मंगलवार, दिसंबर 30, 2025

दिसम्बर : स्मृतियों का शाश्वत झरोखा

दिसंबर: स्मृतियों का कोलाज और इतिहास का शाश्वत झरोखा
सत्येन्द्र कुमार पाठक
दिसंबर केवल कैलेंडर का अंतिम पन्ना नहीं है, बल्कि यह स्मृतियों, संघर्षों, वैज्ञानिक बदलावों और उत्सवों का एक ऐसा अनूठा संगम है, जो हमें अतीत की जड़ों से जोड़कर भविष्य की ओर ले जाता है। जब हम दिसंबर की गुनगुनी धूप का आनंद लेते हैं, तब शायद ही हम यह सोचते हैं कि जिस महीने को हम '12वां' कह रहे हैं, उसका नाम चीख-चीखकर खुद को 'दसवां' बता रहा है। यह अंत भी है और शुरुआत भी; यह शोक भी है और उत्सव भी।
दिसंबर शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द 'देसम' (Decem) से हुई है, जिसका अर्थ होता है 'दस'। आज यह* सुनकर अजीब लग सकता है, लेकिन प्राचीन रोमन काल में यह वास्तव में साल का दसवां महीना ही था।
रोम के संस्थापक राजा रोमुलस द्वारा लगभग 750 ईसा पूर्व में बनाए गए पहले कैलेंडर में केवल 10 महीने होते थे। साल की शुरुआत 'मार्च' से होती थी। उस समय कैलेंडर केवल 304 दिनों का होता था। शेष 61 दिन, जो कड़ाके की ठंड के होते थे, उन्हें किसी महीने का दर्जा नहीं दिया गया था क्योंकि उस दौरान न तो युद्ध होते थे और न ही खेती। बाद में जब कैलेंडर में सुधार हुआ और जनवरी व फरवरी को जोड़ा गया, तो दिसंबर खिसककर 12वें स्थान पर आ गया, लेकिन इसका नाम 'दसवां' ही बना रहा। रोमुलस की कहानी स्वयं में एक रोमांचक फिल्म जैसी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, रोमुलस और उनके भाई रेमुस को बचपन में तिबर नदी में बहा दिया गया था, जहाँ एक मादा भेड़िये (Lupa) ने उन्हें अपना दूध पिलाकर बचाया। आगे चलकर रोमुलस ने 21 अप्रैल, 753 ईसा पूर्व को 'रोम' की नींव रखी। उनके शासन का अंत भी रहस्यमयी था; माना जाता है कि वे एक तूफान के दौरान गायब हो गए और उन्हें देवता 'क्विर्नस' के रूप में पूजा जाने लगा।
भारत के लिए दिसंबर का महीना बदलाव और बलिदान की कहानियों से भरा रहा है। भारतीय राजनीति और स्वतंत्रता संग्राम की कई बड़ी घटनाओं ने इसी महीने में आकार लिया: राजधानी का स्थानांतरण12 दिसंबर 1911  को दिल्ली दरबार में ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम ने भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली लाने की घोषणा की। क्रांतिकारियों का सर्वोच्च बलिदान: 17 से 19 दिसंबर 1927  के बीच राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान और रोशन सिंह को फाँसी दी गई। उनके बलिदान ने आजादी की अलख को और प्रचंड कर दिया।भोपाल गैस त्रासदी: 2 और 3 दिसंबर 1984 की वह काली रात, जब 'मिथाइल आइसोसाइनेट' गैस ने हजारों जिंदगियाँ निगल लीं। यह दुनिया की सबसे भीषण औद्योगिक दुर्घटना थी।  13 दिसंबर 2001 को आतंकियों ने भारतीय लोकतंत्र के मंदिर पर हमला किया, जिसे हमारे जांबाज सुरक्षा बलों ने विफल कर दिया। 26 दिसंबर 2004 को आई विनाशकारी सुनामी ने दक्षिण भारत सहित कई देशों में तबाही मचाई, जो प्रकृति के विकराल रूप की याद दिलाती है।
वैश्विक स्तर पर भी दिसंबर ने दुनिया का नक्शा और मानवीय सोच को नई दिशा दी है। 16 दिसंबर 1773 की 'बोस्टन टी पार्टी' ने अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी सुलगाई। वहीं, 1914 के प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 'क्रिसमस ट्रूस' ने इतिहास रचा, जब सैनिकों ने स्वतः स्फूर्त तरीके से युद्ध रोककर 'नो मैन्स लैंड' पर साथ मिलकर फुटबॉल खेला।
विज्ञान और शांति के क्षेत्र में 1 दिसंबर 1959 को 'अंटार्कटिका संधि' पर हस्ताक्षर हुए, जिसने इस बर्फीले महाद्वीप को केवल शांति के लिए सुरक्षित कर दिया। कला जगत के लिए 8 दिसंबर 1980 का दिन दुखद था, जब शांति के पैरोकार जॉन लेनन की हत्या ने पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया। दिसंबर केवल गंभीर घटनाओं का ही नहीं, बल्कि उल्लास का भी महीना है। 1 दिसंबर को 'विश्व एड्स दिवस' और 4 दिसंबर को 'भारतीय नौसेना दिवस' जैसे महत्वपूर्ण दिन आते हैं।
प्राचीन रोम में इस समय 'सैटर्नालिया' उत्सव मनाया जाता था। 25 दिसंबर को 'सोल इन्विक्टस' (अपराजित सूर्य) का जन्मदिन मनाया जाता था, जिसे बाद में ईसाई धर्म ने ईसा मसीह के जन्म (क्रिसमस) के रूप में अपनाया। शीतकालीन संक्रांति के साथ शुरू होने वाला यह समय हमें सिखाता है कि सबसे लंबी रात के बाद उजाला अवश्य मिलता है।
31 दिसंबर: काल के संगम पर एक विशेष उत्सव - 31 दिसंबर का दिन कैलेंडर की अंतिम तिथि मात्र नहीं है, बल्कि वह संधिकाल है जहाँ अनुभव और आशाएं हाथ मिलाती हैं। साल 1600 में इसी दिन महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने 'ईस्ट इंडिया कंपनी' को व्यापारिक एकाधिकार दिया था। लेकिन इसी तारीख को 1929 में लाहौर में रावी नदी के तट पर पंडित नेहरू ने 'पूर्ण स्वराज' की घोषणा कर ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी। : यूरोप में यह दिन 'सेंट सिल्वेस्टर' के पर्व के रूप में मनाया जाता है। पौराणिक कथा है कि पोप सिल्वेस्टर ने रोम को एक जहरीले ड्रैगन से  मुक्त कराया था। आध्यात्मिक रूप से यह दिन 'कृतज्ञता' का है। वेटिकन में 'ते ड्यूम' (Te Deum) स्तुति गान द्वारा बीते वर्ष के लिए ईश्वर को धन्यवाद दिया जाता है। भारत के संदर्भ में, वर्ष 2025 में 31 दिसंबर को 'पुत्रदा एकादशी' का पावन संयोग है, जो समृद्धि और सुख की कामना का दिन है।
इटली लोग रात 12 बजे मसूर की दाल खाते हैं, जो धन और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है इटली में लोग खिड़की से पुराने बर्तन फेंकते थे, जो पुराने साल के दुखों को बाहर निकालने का प्रतीक था। दिसंबर हमें सिखाता है कि समय का पहिया निरंतर घूमता रहता है। रोमुलस के 10 महीनों वाले कैलेंडर से लेकर आज के डिजिटल युग तक, दिसंबर ने मानव सभ्यता के उत्थान और पतन दोनों को देखा है। यह महीना हमें याद दिलाता है कि भले ही बाहर कड़ाके की ठंड हो, लेकिन इतिहास की गर्म यादें और बलिदानों की गाथाएं हमारे भीतर की ऊर्जा को बनाए रखती हैं। 31 दिसंबर की रात को जब घड़ी की सुइयां 12 पर मिलती हैं, तो वह केवल एक दिन का अंत नहीं, बल्कि एक नए अध्याय की शुरुआत होती है। यह अतीत की गलतियों से सीखने, वर्तमान के लिए आभार व्यक्त करने और एक बेहतर भविष्य की ओर कदम बढ़ाने का सुनहरा अवसर है।

