ा करके ब्रह्मपुत्र के पेट में समा रहा है। लेकिन इस संकट के बावजूद, माजुली के लोगों की सांस्कृतिक जिजीविषा (Will to live) कम नहीं हुई है। वे बाढ़ के पानी को भी अपना भाग्य मानकर स्वीकार करते हैं और मिसिंग (Mising) जनजाति के लोग मचानों पर अपने घर बनाकर नदी के साथ सह-अस्तित्व की अनूठी जल और नदी संस्कृति का निर्वाह कर रहे हैं।
जब हम गुवाहाटी, काजीरंगा और माजुली को एक समग्र दृष्टि से देखते हैं, तो हमें समझ आता है कि यह केवल तीन भौगोलिक स्थान नहीं हैं, बल्कि यह मानव चेतना के विकास के पांच प्रमुख सोपान हैं। इन तीनों क्षेत्रों ने भारत की पांच प्रमुख अमूर्त संस्कृतियों को सहेजने और संवर्धित करने में युगांतरकारी भूमिका निभाई है।
असम का पंचतत्व सांस्कृतिक अवदान में नदी एवं जल संस्कृति का स्थल ब्रह्मपुत्र नद , द्वीप और अरण्य संस्कृति का काजीरंग और मंजिली , शाक्त व सौर चेतना का स्थल गुवाहाटी , वैष्णव कला दर्शन स्थल माजुली और ऋषि संस्कृति स्थल वशिष्ठ आश्रम है।
ब्रह्मपुत्र (लोहित) नदी केवल पानी का बहाव नहीं है, वह असम की जीवन-रेखा और संस्कृति की जननी है। गुवाहाटी में इसी नदी ने सरायघाट के युद्ध में राष्ट्र की रक्षा की, काजीरंगा में इसी के कछारों ने एलीफेंट ग्रास को जन्म देकर गैंडों को जीवन दिया, और माजुली में इसी नदी ने विश्व के सबसे बड़े द्वीप को अपनी गोद में पाला। इन क्षेत्रों ने हमें सिखाया कि नदी के साथ लड़कर नहीं, बल्कि उसके स्वभाव को समझकर ही सभ्यताएं दीर्घायु हो सकती हैं। द्वीप और वृक्ष (अरण्य) संस्कृति - माजुली का द्वीप रूप और काजीरंगा के सघन वन इस बात के प्रतीक हैं कि एकांत और प्रकृति के बीच ही सर्वोच्च दर्शन का जन्म होता है। काजीरंगा ने जहाँ वृक्ष और जीव संरक्षण की आधुनिक वैश्विक संस्कृति को जन्म दिया, वहीं माजुली ने नदी-द्वीप के भीतर एक अभेद्य सांस्कृतिक दुर्ग का निर्माण किया, जिसे बाहरी आक्रमणकारी भी नष्ट नहीं कर सके।
गुवाहाटी का कामाख्या पीठ शाक्त मत की पराकाष्ठा है, तो नवग्रह मंदिर सौर संस्कृति का वैज्ञानिक शिखर। वशिष्ठ आश्रम की शैव और ऋषि परंपरा इस बात का प्रमाण है कि असम कभी भी अलगाव में नहीं रहा, बल्कि वह सनातन भारत की मुख्य आध्यात्मिक धमनियों में रक्त बनकर दौड़ता रहा है।
श्रीमंत शंकरदेव के नेतृत्व में माजुली से उठी वैष्णव धर्म की लहर ने कला को धर्म का माध्यम बनाया। सत्रिया नृत्य, बोरगीत और मुखौटा शिल्प केवल मनोरंजन के साधन नहीं हैं, बल्कि ये ईश्वर की आराधना के वे रूप हैं जो समाज के सबसे अंतिम व्यक्ति को भी बिना किसी भेदभाव के अपने भीतर समेट लेते है।
माजुली के कमलाबाड़ी सत्र की शाम की प्रार्थना का दृश्य मेरी आँखों के सामने अभी भी तैर रहा है। बड़े-बड़े कांसे के झांझों (भोटताल) और खोल (मृदंग) की थाप पर जब भकतों ने एक स्वर में नाम-कीर्तन शुरू किया, तो ऐसा लगा मानो ब्रह्मपुत्र की लहरें भी उस संगीत की ताल पर थिरक रही हों। मेरी यह विरासत-यात्रा केवल भौतिक दूरियों को मापने की यात्रा नहीं थी; यह मन्वंतरों, युगों और राजवंशों के इतिहास से गुजरते हुए अपने भीतर की जड़ों को खोजने की यात्रा थी। गुवाहाटी का वैभव, काजीरंगा की आदिम अरण्य-चेतना और माजुली का शांत, निश्छल अध्यात्म—ये तीनों मिलकर असम का वह 'त्रिरत्न' बनते हैं, जो आधुनिक उपभोक्तावादी दुनिया को शांति, सह-अस्तित्व और प्रकृति-संरक्षण का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाते हैं। जब मैं असम की पावन माटी को प्रणाम कर वापस मगध की ओर लौट रहा था, तो मेरे कानों में शंकरदेव की पंक्तियाँ गूँज रही थीं, जो आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी पाँच सौ वर्ष पूर्व थीं—"समस्त भूतेषु विष्णु बुद्धि" अर्थात संसार के प्रत्येक जीव, वृक्ष, नदी और द्वीप में उसी एक ब्रह्म की चेतना को देखना ही मानव जीवन की सार्थकता है।
संदर्भ सूची - कालिका पुराण (प्राचीन तंत्र ग्रंथ): कामरूप, प्रागज्योतिषपुर और महापीठ कामाख्या के पौराणिक इतिहास और नरकासुर वृत्तांत का मूल स्रोत।।महाभारत (द्रोण पर्व और सभा पर्व): राजा भगदत्त, उनके अजेय हाथी 'सुप्रतीक' और कुरुक्षेत्र युद्ध में उनके अवदान का प्रामाणिक संदर्भ।सी-यू-की (ग्रंथ) – ह्वेनसांग: सातवीं शताब्दी में कुमार भास्करवर्मन के शासनकाल, कामरूप की भौगोलिक स्थिति, जल और वृक्ष संस्कृति का आँखों देखा विवरण। अहोम बुरंजी (ऐतिहासिक दस्तावेज): अहोम राजाओं के कालखंड, मुगलों के आक्रमण और सेनापति लचित बोरफुकन द्वारा सरायघाट के युद्ध (1671 ई.) में अपनाई गई जल-रणनीति का विवरण।।रिपोर्ट ऑन दी प्रोविंस ऑफ असम (1853) – ए.जे. मिफेट मिल्स: ब्रिटिश काल में माजुली द्वीप के कुल क्षेत्रफल (1246 वर्ग किमी) और ब्रह्मपुत्र नदी के कछारों का सांख्यिकीय एवं भौगोलिक सर्वेक्षण।।शंकर चरित्र – माधवदेव कृत: श्रीमंत शंकरदेव के जीवन, माजुली में सत्र संस्कृति की स्थापना और नव-वैष्णव आंदोलन के सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभावों का प्रामाणिक इतिहास।।काजीरंगा नेशनल पार्क सेंटेनरी वॉल्यूम (2005): लेडी मैरी कर्जन (1905) के प्रयासों, पी.डी. स्ट्रेसी (1950) द्वारा नाम परिवर्तन और वन्यजीव संरक्षण के आधुनिक इतिहास का प्रामाणिक संकलन।