शुक्रवार, जुलाई 10, 2026

बराबर पर्वत समूह का कालजयी सांस्कृतिक विरासत

 बराबर पर्वत श्रृंखला की कालजयी सांस्कृतिक विरासत
लेखक: सत्येन्द्र कुमार पाठक
 सभ्यता की प्रसवस्थली मगध का एक जीवंत दस्तावेज बिहार की पावन और ऐतिहासिक भूमि सदियों से वैश्विक ज्ञान, अध्यात्म, दर्शन और महान साम्राज्यों की प्रसवस्थली रही है। मगध की इसी पावन परिधि के भीतर, वर्तमान बिहार के जहानाबाद जिले में स्थित बराबर और नागार्जुन पर्वत समूह केवल पत्थरों, कंदराओं या पहाड़ियों का एक भौगोलिक समुच्चय नहीं है; यह भारतीय सभ्यता, वास्तुकला, प्राचीन खगोलीय विज्ञान और सर्वधर्म समभाव का एक ऐसा जीवंत दस्तावेज है जो प्रागैतिहासिक काल से लेकर आधुनिक युग तक की मानवीय यात्रा को अपने भीतर समेटे हुए है। समुद्र तल से लगभग 1023 फीट की ऊंचाई पर गर्व से मस्तक उठाए खड़ी ये पहाड़ियाँ, प्राचीन 'कीकट प्रदेश' और गौरवशाली 'मगध साम्राज्य' की आंतरिक चेतना का हिस्सा रही हैं। पवित्र फल्गु नदी के आंचल में बसा यह संपूर्ण क्षेत्र सनातन, बौद्ध, जैन और आजीविक संस्कृतियों के एक अद्भुत और विरल संगम स्थल के रूप में प्रतिष्ठित है। यहाँ की कठोर ग्रेनाइट चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाएँ न केवल भारत की प्राचीनतम रॉक-कट वास्तुकला का आदि-स्रोत हैं, बल्कि यह इस बात का भी साक्षात प्रमाण हैं कि मगध का यह अंचल विज्ञान और अध्यात्म दोनों ही क्षेत्रों में संपूर्ण विश्व का पथप्रदर्शक रहा है।
. पौराणिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि: मन्वंतरों से संस्कृतियों का क्रमिक विकास - बराबर पर्वत समूह का इतिहास केवल तिथियों और राजाओं के शिलालेखों तक सीमित नहीं है। इसकी जड़ें सनातन कालक्रम के मन्वंतरों, पुराणों और महाकाव्यों की गहरी आध्यात्मिक अनुभूतियों से जुड़ी हुई हैं। सूर्यांक गिरि पर तीन पाषाण युक्त गुफा प्रकोष्ठ है । प्रथम प्रकोष्ठ में बाबा सिद्धनाथ शिवलिंग , दूसरे प्रकोष्ठ में माता बागेश्वरी , माता सिद्धेश्वरी और तीसरे प्रकोष्ठ में दत्तात्रेय की मूर्ति विराजमान है । सिद्धेश्वरनाथ मंदिर का गुणज गुप्त कल में निर्माण किया गया था । मंदिर के परिसर में भगवानसूर्य , गणेश , काली , अनेक देवों देवियों मूर्तियां है । 
ईश्वरगीता की उत्पत्ति और दार्शनिक संवाद - स्थानीय जनश्रुतियों, लोक-कथाओं और प्राचीन धार्मिक आख्यानों के अनुसार, बराबर पर्वत समूह की 'सूर्यांक गिरि' नामक चोटी पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और दार्शनिक घटना घटी थी। मान्यता है कि असुर संस्कृति के अत्यंत ज्ञानी राजा सुकेशी और देवाधिदेव महादेव के परम प्रतापी अवतार बाबा सिद्धेश्वर नाथ (सिद्धनाथ) के बीच यहाँ एक गूढ़ संवाद हुआ था। राजा सुकेशी के गहन प्रश्नों और बाबा सिद्धनाथ के दिव्य उत्तरों के इसी पावन मिलन से 'ईश्वरगीता' की उत्पत्ति हुई। यह ग्रंथ जीवन, प्रकृति, ब्रह्मांड और मोक्ष के रहस्यों को अत्यंत सरल परंतु तार्किक रूप से प्रतिपादित करता है।
