मंगलवार, मई 10, 2022

मातृ पितृ भक्त श्रवण का स्थल सरवन देवड़ी ....


    मातृ पितृ भक्त  श्रवण कुमार  के माता पिता अंधें थे । श्रवण कुमार अपने माता पिता की बहुत सेवा करते थे उनकी तीर्थ की इच्छा पूरी करने उन्हें दो टोकरी में कांवर बना बैठाकर ले जा रहे थे तभी माता पिता नें प्यास लगने पर श्रवण कुमार को नदी का पानी लेने भेजा तभी शिकार के इंतजार में बैठे अयोध्या के राजा दशरथ नें शब्द भेदी बाण चला दिया जिससे श्रवण कुमार की मृत्यू हो गई लेकिन माता पिता की सेवा और आशीर्वादकी वजह से उन्हें  पितृ भक्त श्रवण कुमार के नाम विख्यात है। छत्तीसगढ़ राज्य का बिलासपुर जिला मुख्यालय विलासपुर से  पच्चीस किलोमीटर दूर और महामाया कि नगरी रतनपुर से महज पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित सरवन देवरी में श्रवण कुमार की पाषाण प्रतिमा स्थापित है। 1222 ई. में  डबरापरा को  देवरी नामकरण  किया गया  था । डबरापरा में  निषाद  निवासी  को स्वप्न में श्रवण कुमार की प्रतिमा  गांव के निकट बहने वाली खारुन नदी के दहरे में से निकाल कर गांव में स्थापित किये जाने की बात कही जाती थी । निषादों  ने श्रवणकुमार की प्रतिमा के संबंध में  जानकारी प्राप्त करने के बाद  निषादों एवं ग्रामीणों द्वारा  खारुन नदी पर जाल फेंकते गांव के लोग हतप्रभ रह गये जब जाल खींचने पर ना केवल श्रवण कुमार की पाशाण प्रतिमा के साथ पाषाण प्रतिमा  गणेश ,  नागदेवता ,  शिवलिंग ,  नंदी ,  हनुमान जी की प्रतिमा निकली थी । ग्रामीणों द्वारा  खारुन नदी के किनारे खारुन नदी से प्राप्त पाषाण मूर्तियां श्रवणकुमार , शिवलिंग, नाग ,नंदी एवं हनुमान जी   स्थापित किया गया है । कैंसर पीडित राधेश्याम  ने श्रवणकुमार मंदिर बनाने के लिये अपने परिवार को अपनी मौत से पूर्व ही कहा  था कि श्रवण कुमार के मंदिर का निर्माण मेरी मौत के बाद आप लोगों को करना है। परिवार के लोगों नें भी उनको दिया वचन पूरा करते हुए गांव में श्रवन कुमार के मंदिर की स्थापना कर उनकी प्रतिमा स्थापित किया था । खाॅरुन नदी के दहरा का  भगवान श्रवण कुमार  को समर्पित गाँव सरवन देवरी में  प्रतिवर्ष माघ शुक्ल  पुर्णिमा के दिन खारुन नदी  का दहरे से श्रवण कुमार की प्रतिमा निकाली गई थी ।  महिलाएं  श्रवण कुमार पूजा करतीं और  श्रवण कुमार कि तरह माता -पिता की सेवा करने वाला पुत्र उनकी कोख से जन्म लेने की मन्नते मानती है । त्रेतायुग में ब्रह्मा जी द्वारा शापित ऋषि शांतनु की पत्नी ज्ञानवती का पुत्र श्रवण कुमार का  जन्म छत्तीसगढ़ राज्य के बुजुर्ग जिले का बटिया गढ़ तहसील के अंतर्गत करवाना में हुआ था । शास्त्रों के अनुसार अयोध्या के राजा दशरथ की बहन रूपवती एवं यज्ञदत्त का पुत्र श्रवण था। यगदत्त ज्ञानवान और भगवान विष्णु एवं ब्रह्मा जी का भक्त थे।  ब्रह्मा जी के शापित होने से अंधा होने के कारण यगदत्त एवं पत्नी चंद्रकला  को अंधक एवं शांतनु तथा पत्नी को ज्ञानवती ,ज्ञानमती ,ज्ञानवन्ति ,ज्ञानवाणी अंधी हो गयी थी । यगदत्त के पुत्रों में वंशीलाल ,राजू ,महेंद्र ,जगपाल एवं श्रवणकुमार एवं पुत्री शांता थी । शांतनु की भर्या ज्ञानवती के पुत्र श्रवण कुमार अपने अंधे माता पिता को कावर में बैठा कर तीर्थ भ्रमण कार्य कर रहे थे । श्रवणकुमार का ससुराल उत्तरप्रदेश के मेरठ स्थित मयराष्ट्र में था । रामायण के अनुसार श्रवण कुमार ने अपने माता पिता को प्यास बुझाने के लिए नदी में जल भरने के दौरान अयोधया के राजा दशरथ द्वारा शब्दभेदी बाण चला कर हत्या कर दी ग्सई थी । जब श्रवणकुमार के अंधे माता पिता को यह ज्ञात हुआ कि मेरा पुत्र दशरथ द्वारा मारा गया है । अंधे माता पिता द्वारा अयोध्या के राजा दशरथ को शसप दिया कि जिस तरह मैं अपने पुत्र श्रवण के वियोग में अपना प्राण त्याग करता हु उसी तरह है दशरथ तुम्हे अपने पुत्र के वियोग में तुम्हारी मृत्यु होगी । फलत: भगवान राम के वन गमन के दौरान राजा दशरथ ने अपने पुत्र राम के वियोग में अपने प्राण त्याग किए थे । श्रवण के चार भाइयो द्वारा उत्तराखंड के  पलवल का फुलवारी से अपने माता रूपवती एवं पिता चंद्रपाल को काँवर में बैठाकर हरिद्वार का भ्रमण कराया गया था । छत्तीसगढ़ का मातृ पितृ भक्त सरवन का स्थल सरवन देवड़ी है ।



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