बुधवार, मार्च 11, 2026

भूले बिखरे बाल कहानी , कविता , नाटक

 दलान वाली गुलाबी रंग
फागुन की गुलाबी ठंड विदा हो रही थी और हवा में टेसू के फूलों की भीनी-भीनी महक घुलने लगी थी। गाँव के पुराने पुश्तैनी घर का 'दादाजी का दलान' (बड़ी बैठक) आज खिलखिला रहा था। शहर की भीड़भाड़ से दूर, माता-पिता के साथ पाँचों बच्चे—अंशिका (10 वर्ष), दियांशु (8 वर्ष), शशांक (7 वर्ष), बुच्चन (5 वर्ष) और नन्हा प्रियांशु (3 वर्ष)—दादाजी के पास होली मनाने आए थे ।
सुबह का समय था। आंगन में दादीजी और माताजी गोबर से छोटी-छोटी गोल टिकिया बना रही थीं, जिनके बीच में छेद था। ८ साल का दियांशु और ७ साल का शशांक बड़े कौतूहल से यह सब देख रहे थे।
दियांशु: "मम्मी, क्या आप गोबर के 'डोनट्स' बना रही हैं? हम इनका क्या करेंगे?"
माताजी (हँसते हुए): "नहीं बेटा, ये डोनट्स नहीं, 'होलिया' (बड़कुल्ले) हैं। इन्हें मूंज की रस्सी में पिरोकर माला बनाई जाती है।"
तभी १० साल की अंशिका ने पूछा, "लेकिन दादाजी, गोबर को आग में जलाना क्या प्रदूषण नहीं है? शहर में तो सब कहते हैं कि धुआं बुरा होता है।"
दादाजी ने चश्मा ठीक किया और बच्चों को पास बुलाया। "बिटिया, यह हमारी प्राचीन विज्ञान का हिस्सा है। गाय के शुद्ध गोबर में कपूर और गूगल मिलाकर जब इसे होलिका दहन की पवित्र अग्नि में डाला जाता है, तो इससे निकलने वाला धुआं हवा में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया को खत्म करता है। यह ऋतु परिवर्तन के समय वातावरण को 'सैनिटाइज' करने का प्राकृतिक तरीका है।"
होलिका दहन: बुराई पर अच्छाई की लौ से शाम ढलते ही गाँव के चौराहे पर लकड़ियों का ऊँचा ढेर लग गया। ३ साल का नन्हा प्रियांशु अपनी छोटी सी पिचकारी को बंदूक की तरह पकड़े इधर-उधर भाग रहा था। ५ साल का बुच्चन पास ही रखी मिठाई की थाली निहारने में व्यस्त था। जब अग्नि प्रज्वलित की गई, तो दादाजी ने बच्चों को घेरकर बिठाया और कहानी सुनाई:
"बच्चों, यह आग प्रतीक है कि अहंकारी हिरण्यकश्यप और उसकी बहन होलिका की बुराई जलकर राख हो गई, जबकि ईश्वर पर अटूट विश्वास रखने वाला भक्त प्रहलाद सुरक्षित रहा। जीवन में चाहे कितनी भी मुश्किलें आएं, अगर आप सच्चाई के रास्ते पर हैं, तो जीत आपकी ही होगी।"
बुच्चन: "क्या हम भी प्रहलाद की तरह बहादुर बन सकते हैं?"
दादाजी: "बिल्कुल! जब तुम किसी कमजोर की मदद करोगे और कभी झूठ का साथ नहीं दोगे, तो तुम भी प्रहलाद ही कहलाओगे।"
अगले दिन 'धुलेंडी' थी। शशांक एक बाल्टी में गहरा पक्का रंग घोलकर लाया और घर के पालतू कुत्ते 'शेरू' की ओर दौड़ने लगा। अंशिका (चिल्लाते हुए): "रुको शशांक! जानवरों को रंग नहीं लगाना चाहिए। उनकी त्वचा बहुत कोमल होती है और वे रंग चाट लें तो बीमार पड़ सकते हैं। क्या तुम अपने बेजुबान दोस्त को बीमार करना चाहते हो?"
शशांक शर्मिंदा होकर रुक गया। तभी पिताजी ने बीच बचाव किया और टोकरियों में भरी गुलाब की पंखुड़ियां ले आए। "आज हम रसायनों से नहीं, प्रकृति के रंगों से खेलेंगे। इससे न पानी बर्बाद होगा, न किसी की आँखें जलेंगी।"
फिर क्या था! पूरे दलान में फूलों की बारिश होने लगी। प्रियांशु ने पिचकारी में गुलाब जल भरकर सबको भिगोना शुरू किया। हवा गुलाब की महक से भर गई। न कीचड़ था, न गंदगी, बस शुद्ध आनंद था।
पकवानों का ज़ायका और मीठी सीख : दोपहर को माताजी ने मेज सजा दी। गुझिया, मठरी, कांजी वड़ा और ठंडाई देखकर बच्चों की भूख चमक उठी।
बुच्चन: "दादी, ये गुझिया इतनी सुंदर कैसे बनी है? इसके किनारों पर तो बारीक डिजाइन है!"
दादीजी: "बेटा, जैसे हम प्यार से गुझिया के मीठे खोए को मैदे के अंदर गूँथते हैं, वैसे ही परिवार को भी प्यार से पिरोकर रखना चाहिए। मीठा स्वाद कड़वाहट को मिटा देता है।"
भोजन के बाद दादाजी ने बच्चों को होली के चार सुनहरे नियम सिखाए:
क्षमा भाव: होली का अर्थ है 'जो हो ली, सो हो ली'—पुरानी बातों को भूलकर गले मिलना।
समानता: रंगों के नीचे सबका चेहरा एक जैसा दिखता है, कोई छोटा-बड़ा नहीं होता।
प्रकृति प्रेम: पानी बचाना और फूलों से खेलना ही सच्ची समझदारी है।
स्वच्छता: जैसे होलिका जलाई, वैसे ही अपने मन का गुस्सा और आलस भी जला दो।
सूरज ढलने लगा था। बच्चे थककर चूर थे लेकिन उनके चेहरों पर एक नई चमक थी। उन्होंने न केवल होली खेली थी, बल्कि जीवन के गहरे संस्कार भी सीखे थे। अंशिका ने अपनी डायरी में लिखा— "आज की होली केवल रंगों की नहीं, बल्कि रिश्तों और खुशियों की होली थी।"गाँव की वह होली बच्चों के मन में हमेशा के लिए एक मीठी याद बनकर बस गई।
कहानी की मुख्य शिक्षा:"त्यौहार केवल शोर-शराबे का नाम नहीं है, बल्कि यह बुराई त्यागने, प्रकृति का सम्मान करने और अपनों के प्रति प्रेम व्यक्त करने का माध्यम है।"

 सीख और दुलार
बस्ता भारी, आँखें भारी, डुग्गू खड़ा उदास,
खेल कूद की दुनिया उसको, लगती सबसे खास।
मम्मी आईं, हाथ बढ़ाया, पकड़ा उसका कान,
बोलीं— "छोड़ो अब शैतानी, ओ मेरे कप्तान!"
पुच्चू खड़ा सजा-धजा सा, पहने सुंदर ड्रेस,
बनी टाई, चमके जूते, जैसे छोटा प्रेस।
मम्मी ने पुच्चू को चूमा, भेजा उसे स्कूल,
बोलीं— "बेटा, पढ़ना-लिखना, जीवन का है मूल।"
डुग्गू बोला— "देखो मम्मी, दोस्त खेल रहे बाहर,
मुझे नहीं जाना है स्कूल, मुझे नहीं पढ़ना अक्षर!"
मम्मी ने तब पास बिठाया, सिर पर फेरा हाथ,
शिक्षा और खेल की महिमा, समझाई एक साथ।
"जो पढ़ता है, वही बढ़ता है, जग में पाता मान,
खेल से बनता शरीर बलिष्ठ, पढ़ाई से बढ़ता ज्ञान।
मैदान सिखाता है लड़ना, और टीम का साथ,
कलम सिखाती है दुनिया को, रखना अपने हाथ।"
"जाओ डुग्गू, स्कूल पुकारे, पढ़कर तुम घर आना,
शाम ढले फिर सखा-संग तुम, जी भरकर खेल रचाना।
शिक्षा बिना जीवन अधूरा, जैसे बिन खुशबू फूल,
पढ़ना-खेलना दोनों साथी, जाओ अब तुम स्कूल।"
पात्रों का चित्रण: ८ साल के डुग्गू की चंचलता और ५ साल के पुच्चू की सरलता। भाव: माँ का कड़ा अनुशासन (कान पकड़ना) और फिर ममता भरा दुलार। संदेश: शिक्षा और खेल के बीच संतुलन का महत्व।

सुनहरा बस्ता और जादुई मैदान
सुबह के आठ बज रहे थे। घर में अफरा-तफरी का माहौल था। ८ साल का डुग्गू अपने सोफे के पीछे छिपा बैठा था, जबकि ५ साल का छोटा पुच्चू अपनी नई स्कूल ड्रेस पहनकर आइने के सामने खुद को निहार रहा था। पुच्चू अपनी टाइट टाई और चमचमाते जूतों को देखकर बहुत खुश था, उसे लग रहा था जैसे वह कोई बड़ा अफसर बन गया हो।
तभी माँ की आवाज गूँजी— "डुग्गू! कहाँ हो तुम? बस आने ही वाली है!"
डुग्गू दबे पाँव खिड़की की ओर बढ़ा। बाहर खेल का मैदान दिख रहा था, जहाँ कुछ बच्चे गेंद से खेल रहे थे। डुग्गू का मन मचल गया। उसने सोचा, "अगर मैं आज स्कूल न जाऊँ, तो पूरा दिन उस मैदान में छक्के छुड़ा सकता हूँ।" उसने धीरे से अपना बस्ता सोफे के नीचे धकेला और पिछवाड़े के दरवाजे से भागने की कोशिश की।
लेकिन माँ की नजरें पारखी थीं। जैसे ही डुग्गू ने दरवाजा खोला, माँ ने पीछे से उसका कान पकड़ लिया।
"आह! मम्मी, दर्द हो रहा है!" डुग्गू बिलबिलाया।
माँ ने मुस्कुराते हुए पर थोड़े सख्त लहजे में कहा, "आजकल तुम्हारा मन पढ़ाई से ज्यादा मैदान में लग रहा है, मिस्टर डुग्गू। चलो, सीधे तैयार हो जाओ!"
पुच्चू अपनी पानी की बोतल लटकाए पास खड़ा था। उसने अपनी मासूम आवाज में कहा, "भैया, देखो मैं तो 'गुड बॉय' बन गया, आप तो 'बैड बॉय' बन रहे हो!" माँ ने पुच्चू के गाल थपथपाए और उसे स्कूल बस तक छोड़ने चली गईं।
जब माँ वापस आईं, तो उन्होंने देखा कि डुग्गू अब भी मुँह फुलाए बैठा है। माँ का गुस्सा अब शांत हो गया था। उन्होंने उसे पास बुलाया और गोद में बिठाकर बड़े प्यार से बाल सहलाए।
माँ ने कहा, "डुग्गू, क्या तुम जानते हो कि मैदान और स्कूल के बीच क्या रिश्ता है?"
डुग्गू ने सिर हिलाया— "नहीं मम्मी, मैदान में मजा आता है और स्कूल में सिर्फ बोरियत।"
माँ ने समझाया, "देखो बेटा, खेल का मैदान तुम्हें ताकत देता है। वह तुम्हें सिखाता है कि हारने के बाद फिर से कैसे खड़ा होना है। लेकिन यह जो स्कूल है न, यह तुम्हें दिमाग की शक्ति देता है। अगर तुम्हारे पास सिर्फ ताकत होगी और बुद्धि नहीं, तो दुनिया तुम्हें पीछे छोड़ देगी। जैसे एक क्रिकेट मैच जीतने के लिए सिर्फ तेज गेंद फेंकना काफी नहीं होता, बल्कि दिमाग से 'स्ट्रेटेजी' भी बनानी पड़ती है।"
डुग्गू ध्यान से सुन रहा था। माँ ने आगे कहा, "जो बच्चा पढ़ता है, वह बड़ा होकर दुनिया को समझता है। और जो खेलता है, वह स्वस्थ रहता है। मैं नहीं चाहती कि तुम सिर्फ किताबी कीड़ा बनो, लेकिन मैं यह भी नहीं चाहती कि तुम अनपढ़ पहलवान बनो। स्कूल जाओ, अक्षर सीखो, ज्ञान पाओ और शाम को इसी मैदान में जाकर खूब पसीना बहाओ।"
माँ की बातों ने डुग्गू के नन्हे मन पर जादू कर दिया। उसे समझ आ गया कि पढ़ाई बोझ नहीं, बल्कि उसके सपनों की चाबी है। उसने झटपट अपनी ड्रेस पहनी, कंघी की और अपना बस्ता उठाकर माँ के पैर छुए।
जाते-जाते उसने कहा, "मम्मी, आज मैं स्कूल में सबसे ज्यादा सवाल पूछूँगा और शाम को पुच्चू के साथ मैदान में सबसे ज्यादा रन बनाऊँगा!"
माँ ने उसे गले लगाया और हाथ हिलाकर विदा किया। घर के दरवाजे पर खड़ी माँ सोच रही थी कि बच्चे को सही राह पर लाने के लिए कभी कान पकड़ना पड़ता है, तो कभी प्यार से समझाना। अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 
1. मगही (मगध की गौरवमयी वाणी)
आल्हा शैली (वीरता का भाव):
सुमिरन करूँ मैं सरस्वती के, मगही के गुण गाऊँ रे।
बिम्बिसार और जरासंध के, माटी के याद दिलाऊँ रे॥
बाल गीत:
पढ़ लिख के तू बनबा बाबू, मगही कखनो न भूलिहै।
जे अपन भाषा के छोड़लक, ओकर जड़ से नाता टूटिहै॥
मगध के ई पावन बोली, पुरखन के ई वरदान हय।
एकरा बोले में गरब करहु, ईहे हमर पहचान हय॥
फाग शैली (मधुर लय):
फागुन आइल मगही गाबय, डफ पर थाप लगावय रे।
बाल गीत:
आवौ खेलौ होरी भैया, मगही के पिचकारी से।
मिश्री जैसन घोलौ बोली, दुनिया के फुलवारी से॥
माई-बाबू बोलथिन जेकर, उहे संस्कार हमर हय।
मगही में जे बात कहली, उहे असली प्यार हमर हय॥
2. बज्जिका (वैशाली की लोक-वाणी)
आल्हा शैली (चेतना का भाव):
वैशाली के पावन धरती, लोकतंतर के आदि विचार।
बज्जिका के झंडा गाड़ौ, ईहे हय असली अधिकार॥
बाल गीत:
बज्जिका हमनी के बोली, एकरा में जान बसल बा।
बचपन के हर एक खेल में, ईहे सुर-ताल फँसल बा॥
लाज छोड़ि के बोलहु सब कोइ, लाज कहै के बात नई।
जे अपन बोली ना बोलय, ओकर कतहु बिसात नई॥