ग्यारह प्रमुख प्राचीन संस्कृतियों के पदचिह्न - सनातन कालक्रम के अनुसार, इस सृष्टि ने कई मन्वंतर देखे हैं। स्वयंभू मन्वंतर से लेकर वर्तमान वैवस्वत मन्वंतर के दीर्घ कालखंड के दौरान, इस पर्वत समूह की 14 विशिष्ट श्रृंखलाओं पर विभिन्न प्रकार की संस्कृतियों और मानव समुदायों का क्रमिक विकास हुआ। बराबर के पत्थरों, गुफाओं और कंदराओं का बारीकी से अध्ययन करने पर यहाँ ग्यारह प्रमुख प्राचीन संस्कृतियों के गहरे पदचिह्न दिखाई देते हैं: सौर संस्कृति: सूर्य की ऊर्जा, प्रकाश और समय-चक्र की उपासना। शाक्त संस्कृति: आदिशक्ति माँ भवानी के विभिन्न रूपों (बागेश्वरी, सिद्धेश्वरी) की आराधना। ब्रह्म संस्कृति: परम तत्व ब्रह्मा और सृष्टि के रहस्यों पर गहन मनन। शैव संस्कृति: भगवान शिव और उनकी कल्याणकारी शक्तियों की पूजा।।वैष्णव संस्कृति: भगवान विष्णु के अवतारों और पालनकर्ता रूप की अनन्य भक्ति।।ऋषि संस्कृति: मुनियों, ऋषियों और तपस्वी संतों के आश्रम तथा ध्यान केंद्र। देव संस्कृति: उच्च चेतना और दिव्य शक्तियों के प्रतीक स्वरूप उपासना। नाग संस्कृति: प्रकृति, पाताल और सर्प शक्तियों के प्रति कृतज्ञता (अनंत स्वामी की उपासना)। मनु संस्कृति: मानव समाज के नियम, मर्यादा और सामाजिक ताने-बाने का क्रमिक विकास। पितृ संस्कृति: पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, तर्पण और पिंडों की परंपरा। गुफा संस्कृति: आदिम काल के आश्रय स्थल से लेकर भिक्षुओं के एकांतवास और कठोर तपस्या की पद्धति है। गुफा की दीवारों पर ब्राह्मी लिपि , प्राकृत व मागधी लिपि में लिपि संस्कृति एवं गाय घाट और गुफा से बाबा सिद्धेश्वर नाथ मंदिर जाने के क्रम में भित्तिचित्र विभिन्न देवों , देवियों की निर्मित है । 
पाताल लोक की राजधानी और 'लाल पहाड़ी' का रहस्य - पुराणों में इस क्षेत्र को पौराणिक काल के पराक्रमी राजा विकुक्षी के पुत्र बाण और महान दानवीर राजा बलि के औरास पुत्र प्रतापी पुत्र बाणासुर की 'पाताल प्रदेशीय राजधानी' के रूप में वर्णित किया गया है। बाणासुर भगवान शिव का परम भक्त और असीम शक्तियों का स्वामी था। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण और बाणासुर के बीच ऐतिहासिक और महाविनाशकारी युद्ध हुआ, तो श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र और बाणासुर के अस्त्रों के प्रहार से यहाँ की एक विशाल पहाड़ी पूरी तरह ध्वस्त और विखंडित हो गई। भीषण रक्तपात और संहारक अग्नि के कारण उस पहाड़ी की मिट्टी और पत्थर लाल हो गए, जिसे आज भी जनमानस में 'लाल पहाड़ी' के नाम से जाना जाता है।
ऐतिहासिक कालखंड की निरंतरता: महाभारत से शुंग काल तक - बराबर की पहाड़ियाँ भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण, वैभवशाली और क्रांतिकारी कालखंडों की मूक गवाह रही हैं। द्वापर युग के महाभारत काल से लेकर मौर्य साम्राज्य के उदय और शुंग वंश के पुनरुत्थान तक, हर दौर ने इस भूमि पर अपनी अमिट ऐतिहासिक छाप छोड़ी है। महाभारत कालीन साक्ष्य और रथ के पहियों के निशान - जब भगवान श्रीकृष्ण, पांडुपुत्र अर्जुन और महाबली भीम मगध के अजेय और अत्याचारी राजा जरासंध का वध करने के उद्देश्य से एक कूटनीतिक और गुप्त मार्ग से मगध साम्राज्य की राजधानी राजगीर (राजगृह) की ओर बढ़ रहे थे, तब उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान इसी पर्वत पर विश्राम किया था और सर्वोच्च चोटी पर स्थित बाबा सिद्धनाथ के दर्शन कर विजय का आशीर्वाद प्राप्त किया था।।आज भी, 'गाय घाट' से बाबा सिद्धनाथ मंदिर की ओर जाने वाले प्राचीन, पथरीले और दुर्गम मार्ग पर पत्थरों को काटकर बनाए गए प्राचीन भित्तिचित्र और भगवान श्रीकृष्ण के रथ के पहियों के गहरे, समानांतर निशान स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। ये निशान द्वापर युग की ऐतिहासिकता को प्रमाणित करने वाले साक्षात पुरातात्विक साक्ष्य हैं।