अस्तिव की जग : मानव लालच से जूझ रही है पर्वत और नदियाँ


अस्तित्व की जंग : जब पर्वत और नदियाँ मानव लालच से जूझ रही हैं
मानव सभ्यता के मूल आधार—नदियाँ और पर्वत—आज तथाकथित विकास की मार से अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। यदि समय रहते संरक्षण नहीं हुआ, तो यह संकट आने वाली पीढ़ियों के लिए विनाशकारी विरासत बन जाएगा।
विकास की आड़ में विनाश: नदियों और पर्वतों का करुण संघर्ष
सभ्यता के स्तंभ खतरे में: जल, जंगल और पहाड़ों की पुकार
जब सूखती नदियाँ और टूटते पर्वत भविष्य पर प्रश्नचिह्न बनें
पर्यावरण संकट का सच: हिमालय से मगध तक चेतावनी की गूँज
विनाश के मुहाने पर खड़ी सभ्यता—मानव सभ्यता का इतिहास नदियों की गोद में फला-फूला और पहाड़ों की छांव में सुरक्षित रहा। लेकिन आज इक्कीसवीं सदी का तथाकथित ‘विकास’ इन्हीं आधारभूत स्तंभों को ढहाने पर तुला है। हिमालय की शिवालिक श्रेणियों से लेकर अरावली के प्राचीन पत्थरों तक और गंगा की लहरों से लेकर मगध की छोटी धाराओं तक—हर ओर प्रकृति की चीख सुनाई दे रही है। वायु प्रदूषण, जल संकट और बढ़ता तापमान कोई संयोग नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ किए गए खिलवाड़ का परिणाम है। यदि आज हमने अपनी नदियों और पर्वतों को नहीं बचाया, तो भविष्य की पीढ़ियों के पास विरासत के नाम पर केवल मरुस्थल और ज़हरीला पानी बचेगा।
नदियों का संकट – केवल जल नहीं, जीवन का क्षरण – आयरलैंड जैसे छोटे देश में 73,000 किलोमीटर लंबी नदी-नालियाँ हैं, जो पृथ्वी का दो बार चक्कर लगा सकती हैं। भारत में भी कभी नदियों का ऐसा ही विस्तृत जाल था, जो अब सिमटता जा रहा है।
प्रदूषण का ज़हर – गंगा, सोन और गंडक जैसी पवित्र नदियाँ आज औद्योगिक कचरे और अनुपचारित सीवेज का केंद्र बन चुकी हैं। तूफानी जल-अपवाह अपने साथ भारी मात्रा में प्लास्टिक और घातक रसायन लेकर इन जलस्रोतों में मिलता है, जिससे जलीय ऑक्सीजन समाप्त हो रही है। परिणामस्वरूप मछलियाँ मर रही हैं और शैवाल का साम्राज्य बढ़ता जा रहा है।
बिहार की दम तोड़ती नदियाँ – बिहार के परिप्रेक्ष्य में स्थिति और भी भयावह है। जहाँ गंगा और बागमती प्रदूषण से कराह रही हैं, वहीं बूढ़ी गंडक, फल्गु और मोरहर जैसी नदियाँ अपने अस्तित्व के पुनरुद्धार की बाट जोह रही हैं। दारधा, जमुनी और वाया जैसी नदियाँ अतिक्रमण का शिकार होकर नालों में तब्दील हो चुकी हैं। सबसे दुखद तथ्य यह है कि वैदिक काल की हिरण्यबाहु और बाह जैसी नदियाँ विलुप्त हो चुकी हैं, जो हमारी सांस्कृतिक और भौगोलिक क्षति का प्रतीक हैं। कम प्रवाह और बाँध – बड़े बाँधों ने नदियों की ‘अविरलता’ को नष्ट कर दिया है। जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा का पैटर्न बदला है, जिससे नदियों का जलस्तर घट रहा है। कम प्रवाह के कारण नौकायन और मछली-पालन अब पहले जैसा सुगम नहीं रहा। पर्वतों पर प्रहार: टूटता सुरक्षा कवच – पर्वत न केवल नदियों के स्रोत हैं, बल्कि वे बादलों को रोककर वर्षा कराते हैं और मरुस्थलीकरण को भी रोकते हैं। किंतु आज पहाड़ों को ‘कच्चे माल’ की खदान समझ लिया गया है। मगध के पर्वतों का रुदन – मगध प्रमंडल की पहचान मानी जाने वाली बराबर, राजगीर की पहाड़ियां , ककोलत ,  कौवाडोल और ब्रह्मयोनि जैसी ऐतिहासिक पहाड़ियाँ अवैध खनन के कारण पत्थरों के ढेर में बदलती जा रही हैं। यह केवल पर्यावरणीय क्षति नहीं, बल्कि हमारी प्राचीन धरोहरों पर सीधा आघात है। अरावली और दिल्ली-एनसीआर का भविष्य – सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णयों के बावजूद यह भयावह तथ्य है कि अरावली पर्वत श्रृंखला का 91 प्रतिशत हिस्सा संरक्षण से बाहर है। यदि अरावली समाप्त हुई, तो दिल्ली-एनसीआर को मरुस्थलीकरण और भीषण जल संकट से कोई नहीं बचा पाएगा। टांडा क्षेत्र में भीलीस्तान लायन सेना जैसे संगठन आदिवासियों के अधिकारों और पर्यावरण संरक्षण के लिए आवाज उठा रहे हैं, क्योंकि पहाड़ों का विनाश सीधे तौर पर स्थानीय समुदायों के विस्थापन का कारण बन रहा है।
5 डिग्री सेल्सियस की मार – एक शोध के अनुसार पहाड़ों का औसत तापमान 5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। इसके कारण उत्तराखंड के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे नदियों में अचानक बाढ़ (फ्लैश फ्लड) और उसके बाद लंबे सूखे की स्थिति उत्पन्न हो रही है। खनन, शहरीकरण और वनों की कटाई: घातक गठजोड़ – पहाड़ों को काटकर बनाई जा रही सुरंगें और सड़कें उनकी स्थिरता को समाप्त कर रही हैं। वनों की कटाई से मिट्टी का कटाव बढ़ा है, जिससे भूस्खलन की घटनाएँ बढ़ रही हैं। अनियंत्रित खनन भू-जल स्तर को भी गहराई में धकेल रहा है। बढ़ती आबादी और पानी की मांग के बीच जलवायु परिवर्तन किसानों को लंबे सूखे की ओर धकेल रहा है। समाधान की राह: अब नहीं तो कभी नहीं – इस संकट का समाधान केवल सरकारी फाइलों में नहीं, बल्कि धरातल पर कड़े निर्णयों में है। नमामि गंगे और दिव्य गंगा मिशन को केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि पारिस्थितिक शुद्धिकरण के रूप में देखा जाना चाहिए। उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और बंगाल को गंगा बेसिन के लिए एकीकृत प्रबंधन नीति अपनानी होगी। नदियों के किनारों और पहाड़ों के संवेदनशील क्षेत्रों को ‘नो-डेवलपमेंट ज़ोन’ घोषित कर अतिक्रमण पर सख्त दंडात्मक कार्रवाई आवश्यक है। प्लास्टिक का पूर्ण बहिष्कार और रीसाइक्लिंग को जीवनशैली का हिस्सा बनाना होगा। सार्वजनिक परिवहन, वृक्षारोपण और स्थानीय समुदायों—विशेषकर आदिवासियों—की भागीदारी ही संरक्षण की कुंजी है। प्रकृति के पास हमारी आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त संसाधन हैं, लेकिन हमारे लालच के लिए नहीं। यदि हमने आज अपनी जीवनरेखा नदियों और प्रहरी पर्वतों की रक्षा नहीं की, तो प्रकृति स्वयं संतुलन बनाएगी—और वह संतुलन बाढ़, सूखे और आपदाओं के रूप में अत्यंत विनाशकारी होगा। नदियों को फिर से बहने दें और पहाड़ों को अपनी जगह स्थिर रहने दें—यही मानवता के बचने का एकमात्र मार्ग है। नमामि गंगे की ओर से भारतीय प्रशासनिक संस्थान, नई दिल्ली में जीवनधारा नमामि गंगे के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. हरिओम शर्मा के नेतृत्व में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सह आचार्यकुल के राष्ट्रीय प्रवक्ता  साहित्यकार व इतिहासकार सत्येन्द्र कुमार पाठक सहित बिहार राज्याध्यक्ष डॉ. उषाकिरण श्रीवास्तव, डॉ. दिव्या स्मृति एवं अन्य गंगा सेवियों द्वारा गंगा बेसिन क्षेत्रों पर विस्तृत चर्चा की गई। मानव सभ्यता के मूल आधार—नदियाँ और पर्वत—आज तथाकथित विकास की मार से अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। यदि समय रहते संरक्षण नहीं हुआ, तो यह संकट आने वाली पीढ़ियों के लिए विनाशकारी विरासत बन जाएगा।

रविवार, दिसंबर 28, 2025

जनवरी : नव वर्ष का प्रारम्भ

जनवरी : समय की दहलीज, जानूस की दृष्टि और नए आरंभ का दर्शन
आपके विचार
जनवरी : समय की दहलीज, जानूस की दृष्टि और नए आरंभ का दिवस जनवरी केवल कैलेंडर का पहला महीना नहीं, बल्कि अतीत और भविष्य के बीच खड़ी मानव चेतना की दहलीज है। जानूस के दो चेहरों की तरह यह महीना हमें सीख देता है कि अनुभव और उम्मीद के संतुलन से ही सार्थक जीवन संभव है। जनवरी क्यों है नए साल की शुरुआत का प्रतीक , जानूस से गणेश तक: आरंभ और विवेक की सांस्कृतिक विरासत , इतिहास, विज्ञान और दर्शन में जनवरी का महत्व अतीत और भविष्य के बीच खड़ा महीना: जनवरी है। 
हर साल जब 31 दिसंबर की आधी रात को घड़ी की सुइयाँ एक साथ मिलती हैं, तो पूरी दुनिया एक अजीब से उत्साह और आत्मचिंतन से भर जाती है। हम आतिशबाज़ियों के शोर में पुराने साल को विदा करते हैं और एक नई डायरी के कोरे पन्नों की तरह नए साल का स्वागत करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि साल की शुरुआत ‘जनवरी’ से ही क्यों होती है? क्यों इस महीने का नाम किसी राजा या योद्धा के नाम पर न होकर एक ‘दो चेहरों वाले देवता’ के नाम पर पड़ा? जनवरी केवल 31 दिनों का एक कालखंड नहीं है; यह इतिहास, संस्कृति, विज्ञान और दर्शन का वह चौराहा है, जहाँ अतीत भविष्य से हाथ मिलाता है।
जानूस: वह देवता जो समय की संधि पर खड़ा है – जनवरी शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द Ianuarius से हुई है, जो रोमन देवता ‘जानूस’  को समर्पित है। रोमन पौराणिक कथाओं में जानूस का स्थान अद्वितीय है। वे जुपिटर की तरह बिजली नहीं कड़काते थे, न ही मार्स की तरह युद्ध के मैदान में उतरते थे, लेकिन वे इन सबसे महत्वपूर्ण थे। वे ‘शुरुआत, द्वारों, रास्तों और बदलाव’ के देवता थे। जानूस की सबसे बड़ी विशेषता उनके दो चेहरे हैं। एक चेहरा पीछे की ओर यानी ‘अतीत’ को देखता है और दूसरा आगे की ओर यानी ‘भविष्य’ को।
यह प्रतीकात्मकता मनुष्य के जीवन दर्शन को दर्शाती है। 1 जनवरी को जब हम खड़े होते हैं, तो हम अनजाने में ही जानूस की भूमिका में होते हैं—हम पीछे मुड़कर अपनी गलतियों और उपलब्धियों को देखते हैं और सामने की ओर अपनी उम्मीदों और संकल्पों को। प्राचीन रोम में माना जाता था कि बिना जानूस की अनुमति के स्वर्ग का द्वार भी नहीं खुलता, इसीलिए हर पूजा और शुभ कार्य में उनका आह्वान सबसे पहले किया जाता था।
कैलेंडर का संघर्ष – इतिहास की गलियों में झाँकें तो पता चलता है कि जनवरी हमेशा से साल का पहला महीना नहीं था। प्राचीन रोमन कैलेंडर केवल 10 महीनों का होता था और साल की शुरुआत मार्च से होती थी। यही कारण है कि आज भी ‘सितंबर’, ‘अक्टूबर’, ‘नवंबर’ और ‘दिसंबर’ के नाम उनकी पुरानी स्थिति को दर्शाते हैं। लगभग 713 ईसा पूर्व में राजा नुमा पोंपिलियस ने जनवरी और फरवरी के महीनों को जोड़ा और जानूस को सम्मान देने के लिए जनवरी को साल का पहला महीना घोषित किया। 1582 में ग्रेगोरियन कैलेंडर के बाद 1 जनवरी को वैश्विक मान्यता मिली। भारत में जनवरी राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक है। 26 जनवरी—संविधान लागू हुआ। , 12 जनवरी—स्वामी विवेकानंद जयंती (राष्ट्रीय युवा दिवस)। , 10 जनवरी—विश्व हिंदी दिवस।, मकर संक्रांति, पोंगल, लोहड़ी और बिहू—सांस्कृतिक विविधता के प्रतीक है।
जानूस और गणेश: दो संस्कृतियों का एक सत्य – विद्वानों ने जानूस और भगवान श्री गणेश के बीच अद्भुत समानताएँ देखी हैं। प्रथम पूज्य, द्वारपाल और विवेक—दोनों ही आरंभ और सही निर्णय के प्रतीक हैं। जनवरी: आविष्कारों और चेतना का महीना – 1 जनवरी 1885—समय का मानकीकरण। ,4 जनवरी—लुई ब्रेल का जन्म। 9 जनवरी 2007—पहला iPhone है।
आज जनुसीयन थिंकिंग ‘’ मनोविज्ञान का महत्वपूर्ण सिद्धांत है—एक साथ दो विपरीत विचारों को साधने की क्षमता। प्रबंधन की भाषा में इसे अम्बिडेक्सटेंटी   कहा जाता है।
दहलीज पर खड़ा इंसान – जनवरी हमें सिखाती है कि आगे बढ़ने के लिए पीछे देखना कमजोरी नहीं, बुद्धिमानी है। शब्द बदल गए हैं—शहद की जगह ‘हैप्पी न्यू ईयर’—लेकिन भावना वही है। तो आइए, इस जनवरी हम भी जानूस की तरह बनें। बीते वर्ष की कड़वाहट को अनुभव की मिठास में बदलें और आने वाले समय के द्वार पर आत्मविश्वास के साथ दस्तक दें। क्योंकि हर जनवरी एक वादा है—कि समय का द्वार हमेशा नई रोशनी की ओर खुलता है।
जनवरी केवल कैलेंडर का पहला महीना नहीं, बल्कि अतीत और भविष्य के बीच खड़ी मानव चेतना की दहलीज है। जानूस के दो चेहरों की तरह यह महीना हमें सीख देता है कि अनुभव और उम्मीद के संतुलन से ही सार्थक जीवन संभव है।

