मंगलवार, फ़रवरी 24, 2026

हिंदी और नेपाली साहित्य में प्रेम और सद्भावना

हिंदी और नेपाली साहित्य में प्रेम एवं सद्भावना
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
भारत और नेपाल के संबंध केवल दो राजनीतिक सीमाओं के मिलन बिंदु नहीं हैं, बल्कि यह दो ऐसी संस्कृतियों का संगम है जिनका हृदय एक ही लय में धड़कता है। हिमालय की कंदराओं से निकलने वाली नदियाँ जिस प्रकार भारत के मैदानों को सींचती हैं, उसी प्रकार इन दोनों देशों का साहित्य 'प्रेम' और 'सद्भावना' के जल से एक-दूसरे की वैचारिक भूमि को उर्वर बनाता रहा है। हिंदी और नेपाली साहित्य में निहित भक्ति, करुणा और भातृत्व वह अदृश्य धागा है, जो पशुपतिनाथ को काशी विश्वनाथ से और लुंबिनी को बोधगया से जोड़ता है।
. भक्ति साहित्य: प्रेम का आध्यात्मिक शिखर हिंदी और नेपाली दोनों ही साहित्यों का स्वर्ण युग 'भक्ति काल' रहा है। यहाँ प्रेम केवल व्यक्तिगत राग नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और चराचर जगत के प्रति 'ममता' (माया) है।
राम काव्य की मर्यादा: जहाँ भारत में गोस्वामी तुलसीदास ने 'रामचरितमानस' के माध्यम से मर्यादा पुरुषोत्तम राम को घर-घर पहुँचाया, वहीं नेपाल में आदिकवि भानुभक्त आचार्य ने 'भानुभक्त रामायण' लिखकर नेपाली जनमानस को एक नई भाषाई और सांस्कृतिक पहचान दी। दोनों कवियों के लिए राम 'प्रेम और न्याय' के प्रतीक हैं।
कृष्ण प्रेम की माधुरी: हिंदी में सूरदास और रसखान की कृष्ण भक्ति जिस तन्मयता से मिलती है, नेपाली साहित्य में भी कृष्ण काव्य की वही धारा प्रवाहित हुई है। यहाँ 'प्रेम' ईश्वर की प्राप्ति का एकमात्र साधन माना गया है, जिसमें कोई ऊँच-नीच या सीमा नहीं है। . 'प्रेम' और 'माया': नेपाली संवेदना के दो रंग नेपाली साहित्य में प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए दो शब्दों का प्रयोग अत्यंत सुंदर और अर्थपूर्ण है— 'प्रेम' और 'माया'। प्रेम: यह शब्द अक्सर शास्त्रीय, गंभीर और आध्यात्मिक अनुराग के लिए प्रयुक्त होता है। माया: हिंदी में 'माया' का अर्थ प्रायः भ्रम या संसार की असत्यता से लिया जाता है, किंतु नेपाली साहित्य और लोकजीवन में 'माया' का अर्थ अत्यंत पवित्र है। यहाँ 'माया' का अर्थ है—स्नेह, ममता, दया और लगाव। जब एक नेपाली कवि 'माया' की बात करता है, तो वह उस आत्मीयता को दर्शाता है जो एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से जोड़ती है। यही वह मानवीय संवेदना है जो भारत-नेपाल के साझा रिश्तों का आधार है।
करुणा का बुद्धत्व: मानवतावाद का स्वर नेपाली साहित्य में बुद्ध की करुणा और हिंदी साहित्य में गांधी की अहिंसा का गहरा प्रभाव है। महाकवि लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा (नेपाल) और जयशंकर प्रसाद (भारत) जैसे दिग्गजों ने अपने काव्य में 'मानवता' को ही सबसे बड़ा धर्म माना। देवकोटा की कालजयी रचना 'मुनामदन' प्रेम और विरह की वह महागाथा है, जो जाति और वर्ग की सीमाओं को तोड़कर 'मानवीय हृदय' की श्रेष्ठता सिद्ध करती है। हिंदी में 'कामायनी' जिस प्रकार मानवता के विकास की कथा कहती है, नेपाली काव्य भी उसी प्रकार शांति और विश्व-बंधुत्व का संदेश देता है। 'बुद्ध' दोनों देशों के साझा नायक हैं, जिनके माध्यम से करुणा और सद्भावना के स्वर मुखरित होते हैं। . हिंदी: नेपाल के मधेस और पहाड़ों के बीच का सेतु नेपाल में हिंदी भाषा केवल एक विदेशी भाषा नहीं है, बल्कि यह संपर्क, शिक्षा और संस्कृति की भाषा रही है। मधेस क्षेत्र: नेपाल का तराई क्षेत्र हिंदी, मैथिली और भोजपुरी के माध्यम से भारत से सीधे तौर पर जुड़ा है। यहाँ का साहित्य साझा रोटी-बेटी के संबंधों और सांस्कृतिक एकता का जीवंत दस्तावेज है। देवनागरी लिपि ने दोनों भाषाओं के बीच एक 'भाषिक पुल' का कार्य किया है। नेपाल के आधुनिक गद्य लेखन और शिक्षा के विकास में हिंदी साहित्य के महान रचनाकारों (जैसे प्रेमचंद, निराला और रेणु) का गहरा प्रभाव देखा जा सकता है। साहित्य समाज का दर्पण होता है। जहाँ इतिहास युद्धों और विजयों की बात करता है, वहीं साहित्य उन युद्धों से पीड़ित मानवता के घावों पर 'प्रेम' का मरहम लगाता है। नेपाली साहित्य में गुमानी पंत जैसे कवियों ने राजनीतिक उथल-पुथल के बीच भी प्रेम और सद्भावना को प्रमुखता दी। उन्होंने दिखाया कि विनाश और युद्ध के बजाय जीवन को 'प्रेम' से ही सुंदर बनाया जा सकता है। हिंदी के छायावादी और प्रगतिवादी कवियों की तरह नेपाली कवियों ने भी शोषितों के प्रति 'करुणा' और अत्याचारी के विरुद्ध 'प्रेमपूर्ण प्रतिरोध' का मार्ग चुना। लोक संस्कृति: गीतों में बहती साझा विरासत साहित्य केवल पोथियों में नहीं, बल्कि लोकगीतों में भी जीवित रहता है। नेपाली के 'बारहमासा', 'प्रेमगीत' और 'वीरगीत' हिंदी के लोक साहित्यों (जैसे कजरी, चैती और सोहर) के बहुत करीब हैं। प्रकृति चित्रण में हिमालय का वर्णन दोनों साहित्यों में एक समान गौरव के साथ आता है। पहाड़ की सुंदरता, नदियों का कल-कल और ग्रामीण जीवन की सरलता—ये तत्व दोनों साहित्यों को एक ही धरातल पर लाकर खड़ा कर देते हैं।
आज के दौर में नेपाल में गज़ल विधा का जबरदस्त उभार हुआ है। हिंदी और उर्दू की गज़ल परंपरा ने नेपाली युवाओं को इस कदर प्रभावित किया है कि आज नेपाली में लिखी जा रही गज़लें 'प्रेम और कोमलता' का नया मानक गढ़ रही हैं। समकालीन नेपाली और हिंदी लेखक साझा कार्यशालाओं और साहित्यिक सम्मेलनों के माध्यम से 'भारत-नेपाल भाई-भाई' की भावना को और प्रगाढ़ कर रहे हैं। मन्नू भंडारी की 'यही सच है' जैसी कहानियों में प्रेम की जो सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक परतें हैं, वैसी ही संवेदनशीलता आधुनिक नेपाली कथा-साहित्य में भी दृष्टिगोचर होती है।
हिंदी और नेपाली साहित्य की यह समरूपता केवल शब्दों का मेल नहीं है, बल्कि यह उन साझा मूल्यों का प्रतीक है जिन्हें हमने सदियों से सहेज कर रखा है। 'वसुधैव कुटुंबकम' (विश्व एक परिवार है) की भावना दोनों देशों के साहित्य की आत्मा है। जब तक नेपाल के पहाड़ों में 'माया' के गीत गाए जाते रहेंगे और भारत की गलियों में 'प्रेम' की चर्चा होती रहेगी, तब तक यह सांस्कृतिक सेतु अडिग रहेगा। साहित्य वह प्रकाश है जो नफरत के अंधकार को मिटाकर प्रेम और सद्भावना का मार्ग प्रशस्त करता है। भारत और नेपाल का साहित्यिक संबंध इसी स्थायी प्रेम और अटूट भाईचारे का घोषणापत्र है। "साहित्य समाज का वह दर्पण है, जिसमें दो देश अपनी सीमाओं को भूलकर एक-दूसरे के हृदय की धड़कन सुन सकते हैं।

हिंदी और नेपाली साहित्य में प्रेम और सद्भावना

हिंदी और नेपाली साहित्य में प्रेम एवं सद्भावना
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
भारत और नेपाल के संबंध केवल दो राजनीतिक सीमाओं के मिलन बिंदु नहीं हैं, बल्कि यह दो ऐसी संस्कृतियों का संगम है जिनका हृदय एक ही लय में धड़कता है। हिमालय की कंदराओं से निकलने वाली नदियाँ जिस प्रकार भारत के मैदानों को सींचती हैं, उसी प्रकार इन दोनों देशों का साहित्य 'प्रेम' और 'सद्भावना' के जल से एक-दूसरे की वैचारिक भूमि को उर्वर बनाता रहा है। हिंदी और नेपाली साहित्य में निहित भक्ति, करुणा और भातृत्व वह अदृश्य धागा है, जो पशुपतिनाथ को काशी विश्वनाथ से और लुंबिनी को बोधगया से जोड़ता है।
. भक्ति साहित्य: प्रेम का आध्यात्मिक शिखर हिंदी और नेपाली दोनों ही साहित्यों का स्वर्ण युग 'भक्ति काल' रहा है। यहाँ प्रेम केवल व्यक्तिगत राग नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और चराचर जगत के प्रति 'ममता' (माया) है।
राम काव्य की मर्यादा: जहाँ भारत में गोस्वामी तुलसीदास ने 'रामचरितमानस' के माध्यम से मर्यादा पुरुषोत्तम राम को घर-घर पहुँचाया, वहीं नेपाल में आदिकवि भानुभक्त आचार्य ने 'भानुभक्त रामायण' लिखकर नेपाली जनमानस को एक नई भाषाई और सांस्कृतिक पहचान दी। दोनों कवियों के लिए राम 'प्रेम और न्याय' के प्रतीक हैं।
कृष्ण प्रेम की माधुरी: हिंदी में सूरदास और रसखान की कृष्ण भक्ति जिस तन्मयता से मिलती है, नेपाली साहित्य में भी कृष्ण काव्य की वही धारा प्रवाहित हुई है। यहाँ 'प्रेम' ईश्वर की प्राप्ति का एकमात्र साधन माना गया है, जिसमें कोई ऊँच-नीच या सीमा नहीं है। . 'प्रेम' और 'माया': नेपाली संवेदना के दो रंग नेपाली साहित्य में प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए दो शब्दों का प्रयोग अत्यंत सुंदर और अर्थपूर्ण है— 'प्रेम' और 'माया'। प्रेम: यह शब्द अक्सर शास्त्रीय, गंभीर और आध्यात्मिक अनुराग के लिए प्रयुक्त होता है। माया: हिंदी में 'माया' का अर्थ प्रायः भ्रम या संसार की असत्यता से लिया जाता है, किंतु नेपाली साहित्य और लोकजीवन में 'माया' का अर्थ अत्यंत पवित्र है। यहाँ 'माया' का अर्थ है—स्नेह, ममता, दया और लगाव। जब एक नेपाली कवि 'माया' की बात करता है, तो वह उस आत्मीयता को दर्शाता है जो एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से जोड़ती है। यही वह मानवीय संवेदना है जो भारत-नेपाल के साझा रिश्तों का आधार है।
करुणा का बुद्धत्व: मानवतावाद का स्वर नेपाली साहित्य में बुद्ध की करुणा और हिंदी साहित्य में गांधी की अहिंसा का गहरा प्रभाव है। महाकवि लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा (नेपाल) और जयशंकर प्रसाद (भारत) जैसे दिग्गजों ने अपने काव्य में 'मानवता' को ही सबसे बड़ा धर्म माना। देवकोटा की कालजयी रचना 'मुनामदन' प्रेम और विरह की वह महागाथा है, जो जाति और वर्ग की सीमाओं को तोड़कर 'मानवीय हृदय' की श्रेष्ठता सिद्ध करती है। हिंदी में 'कामायनी' जिस प्रकार मानवता के विकास की कथा कहती है, नेपाली काव्य भी उसी प्रकार शांति और विश्व-बंधुत्व का संदेश देता है। 'बुद्ध' दोनों देशों के साझा नायक हैं, जिनके माध्यम से करुणा और सद्भावना के स्वर मुखरित होते हैं। . हिंदी: नेपाल के मधेस और पहाड़ों के बीच का सेतु नेपाल में हिंदी भाषा केवल एक विदेशी भाषा नहीं है, बल्कि यह संपर्क, शिक्षा और संस्कृति की भाषा रही है। मधेस क्षेत्र: नेपाल का तराई क्षेत्र हिंदी, मैथिली और भोजपुरी के माध्यम से भारत से सीधे तौर पर जुड़ा है। यहाँ का साहित्य साझा रोटी-बेटी के संबंधों और सांस्कृतिक एकता का जीवंत दस्तावेज है। देवनागरी लिपि ने दोनों भाषाओं के बीच एक 'भाषिक पुल' का कार्य किया है। नेपाल के आधुनिक गद्य लेखन और शिक्षा के विकास में हिंदी साहित्य के महान रचनाकारों (जैसे प्रेमचंद, निराला और रेणु) का गहरा प्रभाव देखा जा सकता है। साहित्य समाज का दर्पण होता है। जहाँ इतिहास युद्धों और विजयों की बात करता है, वहीं साहित्य उन युद्धों से पीड़ित मानवता के घावों पर 'प्रेम' का मरहम लगाता है। नेपाली साहित्य में गुमानी पंत जैसे कवियों ने राजनीतिक उथल-पुथल के बीच भी प्रेम और सद्भावना को प्रमुखता दी। उन्होंने दिखाया कि विनाश और युद्ध के बजाय जीवन को 'प्रेम' से ही सुंदर बनाया जा सकता है। हिंदी के छायावादी और प्रगतिवादी कवियों की तरह नेपाली कवियों ने भी शोषितों के प्रति 'करुणा' और अत्याचारी के विरुद्ध 'प्रेमपूर्ण प्रतिरोध' का मार्ग चुना। लोक संस्कृति: गीतों में बहती साझा विरासत साहित्य केवल पोथियों में नहीं, बल्कि लोकगीतों में भी जीवित रहता है। नेपाली के 'बारहमासा', 'प्रेमगीत' और 'वीरगीत' हिंदी के लोक साहित्यों (जैसे कजरी, चैती और सोहर) के बहुत करीब हैं। प्रकृति चित्रण में हिमालय का वर्णन दोनों साहित्यों में एक समान गौरव के साथ आता है। पहाड़ की सुंदरता, नदियों का कल-कल और ग्रामीण जीवन की सरलता—ये तत्व दोनों साहित्यों को एक ही धरातल पर लाकर खड़ा कर देते हैं।
आज के दौर में नेपाल में गज़ल विधा का जबरदस्त उभार हुआ है। हिंदी और उर्दू की गज़ल परंपरा ने नेपाली युवाओं को इस कदर प्रभावित किया है कि आज नेपाली में लिखी जा रही गज़लें 'प्रेम और कोमलता' का नया मानक गढ़ रही हैं। समकालीन नेपाली और हिंदी लेखक साझा कार्यशालाओं और साहित्यिक सम्मेलनों के माध्यम से 'भारत-नेपाल भाई-भाई' की भावना को और प्रगाढ़ कर रहे हैं। मन्नू भंडारी की 'यही सच है' जैसी कहानियों में प्रेम की जो सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक परतें हैं, वैसी ही संवेदनशीलता आधुनिक नेपाली कथा-साहित्य में भी दृष्टिगोचर होती है।
हिंदी और नेपाली साहित्य की यह समरूपता केवल शब्दों का मेल नहीं है, बल्कि यह उन साझा मूल्यों का प्रतीक है जिन्हें हमने सदियों से सहेज कर रखा है। 'वसुधैव कुटुंबकम' (विश्व एक परिवार है) की भावना दोनों देशों के साहित्य की आत्मा है। जब तक नेपाल के पहाड़ों में 'माया' के गीत गाए जाते रहेंगे और भारत की गलियों में 'प्रेम' की चर्चा होती रहेगी, तब तक यह सांस्कृतिक सेतु अडिग रहेगा। साहित्य वह प्रकाश है जो नफरत के अंधकार को मिटाकर प्रेम और सद्भावना का मार्ग प्रशस्त करता है। भारत और नेपाल का साहित्यिक संबंध इसी स्थायी प्रेम और अटूट भाईचारे का घोषणापत्र है। "साहित्य समाज का वह दर्पण है, जिसमें दो देश अपनी सीमाओं को भूलकर एक-दूसरे के हृदय की धड़कन सुन सकते हैं।