'राम गया' और लौह अयस्क की सामरिक समृद्धि - बराबर पर्वत समूह और उसके आस-पास फैले विस्तृत मैदानी भाग को ऐतिहासिक और धार्मिक रूप से 'राम गया' कहा गया है। यह क्षेत्र भू-वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्राचीन काल से ही उच्च गुणवत्ता वाले लौह अयस्क से समृद्ध रहा है। इसी लौह अयस्क की प्रचुर उपलब्धता ने प्राचीन मगध के शासकों को उत्कृष्ट अस्त्र-शस्त्र और उपकरण बनाने की शक्ति दी, जिसने अंततः मगध को भारत का सबसे शक्तिशाली, अजेय और प्रथम विशाल साम्राज्य बनाने में केंद्रीय भूमिका निभाई।
सम्राट अशोक की राजकीय सभा और 'कलाटीका पर्वत' - मौर्य काल के आधिकारिक और पुरातात्विक दस्तावेजों में बराबर पर्वत समूह को 'कलाटीका पर्वत' के नाम से संबोधित किया गया है। महान मौर्य सम्राट अशोक ने अपने शासनकाल में इस क्षेत्र की आध्यात्मिक महत्ता को पहचानते हुए, यहाँ की गुफा संस्कृति और आजीविक, बौद्ध तथा जैन भिक्षुओं के कल्याण के लिए 'लोमश ऋषि गुफा' के ठीक सम्मुख एक विशाल राजकीय सभा का आयोजन किया था। इस ऐतिहासिक सभा के पुरातात्विक अवशेष—जैसे पत्थरों के तराशे गए विशाल चबूतरे, खंभों के आधार और प्राचीन जल-प्रणालियाँ—आज भी यहाँ साक्ष्य के रूप में विद्यमान हैं। मौर्य काल में यह संपूर्ण क्षेत्र भारत ही नहीं, बल्कि उपमहाद्वीप के भिक्षुओं और संन्यासियों की कठोर आत्म-साधना का एक वैश्विक केंद्र बन चुका था।
शुंग वंश का पुनरुत्थान और अश्वमेघ यज्ञ - मौर्य साम्राज्य के अवसान के बाद जब मगध की गद्दी पर शुंग राजवंश का उदय हुआ, तब सम्राट पुष्यमित्र शुंग के कालखंड में वैदिक संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए बराबर की प्रसिद्ध 'कर्ण गुफा' के विस्तृत और समतल परिसर में एक भव्य अश्वमेघ यज्ञ का अनुष्ठान किया गया था। इस यज्ञ के आयोजन से जुड़े धार्मिक और पुरातात्विक अवशेष, यज्ञ कुंडों के प्रतीक और प्राचीन संरचनाएँ आज भी इस स्थल की ऐतिहासिक निरंतरता और धार्मिक सहिष्णुता को पुष्ट करते हैं।
. वास्तुकला का बेजोड़ शिखर: 'सप्त गुफा' (सात घर , सतघरवा ) - बराबर और उसके ठीक बगल में स्थित नागार्जुन पहाड़ियों को काटकर बनाई गई सात अमर गुफाएँ, जिन्हें प्राचीन काल से ही लोकभाषा में 'सप्त गुफा' या 'सात घर' कहा जाता है, प्राचीन भारतीय रॉक-कट स्थापत्य कला  का सबसे प्रारंभिक और सर्वोत्कृष्ट उदाहरण हैं।लगभग 500 फीट लंबे और 35 फीट ऊंचे विशाल ग्रेनाइट पाषाण खंडों को भीतर से खोखला करके इन अद्भुत गुफाओं का निर्माण किया गया है। गुफाओं की सबसे विस्मयकारी विशेषता इनकी आंतरिक दीवारों और छतों पर की गई 'शीशे जैसी चमकदार पॉलिश' (Maurya Polish) है। ढाई हजार साल से भी अधिक का समय बीत जाने, मौसम के थपेड़े सहने और मानवीय उपेक्षा के बावजूद यह पॉलिश आज भी इस तरह चमकती है कि देखने वाले को उसमें अपना स्पष्ट प्रतिबिंब दिखाई देता है। वैज्ञानिकों और पुरातत्वविदों के लिए आज भी यह एक पहेली है कि उस प्राचीन काल में बिना आधुनिक मशीनों के ग्रेनाइट जैसे कठोर पत्थर को इस कदर चिकना और चमकदार कैसे बनाया गया होगा।