शुक्रवार, दिसंबर 12, 2025

गणपति , बुध और बुधवार का महासमन्वय

बुद्धि, वाणी और व्यापार का महासंगम: बुधवार, बुध और गणपति
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
भारतीय सनातन धर्म और ज्योतिष शास्त्र में, सप्ताह के प्रत्येक दिन का अपना विशिष्ट महत्व है, जो किसी न किसी ग्रह या देवता को समर्पित होता है। इन्हीं में से एक है बुधवार, जिसे न केवल ग्रहों के राजकुमार बुध (Mercury) को समर्पित माना जाता है, बल्कि यह प्रथम पूज्य भगवान गणेश की आराधना के लिए भी सर्वश्रेष्ठ दिवस है। बुद्धि, विवेक, संचार और व्यापार के कारक बुध और ज्ञान के देवता गणपति का यह अनूठा संगम, इस दिन की गई पूजा-अर्चना को अक्षय फलदायी बना देता है।  बुधवार की पौराणिक पृष्ठभूमि, ज्योतिषीय महत्व और धार्मिक अनुष्ठानों का विस्तृत विश्लेषण करता है, यह बताता है कि यह दिवस भक्तों के लिए ज्ञान, समृद्धि और विघ्न-निवारण का द्वार कैसे खोलता है। बुधवार का पौराणिक जन्म और वैवश्वत मन्वन्तर का संबंध - बुधवार की उत्पत्ति की कथा सीधे तौर पर ज्योतिषीय गणनाओं और पौराणिक आख्यानों से जुड़ी है। बुध ग्रह का नामकरण और दिवस समर्पण सीधे बुध ग्रह से संबंधित है। पुराणों के अनुसार, बुध देव चंद्रमा (चंद्र देव/सोम) और देवगुरु बृहस्पति की पत्नी तारा के पुत्र हैं। बुध को अपनी बुद्धि, चपलता और तीव्र गति के कारण 'ग्रहों के राजकुमार' की उपाधि मिली है। वैवश्वत मनु और इला का संदर्भ पुराणों के अनुसार, बुधवार का संबंध वैवश्वत मन्वन्तर की पौराणिक गाथा से भी जुड़ा है। इसी मन्वन्तर में, सप्तम मनु वैवश्वत के अनुरोध पर मित्र और वरुण की सहायता से उत्पन्न पुत्री इला के पति बृहस्तपति एवं चंद्रमा एवं तारा  के पुत्र बुध को यह दिवस समर्पित किया गया। बुध को मगध देश का राजा माना गया है, और वे राशिचक्र में मिथुन तथा कन्या राशि के स्वामी हैं। यह ऐतिहासिक और ज्योतिषीय जुड़ाव बुधवार के महत्व को और भी अधिक गहरा करता है।
 गणेश पुराण में बुधवार का समर्पण बुधवार को भगवान गणेश की पूजा का विधान क्यों है, इसका सबसे मार्मिक और पुष्ट आधार गणेश पुराण की कथा में मिलता है: जब माता पार्वती ने कैलाश पर्वत पर अपने पुत्र गणेश जी को अद्भुत रूप में प्रकट किया, तब सभी देवी-देवता और नवग्रह उनके दर्शन के लिए पधारे। उन उपस्थित देवगणों में बुध देव भी शामिल थे। बालक गणेश के दिव्य रूप, उनकी बुद्धि की तीक्ष्णता और ज्ञान के तेज को देखकर बुध देव अत्यंत अभिभूत हो गए। अपनी इस परम प्रसन्नता को व्यक्त करते हुए, बुध देव ने तत्काल यह घोषणा की कि उनका प्रिय दिवस, बुधवार, अब से भगवान गणेश को समर्पित होगा। बुध देव ने यह वरदान दिया कि जो भक्त बुधवार के दिन गणेश जी की सच्चे मन से पूजा करेगा, उसे बुध ग्रह से संबंधित सभी शुभ फल प्राप्त होंगे, और विघ्नहर्ता उसके सभी संकट दूर करेंगे। इसी समर्पण के कारण बुधवार को गणेश जी की पूजा करने का विधान बना और यह दिन ज्ञान, वाणी और व्यापार के लिए विशेष फलदायी हो गया। ज्योतिष शास्त्र में, बुध ग्रह और भगवान गणेश दोनों का कारकत्व (प्रतिनिधित्व करने वाला गुण) पूरी तरह से एक-दूसरे से मेल खाता है। इसी कारण, बुधवार को इन दोनों की पूजा करना 'सोने पर सुहागा' के समान माना जाता है। कारकत्व बुध ग्रह (ग्रहों के राजकुमार) भगवान गणेश (बुद्धि के देवता) बुद्धि बुद्धि, विवेक, तर्क, विश्लेषण क्षमता और हास्य-बोध का प्रतिनिधित्व। स्वयं बुद्धि और ज्ञान के शाश्वत देवता। वाणी/संचार व्यक्ति की वाणी की मधुरता, संवाद कौशल, लेखन और पत्रकारिता का कारक। विघ्नहर्ता होने के कारण, वाणी और संचार में आने वाली सभी बाधाओं का निवारण करते हैं। व्यापार वाणिज्य, व्यापार, लेखा-जोखा और वित्तीय सौदों का नियामक। रिद्धि और सिद्धि (समृद्धि और सफलता) के स्वामी होने के कारण व्यापार में वृद्धि करते हैं। ज्योतिष में, यदि जन्म कुंडली में बुध ग्रह पीड़ित या कमजोर होता है, तो व्यक्ति को वाणी दोष (हकलाना), व्यापार में घाटा, कमजोर याददाश्त और मानसिक अस्थिरता जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसे ही बुध दोष कहते हैं। भगवान गणेश विद्या और विवेक के देवता हैं, और वे समस्त ग्रहों के स्वामी व विघ्नहर्ता भी हैं, इसलिए बुधवार को उनकी आराधना करने से बुध देव प्रसन्न होते हैं। इससे बुध दोष शांत होता है, बुद्धि-ज्ञान बढ़ता है और जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।
बुधवार के दिन की गई गणेश आराधना निम्नलिखित क्षेत्रों में विशेष फलदायी सिद्ध होती है: ज्ञान और करियर में उत्थान: यह दिन छात्रों, शिक्षकों, वकीलों और लेखकों के लिए अत्यंत शुभ है। पूजा से बुध की कृपा प्राप्त होती है, जिससे स्मरण शक्ति और एकाग्रता बढ़ती है, और शिक्षा तथा प्रतियोगिता में सफलता मिलती है। जिन लोगों को व्यापार में लगातार हानि हो रही है या पैसों की किल्लत है, उन्हें बुधवार का व्रत और पूजा अवश्य करनी चाहिए। बुध को मजबूत करने से व्यापार में तेजी आती है और धन-धान्य की वर्षा होती है। समस्त बाधाओं का निवारण: गणपति की कृपा से जीवन की सभी प्रकार की आर्थिक, शारीरिक और मानसिक बाधाएँ दूर होती हैं। बुधवार की पूजा केवल बुध दोष ही नहीं, बल्कि राहु और केतु जैसे क्रूर ग्रहों से संबंधित समस्याओं के निवारण के लिए भी प्रभावी मानी जाती है, क्योंकि गणेश जी विघ्नहर्ता हैं।बुधवार के दिन अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित उपाय करने चाहिए: भगवान गणेश को दूर्वा घास (चूँकि दूर्वा घास हरे रंग की होती है, यह बुध ग्रह को भी प्रिय है) और सिंदूर अर्पित करें। उन्हें मोदक या गुड़-धनिया का भोग लगाएं।
मंत्र जाप: बुध ग्रह की शांति और बुद्धि वृद्धि के लिए: "ॐ बुं बुधाय नमः"। बाधा निवारण और शुभता के लिए: "ॐ गं गणपतये नमः"।किसी भी मंत्र का कम से कम एक माला (108 बार) जाप करना चाहिए। इस दिन हरी वस्तुओं जैसे हरी मूंग दाल (सबूत), हरी सब्जियां, हरे वस्त्र या हरे रंग की चूड़ियां (महिलाओं को) दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इससे बुध देव की प्रसन्नता प्राप्त होती है। यदि संभव हो तो बुधवार के दिन हरे रंग के वस्त्र धारण करें, इससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। बुधवार का दिन केवल एक खगोलीय घटना नहीं है, बल्कि यह वह आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र है जहाँ बुद्धि और विवेक के देव गणेश अपने सबसे शक्तिशाली स्वरूप में विराजमान रहते हैं। बुध ग्रह और गणपति का यह अटूट संबंध इस दिवस को विद्या, वाणी, ज्ञान और व्यापार में सफलता प्राप्त करने का महावरदान प्रदान करता है। जो भक्त बुधवार को सच्ची श्रद्धा से गणेश जी की पूजा करते हैं, उनके जीवन से बुध दोष दूर होता है, मानसिक शांति मिलती है और हर क्षेत्र में सफलता और सौभाग्य के मार्ग खुलते हैं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए भौतिक व्यापार (बुध) और आध्यात्मिक ज्ञान (गणेश) दोनों का संतुलन आवश्यक है।