जम्बू द्वीप से शाकद्वीप तक

शाश्वत भारत: जम्बू द्वीप से शाकद्वीप तक
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
 खोज की आदि भूमि सदियों से भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक चेतना का केंद्र रहा है। प्राचीनकाल से ही यूनानी, रोमन और अरबी लोग यहाँ मिट्टी की खोज में नहीं, बल्कि उस 'सत्य' की खोज में आते रहे हैं जो आत्मा को तृप्त कर सके। हिन्दूकुश पर्वतमाला केवल पहाड़ों की एक श्रृंखला नहीं थी, बल्कि दो संस्कृतियों का मिलन स्थल और ज्ञान का द्वार थी। अध्यात्म, चमत्कार और सिद्धियों के बारे में भारत की ख्याति ने इसे विश्व का गुरु बनाया। भारतीय धर्म और दर्शन दुनिया के अन्य मतों से बिल्कुल अलग हैं। यह किसी मरुस्थल की तरह शुष्क या नियमों से बंधा हुआ नहीं है, बल्कि यह हरे-भरे फलों से लदे एक सुव्यवस्थित जंगल की तरह है, जहाँ हर जीव को अपनी प्रकृति के अनुसार विकसित होने की स्वतंत्रता है।
पश्चिमी धर्म और दर्शन अक्सर 'रेडिमेड' उत्तर देते हैं। वहाँ सब कुछ निर्धारित है—ईश्वर एक है, उसका एक संदेशवाहक है, और जीवन केवल एक बार मिलता है। लेकिन भारतीय अध्यात्म प्रश्न को मारने के बजाय उसे जगाता है। : भारतीय दर्शन तब शुरू होता है जब हम आत्मा के स्वतंत्र अस्तित्व और पुनर्जन्म को मानते हैं। यहाँ ईश्वर के होने या न होने के संदेह से अधिक महत्व स्वयं को जानने का है।: उपनिषद् और गीता हमें यह नहीं बताते कि हमें क्या करना है, बल्कि यह सिखाते हैं कि हम 'कौन' हैं। जब हम दूसरों के बताए उत्तरों से मुक्त होते हैं, तभी सच्ची खोज शुरू होती है।
 पश्चिमी धर्मों में प्रलय और न्याय (Judgment Day) की अवधारणा है, जबकि भारत में 'मोक्ष' यानी जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति की प्रक्रिया है।
प्राचीनकाल से ही साधकों के लिए हिमालय सर्वोच्च शरणस्थली रहा है। मुण्डकोपनिषद् के अनुसार, हिमालय की वादियों में सूक्ष्म-शरीरधारी आत्माओं का एक संघ है जिसे 'देवात्मा हिमालय' कहा जाता है।
हिमालय क्षेत्र (जम्मू-कश्मीर, सिक्किम, हिमाचल, उत्तराखंड, असम, अरुणाचल) के लोगों का स्वास्थ्य मैदानी इलाकों की तुलना में बेहतर होता है। यहाँ की शुद्ध वायु और आध्यात्मिक ऊर्जा दमा, टीबी, गठिया और नेत्र रोगों को दूर रखती है। तिब्बत के लोग आज भी निरोगी रहकर 100 वर्ष की औसत आयु प्राप्त करते हैं।
पश्चिमी ग्रंथों में स्वर्ग की कल्पना बर्फ और रेगिस्तान के लोगों की इच्छाओं जैसी है—जहाँ फल, सुंदर स्त्रियाँ और नदियाँ हों। भारत के लिए यह कल्पना नहीं, बल्कि वास्तविकता है। कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल की स्थिति वैसी ही है जैसा कि प्राचीन ग्रंथों में स्वर्ग का वर्णन मिलता है। प्राचीन काल में यहीं ब्रह्मा, विष्णु और शिव का स्थान था और इंद्र का नंदनकानन वन भी यहीं स्थित था।
पौराणिक भूगोल—सप्तद्वीपा वसुंधरा का पुराणों के अनुसार पृथ्वी सात द्वीपों में विभाजित है। इनमें से जम्बू द्वीप और शाकद्वीप का संबंध अत्यंत गहरा है।
. जम्बू द्वीप: कर्म की भूमि हम जिस द्वीप के निवासी हैं, वह जम्बू द्वीप है। इसके मध्य में सुमेरु पर्वत है, जो ब्रह्मांड की धुरी माना जाता है। जम्बू द्वीप को नौ खंडों (वर्षों) में बाँटा गया है: इलावृत वर्ष: केंद्र का भाग जहाँ शिव का निवास है।
भारतवर्ष: सबसे महत्वपूर्ण खंड, जिसे 'कर्मभूमि' कहा गया है। यहाँ जन्म लेकर ही मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।
किम्पुरुष वर्ष: जहाँ हनुमान जी आज भी राम की उपासना करते हैं।
शाकद्वीप: ज्ञान और शुद्धि का प्रतीक शाकद्वीप 'क्षीरसागर' (दूध के समुद्र) से घिरा है। यहाँ की संस्कृति अत्यंत शुद्ध और सात्विक मानी गई है। यहाँ के लोग वायु और सूर्य के माध्यम से ईश्वर की आराधना करते हैं। यहाँ क्रोध, ईर्ष्या और रोग का अस्तित्व नहीं है।
: शाकद्वीप के मग ब्राह्मण और भारत का संबंध इतिहास और पुराणों के अनुसार, शाकद्वीप और भारत (जम्बू द्वीप) का मिलन एक महान रोग के निवारण हेतु हुआ था। साम्ब की कथा और सूर्य उपासना भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को कुष्ठ रोग हुआ। नारद मुनि के परामर्श पर उन्होंने शाकद्वीप से 18 परिवारों के 'मग' ब्राह्मणों को बुलवाया। ये ब्राह्मण सूर्य के अनन्य उपासक और आयुर्वेद के महापंडित थे। मग ब्राह्मणों की विरासत: ये विद्वान अपने साथ ज्योतिष (Astronomy) और सूर्य चिकित्सा का गूढ़ ज्ञान लाए। इन्होंने ही भारत में सूर्य की मूर्ति पूजा और भव्य सूर्य मंदिरों की नींव रखी। अव्यंग और पुर: ये ब्राह्मण आज भी अपने 72 'पुरों' (कुलों) और 'अव्यंग' (विशेष कमरबंद) के माध्यम से अपनी प्राचीन पहचान बनाए हुए हैं।
पूर्वी भारत का शाकद्वीपीय कॉरिडोर (बिहार, झारखंड, ओडिशा, नेपाल) शाकद्वीप से आए इन विद्वानों का मुख्य केंद्र पूर्वी भारत बना। आज भी यहाँ की संस्कृति में शाकद्वीपीय प्रभाव स्पष्ट दिखता है।
. बिहार और मगध 'मगध' शब्द की व्युत्पत्ति ही 'मग' ब्राह्मणों से मानी जाती है। छठ पूजा: बिहार का महापर्व छठ, शाकद्वीपीय सूर्य विज्ञान का जीवंत प्रमाण है। इसमें उगते सूर्य से पहले डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, जो इस दर्शन को दर्शाता है कि अंत ही नए जीवन का बीज है। यह बिना किसी पुरोहित के किया जाने वाला वैज्ञानिक पर्व है।
ओडिशा और कोणार्क ओडिशा का कोणार्क सूर्य मंदिर न केवल स्थापत्य का नमूना है, बल्कि यह खगोलीय गणनाओं की प्रयोगशाला है। यहाँ की सूर्य प्रतिमाओं में पहने गए जूते (उदीच्य वेश) शाकद्वीप की भौगोलिक स्थिति की याद दिलाते हैं। नेपाल का ज्योतिष ज्ञान और झारखंड की औषधीय संपदा इसी ज्ञान परंपरा का हिस्सा है। बुद्ध का 'शाक्य' वंश भी इसी प्राचीन 'शाक' मूल से प्रेरित माना जाता है, जो ज्ञान और करुणा का केंद्र रहा।
सूर्य के 12 नाम और वैज्ञानिक चेतना शाकद्वीपीय संस्कृति ने हमें सूर्य के 12 रूपों का विज्ञान दिया। ये केवल नाम नहीं, बल्कि सौर ऊर्जा के विभिन्न स्तर हैं:
मित्र: मैत्रीपूर्ण ऊर्जा। रवि: ताप का स्रोत। सूर्य: प्रेरक शक्ति। भानु: प्रकाशक। खग: वायुमंडल का शुद्धिकर्ता।
पूषण: पोषक (फसलों के लिए)। हिरण्यगर्भ: ब्रह्मांडीय बीज।  मरीचि: वाष्पीकरण का स्वामी। आदित्य: अमर ऊर्जा।
सवितृ: उत्पत्तिकर्ता। अर्क: औषधि का कारक। भास्कर: बुद्धि का प्रकाशक है।
: प्राचीन गुफाएँ और ऐतिहासिक धरोहर में  भारत के भूगोल में केवल पहाड़ और नदियाँ नहीं, बल्कि इतिहास की परतें भी छिपी हैं। भीमबेटका: मध्यप्रदेश के रायसेन जिले में स्थित 750 गुफाओं का समूह, जहाँ 35,000 वर्ष पुरानी चित्रकारी आज भी हमें आदिमानव की चेतना से जोड़ती है। अजंता-एलोरा और एलीफेंटा: ये गुफाएँ दर्शाती हैं कि कैसे पत्थरों को तराशकर अध्यात्म को ठोस रूप दिया गया। बामियान (अखंड भारत): अफगानिस्तान की गुफाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि भारतीय दर्शन की सीमाएँ कितनी व्यापक थीं  विश्व कल्याण का भारतीय मार्ग
भारत का अध्यात्म केवल व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण अस्तित्व के लिए है। यह हमें सिखाता है कि हम कौन हैं, क्यों हैं और हमारा इस ब्रह्मांड के साथ क्या संबंध है। जम्बू द्वीप की कर्मठता और शाकद्वीप की वैज्ञानिक सात्विकता का संगम ही आज के विश्व को शांति और स्वास्थ्य का मार्ग दिखा सकता है। हिमालय की वादियों से लेकर बिहार के छठ घाटों तक, और कोणार्क के पत्थरों से लेकर भीमबेटका की गुफाओं तक—भारत एक अखंड ग्रंथ है। इसे पढ़ने के लिए केवल आँखों की नहीं, बल्कि उस जिज्ञासा की आवश्यकता है जो हमें हमारे अपने कुओं से बाहर निकाल सके।
हमें एक ऐसे ज्ञान की जरूरत है जो यह न बताए कि क्या मानना है, बल्कि यह सिखाए कि कैसे जानना है। भारत की यह खोज शाश्वत है और हमेशा रहेगी।
यह आलेख प्राचीन ग्रंथों, पौराणिक भूगोल और सांस्कृतिक विरासतों के गहन अध्ययन पर आधारित है।