मुरली पहाड़ी (बराबर) की मुख्य गुफाएँ - लोमश ऋषि गुफा: यह गुफा पूरी दुनिया के वास्तुकला के इतिहास में एक मील का पत्थर है। इसका प्रवेश द्वार तत्कालीन काष्ठ कला (लकड़ी की नक्काशी) की नकल करते हुए पत्थर पर उकेरा गया है। इसके मेहराब (Arch) पर स्तूप की ओर बढ़ते हुए हाथियों के झुंड की अत्यंत सजीव और बारीक नक्काशी की गई है। भारतीय वास्तुकला में इसे 'चैत्य मेहराब' का सबसे आदिम और शुद्ध रूप माना जाता है। पुरातत्व विज्ञान के जनक जनरल अलेक्जेंडर कनिंघम के अनुसार, चौथी शताब्दी में गुप्त साम्राज्य के दौरान इस गुफा को और अधिक परिष्कृत और विकसित किया गया था। सुदामा गुफा: यह गुफा सम्राट अशोक द्वारा अपने राज्याभिषेक के 12वें वर्ष (लगभग 261 ईसा पूर्व) में आजीविक संप्रदाय के भिक्षुओं को निवास और तपस्या के लिए दान में दी गई थी। इस गुफा के भीतर दो कक्ष हैं—एक गोलाकार कक्ष जिसकी छत गुंबदाकार है और एक आयताकार कक्ष। इस गुफा की आंतरिक बनावट ऐसी है कि यहाँ की गई हल्की सी आवाज भी कई बार गूंजती है। इसकी इसी 'अद्भुत प्रतिध्वनि'  को देखने दुनिया भर के ध्वनि-विज्ञानी यहाँ आते हैं। जनरल कनिंघम ने इस गुफा के ऐतिहासिक महत्व को पहचानकर इसके जीर्णोद्धार में बड़ा योगदान दिया था।कर्ण चौपार (कर्ण गुफा): यह पूरी तरह से एक एकल आयताकार कमरा है, जिसकी दीवारें फर्श से लेकर छत तक मौर्यकालीन चमकदार पॉलिश से सुसज्जित हैं। इसके प्रवेश द्वार पर मौर्य राजाओं के संक्षिप्त अभिलेख उत्कीर्ण हैं, और इसके ठीक बाहर शुंग कालीन सांस्कृतिक गतिविधियों के अवशेष प्राप्त होते हैं।।विश्वामित्र गुफा: यह पहाड़ी के एक अन्य ढलान वाले हिस्से में स्थित है। इसमें दो चौकोर कमरे हैं और इसका प्रवेश द्वार मौर्यकालीन ज्यामितीय शुद्धता का एक बेहतरीन नमूना है।भदंत गुफा: यह गुफा मुख्य रूप से बौद्ध भिक्षुओं (जिन्हें बौद्ध परंपरा में 'भदंत' कहा जाता था) के वर्षावास और एकांत ध्यान के लिए आरक्षित थी। योगेन्द्र गुफा: यह गुफा गुप्त काल और उसके बाद के कालखंडों में हठयोगियों और सिद्ध संन्यासियों की गुप्त साधनाओं का मुख्य केंद्र रही है।।
नागार्जुन पहाड़ी की गुफाएँ एवं अन्य सांस्कृतिक धरोहरें - गोपी गुफा: यह नागार्जुन पहाड़ी की सबसे विशाल और भव्य गुफा है। इसे मौर्य सम्राट अशोक के प्रतापी पौत्र सम्राट दशरथ ने अपने राज्याभिषेक के समय आजीविक संप्रदाय के पूज्य संतों को समर्पित किया था। मध्यकाल में, इस गुफा के ठीक समीप मोहम्मद नामक एक स्थानीय प्रभावशाली व्यक्ति द्वारा एक ईदगाह का निर्माण कराया गया था। यह इस बात का एक अनुपम उदाहरण है कि कैसे यह स्थल सदियों से विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और भारतीय सांप्रदायिक सौहार्द का मूक गवाह रहा है। वेदाधिक और वापिक गुफा: इन गुफाओं का ऐतिहासिक महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि 5वीं शताब्दी के उत्तर-गुप्त काल के दौरान, प्रतापी राजा शार्दूल वर्मन और उनके पुत्र आनंद वर्मन ने इन गुफाओं का न केवल व्यापक जीर्णोद्धार कराया, बल्कि यहाँ अत्यंत सुंदर ब्राह्मी लिपि और संस्कृत भाषा में महत्वपूर्ण ऐतिहासिक शिलालेख उत्कीर्ण कराए, जो तत्कालीन राजनीतिक इतिहास के मुख्य स्रोत हैं।।