माजुली की आध्यात्मिक और शिल्प विरासत
यह आलेख ब्रह्मपुत्र नदी में स्थित विश्व के सबसे बड़े नदी द्वीप माजुली की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और शिल्प परंपराओं को विस्तार से प्रस्तुत करता है। नव-वैष्णव आंदोलन, सत्र संस्कृति, मुखौटा कला, टेराकोटा शिल्प और प्राकृतिक जैव विविधता के साथ-साथ, इसमें माजुली के सामने खड़े भू-कटाव के गंभीर संकट को भी रेखांकित किया गया है। नव-वैष्णव परंपरा का जीवंत केंद्र माजुली , सत्र संस्कृति और एकशरण नामधर्म की धरोहर , मुखौटा कला और रास लीला की अनूठी पहचान , भू-कटाव के साए में सांस्कृतिक अस्तित्व का संघर्ष है।
महाबाहु की गोद में एक सांस्कृतिक रत्न असम के हृदय स्थल में, जहाँ ब्रह्मपुत्र की विशाल धाराएँ अपनी प्रचंडता और उदारता के साथ बहती हैं, वहाँ दुनिया का सबसे बड़ा नदी द्वीप ‘माजुली’ स्थित है। यह केवल भूमि का एक टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह असमिया सभ्यता, आध्यात्मिकता और कला का वह केंद्र है, जिसने सदियों से अपनी मौलिकता को संजोकर रखा है। 2016 में भारत का पहला द्वीप जिला बनने का गौरव प्राप्त करने वाला माजुली, आज अपनी भौगोलिक विशिष्टता और नव-वैष्णव संस्कृति के कारण वैश्विक मानचित्र पर चमक रहा है। नव-वैष्णववाद का उद्गम और ‘एकशरण नामधर्म’ माजुली की पहचान को समझने के लिए 15वीं-16वीं शताब्दी के महान संत, समाज सुधारक और कला मनीषी श्रीमंत शंकरदेव के योगदान को समझना अनिवार्य है। उन्होंने असम की धरती पर ‘एकशरण नामधर्म’ की नींव रखी। उस काल में, जब समाज जटिल कर्मकांडों में उलझा था, शंकरदेव ने सामूहिक कीर्तन और समर्पण के माध्यम से भगवान कृष्ण की भक्ति का एक सरल मार्ग दिखाया। माजुली इस आंदोलन का मुख्य केंद्र बना। यहाँ ‘सत्र’ (मठों) की स्थापना की गई, जो केवल धार्मिक स्थान नहीं, बल्कि ज्ञान और कला के विश्वविद्यालय बन गए। शंकरदेव ने बेल का पेड़ लगाकर यहाँ पहले सत्र ‘बेलगुरी’ की स्थापना की थी। आज भी माजुली में 22 प्रमुख सत्र सक्रिय हैं, जो मानवता और शांति का संदेश दे रहे हैं। माजुली के सत्र अपनी विशिष्ट वास्तुकला के लिए जाने जाते हैं। एक आदर्श सत्र परिसर चार मुख्य इकाइयों में विभाजित होता है: बटकोरा: यह सत्र का प्रवेश द्वार है, जो सादगी और स्वागत का प्रतीक है। नामघर (कीर्तन-घर): यह सत्र का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह एक विशाल प्रार्थना कक्ष होता है जहाँ भक्त सामूहिक भजन करते हैं। इसका उपयोग सामुदायिक बैठकों और सांस्कृतिक प्रदर्शनों के लिए भी होता है। मणिकूट: इसे ‘रत्न घर’ भी कहा जाता है, जो सत्र का गर्भगृह होता है जहाँ पवित्र पांडुलिपियाँ या मूर्तियाँ रखी जाती हैं। हाटी नामघर के चारों ओर भक्तों (भक्तों) के निवास के लिए बनी कतारबद्ध झोपड़ियाँ या घर है। सत्रों की व्यवस्था भी अत्यंत अनुशासित होती है। इसके प्रमुख को ‘सत्राधिकार’ कहा जाता है। यहाँ भक्तों के बीच काम का बँवारा होता है—जैसे भागवती (शास्त्रों का वाचक), गायन-बायन (गायक और वादक), और खनिकर (कलाकार)। यहाँ दो प्रकार के सत्र होते हैं—’उदासीन सत्र’ जहाँ भक्त ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं और ‘गृहस्थी सत्र’ जहाँ परिवार के साथ रहने की अनुमति होती है। विश्व प्रसिद्ध रास लीला और मुखौटा कला में माजुली का सबसे बड़ा आकर्षण यहाँ की कृष्ण रास लीला है। पूरे भारत में माजुली ही वह स्थान है जहाँ रास लीला केवल पेशेवर कलाकारों द्वारा नहीं, बल्कि स्थानीय भक्तों द्वारा एक साधना के रूप में मनाई जाती है। नवंबर के महीने में पूरा द्वीप कृष्णमय हो जाता है। इस रास लीला को जीवंत बनाने में ‘समागुरी सत्र’ की मुखौटा कला का बहुत बड़ा हाथ है। यहाँ के कलाकार बांस, मिट्टी और गोबर का उपयोग करके अद्भुत मुखौटे बनाते हैं। रावण, बकासुर और हनुमान जैसे पात्र इन मुखौटों को पहनकर जब मंच पर आते हैं, तो दर्शक उस पौराणिक काल में पहुँच जाते हैं। यह कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत के रूप में सँभाली जा रही है।
