बुधवार, जनवरी 05, 2022

सकारात्मक ऊर्जा मकर संक्रांति...


वेदों , पुरणों , स्मृति ग्रंथों में संक्रांति का महत्वपूर्ण स्थान है ।  मकर संक्रान्ति  भारत और नेपाल के क्षेत्रों में पौष मास में जब सूर्य मकर राशि पर आने पर भगवान सूर्य उत्तरायण होने के कारण मकरसंक्रांति मनायजता है । ग्रिग्लोरियाँ कैलेंडर केअनुसार प्रतिवर्ष 14 या 15 जनवरी को मकर संक्रांति मनाया जाता है । मकरसंक्रांति को विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न भिन्न भिन्न भिन्न भिन्न नामों में मकरसंक्रांति , सकरात , पोंगल , संक्रांति , उत्तरायण संक्रांति  कहा गया है । तमिलनाडु में पोंगल उत्सव ,  कर्नाटक, केरल तथा आंध्र प्रदेश में  संक्रांति , बिहार , झारखंड , बंगाल में संक्रांति को छुड़ा , दही , तिलकुट , शक्कर एवं खिचड़ी पोंगल दान एवं खाने की परंपरा  कायम है ।  छत्तीसगढ़, गोआ, ओड़ीसा, हरियाणा, बिहार, झारखण्ड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, मध्यप्रदेश ,महाराष्ट्र , मणिपुर, राजस्थान, सिक्किम, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, पश्चिम बंगाल, गुजरात और जम्मू ,ताइ पोंगल, उझवर तिरुनल : तमिलनाडु , उत्तरायण : गुजरात, उत्तराखण्ड , उत्तरैन[2], माघी संगरांद : जम्मू ,शिशुर सेंक्रात : कश्मीर घाटी ,माघी : हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब ,भोगाली बिहु : असम ,खिचड़ी : उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार ,पौष संक्रान्ति : पश्चिम बंगाल ,मकर संक्रमण : कर्नाटक , बांग्लादेश : Shakrain/ पौष संक्रान्ति ,नेपाल : माघे संक्रान्ति या 'माघी संक्रान्ति' 'खिचड़ी संक्रान्ति' ,थाईलैण्ड का  सोंगकरन ,लाओस  में : पि मा लाओ ,म्यांमार का  : थिंयान , कम्बोडिया ?के मोहा संगक्रान श्री लंका में पोंगल, उझवर तिरुनल पर्व मनाया जाता है । नेपाल के सभी प्रांतों (प्रान्तों) में अलग-अलग नाम व भांति-भांति के रीति-रिवाजों द्वारा भक्ति एवं उत्साह के साथ धूमधाम से मनाया जाता है। मकर संक्रांति (संक्रान्ति) के दिन किसान अपनी अच्छी फसल के लिये भगवान को धन्यवाद देकर अपनी अनुकम्पा को सदैव लोगों पर बनाये रखने का आशीर्वाद माँगते हैं। इसलिए मकर संक्रांति (संक्रान्ति) के त्यौहार को फसलों एवं किसानों के त्यौहार के नाम से भी जाना जाता है। नेपाल में मकर संक्रांति (संक्रान्ति) को माघे-संक्रांति (माघे-संक्रान्ति), सूर्योत्तरायण और थारू समुदाय में 'माघी' कहा जाता है। इस दिन नेपाल सरकार सार्वजनिक छुट्टी देती है। थारू समुदाय का यह सबसे प्रमुख त्यैाहार है। नेपाल के बाकी समुदाय भी तीर्थस्थल में स्नान करके दान-धर्मादि करते हैं और तिल, घी, शर्करा और कन्दमूल खाकर धूमधाम से मनाते हैं। वे नदियों के संगम पर लाखों की संख्या में नहाने के लिये जाते हैं। तीर्थस्थलों में रूरूधाम (देवघाट) व त्रिवेणी मेला सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है।मकर संक्रान्ति के अवसर पर आन्ध्र प्रदेश और तेलंगण राज्यों मे भोजनम्' का आस्वादन किया जाता है। मकर संक्क्रान्ति के अवसर पर मैसुरु में एकगाय को अलंकृत किया गया है।।  भारत में मकर संक्रांति  रूपों में मनाया जाता है। विभिन्न प्रांतों में इस त्योहार को मनाने के जितने अधिक रूप प्रचलित हैं उतने किसी अन्य पर्व में नहीं।