अन्य प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत स्थल: पहाड़ियों के बीच स्थित 'पाताल गंगा' एक प्राकृतिक, बारहमासी और पवित्र जलप्रपात (झरना) है, जिसका पानी औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है। इसके अतिरिक्त हथियाबोर (हाथी के आकार की विशाल चट्टान), सांध्य गिरि (सूर्यास्त के दर्शन का मनोहारी स्थल) और कौवाडोल पहाड़ी यहाँ के अन्य प्रमुख धरोहर स्थल हैं। कौवाडोल पहाड़ी की तलहटी में पत्थरों पर उकेरी गई देवी-देवताओं की मूर्तियाँ और भगवान बुद्ध की एक विशाल, ध्यानमग्न पाषाण प्रतिमा स्थित है, जो पर्यटकों और शोधकर्ताओं को समान रूप से आकर्षित करती है।
प्राचीन भारत की उन्नत खगोलीय विज्ञान वेधशाला - बराबर-नागार्जुन पर्वत समूह केवल संन्यासियों के वैराग्य और ध्यान की स्थली नहीं थी, बल्कि यह प्राचीन भारत की एक अत्यंत उच्च स्तरीय और वैज्ञानिक खगोलीय वेधशाला भी थी। इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति और यहाँ के पत्थरों के विन्यास से स्पष्ट होता है कि प्राचीन मनीषी यहाँ से आकाशीय पिंडों, नक्षत्रों और ऋतु परिवर्तनों का अत्यंत सूक्ष्म अध्ययन करते थे।
सूर्य और चंद्रमा के पाषाण प्रतीक - नागार्जुन पहाड़ी के विस्तृत मैदानी भाग में ब्रह्मांडीय गतियों, सौर चक्रों और चंद्र कलाओं को समझने के लिए पत्थरों की विशेष गणितीय स्थापना की गई थी। यहाँ सूर्य के प्रतीक के रूप में एक अत्यंत ऊंचा, सीधा और लम्बायुक्त पाषाण स्तंभ स्थापित किया गया था, जो धूपघड़ी (Sundial) की भांति समय और अयनकाल की गणना करता था। ठीक उसी के समीप चंद्रमा के प्रतीक स्वरूप एक विशाल गोलाकार पाषाण खंड स्थापित किया गया था, जिसका उपयोग चंद्र ग्रहणों की सटीक तिथि निर्धारित करने के लिए होता था।
खगोलीय पाषाण स्तंभों की श्रृंखला - पाताल गंगा के पवित्र झरने के समीप और 'विश्व झोपड़ी  विश्वामित्र गुफा ' की ओर जाने वाले प्राचीन संकरे मार्ग पर आज भी खगोलीय विज्ञान से जुड़े कई छोटे-बड़े गोलाकार पाषाण युक्त स्तंभ  बिखरे हुए देखे जा सकते हैं। ये स्तंभ इस बात के गवाह हैं कि प्राचीन काल में यहाँ नक्षत्र गणना के लिए एक सुव्यवस्थित वेधशाला क्रियाशील थी।
प्रेत शिला का वैज्ञानिक महत्व - कर्ण गुफा से कुछ ही दूरी पर स्थित एक और विशाल, सपाट पाषाण चट्टान है, जिसे स्थानीय भाषा में 'प्रेत शिला' कहा जाता है। आधुनिक खगोलविदों और पुरातत्वविदों के शोध के अनुसार, यह शिला भी इसी प्राचीन वैज्ञानिक, गणितीय और आध्यात्मिक खगोलीय संरचना का एक अभिन्न हिस्सा थी, जिसका उपयोग कर्क और मकर संक्रांति के समय सूर्य की कोणीय स्थिति मापने के लिए किया जाता था।