भारतीय तीज त्यौहार प्रकृति प्रेम

भारतीय तीज त्योहार: प्रकृति, प्रेम 
सत्येंद्र कुमार पाठक 
भारतीय संस्कृति में त्योहार केवल तिथियों का समूह नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक कला हैं। जब तपती गर्मी के बाद आसमान में काले बादल घिरते हैं और मरुधरा से लेकर पहाड़ों तक मिट्टी की सोंधी खुशबू महकने लगती है, तब आगमन होता है 'तीज' का। तीज का त्योहार मुख्य रूप से मानसून के दौरान श्रावण और भाद्रपद मास में मनाया जाता है। यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के पुनर्जीवन, स्त्री शक्ति के संकल्प और सामाजिक समरसता का जीवंत प्रतीक है।: शिव-शक्ति का अटूट बंधन तीज के मूल में भगवान शिव और माता पार्वती की पौराणिक कथा निहित है। माना जाता है कि माता सती के आत्मदाह के बाद शिव समाधि में चले गए थे। सती ने पुनर्जन्म लेकर पार्वती के रूप में 108 वर्षों तक कठोर तपस्या की। उन्होंने अन्न, जल और सुख-सुविधाओं का त्याग कर दिया। अंततः भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन शिव ने उनकी निष्ठा को स्वीकार किया और उन्हें पत्नी रूप में अपनाया। इसीलिए, यह पर्व 'अखंड सौभाग्य' और 'मनवांछित वर' की प्राप्ति के लिए मनाया जाता है।
भारतीय पंचांग के अनुसार, तीन मुख्य तीज मनाई जाती हैं, जिनमें से प्रत्येक का अपना विशेष महत्व है:हरियाली तीज (श्रावण शुक्ल तृतीया): यह सावन की हरियाली और उमंग का उत्सव है। इस दिन महिलाएं हरे रंग के वस्त्र और चूड़ियाँ पहनती हैं, जो प्रकृति के साथ एकाकार होने का प्रतीक है। कजरी तीज (भाद्रपद कृष्ण तृतीया): इसे 'बूढ़ी तीज' या 'सातुड़ी तीज' भी कहते हैं। इसमें नीम की पूजा का विशेष महत्व है और कजरी लोकगीत गाए जाते हैं। हरतालिका तीज (भाद्रपद शुक्ल तृतीया): यह सबसे कठिन व्रत माना जाता है। इसमें महिलाएं निर्जला व्रत रखकर बालू के शिव-पार्वती की पूजा करती हैं।
भारत के विभिन्न राज्यों में तीज भारतीय उपमहाद्वीप के हर कोने में तीज का अपना रंग है। आइए, भारत के विभिन्न राज्यों की तीज परंपराओं की सैर करें: राजस्थान: राजसी वैभव और 'लहरिया' की राजस्थान में तीज का रूप सबसे भव्य होता है। जयपुर की 'तीज माता की सवारी' दुनिया भर में प्रसिद्ध है। यहाँ महिलाएं 'लहरिया' साड़ी पहनती हैं। नवविवाहिताओं के लिए उनके मायके से 'सिंजारा' आता है, जिसमें श्रृंगार सामग्री और घेवर होते हैं। झूला झूलना और लोकगीत गाना यहाँ की परंपरा का अभिन्न हिस्सा है।बिहार और झारखंड: संकल्प की पराकाष्ठा 'हरतालिका तीज' का वर्चस्व है। बिहार की महिलाएं इस व्रत को अत्यंत कठोरता से निभाती हैं। घर-घर में मिट्टी के शिव-पार्वती बनाए जाते हैं। यहाँ का 'पिड़ुकिया' (गुजिया) और 'ठेकुआ' त्योहार की मिठास बढ़ा देते हैं। रात भर जागकर महिलाएं सखियों के साथ लोकगीत गाती हैं, जिसे 'जागरण' कहा जाता है। उत्तर प्रदेश: कजरी और नीमड़ी माता की पूजा में पूर्वी उत्तर प्रदेश में 'कजरी' की गूँज चारों ओर सुनाई देती है। मिर्जापुर और वाराणसी कजरी के केंद्र हैं। यहाँ महिलाएं नीम के पेड़ की पूजा करती हैं जिसे 'नीमड़ी माता' कहा जाता है। सत्तू का भोग लगाना और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देना यहाँ की मुख्य विशेषता है। मध्य प्रदेश और दिल्ली: आधुनिकता और परंपरा का संगम में मध्य प्रदेश के मालवा और बुंदेलखंड अंचल में हरतालिका तीज बड़े उत्साह से मनाई जाती है। वहीं दिल्ली जैसे महानगरों में 'तीज मेलों' का आयोजन होता है, जहाँ पारंपरिक खान-पान और हस्तशिल्प की प्रदर्शनी लगती है। महाराष्ट्र और गुजरात: मंगला गौरी और नृत्य में महाराष्ट्र में श्रावण के मंगलवार को 'मंगला गौरी' पूजा होती है। यह तीज का ही एक रूप है जहाँ महिलाएं 'झिम्मा' और 'फुगड़ी' जैसे पारंपरिक खेल खेलती हैं। गुजरात में इस दौरान गरबा और डांडिया की खनक सुनाई देती है। दक्षिण भारत: स्वर्ण गौरी और आदि पूरम में कर्नाटक: यहाँ इसे 'गौरी हब्बा' कहा जाता है। गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले माँ गौरी का स्वागत किया जाता है। तमिलनाडु: यहाँ 'आदि पूरम' मनाया जाता है, जहाँ मंदिरों में देवी को हज़ारों चूड़ियाँ चढ़ाई जाती हैं और बाद में उन्हें सुहागिन महिलाओं में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।ओडिशा और उत्तराखंड: प्रकृति और पितृ सत्ता का सम्मान का ओडिशा में 'सावित्री व्रत' के रूप में इसे मनाया जाता है, जबकि उत्तराखंड के पहाड़ों में 'हरियाला' पर्व के साथ इसका मेल होता है। यहाँ महिलाएं अपने पारंपरिक 'पिछौड़ा' पहनकर पूजा करती हैं।
तीज केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने का जरिया है:रिश्तों की मिठास: विवाहित महिलाएं तीज पर मायके आती हैं। यह भाइयों और बहनों के बीच प्रेम को ताज़ा करने का अवसर होता है। ससुराल और मायके के बीच उपहारों (सिंधारा) का आदान-प्रदान रिश्तों में नई ऊर्जा भरता है। महिला सशक्तिकरण और सामूहिकता: तीज के दौरान महिलाएं घर के कामकाज से ब्रेक लेकर अपनी सखियों के साथ समय बिताती हैं। सामूहिक रूप से झूला झूलना, मेहंदी लगाना और नृत्य करना उनके मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक जुड़ाव के लिए महत्वपूर्ण है। कला और संस्कृति का संरक्षण: मेहंदी के जटिल डिजाइन, लोकगीतों की अनूठी धुनें और पारंपरिक परिधान (जैसे लहरिया, बनारसी साड़ी, पिछौड़ा) भारतीय कला को जीवित रखते हैं।
तीज के पकवानों के बिना यह लेख अधूरा है। हर राज्य का अपना एक विशेष स्वाद है: घेवर: राजस्थान का गौरव, जो केवल मानसून में ही मिलता है। सत्तू और मालपुआ: उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रमुख व्यंजन। पुरण पोली: महाराष्ट्र की प्रसिद्ध मिठाई। ठेकुआ: झारखंड और बिहार का पारंपरिक प्रसाग तीज हमें प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाता है। झूलों के लिए पेड़ों का चयन, पूजा में मिट्टी और फूलों का उपयोग, और हरियाली की पूजा यह संदेश देती है कि हमारा अस्तित्व इस प्रकृति से ही है। यह पर्व 'इको-फ्रेंडली' उत्सव का प्राचीन भारतीय उदाहरण है। शाश्वत परंपरा का जीवंत रूप आज के आधुनिक युग में भी तीज की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। भले ही उत्सव मनाने के तरीके बदल गए हों, लेकिन इसके पीछे की भावना—प्रेम, श्रद्धा और प्रकृति का सम्मान—आज भी वही है। तीज वह धागा है जो भारत के विभिन्न राज्यों को एक ही सांस्कृतिक माला में पिरोता है। यह उत्सव हमें याद दिलाता है कि जीवन में कठिन तप (व्रत) के बाद ही मधुर फल (मिलन और खुशहाली) की प्राप्ति होती है।जब तक सावन में घटाएं घिरेंगी, जब तक पेड़ों पर झूले पड़ेंगे और जब तक मेहंदी की खुशबू महकेगी, तीज की यह गौरवशाली परंपरा भारतीय हृदय की धड़कन बनी रहे हैं। 

हिमालय का हृदय नेपाल

हिमालय के हृदय की धड़कन: पोखरा की नीली झीलों से मुक्तिनाथ के मोक्ष-शिखर तक की महायात्रा में नेपाल, जिसे दुनिया केवल एवरेस्ट के देश के रूप में जानती है, वास्तव में वह उससे कहीं अधिक गहरा और आध्यात्मिक है। यह वह भूमि है जहाँ पत्थर भी बोले जाते हैं और जहाँ बहती नदियाँ मोक्ष की गाथाएँ सुनाती हैं। हमारी यह यात्रा दो विपरीत ध्रुवों के मिलन की कहानी है—एक ओर 'पोखरा' है, जो अपनी विलासिता और प्राकृतिक शांति के लिए आधुनिक युग का स्वर्ग है, और दूसरी ओर 'मुक्तिनाथ' है, जो 3,800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित वह प्राचीन सत्य है जिसे पाने के लिए ऋषि-मुनियों ने सदियों तक प्रतीक्षा की।
पोखरा केवल एक शहर नहीं, बल्कि एक अहसास है। ऐतिहासिक रूप से, यह पुराने भारत-चीन व्यापार मार्ग का एक मुख्य पड़ाव रहा है। 17वीं शताब्दी में, जब नेपाल छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित था, पोखरा 'चौबीसे' राज्यों में से एक, 'कास्की' राज्य का हिस्सा था। आज भी शहर के पुराने हिस्सों में उस काल की वास्तुकला की झलक मिलती है।
फेवा ताल: जहाँ आकाश जल में उतरता है । पोखरा पहुँचते ही जो पहली छवि मन पर अंकित होती है, वह है फेवा झील। सुबह की पहली किरण जब माछापुछरे (Fishtail) पर्वत की चोटी को चूमती है, तो वह स्वर्ण-शिखर झील के शांत पानी में ऐसे दिखाई देता है मानो साक्षात् महादेव ने जल-समाधि ले रखी हो। ताल बाराही: झील के मध्य स्थित यह द्वि-तलीय पगोडा शैली का मंदिर माँ शक्ति को समर्पित है। यहाँ पहुँचने का एकमात्र जरिया 'डूंगा' (रंगीन नावें) है। लहरों के बीच से गुजरते हुए मंदिर तक पहुँचना, संसार के कोलाहल से भक्ति की शांति की ओर बढ़ने जैसा है।
डेविस फॉल्स और गुप्तेश्वर: पाताल के रहस्य है। पोखरा की भौगोलिक बनावट विस्मयकारी है। डेविस फॉल्स  का पानी जब एक अंधेरी खाई में गिरकर गायब होता है, तो वह प्रकृति की विनाशकारी और सृजनात्मक शक्ति का अहसास कराता है। इस झरने के ठीक सामने गुप्तेश्वर महादेव गुफा है। गुफा की गहराई में उतरते हुए ऐसा लगता है मानो हम धरती के गर्भ में प्रवेश कर रहे हैं। यहाँ का प्राकृतिक शिवलिंग सदियों से अंधकार में भी प्रकाश की प्रेरणा दे रहा है।
सूर्योदय का दार्शनिक पक्ष पर यदि आप जीवन में नई आशा का अर्थ समझना चाहते हैं, तो आपको भोर के समय सारंगकोट की पहाड़ी पर होना चाहिए। यहाँ से अन्नपूर्णा रेंज और धौलागिरी के विशाल शिखरों का जो विस्तार दिखता है, वह मनुष्य के अहंकार को एक पल में समाप्त कर देता है।  काली गंडकी का चुनौतीपूर्ण मार्ग – शालिग्राम की खोज में  पोखरा की सुखद जलवायु को छोड़कर जब हम मुक्तिनाथ की ओर बढ़ते हैं, तो रास्ता रोमांच और भक्ति की पराकाष्ठा बन जाता है। जोमसोम तक की यात्रा में हिमालय का वह रूप दिखता है जो कठोर है, शुष्क है, लेकिन अत्यंत तेजस्वी है। विश्व की सबसे गहरी घाटी और काली गंडकी - मुक्तिनाथ जाने के मार्ग में हम उस स्थान से गुजरते हैं जिसे 'अंधा गल्छी' कहा जाता है। यह दुनिया की सबसे गहरी खाई है। इसके किनारे बहती काली गंडकी नदी का अपना एक अलग शास्त्र है। शालिग्राम शिला: यह दुनिया की एकमात्र नदी है जहाँ 'शालिग्राम' पत्थर मिलते हैं। ये पत्थर वास्तव में करोड़ों साल पुराने जीवाश्म (Fossils) हैं, जिन्हें हिंदू धर्म में भगवान विष्णु का साक्षात् विग्रह माना जाता है। इन काले, चिकने पत्थरों को नदी के तट पर खोजना अपने आप में एक आध्यात्मिक खोज जैसा ह
3,800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित मुक्तिनाथ (मुस्तांग) वह स्थान है जहाँ पहुँचकर समय थम जाता है। इसे 'मुक्ति क्षेत्र' कहा जाता है, जिसका अर्थ है 'वह स्थान जहाँ मोक्ष प्राप्त होता है'।
मंदिर परिसर के पीछे अर्धवृत्ताकार रूप में 108 कांसे के गौमुखों से पवित्र जल की धाराएं गिरती हैं। 108 का अंक हिंदू ज्योतिष और बौद्ध परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण है शून्य से भी कम तापमान में जब यात्री इन 108 धाराओं के नीचे से दौड़ता है, तो उसका शरीर भले ही कांप रहा हो, लेकिन उसका मन एक असीम शांति से भर जाता है। माना जाता है कि ये धाराएं मनुष्य के संचित पापों का क्षरण कर देती हैं।
मुक्तिनाथ मंदिर के पास ही स्थित ज्वाला माई का मंदिर एक प्राकृतिक चमत्कार है। यहाँ भूमि के भीतर से निकलती एक शाश्वत नीली लौ जलती रहती है। इसके ठीक नीचे से शीतल जल बहता है। अग्नि और जल का यह सह-अस्तित्व दार्शनिक रूप से यह बताता है कि विपरीत स्वभाव के तत्व भी एक साथ अस्तित्व में रह सकते हैमु।मुक्तिनाथ की सबसे सुंदर बात यहाँ की साझा संस्कृति है। यहाँ बौद्ध भिक्षुणियां (Anis) और हिंदू पुजारी एक साथ मंदिर की सेवा करते हैं। बौद्ध इसे 'चुमिग ग्यात्सा' कहते हैं। यह स्थान विश्व को सांप्रदायिक सद्भाव का सबसे बड़ा संदेश देता है। 
मुक्तिनाथ का उल्लेख विष्णु पुराण में विस्तार से मिलता है। यह स्थल 108 दिव्य देशमों में से 105वाँ है। ऐतिहासिक रूप से, थोरोंग ला पर्वत दर्रे की तलहटी में होने के कारण, यह स्थान प्राचीन व्यापारियों और तपस्वियों के लिए एक मुख्य आश्रय स्थल रहा है। यहाँ का 'वृंदा और विष्णु' का प्रसंग हमें सिखाता है कि भक्ति में श्राप भी वरदान बन जाता है और स्वयं भगवान को भी प्रकृति के नियमों शालिग्राम रूप में है । पोखरा और मुक्तिनाथ की यह यात्रा केवल 165 किलोमीटर की दूरी तय करना नहीं है, बल्कि यह अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ने की एक यात्रा है। पोखरा ने हमें सिखाया कि सुंदरता कैसे मन को शांत करती है, और मुक्तिनाथ ने सिखाया कि तपस्या कैसे आत्मा को मुक्त करती है। हिमालय की इन वादियों से लौटते समय, एक यात्री अपने साथ केवल तस्वीरें नहीं लाता, बल्कि वह शालिग्राम की तरह एक ऐसा व्यक्तित्व लेकर लौटता है जो बाहर से कठोर लेकिन भीतर से देवत्व को समेटे होता है।

