- सत्येन्द्र कुमार पाठक
वैश्विक सभ्यता का पालना और 'पाटलिग्राम' का उदय में बिहार की राजधानी पटना का इतिहास केवल एक नगर की भौगोलिक सीमा का विवरण नहीं है, बल्कि यह भारतीय उपमहाद्वीप के राजनैतिक अभ्युदय, आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की जीवंत गाथा है। गंगा, सोन और गंडक जैसी पवित्र नदियों के संगम पर स्थित यह भूभाग प्राचीन काल से ही वैश्विक ज्ञान और सत्ता का केंद्र रहा है। पाटलिपुत्र नगर की यात्रा ईसा पूर्व 5वीं शताब्दी (लगभग 450 ई.पू.) में शुरू हुई, जब मगध साम्राज्य के हर्यक वंश के प्रतापी राजा अजातशत्रु ने वैशाली के शक्तिशाली लिच्छवियों के संभावित आक्रमणों से अपने राज्य की सुरक्षा के लिए यहाँ गंगा के तट पर 'पाटलिग्राम' के रूप में एक सैनिक छावनी (जलदुर्ग) का निर्माण करवाया था। अजातशत्रु के दूरदर्शी पुत्र राजा उदयन ने इस स्थान के अद्वितीय सामरिक (Strategic) और व्यापारिक महत्व को समझा। उन्होंने मगध की राजधानी को पहाड़ियों से घिरे 'राजगृह' (राजगीर) से स्थानांतरित कर पाटलिपुत्र में स्थापित किया। आगे चलकर यह नगर मौर्य, शुंग और गुप्त जैसे महान राजवंशों के अधीन अखंड भारत की एक महाशक्तिशाली साम्राज्यिक राजधानी के रूप में प्रदीप्त हुआ, जहाँ चाणक्य, चन्द्रगुप्त, सम्राट अशोक और आर्यभट्ट जैसे युगपुरुषों ने अपनी कर्मभूमि बनाई।
गुप्त साम्राज्य के अवसान और पाल वंश के बाद समय के थपेड़ों के कारण इस ऐतिहासिक नगर का गौरव कुछ समय के लिए धुंधला पड़ गया था। मध्यकाल में इस खोई हुई भौगोलिक और प्रशासनिक महत्ता को पुनः स्थापित करने का श्रेय अफगान शासक शेरशाह सूरी को जाता है। वर्ष 1541 ईस्वी में शेरशाह सूरी ने प्राचीन पाटलिपुत्र के खंडहरों के समीप गंगा नदी के तट की रणनीतिक स्थिति को पुनः पहचाना। उन्होंने यहाँ एक बेहद मजबूत और भव्य दुर्ग का निर्माण कराया और इसे बिहार की प्रांतीय राजधानी घोषित किया। इसी कालखंड के दौरान, व्यापारिक केंद्रों, घाटों और बंदरगाहों के लिए प्रयुक्त होने वाले संस्कृत शब्द 'पत्तन' से प्रेरित होकर इस नगर का नाम 'पाटलिपुत्र' से बदलकर 'पटना' के रूप में सर्वमान्य और स्थापित हो गया।
. ब्रिटिश काल और आधुनिक बिहार का अभ्युदय (1912) - 20वीं शताब्दी की शुरुआत पटना के आधुनिक इतिहास का सबसे स्वर्णिम और निर्णायक मोड़ साबित हुई। वर्ष 1911 के ऐतिहासिक दिल्ली दरबार में वाइसराय लॉर्ड हार्डिंग द्वारा ब्रिटिश हुकूमत (जॉर्ज पंचम की शाही घोषणा) के माध्यम से बिहार को अलग प्रांत बनाने की रूपरेखा तैयार की गई। परिणामस्वरूप, 22 मार्च 1912 को बिहार और उड़ीसा को बंगाल प्रेसीडेंसी से पृथक कर एक नए राज्य का दर्जा दिया गया।
01 अप्रैल 1912 को तत्कालीन पटना शहर को बिहार नए राज्य का मुख्य प्रशासनिक केंद्र और राजधानी घोषित किया गया। वर्ष 1936 में उड़ीसा के अलग होने और वर्ष 2000 में झारखंड राज्य के निर्माण के बाद भी पटना निरंतर बिहार के मुख्य प्रशासनिक, आर्थिक, न्यायिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में अडिग और जीवंत बना रहा। प्रशासनिक रूप में 1912 से लेकर भारतीय गणतंत्र के गठन (1950) तक का कालखंड पटना का "स्वर्णिम युग" माना जाता है, जिसमें इसका प्रशासनिक स्वरूप पूरी तरह बदल गया: क्षेत्रफल का विस्तार और 'न्यू कैपिटल एरिया' 1912 की स्थिति: तत्कालीन पटना मुख्य रूप से पूर्वी हिस्से (आज का सिटी इलाका, बांकीपुर और पुरानी बाज़ार की संकरी सड़कों) तक सिमटा हुआ था, जिसका कुल क्षेत्रफल लगभग 9 से 10 वर्ग मील था।