प्रशासनिक, राजनीतिक अवदान और आधुनिक पुनरुद्धार - मन्वंतरों के पौराणिक काल से लेकर मौर्य, शुंग, गुप्त, पाल, सेन, हर्षवर्धन, मुगल और ब्रिटिश हुकूमत के दौर से गुजरते हुए, आधुनिक स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में भी इस क्षेत्र के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संरक्षण में कई राजनेताओं, सामाजिक विचारकों और भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के कर्मठ अधिकारियों ने अपनी युगांतकारी भूमिका निभाई है। विशेष रूप से वर्ष 1986 में जहानाबाद को एक स्वतंत्र जिला बनाए जाने के बाद, इस दुर्गम, बीहड़ और तत्कालीन कानून-व्यवस्था की गंभीर चुनौतियों से जूझते क्षेत्र का प्रशासनिक कायाकल्प अत्यंत तेजी से हुआ।।प्रमुख राजनेताओं का दूरदर्शी और नीतिगत योगदान - लालू प्रसाद (पूर्व मुख्यमंत्री, बिहार): इनके शासनकाल के दौरान इस सुदूर, उपेक्षित और दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित हुआ। इनके कार्यकाल में क्षेत्र की बुनियादी संरचना  के विकास और स्थानीय लोक संस्कृति को सहेजने के शुरुआती और गंभीर प्रशासनिक प्रयास शुरू किए गए।। नीतीश कुमार (पूर्व मुख्यमंत्री, बिहार): इनके दूरदर्शी, सांस्कृतिक और विकासोन्मुखी नेतृत्व में इस ऐतिहासिक स्थल के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ा। इन्होंने यहाँ 'बराबर महोत्सव' की शुरुआत करवाई, जिसने इस गुमनाम और उपेक्षित ऐतिहासिक धरोहर को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र  पर मजबूती से स्थापित कर दिया। इसके साथ ही, इनके शासनकाल में गुफाओं के संरक्षण, सीढ़ियों के निर्माण, पहाड़ी की तलहटी के सुंदरीकरण और इको-टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए कई विशेष और दीर्घकालिक योजनाएं धरातल पर उत्कारी गईं। जितन राम मांझी (पूर्व मुख्यमंत्री, बिहार): इस क्षेत्र के समग्र विकास और स्थानीय स्तर पर ग्रामीण पर्यटन को रोजगार से जोड़ने के लिए इन्होंने विशेष बजटीय आवंटन सुनिश्चित कराया। इनके प्रयासों से बराबर पहाड़ी क्षेत्र की ओर जाने वाली सड़कों की कनेक्टिविटी में क्रांतिकारी और गुणात्मक सुधार हुआ, जिससे आम पर्यटकों का आना सुलभ हो सका।।जयराम रमेश (पूर्व केंद्रीय मंत्री, भारत सरकार): इन्होंने अपने केंद्रीय पर्यावरण, वन और ग्रामीण विकास मंत्री के कार्यकाल के दौरान इस ऐतिहासिक और संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्र के पारिस्थितिक तंत्र  को बचाने के लिए विशेष पहल की। इन्होंने केंद्रीय योजनाओं के माध्यम से बराबर के जंगलों के संरक्षण, पर्यावरण-मित्र पर्यटन और स्थानीय ग्रामीणों के विकास के लिए महत्वपूर्ण कड़ियां जोड़ीं। जगदीश शर्मा (तत्कालीन सांसद): इन्होंने स्थानीय जनप्रतिनिधि के रूप में संसद से लेकर सड़क तक बराबर पर्वत समूह के विकास के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया और अपनी संसदीय निधि का एक बड़ा हिस्सा यहाँ पर्यटकों की बुनियादी सुविधाएं विकसित करने में लगाया।