फाग शैली (उल्लास):
जोगिरा सा रा रा रा... बज्जिका में रंग उड़ाबय रे!
बाल गीत:
बज्जिका के मीठ-मीठ बोली, कान में अमृत घोलय बा।
जेना कोयल बोले बगिया, ओना लइका बोलय बा॥
माटी के ई गमक हय भैया, ईहे हमर सिंगार हय।
बज्जिका में जे गीत गावै, ओकरा सबसे प्यार हय॥
3. भोजपुरी (वैश्विक पहचान की मिठास)
आल्हा शैली (शौर्य और स्वाभिमान):
बाबू कुँवर सिंह के धरती, बिस्मिल्लाह के शहनाई बा।
भोजपुरी के मान बढ़ावहु, ईहे सबसे बड़ाई बा॥
बाल गीत:
शेर जइसन गरज के बोलऽ, भोजपुरी के तान रहे।
दुनिया के कवनो कोना में, ई माटी के शान रहे॥
जे माई के दूध पी लेलस, ऊ माई के बोली बोली।
भोजपुरी के ताकत देखऽ, जइसे चलल बंदूक के गोली॥

फाग शैली (फगुआ/हंसी-ठिठोली):
सदा आनंद रहे एही द्वारे... भोजपुरी रस बरसे रे!
बाल गीत:
भोजपुरी के फाग निराला, जइसन चोखा-बाटी रे।
दुनिया भर के खुशबू मिल जाई, अपनी देस के माटी रे॥
लइका-बच्चा सब मिल गावे, 'का हाल बा' जब पूछेले।
मन के सारा दुःख कट जाला, जब भोजपुरी में बूझेले॥

इन गीतों का उद्देश्य नई पीढ़ी (बच्चों) के मन से अपनी भाषा के प्रति 'हीन भावना' को खत्म करना है। जैसा कि सत्येंद्र जी ने कहा है, "मातृभाषा वह प्रथम गुरु है जो हमें दुनिया को देखना सिखाती है।"

: मातृभाषा: सांस्कृतिक अस्मिता का आधार 
भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि किसी भी सभ्यता की आत्मा होती है। वह संस्कारों की संवाहक और इतिहास की साक्षी है। जब एक भाषा मरती है, तो उसके साथ एक पूरी संस्कृति, परंपरा और ज्ञान का खजाना विलुप्त हो जाता है। इसी चेतना को जागृत करने के लिए हर साल 21 फरवरी को संपूर्ण विश्व में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है। इस दिवस की उत्पत्ति के पीछे संघर्ष और शहादत की एक मर्मस्पर्शी कहानी है। 1952 का भाषा आंदोलन: तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में अपनी मातृभाषा 'बांग्ला' को राजकीय दर्जा दिलाने के लिए छात्रों और आम नागरिकों ने आंदोलन किया। 21 फरवरी 1952 को ढाका मेडिकल कॉलेज के पास पुलिस की गोलियों से कई युवा शहीद हुए। उन शहीदों की याद में ढाका में 'शहीद मीनार' का निर्माण किया गया, जो आज भी भाषायी प्रेम का प्रतीक है।यूनेस्को की स्वीकृति: बांग्लादेश के इसी लंबे संघर्ष को अंतरराष्ट्रीय पहचान तब मिली जब 17 नवंबर, 1999 को यूनेस्को ने 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में घोषित किया।
वैश्विक संकल्प: संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2008 को 'अंतरराष्ट्रीय भाषा वर्ष' घोषित कर इस बात पर जोर दिया कि बहुभाषावाद ही विश्व शांति और विकास का मार्ग है। भारत के हृदय स्थल, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के एक विशाल भू-भाग (बुंदेलखंड) में बोली जाने वाली बुंदेलखंडी भाषा वीरता, प्रेम और भक्ति के रस से सराबोर है। आल्हा-ऊदल के किस्से हों या ईसुरी की फागें, बुंदेलखंडी की मिठास बेजोड़ है। पीढ़ियों का अंतराल: आज के दौर में बुंदेलखंडी बोलने वाले लोग तो बहुत हैं, लेकिन नई पीढ़ी (बच्चों) में इसके प्रति हीन भावना या अन्य भाषाओं के प्रति अत्यधिक लगाव देखा जा रहा है। कामकाज की भाषा न होने के कारण यह केवल बोलचाल तक सीमित रह गई है। प्राथमिक स्तर पर बच्चों को उनकी मातृभाषा में सीखने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। शासकीय प्रयोजन: सरकारी कार्यालयों और जन-संवाद के कार्यक्रमों में बुंदेलखंडी के प्रयोग को बढ़ावा देना आवश्यक है।डिजिटल उपस्थिति: सोशल मीडिया और आधुनिक माध्यमों पर बुंदेलखंडी साहित्य और संगीत का प्रचार-प्रसार। भाषा की सेवा करने वालों का सम्मान करना समाज का कर्तव्य है। इसी दिशा में लिन्ग्गुआपाक्स पुरस्कार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भाषायी विविधता के लिए दिया जाता है। खुशी का विषय है कि इस वर्ष (21 फरवरी 2026) काठमांडू, नेपाल में आयोजित एक गरिमामयी समारोह में फाउंडेशन नेपाल द्वारा सत्येन्द्र कुमार पाठक को 'मातृभाषा रत्न' की मानद उपाधि से सम्मानित किया जा रहा है। ऐसे सम्मान न केवल व्यक्ति को बल्कि उस पूरी भाषायी विरासत को गौरवान्वित करते हैं।
"मातृभाषा" वह प्रथम गुरु है जो हमें दुनिया को देखना सिखाती है। बुंदेलखंडी जैसी समृद्ध बोलियों का संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर बुंदेली का कर्तव्य है। यदि हम अपनी जड़ों से नहीं जुड़ेंगे, तो हम अपनी पहचान खो देंगे। आइए, इस अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर संकल्प लें कि हम अपनी मातृभाषा में बोलने में गर्व महसूस करेंगे और इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखेंगे।
"निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल

 बाल नाटक: पुनपुन के प्रहरी और हरा-भरा करपी
नाटक का परिचय
यह नाटक अरवल जिले के करपी क्षेत्र की पृष्ठभूमि पर आधारित है। जहाँ पाँच बच्चों की टोली अपने दादा-दादी के बगीचे और पुनपुन नदी की पवित्रता को बचाने के लिए एक 'घमंडी और बाचाल' लड़के (लखैरा) का सामना करती है। यह नाटक हमें सिखाता है कि प्रकृति का विनाश स्वयं का विनाश है।
पात्र-विवरण
अंशिका (12 वर्ष): टोली की मार्गदर्शक। शांत, गंभीर और सूझबूझ वाली।
दिव्यांशु (10 वर्ष): निडर और फुर्तीला। वह अन्याय के खिलाफ तुरंत खड़ा हो जाता है।
शशांक (9 वर्ष): ज्ञान का पिटारा। उसे हर पौधे के आयुर्वेदिक और वैज्ञानिक फायदे पता हैं।
बुच्चन (6 वर्ष): टोली का 'कॉमेडी किंग'। उसे बस खाने और खेलने से मतलब है।
प्रियांशु (5 वर्ष): सबसे नन्हा। जो बड़े कहते हैं, वही दोहराता है। मासूमियत का केंद्र।
लखैरा (विलेन): घमंडी, बातूनी और बिगड़ा हुआ लड़का। वह पेड़ों को 'लकड़ी' और नदी को 'नाली' समझता है।
दादा जी: करपी के पुराने किसान, जो मिट्टी और संस्कारों की बात करते हैं।
माता-पिता: प्रेम और अनुशासन का आधार।
प्रथम दृश्य: बगिया की रौनक
(स्थान: करपी में पुनपुन नदी के किनारे एक सुंदर बगीचा। ऊँचे-ऊँचे आम, महुआ और लीची के पेड़ हैं। क्यारियों में तुलसी, गेंदा और गुलाब खिले हैं। पार्श्व संगीत में पक्षियों का कलरव और नदी की लहरों की ध्वनि है।)
अंशिका: (तुलसी के पौधे में जल देते हुए) "देखो प्रियांशु, ये तुलसी मैया हैं। सुबह-सुबह इन्हें जल देने से घर में सुख-शांति आती है।"
प्रियांशु: (नकल करते हुए) "हाँ, शांति आती है और जुकाम भाग जाता है!"
शशांक: (अमरूद के पेड़ को सहलाते हुए) "भाई दिव्यांशु, देखो इस बार अमरूद कितने बड़े हुए हैं। और वह देखो महुआ! जब इसकी खुशबू हवा में घुलती है, तो लगता है पूरा करपी महक उठा है।"
बुच्चन: (मुँह लटकाकर) "खुशबू से पेट थोड़े ही भरता है! मुझे तो मीठी लीची खानी है। कब पकेंगी ये?"
दिव्यांशु: "धैर्य रख बुच्चन! अभी तो पुनपुन की हवाओं ने इन्हें सहलाया है, सूरज की धूप इन्हें मीठा करेगी, तब हम सब मिलकर दावत उड़ाएंगे।"
द्वितीय दृश्य: लखैरा का उत्पात
(अचानक शोर सुनाई देता है। 'लखैरा' हाथ में एक बड़ी कुल्हाड़ी और गुलेल लेकर सीना फुलाकर प्रवेश करता है। वह चलते-चलते चमेली के फूलों को पैरों से कुचलता है।)
लखैरा: (अट्टहास करते हुए) "अबे ओ छोटे बच्चों! क्या तुम लोग यहाँ घास छील रहे हो? हटाओ इन झाड़ियों को। मुझे यहाँ अपना बड़ा सा गोदाम बनाना है। मैं इन सारे पेड़ों को कटवा दूँगा।"
अंशिका: (दृढ़ता से) "खबरदार लखैरा! ये पेड़ नहीं, हमारे परिवार के सदस्य हैं। तुम इन्हें छू भी नहीं सकते।"
लखैरा: (बाचालता से) "अरे जा-जा! बड़ी आई नेत्री। ये आम-अमरूद क्या देंगे? पैसा देंगे? मैं इन्हें काटकर लकड़ी बेचूँगा और पुनपुन नदी में शहर का सारा कचरा फिंकवा दूँगा। मुझे प्रकृति से कोई लेना-देना नहीं।"
दिव्यांशु: "तुम कितने मूर्ख हो! जिस नदी का पानी पीते हो, उसे ही गंदा करोगे? जिन पेड़ों की छाया में बैठते हो, उन्हें ही काटोगे?"
लखैरा: "हूँ! ज्यादा ज्ञान मत झाड़ो। कल सुबह मेरे मजदूर आएंगे और इस बगीचे का नामोनिशान मिटा देंगे। रोक सको तो रोक लो!"
तृतीय दृश्य: बच्चों की गुप्त सभा
(रात का समय। लालटेन जल रही है। पाँचों बच्चे गोल घेरे में बैठे हैं।)
शशांक: "दीदी, लखैरा बहुत घमंडी है। वह सच में पेड़ों को नुकसान पहुँचाएगा। हमें उसे सबक सिखाना होगा, पर अहिंसा से।"
बुच्चन: "मेरे पास एक विचार है! हम उसे नींबू का रस आँखों में डाल दें?"
अंशिका: "नहीं बुच्चन! हमें उसे डराना नहीं, जगाना है। हम 'प्रकृति के रक्षक' बनेंगे। दिव्यांशु, तुम और शशांक महुआ के पीछे छिप जाना। मैं और छोटे बच्चे गेंदे की क्यारियों के पास रहेंगे। हम उसे अहसास दिलाएंगे कि पेड़ बोलते हैं।"
चतुर्थ दृश्य: चमत्कार या वास्तविकता?
(अगली सुबह। लखैरा कुल्हाड़ी लेकर बगीचे में आता है। जैसे ही वह आम के पेड़ पर वार करने के लिए कुल्हाड़ी उठाता है, पीछे से एक गंभीर आवाज आती है।)
आवाज (दिव्यांशु पर्दे के पीछे से): "रुको लखैरा! क्या तुम अपनी ऑक्सीजन का गला काटना चाहते हो?"
लखैरा: (चौंककर इधर-उधर देखता है) "कौन बोला? कौन है वहाँ?"
आवाज (शशांक): "मैं यह महुआ का पेड़ हूँ। मैंने तुम्हें बचपन में छाया दी, क्या तुम बदले में मुझे मौत दोगे?"
अंशिका (पेड़ के पीछे से): "और मैं पुनपुन नदी हूँ। अगर तुमने मुझे गंदा किया, तो तुम्हारी आने वाली पीढ़ियाँ प्यासी मर जाएंगी।"
(लखैरा डर के मारे कांपने लगता है। उसे लगता है कि प्रकृति स्वयं उससे बात कर रही है। वह भागने की कोशिश करता है लेकिन गेंदे और गुलाब की झाड़ियों के बीच रखे 'नींबू और आंवले' के फलों पर उसका पैर फिसलता है और वह गिर पड़ता है।)
प्रियांशु और बुच्चन: (बाहर निकलकर ताली बजाते हुए) "गिर गया घमंडी! फिसलगुंडी!"
पंचम दृश्य: हृदय परिवर्तन
(दादा जी और माता-पिता का प्रवेश। दादा जी लखैरा को उठाकर मिट्टी झाड़ते हैं।)
दादा जी: "बेटा लखैरा, डरो मत। ये पेड़ नहीं बोल रहे थे, ये इन बच्चों की पुकार थी जो प्रकृति को अपनी माँ समझते हैं। देखो बेटा, करपी की यह धरती हमें अन्न देती है, यह पुनपुन हमें जल देती है। क्या हम इतने स्वार्थी हो जाएँ कि अपनी माँ का ही आँचल फाड़ दें?"
माता: "बेटा, असली ताकत बनाने में है, उजाड़ने में नहीं। तुम बाचाल तो बहुत हो, पर तुम्हारी बातों में कड़वाहट है। इसे फूलों जैसी मिठास में बदलो।"
लखैरा: (ग्लानि से भरकर) "मुझे माफ कर दीजिए दादा जी! अंशिका, दिव्यांशु... मुझे समझ आ गया कि मैं कितना गलत था। मुझे लगा था कि पैसा ही सब कुछ है, पर बिना शुद्ध हवा और पानी के पैसा किस काम का? 
शशांक: "कोई बात नहीं लखैरा। आज से तुम हमारे दुश्मन नहीं, 'पुनपुन के प्रहरी' हो।"
षष्ठ दृश्य: उत्सव का माहौल
(सब बच्चे मिलकर एक साथ खड़े होते हैं। वे पौधों को पानी देते हैं और एक मधुर गीत गाते हैं।)
सामूहिक गीत:
"करपी की बगिया महके, पुनपुन की लहरें गाएँ,
आओ मिलकर हम सब, धरती को स्वर्ग बनाएँ।
आम, महुआ और लीची, हमारे प्राण हैं ये,
तुलसी, गुलाब और गेंदा, जग की मुस्कान हैं ये।
ना कोई छोटा, ना कोई बड़ा, हम सब एक समान,
प्रकृति को बचाना ही, है सबसे बड़ा अभियान!"
(सब एक साथ दर्शकों की ओर झुककर प्रणाम करते हैं।)
-- यवनिका (पर्दा गिरता है) --
नाटक से मिली शिक्षा: - यह नाटक हमें यह संदेश देता है कि बच्चे देश का भविष्य हैं। यदि वे पर्यावरण के प्रति जागरूक हो जाएँ, तो बड़े से बड़ा विनाश रुक सकता है। करपी की मिट्टी और पुनपुन का जल सिर्फ भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि हमारी जीवन रेखा है।

: मातृभाषा के बिना अधूरी है संस्कृति की पहचान: सत्येंद्र कुमार पाठक
जहानाबाद । "भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि किसी भी समाज की आत्मा और उसकी संस्कृति का आईना होती है। जिस दिन हम अपनी मातृभाषा भूल जाएंगे, उस दिन हमारी पहचान भी मिट जाएगी।" ये विचार प्रख्यात साहित्यकार सत्येंद्र कुमार पाठक ने अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर आयोजित एक विशेष संगोष्ठी में व्यक्त किए। श्री पाठक ने इतिहास के झरोखे से युवाओं को रूबरू कराते हुए बताया कि इस दिवस की नींव 21 फरवरी 1952 को ढाका (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) में पड़ी थी। अपनी मातृभाषा 'बांग्ला' के सम्मान के लिए छात्रों ने गोलियां खाईं और शहादत दी। उन्हीं के बलिदान को वैश्विक सम्मान देते हुए यूनेस्को ने 1999 में इस दिन को मान्यता दी। उन्होंने विशेष जोर देते हुए कहा कि वर्ष 2025 इस ऐतिहासिक दिवस की 'सिल्वर जुबली' (25वीं वर्षगांठ) है, जो हमें अपनी भाषाई जड़ों की ओर लौटने का संदेश देती है।
विलुप्ति के कगार पर हजारों भाषाएं यूनेस्को की रिपोर्ट का हवाला देते हुए साहित्यकार ने चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि दुनिया की 8,324 भाषाओं में से लगभग 7,000 ही चलन में हैं और कई दम तोड़ रही हैं। बिहार की समृद्ध भाषाई विरासत की चर्चा करते हुए उन्होंने मगही, भोजपुरी, मैथिली, अंगिका और बज्जिका को बचाने की अपील की। उन्होंने कहा, "बहुभाषी शिक्षा और मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षण ही वह संजीवनी है, जो हमारी लोक परंपराओं को जीवित रख सकती है ।कार्यक्रम के अंत में उन्होंने जिले के युवाओं से अपील की कि वे अपनी मातृभाषा बोलने में लज्जा नहीं, बल्कि गर्व महसूस करें। उन्होंने कहा कि स्वदेशी भाषाओं के संरक्षण से ही हम अपने अधिकारों और सांस्कृतिक गौरव की रक्षा कर सकते हैं। इस अवसर पर कई प्रबुद्धजनों ने अपनी-अपनी मातृभाषा में काव्य पाठ कर भाषाई विविधता का जश्न मनाए।

 घर बना चिड़ियाघर
आठ साल का डुग्गू देखो, बना हुआ है हाथी,
सूँड हिलाकर हुक्म चलाता, सबका बना वो साथी।
भारी भरकम कदम बढ़ाता, घर को खूब हिलाता,
मम्मी की ताज़ा रोटी पर, अपना हक जताता।
बुच्चन छह साल का भैया, घोड़ा बन कर आया,
सोफे की ऊँची पीठ को, उसने अस्तबल बनाया।
सरपट-सरपट दौड़े ऐसे, जैसे हो मैदान,
उसकी टापों की आवाज़ से, थर-थर सारा मकान।
पाँच साल का पुच्चू छोटा, बिल्ली बन इठलाता,
मलाई वाला दूध देख के, मन ही मन मुस्काता।
म्याऊं-म्याऊं शोर मचाकर, चूहे को धमकाता,
पर छोटा-सा चूहा देखो, बिल में छिप जाता।
पिंजरे वाला सुग्गा बोले— "पढ़ लो बच्चों, पढ़ लो!"
पर शेरू कुत्ता भौं-भौं करके, कहता— "मुझसे लड़ लो!"
कोने में खड़ा गदहा बोला— "हें-चूँ, हें-चूँ भाई,
खिलौनों की इस भारी गठरी, ने तो जान बचाई!"
मम्मी-पापा देख रहे थे, यह अद्भुत सा मेला,
तभी दादाजी भी आए, लेकर खेल-अकेला।
धमाचौकड़ी मची हुई है, नन्हा-मुन्ना शोर,
हंसी-खुशी की डोरी बँधी, घर के चारों ओर।
इस कविता की मुख्य विशेषताएँ:
बाल सुलभ शरारतें: बच्चों के सहज स्वभाव और जानवरों की हरकतों का तालमेल। पारिवारिक परिवेश: बड़ों का बच्चों के खेल में शामिल होना। लयात्मकता: इसे आसानी से गाया जा सकता है।

: कविता: होलाष्टक की सीख
दादा बोले सुन लो बच्चों, होली की इक बात,
आठ दिनों का समय विशेष, लाता अपनी सौगात।
अष्टमी से जो शुरू हुआ, 'होलाष्टक' कहलाए,
संयम और भक्ति का मार्ग, हमको यह दिखलाए।
दिव्यांशु-प्रियांशु पूछें, "दादा! डंडा क्यों गाड़ा?"
बुच्चन बोला, "सफाई कर दो, साफ रहे घर-वाड़ा।"
दादा बोले, "भक्त प्रह्लाद और होलिका का यह चिन्ह,**
**बुराई जलेगी आग में, आएँगे पावन दिन।"
शशांक और अंशिका ने पूछा, "क्यों शुभ काम हैं वर्जित?"
पापा बोले, "ग्रह उग्र हैं, मन होता है अचंभित।**
चंद्रमा, सूर्य और शनि-मंगल, सब डोल रहे हैं आज,
**सावधानी से कदम बढ़ाओ, सिद्ध हों सारे काज।"
मम्मी बोलीं, "बेटा! यह तो ऋतु-परिवर्तन की बेला,**
ताप बढ़ेगा, कीटाणु भागें, जब लगेगा आग का मेला।
सात्विक भोजन, ध्यान लगाकर, मन को शुद्ध बनाओ,
**बड़ों का आदर, प्रेम भाव से, जग को स्वर्ग बनाओ।"
आठ दिनों तक जपें नाम हम, 'ओम नमो भगवते वासुदेवाय',
मन का संशय दूर भगाएँ, सुख-समृद्धि घर आए।
तपकर कुंदन जैसे चमकें, फिर खेलेंगे हम रंग,
बुराई की हो हार सदा, और जीत रहे सच के संग!

