शनिवार, अप्रैल 11, 2026

बाल मंच

बाल  नाटक - "मिट्टी की मेड़: संघर्ष से शिखर तक"
पात्र परिचय:
धनिया (मुख्य पात्र): एक साहसी माँ और स्कूल की शिक्षिका।
धनपत: धनिया का पति, पुरानी सोच का किसान जो शिक्षा को व्यर्थ मानता है।
डुग्गू (9 वर्ष): बड़ा बेटा, गंभीर और समझदार।
पुच्चू (5 वर्ष): छोटा बेटा, जिज्ञासु और चंचल।
सासू माँ: धनपत की माँ, जो पुरानी रूढ़ियों में जकड़ी हुई है।
किशन और सोहन: गाँव के अन्य किसान (ताने मारने वाले)।
वयस्क डुग्गू (कलेक्टर): जो अंत में सफलता के रूप में आता है।
वयस्क पुच्चू (कृषि वैज्ञानिक): जो खेती को नया रूप देता है।
(मंच पर हल्की नीली रोशनी है। पक्षियों के चहचहाने और चक्की चलने की आवाज़ आ रही है। धनिया चूल्हा फूँक रही है।)
सूत्रधार: गाँव की वह सुबह, जहाँ सूरज की पहली किरण के साथ ही धनिया का युद्ध शुरू हो जाता था। घर की चक्की से लेकर स्कूल के ब्लैकबोर्ड तक, उसकी ज़िंदगी एक निरंतर दौड़ थी।
धनिया: (धुएँ से खाँसते हुए) डुग्गू! पुच्चू! उठो लाल। सूरज सिर पर आ गया है। आज स्कूल में गणित की परीक्षा है न तुम्हारी?
डुग्गू: (आँखें मलते हुए) हाँ माँ, मुझे सब याद है। आपने रात को जो सिखाया था, वह मैं कभी नहीं भूलूँगा।
पुच्चू: माँ, मुझे भी स्कूल जाना है! क्या मैं भी बड़ा होकर आपकी तरह सबको पढ़ाऊँगा?
धनिया: (पुच्चू को चूमते हुए) तुम तो मुझसे भी बड़ा काम करोगे बेटा। तुम इस मिट्टी की सेवा करोगे।
(तभी धनपत गुस्से में प्रवेश करता है। उसके हाथ में हुक्का है।)
धनपत: क्या लगा रखा है सुबह-सुबह ये स्कूल-स्कूल का राग? धनिया, मैंने कितनी बार कहा है कि इन लड़कों को मेरे साथ खेत पर भेजो। मिट्टी से सोना निकालना सीखें, ये कागज़ काले करने से पेट नहीं भरता।
धनिया: (विनम्रता से) धनपत जी, खेती भी तभी सोना देगी जब उसे दिमाग से किया जाएगा। शिक्षा बोझ नहीं, आँखें हैं। बिना शिक्षा के इंसान अंधा है।
सासू माँ: (भीतर से आते हुए) बड़ी आई आँखें देने वाली! हमारे ज़माने में तो कोई स्कूल नहीं गया, क्या हम भूखे मर गए? धनिया, तू अपने हाथ के चार पैसों की वजह से बहुत उड़ने लगी है।
धनपत: (चिल्लाकर) खेती का पैसा मिट्टी में जाता है, और ये अपनी तनख्वाह को महल समझती है। याद रखना धनिया, इस घर का मालिक मैं हूँ!
(मंच पर बिजली कड़कने और तेज़ बारिश की आवाज़। अँधेरा है, कभी-कभी बिजली की चमक से मंच दिखाई देता है। धनिया घर के बर्तन बचा रही है जिनसे छत टपक रही है।)
धनिया: धनपत जी! उठिए! पानी अंदर आ रहा है। झोपड़ी की दीवारें कच्ची हैं, अगर बाहर से मिट्टी की मेड़ नहीं बनाई तो सब बह जाएगा। बच्चों की किताबें भीग रही हैं!
धनपत: (नशे की झोंक में) हट! सारा दिन किच-किच करती है। मैं तेरा नौकर नहीं हूँ जो इस बारिश में कीचड़ ढोऊँ। सो जा चुपचाप!
धनिया: (मिन्नत करते हुए) बच्चों के लिए चलिए... उनकी सुरक्षा के लिए...