रविवार, जनवरी 25, 2026

मदु गंगा और श्रीलंका

मदु गंगा के मैंग्रोव गलियारों में साहित्य की नाव: मेरी श्रीलंका डायरी
 सत्येन्द्र कुमार पाठक
श्रीलंका, जिसे हिंद महासागर का मोती कहा जाता है, अपनी गोद में न जाने कितने रहस्य और सुंदरता समेटे हुए है। लेकिन 9 जनवरी 2026 की उस सुबह ने मेरे लिए प्रकृति के एक नए और जादुई अध्याय को खोला। अवसर था पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी  के तत्वावधान में आयोजित एक साहित्यिक यात्रा का, जिसमें कलम और संवेदना के धनी साहित्यकारों का समागम था।
कोलंबो एयरपोर्ट  से बेंटोटा: एक नई सुबह की आहट - यात्रा की शुरुआत कोलंबो हवाई अड्डे से हुई। वहाँ की नमी भरी हवा में एक अजीब सा अपनापन था। बस द्वारा जब हम बेंटोटा के लिए निकले, तो मेरे साथ स्वर्णिम कला केंद्र की अध्यक्षा और प्रख्यात कवयित्री डॉ. उषाकिरण श्रीवास्तव, डॉ. संगीता सागर और हिमाचल प्रदेश तथा महाराष्ट्र के लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार उपस्थित थे। बस की खिड़की से बाहर भागते नारियल के पेड़ों और समुद्र की लहरों ने जैसे हमारे साहित्यिक संवादों के लिए एक पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी। कोलंबो से करीब 80 किलोमीटर दक्षिण में स्थित 'बालापिटिया' हमारा गंतव्य था, जहाँ 'मदु गंगा' अपने शांत जल के साथ हमारा इंतज़ार कर रही थी। प्रकृति का 'ग्रीन कैथेड्रल' - मदु गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि श्रीलंका के गाले जिले का गौरव है। यह उराग स्मन हंडिया के पास से निकलती है और अपनी छोटी सी यात्रा में एक विशाल लैगून का रूप ले लेती है। जैसे ही हम नाव पर सवार हुए, मैंग्रोव वनों की सघनता ने हमें चारों ओर से घेर लिया। यहाँ के मैंग्रोव वन किसी 'ग्रीन कैथेड्रल' (हरित गिरजाघर) की तरह प्रतीत होते हैं, जहाँ सूरज की किरणें भी पत्तों से छनकर आती हैं।
नाव सफारी के दौरान मेरा रूबरू होना यहाँ की उस जैव विविधता से हुआ, जिसे दुनिया 'रामसर आर्द्रभूमि' के रूप में जानती है। पानी की सतह पर तैरते पक्षी और किनारे पर धूप सेंकते सरीसृप यह बता रहे थे कि यहाँ 95 प्रजातियों के पौधे और 248 कशेरुकी जीव एक अद्भुत सामंजस्य में रहते हैं। साहित्यकारों  की टिप्पणियों ने उन दृश्यों को काव्यमयी बना दिया। उन्होंने कहा कि "प्रकृति की ये जड़ें हमें सिखाती हैं कि अस्तित्व को बचाए रखने के लिए कितनी गहराई तक मिट्टी और पानी को पकड़ना पड़ता है।"
दालचीनी द्वीप: जहाँ हवा में स्वाद घुल जाता है । यात्रा का सबसे सुगंधित पड़ाव था 'दालचीनी द्वीप' । मदु गंगा के पेट में बसे करीब 25-28 द्वीपों में से यह सबसे प्रमुख है। द्वीप पर उतरते ही दालचीनी की तीखी और मीठी खुशबू ने हमारा स्वागत किया। यहाँ हमने देखा कि कैसे स्थानीय निवासी पीढ़ियों से चली आ रही विधि से दालचीनी की छाल निकालते हैं।।व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए वह क्षण अविस्मरणीय था जब हमने वहाँ की पारंपरिक दालचीनी की चाय का स्वाद लिया। नारियल के पानी और ताजे पाइन (Pine) के साथ वह चाय एक उत्सव की तरह थी। स्मृति के तौर पर हमने वहाँ से लंकाई 2000 रुपये में शुद्ध दालचीनी, बारीक चूर्ण और उसका अर्क (Extract) खरीदा। वह खरीदारी मात्र एक सौदा नहीं, बल्कि उस द्वीप के श्रमजीवियों के प्रति एक सम्मान था।
आस्था, इतिहास और मिलन का संगम मदु नदी के बीचों-बीच स्थित कोठदुवा मंदिर (Kothduwa Temple) हमारी आध्यात्मिक जिज्ञासा का केंद्र बना। द्वीप पर स्थित यह बौद्ध मंदिर शांति का पर्याय है। यहाँ के ऐतिहासिक महत्व को जानकर हम चकित रह गए—अमरपुरा निकया संप्रदाय का पहला दीक्षा समारोह यहीं हुआ था। जब हमारी नाव उस बिंदु पर पहुँची जहाँ मदु गंगा अपना अस्तित्व हिंद महासागर को समर्पित कर देती है, तो वह दृश्य अलौकिक था।मैंने  इसे मानवता के वैश्विक संबंधों से जोड़ते हुए कहा कि "साहित्य भी इसी मिलन बिंदु की तरह है जहाँ विभिन्न संस्कृतियाँ एक होकर प्रेम के महासागर में गिरती हैं।" मीठे और खारे पानी का वह मिलन स्थल जीवन के द्वंद्व और शांति का प्रतीक जान पड़ा।
जल झोपड़ियाँ और मशगूल मन में वृक्षों और बांसों की बनी जल झोपड़ियाँ पर्यटकों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं हैं। उन झोपड़ियों में बैठकर जब हमने प्रकृति को निहारा, तो समय जैसे ठहर गया। बिहार , हिमाचल और महाराष्ट्र से आए साहित्यकारों ने जब अपनी क्षेत्रीय संस्कृतियों के साथ मदु गंगा की विहार ,  तुलना की, तो लगा कि प्रकृति पूरी दुनिया को एक ही सूत्र में पिरोती है। मछलियों के साथ रूबरू होना और जल-जीवन को इतने करीब से देखना एक ऐसी अनुभूति थी जो महानगरों की सीमेंट की दुनिया में दुर्लभ है।  एक अमिट छाप 9 जनवरी 2026 की शाम जब हम वापस लौटे, तो हमारे मन-मस्तिष्क में मदु गंगा की लहरें हिलोरे ले रही थीं। यह यात्रा केवल घूमने-फिरने की नहीं थी, बल्कि यह सत्येन्द्र कुमार पाठक की नजरों में प्रकृति, साहित्य और संस्कृति का एक त्रिकोणीय संगम थी। 2000 रुपये की दालचीनी और अर्क तो बस एक प्रतीक थे, असली कमाई वह मानसिक ऊर्जा थी जो हमें उस 'मैंग्रोव मैजिक' से मिली। श्रीलंका की मदु नदी आज भी मेरे भीतर कल-कल कर रही है। वह नारियल पानी का स्वाद, दालचीनी की खुशबू और बुद्ध की शांत प्रतिमा—यह सब अब मेरी स्मृतियों का हिस्सा हैं, जो आने वाले कई वर्षों तक मेरी कलम को स्याही प्रदान करती रहेंगी।
प्रमुख आकर्षणों की एक झलक में  बोट सफारी, कोठदुवा बुद्ध मंदिर, मैंग्रोव टनल। ,खरीदें: शुद्ध दालचीनी, दालचीनी का तेल और अर्क , : 2003 में रामसर साइट के रूप में नामित, जैव विविधता का खजाना।साहित्यिक संगम है।

