बुधवार, जनवरी 21, 2026

भारत - श्रीलंका और हिन्द महासागर

भारत श्रीलंका और हिंदमहासागर की सांस्कृतिक समन्वय 
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
इतिहास की पुस्तकें हमें बताती हैं कि सभ्यताएं नदियों के किनारे फली-फूलीं, लेकिन संस्कृतियों का विस्तार महासागरों की लहरों पर हुआ। 13 जनवरी 2026 की सुनहरी सुबह, जब कोलंबो स्थित हिंद महासागर के तट पर सूर्य की पहली किरणें बिखरीं, तो एक नया इतिहास रचा जा रहा था। पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी द्वारा आयोजित 'लेखक मिलन समारोह' के दौरान भारतीय साहित्यकारों के एक दल ने न केवल श्रीलंका की धरती पर कदम रखा, बल्कि हिंद महासागर के जल में प्रतीकात्मक गोता लगाकर भारत और श्रीलंका के बीच के 2500 वर्ष पुराने संबंधों को शब्दों का नया आकाश दिया। इस दल का नेतृत्व कर रहे थे वरिष्ठ साहित्यकार सत्येन्द्र कुमार पाठक, अकादमी के संयोजक डॉ. अकेला भाई, स्वर्णिम कला केंद्र की अध्यक्षा डॉ. उषाकिरण श्रीवास्तव और कवयित्री डॉ. संगीता सागर है। साहित्यकार व इतिहासकार सत्येन्द्र कुमार पाठक ने कहा कि यह आयोजन केवल एक साहित्यिक गोष्ठी नहीं थी, बल्कि यह 'सांस्कृतिक कूटनीति' का एक उत्कृष्ट उदाहरण था, जहाँ कलम के सिपाहियों ने समंदर की लहरों के माध्यम से दो देशों के दिलों को जोड़ने का उपक्रम किया। कोलंबो: जहाँ इतिहास करवट लेता है कोलंबो, जिसे दुनिया 'हिंद महासागर का मोती' कहती है, वास्तव में एक ऐसा चौराहा है जहाँ समय की कई परतें एक साथ मौजूद हैं। एक ओर उत्तर में कोलंबो बंदरगाह की आधुनिकता और दूसरी ओर बेइरा झील के शांत लैगून के बीच बसा यह शहर दक्षिण एशिया की समुद्री पहचान का केंद्र है। ऐतिहासिक रूप से, कोलंबो सदियों तक मसालों, रत्नों और बौद्धिक चेतना का केंद्र रहा। अरब व्यापारियों से लेकर यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों तक, हर किसी ने इस 'मोती' को पाने की चाह रखी। आज, जब हम यहाँ के 'फोर्ट एरिया' या 'गंगारामया मंदिर' की गलियों में टहलते हैं, तो हमें पुर्तगाली, डच और ब्रिटिश वास्तुकला के साथ-साथ शुद्ध श्रीलंकाई परंपराओं का अद्भुत संगम दिखाई देता है। यह वही 'समुद्री सिल्क रोड' है जिसने कभी बुद्ध के संदेशों को वैश्विक बनाया था। वैचारिक विमर्श इस यात्रा के केंद्र बिंदु रहे वरिष्ठ साहित्यकार सत्येन्द्र कुमार पाठक। समारोह के दौरान उनके संबोधन ने उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया। पाठक जी ने तर्क दिया कि भारत और श्रीलंका का संबंध केवल भौगोलिक निकटता का नहीं, बल्कि 'सांस्कृतिक डीएनए' का है।
उन्होंने रेखांकित किया कि कैसे प्राचीन व्यापारिक हवाओं ने नकेवल जहाजों को दिशा दी, बल्कि ज्ञान, दर्शन और कला का भी वहन किया। उनके अनुसार, "हिंद महासागर का जल हमारे बीच की दीवार नहीं, बल्कि वह दर्पण है जिसमें भारत और श्रीलंका एक-दूसरे का अक्स देखते हैं।" पाठक जी का यह दृष्टिकोण आधुनिक संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है, विशेषकर जब दक्षिण एशियाई देश अपनी साझा पहचान को फिर से परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं। संयोजन की शक्ति: डॉ. अकेला भाई और स्वर्णिम कला केंद्र किसी भी अंतरराष्ट्रीय आयोजन की सफलता उसके पीछे की संगठनात्मक दूरदृष्टि पर निर्भर करती है। पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी के संयोजक डॉ. अकेला भाई ने जिस कुशलता से इस लेखक मिलन समारोह को संयोजित किया, उसने हिंदी साहित्य के वैश्विक विस्तार को एक नई दिशा दी है। वहीं, डॉ. उषाकिरण श्रीवास्तव और डॉ. संगीता सागर की उपस्थिति ने इस आयोजन को भावुकता और काव्यात्मक ऊँचाई प्रदान की। डॉ. श्रीवास्तव ने 'हिंद महासागर की पहचान' को पुनर्जीवित करने पर बल देते हुए कहा कि समुद्री सुरक्षा के साथ-साथ 'सांस्कृतिक सुरक्षा' भी आज की महती आवश्यकता है। इन साहित्यकारों का हिंद महासागर के सानिध्य में समय बिताना इस बात का प्रतीक था कि भारतीय ज्ञान परंपरा आज भी महासागर की तरह विशाल और समावेशी है। हिंद महासागर: सामरिक महत्व और सांस्कृतिक पहचान आलेख का एक महत्वपूर्ण पहलू इस क्षेत्र का सामरिक महत्व भी है। कोलंबो सुरक्षा सम्मेलन (CSC) जैसे मंचों ने आज हिंद महासागर को सुरक्षा और सहयोग का नया केंद्र बना दिया है। भारत, श्रीलंका, मालदीव और अब पूर्ण सदस्य के रूप में सेशेल्स की भागीदारी इस क्षेत्र को वैश्विक शक्तियों की प्रतिस्पर्धा से बचाकर एक 'स्थिरता का क्षेत्र' बनाने की कोशिश कर रही है। लेकिन साहित्यकारों का मानना है कि यह सुरक्षा केवल नौसैनिक जहाजों से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान से भी आएगी। जब भारत और श्रीलंका के लेखक एक-दूसरे की भाषाओं और संवेदनाओं को समझेंगे, तो क्षेत्रीय शांति की नींव और अधिक सुदृढ़ होगी। भारतीय यात्रियों के लिए एक किफ़ायती स्वर्ग पर्यटन की दृष्टि से देखा जाए तो श्रीलंका भारतीयों के लिए हमेशा से एक पसंदीदा गंतव्य रहा है। 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार, श्रीलंका भारतीयों के लिए सबसे सस्ते और सुंदर यात्रा गंतव्यों में से एक है।
खान-पान: यहाँ का 'इस्सो वडाई' (झींगे के पकौड़े) और स्ट्रीट फूड न केवल स्वादिष्ट है, बल्कि भारतीय जायके के काफी करीब है। गॉल फेस ग्रीन पर सूर्यास्त देखना और पतंगों से भरे आकाश के नीचे समुद्र की लहरों का संगीत सुनना एक आध्यात्मिक अनुभव की तरह है। जुड़ाव: 2500 साल पुराना साझा इतिहास हर कदम पर भारतीय यात्री को अपनेपन का अहसास कराता ह कोलंबो में आयोजित यह लेखक मिलन समारोह एक गूँज की तरह है जो आने वाले लंबे समय तक सुनी जाएगी। यह आयोजन बताता है कि "सूर्यास्त को सहारा मानकर पानी के किनारे रहना" केवल एक काव्य पंक्ति नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन है। हम हमेशा पानी के किनारे रहते आए हैं, और हमारा मुख हमेशा पश्चिम की ओर रहा है, जहाँ से ज्ञान और व्यापार की नई किरणें आती हैं।  श्रीलंका को 'हिंद महासागर का मोती' इसलिए नहीं कहा जाता कि वह सुंदर है, बल्कि इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह समुद्र की गहराइयों से निकली उस संस्कृति को संजोए हुए है, जिसमें भारत का प्रेम और विश्व कल्याण की भावना समाहित है। सत्येन्द्र कुमार पाठक और उनके साथियों की यह यात्रा इसी प्रेम और समन्वय की विजय गाथा है।