1950 तक की स्थिति: जब ब्रिटिश सरकार ने पश्चिम की ओर 'न्यू कैपिटल एरिया' (नया प्रशासनिक क्षेत्र) विकसित करना शुरू किया, तो शहर का झुकाव तेजी से पश्चिम की तरफ हुआ। राजभवन, सचिवालय, गोल्फ क्लब और असेंबली (विधानसभा) जैसे क्षेत्रों के निर्माण के बाद 1950 तक पटना नगर पालिका और उसके आसपास के शहरी विकास का कुल क्षेत्रफल बढ़कर लगभग 20 से 22 वर्ग मील (लगभग 52 से 57 वर्ग किलोमीटर) हो गया था। प्रशासनिक सुदृढ़ीकरण और प्रमंडल व्यवस्था - ब्रिटिश शासनकाल में प्रशासनिक सुगमता के लिए 1829 में कमिश्नरियों का गठन किया गया था, जिसके तहत पटना को प्रमंडल का मुख्यालय बनाया गया। 1912 में बिहार के गठन के बाद इस व्यवस्था को और सुदृढ़ किया गया। कमिश्नर का कार्यालय बांकीपुर (गांधी मैदान के पास) में केंद्रित रहा। : वर्तमान में प्रशासनिक स्वरूप के तहत पटना प्रमंडल के अंतर्गत 6 जिले (पटना, नालंदा, भोजपुर, बक्सर, रोहतास और कैमूर) आते हैं, जबकि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से मगध प्रमंडल के जिले (गया, नवादा, औरंगाबाद, जहानाबाद और अरवल) भी इसके प्रभाव क्षेत्र से निरंतर जुड़े रहे हैं। पटना जिला मुख्यालय: औपचारिक रूप से 1825 के आसपास एक प्रशासनिक जिले के रूप में स्थापित पटना का कलेक्टॉरेट (गंगा तट के किनारे) जिला प्रशासन का मुख्य केंद्र बना रहा, जिसके तहत जिला अदालतों और सिविल लाइंस का विस्तार हुआ था ।
आधुनिक पटना के चार स्थापत्य स्तंभ 1912 से 1950 के बीच निर्मित पटना के प्रमुख प्रशासनिक, न्यायिक और शैक्षणिक भवनों का इतिहास केवल वास्तुकला का उदाहरण नहीं है, बल्कि यह आधुनिक बिहार के उदय और उसकी अस्मिता की कहानी है: पटना उच्च न्यायालय – न्याय का भव्य प्रतीक बंगाल से अलग होने के बाद बिहार को अपने एक स्वतंत्र उच्च न्यायालय की आवश्यकता थी। इसके लिए पटना के पश्चिमी हिस्से (न्यू कैपिटल एरिया) को चुना गया। इसका शिलान्यास 1 दिसंबर 1913 को तत्कालीन वाइसराय लॉर्ड हार्डिंग द्वारा किया गया और 3 फरवरी 1916 को इसका भव्य उद्घाटन हुआ था । इसके मुख्य डिजाइनकार न्यूजीलैंड के प्रसिद्ध वास्तुकार जे. एफ. मुिंग्स थे और सहयोगी के रूप में ए. एम. मिलवुड (A. M. Millwood) ने काम किया। यह भवन 'नियो-क्लासिकल' (Neo-Classical Style) और यूरोपीय पुनर्जागरण काल (Renaissance style) की शैली पर आधारित है। इसे मुख्य रूप से 'E' आकार में डिजाइन किया गया है, जो 'England' या 'Executive' का प्रतीक माना जाता है। इसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश सर एडवर्ड चामियर थे, जबकि बाद में सर सुल्तान अहमद इसके पहले भारतीय मुख्य न्यायाधीश बने।
. पटना सचिवालय – सत्ता और प्रशासन का केंद्र बिहार प्रांत के प्रशासनिक कार्य को एक छत के नीचे लाने के लिए इस विशाल भवन का निर्माण 1913 से 1915 के बीच कराया गया और 1917 तक यह पूरी तरह क्रियाशील हो गया था। इसे भी वास्तुकार जे. एफ. मुिंग्स ने ही डिजाइन किया था और निर्माण का कार्य कलकत्ता की प्रसिद्ध फर्म 'मार्टिन एंड कंपनी' को सौंपा गया था। यह भवन इण्डो-सारसेनिक और पुनर्जागरण शैली का अद्भुत मिश्रण है। यह लगभग 716 फीट लंबा है। इसके ठीक पीछे एक विशाल क्लॉक टावर (घंटाघर) बनाया गया था, जो 1934 के विनाशकारी भूकंप में क्षतिग्रस्त हो गया था, जिसे बाद में छोटा किया गया। इसी भवन के मुख्य द्वार के सामने 'शहीद स्मारक' (Martyrs' Memorial) स्थित है, जो 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान सचिवालय पर तिरंगा फहराने की कोशिश में शहीद हुए 7 वीर छात्रों की अमर शहादत की याद दिलाता है। पटना विश्वविद्यालय – 'पूर्व का ऑक्सफोर्ड' अक्टूबर 1917 में स्थापित पटना विश्वविद्यालय, भारतीय उपमहाद्वीप का 7वां सबसे पुराना विश्वविद्यालय है। गंगा नदी के सुरम्य तट पर स्थित इसके भवनों का निर्माण शिक्षा के प्रति बिहार के समर्पण को दर्शाता है। इसके अंतर्गत 1926 में निर्मित 'व्हीलर सीनेट हाउस' विश्वविद्यालय की रीढ़ बना, जिसका नाम तत्कालीन चांसलर सर हेनरी व्हीलर के नाम पर रखा गया था और इसका उद्घाटन राजा देवकी नंदन प्रसाद सिंह के आर्थिक सहयोग से हुआ था। इसके अतिरिक्त पटना कॉलेज (स्थापित 1863) का भवन डच वास्तुकला (Dutch Architecture) से प्रभावित है, जहाँ कभी डच व्यापारियों की फैक्ट्री हुआ करती थी। 1927 में स्थापित 'पटना साइंस कॉलेज' का उद्घाटन 1928 में लॉर्ड इर्विन ने किया था, जिसकी इमारतें यूरोपीय क्लासिकल शैली में बनी हैं। इसकी शैक्षणिक उच्चता के कारण इसे "पूर्व का ऑक्सफोर्ड" कहा जाने लगा।।सिन्हा लाइब्रेरी – ज्ञान और वैचारिक क्रांति की भूमि आधुनिक बिहार के निर्माता डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती राधिका सिन्हा की दूरदर्शिता का परिणाम यह पुस्तकालय है, जिसकी स्थापना 1924 में हुई थी। आधिकारिक तौर पर इसे 'श्रीमती राधिका सिन्हा इंस्टीट्यूशन' कहा जाता है।: डॉ. सिन्हा ने अपनी स्वयं की अर्जित अकूत और दुर्लभ पुस्तकों का संग्रह, अपनी भूमि और भवन इस पुस्तकालय को दान कर दिया। 1930 और 1940 के दशक में यह पुस्तकालय केवल किताबों का घर नहीं, बल्कि बिहार के स्वतंत्रता सेनानियों और राजनेताओं ( जयप्रकाश नारायण, डॉ. श्रीकृष्ण सिंह) की गुप्त बैठकों और वैचारिक विमर्श का मुख्य केंद्र हुआ करता था।
आधुनिक पटना के निर्माता: महापुरुषों का अमूल्य योगदान - पटना को बिहार की धड़कन और आधुनिक नागरिक स्वरूप देने में राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर के कई दूरदर्शी राजनेताओं, शिक्षाविदों और समाजसेविदों का अमूल्य योगदान रहा है: सच्चिदानंद सिन्हा: इन्हें "आधुनिक बिहार का निर्माता" कहा जाता है। उन्होंने बंगाल से बिहार को अलग करने की लंबी कानूनी और राजनैतिक लड़ाई लड़ी। शिक्षा के क्षेत्र में उनका अवदान अतुलनीय है। लॉर्ड हार्डिंग (तत्कालीन वाइसराय): 1911 के दिल्ली दरबार में बिहार को अलग प्रांत बनाने की घोषणा कराने और पटना में नए प्रशासनिक भवनों (हाईकोर्ट, सचिवालय) की रूपरेखा तैयार करवाने में इनकी मुख्य भूमिका थी। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद: देश के प्रथम राष्ट्रपति। उन्होंने पटना को अपनी कर्मभूमि बनाया, सदाकत आश्रम (1921) से स्वतंत्रता संग्राम का संचालन किया और पटना विश्वविद्यालय के सीनेट के सक्रिय सदस्य रहकर यहाँ की शैक्षणिक नीतियों को दिशा दी। डॉ. श्रीकृष्ण सिंह (श्रीबाबू) और अनुग्रह नारायण सिंह (बिहार विभूति): 1937 की अंतरिम सरकार और 1946 के बाद मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री के रूप में, इन दोनों नेताओं ने 1950 तक पटना के औद्योगिकीकरण, शैक्षणिक संस्थानों को सुदृढ़ करने और राजधानी के नागरिक ढांचे को आधुनिक बनाने की नींव रखी। मौलाना मज़हरुल हक़: महान स्वतंत्रता सेनानी और सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक। उन्होंने असहयोग आंदोलन के दौरान पटना में सदाकत आश्रम और बिहार विद्यापीठ की स्थापना के लिए अपनी ज़मीन दान कर दी थी। सर सुल्तान अहमद: पटना उच्च न्यायालय के पहले भारतीय मुख्य न्यायाधीश और पटना विश्वविद्यालय के कुलपति थे। उन्होंने पटना में उच्च शिक्षा के स्तर को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहुँचाने में अभूर्व योगदान दिया।