: स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर: एक बहुआयामी राष्ट्रभक्त
विनायक दामोदर सावरकर (1883-1966) भारतीय इतिहास के आकाश में एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनके विचारों और कार्यों ने भारतीय राजनीति और समाज को गहरे तक प्रभावित किया। वे केवल एक क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि एक प्रखर चिन्तक, समाजसुधारक, इतिहासकार, कवि, ओजस्वी वक्ता और दूरदर्शी राजनेता भी थे। उनके समर्थक उन्हें श्रद्धा से 'वीर सावरकर' के नाम से संबोधित करते हैं।सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को नासिक के भागुर ग्राम में हुआ था। बचपन से ही उनमें देशभक्ति की ज्वाला प्रज्वलित थी। उन्होंने पुणे के फर्ग्युसन कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और बाद में कानून की पढ़ाई के लिए लंदन गए। लंदन का 'इंडिया हाउस' उनके क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र बना, जहाँ उन्होंने 'अभिनव भारत' संस्था के माध्यम से भारतीय छात्रों को संगठित किया।
सावरकर भारत के पहले ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य के केंद्र लंदन में रहकर उनके विरुद्ध सशक्त आंदोलन चलाया। उनके जीवन के कुछ प्रमुख क्रांतिकारी पड़ाव निम्नलिखित हैं:
1857 का इतिहास: उन्होंने 1857 के विद्रोह को 'सिपाही विद्रोह' के बजाय 'भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम' सिद्ध करते हुए एक कालजयी पुस्तक लिखी। यह विश्व की ऐसी पहली पुस्तक थी जिसे प्रकाशन से पूर्व ही प्रतिबंधित कर दिया गया था।दोहरे आजीवन कारावास की सजा: नासिक षडयंत्र केस के तहत उन्हें गिरफ्तार किया गया और अंग्रेजों ने उन्हें 50 वर्ष की कठोर कारावास (दो काले पानी की सजा) देकर अंडमान की सेल्यूलर जेल भेज दिया।
जेल में संघर्ष: जेल की अमानवीय यातनाओं के बीच भी सावरकर का मनोबल नहीं टूटा। उन्होंने जेल की दीवारों पर कंकड़ों से कविताएं लिखीं और हजारों पंक्तियाँ कंठस्थ कीं।
'हिन्दुत्व' और राजनीतिक दर्शनके सावरकर ने भारतीय राजनीति को 'हिन्दुत्व' की एक नई परिभाषा दी। उनके अनुसार, "जो व्यक्ति सिंधु नदी से लेकर समुद्र तक फैली भारत भूमि को अपनी पितृभूमि और पुण्यभूमि मानता है, वह हिन्दू है।" उपयोगितावाद और तर्कवाद: सावरकर परंपराओं के अंधानुकरण के विरोधी थे। वे विज्ञाननिष्ठ थे और समाज को रूढ़ियों से मुक्त करना चाहते थे। अखंड भारत: वे भारत के विभाजन के कट्टर विरोधी थे। 15 अगस्त 1947 को स्वराज मिलने पर उन्होंने खुशी तो जताई, लेकिन खंडित भारत का उन्हें गहरा दुःख था।
सैन्यीकरण का आह्वान: उनका मानना था कि राष्ट्र की सुरक्षा के लिए सीमाओं का निर्धारण कागजों से नहीं, बल्कि युवाओं के शौर्य और सैन्य शक्ति से होता है।सावरकर का समाज सुधार का पक्ष उनके राजनीतिक पक्ष जितना ही सशक्त था। उन्होंने हिन्दू समाज को कमजोर करने वाली 'सात बेड़ियों' को तोड़ने का आह्वान किया: अस्पृश्यता (स्पर्शबंदी): वे छुआछूत के घोर विरोधी थे। रत्नागिरी में उन्होंने 'पतितपावन मंदिर' बनवाया जहाँ समाज के सभी वर्गों का प्रवेश समान था। शुद्धि आंदोलन: उन्होंने धर्म परिवर्तन कर चुके हिन्दुओं की घर वापसी के लिए निरंतर प्रयास किए। जाति-भेद का अंत: उनका मानना था कि जब तक हिन्दू समाज जातिवाद में बंटा रहेगा, वह सशक्त राष्ट्र नहीं बन सकता। सावरकर एक सिद्धहस्त लेखक और कवि थे। उन्होंने मराठी और अंग्रेजी में हजारों पृष्ठों का मौलिक साहित 5 फरवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या के बाद सावरकर को गिरफ्तार किया गया। उन पर हत्या के षडयंत्र में शामिल होने का आरोप लगा, लेकिन न्यायालय ने उन्हें पूर्णतः निर्दोष पाया और बाइज्जत बरी किया। उनके और गांधीजी के बीच वैचारिक मतभेद जरूर थे, लेकिन सावरकर के 'वीर' व्यक्तित्व के प्रशंसकों में गांधीजी भी शामिल थे।
सावरकर ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में 'प्रायोपवेशनम्' (स्वेच्छा से भोजन-जल त्याग कर मृत्यु का वरण करना) का निर्णय लिया। उनका मानना था कि जब जीवन का उद्देश्य पूर्ण हो जाए और शरीर कार्य करने में असमर्थ हो, तो मृत्यु का स्वागत करना चाहिए। 26 फरवरी 1966 को बम्बई में उन्होंने अपने पार्थिव शरीर का त्याग किया
वीर सावरकर एक ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने राष्ट्र को 'हिन्दुत्व' की वैचारिक चेतना और 'अखंड भारत' का स्वप्न दिया। उनके त्याग, जेल की कठोर यातनाओं और समाज सुधार के कार्यों ने उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अमर है

 कल्पनाओं का शाश्वत उत्सव: राष्ट्रीय परी कथा दिवस 
प स्मृतियों की गलियों से एक यात्रा में "एक समय की बात है..." (Once upon a time...) — ये चार शब्द केवल एक कहानी की शुरुआत नहीं हैं, बल्कि एक ऐसी खिड़की हैं जो हमें वास्तविकता की सीमाओं से परे एक जादुई दुनिया में ले जाती हैं। हर साल 26 फरवरी को मनाया जाने वाला 'राष्ट्रीय परी कथा दिवस' (National Tell a Fairy Tale Day) हमें उसी मासूमियत, आश्चर्य और असीमित संभावनाओं वाले बचपन की याद दिलाता है। यह दिन केवल परियों या जिन्नों की कहानियों का उत्सव नहीं है, बल्कि यह उस मानवीय क्षमता का सम्मान है जो असंभव में भी विश्वास करना जानती है। इतिहास की गहराई में: कहाँ से आया यह जादू परी कथाओं का इतिहास उतना ही पुराना है जितना कि स्वयं मानवता। आधुनिक शोध बताते हैं कि कुछ कहानियाँ, जैसे 'द स्मिथ एंड द डेविल', लगभग 6,000 साल पुरानी हैं, जो कांस्य युग (Bronze Age) से मौखिक रूप से चली आ रही हैं।
यद्यपि ये कहानियाँ हज़ारों साल पुरानी थीं, लेकिन इन्हें 'परी कथा' (Fairy Tale) नाम बहुत बाद में मिला। सत्रहवीं शताब्दी के अंत में (1697), फ्रांसीसी लेखिका मैडम डी'ऑलनॉय ने अपनी रचनाओं के लिए 'conte de fées' (परियों की कहानी) शब्द का प्रयोग किया। उन्होंने इन कहानियों को दरबारों और महफिलों का हिस्सा बनाया, जहाँ वयस्क भी इनका उतना ही आनंद लेते थे ।
राष्ट्रीय परी कथा दिवस का 26 फरवरी को मनाया जाना किसी सरकारी आदेश का परिणाम नहीं है, बल्कि यह कहानीकारों, लेखकों और पुस्तकालय प्रेमियों द्वारा शुरू की गई एक सांस्कृतिक लहर है।
मौखिक परंपरा का पुनरुद्धार: इस दिन का मुख्य उद्देश्य 'कहानी सुनाने' (Storytelling) की उस कला को जीवित रखना है जो डिजिटल युग के शोर में कहीं खो गई है।साहित्यिक जुड़ाव: फरवरी के अंत में, जब दुनिया सर्दियों की विदाई और वसंत का स्वागत कर रही होती है, पुरानी लोककथाओं को याद करना नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। विल्हेम ग्रिम (प्रसिद्ध ग्रिम ब्रदर्स में से एक) का जन्मदिन 24 फरवरी को होता है, जो इस सप्ताह को परी कथाओं के लिए और भी प्रासंगिक बनाता है। परी कथाओं के स्तंभ ने कहानियों को अमर बनाया परी कथाओं के इतिहास में कुछ ऐसे नाम हैं, जिनके बिना यह उत्सव अधूरा है: भाइयों ग्रिम (Brothers Grimm): जैकब और विल्हेम ग्रिम ने 19वीं सदी में जर्मनी की लोककथाओं को इकट्ठा किया। 'सिंड्रेला', 'स्नो व्हाइट' और 'हेंसल और ग्रेटेल' जैसी कहानियाँ आज उन्हीं की बदौलत हमारे पास हैं।हंस क्रिश्चियन एंडरसन: डेनमार्क के इस लेखक ने हमें 'द लिटिल मरमेड' और 'द अगली डकलिंग' जैसी कहानियाँ दीं, जिनमें अक्सर गहरा दुख और फिर अंत में एक मार्मिक सीख होती थी।
ईसप और पंचतंत्र: प्राचीन ग्रीस के ईसप और भारत के विष्णु शर्मा (पंचतंत्र के रचयिता) ने पशु-पक्षियों के माध्यम से ऐसी कहानियाँ रचीं जो जादुई भी थीं और नैतिक मूल्यों से भरी भी थीं।
परी कथाओं के शौकीनों के लिए साल में दो बड़े अवसर होते हैं:पहलू राष्ट्रीय परी कथा दिवस (26 फरवरी) अंतर्राष्ट्रीय परी दिवस (24 जून)मुख्य फोकस कहानियाँ पढ़ने और सुनाने पर। परियों के अस्तित्व और लोककथाओं के जश्न पर।प्रकृति शैक्षिक और साहित्यिक। उत्सवपूर्ण और काल्पनिक।गतिविधि किताबें पढ़ना, कहानी सत्र आयोजित करना। प्रकृति में परियों को खोजना, जादुई वेशभूषा पहनना है।प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि परी कथाएं बच्चों के मानसिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। डर का सामना करना: कहानियों में राक्षसों या चुड़ैलों का होना बच्चों को यह सिखाता है कि बुराई मौजूद है, लेकिन साहस और बुद्धिमानी से उसे हराया जा सकता है।
नैतिक मूल्य: "सच्चाई की हमेशा जीत होती है" — यह संदेश परी कथाओं का मूल आधार है।
कल्पना की उड़ान: आइंस्टीन ने एक बार कहा था, "यदि आप अपने बच्चों को बुद्धिमान बनाना चाहते हैं, तो उन्हें परी कथाएं पढ़ाएं।" ये कहानियाँ मस्तिष्क की रचनात्मक सीमाओं को आज परी कथाएं केवल किताबों तक सीमित नहीं हैं। डिज़्नी (Disney) जैसी फिल्मों ने इन कहानियों को दृश्य रूप देकर घर-घर पहुँचाया है। हालाँकि, मूल कहानियाँ अक्सर डार्क और गंभीर होती थीं, जिन्हें समय के साथ बच्चों के लिए सरल और सुखद बनाया गया। आज के दौर में, 'राष्ट्रीय परी कथा दिवस' हमें उन मूल कहानियों की ओर लौटने के लिए प्रोत्साहित करता है जिनमें जीवन के गहरे सत्य छिपे हैं। अपने मोबाइल फोन को एक घंटे के लिए बंद करें और बच्चों को या अपने दोस्तों को कोई पुरानी लोककथा सुनाएं। पुस्तकालय की यात्रा: पास के किसी पुस्तकालय में जाएं और परी कथाओं के पुराने संस्करण खोजें।
रचनात्मक लेखन: अपनी खुद की एक जादुई कहानी लिखें जिसमें आपका शहर या गाँव एक जादुई नगरी बन जाए।
फिल्म नाइट: किसी क्लासिक परी कथा पर आधारित फिल्म को परिवार के साथ देखें।
 जादू अभी खत्म नहीं हुआ है राष्ट्रीय परी कथा दिवस हमें याद दिलाता है कि भले ही हम बड़े हो गए हों और दुनिया तर्कों और विज्ञान से चलती हो, लेकिन हमारे भीतर का वह बच्चा आज भी किसी जादुई चमत्कार की प्रतीक्षा करता है। ये कहानियाँ हमें सिखाती हैं कि "सुखांत" (Happy Ending) केवल किताबों में नहीं होते, बल्कि हमारी उम्मीदों और संघर्षों में भी छिपे होते हैं।
तो, इस 26 फरवरी को, एक किताब उठाएं, एक कहानी सुनाएं और विश्वास करें कि जादू आज भी मौजूद है—बस उसे देखने के लिए थोड़ी कल्पना और थोड़े बचपन की जरूरत है।
सत्य