गुरुवार, दिसंबर 11, 2025

संस्कार , संस्कृति और सभ्यता

संस्कार से सभ्यता तक: भारत की शिक्षा और संस्कृति
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
मानव समाज की प्रगति केवल गगनचुंबी इमारतों या तकनीकी आविष्कारों से नहीं मापी जाती, बल्कि यह इस बात पर निर्भर करती है कि उस समाज के नागरिक कितने संस्कारवान, अनुशासित और नैतिक हैं। भारतीय मनीषियों ने इस तथ्य को सहस्राब्दियों पूर्व ही पहचान लिया था और संस्कार, संस्कृति और सभ्यता को एक दूसरे से अभिन्न रूप से जोड़कर एक ऐसी जीवन प्रणाली विकसित की जो कालातीत है। आज, जब भौतिकवाद और त्वरित प्रगति की होड़ में हमारी नैतिक और सांस्कृतिक जड़ें कमजोर पड़ रही हैं, तब यह आवश्यक हो जाता है कि हम अपनी शिक्षा प्रणाली को पुनर्जीवित करें। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो हमारी प्राचीन शिक्षा प्रणाली—विशेषकर गुरुकुल—के सिद्धांतों को आधुनिक संदर्भ में स्थापित करने का प्रयास है। त्रिवेणी का सिद्धांत में संस्कार, संस्कृति और सभ्यता अवधारणाएँ एक-दूसरे को पोषित कर तत्व अर्थ कार्य और पहचान शिक्षा में संबंध बनाती है।
संस्कार आंतरिक शुद्धि और परिष्करण की प्रक्रिया ( 16 संस्कार)। व्यक्ति को विवेकशील, नैतिक और कर्तव्यनिष्ठ बनाना। बीज: चरित्र निर्माण का आधार।संस्कृति समाज के सोचने, महसूस करने और व्यवहार करने का सामूहिक तरीका। समाज की पहचान, मूल्य और जीवनशैली का सार। पौधा: संस्कारों को पोषित करने वाली जीवनशैली। सभ्यता संस्कृति का भौतिक और बाहरी प्रकटीकरण; उन्नत समाज की उपलब्धियाँ (तकनीक, वास्तुकला)। समाज की भौतिक प्रगति और विकास को दर्शाना। वृक्ष/फल: संस्कृति का परिणाम है। संस्कार व्यक्ति के अंदर नैतिकता का बीज बोते हैं, जिससे संस्कृति रूपी पौधा पल्लवित होता है। यही संस्कृति, अंततः सभ्यता रूपी विशाल वृक्ष के रूप में फलती-फूलती है। संस्कृति हमें बताती है कि 'हम क्या हैं' (आंतरिक स्थिति), जबकि सभ्यता बताती है कि 'हमारे पास क्या है' (बाहरी उपलब्धि) है।
संरक्षण और संवर्धन का माध्यम शिक्षा में संस्कार , संस्कृति और सभ्यता  को संरक्षित और संवर्धित करता है। शिक्षा केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाना है।1. संस्कारों का पोषण शिक्षा का प्राथमिक कार्य उत्तम आचरण और व्यवहार सिखाना है। पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा, मानवीय मूल्यों और सामाजिक दायित्वों को शामिल करके छात्रों में विनम्रता, आदर, और सत्यनिष्ठा जैसे संस्कार विकसित किए जाते हैं। सेवा परियोजनाओं और सामुदायिक जुड़ाव के माध्यम से ये नैतिक मूल्य केवल सैद्धांतिक न रहकर, व्यावहारिक रूप से जीवन का हिस्सा बनते हैं। संस्कृति का संचार में  शिक्षा हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, ज्ञान परंपराओं, कलाओं और भाषाओं को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाती है। साहित्य, कला-एकीकृत शिक्षा और भारतीय भाषाओं के अध्ययन के माध्यम से छात्र अपनी जड़ों से जुड़ते हैं। यह जुड़ाव उन्हें वैश्विक मंच पर आत्मविश्वास के साथ अपनी पहचान बनाए रखने में सक्षम बनाता है। 3. सभ्यता का मार्गदर्शन:शिक्षा वैज्ञानिक ज्ञान, तकनीकी कौशल और आलोचनात्मक चिंतन प्रदान करती है, जो सभ्यता की भौतिक प्रगति के लिए आवश्यक है। साथ ही, यह नैतिक और सतत विकास सुनिश्चित करने के लिए तकनीकी शिक्षा में एथिक्स, सामाजिक जिम्मेदारी और पर्यावरण चेतना को भी शामिल करती है।
 प्राचीन आदर्शों की आधुनिक अभिव्यक्ति राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 शिक्षा को भारतीय मूल्यों के साथ पुनर्संयोजित करने का सबसे बड़ा प्रयास है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का मातृभाषा/ क्षेत्रीय  भाषा में शिक्षा पर जोर सांस्कृतिक संरक्षण का एक महत्वपूर्ण कदम है। मातृभाषा में शिक्षा से छात्र संज्ञानात्मक रूप से बेहतर सीखते हैं, जटिल विचारों को तेजी से समझते हैं, और भावनात्मक रूप से सुरक्षित महसूस करते हैं। मातृभाषा  सीधे तौर पर उनकी संस्कृति और संस्कारों को उनके मन में आत्मसात करने में सहायक होता है। भारतीय ज्ञान प्रणाली नीति में भारतीय कला, विज्ञान, गणित और दर्शन के योगदान को पाठ्यक्रम में शामिल करने का प्रावधान है। यह छात्रों को अपनी समृद्ध सभ्यता से परिचित कराता है और उनमें राष्ट्रीय गौरव का भाव भरता है।समग्र प्रगति कार्ड राष्ट्रीय शिक्षा नीति  में चरित्र निर्माण, सहकर्मी संबंध और सामाजिक जागरूकता को शैक्षणिक अंकों के समान महत्व दिया गया है। यह सुनिश्चित करता है कि शिक्षा का अंतिम लक्ष्य एक चरित्रवान व्यक्ति (संस्कार) तैयार करना है, न कि केवल डिग्रीधारी है। गुरुकुल प्रणाली, प्राचीन भारतीय शिक्षा का आधार, इस बात का उत्कृष्ट उदाहरण है कि संस्कार और संस्कृति किस प्रकार शिक्षा का मूल केंद्र थे।सादा जीवन और अनुशासन: गुरु के सान्निध्य में रहकर शिष्य विनम्रता, श्रम का मूल्य और अनुशासन सीखते थे। यज्ञोपवीत संस्कार से शिक्षा आरंभ होती थी, जो जीवन के महत्वपूर्ण चरणों को संस्कारों द्वारा चिह्नित करती थी। गुरुकुलों में केवल आध्यात्मिक ज्ञान ही नहीं, बल्कि 64 कलाओं (वास्तुकला, चिकित्सा, युद्ध कौशल) की शिक्षा भी दी जाती थी, जो भारतीय सभ्यता की उन्नति का कारण बनी। शिक्षा निःशुल्क थी, जिसके बदले शिष्य गुरु की सेवा करते थे। इससे उनमें सेवा भाव और आदर का संस्कार गहरे उतरता था। संस्कार, संस्कृति और सभ्यता का संरक्षण और संवर्धन आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। NEP 2020 के माध्यम से हम गुरुकुल के उस मूलभूत सिद्धांत की ओर लौट रहे हैं जहाँ शिक्षा का उद्देश्य एक ऐसे व्यक्ति का निर्माण करना था जो नैतिक रूप से सशक्त (संस्कार), सांस्कृतिक रूप से समृद्ध (संस्कृति) और ज्ञान-विज्ञान में निपुण (सभ्यता) हो। यह हम सबकी जिम्मेदारी है कि हम बच्चों को केवल यह न सिखाएँ कि 'हमारे पास क्या है' (सभ्यता), बल्कि यह भी सिखाएँ कि 'हम क्या हैं' (संस्कृति) और 'हमें कैसा होना चाहिए' (संस्कार)। जब ये तीनों तत्व शिक्षा के माध्यम से संतुलित होंगे, तभी लोक जीवन में सच्चा सुकून और राष्ट्रीय प्रगति सुनिश्चित हो सकेगी ।