सैयद हसन इमाम: प्रसिद्ध बैरिस्टर और कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। पटना में नागरिक अधिकारों की रक्षा और आधुनिक विचारों के प्रसार में इनका बड़ा नाम था। सर गणेश दत्त सिंह: बिहार के तत्कालीन स्थानीय स्वशासन मंत्री थे। उन्होंने अपने वेतन का एक बड़ा हिस्सा पटना विश्वविद्यालय और पटना मेडिकल कॉलेज और अस्पताल, स्थापित 1925, पूर्व नाम 'प्रिंस ऑफ वेल्स मेडिकल कॉलेज') जैसी संस्थाओं को दान कर दिया, जिससे गरीब छात्रों को छात्रवृत्ति और चिकित्सा शिक्षा को बढ़ावा मिला।
साहित्यिक पुनर्जागरण, पत्रकारिता और भाषाई साधना - 1912 से 1950 के बीच पटना का विकास केवल ईंट-पत्थरों के भवनों का निर्माण नहीं था, बल्कि यह बिहार की अस्मिता, आधुनिक शिक्षा, और साहित्यिक चेतना के उदय का काल था। इस दौरान पटना हिंदी, संस्कृत और उर्दू साहित्य के एक बड़े गढ़ के रूप में स्थापित हुआ: आचार्य शिवपूजन सहाय (1893–1963): इन्हें हिंदी साहित्य का 'सच्चा सेवादार' और 'भाषा का जादूगर' कहा जाता है। 1912 से 1950 के बीच पटना को हिंदी पत्रकारिता और साहित्य का केंद्र बनाने में इनका सबसे बड़ा हाथ था। इन्होंने पटना से निकलने वाली प्रसिद्ध पत्रिकाओं 'मारवाड़ी सुधार', 'गोलमाल', 'उपन्यास तरंग' और 'बालक' (बच्चों की कालजयी पत्रिका) का संपादन किया। 1947 में स्थापित 'बिहार राष्ट्रभाषा परिषद' (पटना) के निर्माण और उसकी रूपरेखा तैयार करने में इनका ऐतिहासिक योगदान था। इन्होंने रामवृक्ष बेनीपुरी, कंचननाथ झा और पंडित जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी जैसे अनगिनत युवा लेखकों को तराशा।
आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री (1916–2011): छायावादोत्तर काल के महान कवि, गीतकार और संस्कृत के प्रकांड विद्वान। यद्यपि इनका मुख्य केंद्र मुजफ्फरपुर रहा, लेकिन पटना के साहित्यिक समाज को इन्होंने अपने गीतों और काव्यों (जैसे 'काकली', 'रूप अरूप') से अत्यधिक समृद्ध किया। महाप्राण निराला के प्रिय रहे शास्त्री जी ने बिहार में गीति-काव्य की एक नई धारा प्रवाहित की। पंडित रामदयाल पांडेय (1915–1972): बिहार में राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार के पुरोधा और 'बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन' (पटना) के प्रमुख कर्णधारों में से एक थे। इन्होंने 'राष्ट्रभाषा' पत्रिका का कुशल संपादन किया और अपनी ओजस्वी कविताओं से युवाओं में राष्ट्रभक्ति का संचार किया। प्रो. बद्रीनाथ वर्मा (1889–1972): प्रख्यात शिक्षाविद, साहित्य प्रेमी और स्वतंत्रता के बाद बिहार के पहले शिक्षा मंत्री (1946-1961)। शिक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने पटना विश्वविद्यालय को सुदृढ़ किया और 'बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना' तथा 'काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान' की स्थापना कराई, जिसने हिंदी और शोध के क्षेत्र में वैश्विक कीर्तिमान स्थापित किया। बाबू वीर कुंवर सिंह (1777–1858) और जीवधर सिंह का प्रभाव: यद्यपि बाबू वीर कुंवर सिंह 1857 की क्रांति के महानायक थे, लेकिन उनकी वीरता ने आधुनिक बिहार के पूरे साहित्य को प्रेरित किया। 