: बाल नाटक - असली रंग, अपनों के संग"
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
पात्र परिचय: दादाजी: (65 वर्ष) परंपराओं के ज्ञाता, शांत और मजाकिया स्वभाव। मम्मी-पापा: (35-40 वर्ष) बच्चों को अच्छी सीख देने वाले। अंशिका: (10 वर्ष) समझदार, शांत और नेतृत्व करने वाली।दिव्यांशु: (8 वर्ष) अति-उत्साही और शरारती।शशांक: (7 वर्ष) जिज्ञासु और थोड़ा डरपोक। प्रियांशु: (6 वर्ष) खाने-पीने का शौकीन। बुच्चन: (5 वर्ष) सबसे छोटा, मासूम और सबकी नकल उतारने वाला।
दृश्य 1: दादू का दालान (सुबह का समय)
(स्थान: गाँव के घर का बड़ा खुला दालान। एक तरफ पुरानी चारपाई बिछी है, दूसरी तरफ संगीत के साज—ढोलक, तबला और हारमोनियम रखे हैं। मेज पर मालपुआ, मलाई और पान सजे हैं। दिव्यांशु, शशांक और प्रियांशु अपनी-अपनी पिचकारियों में रंग भर रहे हैं। अंशिका और बुच्चन गुलाल की थालियाँ सजा रहे हैं।)
दिव्यांशु: (उछलते हुए) आज तो मैं सबको 'काला भूत' बना दूँगा! मेरे पास वो पक्का वाला रंग है जो सात दिनों तक नहीं छूटता।
शशांक: (डरते हुए) पर भैया, कल स्कूल भी तो जाना है। अगर सर ने देख लिया तो?
प्रियांशु: अरे स्कूल की चिंता छोड़ो! पहले ये देखो, मम्मी ने मालपुआ और मलाई रखी है। होली खेलने के लिए ताकत चाहिए भाई! (एक मालपुआ मुँह में दबाता है)
अंशिका: रुको दिव्यांशु! दादाजी ने कहा था कि इस बार हम 'केमिकल' वाले रंगों से नहीं खेलेंगे। वो त्वचा के लिए हानिकारक होते हैं।
बुच्चन: (अंशिका की नकल करते हुए) हाँ! हानी-का-लक! और बंदर जैसे लगोगे सो अलग!
दृश्य 2: दादाजी का प्रवेश और ज्ञान की बात
(दादाजी हाथ में गुलाब और गेंदे के फूलों की टोकरी लेकर दालान में आते हैं। उनके पीछे मम्मी और पापा भी हैं।)
दादाजी: वाह भाई वाह! टोली तो पूरी तैयार है। लेकिन दिव्यांशु बेटा, ये काला रंग हाथ में क्यों है?
दिव्यांशु: दादू, बिना पक्के रंग के होली का मजा ही क्या?
दादाजी: (पास बैठकर) बेटा, होली का मतलब है 'होलिका' यानी बुराई को जलाना। लेकिन अगर हम ज़हरीले रंगों से अपने दोस्तों की आँखें या त्वचा खराब कर दें, तो क्या वो अच्छाई होगी?
पापा: बिल्कुल सही कहा बाबूजी। बच्चों, देखो हम आपके लिए क्या लाए हैं। (पापा लाल, पीला, हरा और गुलाबी प्राकृतिक गुलाल दिखाते हैं।)
मम्मी: ये गुलाल फूलों और जड़ी-बूटियों से बना है। इसे लगाने से चेहरे पर निखार आता है, खारिश नहीं।
शशांक: और दादू, ये गेंदे और गुलाब की पंखुड़ियाँ क्यों हैं?
दादाजी: बेटा, पुराने समय में राजा-महाराजा 'पुष्प होली' खेलते थे। फूलों की खुशबू मन को शांत करती है। आओ, आज हम भी वैसे ही शुरुआत करें।
दृश्य 3: संगीत और मस्ती का माहौल
(पापा तबले पर थाप देते हैं, मम्मी हारमोनियम सँभालती हैं। बच्चे ढोलक और झांझ (झल) लेकर गोल घेरा बना लेते हैं।)
गीत (सामूहिक):
"ब्रज की होली, दादू की टोली,
प्यार भरी है सबकी बोली।
उड़े गुलाल, मचे धमाल,
मस्त हुई है बच्चों की टोली!"
(सब बच्चे नाचते हैं और एक-दूसरे पर फूलों की पंखुड़ियाँ छिड़कते हैं। माहौल बहुत खुशनुमा हो जाता है।)
प्रियांशु: (नाचते-नाचते) दादू, गाना तो बढ़िया है, पर क्या हम थोड़ा पानी इस्तेमाल कर सकते हैं? मेरी पिचकारी उदास लग रही है।
दादाजी: (हँसते हुए) क्यों नहीं! लेकिन एक शर्त है—सिर्फ एक बाल्टी पानी। हम पानी बर्बाद नहीं करेंगे, क्योंकि जल ही जीवन है।
दृश्य 4: मनमुटाव का अंत
(तभी पड़ोस का एक बच्चा रोते हुए दालान के पास से गुजरता है। दिव्यांशु उसे देखता है।)
अंशिका: अरे, वो तो गोलू है। वो रो क्यों रहा है?
मम्मी: दिव्यांशु, कल तुम्हारी उससे लड़ाई हुई थी न? शायद इसीलिए वो हमारे घर नहीं आ रहा।
दादाजी: बच्चों, होली का असली मंत्र है—'दुश्मनी भूलकर दोस्त बनाना'। दिव्यांशु, जाओ उसे बुलाकर लाओ। जो पहले झुकता है, वही बड़ा होता है।
दिव्यांशु: (थोड़ी हिचकिचाहट के बाद) ठीक है दादू। (दौड़कर गोलू को लाता है और उसे गले लगाता है।) "बुरा न मानो होली है गोलू! ये लो, केसरिया मलाई खाओ।"
गोलू: (मुस्कुराते हुए) थैंक यू दिव्यांशु! चलो, अब मिलकर धमाल मचाते हैं।
(सब बच्चे मेज के पास जमा हो जाते हैं। मम्मी सबको मालपुआ और मलाई देती हैं। पापा सबको पान और मसाला (सौंफ-मिश्री) देते हैं।)
बुच्चन: (मलाई खाते हुए) दादू, होली में इतना खाना क्यों बनता है?
दादाजी: बेटा, जब हम साथ बैठकर खाते हैं, तो प्यार बढ़ता है। और ये पान-मसाला हमारे पाचन को ठीक रखता है और मुँह में मिठास घोलता है। जैसे ये पान लाल रंग देता है, वैसे ही हमारी बातें भी मीठी और रंगीन होनी चाहिए।
अंशिका: दादू, आज मैंने सीखा कि होली सिर्फ शोर मचाना नहीं है। यह प्रकृति (फूलों), स्वास्थ्य (प्राकृतिक रंग), और रिश्तों (माफी) का त्यौहार है।
(सभी पात्र मंच के केंद्र में आते हैं। पृष्ठभूमि में ढोलक की तेज आवाज होती है।)
शशांक: (पिचकारी ऊपर उठाकर) "पानी बचाओ, खुशियाँ फैलाओ!"
प्रियांशु: "मालपुआ खाओ, सेहत बनाओ!"
मम्मी-पापा: "संस्कार अपनाओ, त्यौहार मनाओ!"
दादाजी: (सबके सिर पर हाथ रखते हुए)
"रंग रहे न रहे, पर यादें रहनी चाहिए,
दिलों में नफरत नहीं, बस प्यार बहनी चाहिए।"
सब पात्र (एक साथ दर्शकों की ओर देखकर):
"आप सभी को असली और सुरक्षित होली की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!"
(सभी पात्र एक-दूसरे पर गुलाबी गुलाल उड़ाते हैं और 'होली है' का जयकारा लगाते हैं। पर्दा धीरे-धीरे गिरता है।)

शिक्षा - यह नाटक सिखाता है कि त्यौहारों का असली आनंद अहंकार छोड़ने, प्रकृति की रक्षा करने और अपनों के साथ मिल-बैठकर खुशियाँ बांटने में है। रासायनिक रंगों और पानी की बर्बादी से बचकर हम समाज को एक बेहतर संदेश है।

 बाल गज़ल: 
होली का हुड़दंग और ढुंढा का अंत
आओ मिलकर शोर मचाएं, ढुंढा को अब दूर भगाएं। 
हंसी-ठिठोली, ढोल-नगाड़े, खुशियों के हम दीप जलाएं।
प्रियांशु बोला, दिव्यांशु से— "डरने की कोई बात नहीं",
 नन्हा बुच्चन साथ खड़ा है, आओ हम सब धूम मचाएं।
मम्मी-पापा कहते देखो, "हुड़दंग यह बीमारी नहीं", 
नकारात्मकता के दानव को, अट्टहास से मार गिराएं।
शिव का है वरदान यही कि, 'ध्वनि-युद्ध' ही जीतेगा, 
गीत सुनाएं, नाचें-गाएं, मन के भय को दूर भगाएं।
गोबर के उपलों की माला, अग्नि को हम अर्पण कर, 
शुद्ध हवा हो, स्वस्थ धरा हो, ऐसी रस्में आज निभाएं।
बैर-भाव और ऊंच-नीच का, अंत करे यह पावन पर्व, 
बच्चे बनकर खेलें सब मिल, जग में प्रेम की अलख जगाएं।

वो कहानी ढूंढा रानी, त्रेतायुग की दिव्य निशानी,
 राक्षस कुल की एक 'ढुंढा' थी, मायावी और बड़ी सयानी। 
शिव से उसने वर पाया था— "अस्त्र न मुझको मार सकें",
 देव, दनुज या मानव कोई, कभी न मेरा काल बनें।
अदृश्य होकर धूल-धुएं में, बच्चों को वो डराती थी,
 बीमारी और भय का साया, गलियों में फैलाती थी। 
तब भोले ने राह दिखाई— "अस्त्र यहाँ न काम करेंगे, 
सामूहिक अट्टहास जहाँ हो, वहाँ न दानव पाँव धरेंगे।"
प्रियांशु बोला, दिव्यांशु से— "ढोल उठाओ, शोर मचाओ",
 नन्हा बच्चन संग खड़ा है— "खुलकर नाचो, धूम मचाओ!" 
मम्मी-पापा ने समझाया— "यह हुड़दंग नहीं खेल है, 
बीमारी के कीटाणुओं का, शोर ही असली जेल है।"
चिल्लाने से, हँसने से, बढ़ता है मन का विश्वास, 
एंडोर्फिंस और डोपामिन का, होता है भीतर वास।
 गोबर के उपलों की माला, अग्नि में हम डाल रहे,
 वातावरण को शुद्ध बनाकर, स्वस्थ समाज को पाल रहे।
चीन हो या जापान देश, हर जगह 'शोर' का पहरा है,
 बुराई को भगाने का यह, विज्ञान बहुत ही गहरा है।
 तो झूम के नाचो, मिलकर गाओ, होली का त्यौहार मनाओ,
 ढुंढा जैसी नकारात्मकता को, हँसकर दूर भगाओ!
पात्रों का जुड़ाव: प्रियांशु, दिव्यांशु और बच्चन के माध्यम से बच्चे स्वयं को कहानी का हिस्सा महसूस करेंगे।
समें केवल कहानी नहीं, बल्कि 'साउंड बैरियर' और 'कीटाणु नाश' जैसे वैज्ञानिक पहलुओं को सरल शब्दों में पिरोया गया है।सकारात्मक संदेश: यह सिखाती है कि 'आनंद' और 'एकजुटता' ही सबसे बड़े सुरक्षा कवच है।