धनपत: (गुस्से में धनिया का हाथ पकड़कर उसे बाहर बारिश में धकेल देता है) जा! बहुत चिंता है तो खुद बना मेड़। आज तेरी सारी 'मास्टरी' निकालता हूँ।
(धनिया कीचड़ में गिरती है। सासू माँ किवाड़ से झाँकती है और कुटिलता से मुस्कुराकर अंदर चली जाती है। धनिया अकेली मूसलाधार बारिश में भीग रही है।)
धनिया: (रोते हुए, फिर अचानक चुप होकर) नहीं... मैं नहीं रोऊँगी। अगर आज मैं टूट गई तो मेरे बच्चों का भविष्य इस कीचड़ में दब जाएगा। मुझे खुद अपनी और अपने बच्चों की ढाल बनना होगा।
(धनिया पागलों की तरह नंगे हाथों से मिट्टी इकट्ठा करने लगती है। वह बारिश की धाराओं के विपरीत मिट्टी की एक दीवार (मेड़) खड़ी करती है। हाथ छिल जाते हैं, पर वह नहीं रुकती।)
धनिया: (मिट्टी लगाते हुए) ये मिट्टी नहीं है, ये मेरे बच्चों का भविष्य है। बहो मत... ठहर जाओ
(समय बीतने का संकेत। मंच पर धनिया सिलाई मशीन चला रही है और बच्चे बगल में पढ़ रहे हैं।)
किशन (ग्रामीण): अरे धनिया बहन! सुना है डुग्गू को शहर पढ़ने भेज रही हो? क्या फायदा? आखिर तो उसे हल ही चलाना है। इतना पैसा क्यों बर्बाद कर रही हो?
धनिया: (शान्त भाव से) किशन भाई, हल चलाना बुरा नहीं है, लेकिन हल चलाने वाला अगर ये जान ले कि मिट्टी को क्या चाहिए, तो वह राजा बन जाता है। मेरा बेटा हल नहीं, इस देश का भाग्य चलाएगा।
डुग्गू: माँ, लोग आपको ताना मारते हैं, मुझे अच्छा नहीं लगता।
धनिया: बेटा, तानों को सीढ़ी बनाओ। जब लोग तुम पर पत्थर फेंकें, तो उन पत्थरों से अपने ज्ञान का महल खड़ा करो। याद रखना, किताबें ही वो सीढ़ी हैं जो तुम्हें इस गरीबी के दलदल से बाहर निकालेंगी।
: गौरवशाली सवेरा
(15 साल बाद। गाँव का दृश्य आधुनिक है। मंच पर एक बड़ी गाड़ी के आने की आवाज़। गाँव वाले इकट्ठा हैं।)
सूत्रधार: समय का पहिया घूमा। धनिया के हाथ और बूढ़े हो गए, लेकिन उसकी आँखों की चमक वैसी ही थी। आज गाँव में कुछ बड़ा होने वाला था।
(कलेक्टर की वर्दी में वयस्क डुग्गू और सूट में पुच्चू प्रवेश करते हैं। गाँव वाले हैरान हैं।)
डुग्गू: (भीड़ को चीरते हुए) माँ! कहाँ हो माँ?
(धनिया रसोई से बाहर आती है। डुग्गू झुककर उसके पैर छूता है और अपनी सरकारी नीली टोपी धनिया के सिर पर रख देता है।)
डुग्गू: माँ, आज जिला कलेक्टर की ये टोपी आपके उस संघर्ष के सामने बहुत छोटी है। अगर उस रात आपने वह मिट्टी की मेड़ न बनाई होती, तो आज मैं यहाँ न होता।
पुच्चू: और पिताजी, देखिए। मैं विदेश से पढ़कर आया हूँ। अब हमारी खेती मिट्टी में पैसा नहीं डुबाएगी, बल्कि तकनीक से हर किसान अमीर बनेगा।
धनपत: (बुढ़ापे की लाठी टेकते हुए, रोते हुए) मुझे माफ कर दे धनिया। मैंने तुझे पत्थर समझा, पर तू तो पारस थी। मैंने सिर्फ खेत देखे, तूने भविष्य देखा ।
(सभी पात्र मंच के केंद्र में आते हैं। पीछे एक बड़ा बैनर खुलता है जिस पर लिखा है: "शिक्षा ही शक्ति है")
धनिया: (दर्शकों की ओर देखते हुए) मेरी जीत मेरी नहीं है। यह हर उस माँ की जीत है जो अभावों में भी अपने बच्चों को शिक्षा का सपना दिखाती है। समाज कहेगा कि तुम कमज़ोर हो, लेकिन याद रखना—जब एक महिला ठान लेती है, तो वह पहाड़ों का रास्ता बदल सकती है।
सब एक साथ:
"शिक्षा का दीप जलाएंगे, नया सवेरा लाएंगे।
मिट्टी से सोना उपजेगा, जब हम ज्ञान पाएंगे!"
(पर्दा गिरता है)
नाटक से मिलने वाली शिक्षाएँ: दृढ़ संकल्प: कठिन परिस्थितियों में हार मानने के बजाय खुद रास्ता बनाना चाहिए। शिक्षा का मूल्य: पढ़ाई केवल नौकरी के लिए नहीं, बल्कि समाज और सोच बदलने के लिए ज़रूरी है। स्त्री शक्ति: एक महिला परिवार की नींव होती है; उसका सम्मान ही घर की उन्नति है। आधुनिक खेती: शिक्षा के माध्यम से कृषि को भी लाभप्रद बनाया जा सकता है।

: मिलकर रहना सीखें हम: डुग्गू-पुच्चू की टोली 
नन्हा डुग्गू, छोटी पुच्चू, बैठे बाग के अंदर,
देख रहे थे खेल निराला, कुदरत का सुंदर मंजर।
पास खड़ी थी एक बिल्ली, म्याऊँ-म्याऊँ करती,
देख चूहा भागा बिल में, वो बिल्ली से डरती।
पेड़ पे बैठा तोता बोला, "सुनो डुग्गू-पुच्चू भाई,
सूरज उगते ही जग जाओ, आलस है कठिनाई।"
पास ही बैठी मैना बोली, "मीठी वाणी बोलो,
कड़वे वचन न कभी कहो तुम, प्यार के मिश्री घोलो।"
दूर डाल पर बैठा कौवा, काँव-काँव चिल्लाता,
"गंदगी को दूर भगाओ", सबको पाठ पढ़ाता।
आसमान में उड़ती तितली, बोली "रंग निराले,
जैसे फूल महकते जग में, बनो तुम मन के उजाले।"
द्वार खड़ा था शेरू कुत्ता, पूँछ हिलाकर बोला,
"सदा वफादारी तुम करना, मत करना कभी झोला।"
अजनबी दिखे तो भौं-भौं करना, घर की रखवाली,
सब मिलकर जब साथ रहेंगे, आएगी खुशहाली।
सीख: छोटे बच्चों, इस दुनिया में हर जीव हमें कुछ न कुछ सिखाता है। बस हमें प्यार से सबके साथ रहना चाहिए और अच्छी बातें सीखनी चाहिए

: बाल कहानी
बुद्धि का प्रकाश: अनोखी पाठशाला और जादुई दर्पण
नीले आसमान के नीचे और विशाल बरगद की छाया में एक अनोखी पाठशाला लगती थी। यहाँ रिया और प्रिया अपनी किताबों के साथ बैठती थीं, तो उनके बगल में बालू और शालू (नन्हे भालू) भी बड़े चाव से क ख ग सीखते थे। बंदर दादा अक्सर पेड़ की ऊँची टहनी से हँसते हुए कहते, "किताबों से क्या होगा? असली ताकत तो ऊँची छलांग और ताकतवर बाजू में है।" रिया मुस्कुराकर कहती, "दादा, शिक्षा हमें लड़ना नहीं, बल्कि तालमेल बिठाना सिखाती है।"
एक शाम जब सभी बच्चे पाठशाला से घर लौट रहे थे, तभी झाड़ियों में सरसराहट हुई। सामने खूँखार वनराज (शेर) और उसका चालाक साथी सियार खड़ा था। सियार धीमे से फुसफुसाया, "महाराज, आज तो शिकार खुद चलकर आया है!" बंदर दादा डर के मारे सबसे ऊँची टहनी पर जा छिपे। भालू भी घबरा गए, लेकिन रिया और प्रिया ने एक-दूसरे का हाथ थाम लिया। यह 'व्यावहारिक बुद्धि' की परीक्षा की घड़ी थी।
प्रिया ने धीमी आवाज़ में कहा, "भागना मत! अगर हम भागे तो शेर हमला कर देगा। हमें रुककर सोचना होगा।" यह शिक्षा का वही तीसरा विकल्प था— 'सोचो ।
तभी शालू (भालू) ने अपनी वाकपटुता का परिचय दिया। वह शेर के सामने हाथ जोड़कर बोला, "महाराज! आप तो इस जंगल के न्यायप्रिय राजा हैं। क्या आप जानते हैं कि पास की नदी के किनारे एक सोने का सिंहासन प्रकट हुआ है? जो वहां सबसे पहले पहुँचेगा, वही त्रिलोक का राजा बनेगा!"