सलमारा की टेराकोटा परंपरा: बिना चाक की मिट्टी कला माजुली की सांस्कृतिक विरासत का एक और अनमोल रत्न सलमारा गाँव है। यहाँ का टेराकोटा शिल्प अपनी तरह का अनोखा है। आमतौर पर कुम्हार चाक का उपयोग करते हैं, लेकिन सलमारा के कलाकार हाथों की निपुणता से मिट्टी को आकार देते हैं। मिट्टी इकट्ठा करने (खानी-दिया) से लेकर उसे पकाने (पेघाली दिया) तक की प्रक्रिया में पूरा परिवार शामिल होता है। महिलाएँ विशेष रूप से बर्तनों को आकार देने में दक्ष होती हैं। ये कलाकार न केवल बर्तन बनाते हैं, बल्कि कुशल नाव निर्माता भी होते हैं। इनके द्वारा बनाए गए मिट्टी के पात्र आज भी असमिया रसोई और सत्रों की शुद्धता का हिस्सा है।
माजुली विभिन्न समुदायों का एक सुंदर गुलदस्ता है। यहाँ मिशिंग, देवरी और सोनोवाल कचारी जैसे आदिवासी समुदाय सदियों से निवास कर रहे हैं। विशेष रूप से मिशिंग समुदाय की महिलाओं द्वारा की जाने वाली बुनाई पूरे भारत में प्रसिद्ध है। उनके द्वारा बनाए गए ‘मिरी जि़म’ और रंगीन कपड़े अपनी सूक्ष्म कलाकारी के लिए जाने जाते हैं। माजुली की आबादी लगभग 1.5 लाख है, जहाँ 144 गाँवों में लोग प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर रहते हैं।प्रकृति प्रेमियों के लिए माजुली किसी जन्नत से कम नहीं है। यहाँ पक्षियों की लगभग 260 प्रजातियां पाई जाती हैं। सर्दियों के मौसम में यहाँ साइबेरिया और अन्य ठंडे प्रदेशों से प्रवासी पक्षी आते हैं। ग्रे पेलिकन, सफेद गर्दन वाले सारस और बड़ी जलमुर्गियों का कलरव द्वीप के शांत वातावरण में संगीत भर देता है। यहाँ की आर्द्रभूमियाँ (बीलें) पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
माजुली की खूबसूरती के बीच एक कड़वा सच यहाँ का निरंतर होने वाला भू-कटाव है। 20वीं शताब्दी के आरंभ में यह द्वीप 1255 वर्ग किलोमीटर का था, जो अब घटकर मात्र 352 वर्ग किलोमीटर रह गया है। ब्रह्मपुत्र की लहरें हर साल इस सांस्कृतिक धरोहर का एक हिस्सा निगल रही हैं। यह न केवल जमीन का नुकसान है, बल्कि उस पर बसी सदियों पुरानी परंपराओं के मिटने का खतरा भी है। माजुली केवल असम की नहीं, बल्कि पूरी मानवता की अमूर्त विरासत (Intangible Heritage) है।
यहाँ का अध्यात्म, यहाँ के सत्र, सलमारा की मिट्टी की खुशबू और मुखौटों के पीछे छिपी कला, यह सब हमें जड़ों की ओर लौटने का संदेश देते हैं। माजुली की यात्रा केवल एक पर्यटन नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि का एक अनुभव है। हमें इस द्वीप को न केवल भौगोलिक रूप से बचाने की आवश्यकता है, बल्कि इसकी सांस्कृतिक लौ को भी प्रज्वलित रखना होगा। माजुली पहुँचने के लिए सबसे नज़दीकी शहर जोरहाट है। जोरहाट के निमातीघाट से प्रतिदिन फेरी (नाव) सेवाएँ उपलब्ध हैं, जो ब्रह्मपुत्र के विशाल पाट को पार कर आपको इस आध्यात्मिक द्वीप तक पहुँचाती हैं।
यह आलेख ब्रह्मपुत्र नदी में स्थित विश्व के सबसे बड़े नदी द्वीप माजुली की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और शिल्प परंपराओं को विस्तार से प्रस्तुत करता है। नव-वैष्णव आंदोलन, सत्र संस्कृति, मुखौटा कला, टेराकोटा शिल्प और प्राकृतिक जैव विविधता के साथ-साथ, इसमें माजुली के सामने खड़े भू-कटाव के गंभीर संकट को भी रेखांकित किया गया है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें