तांत्रिक मेधा से वैश्विक शक्तिपीठों तक
सत्येन्द्र कुमार पाठक
शक्ति तत्व का उदय और दार्शनिक अधिष्ठान में भारतीय धर्म और दर्शन के आकाश में 'शक्ति' वह सूर्य है जिसके बिना चेतना का अस्तित्व संभव नहीं है। शाक्त संप्रदाय केवल एक मत नहीं, बल्कि आदिम काल से चली आ रही वह ऊर्जा-धारा है जिसने सभ्यता के हर सोपान को स्पर्श किया है। जब हम 'शाक्त साम्राज्य' की बात करते हैं, तो हमारा तात्पर्य किसी राजनीतिक सीमा से नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक और आध्यात्मिक प्रभाव से है, जिसने हिमालय से कन्याकुमारी और गांधार से लंका तक एक अखंड वैचारिक साम्राज्य स्थापित किया। ऋग्वेद के 'देवी सूक्त' में वाक्-शक्ति का उद्घोष हो या उपनिषदों की 'उमा हैमवती', शक्ति हमेशा से ज्ञान और क्रिया का आधार रही है। लेकिन इस साम्राज्य को विधिवत स्वरूप मिला मध्यकाल के तंत्र-साहित्य और उन ५१ शक्तिपीठों के माध्यम से, जिन्होंने भारत के भूगोल को एक आध्यात्मिक शरीर में बदल दिया।
बिहार शाक्त चेतना का उद्गम और मेरुदंड इतिहास की दृष्टि से मगध (आधुनिक बिहार का दक्षिणी भाग) को अक्सर मौर्यों और गुप्तों के राजनीतिक उत्कर्ष के लिए जाना जाता है, किंतु सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो यह क्षेत्र शाक्त साधना का 'न्यूक्लियस' रहा है। मुण्डेश्वरी का साक्ष्य: कैमूर की पहाड़ियों पर स्थित माँ मुण्डेश्वरी का मंदिर ईसा पूर्व की परंपराओं को जीवंत रखता है। यहाँ के शिलालेख (६३५ ईस्वी) प्रमाणित करते हैं कि जब उत्तर भारत में वैष्णव धर्म का प्रभाव बढ़ रहा था, तब भी मगध अपनी प्राचीन 'वाराही' और 'नारायणी' पद्धति पर अडिग था। यह मंदिर स्थापत्य कला का वह दुर्लभ नमूना है जहाँ 'अष्टकोणीय' संरचना शक्ति के तांत्रिक स्वरूप को दर्शाती है। गया की मंगलागौरी और तांत्रिक विमर्श: गया केवल पितरों की मुक्ति का स्थान नहीं है। ५१ शक्तिपीठों में 'स्तन पीठ' के रूप में मंगलागौरी की उपस्थिति इसे 'पोषण और सृजन' का केंद्र बनाती है। मगध के साधकों ने यहाँ 'दक्षिण मार्ग' और 'वाम मार्ग' का वह समन्वय किया, जो आगे चलकर बंगाल और असम के तंत्र मार्ग का आधार बना। बराबर की गुफाएं और गुप्त साधनाएं: जहानाबाद की बराबर पहाड़ियों का इतिहास आजीवकों से शुरू होता है, लेकिन वहाँ के लोक-इतिहास में 'सिद्धों' की उपस्थिति और पहाड़ियों के तलहटी में स्थित देवी मंदिरों के अवशेष बताते हैं कि यह क्षेत्र प्राचीन काल में एकांत तांत्रिक साधनाओं का गढ़ था।
५१ शक्तिपीठ: एक अखंड आध्यात्मिक भूगोल शाक्त साम्राज्य का सबसे सशक्त प्रमाण सती के अंगों के गिरने से बने ५१ शक्तिपीठ हैं। यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसने भारत के हर कोने को एक-दूसरे से जोड़ दिया। कामाख्या (असम): यदि मगध केंद्र है, तो कामाख्या इस साम्राज्य का 'गर्भगृह' है। यहाँ सती की योनि का पतन हुआ, जो सृजन की पराकाष्ठा है। यहाँ का 'अम्बुवाची मेला' प्रकृति के रजस्वला होने और पुनरुत्थान का उत्सव है। कालीघाट और तारापीठ (बंगाल): बंगाल में शक्ति का स्वरूप 'काली' और 'तारा' के रूप में अधिक प्रखर हुआ। मगध से बहकर जाने वाली गंगा अपने साथ जो सांस्कृतिक खाद ले गई, उसी ने बंगाल की मिट्टी में 'शाक्त साम्राज्य' को फलने-फूलने का अवसर दिया। . शिलालेख और ताम्रपत्र: इतिहास की मूक गवाही जो शिलाओं पर उकेरे गए हैं: पाल राजवंश के ताम्रपत्र: पाल शासकों ने यद्यपि बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया, लेकिन उनके समय की 'तारा' और 'महिषासुरमर्दिनी' की मूर्तियाँ बताती हैं कि तत्कालीन समाज 'शाक्त' था। नालंदा से प्राप्त अभिलेखों में 'भगवती' के लिए दान का उल्लेख मिलता है।