1912 से 1950 के बीच पटना और बिहार के कवियों ( मनोरंजन प्रसाद सिंह की कविता "नमन करूँ मैं उस वीर को...") ने कुंवर सिंह को केंद्र में रखकर वीर रस के अप्रतिम साहित्य की रचना की। स्वतंत्रता सेनानी जीवधर सिंह ने भी अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों और वैचारिक लेखों से तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं और लोक-साहित्य को गहराई से प्रभावित किया। राजसी रियासतें और उनका साहित्यिक 1912 से 1950 के संक्रमण काल में जब हिंदी और संस्कृत के साहित्यकारों के पास आजीविका का संकट था, तब बिहार की समृद्ध रियासतों ने आर्थिक उदारता दिखाकर साहित्य, प्रेस और शिक्षा को जीवित रखा:
दरभंगा राज और महाराजा सर कामेश्वर सिंह (1907–1962): दरभंगा राज भारत में संस्कृत, मैथिली और हिंदी साहित्य का सबसे बड़ा संरक्षक था। महाराजा कामेश्वर सिंह ने पटना से निकलने वाले प्रसिद्ध अंग्रेजी समाचार पत्र 'The Searchlight' (द सर्चलाइट) और 'The Indian Nation' (द इंडियन नेशन) तथा हिंदी के 'आर्यावर्त' को आर्थिक संरक्षण और जीवन दिया। उनके दरबार और संरक्षण से महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' और राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' जैसे दिग्गज जुड़े रहे।
टिकारी राज (गया / पटना क्षेत्र): गया और पटना की सीमा पर स्थित टिकारी राज के महाराजाओं ने कला, संगीत और साहित्य को खूब बढ़ावा दिया। प्रसिद्ध छायावादी कवि महाराज गोपाल शरण सिंह (जिन्होंने 'माधवी', 'कादम्बिनी' जैसी कृतियाँ लिखीं) इसी राज परिवार से थे। इनके काल में खड़ी बोली हिंदी के कई कवियों को राज्याश्रय मिला और टिकारी राज ने पटना के कई प्रकाशनों को आर्थिक मदद दी।
बेतिया राज की महारानी जानकी कुंवर के समय में इस राज ने उत्तर बिहार और पटना के साहित्यिक आयोजनों को हमेशा आर्थिक संबल दिया। बेतिया राज के संरक्षण में 'बेतिया घराना' (ध्रुपद गायन) फला-फूला, जिसने संगीत शास्त्र और कला पर कई महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना करवाई। बड़ौदा राज गुजरात में था, लेकिन इसके महान शासक महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय का आधुनिक बिहार और पटना के निर्माताओं से गहरा संबंध था। उन्होंने डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा के प्रयासों और बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर की उच्च शिक्षा में आर्थिक मदद की थी। बड़ौदा राज की 'गायकवाड़ ओरिएंटल सीरीज' से प्रेरित होकर ही पटना में प्राच्य (Oriental) और ऐतिहासिक ग्रंथों के संपादन-प्रकाशन की प्रेरणा मिली।
1912 से 1950 के बीच का पटना केवल एक प्रशासनिक राजधानी मात्र नहीं था, बल्कि यह बिहार की अस्मिता, न्याय, आधुनिक शिक्षा, और प्रखर राजनीतिक व साहित्यिक चेतना के अभ्युदय का जीवंत कालखंड था। सच्चिदानंद सिन्हा से लेकर डॉ. श्रीकृष्ण सिंह तक के दूरदर्शी राजनैतिक नेतृत्व; दरभंगा राज और टिकारी राज जैसी रियासतों की आर्थिक उदारता; बद्रीनाथ वर्मा की प्रशासनिक दूरदर्शिता और आचार्य शिवपूजन सहाय, रामदयाल पांडेय, जानकी बल्लभ शास्त्री तथा रामधारी सिंह दिनकर जैसे महामनीषियों की निश्छल और अनवरत साहित्याराधना का ही यह सामूहिक अवदान था, जिसने पटना को एक ऐसा मजबूत सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और बौद्धिक आधार दिया, जिस पर आज का आधुनिक बिहार गर्व से खड़ा है।