लालची सियार और शेर सोच में पड़ गए। इसी बीच प्रिया ने अपने बस्ते से विज्ञान की कक्षा में इस्तेमाल होने वाला एक छोटा सा दर्पण निकाला। डूबते हुए सूरज की एक आखिरी किरण उस पर पड़ी। प्रिया ने बड़ी कुशलता से उस प्रकाश को परावर्तित किया और सीधे शेर की आँखों पर केंद्रित कर दिया।
शेर की आँखों में अचानक इतनी तेज़ रोशनी पड़ी कि उसे लगा जैसे आसमान से कोई दैवीय शक्ति नीचे आ गई हो। वह चौंधिया गया और घबराकर पीछे हटने लगा।
इसी दौरान बालू ने अपनी ताकत का इस्तेमाल किया। उसने पास की सूखी लकड़ियों को जोर-जोर से हिलाना और शोर मचाना शुरू किया। आवाज़ और उस रहस्यमयी रोशनी से डरकर शेर और सियार दुम दबाकर जंगल की ओर भाग खड़ी हुई ।
दूर खड़े बंदर दादा यह सब देख रहे थे। उन्हें समझ आ गया कि केवल कूदना ही काफी नहीं है, संकट में 'विवेक' ही काम आता है। उधर, शेर भी समझ चुका था कि लालची सियार की बातों में आकर उसने अपनी फजीहत करा ली।
जब बच्चे और जानवर सुरक्षित अपने घर पहुँचे, तो जंगल की ठंडी हवाओं ने उनका स्वागत किया। बहती हुई नदी और झूमते पेड़ इस बात के गवाह थे कि जहाँ एकता और शिक्षा होती है, वहाँ डर का कोई स्थान नहीं होता।
"शिक्षा केवल अक्षरों का ज्ञान नहीं, बल्कि वह आत्मविश्वास है जो हमें विपरीत परिस्थितियों में भी शांत रहकर समाधान खोजना सिखाता है।"
नवाचार: स्कूल के दर्पण का उपयोग संकट प्रबंधन में करना। समावेश: मनुष्य और पशु का एक साथ पढ़ना और एक-दूसरे की रक्षा करना। पर्यावरण: प्रकृति को एक शिक्षक और गवाह के रूप में प्रस्तुत करना।

 बाल कहानी मंथन: 
संस्कार, सृजन  का अक्षय कोश
: बाल मन की उर्वर भूमि और साहित्य का बीजारोपण में बाल्यकाल जीवन की वह स्वर्णिम अवस्था है जहाँ जिज्ञासाओं का अनंत आकाश होता है और कल्पनाओं के सप्तरंगी पंख। इस अवस्था में बालक जो कुछ भी सुनता, देखता या पढ़ता है, वह उसके अवचेतन मानस पर अमिट लकीर की तरह अंकित हो जाता है। महान दार्शनिकों का मत है कि यदि हम एक सशक्त राष्ट्र और मानवीय समाज का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें अपनी आगामी पीढ़ी के वैचारिक धरातल को संस्कारित करना होगा। इसी पावन उद्देश्य की सिद्धि के लिए 'बाल कहानी मंथन' का सृजन किया गया है।
यह पुस्तक केवल पन्नों का पुलिंदा या मनोरंजन का साधन मात्र नहीं है, बल्कि यह बाल-मन के परिष्कार, उनके चारित्रिक उत्थान और सामाजिक-पर्यावरणीय बोध को जागृत करने का एक सुविचारित 'मंथन' है। वर्तमान तकनीकी युग में, जहाँ गैजेट्स और आभासी दुनिया ने बच्चों के स्वाभाविक बचपन को संकुचित कर दिया है, वहाँ शब्दों की यह जीवंत दुनिया उन्हें पुनः अपनी जड़ों, अपनी मिट्टी और अपनी संस्कृति से जोड़ने का एक सेतु है।
