सत्येन्द्र कुमार पाठक
जून का महीना था और सूरज देवता अपने पूरे तेवर में थे। स्कूलों में गर्मी की छुट्टी हो चुकी थी। ८ वर्ष का डुग्गू, ६ वर्ष का पुच्चू और उनकी छोटी बहन ५ वर्ष की पीहू, तीनों शहर की भागदौड़ से दूर अपने गांव ‘हरीपुर’ आए थे। उनके लिए गांव का मतलब था—मम्मी-पापा के साथ ढेर सारी मस्ती और दादाजी का वह पुराना, हवादार और बड़ा सा दालान। दादाजी का दालान कोई साधारण जगह नहीं थी। वहाँ ठंडी-ठंडी हवा चलती थी, मिट्टी की सोंधी खुशबू आती थी और सबसे बढ़कर, वहाँ दादाजी की ज्ञान की पोटली खुलती थी।
एक सुबह, दालान में पीपल और बरगद के विशाल पेड़ों की ठंडी छांव बिखरी हुई थी। तभी अचानक कहीं से जोर-जोर से कांव-कांव की आवाज आने लगी। पीहू ने चिढ़कर अपने कान बंद कर लिए, "धत्तरे की! यह कौवा कितना गंदा गाता है। मुझे यह बिल्कुल पसंद नहीं।"
पास ही बैठे दादाजी मुस्कुराए और पीहू को अपनी गोद में बिठाते हुए बोले, "अरे छोटी बिटिया, ऐसा नहीं कहते। भले ही कौवे की आवाज सुरीली नहीं होती, लेकिन वह हमारा बहुत अच्छा दोस्त है। वह हमारे आसपास की गंदगी साफ करता है। और जानते हो, वह बहुत बुद्धिमान और मिलनसार भी होता है।"
"सच में दादाजी?" डुग्गू और पुच्चू भी अपनी कॉमिक्स छोड़कर पास आ गए।
"हाँ बच्चों! और जरा सामने देखो, उस शीशम की डाल पर कौन बैठा है?" दादाजी ने इशारा किया।
वहाँ एक हरे रंग का तोता और एक भूरे रंग की मैना आपस में गुटरगू कर रहे थे। कुछ ही दूरी पर एक सुंदर मोर अपने पंख समेटे खड़ा था। मम्मी रसोई से ठंडे-ठंडे आम और अमरूद काटकर लाईं। पापा ने कहा, "बच्चों, यह देखो, यह फल हमारे बगीचे के हैं। इस गर्मी में पेड़ हमें मीठे फल भी देते हैं और ठंडी हवा भी।" पुच्चू ने अमरूद का टुकड़ा मुंह में डालते हुए पूछा, "पापा, क्या पेड़ सिर्फ फल देते हैं?" पापा ने समझाया, "नहीं पुच्चू, ये जो पीपल, बरगद और शीशम के पेड़ हैं, ये हमें ऑक्सीजन देते हैं जिससे हम सांस लेते हैं। और वह देखो, दूर जो महुआ के पेड़ हैं, उनके फूलों से दवाइयां और स्वादिष्ट पकवान बनते हैं।"
दोपहर ढलने लगी तो दादाजी ने कहा, "चलो बच्चों, आज तुम्हें गाँव की असली पाठशाला ले चलते हैं—प्रकृति की पाठशाला!"पापा ने गाड़ी तैयार की और सब घूमने निकले। थोड़ी दूर जाने पर उन्हें ऊंचे-ऊंचे पर्वत दिखाई दिए। पर्वत इतने ऊंचे थे मानो आसमान को छू रहे हों। पर्वतों के बीच से एक कलकल करती नदी बह रही थी।
डुग्गू ने पूछा, "दादाजी, यह नदी कहाँ से आती है?" दादाजी ने बताया, "डुग्गू, ये नदियाँ इन ऊंचे पर्वतों पर जमी बर्फ के पिघलने से बनती हैं। नदी का पानी मीठा होता है, जो खेतों की प्यास बुझाता है और हमें पीने का पानी देता है।" नदी के किनारे हरी-भरी घास चर रही गाय, मजबूत बैल और पानी में आनंद लेती भैंस दिखाई दीं। वहीं पास में एक सफेद घोड़ा शान से दौड़ रहा था। दादाजी ने बच्चों को बताया, "यह गाय हमें पौष्टिक दूध देती है। बैल खेतों में किसान की मदद करते हैं और भैंस भी दूध देती है। ये सब हमारे वफादार साथी हैं।"
तभी दालान का रखवाला, उनका पालतू कुत्ता 'शेरू' भी दौड़ता हुआ वहाँ आ गया और अपनी पूंछ हिलाने लगा। पीहू ने उसे प्यार से सहलाया।
शाम होने को आई थी। सूरज की किरणें अब हल्की और सुनहरी हो गई थीं। पापा उन्हें नदी के पास ही बने एक बड़े से सरोवर (तालाब) के पास ले गए।।सरोवर का जल बिल्कुल साफ और शांत था। पानी में रंग-बिरंगी मछली तैर रही थीं। पीहू पानी में मछलियों को देखकर ताली बजाने लगी। तभी पुच्चू चिल्लाया, "देखो-देखो, पानी पर नाव जैसी कोई चीज तैर रही है!"