भगवान शिव

महाकाल शिव का विराट स्वरूप: प्रतीकों में निहित सृष्टि
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
भारतीय पौराणिक और दार्शनिक परंपरा में, भगवान शिव को 'महादेव' या 'महाकाल' के रूप में पूजा जाता है। उनका स्वरूप, उनके वस्त्र, उनके आभूषण और उनके अस्त्र-शस्त्र—ये सब मिलकर केवल एक देवता की छवि नहीं बनाते, बल्कि सृष्टि के मूलभूत सिद्धांतों, समय चक्र, और मानव चेतना के उच्चतम आदर्शों का प्रतीक हैं। शिव का प्रत्येक तत्व गहन दार्शनिक अर्थ रखता है, जो उन्हें परम योगी, भयंकर विनाशक और करुणामय रक्षक के रूप में स्थापित करता है। भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान अर्धचंद्रमा (सोम) उनके सबसे प्रसिद्ध स्वरूप 'चंद्रशेखर' का आधार है। यह कहानी दक्ष प्रजापति के श्राप और शिव के करुणामय हस्तक्षेप से जुड़ी है। जब राजा प्रजापति  दक्ष ने अपनी 27 पुत्रियों (नक्षत्रों) के साथ भेदभाव करने के कारण चंद्रदेव को क्षय (घटने) का श्राप दिया, तो चंद्रमा मृत्युतुल्य हो गए। शिव का आश्रय: चंद्रमा ने सहायता के लिए शिव की शरण ली। शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में स्थान दिया और शीतलता प्रदान कर श्राप के प्रकोप को शांत किया। शिव का यह कार्य उनकी रक्षक और दयालु भूमिका को दर्शाता है।
संतुलन का प्रतीक: चंद्रमा (सोम) शीतलता, मन और अमृत का प्रतीक है, जबकि शिव (शंकर) उग्रता और वैराग्य का। दोनों का समन्वय यह दर्शाता है कि सृष्टि को चलाने के लिए उग्रता (तेज) और शीतलता (शांति) के बीच संतुलन आवश्यक है। शिव अपने भीतर सभी द्वंद्वों को समाहित कर संतुलन स्थापित करते हैं।इसी घटना के उपरांत चंद्रदेव ने प्रभास क्षेत्र में जिस शिवलिंग की स्थापना की, वह सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जो शिव और सोम के अटूट बंधन का प्रमाण है। शिव के हाथ में स्थित दो प्रमुख प्रतीक उनकी शक्ति और नियंत्रण को दर्शाते हैं। डमरू की ध्वनि को 'नाद' या 'ओम्' माना जाता है, जो सृष्टि की प्रारंभिक कंपन है। उत्पत्ति का नाद: प्रतीक है कि शिव की ध्वनि (कंपन) से ही संपूर्ण ब्रह्मांड और समय का जन्म हुआ है। महेश्वर सूत्र: कहा जाता है कि शिव के तांडव नृत्य के दौरान डमरू की 14 बार की ध्वनि से संस्कृत व्याकरण के मूल महेश्वर सूत्र की उत्पत्ति हुई, जो भाषा और ज्ञान का आधार बने।
त्रिशूल के तीन शूल शिव के नियंत्रण को दर्शाते हैं। त्रिगुणों पर नियंत्रण:सत्व, रजस और तमस (प्रकृति के तीन गुण) पर शिव की प्रभुता को दर्शाता है। शिव इन गुणों से परे हैं, फिर भी ये गुण उनके अधीन रहकर कार्य करते हैं।
इच्छा, ज्ञान, क्रिया: यह इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति के समन्वय को भी दर्शाता है। शिव इन तीनों शक्तियों का उपयोग करके सृष्टि का संचालन करते हैं शिव का स्वरूप किसी राजा या भोगी का नहीं है, बल्कि एक महायोगी का है, जिसके प्रतीक वैराग्य और काल पर विजय की गाथा कहते हैं। शिव के गले में लिपटा सर्प वासुकी नाग कई रहस्यों को समेटे है। सर्प काल (समय) का प्रतीक है। शिव द्वारा इसे आभूषण के रूप में धारण करना यह दर्शाता है कि वे मृत्यु और काल पर विजयी हैं, इसीलिए वे महाकाल कहलाते हैं। कुंडलिनी शक्ति: आध्यात्मिक ऊर्जा कुंडलिनी का भी प्रतीक है, जिसे शिव ने जागृत कर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त कर लिया है। शिव पूरे शरीर पर चिता की राख (भस्म) रमाते हैं । भस्म इस भौतिक संसार की नश्वरता (सब कुछ अंततः राख हो जाएगा) का सबसे बड़ा प्रतीक है। यह भक्तों को वैराग्य का मार्ग और भौतिक मोह से मुक्ति का संदेश देता है।: भस्म अग्नि में जलने के बाद बची हुई शुद्धतम अवस्था है। यह शुद्धता और सभी पापों के विनाश का प्रतीक है। शिव की जटाएँ गहन तपस्या और आध्यात्मिक शक्ति को दर्शाती हैं। : जटाओं में गंगा का निवास शिव की करुणा और संरक्षक की भूमिका को दर्शाता है, जहाँ उन्होंने गंगा के वेग को रोककर पृथ्वी को विनाश से बचाया और पवित्रता (मोक्ष की धारा) को नियंत्रित किया।
. तृतीय नेत्र और कैलाश: ज्ञान : मस्तक पर स्थित नेत्र शिव की आंतरिक शक्ति का केंद्र है। विवेक दृष्टि:दो सामान्य आँखों से परे ज्ञान (अंतर्दृष्टि) और विवेक की दृष्टि का प्रतीक है, जो सत्य और असत्य में भेद करती है। अज्ञान का विनाश  नेत्र अज्ञान, काम वासना ( कामदेव को भस्म करना) और अहंकार के विनाश की शक्ति रखता है। यह चेतना की जागृति (आज्ञा चक्र) का प्रतीक है। कैलाश, शिव का निवास, केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक केंद्र है। स्थिरता और वैराग्य स्थिरता, अविनाशीपन और भौतिक सुखों से दूर तपस्वी जीवन का प्रतीक है। कैलाश को ब्रह्मांड का अक्ष माना जाता है, जो दर्शाता है कि शिव स्वयं ब्रह्मांड के केंद्र में स्थित हैं, जो संपूर्ण सृष्टि को नियंत्रित करते हैं। नंदी बैल, शिव का वाहन और द्वारपाल, शिव की ओर मुख करके बैठे रहते हैं। नंदी धर्म और सत्य का प्रतीक है। नंदी को शिव तक पहुँचने का माध्यम माना जाता है, जिसका अर्थ है कि धर्म के मार्ग पर चलकर ही ईश्वर की प्राप्ति संभव है। नंदी का स्थिर आसन एकाग्रता, धैर्य और अटूट भक्ति का संदेश देता है। यह सिखाता है कि शिव को प्राप्त करने के लिए मन की एकाग्रता आवश्यक है। भगवान शिव का स्वरूप अंतिम वास्तविकता को दर्शाता है। वे केवल पौराणिक पात्र नहीं हैं, बल्कि वे अनादि, अनंत, और अव्यक्त शक्ति हैं। उनके प्रतीक हमें याद दिलाते हैं कि जीवन नश्वरता (भस्म) से भरा है, फिर भी हमें धैर्य (नंदी) के साथ ज्ञान (तृतीय नेत्र) प्राप्त करना चाहिए, काल (सर्प) पर विजय पानी चाहिए, और जीवन के सभी द्वंद्वों को संतुलन (चंद्रमा) में जीना चाहिए। शिव का विराट स्वरूप हमें बताता है कि मोक्ष बाहर नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर स्थित चेतना के उत्थान में निहित है। 