शुक्रवार, जनवरी 23, 2026

मिथिला से श्रीलंका तक

मिथिला से लंका तक: मर्यादा पुरुषोत्तम और सिया के पदचिह्न
सत्येन्द्र कुमार पाठक
रामायण केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि भारत और उसके पड़ोसी देशों की सांस्कृतिक धड़कन है। एक जिज्ञासु यात्री के रूप में जब मैंने भगवान राम और माता सीता के जीवन से जुड़े तीन सबसे महत्वपूर्ण पड़ावों—जनकपुर, अयोध्या और अशोक वाटिका की यात्रा शुरू की, तो मुझे अहसास हुआ कि ये स्थान केवल पत्थर और मिट्टी के ढांचे नहीं, बल्कि जीवंत इतिहास हैं। यह यात्रा प्रेम, कर्तव्य और धैर्य के उस त्रिकोण को समझने की कोशिश थी, जिसने भारतीय उपमहाद्वीप के चरित्र को गढ़ा है। जनकपुर जहाँ उत्सव कभी समाप्त नहीं होता है। मेरी यात्रा की शुरुआत हुई नेपाल के तराई क्षेत्र में स्थित जनकपुर से। जैसे ही मैंने इस शहर की सीमा में प्रवेश किया, कानों में 'सिया-राम' की मधुर धुन और मैथिली भाषा की मिठास घुलने लगी। जानकी मंदिर की भव्यता: जनकपुर का मुख्य आकर्षण 'जानकी मंदिर' है। सफेद संगमरमर से बना यह विशाल मंदिर हिंदू-राजपूत और इस्लामी वास्तुकला का एक अनूठा संगम है। इसे 'नौ लखा मंदिर' भी कहा जाता है। मंदिर के गर्भ गृह में खड़ा होकर जब मैंने माता सीता की शांत प्रतिमा को देखा, तो मन उस युग में चला गया जब राजा जनक को हल चलाते समय भूमि से एक पुत्री प्राप्त हुई थी।।विवाह मंडप की जीवंतता: मंदिर परिसर के पास ही वह मंडप है जहाँ राम-जानकी का विवाह हुआ था। यहाँ की दीवारों पर आज भी उस विवाह के दृश्यों को इतनी बारीकी से उकेरा गया है कि लगता है मानो शहनाइयां अभी बज उठेंगी। जनकपुर के 'धनुष सागर' और 'गंगा सागर' जैसे पवित्र सरोवरों के तट पर शाम की आरती आपको एक अलग ही आध्यात्मिक शांति से भर देती है। जनकपुर हमें सिखाता है कि बेटी केवल पराया धन नहीं, बल्कि पूरे समाज का गर्व होती है।
 अयोध्या — मर्यादा और धर्म की शाश्वत नगरी जनकपुर की कोमलता को समेटे हुए मैं उत्तर प्रदेश की पावन नगरी अयोध्या पहुँचा। सरयू नदी के तट पर बसी यह नगरी आज अपने एक नए और भव्य स्वरूप में दुनिया के सामने है।।नया वैभव और प्राचीन गौरव अयोध्या में कदम रखते ही 'जय श्री राम' का जयघोष वातावरण में ऊर्जा भर देता है। हाल ही में निर्मित भव्य राम मंदिर की नक्काशी और पत्थरों की मजबूती मर्यादा पुरुषोत्तम के चरित्र की याद दिलाती है। नागर शैली में बने इस मंदिर के गर्भगृह में रामलला की मनमोहक मूर्ति को देखकर भक्त अपनी सुध-बुध खो बैठते हैं।
अनुशासन की नगरी अयोध्या केवल भव्यता नहीं, बल्कि अनुशासन का नाम है। 'हनुमानगढ़ी' की 76 सीढ़ियाँ चढ़ते हुए जब मैंने अयोध्या का विहंगम दृश्य देखा, तो अहसास हुआ कि क्यों इसे अपराजेय नगरी कहा जाता था। 'कनक भवन' की सुंदरता देखकर माता सीता के प्रति अयोध्यावासियों के प्रेम का पता चलता है। सरयू के तट पर शाम को होने वाली आरती और दीपदान का दृश्य ऐसा लगता है मानो आकाश के तारे धरती पर उतर आए हों। अयोध्या हमें संदेश देती है कि राजधर्म और व्यक्तिगत सुख में से जब चुनना हो, तो मर्यादा हमेशा सर्वोपरि होनी चाहिए।
अशोक वाटिका — विरह, धैर्य और शक्ति की भूमि यात्रा का अंतिम और सबसे भावुक पड़ाव था श्रीलंका का नुवारा एलिया क्षेत्र, जिसे रामायण काल में अशोक वाटिका कहा जाता था। उत्तर भारत की गर्मी और अयोध्या की भीड़भाड़ से दूर, यह स्थान घने जंगलों, ऊंचे पहाड़ों और झरनों के बीच स्थित है। सीता एलिया का सन्नाटा स्थल पर पहुँचते ही वातावरण में एक अजीब सी गंभीरता महसूस होती है। 'सीता अम्मन मंदिर' उसी स्थान पर बना है जहाँ सीता जी ने 10-12 महीने बंदी के रूप में बिताए थे। मंदिर के बगल में बहता झरना ऐसा प्रतीत होता है मानो आज भी माता सीता के विरह की कथा सुना रहा हो।
हनुमान जी के पदचिह्न और जलती हुई मिट्टी: यहाँ की चट्टानों पर बड़े-बड़े गड्ढे मौजूद हैं, जिन्हें 'हनुमान जी के पदचिह्न' माना जाता है। सबसे आश्चर्यजनक अनुभव था उस्सांगोडा (Ussangoda) की यात्रा। यहाँ की मिट्टी आज भी काली है। वैज्ञानिक तर्क चाहे जो भी हों, लेकिन स्थानीय लोककथाएं कहती हैं कि यह वही स्थान है जिसे हनुमान जी ने अपनी पूंछ की आग से जलाकर राख कर दिया था। अशोक वाटिका में सीता जी का अशोक वृक्ष के नीचे बैठना और रावण के ऐश्वर्य को तिनके के समान ठुकरा देना, नारी शक्ति और आत्मसम्मान का सबसे बड़ा उदाहरण है।
जनकपुर से शुरू होकर अयोध्या के वैभव से गुजरती हुई अशोक वाटिका की राख तक पहुँचने वाली यह यात्रा जीवन के संपूर्ण चक्र को दर्शाती है। जनकपुर प्रेम और पारिवारिक मूल्यों का प्रतीक है। अयोध्या कर्तव्य, न्याय और समाज के प्रति जिम्मेदारी का केंद्र है। अशोक वाटिका हमें सिखाती है कि जब सब कुछ छीन लिया जाए, तब भी आपका चरित्र और आपका आत्मबल ही आपकी सबसे बड़ी शक्ति होता है। आज भी, जब हम इन स्थानों की यात्रा करते हैं, तो हमें लगता है कि रामायण कोई पुरानी कहानी नहीं बल्कि एक शाश्वत सत्य है जो भौगोलिक सीमाओं को पार कर भारत, नेपाल और श्रीलंका को एक ही धागे में पिरोता है। यह यात्रा केवल दर्शन के लिए नहीं, बल्कि अपने भीतर के 'राम' और 'सीता' को जगाने की एक कोशिश है।

बुधवार, जनवरी 21, 2026

भारत - श्रीलंका और हिन्द महासागर

भारत श्रीलंका और हिंदमहासागर की सांस्कृतिक समन्वय 
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
इतिहास की पुस्तकें हमें बताती हैं कि सभ्यताएं नदियों के किनारे फली-फूलीं, लेकिन संस्कृतियों का विस्तार महासागरों की लहरों पर हुआ। 13 जनवरी 2026 की सुनहरी सुबह, जब कोलंबो स्थित हिंद महासागर के तट पर सूर्य की पहली किरणें बिखरीं, तो एक नया इतिहास रचा जा रहा था। पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी द्वारा आयोजित 'लेखक मिलन समारोह' के दौरान भारतीय साहित्यकारों के एक दल ने न केवल श्रीलंका की धरती पर कदम रखा, बल्कि हिंद महासागर के जल में प्रतीकात्मक गोता लगाकर भारत और श्रीलंका के बीच के 2500 वर्ष पुराने संबंधों को शब्दों का नया आकाश दिया। इस दल का नेतृत्व कर रहे थे वरिष्ठ साहित्यकार सत्येन्द्र कुमार पाठक, अकादमी के संयोजक डॉ. अकेला भाई, स्वर्णिम कला केंद्र की अध्यक्षा डॉ. उषाकिरण श्रीवास्तव और कवयित्री डॉ. संगीता सागर है। साहित्यकार व इतिहासकार सत्येन्द्र कुमार पाठक ने कहा कि यह आयोजन केवल एक साहित्यिक गोष्ठी नहीं थी, बल्कि यह 'सांस्कृतिक कूटनीति' का एक उत्कृष्ट उदाहरण था, जहाँ कलम के सिपाहियों ने समंदर की लहरों के माध्यम से दो देशों के दिलों को जोड़ने का उपक्रम किया। कोलंबो: जहाँ इतिहास करवट लेता है कोलंबो, जिसे दुनिया 'हिंद महासागर का मोती' कहती है, वास्तव में एक ऐसा चौराहा है जहाँ समय की कई परतें एक साथ मौजूद हैं। एक ओर उत्तर में कोलंबो बंदरगाह की आधुनिकता और दूसरी ओर बेइरा झील के शांत लैगून के बीच बसा यह शहर दक्षिण एशिया की समुद्री पहचान का केंद्र है। ऐतिहासिक रूप से, कोलंबो सदियों तक मसालों, रत्नों और बौद्धिक चेतना का केंद्र रहा। अरब व्यापारियों से लेकर यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों तक, हर किसी ने इस 'मोती' को पाने की चाह रखी। आज, जब हम यहाँ के 'फोर्ट एरिया' या 'गंगारामया मंदिर' की गलियों में टहलते हैं, तो हमें पुर्तगाली, डच और ब्रिटिश वास्तुकला के साथ-साथ शुद्ध श्रीलंकाई परंपराओं का अद्भुत संगम दिखाई देता है। यह वही 'समुद्री सिल्क रोड' है जिसने कभी बुद्ध के संदेशों को वैश्विक बनाया था। वैचारिक विमर्श इस यात्रा के केंद्र बिंदु रहे वरिष्ठ साहित्यकार सत्येन्द्र कुमार पाठक। समारोह के दौरान उनके संबोधन ने उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया। पाठक जी ने तर्क दिया कि भारत और श्रीलंका का संबंध केवल भौगोलिक निकटता का नहीं, बल्कि 'सांस्कृतिक डीएनए' का है।
उन्होंने रेखांकित किया कि कैसे प्राचीन व्यापारिक हवाओं ने नकेवल जहाजों को दिशा दी, बल्कि ज्ञान, दर्शन और कला का भी वहन किया। उनके अनुसार, "हिंद महासागर का जल हमारे बीच की दीवार नहीं, बल्कि वह दर्पण है जिसमें भारत और श्रीलंका एक-दूसरे का अक्स देखते हैं।" पाठक जी का यह दृष्टिकोण आधुनिक संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है, विशेषकर जब दक्षिण एशियाई देश अपनी साझा पहचान को फिर से परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं। संयोजन की शक्ति: डॉ. अकेला भाई और स्वर्णिम कला केंद्र किसी भी अंतरराष्ट्रीय आयोजन की सफलता उसके पीछे की संगठनात्मक दूरदृष्टि पर निर्भर करती है। पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी के संयोजक डॉ. अकेला भाई ने जिस कुशलता से इस लेखक मिलन समारोह को संयोजित किया, उसने हिंदी साहित्य के वैश्विक विस्तार को एक नई दिशा दी है। वहीं, डॉ. उषाकिरण श्रीवास्तव और डॉ. संगीता सागर की उपस्थिति ने इस आयोजन को भावुकता और काव्यात्मक ऊँचाई प्रदान की। डॉ. श्रीवास्तव ने 'हिंद महासागर की पहचान' को पुनर्जीवित करने पर बल देते हुए कहा कि समुद्री सुरक्षा के साथ-साथ 'सांस्कृतिक सुरक्षा' भी आज की महती आवश्यकता है। इन साहित्यकारों का हिंद महासागर के सानिध्य में समय बिताना इस बात का प्रतीक था कि भारतीय ज्ञान परंपरा आज भी महासागर की तरह विशाल और समावेशी है। हिंद महासागर: सामरिक महत्व और सांस्कृतिक पहचान आलेख का एक महत्वपूर्ण पहलू इस क्षेत्र का सामरिक महत्व भी है। कोलंबो सुरक्षा सम्मेलन (CSC) जैसे मंचों ने आज हिंद महासागर को सुरक्षा और सहयोग का नया केंद्र बना दिया है। भारत, श्रीलंका, मालदीव और अब पूर्ण सदस्य के रूप में सेशेल्स की भागीदारी इस क्षेत्र को वैश्विक शक्तियों की प्रतिस्पर्धा से बचाकर एक 'स्थिरता का क्षेत्र' बनाने की कोशिश कर रही है। लेकिन साहित्यकारों का मानना है कि यह सुरक्षा केवल नौसैनिक जहाजों से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान से भी आएगी। जब भारत और श्रीलंका के लेखक एक-दूसरे की भाषाओं और संवेदनाओं को समझेंगे, तो क्षेत्रीय शांति की नींव और अधिक सुदृढ़ होगी। भारतीय यात्रियों के लिए एक किफ़ायती स्वर्ग पर्यटन की दृष्टि से देखा जाए तो श्रीलंका भारतीयों के लिए हमेशा से एक पसंदीदा गंतव्य रहा है। 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार, श्रीलंका भारतीयों के लिए सबसे सस्ते और सुंदर यात्रा गंतव्यों में से एक है।
खान-पान: यहाँ का 'इस्सो वडाई' (झींगे के पकौड़े) और स्ट्रीट फूड न केवल स्वादिष्ट है, बल्कि भारतीय जायके के काफी करीब है। गॉल फेस ग्रीन पर सूर्यास्त देखना और पतंगों से भरे आकाश के नीचे समुद्र की लहरों का संगीत सुनना एक आध्यात्मिक अनुभव की तरह है। जुड़ाव: 2500 साल पुराना साझा इतिहास हर कदम पर भारतीय यात्री को अपनेपन का अहसास कराता ह कोलंबो में आयोजित यह लेखक मिलन समारोह एक गूँज की तरह है जो आने वाले लंबे समय तक सुनी जाएगी। यह आयोजन बताता है कि "सूर्यास्त को सहारा मानकर पानी के किनारे रहना" केवल एक काव्य पंक्ति नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन है। हम हमेशा पानी के किनारे रहते आए हैं, और हमारा मुख हमेशा पश्चिम की ओर रहा है, जहाँ से ज्ञान और व्यापार की नई किरणें आती हैं।  श्रीलंका को 'हिंद महासागर का मोती' इसलिए नहीं कहा जाता कि वह सुंदर है, बल्कि इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह समुद्र की गहराइयों से निकली उस संस्कृति को संजोए हुए है, जिसमें भारत का प्रेम और विश्व कल्याण की भावना समाहित है। सत्येन्द्र कुमार पाठक और उनके साथियों की यह यात्रा इसी प्रेम और समन्वय की विजय गाथा है।