मम्मी ने हंसते हुए कहा, "पुच्चू, वह नाव नहीं, हंस है।" शान से तैरते हुए सफेद हंसों का जोड़ा बेहद खूबसूरत लग रहा था। दादाजी ने इस मौके पर बच्चों को एक बहुत बड़ी सीख दी। उन्होंने कहा, "बच्चों, हंस की एक बहुत बड़ी खासियत होती है। इसे 'नीर-क्षीर विवेक' कहते हैं। अगर हंस के सामने दूध और पानी मिलाकर रख दिया जाए, तो वह सिर्फ दूध पी लेता है और पानी छोड़ देता है।" "इसका क्या मतलब हुआ दादाजी?" डुग्गू ने उत्सुकता से पूछा। "इसका मतलब है मेरे बच्चे," दादाजी ने प्यार से डुग्गू का सिर थपथपाते हुए कहा, "कि इस दुनिया में अच्छी बातें भी हैं और बुरी बातें भी। हमें इस हंस की तरह बनना चाहिए—हमेशा अच्छी बातों (दूध) को अपनाना चाहिए और बुरी बातों (पानी) को छोड़ देना चाहिए।"
घर वापसी और ज्ञान का उपहार
रात होने लगी थी। आसमान में तारे टिमटिमाने लगे थे। सब लोग वापस दादाजी के दालान में आ गए। ठंडी हवा चल रही थी और आसमान में चाँद मुस्कुरा रहा था। मम्मी ने सबको खाने के बाद मीठा-मीठा पपीता काटकर दिया। पीहू, डुग्गू और पुच्चू आज बहुत खुश थे। उन्होंने आज किताबों वाली पाठशाला से अलग, प्रकृति की सजीव पाठशाला में बहुत कुछ सीखा था। डुग्गू बोला, "दादाजी, आज मुझे समझ आया कि यह पूरी प्रकृति—ये पर्वत, नदी, सरोवर, पशु-पक्षी और पेड़-पौधे—सब आपस में जुड़े हैं। अगर ये नहीं होंगे, तो हम भी नहीं बचेंगे।"
पुच्चू ने कहा, "और मैं अब से कभी किसी जानवर को तंग नहीं करूँगा और हर साल एक पेड़ जरूर लगाऊँगा।"
छोटी पीहू ने हंसते हुए कहा, "और मैं कल सुबह उठकर सबसे पहले कौवे भैया को रोटी दूँगी और तोते-मैना के लिए दालान में पानी रखूँगी।" दादाजी, मम्मी और पापा बच्चों की यह समझदारी देखकर बेहद खुश हुए। दादाजी ने तीनों को गले से लगा लिया। इस तरह गर्मी की वह छुट्टी सिर्फ खेल-कूद की नहीं, बल्कि ज्ञान और संस्कार की एक अनोखी छुट्टी बन गई।
सीख - प्रकृति की हर रचना—चाहे वह छोटा सा कौवा हो, विशाल बरगद का पेड़ हो, या बहती हुई नदी—सबका हमारे जीवन में बहुत महत्व है। हमें पर्यावरण की रक्षा करनी चाहिए और हमेशा हंस की तरह केवल अच्छाइयों को ग्रहण करना चाहिए।
धूप, गर्मी और 'लू' के सबक
सत्येन्द्र कुमार पाठक
हरीपुर गाँव का वही बड़ा और हवादार दालान आज भी ठंडा था, लेकिन बाहर का नजारा बदला हुआ था। दोपहर के बारह बज रहे थे और सूरज देवता आसमान से जैसे आग बरसा रहे थे। चारों तरफ सन्नाटा था। न तो कोई पक्षी चहक रहा था और न ही कोई बाहर दिख रहा था।
८ वर्ष का डुग्गू, ६ वर्ष का पुच्चू और ५ वर्ष की पीहू दालान में बैठे-बैठे बोर हो रहे थे। डुग्गू ने बाहर झांकते हुए कहा, "यार, चलो न बाहर आम के पेड़ के पास छुपन-छुपाई खेलते हैं!"