मानव शरीर

तोरण द्वार की गाथा: स्थापत्य, संस्कृति 
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
तोरण द्वार—केवल एक प्रवेश द्वार नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता, स्थापत्य कला और सामाजिक संस्कारों का एक सशक्त हस्ताक्षर है। यह शब्द सुनते ही मन में भव्य मंदिरों के अलंकृत मेहराब या विवाह मंडप के प्रवेश द्वार पर लटकता वह प्रतीक साकार हो जाता है, जिस पर दूल्हा अपनी वीरता सिद्ध करता है। यह एक ऐसा सांस्कृतिक प्रतीक है जिसने प्राचीन सनातन काल से लेकर आधुनिक युग तक, विभिन्न शासनों और सामाजिक परिवर्तनों को आत्मसात किया है, लेकिन आज इसकी एक महत्त्वपूर्ण रस्म गंभीर सांस्कृतिक भ्रम का शिकार हो गई है।
'तोरण' शब्द संस्कृत के 'तोर' (पार करना/प्रवेश करना) से आया है, जिसका मूल अर्थ 'प्रवेश द्वार' है। भारतीय स्थापत्य में तोरण का सबसे प्राचीन और महत्त्वपूर्ण प्रमाण साँची के स्तूपों (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) में मिलता है।
प्राचीन काल में तोरण, मुख्य रूप से मंदिरों, स्तूपों और विहारों के चारों ओर बनी बाड़ या प्राचीर में प्रवेश के लिए निर्मित होते थे। साँची के तोरण, जो चार दिशाओं में स्थापित हैं, केवल प्रवेश द्वार नहीं थे; वे पत्थर पर उकेरी गई कथाएँ थे। ये बुद्ध के जीवन की घटनाओं, जातक कथाओं और सामाजिक दृश्यों को दर्शाते थे। ये तोरण पवित्र क्षेत्र में प्रवेश, शुभता और संसारिक से पारलौकिक यात्रा के प्रतीक थे। इनकी संरचना में दो ऊर्ध्वाधर खंभे और उनके ऊपर तीन क्षैतिज मेहराबी बीम होते थे, जो ब्रह्मांडीय संरचना का भी प्रतिनिधित्व करते थे।
विवाह की रस्म में तोरण का उपयोग इसी शुभता और पवित्रता के विचार से जुड़ा है, लेकिन इसका एक विशिष्ट पौराणिक आधार है—वीरत्व की कसौटी। लोक कथाओं के अनुसार, एक तोरण नामक राक्षस तोते का रूप धारण कर दुल्हन के घर के प्रवेश द्वार पर बैठ जाता था, ताकि वह दूल्हे को परेशान कर उसका स्थान ले सके। जब एक विद्वान और साहसी राजकुमार ने इसे पहचान कर तलवार से उस प्रतीक (राक्षसी तोते) को मार गिराया, तब से यह रस्म स्थापित हुई। यह रस्म प्रतीकात्मक रूप से यह स्थापित करती है कि दूल्हा अपनी पत्नी की सुरक्षा के लिए साहसी, बलवान और जागरूक है—ठीक वैसे ही जैसे राजकुमार ने किया था।
मध्यकाल में भारतीय स्थापत्य पर इस्लामी और क्षेत्रीय शैलियों का गहरा प्रभाव पड़ा। मुगल वास्तुकला में, तोरण का शास्त्रीय स्वरूप मेहराब (Arch) और विशाल दरवाजा (Gate) में विलीन हो गया। मुगल इमारतों में 'तोरण' की जगह 'दरवाजा' या 'इवान' शब्द प्रचलित हुए (जैसे बुलंद दरवाजा), जो भव्यता, मजबूती और इस्लामी सजावटी तत्वों से सुसज्जित होते थे। हालांकि, राजपूत और विजयनगर जैसे हिन्दू राज्यों में पारंपरिक तोरणों का निर्माण जारी रहा। राजस्थान और गुजरात के मंदिरों और महलों में जटिल नक्काशीदार तोरण पाए जाते हैं, जो भारतीय शिल्पकला की अद्भुत मिसाल हैं। इस काल में भी, घरों और विवाह समारोहों में फूलों, आम के पत्तों और वस्त्रों से बने सजावटी तोरण (बंदनवार) का उपयोग शुभता और स्वागत के प्रतीक के रूप में आम रहा। ब्रिटिश काल में स्थापत्य का मिश्रण हुआ, लेकिन धार्मिक और सामाजिक रस्मों पर सीधे हस्तक्षेप की अनुपस्थिति में विवाह की तोरण रस्म ने अपना अस्तित्व बनाए रखा। यह रस्म गाँवों और कस्बों में पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रही, जबकि ब्रिटिश पुरातत्वविदों ने प्राचीन तोरणों का अध्ययन कर उन्हें वैश्विक पटल पर है।
आज़ादी के बाद, तोरण ने राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक के रूप में अपनी पहचान बनाई, लेकिन विवाह की रस्मों में इसका स्वरूप बदल गया। बाज़ारीकरण और शहरीकरण ने इस परंपरा में एक गंभीर विसंगति उत्पन्न कररस्म का मूल तत्त्व राक्षस का प्रतीक (लकड़ी का तोता) था, जिस पर वार करना थआज बाज़ार में बिकने वाले तोरण अक्सर सुंदर और आकर्षक होते हैं, लेकिन उन पर गणेशजी, स्वास्तिक, ॐ या अन्य पूज्यनीय देवी-देवताओं के चिह्न अंकित होते हैं।यह विसंगति धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से अस्वीकार्य है। विवाह समारोह के आरंभ में ही हम सर्वप्रथम गणेश पूजन करते हैं, उन्हें 'विघ्नहर्ता' मानकर सभी बाधाएं दूर करने का निमंत्रण देते हैं। ऐसे में, जब दूल्हा तलवार लेकर उस तोरण पर वार करता है जिस पर गणेशजी या कोई अन्य पूज्य चिह्न अंकित हो, तो वह अनजाने में पूज्य देवता का अपमान कर रहा होता है। धार्मिक विशेषज्ञ इस कार्य को गंभीर धार्मिक त्रुटि मानते हैं, क्योंकि यह उस पूजा और शुभ संकल्प के विपरीत है जिसके साथ विवाह आरंभ होता है। यह एक स्पष्ट विरोधाभास है: जहाँ एक ओर हम देवताओं का आवाहन करते हैं, वहीं दूसरी ओर प्रतीकात्मक रूप से उन पर प्रहार करता है।
तोरण रस्म भारतीय सभ्यता की एक अनमोल विरासत है, लेकिन इसका सही अर्थ समझना और उसका शुद्ध रूप में पालन करना हमारा दायित्व है। सत्य की पहचान: हमें यह याद रखना होगा कि तलवार का वार राक्षस के प्रतीक पर होता है, न कि किसी देवता के प्रतीक पर। परिवारों को विवाह आयोजकों को स्पष्ट निर्देश देने चाहिए कि तोरण केवल पारंपरिक राक्षसी रूपी तोते वाला ही हो, जिस पर किसी भी प्रकार का धार्मिक या मांगलिक चिह्न अंकित न हो: पुरोहितों और सांस्कृतिक शिक्षकों को इस रस्म के पीछे की प्रामाणिक कथा से लोगों को अवगत कराना चाहिए ताकि यह विसंगति दूर हो सके। तोरण द्वार केवल सजावट नहीं, बल्कि दूल्हे के साहस और सुरक्षा के संकल्प का प्रतीक है। आइए, हम इस ऐतिहासिक रस्म को उसके वास्तविक गौरव, पवित्रता और सत्यता के साथ निभाएं, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ भी संस्कृति के इस मूल अर्थ को समझ सके ।

तोरण द्वार की गाथा

तोरण द्वार की गाथा: स्थापत्य, संस्कृति 
तोरण द्वार—केवल एक प्रवेश द्वार नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता, स्थापत्य कला और सामाजिक संस्कारों का एक सशक्त हस्ताक्षर है। यह शब्द सुनते ही मन में भव्य मंदिरों के अलंकृत मेहराब या विवाह मंडप के प्रवेश द्वार पर लटकता वह प्रतीक साकार हो जाता है, जिस पर दूल्हा अपनी वीरता सिद्ध करता है। यह एक ऐसा सांस्कृतिक प्रतीक है जिसने प्राचीन सनातन काल से लेकर आधुनिक युग तक, विभिन्न शासनों और सामाजिक परिवर्तनों को आत्मसात किया है, लेकिन आज इसकी एक महत्त्वपूर्ण रस्म गंभीर सांस्कृतिक भ्रम का शिकार हो गई है।
'तोरण' शब्द संस्कृत के 'तोर' (पार करना/प्रवेश करना) से आया है, जिसका मूल अर्थ 'प्रवेश द्वार' है। भारतीय स्थापत्य में तोरण का सबसे प्राचीन और महत्त्वपूर्ण प्रमाण साँची के स्तूपों (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) में मिलता है।
प्राचीन काल में तोरण, मुख्य रूप से मंदिरों, स्तूपों और विहारों के चारों ओर बनी बाड़ या प्राचीर में प्रवेश के लिए निर्मित होते थे। साँची के तोरण, जो चार दिशाओं में स्थापित हैं, केवल प्रवेश द्वार नहीं थे; वे पत्थर पर उकेरी गई कथाएँ थे। ये बुद्ध के जीवन की घटनाओं, जातक कथाओं और सामाजिक दृश्यों को दर्शाते थे। ये तोरण पवित्र क्षेत्र में प्रवेश, शुभता और संसारिक से पारलौकिक यात्रा के प्रतीक थे। इनकी संरचना में दो ऊर्ध्वाधर खंभे और उनके ऊपर तीन क्षैतिज मेहराबी बीम होते थे, जो ब्रह्मांडीय संरचना का भी प्रतिनिधित्व करते थे।
विवाह की रस्म में तोरण का उपयोग इसी शुभता और पवित्रता के विचार से जुड़ा है, लेकिन इसका एक विशिष्ट पौराणिक आधार है—वीरत्व की कसौटी। लोक कथाओं के अनुसार, एक तोरण नामक राक्षस तोते का रूप धारण कर दुल्हन के घर के प्रवेश द्वार पर बैठ जाता था, ताकि वह दूल्हे को परेशान कर उसका स्थान ले सके। जब एक विद्वान और साहसी राजकुमार ने इसे पहचान कर तलवार से उस प्रतीक (राक्षसी तोते) को मार गिराया, तब से यह रस्म स्थापित हुई। यह रस्म प्रतीकात्मक रूप से यह स्थापित करती है कि दूल्हा अपनी पत्नी की सुरक्षा के लिए साहसी, बलवान और जागरूक है—ठीक वैसे ही जैसे राजकुमार ने किया था।
मध्यकाल में भारतीय स्थापत्य पर इस्लामी और क्षेत्रीय शैलियों का गहरा प्रभाव पड़ा। मुगल वास्तुकला में, तोरण का शास्त्रीय स्वरूप मेहराब (Arch) और विशाल दरवाजा (Gate) में विलीन हो गया। मुगल इमारतों में 'तोरण' की जगह 'दरवाजा' या 'इवान' शब्द प्रचलित हुए (जैसे बुलंद दरवाजा), जो भव्यता, मजबूती और इस्लामी सजावटी तत्वों से सुसज्जित होते थे। हालांकि, राजपूत और विजयनगर जैसे हिन्दू राज्यों में पारंपरिक तोरणों का निर्माण जारी रहा। राजस्थान और गुजरात के मंदिरों और महलों में जटिल नक्काशीदार तोरण पाए जाते हैं, जो भारतीय शिल्पकला की अद्भुत मिसाल हैं। इस काल में भी, घरों और विवाह समारोहों में फूलों, आम के पत्तों और वस्त्रों से बने सजावटी तोरण (बंदनवार) का उपयोग शुभता और स्वागत के प्रतीक के रूप में आम रहा। ब्रिटिश काल में स्थापत्य का मिश्रण हुआ, लेकिन धार्मिक और सामाजिक रस्मों पर सीधे हस्तक्षेप की अनुपस्थिति में विवाह की तोरण रस्म ने अपना अस्तित्व बनाए रखा। यह रस्म गाँवों और कस्बों में पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रही, जबकि ब्रिटिश पुरातत्वविदों ने प्राचीन तोरणों का अध्ययन कर उन्हें वैश्विक पटल पर है।
आज़ादी के बाद, तोरण ने राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक के रूप में अपनी पहचान बनाई, लेकिन विवाह की रस्मों में इसका स्वरूप बदल गया। बाज़ारीकरण और शहरीकरण ने इस परंपरा में एक गंभीर विसंगति उत्पन्न कररस्म का मूल तत्त्व राक्षस का प्रतीक (लकड़ी का तोता) था, जिस पर वार करना थआज बाज़ार में बिकने वाले तोरण अक्सर सुंदर और आकर्षक होते हैं, लेकिन उन पर गणेशजी, स्वास्तिक, ॐ या अन्य पूज्यनीय देवी-देवताओं के चिह्न अंकित होते हैं।यह विसंगति धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से अस्वीकार्य है। विवाह समारोह के आरंभ में ही हम सर्वप्रथम गणेश पूजन करते हैं, उन्हें 'विघ्नहर्ता' मानकर सभी बाधाएं दूर करने का निमंत्रण देते हैं। ऐसे में, जब दूल्हा तलवार लेकर उस तोरण पर वार करता है जिस पर गणेशजी या कोई अन्य पूज्य चिह्न अंकित हो, तो वह अनजाने में पूज्य देवता का अपमान कर रहा होता है। धार्मिक विशेषज्ञ इस कार्य को गंभीर धार्मिक त्रुटि मानते हैं, क्योंकि यह उस पूजा और शुभ संकल्प के विपरीत है जिसके साथ विवाह आरंभ होता है। यह एक स्पष्ट विरोधाभास है: जहाँ एक ओर हम देवताओं का आवाहन करते हैं, वहीं दूसरी ओर प्रतीकात्मक रूप से उन पर प्रहार करता है।
तोरण रस्म भारतीय सभ्यता की एक अनमोल विरासत है, लेकिन इसका सही अर्थ समझना और उसका शुद्ध रूप में पालन करना हमारा दायित्व है। सत्य की पहचान: हमें यह याद रखना होगा कि तलवार का वार राक्षस के प्रतीक पर होता है, न कि किसी देवता के प्रतीक पर। परिवारों को विवाह आयोजकों को स्पष्ट निर्देश देने चाहिए कि तोरण केवल पारंपरिक राक्षसी रूपी तोते वाला ही हो, जिस पर किसी भी प्रकार का धार्मिक या मांगलिक चिह्न अंकित न हो: पुरोहितों और सांस्कृतिक शिक्षकों को इस रस्म के पीछे की प्रामाणिक कथा से लोगों को अवगत कराना चाहिए ताकि यह विसंगति दूर हो सके। तोरण द्वार केवल सजावट नहीं, बल्कि दूल्हे के साहस और सुरक्षा के संकल्प का प्रतीक है। आइए, हम इस ऐतिहासिक रस्म को उसके वास्तविक गौरव, पवित्रता और सत्यता के साथ निभाएं, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ भी संस्कृति के इस मूल अर्थ को समझ सके ।