एला की वादियां और श्रीलंका

एला की वादियों में जीवित है रामायण: श्रीलंका के 'रावण जलप्रपात 
सत्येन्द्र कुमार पाठक
श्रीलंका, जिसे हिंद महासागर का 'पन्ना' कहा जाता है, अपनी गोद में न केवल प्राकृतिक सुंदरता समेटे हुए है, बल्कि यहाँ की हवाओं में इतिहास और पौराणिक कथाओं का अद्भुत संगीत भी बहता है। 10 जनवरी 2026 की वह गुनगुनी सुबह मेरे जीवन के उन सुनहरे पन्नों में दर्ज हो गई, जिन्हें मैं बार-बार पलटना चाहूँगा। पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी के तत्वावधान में आयोजित इस सांस्कृतिक परिभ्रमण का सबसे रोमांचक पड़ाव था—एला (Ella) और वहाँ का विश्वप्रसिद्ध 'रावण जलप्रपात'। पहाड़ों का हृदय: एला की जादुई घाटियाँ - श्रीलंका का मध्य पहाड़ी क्षेत्र अपनी धुंध भरी सुबहों और अंतहीन चाय के बागानों के लिए जाना जाता है। एला, जो एक छोटा सा पर बेहद खूबसूरत कस्बा है, यहाँ पहुँचते ही ऐसा लगता है मानो समय ठहर गया हो। ऊँची चोटियाँ, बादलों से ढकी घाटियाँ और हरियाली की ऐसी चादर कि आँखें थक जाएँ पर दृश्य खत्म न हों। इसी एला से लगभग 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है वह स्थान, जिसका संबंध सीधे भारत के महान महाकाव्य 'रामायण' से जुड़ा है।
रावण जलप्रपात: जहाँ पत्थर भी गाते हैं इतिहास की गाथा जैसे ही हमारी बस घुमावदार रास्तों से होती हुई नीचे की ओर उतरी, कानों में एक मधुर गर्जना सुनाई देने लगी। यह 'रावण एला' या रावण जलप्रपात था। लगभग 25 मीटर (82 फीट) की ऊँचाई से गिरता यह झरना श्रीलंका के सबसे चौड़े प्रपातों में से एक है। इस झरने की बनावट बड़ी ही अनूठी है। यह एक विशाल अंडाकार अवतल (Concave) चट्टान के ऊपर से नीचे गिरता है। स्थानीय लोगों का मानना है कि वर्षा ऋतु में जब यह अपने पूरे वेग में होता है, तो इसकी आकृति 'मुरझाई हुई पंखुड़ियों वाले सुपारी के फूल' के समान दिखाई देती है। चट्टानों के गहरे रंग और पानी के दूधिया सफेद रंग का विरोधाभास यहाँ के दृश्य को जीवंत बना देता है।
माता सीता का वनवास और वो रहस्यमयी गुफाएँ - इस यात्रा का सबसे भावुक कर देने वाला पक्ष इसका धार्मिक महत्व है। रामायण की कथाओं के अनुसार, जब लंकापति रावण ने माता सीता का अपहरण किया था, तब उन्हें कुछ समय के लिए इसी जलप्रपात के पीछे स्थित गुफाओं में छिपाकर रखा गया था। आज इन गुफाओं को 'रावण एला गुफा' कहा जाता है।।एक यात्री के तौर पर जब आप उस झरने की गिरती धार को देखते हैं, तो मन स्वतः ही उस कालखंड की कल्पना करने लगता है। लोकश्रुति है कि माता सीता ने इसी झरने के शीतल जल से बने प्राकृतिक कुंडों में स्नान किया था। उस समय यह पूरा क्षेत्र अभेद्य जंगलों से घिरा हुआ था। आज भी यह स्थान 'रावण एला वन्यजीव अभ्यारण्य' का हिस्सा है, जो इसकी प्राचीनता और प्राकृतिक शुद्धता को संरक्षित रखता है। श्रीलंका की मिट्टी में रामायण के जीवंत साक्ष्य -  हमारी यात्रा केवल झरने तक सीमित नहीं थी, हमने उन साक्ष्यों को भी करीब से देखा जो रामायण को एक ऐतिहासिक सत्य के रूप में स्थापित करते हैं:।हनुमान जी के पदचिह्न: सीता एलिया (सीता अम्मन टेंपल ) के पास नदी के किनारे चट्टानों पर विशाल पैरों के निशान बने हुए हैं। स्थानीय लोगों का अटूट विश्वास है कि ये निशान पवनपुत्र हनुमान के हैं। अशोक वाटिका (हकगला): यहाँ की मिट्टी का रंग आज भी आसपास की भूमि से भिन्न है। माना जाता है कि लंका दहन की अग्नि से यहाँ की मिट्टी काली पड़ गई थी। दिव्यारुमपोला स्थान जहाँ माता सीता ने अग्नि परीक्षा दी थी। आज भी यहाँ लोग सत्य की शपथ लेने आते है दक्षिण तट पर स्थित 'रुमासाला' पहाड़ी पर हिमालयी वनस्पतियों का मिलना आज भी वैज्ञानिकों के लिए एक सुखद आश्चर्य है। श्रीलंका में रावण को केवल एक योद्धा ही नहीं, बल्कि एक प्रकांड विद्वान और शिव भक्त के रूप में देखा जाता है। हमारी यात्रा के दौरान हमने उन प्राचीन मंदिरों के महत्व को भी समझा जिनका सीधा संबंध रावण की भक्ति से है । कोनेश्वरम मंदिर (त्रिंकोमाली): इसे 'दक्षिण का कैलाश' कहा जाता है। रावण ने अपनी कठिन तपस्या से यहीं भगवान शिव को प्रसन्न किया था। यहाँ चट्टानों पर बने 'रावण वेत' (खाई) के निशान आज भी रावण की असीम शक्ति की याद दिलाते हैं।
मुन्नेश्वरम मंदिर: यहाँ भगवान राम ने रावण वध के बाद ब्रह्महत्या के दोष से मुक्ति पाने के लिए शिव की आराधना की थी। शिव तांडव स्तोत्र: जब एला की वादियों में हवाएँ चलती हैं, तो ऐसा आभास होता है मानो रावण द्वारा रचित शिव तांडव स्तोत्र की गूँज आज भी यहाँ की पहाड़ियों में रची-बसी है। रावण जलप्रपात केवल देखने की वस्तु नहीं है, बल्कि यह अनुभव करने की जगह है। यहाँ पहुँचकर आप स्वयं को प्रकृति के बहुत करीब पाते हैं। यदि आप साहसी हैं, तो आप यहाँ की विशाल चट्टानों पर चढ़कर झरने के ऊपरी हिस्सों तक जा सकते हैं। पत्थरों पर जमी काई और उन पर गिरती पानी की बूंदें एक अद्भुत फिसलन पैदा करती हैं, जो रोमांच को दोगुना कर देती हैं। झरने के नीचे बने तालाबों में स्नान करना पर्यटकों का सबसे प्रिय काम है। हमने देखा कि विश्व भर से आए पर्यटक वहाँ के शीतल जल में अठखेलियाँ कर रहे थे। हालांकि, चट्टानें फिसलन भरी हैं, इसलिए सावधानी बरतना अनिवार्य है।
इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण आयाम पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी की सहभागिता रही। अकादमी के सदस्यों के साथ चर्चा करते हुए यह बात स्पष्ट हुई कि कैसे भाषा और संस्कृति भौगोलिक सीमाओं को लांघ जाती हैं। रावण जलप्रपात के किनारे बैठकर हिंदी के विद्वानों और साहित्य प्रेमियों के बीच रामायण के प्रसंगों पर चर्चा करना, भारत और श्रीलंका के बीच के सांस्कृतिक सेतु को और मजबूत कर रहा था। यह केवल एक पर्यटन नहीं, बल्कि एक 'सांस्कृतिक अन्वेषण' था। एला रेलवे स्टेशन से यह मात्र 6 किलोमीटर की दूरी पर है। टुक-टुक या टैक्सी आसानी से उपलब्ध है । सुबह 8 से 11 बजे का समय सबसे अच्छा है जब सूरज की रोशनी सीधे जलप्रपात पर पड़ती है । चट्टानें अत्यंत फिसलन भरी हैं, विशेषकर बारिश के बाद।: स्मृतियों की पोटली में एक अनमोल रत्न है।
जब हम शाम को एला की ओर वापस लौट रहे थे, तो रावण जलप्रपात की वह गर्जना बहुत देर तक हमारे कानों में गूंजती रही। वह केवल पानी के गिरने की आवाज नहीं थी, बल्कि वह उन हजारों वर्षों की गवाह थी जो इस धरती ने देखे हैं। रावण जलप्रपात की सुंदरता उसकी ऊँचाई में नहीं, बल्कि उसके साथ जुड़ी उन भावनाओं में है जो हर भारतीय और श्रीलंकाई के मन में रची-बसी हैं। 10 जनवरी 2026 की यह यात्रा हमें याद दिलाती है कि प्रकृति और इतिहास एक-दूसरे के पूरक हैं। पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी के इस परिभ्रमण ने हमें न केवल श्रीलंका की सुंदरता से रूबरू कराया, बल्कि हमें अपनी साझा जड़ों और प्राचीन गौरव से भी फिर से जोड़ दी है।

अशोक वाटिका और श्रीलंका

अशोक वाटिका की पदयात्रा: साहित्य, श्रद्धा और स्मृतियों का संगम
समय का चक्र जब अपनी धुरी पर घूमता है, तो कई बार ऐसे संयोग बनाता है जो मनुष्य की कल्पना से परे होते हैं। जनवरी 2026 की शुरुआत मेरे लिए कुछ ऐसी ही रही। पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी, शिलांग द्वारा श्रीलंका में आयोजित 'विश्व हिंदी दिवस' (9 जनवरी - 12 जनवरी 2026) के त्रिदिवसीय सम्मेलन में भाग लेने का निमंत्रण महज एक बौद्धिक यात्रा का बुलावा नहीं था, बल्कि यह मेरे लिए त्रेतायुग के उन पन्नों को पलटने का अवसर था, जिन्हें हमने अब तक केवल रामचरितमानस की चौपाइयों में पढ़ा था। सम्मेलन के बीच से समय निकालकर, 10 जनवरी 2026 का दिन मैंने उस स्थान के लिए सुरक्षित किया, जिसका नाम सुनते ही हर भारतीय का मस्तक श्रद्धा से झुक जाता है—नुवारा एलिया की अशोक वाटिका।
नुवारा एलिया का जादुई सफर में कोलंबो की हलचल से दूर, जब हमारी गाड़ी पहाड़ियों की घुमावदार सड़कों पर चढ़ने लगी, तो मौसम का मिजाज बदलने लगा। श्रीलंका का यह हिस्सा 'लिटिल इंग्लैंड' के नाम से भी जाना जाता है, लेकिन मेरे लिए यह 'सीता एलिया' की खोज थी। ऊँचे चाय के बागान, कोहरे की चादर और ठंडी हवाओं के बीच सफर करते हुए हम उस पड़ाव पर पहुँचे, जहाँ सीता नदी का कल-कल नाद सुनाई देने लगा। सीता अम्मन मंदिर: जहाँ पत्थरों में भी भक्ति है । नुवारा एलिया से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित 'सीता अम्मन मंदिर' ही वह केंद्र है, जिसे प्राचीन अशोक वाटिका माना जाता है। यहाँ पहुँचते ही वातावरण में एक अजीब सी शांति और पवित्रता का अनुभव हुआ। मंदिर की वास्तुकला दक्षिण भारतीय शैली की है, लेकिन इसकी आत्मा रामायण कालीन है। मंदिर के ठीक बगल में बहती सीता नदी (जिसे सीता एलिया नदी भी कहा जाता है) के किनारे खड़े होकर जब मैंने उस जल को स्पर्श किया, तो लगा जैसे समय सदियों पीछे चला गया है। मान्यता है कि रावण द्वारा अपहृत होने के बाद माता सीता ने इसी नदी के जल से अपनी दैनिक क्रियाएँ की थीं और इसी के तट पर बैठकर प्रभु राम की प्रतीक्षा में अनगिनत आंसू बहाए थे। हनुमान जी के पदचिह्न: साक्षात प्रमाण की  यात्रा का सबसे विस्मयकारी और रोमांचक हिस्सा था—बजरंगबली के विशाल पदचिह्नों का दर्शन। सीता नदी के चट्टानी किनारों पर कुछ ऐसे निशान मौजूद हैं, जो मानवीय आकार से कई गुना बड़े हैं। स्थानीय श्रद्धालुओं और ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, ये वही पदचिह्न हैं जो हनुमान जी ने लंका में उतरते समय छोड़े थे। इन विशाल निशानों को देखना एक ऐसा अनुभव था जिसे शब्दों में बांधना कठिन है। यह केवल पत्थर पर उकेरी गई आकृति नहीं थी, बल्कि यह उस अटूट विश्वास का प्रतीक था कि संकटमोचन ने इसी स्थान पर आकर माता जानकी को सांत्वना दी होगी और उन्हें प्रभु राम की मुद्रिका सौंपी होगी। उन निशानों को स्पर्श करते समय ऐसा लगा मानो इतिहास अपनी गवाही खुद दे रहा है। अशोक वाटिका और लंका दहन की राख का गाइड और स्थानीय निवासियों से बातचीत के दौरान एक और दिलचस्प तथ्य सामने आया। वाटिका के आसपास की मिट्टी का रंग सामान्य भूरा न होकर गहरा काला है। लोक मान्यता है कि जब हनुमान जी ने अपनी पूंछ से स्वर्ण लंका को जलाया था, तो उस आग से जो राख बनी, उसने यहाँ की मिट्टी को हमेशा के लिए काला कर दिया। आधुनिक विज्ञान इसे भूगर्भीय परिवर्तन कह सकता है, लेकिन एक भक्त की दृष्टि में यह उस 'धर्मी' की विजय का प्रतीक है जिसने अन्याय के गढ़ को भस्म कर दिया था। त्रिजटा मंदिर और मानवीय संवेदना का मुख्य मंदिर के समीप ही त्रिजटा को समर्पित एक छोटा सा स्थान है। रामायण की कथा में त्रिजटा वह राक्षसी थी जिसने राक्षसों के बीच रहकर भी माता सीता की सुरक्षा की और उन्हें मानसिक संबल दिया। इस मंदिर की उपस्थिति यह दर्शाती है कि शत्रु के खेमे में भी यदि कोई धर्म का साथ देता है, तो इतिहास उसे कभी नहीं भूलता। यहाँ दर्शन करना मानवीय संवेदनाओं के प्रति सम्मान जैसा था।।साहित्यिक संगम और विश्व हिंदी दिवस की गूँज यात्रा का एक पहलू 'पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी' का वह सम्मेलन भी था, जिसने हमें यहाँ तक पहुँचाया। विश्व हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में जब श्रीलंका की धरती पर हिंदी के विद्वानों ने भाषा और संस्कृति पर चर्चा की, तो लगा कि राम और सीता की यह कथा केवल भारत की नहीं, बल्कि वैश्विक चेतना का हिस्सा है। हिंदी भाषा ने कैसे देशों की सीमाओं को तोड़कर हमें एक सांस्कृतिक सूत्र में पिरो रखा है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण इस यात्रा में मिला।
अमर स्मृति 10 जनवरी की वह शाम जब मैं नुवारा एलिया से वापस लौट रहा था, तो मेरे पास केवल तस्वीरें नहीं थीं, बल्कि एक गहरा अनुभव था। मैंने देखा कि कैसे एक स्थान हजारों वर्षों के बाद भी अपनी पवित्रता को संजोए हुए है। सीता नदी की लहरें, हनुमान जी के वे पदचिह्न और अशोक वाटिका के वे वृक्ष—सब मिलकर एक ही गाथा गा रहे थे—धैर्य, भक्ति और धर्म की जीत की गाथा। यह यात्रा मेरे जीवन की सबसे महत्वपूर्ण यात्राओं में से एक रहेगी, जहाँ मैंने अपनी साहित्यिक यात्रा को अपनी आध्यात्मिक जड़ों से जुड़ते हुए देखा।

मंजुली द्वीप और संस्कृति

माजुली की आध्यात्मिक और शिल्प विरासत
 यह आलेख ब्रह्मपुत्र नदी में स्थित विश्व के सबसे बड़े नदी द्वीप माजुली की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और शिल्प परंपराओं को विस्तार से प्रस्तुत करता है। नव-वैष्णव आंदोलन, सत्र संस्कृति, मुखौटा कला, टेराकोटा शिल्प और प्राकृतिक जैव विविधता के साथ-साथ, इसमें माजुली के सामने खड़े भू-कटाव के गंभीर संकट को भी रेखांकित किया गया है। नव-वैष्णव परंपरा का जीवंत केंद्र माजुली , सत्र संस्कृति और एकशरण नामधर्म की धरोहर , मुखौटा कला और रास लीला की अनूठी पहचान , भू-कटाव के साए में सांस्कृतिक अस्तित्व का संघर्ष है। 
महाबाहु की गोद में एक सांस्कृतिक रत्न असम के हृदय स्थल में, जहाँ ब्रह्मपुत्र की विशाल धाराएँ अपनी प्रचंडता और उदारता के साथ बहती हैं, वहाँ दुनिया का सबसे बड़ा नदी द्वीप ‘माजुली’ स्थित है। यह केवल भूमि का एक टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह असमिया सभ्यता, आध्यात्मिकता और कला का वह केंद्र है, जिसने सदियों से अपनी मौलिकता को संजोकर रखा है। 2016 में भारत का पहला द्वीप जिला बनने का गौरव प्राप्त करने वाला माजुली, आज अपनी भौगोलिक विशिष्टता और नव-वैष्णव संस्कृति के कारण वैश्विक मानचित्र पर चमक रहा है। नव-वैष्णववाद का उद्गम और ‘एकशरण नामधर्म’ माजुली की पहचान को समझने के लिए 15वीं-16वीं शताब्दी के महान संत, समाज सुधारक और कला मनीषी श्रीमंत शंकरदेव के योगदान को समझना अनिवार्य है। उन्होंने असम की धरती पर ‘एकशरण नामधर्म’ की नींव रखी। उस काल में, जब समाज जटिल कर्मकांडों में उलझा था, शंकरदेव ने सामूहिक कीर्तन और समर्पण के माध्यम से भगवान कृष्ण की भक्ति का एक सरल मार्ग दिखाया। माजुली इस आंदोलन का मुख्य केंद्र बना। यहाँ ‘सत्र’ (मठों) की स्थापना की गई, जो केवल धार्मिक स्थान नहीं, बल्कि ज्ञान और कला के विश्वविद्यालय बन गए। शंकरदेव ने बेल का पेड़ लगाकर यहाँ पहले सत्र ‘बेलगुरी’ की स्थापना की थी। आज भी माजुली में 22 प्रमुख सत्र सक्रिय हैं, जो मानवता और शांति का संदेश दे रहे हैं। माजुली के सत्र अपनी विशिष्ट वास्तुकला के लिए जाने जाते हैं। एक आदर्श सत्र परिसर चार मुख्य इकाइयों में विभाजित होता है: बटकोरा: यह सत्र का प्रवेश द्वार है, जो सादगी और स्वागत का प्रतीक है। नामघर (कीर्तन-घर): यह सत्र का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह एक विशाल प्रार्थना कक्ष होता है जहाँ भक्त सामूहिक भजन करते हैं। इसका उपयोग सामुदायिक बैठकों और सांस्कृतिक प्रदर्शनों के लिए भी होता है। मणिकूट: इसे ‘रत्न घर’ भी कहा जाता है, जो सत्र का गर्भगृह होता है जहाँ पवित्र पांडुलिपियाँ या मूर्तियाँ रखी जाती हैं। हाटी नामघर के चारों ओर भक्तों (भक्तों) के निवास के लिए बनी कतारबद्ध झोपड़ियाँ या घर है। सत्रों की व्यवस्था भी अत्यंत अनुशासित होती है। इसके प्रमुख को ‘सत्राधिकार’ कहा जाता है। यहाँ भक्तों के बीच काम का बँवारा होता है—जैसे भागवती (शास्त्रों का वाचक), गायन-बायन (गायक और वादक), और खनिकर (कलाकार)। यहाँ दो प्रकार के सत्र होते हैं—’उदासीन सत्र’ जहाँ भक्त ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं और ‘गृहस्थी सत्र’ जहाँ परिवार के साथ रहने की अनुमति होती है। विश्व प्रसिद्ध रास लीला और मुखौटा कला में माजुली का सबसे बड़ा आकर्षण यहाँ की कृष्ण रास लीला है। पूरे भारत में माजुली ही वह स्थान है जहाँ रास लीला केवल पेशेवर कलाकारों द्वारा नहीं, बल्कि स्थानीय भक्तों द्वारा एक साधना के रूप में मनाई जाती है। नवंबर के महीने में पूरा द्वीप कृष्णमय हो जाता है। इस रास लीला को जीवंत बनाने में ‘समागुरी सत्र’ की मुखौटा कला का बहुत बड़ा हाथ है। यहाँ के कलाकार बांस, मिट्टी और गोबर का उपयोग करके अद्भुत मुखौटे बनाते हैं। रावण, बकासुर और हनुमान जैसे पात्र इन मुखौटों को पहनकर जब मंच पर आते हैं, तो दर्शक उस पौराणिक काल में पहुँच जाते हैं। यह कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत के रूप में सँभाली जा रही है।
सलमारा की टेराकोटा परंपरा: बिना चाक की मिट्टी कला माजुली की सांस्कृतिक विरासत का एक और अनमोल रत्न सलमारा गाँव है। यहाँ का टेराकोटा शिल्प अपनी तरह का अनोखा है। आमतौर पर कुम्हार चाक का उपयोग करते हैं, लेकिन सलमारा के कलाकार हाथों की निपुणता से मिट्टी को आकार देते हैं। मिट्टी इकट्ठा करने (खानी-दिया) से लेकर उसे पकाने (पेघाली दिया) तक की प्रक्रिया में पूरा परिवार शामिल होता है। महिलाएँ विशेष रूप से बर्तनों को आकार देने में दक्ष होती हैं। ये कलाकार न केवल बर्तन बनाते हैं, बल्कि कुशल नाव निर्माता भी होते हैं। इनके द्वारा बनाए गए मिट्टी के पात्र आज भी असमिया रसोई और सत्रों की शुद्धता का हिस्सा है।
माजुली विभिन्न समुदायों का एक सुंदर गुलदस्ता है। यहाँ मिशिंग, देवरी और सोनोवाल कचारी जैसे आदिवासी समुदाय सदियों से निवास कर रहे हैं। विशेष रूप से मिशिंग समुदाय की महिलाओं द्वारा की जाने वाली बुनाई पूरे भारत में प्रसिद्ध है। उनके द्वारा बनाए गए ‘मिरी जि़म’ और रंगीन कपड़े अपनी सूक्ष्म कलाकारी के लिए जाने जाते हैं। माजुली की आबादी लगभग 1.5 लाख है, जहाँ 144 गाँवों में लोग प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर रहते हैं।प्रकृति प्रेमियों के लिए माजुली किसी जन्नत से कम नहीं है। यहाँ पक्षियों की लगभग 260 प्रजातियां पाई जाती हैं। सर्दियों के मौसम में यहाँ साइबेरिया और अन्य ठंडे प्रदेशों से प्रवासी पक्षी आते हैं। ग्रे पेलिकन, सफेद गर्दन वाले सारस और बड़ी जलमुर्गियों का कलरव द्वीप के शांत वातावरण में संगीत भर देता है। यहाँ की आर्द्रभूमियाँ (बीलें) पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
माजुली की खूबसूरती के बीच एक कड़वा सच यहाँ का निरंतर होने वाला भू-कटाव है। 20वीं शताब्दी के आरंभ में यह द्वीप 1255 वर्ग किलोमीटर का था, जो अब घटकर मात्र 352 वर्ग किलोमीटर रह गया है। ब्रह्मपुत्र की लहरें हर साल इस सांस्कृतिक धरोहर का एक हिस्सा निगल रही हैं। यह न केवल जमीन का नुकसान है, बल्कि उस पर बसी सदियों पुरानी परंपराओं के मिटने का खतरा भी है। माजुली केवल असम की नहीं, बल्कि पूरी मानवता की अमूर्त विरासत (Intangible Heritage) है।
यहाँ का अध्यात्म, यहाँ के सत्र, सलमारा की मिट्टी की खुशबू और मुखौटों के पीछे छिपी कला, यह सब हमें जड़ों की ओर लौटने का संदेश देते हैं। माजुली की यात्रा केवल एक पर्यटन नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि का एक अनुभव है। हमें इस द्वीप को न केवल भौगोलिक रूप से बचाने की आवश्यकता है, बल्कि इसकी सांस्कृतिक लौ को भी प्रज्वलित रखना होगा। माजुली पहुँचने के लिए सबसे नज़दीकी शहर जोरहाट है। जोरहाट के निमातीघाट से प्रतिदिन फेरी (नाव) सेवाएँ उपलब्ध हैं, जो ब्रह्मपुत्र के विशाल पाट को पार कर आपको इस आध्यात्मिक द्वीप तक पहुँचाती हैं।
यह आलेख ब्रह्मपुत्र नदी में स्थित विश्व के सबसे बड़े नदी द्वीप माजुली की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और शिल्प परंपराओं को विस्तार से प्रस्तुत करता है। नव-वैष्णव आंदोलन, सत्र संस्कृति, मुखौटा कला, टेराकोटा शिल्प और प्राकृतिक जैव विविधता के साथ-साथ, इसमें माजुली के सामने खड़े भू-कटाव के गंभीर संकट को भी रेखांकित किया गया है।