पुच्चू भी तैयार हो गया, "हाँ, यहाँ बैठे-बैठे तो पैर दुखने लगे हैं।"।दोनों जैसे ही दालान से बाहर निकलने लगे, तभी रसोई से हाथ में आम का पन्ना (शरबत) लिए मम्मी बाहर आईं। बच्चों को बाहर जाते देख वे चौंककर बोलीं, "रुको बच्चों! इतनी कड़कती धूप में बाहर बिल्कुल नहीं जाना है। बाहर बहुत तेज और गर्म हवा चल रही है, जिसे 'लू' कहते हैं। इस मौसम में दोपहर को बाहर निकलने से तबीयत खराब हो सकती है।"
पीहू ने अपनी मासूम आवाज में पूछा, "मम्मी, यह 'लू' क्या होती है? क्या यह कोई भूत है?"
तभी पास ही आराम कुर्सी पर बैठे दादाजी जोर से मुस्कुराए और बोले, "नहीं पीहू बिटिया! लू कोई भूत नहीं है। जब जून के महीने में सूरज की किरणें बहुत सीधी और तेज पड़ती हैं, तो हवा बहुत गर्म और सूखी हो जाती है। इसी गर्म और थपेड़ेदार हवा को 'लू' कहते हैं। अगर हम इस धूप और लू के संपर्क में आ जाएं, तो हमारे शरीर का पानी सूख जाता है, चक्कर आने लगते हैं और तेज बुखार भी हो सकता है, जिसे 'सनस्ट्रोक' या 'लू लगना' कहते हैं।"
पापा ने सभी बच्चों को पास बुलाया और मम्मी के हाथ से आम के पन्ने के गिलास लेकर बच्चों को दिए। पापा बोले, "इस मौसम में धूप और लू से बचने के लिए यह कच्चे आम का पन्ना, छाछ और नींबू पानी सबसे अच्छे हथियार हैं। यह हमारे शरीर को अंदर से ठंडा रखते हैं।"डुग्गू ने आम का पन्ना पीते हुए कहा, "वाह दादाजी! यह तो बहुत स्वादिष्ट है। पर दादाजी, हम इंसान तो घर के अंदर छिपकर लू से बच जाते हैं, लेकिन हमारी प्रकृति की पाठशाला के बाकी साथी—जैसे वे पक्षी, गाय, और हमारे शेरू भैया, वे इस भयंकर गर्मी और लू से कैसे बचते होंगे?"
दादाजी बच्चों की इस संवेदनशीलता से बेहद खुश हुए। उन्होंने दालान की खिड़की से बाहर इशारा करते हुए कहा, "देखो बच्चों, प्रकृति ने सबको अपनी रक्षा करना सिखाया है। दोपहर के समय सारे पशु-पक्षी घने पेड़ों की छांव में दुबक जाते हैं। वे इंसानों की तरह बेवजह धूप में नहीं घूमते। लेकिन, इस कड़कती धूप में उनके लिए सबसे बड़ी समस्या पानी की होती है।"
तभी पुच्चू को अपनी पिछली सीख याद आई। वह उछलकर बोला, "दादाजी! पिछली बार हमने सीखा था कि हमें हमेशा हंस की तरह अच्छी बातें अपनानी चाहिए। तो क्या हम इस गर्मी में अपने इन मूक दोस्तों के लिए कुछ अच्छा नहीं कर सकते?"