जहानाबाद के जिलाधिकारियों (IAS) एवं प्रशासनिक अधिकारियों का युगांतकारी योगदान - वर्ष 1986 के बाद, जहानाबाद जिले की कमान संभालने वाले कई ऊर्जावान और संवेदनशील जिलाधिकारियों ने इस दुर्गम, कभी नक्सल प्रभावित रहे और ऐतिहासिक रूप से समृद्ध क्षेत्र के कायाकल्प में अपना अद्वितीय और अविस्मरणीय योगदान दिया: हेम चंद सिरोही: जहानाबाद के शुरुआती दौर के जिलाधिकारी के रूप में इन्होंने इस बेहद दुर्गम और अशांत क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया तथा शुरुआती ढांचागत सुधारों की नींव रखी। अरुण कुमार सिंह: इनके कार्यकाल में पुरातात्विक स्थलों की सुरक्षा के लिए उनकी वैज्ञानिक घेराबंदी कराई गई और दूर-दराज से आने वाले पर्यटकों की सुविधाओं के विस्तार की विस्तृत रूपरेखा (Master Plan) तैयार की गई। विमलकीर्ति सिंह: इन्होंने इतिहास और पुरातत्व के प्रति अपनी व्यक्तिगत रुचि के कारण बराबर की गुफाओं के ऐतिहासिक और वास्तुकला संबंधी महत्व को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पटल पर लाने के लिए बड़े पैमाने पर प्रशासनिक प्रयास तेज किए। शक्ति कुमार नेगी: इस पहाड़ी क्षेत्र के इतिहास में इनका नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। इन्होंने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में इस दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में कानून-व्यवस्था को पूरी तरह सुदृढ़ किया और पर्यटकों तथा विदेशी शोधार्थियों के मन से उग्रवाद और आपराधिक तत्वों के भय को स्थाई रूप से दूर किया।संजय कुमार अग्रवाल: इनके कार्यकाल को बराबर का 'स्वर्ण काल' कहा जा सकता है। इनके समय में 'बराबर महोत्सव' को एक अत्यंत भव्य, राजकीय और सांस्कृतिक रूप मिला। साथ ही बुनियादी पर्यटन सुविधाओं (पक्की सड़कें, निर्बाध बिजली, शुद्ध पेयजल और पर्यटक आवास) का रिकॉर्ड समय में तेजी से विस्तार हुआ। बाला मुरुगन डी: इन्होंने बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम और वन विभाग के साथ बेहतरीन समन्वय स्थापित कर पाताल गंगा के जीर्णोद्धार, कल्पवृक्ष परिसर के सौंदर्यीकरण और गुफाओं के आसपास के क्षेत्रों के लैंडस्केपिंग की योजनाओं को धरातल पर उतारा।पलका साहनी: महिला सशक्तिकरण और पर्यावरण संरक्षण के प्रति समर्पित इस अधिकारी ने अपने कार्यकाल में स्थानीय महिला स्वयं सहायता समूहों (जीविका दीदियों) को पर्यटन गतिविधियों और हस्तशिल्प से जोड़ने के रचनात्मक प्रयास किए। इन्होंने बराबर में 'इको-टूरिज्म' और सस्टेनेबल मॉडल को बढ़ावा दिया।रश्मि वर्मा: बिहार सरकार के पर्यटन सचिव के रूप में इन्होंने बराबर पर्वत समूह को एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय बौद्ध और आजीविक टूरिस्ट सर्किट के रूप में विकसित करने के लिए महत्वपूर्ण बजटीय स्वीकृतियां और प्रशासनिक दिशा-निर्देश प्रदान किए।जयदीप एक्का: जिला योजना पदाधिकारी, जहानाबाद के रूप में इन्होंने धरातल पर सभी विकास योजनाओं की माइक्रो-प्लानिंग तैयार करने और उन्हें समयबद्ध तरीके से क्रियान्वित कराने में अपना महत्वपूर्ण प्रशासनिक सहयोग है। 
इस संपूर्ण महाभियान में जिला सूचना एवं जनसंपर्क पदाधिकारी लाल बाबू सिंह ने अपनी लेखनी और प्रचार माध्यमों से इस धरोहर की ख्याति को जन-जन तक पहुँचाया। वहीं, राजस्व उप समाहर्ता सुबोध कुमार सिंह ने भूमि संबंधी विवादों को कुशलता से सुलझाकर विकास का मार्ग प्रशस्त किया, और उप विकास आयुक्त परशुराम मिश्रा ने ग्रामीण विकास योजनाओं को पर्यटन से जोड़कर क्षेत्र की आर्थिकी को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बिहार विरासत समिति के कार्यपालक निदेशक विजय कुमार चौधरी का पुरातात्विक अन्वेषण किया है । 