चोल और चालुक्य अभिलेख: दक्षिण भारत के राजाओं ने अपनी विजय के बाद 'सप्तमातृका' के मंदिर बनवाए। उनके ताम्रपत्रों में शक्ति को 'विजय की देवी' के रूप में संबोधित किया गया है। 'श्रीलंका मंथन' और पड़ोसी देशों का शाक्त स्वरूप भारतीय सीमाओं के बाहर भी शाक्त साम्राज्य की ध्वजा फहराती रही है: श्रीलंका की शांकरी देवी: १८ महाशक्तिपीठों में से एक होने के नाते, त्रिकोमाली का यह मंदिर भारत और श्रीलंका के प्राचीन संबंधों की धुरी है। पुर्तगाली आक्रमणों के बावजूद यहाँ की श्रद्धा कम नहीं हुई। यह स्थल इस बात का प्रमाण है कि मगध और दक्षिण भारत के समुद्री व्यापारियों ने केवल व्यापार नहीं किया, बल्कि अपनी 'कुलदेवी' को भी लंका के जनमानस में प्रतिष्ठित किया। हिंगलाज (बलूचिस्तान): पाकिस्तान के बलूचिस्तान में स्थित यह शक्तिपीठ आज भी 'नानी का हज' के नाम से जाना जाता है। यह शाक्त साम्राज्य की वह सीमा है जहाँ धर्म की दीवारें ढह जाती हैं। नेपाल की गुह्येश्वरी: काठमांडू में पशुपतिनाथ के सान्निध्य में शक्ति का यह केंद्र शिव और शक्ति के अभिन्न संबंध को दर्शाता है। श्रीविद्या और तंत्र: साम्राज्य का बौद्धिक पक्ष में शाक्त साम्राज्य केवल मंदिरों तक सीमित नहीं था, इसका एक विशाल बौद्धिक साम्राज्य भी था। 'श्रीविद्या' इस मत की सबसे परिष्कृत शाखा है। ललिता त्रिपुरा सुंदरी: श्रीचक्र की साधना के माध्यम से ब्रह्मांड को समझने का प्रयास। मगध के विद्वानों ने 'ललिता सहस्रनाम' और 'सौंदर्य लहरी' की जो व्याख्याएँ कीं, उन्होंने इसे एक उच्च-स्तरीय दर्शन में बदल दिया।
दस महाविद्या: काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला। ये १० शक्तियाँ मानव चेतना के १० अलग-अलग आयामों को दर्शाती हैं। आधुनिक संदर्भ और 'मगध ज्योति' का उत्तरदायित्व आज जब हम इतिहास का पुनरावलोकन करते हैं, तो हमें दिखाई देता है कि शाक्त मत ने हमेशा समाज को जोड़ने का काम किया है। जाति, संप्रदाय और भाषा की सीमाओं को तोड़कर शक्तिपीठों ने एक 'सांस्कृतिक राष्ट्र' का निर्माण किया। अरवल , जहानाबाद और आसपास के क्षेत्रों के उन गुमनाम शक्ति केंद्रों को खोजें जो झाड़ियों और उपेक्षा के नीचे दबे हैं।प्राचीन ताम्रपत्रों का अनुवाद कर उन्हें आज की भाषा में ब्लॉग और लेखों के माध्यम से जनता तक पहुँचाएँ। शक्ति ही शांति है । शाक्त साम्राज्य का अंत कभी नहीं होता, क्योंकि यह 'ऊर्जा' का साम्राज्य है। मगध की मिट्टी में जो तांत्रिक बीज हज़ारों साल पहले बोए गए थे, वे आज भी हमारी परंपराओं, लोकगीतों और पूजा-पद्धतियों में जीवित हैं। ५१ शक्तिपीठों की यह श्रृंखला हमें याद दिलाती है कि हम एक ऐसी संस्कृति के वारिस हैं जहाँ 'नारी तत्व' को ब्रह्मांड का केंद्र माना गया है।
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