सोमवार, जनवरी 17, 2022

श्रीराम जन्मभूमि अयोध्या ...


पुरणों , स्मृति ग्रंथो.  जैन , बौद्ध धर्म ग्रंथों में  प्राचीन और सात पवित्र तीर्थस्थलों में  अयोध्या को शामिल किया गया है । कोसल राज्य की प्रारंभिक राजधानी अयोध्या थी । अयोध्या को अयोध्या , कौशल , कोसल , कोसलपुर , साकेत रामपुर , अवध , राघवपुर कहा जाता है ।  गौतमबुद्ध के काल में  कोसल को सरयू नदी द्वारा उत्तर कोसल और दक्षिण कौशल  विभक्त थी । बौद्ध काल में  अयोध्या के समीप साकेत नगर स्थापित हुआ था । वाल्मीकि रामायण के अनुसार कोशल राज्य  की राजधानी अयोध्या  है ।  पुराणों में इस नगर के संबंध में कोई विशेष उल्लेख नहीं मिलता है. वहीं राम के जन्म के समय यह नगर अवध ( अयोध्या) नाम जाना जाता है ।अयोध्या में ऐसे स्थल पर एक मस्जिद बनवाया गया, जिसे हिंदू अपने आराध्य देव भगवान राम का जन्म स्थान मानते हैं. कहा जाता है कि मुगल राजा बाबर के सेनापति मीर बाकी ने यहां मस्जिद बनवाई थी, जिसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता था. बाबर 1526 में भारत आया. 1528 तक उसका साम्राज्य अवध (वर्तमान अयोध्या) तक पहुंच गया. इसके बाद करीब तीन सदियों तक के इतिहास की जानकरी किसी भी ओपन सोर्स पर मौजूद नहीं है ।कालिदास की  रघुवंश तथा बौद्ध ग्रंथों ,  जैन साहित्य , कनिंघम ने  अयोध्या और साकेत को  समीकृत किया , वाल्मीकि रामायण में कौशल की राजधानी अयोध्या का उल्लेख है । रामायण  में सरयू नदी के किनारे स्थित अयोध्या में  दशरथ की राजधानी और राम की जन्भूमि  है । सरयू नदी के किनारे 14 घाट में गुप्तद्वार घाट, कैकेयी घाट, कौशल्या घाट, पापमोचन घाट, लक्ष्मण घाट , राम की पैड़ी आदि  है  । अयोध्या के मंदिरों में 'कनक भवन ,  हनुमान गढ़ी का हनुमान जी मंदिर , वाल्मीकि मंदिर ,  सबसे सुंदर है. । उत्तर प्रदेश का अयोध्या जिले का मुख्यालय सरयू नदी के तट पर बसा अयोध्या प्राचीन धार्मिक , सांस्कृतिक  नगर है। कोसल , साकेत , अयोध्यापुरी को अयोध्या कहा जाता है । पुरणों के अनुसार अयोध्या में सूर्यवंश  राजाओं का राज  था, जिसमें भगवान् श्री राम ने अवतार लिया। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ७वीं शताब्दी का यात्रा क्रमानुसार अयोध्या में  20 बौद्ध मंदिर तथा 3000 भिक्षु रहते थे। यह नगरी सप्त पुरियों में से एक है । 5458.01 वर्ग कि.मि . ( 14136 वर्गमील ) क्षेत्रफल में फैला अयोध्या जिले के अयोध्या पूरी 4 वर्गमील में स्थित है । अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका ।पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिक :  । अर्थात अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, काञ्चीपुरम, उज्जैन, और द्वारिका - ये सात पुरियाँ नगर मोक्षदायी हैं। ब्रह्मपुराण  के अनुसार वैवस्वत मनु के पौत्र एवं इक्ष्वाकु का बडे पुत्र विकुक्षि को पराक्रम के कारण अयोध्य कहा गया था । राजा अयोध्य ने सरयू नदी के किनारे अयोध्या नगर की स्थापना और अयोध्या राज की नींव डाली थी । राजा  अयोध्य के पुत्र शकुनि उत्तरभारत के रक्षक थे । अयोध्या के सूर्यवंशीय राजा अवध्य के वंशज में ककुट्स, अनेना , पृथु ,विष्टरश्च , आर्द ,युवनाश्व और  श्रावस्त