"बिल्कुल कर सकते हैं!" पापा ने गर्व से कहा।
पापा और बच्चों ने मिलकर तुरंत एक योजना बनाई। पापा घर के अंदर से मिट्टी के कुछ बड़े-बड़े कटोरे (सकोरे) ले आए। डुग्गू और पुच्चू ने उन कटोरों में साफ और ठंडा पानी भरा। पीहू ने उसमें थोड़े से चावल के दाने डाल दिए। फिर दादाजी की देखरेख में, उन्होंने उन कटोरों को दालान के बाहर, पेड़ों की घनी छांव में और दीवार के कोनों पर सुरक्षित रख दिया, जहाँ धूप न पहुँचती हो। पानी रखने के कुछ ही देर बाद, एक प्यासा कौवा उड़ता हुआ आया। उसने पहले चारों तरफ देखा, फिर मजे से सकोरे से पानी पीने लगा। पानी पीकर उसने अपनी चोंच को पानी में डुबोया और पंख फड़फड़ाकर अपनी गर्मी शांत की। उसे देखकर तोते और मैना का जोड़ा भी वहाँ आ गया।
यह देखकर पीहू ताली बजाकर नाचने लगी, "देखो-देखो! कौवे भैया की गर्मी भाग गई!"
शाम को जब सूरज की तपिश कम हुई और ठंडी हवा चलने लगी, तब दादाजी ने बच्चों को गले लगाते हुए कहा, "बच्चों, आज तुम सबने प्रकृति की पाठशाला का एक और बड़ा अध्याय सीख लिया। तेज धूप और गर्मी हमें सहनशीलता सिखाती है, और इस मौसम में दूसरों की प्यास बुझाना सबसे बड़ा पुण्य का काम है।"
डुग्गू, पुच्चू और पीहू ने मिलकर कसम खाई कि वे पूरी गर्मी में हर रोज सुबह-शाम इन सकोरों में पानी बदलेंगे। इस तरह, उन्होंने न सिर्फ खुद को लू से बचाया, बल्कि प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्य को भी बखूबी निभाया।
सीख: भीषण गर्मी और लू के दिनों में हमें खुद को सुरक्षित रखने के साथ-साथ बेजुबान पशु-पक्षियों के दाने-पानी का भी ध्यान रखना चाहिए। प्रकृति की रक्षा में ही हमारी सुरक्षा है।
बाल साहित्य: सतरंगी बचपन
"किसी समाज की सबसे बड़ी पूँजी उसके बच्चे होते हैं, और उन बच्चों के मानसिक व नैतिक विकास की सबसे मजबूत आधारशिला बाल साहित्य है।" बाल साहित्य केवल मनोरंजन या अक्षरों का जमावड़ा नहीं है, बल्कि यह वह मार्गदर्शक है जो किसी बच्चे को पहली बार दुनिया की जटिलताओं, मानवीय मूल्यों, विज्ञान के चमत्कारों और अपनी संस्कृति से बेहद सरल और रोचक तरीके से परिचित कराता है। यह वह साहित्य है जो बच्चों के मानसिक स्तर, उनकी असीम रुचि, अकल्पनीय कल्पनाशीलता और बाल मनोविज्ञान को केंद्र में रखकर रचा जाता है। इसका मूल उद्देश्य बालकों का स्वस्थ मनोरंजन करने के साथ-साथ उनमें नैतिक मूल्य, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और जीवन-कौशल विकसित करना होता है।
बाल साहित्य की परंपरा उतनी ही प्राचीन है जितनी कि इंसानी सभ्यता। समय के साथ इसके स्वरूप में बड़े बदलाव आए हैं, जिन्हें हम दो मुख्य चरणों में देख सकते हैं। प्रारंभ में बाल साहित्य का प्रसार लिखित रूप में न होकर मौखिक रूप में हुआ। यह दादी-नानी की कहानियों, रात्रिकालीन लोरियों और स्थानीय लोकगीतों के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता रहा। भारत की समृद्ध परंपरा में 'पंचतंत्र', 'हितोपदेश' और 'जातक कथाएं' इसी मौखिक और लोक परंपरा की अनमोल देन हैं। इन कहानियों में पशु-पक्षियों और प्रकृति को माध्यम बनाकर बच्चों को नीति और चतुराई की बातें सिखाई जाती थीं, जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।