: होलिका दहन : वैदिक यज्ञ से वैश्विक  तक 
भारतीय संस्कृति के विस्तृत फलक पर होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि यह एक ऐसी जीवंत परंपरा है जो सतयुग से कलियुग तक के मानवीय मूल्यों, कृषि पद्धतियों और आध्यात्मिक विजयों को स्वयं में समेटे हुए है। ज्योतिष शास्त्र और विभिन्न पंचांगों के अनुसार, प्रतिवर्ष फाल्गुन मास की पूर्णिमा को 'होलिका दहन' और अगले दिन 'रंगोत्सव' मनाया जाता है। आइए, इस प्राचीनतम पर्व की गहराइयों में उतरकर इसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक पहलुओं को समझते हैं। . भाषाई और कृषि मूल: 'होलाका' और नवात्रैष्टि यज्ञ की प्राचीनकाल में होली को 'होलाका' के नाम से जाना जाता था। शब्द 'होलका' का शाब्दिक अर्थ है—खेत में पड़ा हुआ वह अन्न जो आधा कच्चा और आधा पका हुआ होता है। वैदिक काल में इस दिन 'नवात्रैष्टि यज्ञ' करने की परंपरा थी। प्राचीन काल से ही भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है, जहाँ नई फसल आने पर उसका पहला भाग देवताओं को अर्पित करना अनिवार्य माना जाता था। खेत से लाए गए अधपके अन्न (होलका) से हवन करने के बाद उसका प्रसाद लेने की इसी परंपरा के कारण इसका नाम 'होलिकोत्सव' पड़ा। यह तथ्य प्रमाणित करता है कि यह त्योहार वैदिक काल से ही मनाया जाता रहा है। इतिहास के पन्नों में होली के साक्ष्य में होली की प्राचीनता केवल कथाओं तक सीमित नहीं है: सिंधु घाटी सभ्यता: अवशेषों में होली और दिवाली मनाए जाने के प्रमाण मिलते हैं। अभिलेख: विंध्य पर्वतों के निकट रामगढ़ में 300 ईसा पूर्व के शिलालेख मिले हैं। साहित्य: ईसा पूर्व छठी शताब्दी में जैमिनि के 'पूर्वमीमांसा सूत्र' और 'कथक गृह्य सूत्र' में इसका वर्णन है। चित्रकला: 16वीं सदी के हंपी के मंदिरों और मेवाड़ के चित्रों में होली के दृश्य अंकित हैं।
सतयुग (होलिका और प्रहलाद): असुर राजा हिरण्याकश्यप की बहन होलिका का दहन और भक्त प्रहलाद की रक्षा। यह 'अधर्म पर धर्म' की जीत का सबसे बड़ा प्रतीक है। कामदेव का पुनरुद्धार: इसी दिन महादेव ने कामदेव को भस्म कर पुनर्जीवित किया था, इसलिए इसे 'काम महोत्सव' भी कहते हैं। त्रेतायुग (धूलिवंदन): भगवान विष्णु द्वारा धूलि वंदन की स्मृति में 'धुलेंडी' मनाई जाती है। द्वापर युग (कृष्ण और राधा): होली में रंगों का समावेश भगवान श्रीकृष्ण ने किया। तभी से इसका नाम 'फगवाह' पड़ा क्योंकि यह फागुन में आता है।  राजा पृथु के काल में 'ढुंढी' नामक राक्षसी बच्चों को पीड़ा देती थी। ऋषियों की सलाह पर बच्चों ने सामूहिक शोर मचाकर और अग्नि जलाकर उसे परास्त किया। आज भी होलिका दहन के समय बच्चों का शोर मचाना और लकड़ी के डंडे गाड़ना 'बाल रक्षा' के उसी साहस का प्रतीक है। भारत के हर राज्य में होली का स्वरूप बदल जाता है, जो इसकी समृद्धि को दर्शाता है । ब्रज की लठमार होली (उत्तर प्रदेश) में बरसाना और नंदगांव की होली विश्व प्रसिद्ध है। यहाँ महिलाएं लाठियों से पुरुषों को मारती हैं और पुरुष ढाल से अपना बचाव करते हैं। यह गोपियों और कृष्ण के बीच के प्रेमपूर्ण ठिठोली का जीवंत रूप है। होला मोहल्ला (पंजाब) में सिखों के लिए होली 'होला मोहल्ला' के रूप में मनाई जाती है। गुरु गोविंद सिंह जी ने इसे वीरता के पर्व के रूप में स्थापित किया। यहाँ रंगों के साथ-साथ घुड़सवारी, तलवारबाजी और सैन्य कौशल का प्रदर्शन होता है। कुमाऊंनी होली (उत्तराखंड) में होली गायन की परंपरा है। यहाँ 'बैठकी होली' और 'खड़ी होली' होती है, जहाँ लोग शास्त्रीय रागों में होली के गीत गाते हैं। पश्चिम बंगाल और ओडिशा में  'डोल पूर्णिमा' कहते हैं। भगवान कृष्ण और राधा की मूर्तियों को पालकी में रखकर जुलूस निकाला जाता है और भक्त भजन गाते हुए गुलाल उड़ाते हैं। शिमगो , गोवा में इसे 'शिमगो' कहा जाता है। यहाँ लोक नृत्यों और झांकियों के साथ समुद्र के किनारे भव्य उत्सव मनाया जाता है। प्राचीन काल में रंग पलाश (टेसू) के फूलों से बनते थे। ये प्राकृतिक रंग त्वचा के लिए औषधि समान थे। होली का नारा "बुरा न मानो होली है" समाज से ऊंच-नीच और भेदभाव मिटाने का माध्यम है। आज यह गयाना, फिजी और मॉरीशस जैसे देशों में भी एक अंतरराष्ट्रीय उत्सव बन चुका है।
होली का सफर 'होलाका' यज्ञ की पवित्र अग्नि से शुरू होकर, प्रहलाद की अटूट भक्ति और श्रीकृष्ण के दिव्य प्रेम के रंगों तक फैला हुआ है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि जीवन में खुशियां तभी स्थायी हैं जब हम सामूहिक रूप से बुराई का अंत करें। फागुन की यह पूर्णिमा हमें नवीनता, सामाजिक समरसता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश देती है।

 होली: सृष्टि के आदि से अनंत तक 
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
होली केवल उत्सव नहीं, एक कालचक्र होली भारत का वह महापर्व है जिसे केवल 'रंगों का त्योहार' कहना इसके विराट स्वरूप को सीमित करना होगा। यह वसंत के शुभागमन, शीत के समापन और प्रकृति में नवजीवन के संचार का उत्सव है। भारतीय मनीषियों ने इसे 'मन्वंतर' के संधिकाल और युगों के परिवर्तन से जोड़कर देखा है। यह पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है, जो खगोलीय रूप से ऊर्जा के चरम और ऋतुओं के मिलन का बिंदु है।
सतयुग से कलियुग तक भारतीय दर्शन के अनुसार समय 'चक्रीय' है, और होली का स्वरूप हर युग में बदलता रहा है: सतयुग: यह 'सत्य और तत्व' की होली थी। इस काल में होली मन की शुद्धता का प्रतीक थी। यह वह समय था जब मनुष्य और प्रकृति के बीच कोई भेद नहीं था। त्रेतायुग: इस युग में होली 'अग्नि और भक्ति' की परीक्षा बनी। भक्त प्रह्लाद और होलिका की कथा इसी काल की है, जो संदेश देती है कि ईश्वर की भक्ति के सामने भौतिक शक्तियाँ (वरदान प्राप्त होलिका) भी भस्म हो जाती हैं।द्वापरयुग: भगवान कृष्ण ने इस पर्व को 'रास और रंग' का स्वर्णिम रूप दिया। ब्रज की होली, जो आज विश्व प्रसिद्ध है, द्वापर की ही देन है। यहाँ भक्ति और प्रेम (राधा-कृष्ण) का अद्भुत मिलन हुआ।
कलियुग: वर्तमान में यह 'सामाजिक समरसता' का उत्सव है। आज यह पर्व अवसाद को मिटाने और बिखरे हुए समाज को रंगों के बहाने एक सूत्र में पिरोने का कार्य कर रहा है। खगोलीय और वैज्ञानिक आधार: सौर और चंद्र का मिलन होली का समय केवल अंधविश्वास नहीं, बल्कि गहरा विज्ञान है: सौर और चंद्र प्रभाव: पूर्णिमा के दिन चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकट और पूर्ण होता है। सूर्य का उत्तरायण मार्ग और चंद्रमा का पूर्ण प्रभाव मनुष्य के रक्त संचार और मानसिक स्थिति को प्रभावित करता है। रंगों का खेलना इस बढ़ी हुई ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देता है। ग्रहों की चाल में ज्योतिष शास्त्र में इसे 'संवत्सर' का अंत माना जाता है। शनि, मंगल (भौम), शुक्र और बुध जैसे ग्रहों की स्थिति इस समय ऋतु परिवर्तन के अनुसार बदलती है, जिससे शरीर में दोष (कफ) बढ़ते हैं। होली की अग्नि और प्राकृतिक रंग इन दोषों का शमन करते हैं। होलिका दहन' के समय का तापमान हानिकारक कीटाणुओं को नष्ट करता है। पुराने समय में पलाश, हल्दी और नीम के रंगों का उपयोग त्वचा के रोगों को दूर करने के लिए किया जाता था।
वर्ण व्यवस्था और सामाजिक समरसता की होली भारतीय समाज के चारों वर्णों को एक ही धरातल पर ला खड़ा करती है: ब्राह्मण: शास्त्रोक्त अनुष्ठान और होलिका पूजन के माध्यम से आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करते हैं। क्षत्रिय: शौर्य और शक्ति का प्रदर्शन करते हैं। प्राचीन काल में राजाओं के दरबार में इसे 'विजयोत्सव' माना जाता था। वैश्य: नई फसल (होला/अनाज) के आने पर लक्ष्मी का स्वागत करते हैं और व्यापारिक रिश्तों में मधुरता लाते हैं। शूद्र: लोक-संगीत, ढोल-नगाड़ों और सामूहिक नृत्य (फाग) के जरिए समाज में उल्लास और प्राणवायु भरते हैं।  धुलेंडी के दिन जब धूल और गुलाल चेहरों पर लगता है, तो वर्णों की दीवार मज़बूत होती है। भारतीय शास्त्रों के अनुसार, यह उत्सव केवल मनुष्यों का नहीं है बल्कि देव और अप्सरा संस्कृति में स्वर्ग में गंधर्वों के गायन और अप्सराओं के नृत्य के साथ इसे 'वसंतोत्सव' कहा जाता है। कामदेव और रति संस्कृति में  शिव द्वारा कामदेव को भस्म करने और फिर रति की प्रार्थना पर उन्हें पुनर्जीवित (अनंग रूप में) करने की कथा प्रेम के पुनर्जन्म का प्रतीक है। असुर और राक्षस कलमे होलिका दहन असुरत्व (अहंकार) के अंत का प्रतीक है। वानर, ऋक्ष और नाग कल में प्राकृतिक योनियाँ प्रकृति के सौंदर्य और फूलों के पराग से इस उत्सव में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं । मुगल काल में अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ के समय इसे 'ईद-ए-गुलाबी' कहा जाता था। मुगल सम्राट लाल किले के झरोखों से जनता के साथ होली खेलते थे, जो भारतीय संस्कृति के प्रति उनके सम्मान को दर्शाता है। ब्रिटिश काल में  अंग्रेजों ने इसे 'कलरफुल फेस्टिवल' कहा। उस कठिन समय में भी भारतीयों ने अपनी संस्कृति को जीवित रखा और इसे एकता का हथियार बनाया। आजादी के बाद, होली राष्ट्रीय पर्व बन गई। यह 'अनेकता में एकता' का जीवंत उदाहरण है, जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक भिन्न नामों (जैसे डोल जात्रा, फाकुआ, फगुआ) से मनाई जाती है। यहूदी, फारसी और यवन प्रभाव में होली का वैश्विक स्वरूप अद्भुत है। फारस का 'नौरोज़', यहूदियों का 'पुरिम' और ईसाइयों का 'ईस्टर' कहीं न कहीं वसंत, नई फसल और बुराई पर अच्छाई की जीत के संदेश के साथ होली के समकक्ष खड़े दिखते हैं। कैरेबियन देशों (त्रिनिदाद, गुयाना) में इसे 'पागवा' के नाम से जाना जाता है, जो प्रवासी भारतीयों की अटूट श्रद्धा का प्रतीक है।होली हमें 'क्षमा'  और 'मैत्री' सिखाती है। यह पुराने शत्रुओं को गले लगाने का दिन है। सांस्कृतिक रूप से यह साहित्य (सूर, मीरा, रसखान), संगीत (फाग, चैती, ठुमरी) और पाक कला (गुझिया, ठंडाई) का अद्भुत मिश्रण है। होली केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मानव चेतना का परिष्कार है। यह ब्रह्म से लेकर शैव, वैष्णव, सौर, बौद्ध और जैन तक—सबके लिए आनंद का स्रोत है। यह पर्व सिखाता है कि जीवन में संघर्ष (होलिका दहन) के बाद ही रंगों (धुलेंडी) का आगमन होता है। आइए, इस विराट संस्कृति के रंगों में सराबोर होकर 'वसुधैव कुटुंबकम्' की भावना को चरितार्थ करें।