एला की वादियां और श्रीलंका

एला की वादियों में जीवित है रामायण: श्रीलंका के 'रावण जलप्रपात 
सत्येन्द्र कुमार पाठक
श्रीलंका, जिसे हिंद महासागर का 'पन्ना' कहा जाता है, अपनी गोद में न केवल प्राकृतिक सुंदरता समेटे हुए है, बल्कि यहाँ की हवाओं में इतिहास और पौराणिक कथाओं का अद्भुत संगीत भी बहता है। 10 जनवरी 2026 की वह गुनगुनी सुबह मेरे जीवन के उन सुनहरे पन्नों में दर्ज हो गई, जिन्हें मैं बार-बार पलटना चाहूँगा। पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी के तत्वावधान में आयोजित इस सांस्कृतिक परिभ्रमण का सबसे रोमांचक पड़ाव था—एला (Ella) और वहाँ का विश्वप्रसिद्ध 'रावण जलप्रपात'। पहाड़ों का हृदय: एला की जादुई घाटियाँ - श्रीलंका का मध्य पहाड़ी क्षेत्र अपनी धुंध भरी सुबहों और अंतहीन चाय के बागानों के लिए जाना जाता है। एला, जो एक छोटा सा पर बेहद खूबसूरत कस्बा है, यहाँ पहुँचते ही ऐसा लगता है मानो समय ठहर गया हो। ऊँची चोटियाँ, बादलों से ढकी घाटियाँ और हरियाली की ऐसी चादर कि आँखें थक जाएँ पर दृश्य खत्म न हों। इसी एला से लगभग 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है वह स्थान, जिसका संबंध सीधे भारत के महान महाकाव्य 'रामायण' से जुड़ा है।
रावण जलप्रपात: जहाँ पत्थर भी गाते हैं इतिहास की गाथा जैसे ही हमारी बस घुमावदार रास्तों से होती हुई नीचे की ओर उतरी, कानों में एक मधुर गर्जना सुनाई देने लगी। यह 'रावण एला' या रावण जलप्रपात था। लगभग 25 मीटर (82 फीट) की ऊँचाई से गिरता यह झरना श्रीलंका के सबसे चौड़े प्रपातों में से एक है। इस झरने की बनावट बड़ी ही अनूठी है। यह एक विशाल अंडाकार अवतल (Concave) चट्टान के ऊपर से नीचे गिरता है। स्थानीय लोगों का मानना है कि वर्षा ऋतु में जब यह अपने पूरे वेग में होता है, तो इसकी आकृति 'मुरझाई हुई पंखुड़ियों वाले सुपारी के फूल' के समान दिखाई देती है। चट्टानों के गहरे रंग और पानी के दूधिया सफेद रंग का विरोधाभास यहाँ के दृश्य को जीवंत बना देता है।
माता सीता का वनवास और वो रहस्यमयी गुफाएँ - इस यात्रा का सबसे भावुक कर देने वाला पक्ष इसका धार्मिक महत्व है। रामायण की कथाओं के अनुसार, जब लंकापति रावण ने माता सीता का अपहरण किया था, तब उन्हें कुछ समय के लिए इसी जलप्रपात के पीछे स्थित गुफाओं में छिपाकर रखा गया था। आज इन गुफाओं को 'रावण एला गुफा' कहा जाता है।।एक यात्री के तौर पर जब आप उस झरने की गिरती धार को देखते हैं, तो मन स्वतः ही उस कालखंड की कल्पना करने लगता है। लोकश्रुति है कि माता सीता ने इसी झरने के शीतल जल से बने प्राकृतिक कुंडों में स्नान किया था। उस समय यह पूरा क्षेत्र अभेद्य जंगलों से घिरा हुआ था। आज भी यह स्थान 'रावण एला वन्यजीव अभ्यारण्य' का हिस्सा है, जो इसकी प्राचीनता और प्राकृतिक शुद्धता को संरक्षित रखता है। श्रीलंका की मिट्टी में रामायण के जीवंत साक्ष्य -  हमारी यात्रा केवल झरने तक सीमित नहीं थी, हमने उन साक्ष्यों को भी करीब से देखा जो रामायण को एक ऐतिहासिक सत्य के रूप में स्थापित करते हैं:।