वैश्विक संदर्भ: आधुनिक रूप में बाल साहित्य का उदय 18वीं शताब्दी में यूरोप में हुआ। लंदन के प्रसिद्ध प्रकाशक जॉन न्यूबेरी को बाल साहित्य का जनक माना जाता है, जिन्होंने पहली बार व्यावसायिक और रचनात्मक रूप से बच्चों के लिए विशेष पुस्तकें छापना शुरू किया। हिन्दी बाल साहित्य की शुरुआत: हिन्दी में बाल साहित्य की औपचारिक शुरुआत भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा संपादित और 1882 में प्रकाशित 'बाल दर्पण' पत्रिका से मानी जाती है। इसके बाद महावीर प्रसाद द्विवेदी के युग में 'बालसखा' जैसी युगांतरकारी पत्रिका का प्रकाशन हुआ। आगे चलकर 'वानर', 'मनमोहन', 'चंदामामा', 'नंदन', 'चंपक' और 'पराग' जैसी पत्रिकाओं ने हिन्दी बाल साहित्य को हर घर के ड्राइंग रूम और बच्चों के दिलों तक पहुँचाया।
साहित्य के संदर्भ में 'अवधान' का अर्थ योगदान या विशेष ध्यान केंद्रित करना है। बाल साहित्य लिखना किसी वयस्क के लिए गंभीर साहित्य रचने से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण कार्य है। बाल साहित्यकारों के अवधान और इसकी मूल अवधारणा के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं: बाल साहित्य की सबसे बड़ी शर्त यह है कि लेखक को अपनी उम्र, अनुभव और 'बड़प्पन के अहंकार' को छोड़कर पूरी तरह से बच्चे के दृष्टिकोण और उसकी मासूम कल्पना के स्तर पर उतरना पड़ता है। "बच्चे की आँख से दुनिया को देखना" ही बाल साहित्य का मूल मंत्र है। सहज, सरल और संगीतात्मक भाषा विधा के लेखकों का सबसे बड़ा योगदान इसकी भाषा को बोधगम्य बनाना रहा है। यहाँ वाक्य छोटे होते हैं, शब्द-विन्यास आसान होता है और भाषा में एक आंतरिक लय या संगीतात्मकता होती है, जिससे बच्चा पढ़ते समय जुड़ाव महसूस करे। : बाल साहित्य मनोरंजन और शिक्षा का एक अनूठा मिश्रण है। बच्चे स्वभाव से विद्रोही और जिज्ञासु होते हैं; उन्हें सीधे उपदेश (जैसे- "सदा सत्य बोलो") पसंद नहीं आते। इसलिए, लेखक कहानियों, कविताओं और रूपकों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से उनके अवचेतन मन में अच्छी बातें रोपित करते हैं।
आज का बाल साहित्य बहुआयामी हो चुका है। बच्चों की विभिन्न रुचियों को ध्यान में रखते हुए इसे कई विधाओं में विभाजित किया जा सकता है: बाल कविता एवं लोरियाँ में तुकबंदी, लयबद्धता और सहज संगीत। भाषाई क्षमता का विकास और याददाश्त को मजबूत करना। बाल कहानी व लघुकथा रोचक पात्र (पशु, जासूस, राजा-रानी या आम बच्चे)। कल्पनाशीलता, तार्किकता और निर्णय लेने की क्षमता का विकास।।विज्ञान कथाएँ अंतरिक्ष, रोबोटिक्स, भविष्य की तकनीक पर आधारित। अंधविश्वास से मुक्ति और वैज्ञानिक दृष्टिकोण या कौतूहल जगाना। बाल नाटक व एकांकी संवादात्मक शैली और मंचन योग्य। बच्चों में आत्मविश्वास, टीम वर्क और अभिव्यक्ति की कला का विकास। आधुनिक विधाएँ (जैसे हाइकु) कम शब्दों (जैसे जापानी विधा हाइकु) में बड़ी बात कहना। संक्षिप्तता और गहरी सोच को बढ़ावा देना है।