 होली 2026 पर 'ब्लड मून' का साया: 100 साल बाद महायोग 
रंगों के उत्सव पर खगोलीय प्रहार वर्ष 2026 की होली केवल गुलाल और खुशियों का पर्व नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय शक्तियों के एक ऐसे मिलन की साक्षी बनने जा रही है, जो इतिहास के पन्नों को पलटने की क्षमता रखता है। 3 मार्च 2026 को फाल्गुन पूर्णिमा के दिन, जब पूरा भारत होलिका दहन की तैयारी कर रहा होगा, आसमान में एक दुर्लभ 'ब्लड मून' (पूर्ण चंद्र ग्रहण) दिखाई देगा। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, ऐसा महासंयोग लगभग एक शताब्दी (100 वर्ष) के बाद बन रहा है। यह ग्रहण सिंह राशि और फाल्गुनी नक्षत्रों के संगम पर लग रहा है, जो न केवल भारत बल्कि संपूर्ण विश्व के राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक ढांचे में 'हार्ड रिसेट' (Hard Reset) का संकेत दे रहा है।
 ग्रहण का गणित: समय और सूतक काल - भारतीय समयानुसार, यह ग्रहण दोपहर से शुरू होकर शाम तक चलेगा, जिसके कारण इसका धार्मिक और ज्योतिषीय प्रभाव भारत में पूर्ण रूप से मान्य होगा। ग्रहण प्रारंभ: दोपहर 03:19 बजे , ग्रहण मध्य: सायं 05:03 बजे , ग्रहण समाप्ति: सायं 06:47 बजे ,सूतक काल: ग्रहण शुरू होने से 9 घंटे पूर्व यानी 3 मार्च की सुबह से ही सूतक लग जाएगा।सूतक काल के दौरान मंदिरों के कपाट बंद रहेंगे और मांगलिक कार्य वर्जित होंगे। होलिका दहन के शुभ मुहूर्त पर भी इस ग्रहण का साया रहेगा, जिससे विद्वानों के बीच भद्रा और सूतक को लेकर गहन विमर्श की स्थिति बनेगी। नक्षत्रों का खेल: सिंह राशि में सत्ता का संघर्ष यह ग्रहण सिंह राशि में लगने जा रहा है, जिसका स्वामी 'सूर्य' है। सिंह राशि राजसत्ता, प्रशासन और आत्मविश्वास का प्रतीक है। इस राशि में ग्रहण लगना सीधे तौर पर दुनिया के शीर्ष नेतृत्व को प्रभावित करता है। पूर्वाफाल्गुनी (स्वामी:, चन्द्र  का प्रभाव: ग्रहण का प्रथम चरण चन्द्र के नक्षत्र में होगा। यह विलासिता, कला और स्त्री शक्ति का प्रतीक है।
मनोरंजन जगत: फिल्म इंडस्ट्री और फैशन जगत में किसी बड़ी हस्ती का पतन या बड़ा विवाद सामने आ सकता है।महिला शक्ति: विश्व स्तर पर महिलाओं से जुड़े कानूनों में बड़े बदलाव या बड़े आंदोलन देखने को मिल सकते हैं।
उत्तराफाल्गुनी (स्वामी: सूर्य) का प्रभाव: ग्रहण का मुख्य प्रभाव सूर्य के नक्षत्र पर होगा। भगवान सूर्य 'राजा' है। नेतृत्व परिवर्तन: अमेरिका, रूस और मध्य-पूर्व के देशों में सत्ता परिवर्तन की लहर चल सकती है। अजेय समझे जाने वाले नेताओं के वर्चस्व को गंभीर चुनौती मिलेगी। ऐतिहासिक पुनरावृत्ति: 100 साल पहले  हुआ था। यदि हम 100 वर्ष पीछे 1925-1926 के कालखंड को देखें, तो उस समय भी ग्रहों की स्थिति ने विश्व को एक नए युग में धकेला था।
क्षेत्र 100 वर्ष पूर्व का प्रभाव (1925-26)             2026 का संभावित प्रभाव
राजनीति उपनिवेशवाद के विरुद्ध विद्रोह तेज हुए। डिजिटल उपनिवेशवाद और AI के विरुद्ध वैश्विक नियम।
अर्थव्यवस्था 1929 की महामंदी की नींव पड़ी। क्रिप्टो और बैंकिंग प्रणाली में 'ग्रेट रिसेट'।
सत्ता राजशाही का अंत और तानाशाहों का उदय। लोकतांत्रिक ढांचों में आमूलचूल परिवर्तन।
तकनीक रेडियो और शुरुआती उड्डयन का विस्तार। क्वांटम कंप्यूटिंग और अंतरिक्ष युद्ध की शुरुआत।
4. वैश्विक भू-राजनीति और युद्ध के बादल 2026 का 'ब्लड मून' मेदिनी ज्योतिष के अनुसार अशांति का सूचक है। मंगल और शनि की युति इस ग्रहण को और भी विस्फोटक बना रही है। मध्य-पूर्व  इजरायल, ईरान और पड़ोसी देशों के बीच संघर्ष का एक नया और अधिक हिंसक अध्याय शुरू हो सकता है। यह 'ब्लड मून' सीमाओं के पुनर्निर्धारण का गवाह बन सकता है । साइबर और स्पेस वॉर: अब युद्ध केवल जमीन पर नहीं, बल्कि अंतरिक्ष और डेटा के स्तर पर लड़े जाएंगे। वैश्विक संचार प्रणालियों (Satellites) में व्यवधान की प्रबल आशंका है। भारत की कुंडली के अनुसार, पड़ोसी देशों के साथ सीमा विवाद गहरा सकता है। हालांकि, कूटनीतिक स्तर पर भारत एक 'विश्व गुरु' की भूमिका में उभरकर नई शांति संधियों का नेतृत्व भी करेगा। आर्थिक 'हार्ड रिसेट' और बाजार की अस्थिरता का सिंह राशि का ग्रहण राजकोष पर प्रभाव डालता है। शेयर बाजार: मार्च 2026 में निवेशकों को अत्यधिक सावधानी बरतने की जरूरत है। 'ब्लड मून' के आसपास बाजारों में अप्रत्याशित गिरावट देखी जा सकती है। सोना और चांदी: अनिश्चितता के कारण कीमती धातुओं के दामों में रिकॉर्ड उछाल आने की संभावना है। लोग सुरक्षित निवेश की ओर भागेंगे।
 प्रकृति का प्रकोप: जलवायु और भूमि में मंगल और राहु का प्रभाव पृथ्वी के भीतर की हलचल को बढ़ाएगा। भूकंप और सुनामी: प्रशांत महासागर के 'रिंग ऑफ फायर' और हिमालयी क्षेत्रों में बड़े भूकंपीय झटकों की आशंका रहेगी। अग्नि तत्व: चूंकि ग्रहण सिंह (अग्नि राशि) में है, इसलिए 2026 की गर्मियों में वैश्विक स्तर पर 'फॉरेस्ट फायर' और भीषण लू (Heatwave) के नए रिकॉर्ड बन सकते हैं। सामाजिक ताना-बना और मानसिक स्वास्थ्य में चंद्रमा 'मन' का कारक है और राहु-केतु के प्रभाव में चंद्रमा का 'रक्त वर्ण' (लाल होना) जनमानस में उत्तेजना पैदा करता है। जन-विद्रोह में दुनिया के कई हिस्सों में जनता अपनी सरकारों के खिलाफ सड़कों पर उतर सकती है।मानसिक तनाव: के दौरान लोगों में अनिद्रा, चिड़चिड़ापन और अवसाद बढ़ सकता है। होली के हुड़दंग में हिंसक टकराव से बचने की सलाह दी जाती है। आध्यात्मिक सुरक्षा कवच। उथल-पुथल भरे समय में ज्योतिष शास्त्र कुछ विशेष सावधानियों का सुझाव देता है:गर्भवती महिलाओं के लिए: ग्रहण काल में घर के भीतर रहें। सिलाई, कटाई या नुकीली वस्तुओं के प्रयोग से बचें।
मंत्र शक्ति: "ॐ सोम सोमाय नमः" और महामृत्युंजय मंत्र का जाप नकारात्मक ऊर्जा को सोखने में सहायक होगा।
: ग्रहण के पश्चात सफेद वस्तुओं (चावल, दूध, चीनी) का दान करना शुभ रहेगा। होलिका दहन के समय सात्विकता बनाए रखें। नशीले पदार्थों से दूर रहें, क्योंकि ग्रहण के प्रभाव में ये मानसिक संतुलन बिगाड़ सकते हैं।  विनाश से विकास की ओर 2026 का 'ब्लड मून' केवल डराने वाली घटना नहीं है, बल्कि यह 'युग परिवर्तन' की एक आवश्यक प्रक्रिया है। पुरानी, सड़ी-गली व्यवस्थाओं के अंत के लिए प्रकृति अक्सर ऐसे कठोर निर्णय लेती है। यह समय आत्म-मंथन, आध्यात्मिक जागृति और नई विचारधाराओं के उदय का है। जो समाज और राष्ट्र इस समय संयम और नवाचार  का परिचय देंगे, वे ही अगले 100 वर्षों तक विश्व पर राज करेंगे।
[5/3, 6:08 AM] Satyendra Kumar PatHK: भारतीय मनीषा के आधुनिक ऋत्विक: डॉ. विद्यानिवास मिश्र
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
हिंदी साहित्य के आकाश में डॉ. विद्यानिवास मिश्र (1926–2005) एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र रहे हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से न केवल शब्दों को संस्कारित किया, बल्कि भारतीय संस्कृति की सोई हुई चेतना को भी झकझोर कर जगाया। वे केवल एक निबंधकार या भाषाविद् नहीं थे; वे एक 'सांस्कृतिक सेतु' थे, जिन्होंने प्राचीन वेदों की ऋचाओं और गाँव की पगडंडियों के बीच एक जीवंत संवाद स्थापित किया। 28 जनवरी 1926 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के पकड़ीडीहा गाँव में जन्में डॉ. मिश्र ने भारतीय वांग्मय को वह 'ललितात्मक' दृष्टि दी, जो विद्वानों के लिए शास्त्र है और आम जनमानस के लिए लोक-कथा।
डॉ. मिश्र का व्यक्तित्व उनके पारिवारिक संस्कारों की उपज था। एक ऐसे परिवार में जन्म जहाँ संस्कृत की ध्वनियाँ हवा में तैरती थीं, उन्होंने बचपन से ही 'शब्द' की शुचिता को आत्मसात किया। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की। संस्कृत, हिंदी और अंग्रेजी—इन तीनों भाषाओं पर उनका समान अधिकार था। वे केवल किताबी विद्वान नहीं थे, बल्कि उन्होंने कैलिफोर्निया और वाशिंगटन जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय भाषा-विज्ञान का परचम लहराया। काशी हिंदू विश्वविद्यालय से लेकर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति पद तक, उनकी यात्रा शिक्षा को 'संस्कार' बनाने की रही। उनके लिए शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं, बल्कि स्वयं को पहचानने की प्रक्रिया थी।
: लोक-सुगंध का अक्षय भंडार विद्यानिवास जी को 'ललित निबंध' विधा का पर्याय माना जाता है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के बाद, उन्होंने इस विधा को वह विस्तार दिया जहाँ निबंध केवल जानकारी न रहकर एक 'अनुभव' बन गया।
प्रमुख कृतियाँ: 'छितवन की छाँह' (1953) से शुरू हुई उनकी यात्रा 'तुम चंदन हम पानी', 'आँगन का पंछी और बंजारा मन', और 'कदम की फूली डाल' जैसी सत्तर से अधिक कृतियों तक पहुँची।  उनके निबंधों में 'स्व' का विस्तार 'सर्व' तक है। जब वे 'मैंने सिल पहुँचाई' लिखते हैं, तो वे केवल एक पत्थर की बात नहीं कर रहे होते, बल्कि उस श्रम, उस त्याग और उस भारतीय स्त्री की बात कर रहे होते हैं जो परिवार की नींव है।
 बाल साहित्य: एक अघोषित क्रांति एक रोचक तथ्य है कि मिश्र जी ने व्यावसायिक अर्थों में 'बाल साहित्य' नहीं लिखा, लेकिन उनका साहित्य बाल-पाठकों के लिए सबसे अधिक 'प्राकृतिक' है। प्रकृति के साथ बचपन: उनके निबंध बच्चों को मोबाइल की स्क्रीन से निकालकर नीम की छाँव और गौरैया के घोंसले तक ले जाते हैं। संस्कार और मनोरंजन: 'आँगन का पंछी' निबंध में वे गौरैया के साथ जो आत्मीयता दिखाते हैं, वह किसी भी बच्चे के भीतर जीव-दया और पर्यावरण प्रेम का बीज बोने के लिए पर्याप्त है। वे लोक-कथाओं के माध्यम से बच्चों को भारतीय जड़ों से जोड़ते हैं, जिससे उनमें 'सांस्कृतिक आत्मविश्वास' जागता है। उनकी शैली इतनी आत्मीय है कि ऐसा लगता है जैसे कोई दादा या नाना बच्चों को पास बिठाकर किस्से सुना रहा हो। यह सरलता ही उन्हें बच्चों का प्रिय लेखक बनाती है।मूल्यों की पत्रकारिता में डॉ. मिश्र एक कुशल प्रशासक और प्रखर संपादक भी थे। 'नवभारत टाइम्स' के प्रधान संपादक के रूप में उन्होंन पत्रकारिता को 'बाजार' बनने से बचाकर 'विचार' का मंच बनाया। उन्होंने इस पत्रिका के माध्यम से नए लेखकों की एक पूरी पीढ़ी तैयार की।  वे आधुनिकता के विरोधी नहीं थे, लेकिन वे ऐसी 'अंधी आधुनिकता' के कट्टर विरोधी थे जो अपनी जड़ों को काटकर ऊँचे महल बनाना चाहती है। उन्होंने हमेशा कहा कि "गाँव का मन" ही भारत का असली मन है। आलोचनात्मक दृष्टि से देखा जाए तो डॉ. मिश्र का साहित्य 'अतीतमुखी' (Past-oriented) नहीं, बल्कि 'अतीत-प्रेरित' है। उन्होंने सिद्ध किया कि जो गरिमा कालिदास के 'मेघदूत' में है, वही वेदना गाँव के विरहा गीतों में भी है। उन्होंने 'कदम की फूली डाल' के माध्यम से दिखाया कि प्रकृति का हर रंग ईश्वरीय लीला का हिस्सा है।  उनकी भाषा में संस्कृत की तत्समता है तो ग्रामीण बोलियों की तरलता भी। यह संगम पाठक को एक मानसिक शांति प्रदान करता है।  सम्मान और उपलब्धियां में राष्ट्र का गौरव भारतीय साहित्य और शिक्षा में उनके योगदान के लिए उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मानों से नवाजा गया: 1987: पद्मश्री , 1999: पद्म भूषण , मूर्तिदेवी पुरस्कार: साहित्य के माध्यम से मानवीय मूल्यों के प्रसार के लिए है । वे हिंदी साहित्य सम्मेलन के दो बार अध्यक्ष रहे और राज्यसभा के सदस्य के रूप में भी उन्होंने देश की सांस्कृतिक नीतियों को प्रभावित किया।
एक अमर विरासत डॉ. विद्यानिवास मिश्र का अवसान 14 फरवरी 2005 को हुआ, लेकिन उनके शब्द आज भी जीवंत हैं। आज जब दुनिया ग्लोबल वार्मिंग और मानसिक तनाव से जूझ रही है, मिश्र जी के निबंध हमें 'प्रकृति' और 'स्वयं' के करीब लौटने का रास्ता दिखाते हैं। उनका साहित्य एक 'सांस्कृतिक औषधि' है जो आधुनिक पीढ़ी को अपनी पहचान (Identity) से रूबरू कराती है। उनका 'बंजारा मन' आज भी हमें पगडंडियों पर चलने और अपनी मिट्टी की सुगंध को महसूस करने की प्रेरणा देता है।  डॉ. मिश्र का जीवन-दर्शन: मिट्टी से प्रेम: जड़ों को कभी मत भूलो। , प्रकृति से संवाद: पक्षी, पेड़ और ऋतुएँ हमारे सहचर हैं। शब्द की गरिमा: भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, संस्कृति का वाहक है। आने वाली शताब्दियों तक जब भी भारतीय लोक-जीवन और ललित निबंधों की चर्चा होगी, डॉ. विद्यानिवास मिश्र का नाम सबसे पहले और सबसे सम्मान के साथ लिया जाएगा। वे भारतीय मनीषा के वे 'ऋत्विक' थे जिन्होंने अपनी लेखनी की आहुति से हिंदी साहित्य के यज्ञ को पूरा किया है।