हनुमान जी के पदचिह्न: सीता एलिया (सीता अम्मन टेंपल ) के पास नदी के किनारे चट्टानों पर विशाल पैरों के निशान बने हुए हैं। स्थानीय लोगों का अटूट विश्वास है कि ये निशान पवनपुत्र हनुमान के हैं। अशोक वाटिका (हकगला): यहाँ की मिट्टी का रंग आज भी आसपास की भूमि से भिन्न है। माना जाता है कि लंका दहन की अग्नि से यहाँ की मिट्टी काली पड़ गई थी। दिव्यारुमपोला स्थान जहाँ माता सीता ने अग्नि परीक्षा दी थी। आज भी यहाँ लोग सत्य की शपथ लेने आते है दक्षिण तट पर स्थित 'रुमासाला' पहाड़ी पर हिमालयी वनस्पतियों का मिलना आज भी वैज्ञानिकों के लिए एक सुखद आश्चर्य है। श्रीलंका में रावण को केवल एक योद्धा ही नहीं, बल्कि एक प्रकांड विद्वान और शिव भक्त के रूप में देखा जाता है। हमारी यात्रा के दौरान हमने उन प्राचीन मंदिरों के महत्व को भी समझा जिनका सीधा संबंध रावण की भक्ति से है । कोनेश्वरम मंदिर (त्रिंकोमाली): इसे 'दक्षिण का कैलाश' कहा जाता है। रावण ने अपनी कठिन तपस्या से यहीं भगवान शिव को प्रसन्न किया था। यहाँ चट्टानों पर बने 'रावण वेत' (खाई) के निशान आज भी रावण की असीम शक्ति की याद दिलाते हैं।
मुन्नेश्वरम मंदिर: यहाँ भगवान राम ने रावण वध के बाद ब्रह्महत्या के दोष से मुक्ति पाने के लिए शिव की आराधना की थी। शिव तांडव स्तोत्र: जब एला की वादियों में हवाएँ चलती हैं, तो ऐसा आभास होता है मानो रावण द्वारा रचित शिव तांडव स्तोत्र की गूँज आज भी यहाँ की पहाड़ियों में रची-बसी है। रावण जलप्रपात केवल देखने की वस्तु नहीं है, बल्कि यह अनुभव करने की जगह है। यहाँ पहुँचकर आप स्वयं को प्रकृति के बहुत करीब पाते हैं। यदि आप साहसी हैं, तो आप यहाँ की विशाल चट्टानों पर चढ़कर झरने के ऊपरी हिस्सों तक जा सकते हैं। पत्थरों पर जमी काई और उन पर गिरती पानी की बूंदें एक अद्भुत फिसलन पैदा करती हैं, जो रोमांच को दोगुना कर देती हैं। झरने के नीचे बने तालाबों में स्नान करना पर्यटकों का सबसे प्रिय काम है। हमने देखा कि विश्व भर से आए पर्यटक वहाँ के शीतल जल में अठखेलियाँ कर रहे थे। हालांकि, चट्टानें फिसलन भरी हैं, इसलिए सावधानी बरतना अनिवार्य है।
इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण आयाम पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी की सहभागिता रही। अकादमी के सदस्यों के साथ चर्चा करते हुए यह बात स्पष्ट हुई कि कैसे भाषा और संस्कृति भौगोलिक सीमाओं को लांघ जाती हैं। रावण जलप्रपात के किनारे बैठकर हिंदी के विद्वानों और साहित्य प्रेमियों के बीच रामायण के प्रसंगों पर चर्चा करना, भारत और श्रीलंका के बीच के सांस्कृतिक सेतु को और मजबूत कर रहा था। यह केवल एक पर्यटन नहीं, बल्कि एक 'सांस्कृतिक अन्वेषण' था। एला रेलवे स्टेशन से यह मात्र 6 किलोमीटर की दूरी पर है। टुक-टुक या टैक्सी आसानी से उपलब्ध है । सुबह 8 से 11 बजे का समय सबसे अच्छा है जब सूरज की रोशनी सीधे जलप्रपात पर पड़ती है । चट्टानें अत्यंत फिसलन भरी हैं, विशेषकर बारिश के बाद।: स्मृतियों की पोटली में एक अनमोल रत्न है।
जब हम शाम को एला की ओर वापस लौट रहे थे, तो रावण जलप्रपात की वह गर्जना बहुत देर तक हमारे कानों में गूंजती रही। वह केवल पानी के गिरने की आवाज नहीं थी, बल्कि वह उन हजारों वर्षों की गवाह थी जो इस धरती ने देखे हैं। रावण जलप्रपात की सुंदरता उसकी ऊँचाई में नहीं, बल्कि उसके साथ जुड़ी उन भावनाओं में है जो हर भारतीय और श्रीलंकाई के मन में रची-बसी हैं। 10 जनवरी 2026 की यह यात्रा हमें याद दिलाती है कि प्रकृति और इतिहास एक-दूसरे के पूरक हैं। पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी के इस परिभ्रमण ने हमें न केवल श्रीलंका की सुंदरता से रूबरू कराया, बल्कि हमें अपनी साझा जड़ों और प्राचीन गौरव से भी फिर से जोड़ दी है।