अयोध्या के राजा हुए । राजा श्रावस्त द्वारा श्रावस्तीपूरी  नगर बसायी थी । श्रवस्त के  पौत्र एवं वृहदश्व के पुत्र कुलाश्व द्वारा दैत्य मधु का पुत्र  दैत्य धुन्धु को वध कर जनता की रक्षा की । इक्ष्वाकु वंशीय राजाओं में अयोध्या का राजा दिलीप , रघु ,अज , दशरथ , भगवान राम , कुश ,अतिथि ,निषध , नल , नभ ,  पुण्डरीक ,क्षेमधंवा , देवनिक अहिनगु, सुधन्वा , शाल , उक्य , वज्रनाभ  और नाल  थे । वेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर बताया गया है, "अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या" । अथर्ववेद में यौगिक प्रतीक के रूप में अयोध्या का उल्लेख है- अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या।तस्यां हिरण्मयः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः॥ (अथर्ववेद -- 10.2.31). रामायण के अनुसार अयोध्या की स्थापना मनु ने की थी। यह पुरी सरयू के तट पर बारह योजन (लगभग १४४ कि.मी) लम्बाई और तीन योजन (लगभग ३६ कि.मी.) चौड़ाई में बसी थी। शताब्दी तक यह नगर सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी रहा। स्कन्दपुराण के अनुसार सरयू के तट पर दिव्य शोभा से युक्त दूसरी अमरावती के समान अयोध्या नगरी है। जैन धर्म ग्रंथों के अनुसार चौबीस तीर्थंकरों में  पांच तीर्थंकरों का जन्म हुआ था। प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ जी, दूसरे तीर्थंकर अजितनाथ जी, चौथे तीर्थंकर अभिनंदननाथ जी, पांचवे तीर्थंकर सुमतिनाथ जी और चौदहवें तीर्थंकर अनंतनाथ जी थे । इसके अलावा जैन और वैदिक दोनों मतो के अनुसार भगवान रामचन्द्र जी का जन्म  भूमि पर हुआ था । इक्ष्वाकु वंशीय  भगवान रामचंद्र जी  कोसल जनपद की राजधानी अयोध्या में राजा था। अयोध्या का  क्षेत्रफल 96 वर्ग मील था। सातवीं शाताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग आया था। उसके अनुसार यहाँ 20 बौद्ध मंदिर थे तथा 3000 भिक्षु रहते थे।  श्रीरामजन्मभूमि , कनकभवन , हनुमानगढ़ी , दशरथमहल , श्रीलक्ष्मणकिला , कालेराम मन्दिर , मणिपर्वत , श्रीराम की पैड़ी , नागेश्वरनाथ , क्षीरेश्वरनाथ श्री अनादि पञ्चमुखी महादेव मन्दिर , गुप्तार घाट समेत अनेक मन्दिर यहाँ प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं। बिरला मन्दिर , श्रीमणिरामदास जी की छावनी , श्रीरामवल्लभाकुञ्ज , श्रीलक्ष्मणकिला , श्रीसियारामकिला , उदासीन आश्रम रानोपाली तथा हनुमान बाग  हैं । श्रीरामनवमी , श्रीजानकीनवमी , गुरुपूर्णिमा , सावन झूला , कार्तिक परिक्रमा , श्रीरामविवाहोत्सव आदि उत्सव प्रमुखता से मनाये जाते हैं।शहर के पश्चिमी हिस्से में स्थित रामकोट में स्थित अयोध्या का सर्वप्रमुख स्थान श्रीरामजन्मभूमि है। श्रीराम-लक्ष्मण-भरत और शत्रुघ्न चारों भाइयों के बालरूप के दर्शन यहाँ होते हैं। कनक भवन - हनुमान गढ़ी के निकट स्थित कनक भवन अयोध्या का एक महत्वपूर्ण मंदिर है। यह मंदिर सीता और राम के सोने मुकुट पहने प्रतिमाओं के लिए लोकप्रिय है । कनक मंदिर को  टीकमगढ़ की रानी ने 1891 में बनवाया था। हनुमान गढ़ी - नगर के केन्द्र में स्थित इस मंदिर में 76 कदमों की चाल से पहुँचा जा सकता है। हनुमान जी सदैव वास करते हैं।  