शुक्रवार, जनवरी 02, 2026

जल , जंगल और जमीन

जल, जंगल, जमीन: मानवता की संस्कृति
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
'जल, जंगल और जमीन'—ये तीन शब्द मात्र भौतिक संसाधन नहीं हैं, बल्कि ये उस त्रिकोण का निर्माण करते हैं जिसके भीतर पृथ्वी का समस्त जीवन स्पंदित होता है। यदि ब्रह्मांड में पृथ्वी को 'नीला ग्रह' कहा जाता है, तो इसका श्रेय इन्हीं तत्वों को जाता है। मानव सभ्यता के इतिहास पर दृष्टि डालें तो स्पष्ट होता है कि हमारी प्रगति की कहानी इन्हीं तीन तत्वों के इर्द-गिर्द बुनी गई है। लेकिन आज, जब हम 21वीं सदी के तीसरे दशक में खड़े हैं, यह आधार स्तंभ डगमगा रहा है। महान आदिवासी नायक बिरसा मुंडा ने जिस "जल, जंगल, जमीन" के हक की लड़ाई शुरू की थी, वह आज केवल आदिवासियों की नहीं, बल्कि पूरी मानवता के अस्तित्व की लड़ाई बन चुकी है।
 सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक जुड़ाव में भारतीय मानस में प्रकृति को कभी भी 'उपभोग की वस्तु' नहीं माना गया। हमारी संस्कृति में नदियों को 'माँ' का दर्जा दिया गया है—गंगा, यमुना, नर्मदा केवल जलधाराएं नहीं, बल्कि मोक्षदायिनी और जीवनदायिनी शक्तियां हैं। वनों को 'तपोवन' कहा गया, जहाँ ऋषियों ने ज्ञान प्राप्त किया।
आदिवासी समाज के लिए तो जंगल उनका देवालय है। उनके लोकगीतों की लय और नृत्यों की थाप में पत्तों की सरसराहट और बारिश की बूंदों का संगीत घुला होता है। उनके लिए जमीन का एक टुकड़ा केवल संपत्ति नहीं, बल्कि उनके पूर्वजों की स्मृति और उनकी पहचान (Identity) है। 'पत्थलगड़ी' जैसे आंदोलन इसी सांस्कृतिक स्वायत्तता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का उद्घोष हैं। यह हमें याद दिलाता है कि जब तक जमीन सुरक्षित है, तब तक संस्कृति जीवित है।
 पृथ्वी के फेफड़े और रक्त का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो 'जल, जंगल और जमीन' एक अटूट चक्र (Cycle) में बंधे हैं: जंगल (पृथ्वी के फेफड़े): वन न केवल कार्बन सोखते हैं और ऑक्सीजन प्रदान करते हैं, बल्कि वे वर्षा चक्र को नियंत्रित करते हैं। वनों का विनाश सीधे तौर पर ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन को निमंत्रण देता है।
जल (जीवन का अमृत): बिना जल के न कृषि संभव है, न उद्योग और न ही जीवन। नदियों का सूखना या उनका प्रदूषित होना एक मृतप्राय सभ्यता की ओर इशारा करता है। जमीन (अन्नपूर्णा): मिट्टी केवल धूल नहीं है; यह वह उपजाऊ आधार है जो अरबों जीव-जंतुओं और वनस्पतियों को आश्रय देती है। रसायनों के अत्यधिक प्रयोग और खनन ने इस आधार को खोखला कर दिया है।. विकास की अंधी दौड़ और विनाश के संकेत की पूंजीवादी विचारधारा ने प्रकृति को 'बाजार' बना दिया है। 'विकास' केनाम पर जो नीतियां बनाई जा रही हैं, उनमें अक्सर पारिस्थितिक संतुलन  की अनदेखी की जाती है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के पहाड़ों में हाल के वर्षों में आई आपदाएं—चाहे वह भूस्खलन हो या अचानक आई बाढ़—प्रकृति की इसी चेतावनी का परिणाम हैं।
जब हम जंगलों को काटकर कंक्रीट के जंगल खड़ा करते हैं या पहाड़ों का सीना चीरकर अनियंत्रित खनन करते हैं, तो हम केवल जमीन नहीं खोते, बल्कि उस सुरक्षा कवच को नष्ट कर देते हैं जो सदियों से हमें आपदाओं से बचाता आया है। विडंबना यह है कि 'वन अधिकार अधिनियम' जैसे कानून कागजों पर तो सशक्त दिखते हैं, लेकिन धरातल पर स्थानीय समुदायों और आदिवासियों को उनकी अपनी ही जड़ों से बेदखल करने की साजिशें जारी हैं।
 संरक्षण का एकमात्र मार्ग विश्व आदिवासी दिवस (9 अगस्त) जैसे अवसर हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि आधुनिक समाज ने प्रगति के नाम पर क्या खोया है। आदिवासी समुदाय का यह नारा—"जल, जंगल, जमीन हमारा है"—स्वामित्व का अहंकार नहीं, बल्कि संरक्षण की जिम्मेदारी का बोध है। वे प्रकृति के स्वामी नहीं, बल्कि उसके 'ट्रस्टी' बनकर रहते हैं।
आदिवासी दर्शन हमें सिखाता है कि प्रकृति से उतना ही लो जितना जीवन के लिए आवश्यक है। यदि हमने उनके इस संघर्ष और मूल्यों को नहीं अपनाया, तो आने वाली पीढ़ियां एक ऐसे मरुस्थल में पैदा होंगी जहाँ धन तो होगा, लेकिन पीने को स्वच्छ पानी और सांस लेने को शुद्ध हवा नहीं होगी। यदि हमें मानवता को बचाना है, तो हमें अपने दृष्टिकोण में आमूलचूल परिवर्तन करना होगा । : विकास ऐसा हो जो भविष्य की पीढ़ियों की जरूरतों से समझौता न करे। स्थानीय समुदायों की भागीदारी: नीति निर्धारण में उन लोगों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए जो जमीन से जुड़े हैं।
केवल वृक्षारोपण नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को फिर से जीवित करने की आवश्यकता है। 'जल, जंगल और जमीन' का संरक्षण कोई दान या उपकार नहीं है, बल्कि यह हमारे स्वयं के अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है। बिरसा मुंडा का संघर्ष हमें याद दिलाता है कि जब सत्ता और स्वार्थ प्रकृति को निगलने का प्रयास करें, तब प्रतिरोध ही एकमात्र विकल्प रह जाता है। प्रकृति का विनाश वास्तव में मनुष्य का आत्मघाती कदम है। हमें यह समझना होगा कि हम प्रकृति के मालिक नहीं, उसका एक छोटा सा हिस्सा हैं। यदि हम जल को शुद्ध, जंगल को हरा और जमीन को उर्वर बनाए रखने में सफल रहे, तभी हमारी संस्कृति और सभ्यता का अस्तित्व बचा रहेगा। आने वाला कल इस बात पर निर्भर करेगा कि आज हम इन तीन स्तंभों का कितना सम्मान करते हैं।

करपी , अरवल , बिहार 804419
9472987491

गुरुवार, जनवरी 01, 2026

स्वर्ण लंका से आधुनिक राष्ट्र तक

श्रीलंका: स्वर्ण लंका से आधुनिक राष्ट्र तक का अद्भुत संगम 
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
हिन्द  महासागर का एक चमकता पन्ना हिंद महासागर के शांत नीले जल में एक नीलम की  चमकता यह छोटा सा द्वीप राष्ट्र 'श्रीलंका' केवल एक देश नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के विकास, पौराणिक गाथाओं और प्राकृतिक सुंदरता का एक जीवंत संग्रहालय है। भारत के दक्षिणी छोर से मात्र 31 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह देश सदियों से व्यापारियों, नाविकों और आध्यात्मिक साधकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। संस्कृत में 'श्री' का अर्थ है लक्ष्मी व आदरणीय और 'लंका' का अर्थ है द्वीप। यह नाम ही इसकी गरिमा और प्राचीनता को बयां करता है।
. पुराणों के अनुसार : देवशिल्पी की रचना और कुबेर का वैभव श्रीलंका का इतिहास केवल कागज के पन्नों पर नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की रग-रग में बसे 'युगों' की कथाओं में मिलता है।
सतयुग और रत्नद्वीप: संहिताओं और स्मृति ग्रंथों  के अनुसार  रत्नद्वीप का निर्माण स्वयं देव-शिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने किया था। भगवान शिव और माता पार्वती के निवास के लिए बनाई गई यह नगरी पूरी तरह सोने की थी। ऋषि विश्रवा ने अपनी चतुराई से इसे शिवजी से दान में मांग लिया और बाद में उनके पुत्र कुबेर यहाँ के पहले राजा बने। उस समय इसे 'रत्नद्वीप' कहा जाता था, जहाँ देवताओं जैसा ऐश्वर्य और सुख-सुविधाएं विद्यमान थीं।
त्रेतायुग में रावण का शासन और विज्ञान का शिखर श्रीलंका के इतिहास का सबसे चर्चित और प्रभावशाली काल त्रेतायुग है। कुबेर के सौतेले भाई कैकसी पुत्र रावण ने अपनी कठोर तपस्या के बल पर ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया और कुबेर को विस्थापित कर लंका का अधिपति बन बैठा।
रावण को केवल एक योद्धा के रूप में देखना उसके व्यक्तित्व के साथ अन्याय होगा। वह अपने समय का सबसे बड़ा वैज्ञानिक और विद्वान था। दशानन का रहस्य: उसे 'दशानन' (दस सिर वाला) इसलिए कहा जाता था क्योंकि उसे चारों वेदों और छह शास्त्रों का पूर्ण ज्ञान था। विमान शास्त्र: रावण के पास 'पुष्पक विमान' था। आधुनिक शोधकर्ता इसे 'एयरोडायनामिक्स' का प्राचीन प्रमाण मानते हैं। श्रीलंका के 'वारियापोला' और 'गुरुलोपोथा' जैसे स्थानों को आज भी रावण के विमानों के लैंडिंग पैड के रूप में जाना जाता है। आयुर्वेद और खगोल विज्ञान: उसने 'अर्क प्रकाश' नामक पुस्तक लिखी, जिसमें 'डिस्टिलेशन' की प्रक्रिया का वर्णन है। उसकी 'रावण संहिता' आज भी ज्योतिष शास्त्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ  है। श्रीलंका के माताले जिले में स्थित 'सिगिरिया' की चट्टान प्राचीन इंजीनियरिंग का एक ऐसा चमत्कार है, जिसे अक्सर रावण के काल से जोड़कर देखा जाता है। शिखर पर नगर नियोजन: 600 फीट ऊंची खड़ी चट्टान के ऊपर एक पूरा शहर बसाया गया था। इतने भारी पत्थरों को उस ऊंचाई तक ले जाना आज भी इंजीनियरों के लिए शोध का विषय है। हाइड्रोलिक सिस्टम: यहाँ के बगीचों में ऐसे फव्वारे हैं, जो बिना किसी बिजली या मोटर के, केवल गुरुत्वाकर्षण और जल-दबाव (Pressure) के सिद्धांत पर चलते हैं। दर्पण दीवार को इतना पॉलिश किया गया था कि राजा इसमें अपना प्रतिबिंब देख सकता था। सदियों बाद भी इसकी चमक बरकरार है । आस्था की गवाही देते स्थान आज भी श्रीलंका में कई ऐसे स्थान हैं जो रामायण की घटनाओं को जीवंत करते हैं: अशोक वाटिका (सीता एलिया): यहाँ के सीता अम्मन मंदिर के पास चट्टानों पर विशाल पैरों के निशान मिलते हैं, जिन्हें हनुमान जी का माना जाता है। एला स्थान 'रावण गुफा' और 'रावण जलप्रपात' के लिए प्रसिद्ध है। माना जाता है कि यहाँ सुरंगों का एक जटिल जाल है। रामसेतु: नासाकी सैटेलाइट तस्वीरों में मन्नार की खाड़ी में दिखने वाली चट्टानें आज भी उस महान वानर सेना के पुरुषार्थ की याद दिलाता है। द्वापर युग के बाद, कलियुग के प्रारंभ में श्रीलंका ने एक नया मोड़ लिया। राजकुमार विजय (543 ईसा पूर्व): उत्तर भारत के राजकुमार विजय ने यहाँ 'सिंहल वंश' की स्थापना की।सम्राट अशोक का प्रभाव: राजा देवानम्पिया तिस्सा के काल में सम्राट अशोक के पुत्र महिंदा और पुत्री संघमित्रा यहाँ बौद्ध धर्म और पवित्र 'बोधि वृक्ष' की शाखा लेकर आए। इसके बाद श्रीलंका बौद्ध संस्कृति और शिक्षा का विश्व केंद्र बन गया। अनुराधापुरा और पोलोन्नारुवा: ये प्राचीन राजधानियां अपनी विशाल मूर्तिकला और जलाशयों के लिए जानी जाती हैं। कैंडी (Kandy) श्रीलंका का अंतिम स्वतंत्र राज्य थाश्रीलंका को 'पूर्व का मोती' उसकी बेमिसाल खूबसूरती के कारण कहा जाता है। सीलोन टी: नुवारा एलिया की धुंध भरी पहाड़ियाँ दुनिया की बेहतरीन चाय का उत्पादन करती हैं।  याला नेशनल पार्क में तेंदुओं की दहाड़ है, तो मिरिसा के नीले तटों पर व्हेल मछलियों का नृत्य। यहाँ के मसाले, विशेषकर दालचीनी, सदियों से वैश्विक व्यापार का आधार रहे हैं। आधुनिक श्रीलंका: संघर्ष और पुनर्निर्माण 1948 में ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता मिलने के बाद श्रीलंका ने शिक्षा और स्वास्थ्य में दक्षिण एशिया में बेहतरीन प्रदर्शन किया। हालांकि, 26 साल तक चले गृहयुद्ध (2009 में समाप्त) ने देश की अर्थव्यवस्था को गहरी चोट पहुँचाई।
वर्तमान में, श्रीलंका अपनी आर्थिक चुनौतियों से जूझते हुए अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौट रहा है। राजधानी श्री जयवर्धनेपुरा कोट्टे और वित्तीय केंद्र कोलंबो आधुनिक गगनचुंबी इमारतों और औपनिवेशिक वास्तुकला का मिश है ।श्रीलंका केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं है, यह एक 'अनुभूति' है। इसकी हवा में मसालों की खुशबू है, मंदिरों में बुद्ध की शांति है, और पहाड़ियों में रामायण की गूँज है। रावण की वैज्ञानिक दृष्टि और सिगिरिया की वास्तुकला यह सिद्ध करती है कि प्राचीन काल में यह द्वीप ज्ञान और तकनीक का वैश्विक केंद्र था।
स्वर्ण लंका की वह चमक आज भी इसके खंडहरों, इसकी संस्कृति और इसके लोगों की चिर-परिचित मुस्कान में सुरक्षित है। चाहे आप इतिहास प्रेमी हों या आध्यात्मिक खोजी, श्रीलंका का हर कोना आपसे कुछ कहता है—एक गौरवशाली अतीत और एक संघर्षशील लेकिन उज्ज्वल भविष्य की कहान