शनिवार, मार्च 21, 2026

हिरण्य प्रदेश और हिरण्यबाहु

हिरण्यबाहु का स्वर्ण तट और च्यवनांचल  का वैभव
 सत्येंद्र कुमार पाठक
भारतीय वांग्मय में मगध केवल एक साम्राज्य का नाम नहीं, बल्कि एक शाश्वत विचार है। यह वह पुण्यभूमि है जहाँ ज्ञान की रश्मियाँ ऋषियों के आश्रमों से प्रस्फुटित होकर सम्राटों के प्रासादों तक पहुँचीं। जब हम मध्य मगध के आधुनिक जिलों—अरवल, जहानाबाद, औरंगाबाद और गया—का सूक्ष्म अवलोकन करते हैं, तो हमारे सामने एक ऐसी कालजयी सभ्यता उभरती है, जो मन्वंतरों की प्राचीनता को समेटे हुए, विक्रम संवत के वैभव से होती हुई आधुनिक 'एंगल संवत' (ब्रिटिश काल) तक निरंतर प्रवाहित है। इस सभ्यता की धुरी दो महान नदियाँ रही हैं: हिरण्यबाहु (सोन) और कीकट (पुनपुन)।  हिरण्यबाहु से 'बहा व  बह  तक का मगही , हिंदी भाषाई और भौगोलिक सफर - प्राचीन काल में जिस नद को 'हिरण्यबाहु' (सोने जैसी भुजाओं वाली) या 'शोणभद्र' कहा गया, उसे आज का जनमानस सहज भाव से 'बहा' कहता है। 'बहा' शब्द का निरुक्त और रहस्य - संस्कृत की 'वह' (वहन करने वाली) धातु से निकला 'बहा' शब्द वास्तव में उस निरंतरता का प्रतीक है, जिसने मगध के चार रत्नों को एक भौगोलिक सूत्र में पिरोया है। यूनानी राजदूत मेगास्थनीज ने अपनी पुस्तक 'इंडिका' में जिसे 'सोनास' कहा, वह नदी अपने साथ स्वर्ण कण लाती थी। इसी कारण इस संपूर्ण क्षेत्र को 'स्वर्ण प्रदेश' की संज्ञा मिली। आज भी सोन का पीला बालू अपनी उसी स्वर्ण आभा के लिए निर्माण जगत में विश्वविख्यात है।  हिरण्यबाहु प्रदेश ( जहानाबाद , गया , अरवल, औरंगाबाद, रोहतास , पटना  का क्षेत्र) प्राचीन मगध की 'आर्थिक रीढ़' था। स्वर्ण नद के बालू से स्वर्ण कणों का निष्कर्षण मगध के राजकोष को सदैव आपूरित रखता था। सामरिक दृष्टि से, पाटलिपुत्र की सुरक्षा के लिए यह नदी एक 'जल-दुर्ग' के समान थी। दक्षिण-पथ (South Trade Route) से आने वाले व्यापारियों और आक्रांताओं को इसी 'बहा' क्षेत्र की चुनौतियों को पार करना पड़ता था। अरवल और औरंगाबाद के ऊंचे टीले आज भी उन प्राचीन सैन्य चौकियों के मूक साक्ष्य हैं। च्यवनांचल और देवकुंड—आयुर्वेद की आदि-स्थली - मगध के इस 'बहा' क्षेत्र का हृदय स्थल देवकुंड (औरंगाबाद-अरवल सीमा) है। यह वह भूमि है जिसे वैश्विक मानचित्र पर 'च्यवनांचल' के रूप में प्रतिष्ठित किया जाना चाहिए । ऋषि च्यवन और कायाकल्प का प्रथम वैज्ञानिक प्रयोग मन्वंतरों के संधिकाल में, भृगु पुत्र ऋषि च्यवन ने इसी क्षेत्र में कठोर तपस्या की थी। वायु पुराण और भागवत पुराण के अनुसार, राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या ने अनजाने में ऋषि की आंखों को क्षति पहुंचाई और प्रायश्चित स्वरूप उनसे विवाह किया। यहीं पर अश्विनी कुमारों ने ऋषि के जीर्ण-शीर्ण शरीर को पुनः युवा बनाने के लिए 'लेह' (जो कालांतर में च्यवनप्राश कहलाया) का निर्माण किया था। यह केवल एक पौराणिक कथा नहीं है, बल्कि भारत में 'जेरियाट्रिक्स' (  या वृद्धावस्था चिकित्सा का प्रथम सफल वैज्ञानिक प्रयोग था। देवकुंड की भौगोलिक स्थिति ऐसी है जहाँ सोन का जलोढ़ क्षेत्र और पठारी खनिज मिलते हैं। शोध दर्शाते हैं कि यहाँ की मिट्टी और जल में विशिष्ट गंधक (Sulphur) एवं खनिज तत्व विद्यमान हैं, जो चर्म रोगों और वृद्धावस्था जनित विकारों में प्रभावी हैं  कीकट से पुनपुन तक—ब्रह्मा का संकल्प