अयोध्या आकर भगवान राम के दर्शन से पहले भक्त हनुमान जी के दर्शन करते हैं।  हनुमान मंदिर "हनुमानगढ़ी" के नाम से प्रसिद्ध है। यह मंदिर राजद्वार के सामने ऊंचे टीले पर स्थित है। हनुमान जी यहाँ एक गुफा में रहते थे और रामजन्मभूमि और रामकोट की रक्षा करते थे। प्रभु श्रीराम ने हनुमान जी को  अधिकार दिया था कि भक्त मेरे दर्शनों के लिए अयोध्या आएगा उसे पहले तुम्हारा दर्शन पूजन करना होगा।  छोटी दीपावली के दिन आधी रात को संकटमोचन का जन्म दिवस मनाया जाता है। पवित्र नगरी अयोध्या में सरयू नदी में पाप धोने से पहले लोगों को भगवान हनुमान से आज्ञा लेनी होती है। यह मंदिर अयोध्या में एक टीले पर स्थित होने के कारण मंदिर तक पहुंचने के लिए लगभग 76 सीढि़यां चढ़नी पड़ती हैं। इसके बाद पवनपुत्र हनुमान की 6 इंच की प्रतिमा के दर्शन होते है।  मुख्य मंदिर में बाल हनुमान के साथ अंजनी माता की प्रतिमा है । मंदिर परिसर में मां अंजनी व बाल हनुमान की मूर्ति में हनुमान जी, अपनी मां अंजनी की गोद में बालक के रूप में विराजमान हैं। हनुमान  मन्दिर के निर्माण सुल्तान मंसूर अली अवध का नवाब था। एक बार उसका एकमात्र पुत्र गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। प्राण बचने के आसार नहीं रहे, रात्रि की कालिमा गहराने के साथ  उसकी नाड़ी उखड़ने लगी तो सुल्तान ने थक हार कर संकटमोचक हनुमान जी के चरणों में माथा रख दिया। हनुमान ने अपने आराध्य प्रभु श्रीराम का ध्यान किया और सुल्तान के पुत्र की धड़कनें पुनः प्रारम्भ हो गई। अपने इकलौते पुत्र के प्राणों की रक्षा होने पर अवध के नवाब मंसूर अली ने बजरंगबली के चरणों में माथा टेक दिया। जिसके बाद नवाब ने न केवल हनुमान गढ़ी मंदिर का जीर्णोंद्धार कराया बल्कि ताम्रपत्र पर लिखकर ये घोषणा की कि कभी  मंदिर पर किसी राजा या शासक का कोई अधिकार नहीं रहेगा और न ही यहां के चढ़ावे से कोई कर वसूल किया जाएगा। उसने 52 बीघा भूमि हनुमान गढ़ी व इमली वन के लिए उपलब्ध करवाई थी । लंका से विजय के प्रतीक रूप में लाए गए निशान मंदिर में रखे गए थे ।मन्दिर में विराजमान हनुमान जी को  अयोध्या का राजा माना जाता है। कहते हैं कि हनुमान यहाँ एक गुफा में रहते थे और रामजन्मभूमि और रामकोट की रक्षा करते है ।
अयोध्या में  हिंदू अपने आराध्य देव भगवान राम का जन्म स्थान पर राम मंदिर पर  मुगल शासक  बाबर के सेनापति मीर बाकी ने  मस्जिद बनवाई थी, जिसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता था । बाबर 1526 में भारत आया. 1528 तक उसका साम्राज्य अवध (अयोध्या) तक पहुंच गया था ।
श्री राम जन्मभूमि -  श्री राम मंदिर का निर्माण अयोध्या का राजा लव द्वारा निर्माण किया था । श्रीराम मंदिर का समय समय पर अयोध्या  के विभिन्न सूर्यवंशीय इक्ष्वाकु कुल के राजाओं में वृहद्वल , आदि राजाओं में इक्ष्वाकु वंशीय का अंतिम राजा क्षुद्रक  का प्रपौत्र कुंडक का पौत्र सुरथ का पुत्र  सुमित्र द्वारा समय समय पर विकास किया था । राजा विक्रमादित्य द्वितीय द्वारा श्री राम का जन्म भूमि  अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण कर  राम लला को विराजमान किया  था जिसे मुगल बादशाह  बाबर ने तोड़कर वहाँ  मस्जिद बना दी। ६ दिसम्बर सन् १९९२ को यह विवादित ढ़ांचा गिरा दिया गया और वहाँ श्री राम का एक अस्थायी मन्दिर निर्मित कर दिया गया।