मदु गंगा के मैंग्रोव गलियारों में साहित्य की नाव: मेरी श्रीलंका डायरी
सत्येन्द्र कुमार पाठक
श्रीलंका, जिसे हिंद महासागर का मोती कहा जाता है, अपनी गोद में न जाने कितने रहस्य और सुंदरता समेटे हुए है। लेकिन 9 जनवरी 2026 की उस सुबह ने मेरे लिए प्रकृति के एक नए और जादुई अध्याय को खोला। अवसर था पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी के तत्वावधान में आयोजित एक साहित्यिक यात्रा का, जिसमें कलम और संवेदना के धनी साहित्यकारों का समागम था।
कोलंबो एयरपोर्ट से बेंटोटा: एक नई सुबह की आहट - यात्रा की शुरुआत कोलंबो हवाई अड्डे से हुई। वहाँ की नमी भरी हवा में एक अजीब सा अपनापन था। बस द्वारा जब हम बेंटोटा के लिए निकले, तो मेरे साथ स्वर्णिम कला केंद्र की अध्यक्षा और प्रख्यात कवयित्री डॉ. उषाकिरण श्रीवास्तव, डॉ. संगीता सागर और हिमाचल प्रदेश तथा महाराष्ट्र के लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार उपस्थित थे। बस की खिड़की से बाहर भागते नारियल के पेड़ों और समुद्र की लहरों ने जैसे हमारे साहित्यिक संवादों के लिए एक पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी। कोलंबो से करीब 80 किलोमीटर दक्षिण में स्थित 'बालापिटिया' हमारा गंतव्य था, जहाँ 'मदु गंगा' अपने शांत जल के साथ हमारा इंतज़ार कर रही थी। प्रकृति का 'ग्रीन कैथेड्रल' - मदु गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि श्रीलंका के गाले जिले का गौरव है। यह उराग स्मन हंडिया के पास से निकलती है और अपनी छोटी सी यात्रा में एक विशाल लैगून का रूप ले लेती है। जैसे ही हम नाव पर सवार हुए, मैंग्रोव वनों की सघनता ने हमें चारों ओर से घेर लिया। यहाँ के मैंग्रोव वन किसी 'ग्रीन कैथेड्रल' (हरित गिरजाघर) की तरह प्रतीत होते हैं, जहाँ सूरज की किरणें भी पत्तों से छनकर आती हैं।
नाव सफारी के दौरान मेरा रूबरू होना यहाँ की उस जैव विविधता से हुआ, जिसे दुनिया 'रामसर आर्द्रभूमि' के रूप में जानती है। पानी की सतह पर तैरते पक्षी और किनारे पर धूप सेंकते सरीसृप यह बता रहे थे कि यहाँ 95 प्रजातियों के पौधे और 248 कशेरुकी जीव एक अद्भुत सामंजस्य में रहते हैं। साहित्यकारों की टिप्पणियों ने उन दृश्यों को काव्यमयी बना दिया। उन्होंने कहा कि "प्रकृति की ये जड़ें हमें सिखाती हैं कि अस्तित्व को बचाए रखने के लिए कितनी गहराई तक मिट्टी और पानी को पकड़ना पड़ता है।"
दालचीनी द्वीप: जहाँ हवा में स्वाद घुल जाता है । यात्रा का सबसे सुगंधित पड़ाव था 'दालचीनी द्वीप' । मदु गंगा के पेट में बसे करीब 25-28 द्वीपों में से यह सबसे प्रमुख है। द्वीप पर उतरते ही दालचीनी की तीखी और मीठी खुशबू ने हमारा स्वागत किया। यहाँ हमने देखा कि कैसे स्थानीय निवासी पीढ़ियों से चली आ रही विधि से दालचीनी की छाल निकालते हैं।।व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए वह क्षण अविस्मरणीय था जब हमने वहाँ की पारंपरिक दालचीनी की चाय का स्वाद लिया। नारियल के पानी और ताजे पाइन (Pine) के साथ वह चाय एक उत्सव की तरह थी। स्मृति के तौर पर हमने वहाँ से लंकाई 2000 रुपये में शुद्ध दालचीनी, बारीक चूर्ण और उसका अर्क (Extract) खरीदा। वह खरीदारी मात्र एक सौदा नहीं, बल्कि उस द्वीप के श्रमजीवियों के प्रति एक सम्मान था।
आस्था, इतिहास और मिलन का संगम मदु नदी के बीचों-बीच स्थित कोठदुवा मंदिर (Kothduwa Temple) हमारी आध्यात्मिक जिज्ञासा का केंद्र बना। द्वीप पर स्थित यह बौद्ध मंदिर शांति का पर्याय है। यहाँ के ऐतिहासिक महत्व को जानकर हम चकित रह गए—अमरपुरा निकया संप्रदाय का पहला दीक्षा समारोह यहीं हुआ था। जब हमारी नाव उस बिंदु पर पहुँची जहाँ मदु गंगा अपना अस्तित्व हिंद महासागर को समर्पित कर देती है, तो वह दृश्य अलौकिक था।मैंने इसे मानवता के वैश्विक संबंधों से जोड़ते हुए कहा कि "साहित्य भी इसी मिलन बिंदु की तरह है जहाँ विभिन्न संस्कृतियाँ एक होकर प्रेम के महासागर में गिरती हैं।" मीठे और खारे पानी का वह मिलन स्थल जीवन के द्वंद्व और शांति का प्रतीक जान पड़ा।
जल झोपड़ियाँ और मशगूल मन में वृक्षों और बांसों की बनी जल झोपड़ियाँ पर्यटकों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं हैं। उन झोपड़ियों में बैठकर जब हमने प्रकृति को निहारा, तो समय जैसे ठहर गया। बिहार , हिमाचल और महाराष्ट्र से आए साहित्यकारों ने जब अपनी क्षेत्रीय संस्कृतियों के साथ मदु गंगा की विहार , तुलना की, तो लगा कि प्रकृति पूरी दुनिया को एक ही सूत्र में पिरोती है। मछलियों के साथ रूबरू होना और जल-जीवन को इतने करीब से देखना एक ऐसी अनुभूति थी जो महानगरों की सीमेंट की दुनिया में दुर्लभ है। एक अमिट छाप 9 जनवरी 2026 की शाम जब हम वापस लौटे, तो हमारे मन-मस्तिष्क में मदु गंगा की लहरें हिलोरे ले रही थीं। यह यात्रा केवल घूमने-फिरने की नहीं थी, बल्कि यह सत्येन्द्र कुमार पाठक की नजरों में प्रकृति, साहित्य और संस्कृति का एक त्रिकोणीय संगम थी। 2000 रुपये की दालचीनी और अर्क तो बस एक प्रतीक थे, असली कमाई वह मानसिक ऊर्जा थी जो हमें उस 'मैंग्रोव मैजिक' से मिली। श्रीलंका की मदु नदी आज भी मेरे भीतर कल-कल कर रही है। वह नारियल पानी का स्वाद, दालचीनी की खुशबू और बुद्ध की शांत प्रतिमा—यह सब अब मेरी स्मृतियों का हिस्सा हैं, जो आने वाले कई वर्षों तक मेरी कलम को स्याही प्रदान करती रहेंगी।
प्रमुख आकर्षणों की एक झलक में बोट सफारी, कोठदुवा बुद्ध मंदिर, मैंग्रोव टनल। ,खरीदें: शुद्ध दालचीनी, दालचीनी का तेल और अर्क , : 2003 में रामसर साइट के रूप में नामित, जैव विविधता का खजाना।साहित्यिक संगम है।
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