अशोक वाटिका और श्रीलंका

अशोक वाटिका की पदयात्रा: साहित्य, श्रद्धा और स्मृतियों का संगम
समय का चक्र जब अपनी धुरी पर घूमता है, तो कई बार ऐसे संयोग बनाता है जो मनुष्य की कल्पना से परे होते हैं। जनवरी 2026 की शुरुआत मेरे लिए कुछ ऐसी ही रही। पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी, शिलांग द्वारा श्रीलंका में आयोजित 'विश्व हिंदी दिवस' (9 जनवरी - 12 जनवरी 2026) के त्रिदिवसीय सम्मेलन में भाग लेने का निमंत्रण महज एक बौद्धिक यात्रा का बुलावा नहीं था, बल्कि यह मेरे लिए त्रेतायुग के उन पन्नों को पलटने का अवसर था, जिन्हें हमने अब तक केवल रामचरितमानस की चौपाइयों में पढ़ा था। सम्मेलन के बीच से समय निकालकर, 10 जनवरी 2026 का दिन मैंने उस स्थान के लिए सुरक्षित किया, जिसका नाम सुनते ही हर भारतीय का मस्तक श्रद्धा से झुक जाता है—नुवारा एलिया की अशोक वाटिका।
नुवारा एलिया का जादुई सफर में कोलंबो की हलचल से दूर, जब हमारी गाड़ी पहाड़ियों की घुमावदार सड़कों पर चढ़ने लगी, तो मौसम का मिजाज बदलने लगा। श्रीलंका का यह हिस्सा 'लिटिल इंग्लैंड' के नाम से भी जाना जाता है, लेकिन मेरे लिए यह 'सीता एलिया' की खोज थी। ऊँचे चाय के बागान, कोहरे की चादर और ठंडी हवाओं के बीच सफर करते हुए हम उस पड़ाव पर पहुँचे, जहाँ सीता नदी का कल-कल नाद सुनाई देने लगा। सीता अम्मन मंदिर: जहाँ पत्थरों में भी भक्ति है । नुवारा एलिया से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित 'सीता अम्मन मंदिर' ही वह केंद्र है, जिसे प्राचीन अशोक वाटिका माना जाता है। यहाँ पहुँचते ही वातावरण में एक अजीब सी शांति और पवित्रता का अनुभव हुआ। मंदिर की वास्तुकला दक्षिण भारतीय शैली की है, लेकिन इसकी आत्मा रामायण कालीन है। मंदिर के ठीक बगल में बहती सीता नदी (जिसे सीता एलिया नदी भी कहा जाता है) के किनारे खड़े होकर जब मैंने उस जल को स्पर्श किया, तो लगा जैसे समय सदियों पीछे चला गया है। मान्यता है कि रावण द्वारा अपहृत होने के बाद माता सीता ने इसी नदी के जल से अपनी दैनिक क्रियाएँ की थीं और इसी के तट पर बैठकर प्रभु राम की प्रतीक्षा में अनगिनत आंसू बहाए थे। हनुमान जी के पदचिह्न: साक्षात प्रमाण की  यात्रा का सबसे विस्मयकारी और रोमांचक हिस्सा था—बजरंगबली के विशाल पदचिह्नों का दर्शन। सीता नदी के चट्टानी किनारों पर कुछ ऐसे निशान मौजूद हैं, जो मानवीय आकार से कई गुना बड़े हैं। स्थानीय श्रद्धालुओं और ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, ये वही पदचिह्न हैं जो हनुमान जी ने लंका में उतरते समय छोड़े थे। इन विशाल निशानों को देखना एक ऐसा अनुभव था जिसे शब्दों में बांधना कठिन है। यह केवल पत्थर पर उकेरी गई आकृति नहीं थी, बल्कि यह उस अटूट विश्वास का प्रतीक था कि संकटमोचन ने इसी स्थान पर आकर माता जानकी को सांत्वना दी होगी और उन्हें प्रभु राम की मुद्रिका सौंपी होगी। उन निशानों को स्पर्श करते समय ऐसा लगा मानो इतिहास अपनी गवाही खुद दे रहा है। अशोक वाटिका और लंका दहन की राख का गाइड और स्थानीय निवासियों से बातचीत के दौरान एक और दिलचस्प तथ्य सामने आया। वाटिका के आसपास की मिट्टी का रंग सामान्य भूरा न होकर गहरा काला है। लोक मान्यता है कि जब हनुमान जी ने अपनी पूंछ से स्वर्ण लंका को जलाया था, तो उस आग से जो राख बनी, उसने यहाँ की मिट्टी को हमेशा के लिए काला कर दिया। आधुनिक विज्ञान इसे भूगर्भीय परिवर्तन कह सकता है, लेकिन एक भक्त की दृष्टि में यह उस 'धर्मी' की विजय का प्रतीक है जिसने अन्याय के गढ़ को भस्म कर दिया था। त्रिजटा मंदिर और मानवीय संवेदना का मुख्य मंदिर के समीप ही त्रिजटा को समर्पित एक छोटा सा स्थान है। रामायण की कथा में त्रिजटा वह राक्षसी थी जिसने राक्षसों के बीच रहकर भी माता सीता की सुरक्षा की और उन्हें मानसिक संबल दिया। इस मंदिर की उपस्थिति यह दर्शाती है कि शत्रु के खेमे में भी यदि कोई धर्म का साथ देता है, तो इतिहास उसे कभी नहीं भूलता। यहाँ दर्शन करना मानवीय संवेदनाओं के प्रति सम्मान जैसा था।।साहित्यिक संगम और विश्व हिंदी दिवस की गूँज यात्रा का एक पहलू 'पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी' का वह सम्मेलन भी था, जिसने हमें यहाँ तक पहुँचाया। विश्व हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में जब श्रीलंका की धरती पर हिंदी के विद्वानों ने भाषा और संस्कृति पर चर्चा की, तो लगा कि राम और सीता की यह कथा केवल भारत की नहीं, बल्कि वैश्विक चेतना का हिस्सा है। हिंदी भाषा ने कैसे देशों की सीमाओं को तोड़कर हमें एक सांस्कृतिक सूत्र में पिरो रखा है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण इस यात्रा में मिला।
अमर स्मृति 10 जनवरी की वह शाम जब मैं नुवारा एलिया से वापस लौट रहा था, तो मेरे पास केवल तस्वीरें नहीं थीं, बल्कि एक गहरा अनुभव था। मैंने देखा कि कैसे एक स्थान हजारों वर्षों के बाद भी अपनी पवित्रता को संजोए हुए है। सीता नदी की लहरें, हनुमान जी के वे पदचिह्न और अशोक वाटिका के वे वृक्ष—सब मिलकर एक ही गाथा गा रहे थे—धैर्य, भक्ति और धर्म की जीत की गाथा। यह यात्रा मेरे जीवन की सबसे महत्वपूर्ण यात्राओं में से एक रहेगी, जहाँ मैंने अपनी साहित्यिक यात्रा को अपनी आध्यात्मिक जड़ों से जुड़ते हुए देखा।