ऋग्वेद में मगध को 'कीकट प्रदेश' कहा गया है। यहाँ बहने वाली मुख्य नदी कीकट (पुनपुन) का आध्यात्मिक विस्तार अद्वितीय है। पुनः पुनः" और मोक्ष का मार्ग का सृष्टि विज्ञान के अनुसार, पुनपुन वह स्थान है जहाँ पदार्थ और चेतना का मिलन होता है। ब्रह्मा के मुख से निकले "पुनः पुनः" शब्दों का अर्थ है—बार-बार के जन्म-मृत्यु चक्र से मुक्ति। इसीलिए गया में पिंडदान से पूर्व पुनपुन में तर्पण की अनिवार्यता इसके आध्यात्मिक वर्चस्व को सिद्ध करती है। इसे 'आदि गंगा' माना जात जहानाबाद का बराबर पर्वत (खलतिका पर्वत) और पुनपुन के किनारे मिले मौर्यकालीन अवशेष यह सिद्ध करते हैं कि यह नदी मार्ग केवल तीर्थयात्रियों के लिए नहीं, बल्कि सम्राट अशोक के धम्म-प्रचार का भी प्रमुख पथ था। मगध की आत्मा इसी नदी के जल से सिंचित होकर पल्लवित हुई है। चतुर्थ अध्याय: एंगल संवत और सोन नहर प्रणाली (1874) में मगध के इतिहास में 'एंगल संवत' (ब्रिटिश काल) का आगमन एक युगांतकारी घटना थी। जहाँ मन्वंतर काल में हिरण्यबाहु केवल ऋषियों की तपोभूमि थी, वहीं 19वीं शताब्दी में यह इस क्षेत्र की 'जीवनरेखा' बनी। अकाल से समृद्धि तक 1860 के दशक के भयंकर अकाल के बाद ब्रिटिश इंजीनियरों ने 'हिरण्यबाहु' के जल को नियंत्रित करने का संकल्प लिया। 1874 में डेहरी में इंद्रपुरी बैराज और सोन नहर प्रणाली का निर्माण हुआ। पूर्वी सोन नहर: इसने औरंगाबाद, अरवल और जहानाबाद के शुष्क क्षेत्रों को सींचा। धान का कटोरा: इस सिंचाई क्रांति ने मगध को 'बिहार का धान का कटोरा' बना दिया। यह प्राचीन 'आहार-पाइन' प्रणाली का ही आधुनिक विस्तार था। आधुनिक जिलों का ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्त्व अरवल: यह च्यवनांचल का द्वार है। करपी, कलेर और मधुसर्वा जैसे क्षेत्रों में च्यवनेश्वर शिवलिंग और प्राचीन ऋषि परंपरा के पदचिह्न आज भी मिलते हैं। जहानाबाद: बराबर की गुफाओं के माध्यम से यह जिला मौर्यकालीन स्थापत्य और बौद्ध-आजीवक दर्शन का केंद्र रहा है। औरंगाबाद: देवकुंड और देव के सूर्य मंदिर के कारण यह धार्मिक पर्यटन का महाकुंभ है। गया: यह मोक्ष की चरम भूमि है, जहाँ हिरण्यबाहु और कीकट का आध्यात्मिक संगम मानवता को शांति का मार्ग दिखाता है। प्राचीन हिरण्यबाहु प्रदेश आज भी अपनी पुरातात्विक संपदा को सीने में दबाए हुए है। मगध की यह विरासत हमें सिखाती है कि नदियाँ केवल जल नहीं ढोतीं, वे संस्कृतियाँ ढोती है । हेरिटेज कॉरिडोर: अरवल से गया तक के इस चतुष्कोण को एक 'विरासत गलियारे' के रूप में विकसित किया जाए। आयुर्वेद पर्यटन: देवकुंड को राष्ट्रीय स्तर पर एक 'कायाकल्प केंद्र' के रूप में मान्यता मिले, जहाँ प्राकृतिक चिकित्सा और औषधीय जड़ी-बूटियों पर शोध हो। दस्तावेजीकरण: सोन-पुनपुन दोआब के ऐतिहासिक गाँवों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कर लुप्त हो रही 'मन्वंतर कालीन' स्मृतियों को लिपिबद्ध किया जाए। हिरण्यबाहु का स्वर्ण कण आज भी हमारी प्रतीक्षा में है। यदि हम अपनी इन प्राचीन जलधाराओं और ऋषि-परंपराओं को संजोने में सफल रहे, तभी हम आगामी संवतों में अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को सुरक्षित रख पाएंगे।
संदर्भ सूची: ऋग्वेद (कीकट प्रदेश विवरण) , वायु पुराण एवं भागवत पुराण (च्यवन-सुकन्या प्रसंग) , इंडिका - मेगास्थनीज (सोनास नदी का वर्णन) , मगध क्षेत्र की विरासत - सत्येंद्र कुमार पाठक , फ्रांसिस बुकानन की रिपोर्ट (1812-13) 

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