पाताल गंगा - बराबर के मैदानी भाग पाताल गंगा में  सावन की प्रतिपदा से पूर्णिमा और अमावस्या तक और भाद्रपद के शुक्ल पक्ष चतुर्दशी को अनंत पूजा , अनंत चतुर्दशी को महत्वपूर्ण मेला लगता है । बाबा का जलाभिषेक एवं अनंत चतुर्दशी की उपासना करते है । अनंत चतुर्दशी से पितृसंस्कृति प्रारंभ होता है । रेस्टोरेंट , सर्किट हाउस , थाने है । गाय घाट में मेला लगता है । गौ माता की पूजा अर्चना होती थी । द्वापर युग से पाताल लोक राजा बाणासुर की पुत्री ऊषा और अनिरुद्ध की स्वप्न प्रेम की कथा , अनंत कथा है। बुकानन हेमिल्टन ने पातालगंगा क्षेत्र को राम गया कहा था ।  रोप वे का निर्माण 2026 में प्रारंभ हुआ है । 
बराबर पर्वत समूह केवल पत्थरों की निर्जीव कंदराएँ नहीं हैं, बल्कि यह भारत के स्वर्णिम अतीत का वह जीवित अंतःकरण है जहाँ इतिहास, विज्ञान, वास्तुकला, कला और अध्यात्म एक साथ मिलकर एक साझी और शाश्वत मानवीय विरासत का निर्माण करते हैं। यह क्षेत्र पूरी दुनिया को यह संदेश देता है कि वैचारिक भिन्नता (शैव, बौद्ध, जैन, आजीविक) के बावजूद कैसे एक शांतिपूर्ण और सहिष्णु समाज का निर्माण किया जा सकता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि इस कालजयी विरासत को यूनेस्को (UNESCO) की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने के प्रयास और तेज किए जाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियां मगध की इस ज्ञानमयी कंदरा से प्रेरणा ले सकें।
सन्दर्भ - पुरातात्विक सर्वेक्षण विवरण: जनरल अलेक्जेंडर कनिंघम, आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया रिपोर्ट्स (1861-1880) - सुदामा और लोमश ऋषि गुफाओं के स्थापत्य और शिलालेखों का विवरण। मौर्यकालीन इतिहास: 'कलाटीका पर्वत' एवं सम्राट अशोक तथा उनके पौत्र दशरथ के ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण गुफा-लेख (मौर्य साम्राज्य का राजशाही इतिहास)। उत्तर-गुप्तकालीन साक्ष्य: राजा शार्दूल वर्मन और आनंद वर्मन के वेदाधिक और वापिक गुफाओं में उत्कीर्ण संस्कृत शिलालेख।।पौराणिक संदर्भ: शिव पुराण, ब्रह्मांड पुराण और स्थानीय ईश्वरगीता आख्यान - राजा सुकेशी और बाबा सिद्धनाथ संवाद, बाणासुर की पाताल राजधानी और लाल पहाड़ी की कथा। महाभारत कालीन संदर्भ: भीम-जरासंध युद्ध मार्ग विवरण (गाय घाट भित्तिचित्र एवं रथ चक्र साक्ष्य)। गया डिस्ट्रिक्ट गजेटियर 1906 एवं 1957 , बिहार सरकार पर्यटन विभाग की 'बराबर महोत्सव' विकास समीक्षा रिपोर्ट। बराबर , मगधाँचल, वाणावर्त , मगध क्षेत्र की विरासत ।  For further particulare see Report of the archaeological survey of India, Volume 1, Page 40and volume VIii, Page 30 , also.List of Ancient Monuments in BENGAL 1805.The last district Gazetteer of Gaya by Mr L S S O Mally ICS was published in 1906 . The book  was reprinting।in 1919. Bihar district Gazetteer Gaya by PC Roy Chaudhary, special officer , gazetteer Revision section , Revenue department , Bihar , Patna was published 15 september 1957 . 

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