सोमवार, दिसंबर 08, 2025

वंदे मातरम में समाहित है राष्ट्र की आत्मा

वन्दे मातरम्: दो शब्दों में समाहित राष्ट्र की आत्मा 
सत्येन्द्र कुमार पगठक 
भारत के राष्ट्रीय गीत, वन्दे मातरम् का उद्घोष मात्र दो शब्दों का नहीं है, बल्कि यह लगभग आधी शताब्दी तक चले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का जयघोष रहा है। यह बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा संस्कृत और बाँग्ला के मिश्रण से रचित वह अमर गीत है, जिसने सदियों से सुप्त पड़े एक राष्ट्र को झकझोर कर जगा दिया और उसे 'माता' के रूप में अपनी भूमि के प्रति प्रेम और बलिदान का पाठ सिखाया। सन् 1882 में बंकिमचन्द्र के कालजयी उपन्यास ‘आनन्द मठ’ में एक अंतर्निहित गीत के रूप में प्रकाशित होकर, यह केवल एक साहित्यिक रचना नहीं रहा, बल्कि यह भारत की राजनीतिक और सांस्कृतिक चेतना का केंद्र बन गया। यह वह गीत है जिसे गाने में केवल 65 सेकंड (1 मिनट और 5 सेकंड) लगते हैं, लेकिन इसके प्रभाव ने भारत के इतिहास की दिशा बदल दी। इसकी धुन यदुनाथ भट्टाचार्य ने बनाई थी, और यह उपन्यास में भवानन्द नामक एक संन्यासी विद्रोही द्वारा गाया गया था, जो अंग्रेजों और तत्कालीन शोषक व्यवस्था के विरुद्ध उठ खड़ा हुआ था।
वन्दे मातरम् की रचना आकस्मिक नहीं थी, बल्कि यह ब्रिटिश शासन के एक अपमानजनक आदेश की सीधी प्रतिक्रिया थी। सन् 1870-80 के दशक में, ब्रिटिश शासकों ने सभी सरकारी समारोहों में ब्रिटिश राष्ट्रगान ‘गॉड! सेव द क्वीन’ गाया जाना अनिवार्य कर दिया था। बंकिमचन्द्र चटर्जी, जो उस समय एक डिप्टी कलेक्टर के पद पर कार्यरत थे, उन्हें इस आदेश से गहरा आघात लगा। माना जाता है कि लगभग 1876 में, उन्होंने इसके विकल्प के तौर पर संस्कृत और बाँग्ला के मिश्रण से एक नए गीत की रचना की। शुरुआती दौर में, इस गीत के केवल दो ही पद रचे गए थे, जो विशुद्ध संस्कृत में थे और केवल मातृभूमि की वंदना करते थे: "वन्दे मातरम् ! सुजलां सुफलां मलयज शीतलाम्, शस्य श्यामलाम् मातरम्।" "शुभ्र ज्योत्स्नां पुलकित यमिनीम्, फुल्ल कुसुमित द्रुमदल शोभिनीम् ; सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्, सुखदां वरदां मातरम्।"ये पद मातृभूमि के नैसर्गिक सौंदर्य—पानी से सिंचित, फलों से भरी, शांत, हरी-भरी, चांदनी रातों से पुलकित, फूलों से सुसज्जित—को दर्शाते थे।।सन् 1882 में जब बंकिमचन्द्र ने अपना उपन्यास ‘आनन्द मठ’ लिखा, तब उन्होंने इस गीत को उसमें शामिल कर लिया। यह उपन्यास अंग्रेजी शासन, जमींदारों के शोषण और अकाल जैसे प्राकृतिक प्रकोपों के बीच मर रही जनता को जागृत करने हेतु अचानक उठ खड़े हुए संन्यासी विद्रोह पर आधारित था। उपन्यास में, शुरुआती संस्कृत पदों के बाद के जो पद थे, वे उपन्यास की मूल भाषा, बाँग्ला में थे। इन बाद वाले पदों में मातृभूमि की स्तुति को हिन्दू देवी दुर्गा के रूप में किया गया था: "तुमि विद्या, तुमि धर्म, तुमि हृदि, तुमि मर्म... त्वम् हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी..." यहीं से इस गीत ने केवल एक वंदना गीत होने के बजाय एक शक्तिशाली राजनीतिक और धार्मिक प्रतीक का रूप ले लिया।
वन्दे मातरम् जल्द ही एक साहित्यिक रचना की सीमाओं को तोड़कर जन-आंदोलन का केंद्रीय मंत्र बन गया।
कांग्रेस मंच पर पदार्पण: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 12वें अधिवेशन (1896, कलकत्ता) में रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने इसे मंच से गाया। इसके बाद, 1901 में श्री चरणदास और 1905 के बनारस अधिवेशन में सरला देवी चौधरानी ने इसे स्वर दिया।बंग भंग का नारा: 1905 में जब लॉर्ड कर्जन ने बंगाल के विभाजन की घोषणा की, तो वन्दे मातरम् राष्ट्रीय विरोध का आधिकारिक नारा बन गया। 6 अगस्त 1905 को टाउन हॉल की सभा में लगभग तीस हज़ार भारतीयों ने इस गीत को एक साथ गाया। 'वन्दे मातरम् संप्रदाय' की स्थापना भी हो गई।
ब्रिटिश दमन और बलिदान: ब्रिटिश सरकार इसकी बढ़ती लोकप्रियता से भयभीत हो उठी और उसने इस पर प्रतिबंध लगाने पर विचार करना शुरू कर दिया। 14 अप्रैल 1906 को बरिशाल में जुलूस में वन्दे मातरम् का नारा लगाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया, और शांतिपूर्ण जुलूस पर लाठीचार्ज किया गया। इस गीत पर प्रतिबंध लगने के बाद भी, यह क्रांतिकारियों की आत्मा में समाया रहा। लाला लाजपत राय ने लाहौर से जिस 'जर्नल' का प्रकाशन शुरू किया, उसका नाम ही 'वन्दे मातरम्' रखा। अंग्रेजों की गोली का शिकार बनकर दम तोड़ने वाली मातंगिनी हाजरा की जिह्वा पर आखिरी शब्द "वन्दे मातरम्" ही थे। वैश्विक पहचान: सन् 1907 में जब मैडम भीखाजी कामा ने जर्मनी के स्टुटगार्ट में तिरंगा फहराया, तो उस ध्वज के मध्य में "वन्दे मातरम्" ही लिखा हुआ था। सन् 2003 में, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस द्वारा आयोजित एक अन्तरराष्ट्रीय सर्वेक्षण में, वन्दे मातरम् को दुनिया भर के शीर्ष 10 सबसे मशहूर गीतों में दूसरे स्थान पर चुना गया था। 'वन्दे मातरम्' या 'बन्दे मातरम्': एक लिपिगत और भाषिक द्वंद्व एक रोचक और गहन भाषिक चर्चा इसके शीर्षक को लेकर भी हुई थी ।: यह गीत मूल रूप में बाँग्ला लिपि में लिखा गया था। चूँकि बाँग्ला लिपि में 'व' अक्षर का उच्चारण 'ब' के समान होता है (या 'व' अक्षर मौजूद ही नहीं है), इसलिए बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने इसे 'बन्दे मातरम्' शीर्षक से लिखा था।  संस्कृत और हिन्दी भाषा (देवनागरी लिपि) में 'वन्दे' शब्द ही सही व्याकरणिक रूप है, जिसका अर्थ है 'मैं वंदना करता हूँ'। 'बन्दे मातरम्' का संस्कृत में कोई स्पष्ट या सही अर्थ नहीं निकलता।
वन्दे मातरम् (माता की वंदना करता हूँ) उच्चारण और अर्थ की शुद्धता को ध्यान में रखते हुए, देवनागरी लिपि में इसे 'वन्दे मातरम्' ही लिखना और पढ़ना समीचीन माना गया। भारतीय संविधान के पृष्ठ 167 पर भी व्यौहार राममनोहर सिंहा द्वारा चित्रित इस शीर्षक को 'वन्दे–मातरम्' ही लिखा गया था। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद, भारत के सर्वोच्च सम्मान, यानी राष्ट्रगान के चयन का प्रश्न उठा।: वन्दे मातरम् के साथ मुख्य समस्या यह थी कि इसके बाद के पदों में देवी दुर्गा का आह्वान किया गया था, जिसे कुछ मुस्लिम समुदाय के सदस्य इस्लाम के एकेश्वरवाद के विरुद्ध मानते थे। साथ ही, 'आनन्द मठ' उपन्यास पर मुस्लिम विरोधी होने का आरोप भी था। कांग्रेस का समाधान (1937): इस विवाद पर गहरा चिंतन करते हुए जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में गठित समिति (जिसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद भी शामिल थे) ने यह निष्कर्ष निकाला कि गीत के शुरुआती दो पद विशुद्ध रूप से मातृभूमि की प्रशंसा में हैं, लेकिन बाद के पदों में हिन्दू देवी-देवताओं का जिक्र होने लगता है।: इसलिए, यह निर्णय लिया गया कि गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर द्वारा रचित और गाये गए गीत 'जन गण मन अधिनायक जय हे' को यथावत राष्ट्रगान (National Anthem) बनाया जाएगा, और बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा रचित वन्दे मातरम् के प्रारम्भिक दो पदों को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया जाएगा।