१५२८ में राम जन्म भूमि पर मस्जिद बनाई गई थी। हिन्दुओं के पौराणिक ग्रन्थ रामायण और रामचरित मानस के अनुसार यहां भगवान राम का जन्म हुआ था।१८५३ में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच इस जमीन को लेकर पहली बार विवाद हुआ।१८५९ में अंग्रेजों ने विवाद को ध्यान में रखते हुए पूजा व नमाज के लिए मुसलमानों को अन्दर का हिस्सा और हिन्दुओं को बाहर का हिस्सा उपयोग में लाने को कहा।१९४९ में अन्दर के हिस्से में भगवान राम की मूर्ति रखी गई। तनाव को बढ़ता देख सरकार ने इसके गेट में ताला लगा दिया।सन् १९८६ में जिला न्यायाधीश ने विवादित स्थल को हिंदुओं की पूजा के लिए खोलने का आदेश दिया। मुस्लिम समुदाय ने इसके विरोध में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी गठित की।सन् १९८९ में विश्व हिन्दू परिषद ने विवादित स्थल से सटी जमीन पर राम मंदिर की मुहिम शुरू की। ६ दिसम्बर १९९२ को अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराई गई। परिणामस्वरूप देशव्यापी दंगों में करीब दो हजार लोगों की जानें गईं।उसके दस दिन बाद १६ दिसम्बर १९९२ को लिब्रहान आयोग गठित किया गया। आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के सेवानिवृत मुख्य न्यायाधीश एम.एस. लिब्रहान को आयोग का अध्यक्ष ने १६ मार्च १९९३ को प्रतिवेदन प्रस्तुत किया । १९९३ में केंद्र के  अधिग्रहण को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती मिली। चुनौती देने वाला शख्स मोहम्मद इस्माइल फारुकी था। मगर कोर्ट ने इस चुनौती को ख़ारिज कर दिया कि केंद्र  जमीन का संग्रहक है। जब मलिकाना हक़ का फैसला हो जाएगा तभी  मालिकों को जमीन लौटा दी जाएगी। १९९६ में राम जन्मभूमि न्यास ने केंद्र सरकार से  जमीन मांगी लेकिन मांग ठुकरा दी गयी। इसके बाद न्यास ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जिसे १९९७ में कोर्ट ने  ख़ारिज कर दिया। २००२ में जब गैर-विवादित जमीन पर कुछ गतिविधियां हुई तो असलम भूरे ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई।२००३ में  सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति कायम रखने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि विवादित और गैर-विवादित जमीन को अलग करके नहीं देखा जा सकता।३० जून २००९ को लिब्रहान आयोग ने चार भागों में ७०० पन्नों की रिपोर्ट प्रधानमंत्री डॉ॰ मनमोहन सिंह और गृह मंत्री पी. चिदम्बरम को सौंपा। ३१ मार्च २००९ को समाप्त हुए लिब्रहान आयोग का कार्यकाल को अंतिम बार तीन महीने अर्थात् ३० जून तक के लिए बढ़ा गया।२०१० में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने निर्णय सुनाया जिसमें विवादित भूमि को रामजन्मभूमि घोषित किया गया। न्यायालय ने बहुमत से निर्णय दिया कि विवादित भूमि जिसे रामजन्मभूमि माना जाता रहा है, उसे हिंदू गुटों को दे दिया जाए। न्यायालय ने  कहा कि वहाँ से रामलला की प्रतिमा को नहीं हटाया जाएगा। न्यायालय ने यह पाया कि चूंकि सीता रसोई और राम चबूतरा आदि कुछ भागों पर निर्मोही अखाड़े का भी कब्ज़ा रहा है इसलिए यह हिस्सा निर्माही अखाड़े के पास ही रहेगा। दो न्यायधीधों ने निर्णय  दिया कि इस भूमि के कुछ भागों पर मुसलमान प्रार्थना करते रहे हैं इसलिए विवादित भूमि का एक तिहाई हिस्सा मुसलमान गुटों दे दिया जाए। लेकिन हिंदू और मुस्लिम दोनों ही पक्षों ने इस निर्णय को मानने से अस्वीकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।