मंजुली द्वीप और संस्कृति

माजुली की आध्यात्मिक और शिल्प विरासत
 यह आलेख ब्रह्मपुत्र नदी में स्थित विश्व के सबसे बड़े नदी द्वीप माजुली की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और शिल्प परंपराओं को विस्तार से प्रस्तुत करता है। नव-वैष्णव आंदोलन, सत्र संस्कृति, मुखौटा कला, टेराकोटा शिल्प और प्राकृतिक जैव विविधता के साथ-साथ, इसमें माजुली के सामने खड़े भू-कटाव के गंभीर संकट को भी रेखांकित किया गया है। नव-वैष्णव परंपरा का जीवंत केंद्र माजुली , सत्र संस्कृति और एकशरण नामधर्म की धरोहर , मुखौटा कला और रास लीला की अनूठी पहचान , भू-कटाव के साए में सांस्कृतिक अस्तित्व का संघर्ष है। 
महाबाहु की गोद में एक सांस्कृतिक रत्न असम के हृदय स्थल में, जहाँ ब्रह्मपुत्र की विशाल धाराएँ अपनी प्रचंडता और उदारता के साथ बहती हैं, वहाँ दुनिया का सबसे बड़ा नदी द्वीप ‘माजुली’ स्थित है। यह केवल भूमि का एक टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह असमिया सभ्यता, आध्यात्मिकता और कला का वह केंद्र है, जिसने सदियों से अपनी मौलिकता को संजोकर रखा है। 2016 में भारत का पहला द्वीप जिला बनने का गौरव प्राप्त करने वाला माजुली, आज अपनी भौगोलिक विशिष्टता और नव-वैष्णव संस्कृति के कारण वैश्विक मानचित्र पर चमक रहा है। नव-वैष्णववाद का उद्गम और ‘एकशरण नामधर्म’ माजुली की पहचान को समझने के लिए 15वीं-16वीं शताब्दी के महान संत, समाज सुधारक और कला मनीषी श्रीमंत शंकरदेव के योगदान को समझना अनिवार्य है। उन्होंने असम की धरती पर ‘एकशरण नामधर्म’ की नींव रखी। उस काल में, जब समाज जटिल कर्मकांडों में उलझा था, शंकरदेव ने सामूहिक कीर्तन और समर्पण के माध्यम से भगवान कृष्ण की भक्ति का एक सरल मार्ग दिखाया। माजुली इस आंदोलन का मुख्य केंद्र बना। यहाँ ‘सत्र’ (मठों) की स्थापना की गई, जो केवल धार्मिक स्थान नहीं, बल्कि ज्ञान और कला के विश्वविद्यालय बन गए। शंकरदेव ने बेल का पेड़ लगाकर यहाँ पहले सत्र ‘बेलगुरी’ की स्थापना की थी। आज भी माजुली में 22 प्रमुख सत्र सक्रिय हैं, जो मानवता और शांति का संदेश दे रहे हैं। माजुली के सत्र अपनी विशिष्ट वास्तुकला के लिए जाने जाते हैं। एक आदर्श सत्र परिसर चार मुख्य इकाइयों में विभाजित होता है: बटकोरा: यह सत्र का प्रवेश द्वार है, जो सादगी और स्वागत का प्रतीक है। नामघर (कीर्तन-घर): यह सत्र का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह एक विशाल प्रार्थना कक्ष होता है जहाँ भक्त सामूहिक भजन करते हैं। इसका उपयोग सामुदायिक बैठकों और सांस्कृतिक प्रदर्शनों के लिए भी होता है। मणिकूट: इसे ‘रत्न घर’ भी कहा जाता है, जो सत्र का गर्भगृह होता है जहाँ पवित्र पांडुलिपियाँ या मूर्तियाँ रखी जाती हैं। हाटी नामघर के चारों ओर भक्तों (भक्तों) के निवास के लिए बनी कतारबद्ध झोपड़ियाँ या घर है। सत्रों की व्यवस्था भी अत्यंत अनुशासित होती है। इसके प्रमुख को ‘सत्राधिकार’ कहा जाता है। यहाँ भक्तों के बीच काम का बँवारा होता है—जैसे भागवती (शास्त्रों का वाचक), गायन-बायन (गायक और वादक), और खनिकर (कलाकार)। यहाँ दो प्रकार के सत्र होते हैं—’उदासीन सत्र’ जहाँ भक्त ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं और ‘गृहस्थी सत्र’ जहाँ परिवार के साथ रहने की अनुमति होती है। विश्व प्रसिद्ध रास लीला और मुखौटा कला में माजुली का सबसे बड़ा आकर्षण यहाँ की कृष्ण रास लीला है। पूरे भारत में माजुली ही वह स्थान है जहाँ रास लीला केवल पेशेवर कलाकारों द्वारा नहीं, बल्कि स्थानीय भक्तों द्वारा एक साधना के रूप में मनाई जाती है। नवंबर के महीने में पूरा द्वीप कृष्णमय हो जाता है। इस रास लीला को जीवंत बनाने में ‘समागुरी सत्र’ की मुखौटा कला का बहुत बड़ा हाथ है। यहाँ के कलाकार बांस, मिट्टी और गोबर का उपयोग करके अद्भुत मुखौटे बनाते हैं। रावण, बकासुर और हनुमान जैसे पात्र इन मुखौटों को पहनकर जब मंच पर आते हैं, तो दर्शक उस पौराणिक काल में पहुँच जाते हैं। यह कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत के रूप में सँभाली जा रही है।
सलमारा की टेराकोटा परंपरा: बिना चाक की मिट्टी कला माजुली की सांस्कृतिक विरासत का एक और अनमोल रत्न सलमारा गाँव है। यहाँ का टेराकोटा शिल्प अपनी तरह का अनोखा है। आमतौर पर कुम्हार चाक का उपयोग करते हैं, लेकिन सलमारा के कलाकार हाथों की निपुणता से मिट्टी को आकार देते हैं। मिट्टी इकट्ठा करने (खानी-दिया) से लेकर उसे पकाने (पेघाली दिया) तक की प्रक्रिया में पूरा परिवार शामिल होता है। महिलाएँ विशेष रूप से बर्तनों को आकार देने में दक्ष होती हैं। ये कलाकार न केवल बर्तन बनाते हैं, बल्कि कुशल नाव निर्माता भी होते हैं। इनके द्वारा बनाए गए मिट्टी के पात्र आज भी असमिया रसोई और सत्रों की शुद्धता का हिस्सा है।
माजुली विभिन्न समुदायों का एक सुंदर गुलदस्ता है। यहाँ मिशिंग, देवरी और सोनोवाल कचारी जैसे आदिवासी समुदाय सदियों से निवास कर रहे हैं। विशेष रूप से मिशिंग समुदाय की महिलाओं द्वारा की जाने वाली बुनाई पूरे भारत में प्रसिद्ध है। उनके द्वारा बनाए गए ‘मिरी जि़म’ और रंगीन कपड़े अपनी सूक्ष्म कलाकारी के लिए जाने जाते हैं। माजुली की आबादी लगभग 1.5 लाख है, जहाँ 144 गाँवों में लोग प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर रहते हैं।प्रकृति प्रेमियों के लिए माजुली किसी जन्नत से कम नहीं है। यहाँ पक्षियों की लगभग 260 प्रजातियां पाई जाती हैं। सर्दियों के मौसम में यहाँ साइबेरिया और अन्य ठंडे प्रदेशों से प्रवासी पक्षी आते हैं। ग्रे पेलिकन, सफेद गर्दन वाले सारस और बड़ी जलमुर्गियों का कलरव द्वीप के शांत वातावरण में संगीत भर देता है। यहाँ की आर्द्रभूमियाँ (बीलें) पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
माजुली की खूबसूरती के बीच एक कड़वा सच यहाँ का निरंतर होने वाला भू-कटाव है। 20वीं शताब्दी के आरंभ में यह द्वीप 1255 वर्ग किलोमीटर का था, जो अब घटकर मात्र 352 वर्ग किलोमीटर रह गया है। ब्रह्मपुत्र की लहरें हर साल इस सांस्कृतिक धरोहर का एक हिस्सा निगल रही हैं। यह न केवल जमीन का नुकसान है, बल्कि उस पर बसी सदियों पुरानी परंपराओं के मिटने का खतरा भी है। माजुली केवल असम की नहीं, बल्कि पूरी मानवता की अमूर्त विरासत (Intangible Heritage) है।
यहाँ का अध्यात्म, यहाँ के सत्र, सलमारा की मिट्टी की खुशबू और मुखौटों के पीछे छिपी कला, यह सब हमें जड़ों की ओर लौटने का संदेश देते हैं। माजुली की यात्रा केवल एक पर्यटन नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि का एक अनुभव है। हमें इस द्वीप को न केवल भौगोलिक रूप से बचाने की आवश्यकता है, बल्कि इसकी सांस्कृतिक लौ को भी प्रज्वलित रखना होगा। माजुली पहुँचने के लिए सबसे नज़दीकी शहर जोरहाट है। जोरहाट के निमातीघाट से प्रतिदिन फेरी (नाव) सेवाएँ उपलब्ध हैं, जो ब्रह्मपुत्र के विशाल पाट को पार कर आपको इस आध्यात्मिक द्वीप तक पहुँचाती हैं।
यह आलेख ब्रह्मपुत्र नदी में स्थित विश्व के सबसे बड़े नदी द्वीप माजुली की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और शिल्प परंपराओं को विस्तार से प्रस्तुत करता है। नव-वैष्णव आंदोलन, सत्र संस्कृति, मुखौटा कला, टेराकोटा शिल्प और प्राकृतिक जैव विविधता के साथ-साथ, इसमें माजुली के सामने खड़े भू-कटाव के गंभीर संकट को भी रेखांकित किया गया है।