जम्मू में यह पर्व उत्तरैन' और 'माघी संगरांद' के नाम से विख्यात है। उत्रैण, अत्रैण' अथवा 'अत्रणी' के नाम से भी जानते है। इससे एक दिन पूर्व लोहड़ी का पर्व भी मनाया जाता है, जो कि पौष मास के अन्त का प्रतीक है।मकर संक्रान्ति के दिन माघ मास का आरंभ माना जाता है, इसलिए इसको 'माघी संगरांद' भी कहा जाता है।डोगरा घरानों में इस दिन मूंग की दाल की खिचड़ी का मन्सना (दान) किया जाता है। इसके उपरांत माँह की दाल की खिचड़ी को खाया जाता है। 'खिचड़ी  पर्व'कहा जाता है। चुड़ा दही तिलकुट , खिचड़ी , पतंगबाजी त्योहार मनाया जाता है । बिहार और झारखंड में मकर संक्रांति को चुड़ा- दही , गुड़ , तील , तिलकुट , खिचड़ी का दान कर अपने परिवारों , मित्रो के साथ चुड़ा दही और तीलकुट खा कर संक्रांति पर्व मानते है ।
जम्मू में  'बावा अम्बो' जी का 
जन्मदिवस मनाया जाता है।उधमपुर की देविका नदी के तट पर, हीरानमनाया जाता है ।सनातन धर्म के विभिन्न संहिताओं एवं शास्त्रों और ज्योतिष शास्त्रों  में मकर संक्रांति का महत्व है। पौष मास में जब सूर्य अपने पुत्र शनि की राशि मकर में प्रवेश करने पर मकर संक्रांति को  जप, तप, दान और स्नान का विशेष महत्व है ।मकर संक्रांति के दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर  सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने के लिए खुद उनके घर आते हैं। शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण देवताओं का दिन और दक्षिणायन रात होती है। सूर्य के उत्तरायण होने पर गरम मौसम की शुरुआत हो जाती है।  श्रीमद्भागवत एवं देवी पुराण के अनुसार, भगवान सूर्य का पुत्र न्याधिपति शनि  को अपने पिता सूर्यदेव से वैर भाव था क्योंकि सूर्यदेव ने उनकी माता छाया को अपनी दूसरी पत्नी संज्ञा के पुत्र यमराज से भेदभाव करते हुए देख लिया था। इस बात से सूर्य देव ने संज्ञा और उनके पुत्र शनि को अपने से अलग कर दिया था। इससे शनिदेव और उनकी छाया ने सूर्यदेव को कुष्ठ रोग का शाप दे दिया था। सूर्यदेव के कुष्ठ रोग से पीड़ित देखकर यमराज काफी दुखी हुए और उन्होंने इस रोग से मुक्ति के लिए तपस्या  की थी। सूर्यदेव ने क्रोध में आकर शनि  के घर कुंभ, जिसे शनि की राशि कहा जाता है, उसको अपने तेज से जला दिया था। इससे शनि देव और उनकी माता छाया को कष्ट भोगने पड़े। यमराज ने अपनी सौतेली माता और अपने भाई शनि को कष्टों में देखकर उनके कल्याण के लिए सूर्यदेव को काफी समझाया था ।यमराज के समझाने पर सूर्य देव उनके घर कुंभ में पहुंचे थे। वहां सबकुछ जला हुआ था। उस समय शनिदेव के पास काले तिल के अलावा कुछ नहीं था इसलिए शनि ने काले तिल से भगवान सूर्य  की पूजा की। शनि की पूजा से प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने शनि को आशीर्वाद दिया कि शनि का दूसरा घर मकर राशि में मेरे आने पर वह धन-धान्य से भर जाएगा। तिल के कारण  शनि महाराज को उनका वैभव फिर से प्राप्त हुआ था ।, इसलिए शनि महाराज को तिल काफी प्रिय हैं। इसी वजह से मकर संक्रांति के दिन तिल से सूर्य देव और शनि महाराज की पूजा का नियम शुरू हुआ और तिल संक्रांति कहा गया है । राजा  भागीरथ द्वारा माता गंगा का अवतरण भूस्थल पर एवं  ऋषि कपिल मुनि के आश्रम के समीप अपने पूर्वज राजा सगर एवं परिवारों को उद्धार हेतु समुद्र में समावेश मकर संक्रांति को  किया गया था  इस स्थल गंगा सागर के नाम से ख्याति प्राप्त है ।