: बगीचे की अनोखी सभा 
(मंच पर हलचल बढ़ जाती है। डुग्गू और पुच्चू अब जानवरों की आवाज़ें निकाल रहे हैं।)
पुच्चू (गदहा बनकर): "ढेंचू-ढेंचू! भाई डुग्गू, सब मुझे बुद्धू कहते हैं, पर देखो मैं कितना भारी बस्ता (पत्तों का ढेर) उठाकर भी नहीं थकता!"
डुग्गू (बंदर की तरह उछलते हुए): "अरे भाई गदहे, तुम तो काम के मारे हो! मुझे देखो, आम के पेड़ से महुआ के पेड़ तक एक छलांग! और ये देखो शरीफा... इसे तो मैं चुटकी में तोड़ लूं!"
पुच्ची (तोते की तरह नाक सिकोड़कर): "टैं-टैं! डुग्गू भैया, फल तोड़ने से पहले आम के पेड़ से पूछ तो लो! वो बेचारा साल भर धूप सहकर हमारे लिए फल बनाता है।"
गुड़िया (मैना की तरह चहकते हुए): "बिल्कुल सही! और गेंदा और गुलाब के फूलों को तो बिल्कुल मत तोड़ना। वे तो बगीचे की मुस्कान हैं। क्या कोई अपनी मुस्कान तोड़ता है?"
मम्मी-पापा और दादाजी का प्रवेश
मम्मी: "अरे वाह! यहाँ तो पूरी चिड़ियाघर की सभा बैठी है। पर क्या किसी ने देखा कि 'बिल्ली मौसी' कहाँ हैं?"
बेबी (हाथ में बिल्ली का खिलौना लेकर): "म्याऊं-म्याऊं... बिल्ली दूध पी गई! पापा, बिल्ली गंदी है?"
पापा (हँसते हुए): "नहीं बेबी, बिल्ली तो बस भूखी थी। जैसे शेर जंगल का राजा है, बिल्ली भी तो उसकी छोटी मौसी कहलाती है! वह चूहों को भगाकर हमारे अनाज की रक्षा करती है।"
दादाजी: "बच्चों, गौर से देखो इस महुआ के पेड़ को। इसकी खुशबू से ही तो पूरा बगीचा महक रहा है। और वो देखो किनारे पर खड़ा कटहल, कितना बड़ा और मजबूत फल देता है।"
एक मजेदार मुकाबला (संवाद)
पुच्चू: "पर दादाजी, सबसे अच्छा तो केला है। न छीलने का झंझट, न बीज का डर! बस खोलो और खा जाओ!"
डुग्गू: "नहीं, अमरूद सबसे बढ़िया है! नमक लगाकर खाओ तो मज़ा आ जाता है।"
पुच्ची: "तुम दोनों बस खाने की सोचते हो। ये चमेली की खुशबू और गेंदे का पीला रंग देखो, जैसे बगीचे ने सोने की चादर ओढ़ ली हो।"
दादाजी: "शाबाश! यही तो कुदरत का जादू है। कुत्ता वफादारी सिखाता है, खरगोश फुर्ती, और ये पेड़ हमें 'परोपकार' यानी दूसरों की मदद करना सिखाते हैं।"
अंतिम दृश्य
सब पात्र एक घेरा बनाकर नाचते हैं।"आम, अमरूद और शरीफा, सबको हम बचाएंगे,
हाथी, घोड़ा और चूहा, सबको दोस्त बनाएंगे!
बगीचा हमारा मंदिर है, हर जीव है वरदान,
प्रकृति की सेवा ही है, हम बच्चों की शान!"
(मंच पर फूलों की वर्षा होती है और सब एक साथ झुककर प्रणाम करते हैं।)

एकांकी की विशेषताएं: मनोरंजन: बच्चों के पशु-पक्षी बनने से नाटक में हास्य बना रहता है।
शिक्षा: पेड़ों के महत्व और जानवरों की उपयोगिता की जानकारी मिलती है।

अनोखी दोस्ती और जादुई संदूक
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
दादाजी का पुराना घर किसी भूलभुलैया से कम नहीं था। ऊँची छतें, भारी लकड़ी के दरवाजे और आंगन में लगा पुराना बरगद का पेड़—यह सब डुग्गू और पुच्चू के लिए किसी एडवेंचर पार्क जैसा था। इस बार छुट्टियों में उनके साथ मम्मी और पापा भी आए थे, जिससे घर की रौनक और बढ़ गई थी।
दोपहर का समय था। घर के बड़े सदस्य आंगन में सुस्ता रहे थे। तभी स्टोर रूम से कुछ अजीब सी आवाजें आईं— "खुर-खुर... चूँ...!" डुग्गू और पुच्चू दबे पाँव अंदर गए। वहां उन्होंने देखा कि एक मोटी सफेद बिल्ली (जिसे दादाजी 'पुसी' कहते थे) एक नन्हे से चूहे को कोने में घेरे खड़ी थी। चूहा डर के मारे थर-थर कांप रहा था। पुच्चू को उस पर दया आ गई। उसने धीरे से कहा, "डुग्गू भैया, हमें इसे बचाना चाहिए।" डुग्गू ने चतुराई दिखाई और अपनी गेंद बिल्ली की तरफ उछाल दी। बिल्ली का ध्यान भटका और चूहा फुर्ती से अलमारी के पीछे जा छिपा ।
अगले दिन घर में बड़ी हलचल थी। दादाजी बहुत परेशान थे। उन्होंने अलमारी में बच्चों के लिए कुछ उपहार रखे थे, लेकिन उसकी चाबी गायब थी। पापा ने सोफे के नीचे देखा, मम्मी ने रसोई की अलमारियों में, यहाँ तक कि बिल्ली के बिछावन के पास भी ढूँढा, पर चाबी कहीं नहीं मिली।
पुच्चू उदास होकर उसी स्टोर रूम के बाहर बैठा था। तभी उसने देखा कि वही नन्हा चूहा अलमारी के पीछे से निकलकर उसकी ओर देख रहा है। वह चूहा बार-बार एक छोटी सी दरार की ओर जा रहा था और वापस आ रहा था।
डुग्गू ने गौर किया, "पुच्चू, देखो! यह चूहा हमें कुछ बताना चाहता है।" दोनों बच्चे उसके पीछे-पीछे दरार के पास गए। वह जगह इतनी तंग थी कि वहां किसी इंसान का हाथ नहीं जा सकता था। चूहा अंदर गया और कुछ ही पलों में अपने दाँतों के बीच पीतल की वह छोटी चाबी दबाए बाहर निकला!
बच्चे खुशी से चिल्ला उठे, "मिल गया ।जब दादाजी ने संदूक खोला, तो उसमें से बच्चों के लिए सुंदर खिलौने और कहानियों की किताबें निकलीं। दादाजी ने मुस्कुराते हुए कहा, "देखा बच्चों, कल तुमने इस छोटे से जीव की जान बचाई थी, और आज इसने हमारी मुश्किल हल कर दी। दुनिया में कोई भी जीव छोटा या बेकार नहीं होता।"
पापा ने भी बच्चों की पीठ थपथपाई। मम्मी ने उस नन्हे चूहे के लिए पनीर का एक टुकड़ा रखा और बिल्ली को प्यार से समझाया कि अब से यह चूहा उसका शिकार नहीं, बल्कि दोस्त है।