उच्चतम न्यायालय ने ११ अगस्त २०१७ से तीन न्यायधीशों की पीठ इस विवाद की सुनवाई प्रतिदिन करेगी। सुनवाई से ठीक पहले शिया वक्फ बोर्ड ने न्यायालय में याचिका लगाकर विवाद में पक्षकार होने का दावा किया । ३० मार्च १९४६ के ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी जिसमें मस्जिद को सुन्नी वक्फ बोर्ड की सम्पत्ति घोषित अर दिया गया था।  अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के 2019 के फैसले के बाद 5 फरवरी 2020 को संसद में घोषणा की गई थी कि द्वितीय मोदी मंत्रालय ने मंदिर निर्माण की एक योजना को स्वीकार कर लिया है। राम  मंदिर 235 फीट चौड़ा, 360 फीट लंबा और 161 फीट ऊंचा होगा।  हिंदू राम  मंदिर श्री राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट ने मार्च 2020 में राम मंदिर के निर्माण का पहला चरण शुरू किया गया । राम निर्माण स्थल के समतल और खुदाई के दौरान एक शिवलिंग, खंभे और टूटी हुई मूर्तियाँ मिलीं। 25 मार्च 2020 को भगवान राम की मूर्ति को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उपस्थिति में एक अस्थायी स्थान पर ले जाया गया। इसके निर्माण की तैयारी में, विश्व हिंदू परिषद ने एक विजय महामंत्र जाप अनुष्ठान का आयोजन किया, जिसमें 6 अप्रैल 2020 का विजय महामंत्र है । भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने सरयू की एक धारा की पहचान की थी जो मंदिर के नीचे बहती है। राजस्थान से आए 600 हजार क्यूबिक फीट बलुआ पत्थर बंसी पर्वत पत्थरों से निर्माण कार्य पूरा किया जाएगा। 22 जनवरी 2024 को नव निर्मित  राममंदिर में राम लला विराजमान होंगे। 
अयोध्या परिभ्रमण
11 जनवरी 2022 को जहानबद से 45 कि. मि . ट्रैन से पटना पहुचने के बाद पटना से 418 कि .मि . दूरी पर स्थित अयोध्या जंक्शन कोटा एक्सप्रेस द्वारा  8: 31 रात्रि में अयोध्या पहुच कर अयोध्या का सिताविहार कुंज में विश्राम किया है । 12 जनवरी 2022 को अयोध्या परिभ्रमण के दौरान अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि , श्रीराम मंदिर ,हनुमान गढ़ी का हनुमान मंदिर स्थित हनुमानजी ,कनक भवन , वाल्मीकि मंदिर ,बड़े हनुमान जी , नागेश्वरनाथ ,सिद्ध हनुमान बाग , दशरथ गद्दी , चौर्बुजी मंदिर , राम की पैड़ी , सरयू घाटों , सरयू आरती , राम दरबार , सीता माता रसोई घर , गौ सेवन , अनेकों मंदिर का दर्शन किया । साहित्यकार व इतिहासकार सत्येन्द्र कुमार पाठक एवं भारतीय जन क्रांति दाल के महासचिव एवं दिव्य रश्मि के संपादक डॉ राकेश दत्त मिश्र के साथ अयोध्या परिभ्रमण किया गया । अयोध्या के प्रत्येक गलियों , चौराहों , मंदिर के इर्द गिर्द , मठों के परिसरों में वन्दर हनुमानजी के रूप में विचरते है । अयोध्या मंदिरों का शहर कहा गया है ।

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