'बाल कहानी मंथन' के आलेखों का प्रथम और महत्वपूर्ण स्तंभ पारिवारिक बोध है। परिवार समाज की वह प्राथमिक इकाई है जहाँ बच्चा प्रेम, त्याग, सहिष्णुता और अनुशासन का प्रथम पाठ पढ़ता है। आज के एकल परिवारों के दौर में बच्चे अक्सर दादा-दादी की कहानियों और बड़े-बुजुर्गों के अनुभवों के साये से वंचित हो रहे हैं। इस पुस्तक की कहानियों में इस रिक्तता को भरने का प्रयास किया गया है। कहानियों के पात्रों के माध्यम से बच्चों को यह समझाने का प्रयत्न किया गया है कि: : माता-पिता और गुरुजनों के प्रति कृतज्ञता केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि जीवन की सफलता का आधार है।भाई-बहन और परिजनों के साथ मिल-जुलकर रहने से न केवल खुशियाँ बढ़ती हैं, बल्कि बड़ी से बड़ी चुनौतियों का सामना करना सरल हो जाता है। परिवार के प्रति अपने कर्तव्यों का बोध ही आगे चलकर एक बालक को उत्तरदायी नागरिक बनाता है।
 एक सजग नागरिक का निर्माण में साहित्य समाज का दर्पण होता है, और बाल साहित्य उस दर्पण की वह निर्मल छवि है जो भविष्य के समाज का खाका खींचती है। 'बाल कहानी मंथन' में संकलित कहानियाँ और नाटक बच्चों को उनके सामाजिक परिवेश के प्रति जागरूक करते हैं।
मानवीय संवेदना: बच्चों में दूसरों के दुःख-दर्द को समझने और सहायता करने की प्रवृत्ति  विकसित करना।  कहानियों के माध्यम से बहुत ही सहजता से सामाजिक बुराइयों, भेदभाव और अंधविश्वासों के प्रति एक तार्किक दृष्टिकोण पैदा करना। इसमें संकलित 'बाल नाटक' विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। नाटक एक ऐसी विधा है जो बच्चों को सामूहिक रूप से कार्य करना सिखाती है। जब बच्चा मंच पर किसी पात्र को जीता है, तो उसमें नेतृत्व क्षमता, आत्मविश्वास और सार्वजनिक अभिव्यक्ति की कला का विकास होता है। यह सामाजिक जुड़ाव ही उसे भविष्य की सामाजिक विसंगतियों से लड़ने का साहस देता है।
आज संपूर्ण विश्व जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय असंतुलन के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में बच्चों को किताबी परिभाषाओं से हटकर प्रकृति के साथ एक आत्मीय रिश्ता जोड़ना अनिवार्य है। 'बाल कहानी मंथन' में पर्यावरण संरक्षण को एक विषय के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवन-शैली के रूप में प्रस्तुत किया गया है।"जल ही जीवन है" और "वृक्ष धरा के भूषण हैं" जैसे संदेशों को उपदेशात्मक न बनाकर कहानियों के ताने-बाने में ऐसे बुना गया है कि बच्चा स्वयं को प्रकृति का रक्षक समझने लगे। जीव-जंतुओं से प्रेम: मूक प्राणियों के प्रति दया और उनके अस्तित्व के महत्व को रेखांकित कर बच्चों में पारिस्थितिकी तंत्र के प्रति समझ विकसित करने का प्रयास किया गया है।
 बच्चों को यह बोध कराना कि पृथ्वी के संसाधन हमारे पूर्वजों की विरासत नहीं, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों की अमानत हैं, जिनका संरक्षण हमारा परम धर्म है।