शुक्रवार, जनवरी 02, 2026

जल , जंगल और जमीन

जल, जंगल, जमीन: मानवता की संस्कृति
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
'जल, जंगल और जमीन'—ये तीन शब्द मात्र भौतिक संसाधन नहीं हैं, बल्कि ये उस त्रिकोण का निर्माण करते हैं जिसके भीतर पृथ्वी का समस्त जीवन स्पंदित होता है। यदि ब्रह्मांड में पृथ्वी को 'नीला ग्रह' कहा जाता है, तो इसका श्रेय इन्हीं तत्वों को जाता है। मानव सभ्यता के इतिहास पर दृष्टि डालें तो स्पष्ट होता है कि हमारी प्रगति की कहानी इन्हीं तीन तत्वों के इर्द-गिर्द बुनी गई है। लेकिन आज, जब हम 21वीं सदी के तीसरे दशक में खड़े हैं, यह आधार स्तंभ डगमगा रहा है। महान आदिवासी नायक बिरसा मुंडा ने जिस "जल, जंगल, जमीन" के हक की लड़ाई शुरू की थी, वह आज केवल आदिवासियों की नहीं, बल्कि पूरी मानवता के अस्तित्व की लड़ाई बन चुकी है।
 सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक जुड़ाव में भारतीय मानस में प्रकृति को कभी भी 'उपभोग की वस्तु' नहीं माना गया। हमारी संस्कृति में नदियों को 'माँ' का दर्जा दिया गया है—गंगा, यमुना, नर्मदा केवल जलधाराएं नहीं, बल्कि मोक्षदायिनी और जीवनदायिनी शक्तियां हैं। वनों को 'तपोवन' कहा गया, जहाँ ऋषियों ने ज्ञान प्राप्त किया।
आदिवासी समाज के लिए तो जंगल उनका देवालय है। उनके लोकगीतों की लय और नृत्यों की थाप में पत्तों की सरसराहट और बारिश की बूंदों का संगीत घुला होता है। उनके लिए जमीन का एक टुकड़ा केवल संपत्ति नहीं, बल्कि उनके पूर्वजों की स्मृति और उनकी पहचान (Identity) है। 'पत्थलगड़ी' जैसे आंदोलन इसी सांस्कृतिक स्वायत्तता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का उद्घोष हैं। यह हमें याद दिलाता है कि जब तक जमीन सुरक्षित है, तब तक संस्कृति जीवित है।
 पृथ्वी के फेफड़े और रक्त का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो 'जल, जंगल और जमीन' एक अटूट चक्र (Cycle) में बंधे हैं: जंगल (पृथ्वी के फेफड़े): वन न केवल कार्बन सोखते हैं और ऑक्सीजन प्रदान करते हैं, बल्कि वे वर्षा चक्र को नियंत्रित करते हैं। वनों का विनाश सीधे तौर पर ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन को निमंत्रण देता है।
जल (जीवन का अमृत): बिना जल के न कृषि संभव है, न उद्योग और न ही जीवन। नदियों का सूखना या उनका प्रदूषित होना एक मृतप्राय सभ्यता की ओर इशारा करता है। जमीन (अन्नपूर्णा): मिट्टी केवल धूल नहीं है; यह वह उपजाऊ आधार है जो अरबों जीव-जंतुओं और वनस्पतियों को आश्रय देती है। रसायनों के अत्यधिक प्रयोग और खनन ने इस आधार को खोखला कर दिया है।. विकास की अंधी दौड़ और विनाश के संकेत की पूंजीवादी विचारधारा ने प्रकृति को 'बाजार' बना दिया है। 'विकास' केनाम पर जो नीतियां बनाई जा रही हैं, उनमें अक्सर पारिस्थितिक संतुलन  की अनदेखी की जाती है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के पहाड़ों में हाल के वर्षों में आई आपदाएं—चाहे वह भूस्खलन हो या अचानक आई बाढ़—प्रकृति की इसी चेतावनी का परिणाम हैं।
जब हम जंगलों को काटकर कंक्रीट के जंगल खड़ा करते हैं या पहाड़ों का सीना चीरकर अनियंत्रित खनन करते हैं, तो हम केवल जमीन नहीं खोते, बल्कि उस सुरक्षा कवच को नष्ट कर देते हैं जो सदियों से हमें आपदाओं से बचाता आया है। विडंबना यह है कि 'वन अधिकार अधिनियम' जैसे कानून कागजों पर तो सशक्त दिखते हैं, लेकिन धरातल पर स्थानीय समुदायों और आदिवासियों को उनकी अपनी ही जड़ों से बेदखल करने की साजिशें जारी हैं।
 संरक्षण का एकमात्र मार्ग विश्व आदिवासी दिवस (9 अगस्त) जैसे अवसर हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि आधुनिक समाज ने प्रगति के नाम पर क्या खोया है। आदिवासी समुदाय का यह नारा—"जल, जंगल, जमीन हमारा है"—स्वामित्व का अहंकार नहीं, बल्कि संरक्षण की जिम्मेदारी का बोध है। वे प्रकृति के स्वामी नहीं, बल्कि उसके 'ट्रस्टी' बनकर रहते हैं।
आदिवासी दर्शन हमें सिखाता है कि प्रकृति से उतना ही लो जितना जीवन के लिए आवश्यक है। यदि हमने उनके इस संघर्ष और मूल्यों को नहीं अपनाया, तो आने वाली पीढ़ियां एक ऐसे मरुस्थल में पैदा होंगी जहाँ धन तो होगा, लेकिन पीने को स्वच्छ पानी और सांस लेने को शुद्ध हवा नहीं होगी। यदि हमें मानवता को बचाना है, तो हमें अपने दृष्टिकोण में आमूलचूल परिवर्तन करना होगा । : विकास ऐसा हो जो भविष्य की पीढ़ियों की जरूरतों से समझौता न करे। स्थानीय समुदायों की भागीदारी: नीति निर्धारण में उन लोगों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए जो जमीन से जुड़े हैं।
केवल वृक्षारोपण नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को फिर से जीवित करने की आवश्यकता है। 'जल, जंगल और जमीन' का संरक्षण कोई दान या उपकार नहीं है, बल्कि यह हमारे स्वयं के अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है। बिरसा मुंडा का संघर्ष हमें याद दिलाता है कि जब सत्ता और स्वार्थ प्रकृति को निगलने का प्रयास करें, तब प्रतिरोध ही एकमात्र विकल्प रह जाता है। प्रकृति का विनाश वास्तव में मनुष्य का आत्मघाती कदम है। हमें यह समझना होगा कि हम प्रकृति के मालिक नहीं, उसका एक छोटा सा हिस्सा हैं। यदि हम जल को शुद्ध, जंगल को हरा और जमीन को उर्वर बनाए रखने में सफल रहे, तभी हमारी संस्कृति और सभ्यता का अस्तित्व बचा रहेगा। आने वाला कल इस बात पर निर्भर करेगा कि आज हम इन तीन स्तंभों का कितना सम्मान करते हैं।

करपी , अरवल , बिहार 804419
9472987491

गुरुवार, जनवरी 01, 2026

स्वर्ण लंका से आधुनिक राष्ट्र तक

श्रीलंका: स्वर्ण लंका से आधुनिक राष्ट्र तक का अद्भुत संगम 
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
हिन्द  महासागर का एक चमकता पन्ना हिंद महासागर के शांत नीले जल में एक नीलम की  चमकता यह छोटा सा द्वीप राष्ट्र 'श्रीलंका' केवल एक देश नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के विकास, पौराणिक गाथाओं और प्राकृतिक सुंदरता का एक जीवंत संग्रहालय है। भारत के दक्षिणी छोर से मात्र 31 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह देश सदियों से व्यापारियों, नाविकों और आध्यात्मिक साधकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। संस्कृत में 'श्री' का अर्थ है लक्ष्मी व आदरणीय और 'लंका' का अर्थ है द्वीप। यह नाम ही इसकी गरिमा और प्राचीनता को बयां करता है।
. पुराणों के अनुसार : देवशिल्पी की रचना और कुबेर का वैभव श्रीलंका का इतिहास केवल कागज के पन्नों पर नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की रग-रग में बसे 'युगों' की कथाओं में मिलता है।
सतयुग और रत्नद्वीप: संहिताओं और स्मृति ग्रंथों  के अनुसार  रत्नद्वीप का निर्माण स्वयं देव-शिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने किया था। भगवान शिव और माता पार्वती के निवास के लिए बनाई गई यह नगरी पूरी तरह सोने की थी। ऋषि विश्रवा ने अपनी चतुराई से इसे शिवजी से दान में मांग लिया और बाद में उनके पुत्र कुबेर यहाँ के पहले राजा बने। उस समय इसे 'रत्नद्वीप' कहा जाता था, जहाँ देवताओं जैसा ऐश्वर्य और सुख-सुविधाएं विद्यमान थीं।
त्रेतायुग में रावण का शासन और विज्ञान का शिखर श्रीलंका के इतिहास का सबसे चर्चित और प्रभावशाली काल त्रेतायुग है। कुबेर के सौतेले भाई कैकसी पुत्र रावण ने अपनी कठोर तपस्या के बल पर ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया और कुबेर को विस्थापित कर लंका का अधिपति बन बैठा।
रावण को केवल एक योद्धा के रूप में देखना उसके व्यक्तित्व के साथ अन्याय होगा। वह अपने समय का सबसे बड़ा वैज्ञानिक और विद्वान था। दशानन का रहस्य: उसे 'दशानन' (दस सिर वाला) इसलिए कहा जाता था क्योंकि उसे चारों वेदों और छह शास्त्रों का पूर्ण ज्ञान था। विमान शास्त्र: रावण के पास 'पुष्पक विमान' था। आधुनिक शोधकर्ता इसे 'एयरोडायनामिक्स' का प्राचीन प्रमाण मानते हैं। श्रीलंका के 'वारियापोला' और 'गुरुलोपोथा' जैसे स्थानों को आज भी रावण के विमानों के लैंडिंग पैड के रूप में जाना जाता है। आयुर्वेद और खगोल विज्ञान: उसने 'अर्क प्रकाश' नामक पुस्तक लिखी, जिसमें 'डिस्टिलेशन' की प्रक्रिया का वर्णन है। उसकी 'रावण संहिता' आज भी ज्योतिष शास्त्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ  है। श्रीलंका के माताले जिले में स्थित 'सिगिरिया' की चट्टान प्राचीन इंजीनियरिंग का एक ऐसा चमत्कार है, जिसे अक्सर रावण के काल से जोड़कर देखा जाता है। शिखर पर नगर नियोजन: 600 फीट ऊंची खड़ी चट्टान के ऊपर एक पूरा शहर बसाया गया था। इतने भारी पत्थरों को उस ऊंचाई तक ले जाना आज भी इंजीनियरों के लिए शोध का विषय है। हाइड्रोलिक सिस्टम: यहाँ के बगीचों में ऐसे फव्वारे हैं, जो बिना किसी बिजली या मोटर के, केवल गुरुत्वाकर्षण और जल-दबाव (Pressure) के सिद्धांत पर चलते हैं। दर्पण दीवार को इतना पॉलिश किया गया था कि राजा इसमें अपना प्रतिबिंब देख सकता था। सदियों बाद भी इसकी चमक बरकरार है । आस्था की गवाही देते स्थान आज भी श्रीलंका में कई ऐसे स्थान हैं जो रामायण की घटनाओं को जीवंत करते हैं: अशोक वाटिका (सीता एलिया): यहाँ के सीता अम्मन मंदिर के पास चट्टानों पर विशाल पैरों के निशान मिलते हैं, जिन्हें हनुमान जी का माना जाता है। एला स्थान 'रावण गुफा' और 'रावण जलप्रपात' के लिए प्रसिद्ध है। माना जाता है कि यहाँ सुरंगों का एक जटिल जाल है। रामसेतु: नासाकी सैटेलाइट तस्वीरों में मन्नार की खाड़ी में दिखने वाली चट्टानें आज भी उस महान वानर सेना के पुरुषार्थ की याद दिलाता है। द्वापर युग के बाद, कलियुग के प्रारंभ में श्रीलंका ने एक नया मोड़ लिया। राजकुमार विजय (543 ईसा पूर्व): उत्तर भारत के राजकुमार विजय ने यहाँ 'सिंहल वंश' की स्थापना की।सम्राट अशोक का प्रभाव: राजा देवानम्पिया तिस्सा के काल में सम्राट अशोक के पुत्र महिंदा और पुत्री संघमित्रा यहाँ बौद्ध धर्म और पवित्र 'बोधि वृक्ष' की शाखा लेकर आए। इसके बाद श्रीलंका बौद्ध संस्कृति और शिक्षा का विश्व केंद्र बन गया। अनुराधापुरा और पोलोन्नारुवा: ये प्राचीन राजधानियां अपनी विशाल मूर्तिकला और जलाशयों के लिए जानी जाती हैं। कैंडी (Kandy) श्रीलंका का अंतिम स्वतंत्र राज्य थाश्रीलंका को 'पूर्व का मोती' उसकी बेमिसाल खूबसूरती के कारण कहा जाता है। सीलोन टी: नुवारा एलिया की धुंध भरी पहाड़ियाँ दुनिया की बेहतरीन चाय का उत्पादन करती हैं।  याला नेशनल पार्क में तेंदुओं की दहाड़ है, तो मिरिसा के नीले तटों पर व्हेल मछलियों का नृत्य। यहाँ के मसाले, विशेषकर दालचीनी, सदियों से वैश्विक व्यापार का आधार रहे हैं। आधुनिक श्रीलंका: संघर्ष और पुनर्निर्माण 1948 में ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता मिलने के बाद श्रीलंका ने शिक्षा और स्वास्थ्य में दक्षिण एशिया में बेहतरीन प्रदर्शन किया। हालांकि, 26 साल तक चले गृहयुद्ध (2009 में समाप्त) ने देश की अर्थव्यवस्था को गहरी चोट पहुँचाई।
वर्तमान में, श्रीलंका अपनी आर्थिक चुनौतियों से जूझते हुए अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौट रहा है। राजधानी श्री जयवर्धनेपुरा कोट्टे और वित्तीय केंद्र कोलंबो आधुनिक गगनचुंबी इमारतों और औपनिवेशिक वास्तुकला का मिश है ।श्रीलंका केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं है, यह एक 'अनुभूति' है। इसकी हवा में मसालों की खुशबू है, मंदिरों में बुद्ध की शांति है, और पहाड़ियों में रामायण की गूँज है। रावण की वैज्ञानिक दृष्टि और सिगिरिया की वास्तुकला यह सिद्ध करती है कि प्राचीन काल में यह द्वीप ज्ञान और तकनीक का वैश्विक केंद्र था।
स्वर्ण लंका की वह चमक आज भी इसके खंडहरों, इसकी संस्कृति और इसके लोगों की चिर-परिचित मुस्कान में सुरक्षित है। चाहे आप इतिहास प्रेमी हों या आध्यात्मिक खोजी, श्रीलंका का हर कोना आपसे कुछ कहता है—एक गौरवशाली अतीत और एक संघर्षशील लेकिन उज्ज्वल भविष्य की कहान