सागर में जा मिली थीं। भागीरथ ने अपने पूर्वजों का तर्पण किया था और गंगाजी ने तर्पण स्वीकार किया था। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह को त्याग दिया था। भीष्म पितामह ने अपने प्राण त्यागने के लिए सूर्य के मकर राशि में आने का इंतजार किया था। सूर्य के उत्तरायण के समय देह त्यागने वाली आत्माएं, सीधे देवलोक में जाती हैं। जिससे आत्मा जन्म-मरण के बंधंन से मुक्त हो जाती हैं। भगवान विष्णु ने असुरों का अंत कर युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी। भगवान ने सभी असुरों को मंदार पर्वत के नीचे दबा दिने के कारण  बुराई और नकारात्मकता का अंत हुआ था। मकर संक्रांति को तमिलनाडु में पोंगल , कर्नाटक, केरल और आंध्र प्रदेश में  संक्रांति , गुजरात में  उत्तरायण , असम में माघी बिहू  और कर्नाटक में सुग्गी हब्बा, केरल में मकरविक्लु , कश्मीर में शिशुर सेंक्रांत. कहा गया है । नेपाल और बांग्लादेश  देशों में अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं के लोग  मनाते हैं । मकर संक्रांति  खगोलीय घटना है । कौन्स्टोलेशन ऑफ़ कैप्रिकॉन को मकर राशि कहते हैं । खगोल विज्ञान के कैप्रिकॉन और भारतीय ज्योतिष की मकर राशि में थोड़ा अंतर है ।कॉन्सटोलेशन तारों से बनने वाले एक ख़ास पैटर्न को कहा जाता है जिन्हें पहचाना जा सके, प्राचीन काल से दुनिया की लगभग हर सभ्यता में लोगों ने उनके आकार के आधार पर उन्हें नाम दिए हैं, खगोलीय कौन्स्टोलेशन और ज्योतिष की राशियां मोटे तौर पर मिलती-जुलती हैं ।संक्रांति का मतलब संक्रमण यानी ट्रांजिशन पर सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। सूर्य के किसी राशि में प्रवेश करने या निकलने का अर्थ यह नहीं है कि सूर्य घूम रहा है, यह पृथ्वी के सूर्य के चारों तरफ़ चक्कर लगाने की प्रक्रिया का हिस्सा है, इसे परिभ्रमण कहते हैं और धरती को सूर्य का एक चक्कर पूरा करने में एक साल का समय लगता है ।मकर संक्रांति से दिन लंबे और रातें छोटी, उत्तरी गोलार्द्ध नॉर्दर्न हैमिस्फ़ियर  में 14-15 जनवरी के बाद से सूर्यास्त का समय धीरे-धीरे आगे खिसकता जाता है। मकर संक्रांति  सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करने का संक्रमण काल. भारत में प्रचलित  हिंदू कैलेंडर सूर्य एवं चंद्र  पर आधारित हैं । ग्रेगोरियन कैलेंडर सोलर कैलेंडर  सूर्य पर आधारित कैलेंडर है । मकर संक्रांति  त्योहार धरती की तुलना में सूर्य की स्थिति के हिसाब से मनाने का कारण  चंद्रमा की स्थिति में मामूली हेरफेर की वजह से 14 जनवरी या  कभी 15 को, लेकिन सूर्य की मुख्य भूमिका होने की वजह से अंग्रेज़ी तारीख़ नहीं बदलती.  है । विद्येश्वर संहिता के अनुसार हिमालय से से प्रवाहित होने वाली 100 मुखवाली पुण्यसलिला गंगा नदी के तट पर निवास एवं नदी में स्नानादि मकर राशि के सूर्य होने पर दान पुण्य एवं आध्यत्मिक साधना करने वालों को अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है ।  सूर्य के मकर राशि पर रहने से मकर संक्रांति , मेष राशि पर सूर्य के रहने पर मेष संक्रांति ,कर्क राशि पर सूर्य रहने से कर्क संक्रांति ,, कन्या संक्रांति , मिथुन संक्रांति , सिंह संक्रांति , वृष संक्रांति अर्थात 12 संक्रांति है ।गोरखपुर का गोरखपुर मन्दिर मे विशेष रूप में संक्रांति मनया जता हैै।

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