शिक्षा का वास्तविक अर्थ सूचनाओं को रटना नहीं, बल्कि 'मंथन' करना है। इस पुस्तक का शीर्षक स्वयं में इसकी सार्थकता सिद्ध करता है। कहानियों के अंत में छिपे निष्कर्ष और नाटकों के संवाद बच्चों की तर्कशक्तिको धार देते हैं।  प्रत्येक कहानी बच्चों के मन में एक प्रश्न छोड़ती है, जो उन्हें स्वयं सोचने और सही-गलत का निर्णय लेने के लिए प्रेरित करती है।  सरल, सुबोध और प्रभावकारी भाषा का प्रयोग किया गया है ताकि बच्चे हिंदी और अपनी भाषाई संस्कृति के प्रति गर्व का अनुभव कर सकें। शब्दों का चयन इस प्रकार है कि बच्चों के शब्दकोश में वृद्धि हो और उनकी अभिव्यक्ति में निखार है। बच्चों को जो हम 'कहते' हैं, वह उसे शायद भूल जाएँ, लेकिन जो हम उन्हें कहानियों के माध्यम से 'महसूस' कराते हैं, वह उनके चरित्र का हिस्सा बन जाता है। 'बाल कहानी मंथन' मेरा वही अनुभव-प्रसाद है जिसे मैंने अपनी लेखनी के माध्यम से शब्दों का रूप दिया है।
इस पुस्तक का प्रत्येक पात्र, चाहे वह कोई नन्हा बालक हो, कोई चतुर पक्षी हो या कोई प्राचीन वृक्ष, वह बच्चों से बातें करता है, उन्हें राह दिखाता है और उन्हें एक बेहतर इंसान बनने के लिए प्रेरित करता है। 'बाल कहानी मंथन' मात्र एक साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि एक नैतिक आंदोलन है। यह अभिभावकों के लिए एक साधन है अपने बच्चों को संस्कारित करने का, शिक्षकों के लिए एक माध्यम है ज्ञान को रोचक बनाने का, और बच्चों के लिए एक मित्र है जो उन्हें जीवन के कठिन सत्यों को कहानियों के माध्यम से सरलता से समझा देता है।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि कहानियों और नाटकों का यह अनूठा संगम बच्चों के हृदय में ज्ञान की ज्योति जलाएगा और उन्हें एक संवेदनशील, जागरूक और आदर्श मनुष्य के रूप में प्रतिष्ठित करेगा। यदि इस पुस्तक के माध्यम से हम समाज में सकारात्मक परिवर्तन की एक भी लहर पैदा कर सके, तो मेरा यह 'मंथन' सफल माना जाएगा।
आगामी पीढ़ी के उज्ज्वल भविष्य की कामना के साथ यह कृति आप सभी को सादर समर्पित है।

: बाल नाटक : 
हार के अनेक रंग: एक ज्ञान यात्रा
पात्र परिचय:
दादाजी: उम्र 70 वर्ष। ऊँचे कद के, सफेद कुर्ता-पायजामा पहने, ज्ञान और शांति का प्रतीक। पापा (अजय): 40 वर्ष। गंभीर लेकिन मिलनसार। मम्मी (ममता): 35 वर्ष। सुसंस्कृत और स्नेहमयी। डुग्गू: 9 वर्ष। जिज्ञासु बालक, जिसे हर बात के पीछे 'क्यों' और 'कैसे' जानने की आदत है। पुच्चू: 5 वर्ष। नन्हा और शरारती, जो खेल-खेल में ज्ञान पाता है
  डुग्गू जो बार-बार प्रश्न पूछता है।
स्थान: दादाजी का विशाल दालान वातावरण: सामने एक सुंदर वाटिका है जहाँ आम, अमरूद, केले, लीची, शरीफे और कटहल के पेड़ लदे हुए हैं। क्यारियों में रंग-बिरंगे फूल खिले हैं। चिड़ियों के चहचहाने की आवाज आ रही है।
(दोपहर का समय। दादाजी आरामकुर्सी पर बैठे माला जप रहे हैं। मम्मी एक थाली में फूल लेकर बैठी हैं और माला (हार) पिरो रही हैं। पापा पास में मेज पर अपना लैपटॉप चला रहे हैं। डुग्गू और पुच्चू एक कोने में लूडो खेल रहे हैं। अचानक पुच्चू चिल्लाता है।)
पुच्चू: मम्मी! देखो डुग्गू भैया फिर से चीटिंग कर रहे हैं। मैं फिर से 'हार' गया!