आज का युग डिजिटल युग है, जहाँ बचपन स्मार्टफोन की स्क्रीन, वीडियो गेम्स और सोशल मीडिया रील्स के चक्रव्यूह में फँस गया है। ऐसे समय में बाल साहित्य की महत्ता और आवश्यकता कई गुना बढ़ गई है ।
अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों में चिड़चिड़ापन और एकाग्रता की कमी पैदा कर रहा है। किताबें पढ़ने से बच्चों के मस्तिष्क में न्यूरॉन्स का बेहतर विकास होता है, जिससे उनकी एकाग्रता और रचनात्मकता बढ़ती है। संस्कार और सामाजिक सरोकार में एकल परिवारों के बढ़ते चलन के कारण आज बच्चों को दादा-दादी या नाना-नानी का सान्निध्य नहीं मिल पा रहा है, जो कभी लोककथाओं के माध्यम से संस्कार देते थे। बाल साहित्य इस खालीपन को भरता है और बच्चों को सहानुभूति, सहिष्णुता, साहस और पर्यावरण संरक्षण जैसे मूल्य सिखाता है। जिज्ञासा और तर्कशक्ति को धार में बाल साहित्यकार बच्चों के भीतर छिपे "क्यों, कहाँ, कैसे" जैसे प्रश्नों को दबाते नहीं, बल्कि उन्हें सही दिशा देकर उनकी जिज्ञासा और तर्कशक्ति को बढ़ाते हैं।
वर्तमान में बाल साहित्य के क्षेत्र में कई सराहनीय और प्रगतिशील कदम उठाए जा रहे हैं। मातेश्वरी विद्या देवी बाल साहित्य शोध संस्थान सिरसा , हरियाणा की अखिल भारतीय बाल साहित्य सम्मेलन के संरक्षक संस्थापक राजकुमार निजात और जयपुर राजस्थान से हिंदी मासिक बच्चों का देश ' के संपादक संजय जैन , हरियाणा के त्रिलोक चंद फतेहपुरी की पुस्तक बाल सौरभ , तेलगाना के प्रसाद राव जामी की संपादित बाल साहित्य , दरभंगा , बिहार के सतीश चंद्र भगत , मुजफ्फरपुर , बिहार के डॉ ऊषा श्रीवास्तव की बज्जिका भाषा m बज्जिका बाल कविता संरक्ष जैसे प्रबुद्ध चिंतकों व संस्थाओं द्वारा इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किए जा रहे हैं। आज के नए और स्थापित बाल साहित्यकारों को न केवल पारंपरिक विधाओं, बल्कि बाल कहानी, नाटक, कविताओं, हाइकु, एकांकी और लघुकथाओं पर लिखने के लिए निरंतर प्रोत्साहित किया जा रहा है, जो कि बाल साहित्य के विकास का एक अत्यंत स्वागत योग्य कदम है। : आज की पीढ़ी 'डिजिटल नेटिव' है। हमें बाल साहित्य को केवल कागज़ की किताबों तक सीमित न रखकर ई-बुक्स , ऑडियो बुक्सऔर सचित्र एनिमेटेड कॉमिक्स के रूप में भी प्रस्तुत करना होगा। : आज के बच्चे को केवल राजा-रानी या परियों की कहानियों से संतुष्ट नहीं किया जा सकता। उन्हें साइबर सुरक्षा, कोडिंग, जलवायु परिवर्तन और मानसिक स्वास्थ्य जैसे समकालीन विषयों पर उनकी भाषा में साहित्य चाहिए।
बाल साहित्य केवल बचपन का मनोरंजन करने का साधन नहीं है, बल्कि यह एक प्रबुद्ध, संवेदनशील और प्रगतिशील राष्ट्र के निर्माण का सबसे सशक्त माध्यम है। एक अच्छा बाल साहित्यकार बच्चों का सबसे अच्छा दोस्त और उनका अनौपचारिक शिक्षक होता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि स्कूलों की प्राथमिक कक्षाओं से लेकर पारिवारिक स्तर तक बाल पत्रिकाओं और पुस्तकों को अनिवार्य रूप से पहुँचाया जाए। जब बच्चों के हाथों में गैजेट्स की जगह रंग-बिरंगी, ज्ञानवर्धक और कल्पनाशीलता से भरी किताबें होंगी, तभी हमारा बचपन सुरक्षित, समृद्ध और सतरंगी बना रहेगा।
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