24 जनवरी 1950 को, डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा में वक्तव्य दिया कि वन्दे मातरम् गान, जिसने स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, को 'जन गण मन' के समकक्ष सम्मान व पद मिलेगा। सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष बिजोय एम्मानुएल वर्सेस केरल राज्य वाद में यह प्रश्न उठा कि क्या किसी को कोई गीत गाने के लिए मजबूर किया जा सकता है। न्यायालय ने फैसला सुनाया कि यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान (या राष्ट्रगीत) का सम्मान करता है पर उसे गाता नहीं है, तो उसे दण्डित नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह उसके व्यक्तिगत विवेक और धार्मिक स्वतंत्रता का विषय हो सकता है।।वन्दे मातरम् केवल एक संवैधानिक या कानूनी गीत नहीं है। यह भारत की सांस्कृतिक, साहित्यिक और आध्यात्मिक यात्रा का प्रतीक है। यह गीत आज भी देश के हर कोने में उस मातृशक्ति के प्रति श्रद्धा और प्रेम का भाव जगाता है, जिसने सदियों की गुलामी को तोड़कर स्वतंत्रता प्राप्त की। यह दो शब्द आज भी हर भारतीय को अपनी भूमि, अपने जल, फल और हरीतिमा के प्रति नमन करने के लिए प्रेरित करते हैं।भारत सरकार ने राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' की 150वीं वर्षगाँठ को एक ऐतिहासिक अवसर के रूप में चिह्नित करते हुए, 7 नवंबर 2025 से 7 नवंबर 2026 तक देश भर में भव्य समारोहों के आयोजन का निर्णय लिया है। यह पहल न केवल भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में इस गीत की अमर भूमिका को स्वीकार करती है, बल्कि इसकी स्थायी सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय महत्व को भी प्रदर्शित करती है। यह निर्णय उस गीत को एक विनम्र श्रद्धांजलि है जिसने पीढ़ियों को स्वतंत्रता के संघर्ष के लिए प्रेरित किया। कार्तिक शुक्ल  अक्षय तृतीया  7 नवम्बर 1875 को वंदे मातरम की रचना का उद्घोष  हुआ था ।
'वंदे मातरम' मूल रूप से एक कविता है, जिसे महान बंगाली साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में संस्कृतनिष्ठ बंगाली भाषा में लिखा था। इस गीत को पहली बार 1882 में उनके प्रसिद्ध बंगाली उपन्यास 'आनंदमठ' में प्रकाशित किया गया था, जो संन्यासी विद्रोह पर आधारित था।इस गीत की शक्ति इसके सरल आह्वान में निहित है—मातृभूमि को प्रणाम। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत माता की स्तुति में लिखा गया एक भावपूर्ण आह्वान था। आनंदमठ में इसका प्रकाशन ही इस गीत के इतिहास का 150 वां वर्ष पूरा होने का आधार है, जिसे 'वंदे मातरम 150' के रूप में मनाया जा रहा है।  'वंदे मातरम' भारत की आजादी की लड़ाई में एक शक्तिशाली नारे और प्रेरणा स्रोत के रूप में उभरा। यह गीत शीघ्र ही स्वतंत्रता सेनानियों के बीच देशभक्ति का पर्याय बन गया। महान कवि रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार 1896 में कलकत्ता में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में गाया था, जिसने इसे राष्ट्रीय मंच प्रदान किया।
राजनीतिक नारा: 'वंदे मातरम' का पहली बार राजनीतिक नारे के रूप में प्रयोग 7 अगस्त 1905 को बंगाल विभाजन के विरोध में हुए आंदोलनों के दौरान हुआ, जहाँ इसने पूरे राष्ट्र को एकजुट करने का काम किया। यह गीत भारतीय राष्ट्रवाद की मुखर अभिव्यक्ति बन गया, जिससे ब्रिटिश सरकार भयभीत हो गई और उसने इसे दबाने का हर संभव प्रयास किया।
आजादी मिलने के बाद, 'वंदे मातरम' को आधिकारिक तौर पर सम्मान प्रदान किया गया। 24 जनवरी 1950 को, संविधान सभा ने इसे भारत गणराज्य के राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया। यह दर्जा राष्ट्रगान 'जन गण मन' के समकक्ष है, और दोनों ही राष्ट्र की पहचान और गौरव का प्रतीक हैं।'वंदे मातरम' सिर्फ एक धुन या पाठ मात्र नहीं है; यह भारत की आत्मा, इसकी भूमि, संस्कृति और इसके लोगों के लिए बलिदान की भावना का प्रतीक है। 150वीं वर्षगाँठ का यह राष्ट्रव्यापी उत्सव नई पीढ़ी को इस गीत के ऐतिहासिक महत्व, इसके रचनाकार के योगदान और स्वतंत्रता संग्राम के आदर्शों से जोड़ने का एक सुनहरा अवसर है। यह वर्ष हमें याद दिलाता है कि यह गीत आज भी भारत की एकता और अखंडता के लिए एक प्रेरणा शक्ति बना हुआ है।
भारत सरकार ने राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' की 150वीं वर्षगाँठ को एक ऐतिहासिक अवसर के रूप में चिह्नित करते हुए, 7 नवंबर 2025 से 7 नवंबर 2026 तक देश भर में भव्य समारोहों के आयोजन का निर्णय लिया है। यह पहल न केवल भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में इस गीत की अमर भूमिका को स्वीकार करती है, बल्कि इसकी स्थायी सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय महत्व को भी प्रदर्शित करती है। यह निर्णय उस गीत को एक विनम्र श्रद्धांजलि है जिसने पीढ़ियों को स्वतंत्रता के संघर्ष के लिए प्रेरित किया। कार्तिक शुक्ल  अक्षय तृतीया  7 नवम्बर 1875 को वंदे मातरम की रचना का उद्घोष  हुआ था ।
'वंदे मातरम' मूल रूप से एक कविता है, जिसे महान बंगाली साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में संस्कृतनिष्ठ बंगाली भाषा में लिखा था। इस गीत को पहली बार 1882 में उनके प्रसिद्ध बंगाली उपन्यास 'आनंदमठ' में प्रकाशित किया गया था, जो संन्यासी विद्रोह पर आधारित था।इस गीत की शक्ति इसके सरल आह्वान में निहित है—मातृभूमि को प्रणाम। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत माता की स्तुति में लिखा गया एक भावपूर्ण आह्वान था। आनंदमठ में इसका प्रकाशन ही इस गीत के इतिहास का 150 वां वर्ष पूरा होने का आधार है, जिसे 'वंदे मातरम 150' के रूप में मनाया जा रहा है।  'वंदे मातरम' भारत की आजादी की लड़ाई में एक शक्तिशाली नारे और प्रेरणा स्रोत के रूप में उभरा। यह गीत शीघ्र ही स्वतंत्रता सेनानियों के बीच देशभक्ति का पर्याय बन गया। महान कवि रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार 1896 में कलकत्ता में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में गाया था, जिसने इसे राष्ट्रीय मंच प्रदान किया।
राजनीतिक नारा: 'वंदे मातरम' का पहली बार राजनीतिक नारे के रूप में प्रयोग 7 अगस्त 1905 को बंगाल विभाजन के विरोध में हुए आंदोलनों के दौरान हुआ, जहाँ इसने पूरे राष्ट्र को एकजुट करने का काम किया। यह गीत भारतीय राष्ट्रवाद की मुखर अभिव्यक्ति बन गया, जिससे ब्रिटिश सरकार भयभीत हो गई और उसने इसे दबाने का हर संभव प्रयास किया।
आजादी मिलने के बाद, 'वंदे मातरम' को आधिकारिक तौर पर सम्मान प्रदान किया गया। 24 जनवरी 1950 को, संविधान सभा ने इसे भारत गणराज्य के राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया। यह दर्जा राष्ट्रगान 'जन गण मन' के समकक्ष है, और दोनों ही राष्ट्र की पहचान और गौरव का प्रतीक हैं।'वंदे मातरम' सिर्फ एक धुन या पाठ मात्र नहीं है; यह भारत की आत्मा, इसकी भूमि, संस्कृति और इसके लोगों के लिए बलिदान की भावना का प्रतीक है। 150वीं वर्षगाँठ का यह राष्ट्रव्यापी उत्सव नई पीढ़ी को इस गीत के ऐतिहासिक महत्व, इसके रचनाकार के योगदान और स्वतंत्रता संग्राम के आदर्शों से जोड़ने का एक सुनहरा अवसर है। यह वर्ष हमें याद दिलाता है कि यह गीत आज भी भारत की एकता और अखंडता के लिए एक प्रेरणा शक्ति बना हुआ है।