डुग्गू: (चिढ़ते हुए) हार गए तो हार गए, इसमें रोना क्या? खेल में तो कोई न कोई हारता ही है।
मम्मी: (मुस्कुराते हुए) अरे बच्चों, लड़ो मत। देखो, मैं कितना सुंदर 'हार' बना रही हूँ। तुम दोनों यह पहन लेना।
पुच्चू: (उलझन में) मम्मी, अभी डुग्गू भैया कह रहे थे कि हारना बुरी बात है, और आप कह रही हैं कि हार पहन लो? क्या हार अच्छी चीज है या बुरी?
(तभी नेपथ्य से एक आवाज गूँजती है)
डुग्गू.: हार क्या है दादा जी ?
दादाजी: (अपनी आँखें खोलते हुए और बच्चों को पास बुलाते हुए) आओ वत्स! तुम लोग एक ही शब्द में उलझ गए हो? 'हार' शब्द कोई साधारण शब्द नहीं है, यह जीवन का एक बड़ा दर्शन है।
डुग्गू: वो कैसे दादाजी?
दादाजी: सुनो! 'हार' के हिन्दी में मुख्य रूप से दो अर्थ हैं— 'गले की माला' और 'पराजय'। अब मजे की बात देखो। हार स्त्रियाँ पहनती हैं और महसूस पुरुष करते हैं।
पापा: (लैपटॉप बंद करते हुए) पिताजी, इस बात को थोड़ा विस्तार से समझाइए।
दादाजी: देखो डुग्गू , स्त्रियों का हार (माला) व्याकरण की दृष्टि से 'पुल्लिंग' है, जबकि पुरुषों की हार (पराजय) 'स्त्रीलिंग' है। यह जीवन के एक सिक्के के दो पहलुओं जैसा है। जब कोई स्त्री अपने हृदय पर सुंदर हार धारण करती है, तो वह मानों पुरुषों को यह संदेश देती है कि— "हे पुरुष! मेरे इस हार के सौंदर्य को देखते ही तुम अपनी सुध-बुध हार जाओगे।" तुम्हारा अहंकार और पौरुष इस सौंदर्य के समक्ष 'हार' मान लेगा।
मम्मी: यानी दादाजी, सौंदर्य की जीत ही पुरुष की हार है?
दादाजी: बिल्कुल! और यदि तुम इस सौंदर्य का गहराई से दर्शन करोगे, तो तुम्हें इसमें 'सत्यं शिवं सुंदरम्' का उद्घोष सुनाई देगा। यानी हार केवल पराजय नहीं, सत्य का साक्षात्कार भी है।
डुग्गू -  हार क्या है बाबा?
दादाजी: (उत्साह के साथ) मेरे बच्चे, हार दरअसल विजय का पहला पाठ है। लोग हारने से डरते हैं, लेकिन सच तो यह है कि 'हार' विजय का उत्प्रेरक  है। यह वह संजीवनी है जो इंसान को फिर से खड़ा होना सिखाती है।
पुच्चू: लेकिन दादाजी, हारने पर तो दुःख होता है।
दादाजी: दुःख नहीं होना चाहिए पुच्चू! हार तो विजय का स्वाद है। बिना हार का स्वाद चखे तुम्हें जीत की मिठास कभी समझ नहीं आएगी। हार जीवन की वह ओषधि है जो अहंकार के रोग को मिटाती है। हार निराशा की वस्तु नहीं, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि तुमने प्रयास किया— यह जीवंतता का प्रतीक है।
पापा: इसीलिए शायद गीता में कहा गया है कि हमें फल की चिंता नहीं करनी चाहिए?
दादाजी: हाँ! गीता का संदेश याद रखो—
सुखे−दु:खे−समौ कृत्वा लाभालाभौ जयाजय:
अर्थात् सुख-दुःख, लाभ-हानि और जीत-हार को समान समझकर जो अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ता है, वही सच्चा वीर है। हार को उसी शौर्य से स्वीकार करो, जैसे तुम जीत का जश्न मनाते हो।
डुग्गू - हार क्या है दादा जी ?
डुग्गू: दादाजी, क्या इस शब्द का कोई और गहरा मतलब भी है?
दादाजी: बहुत गहरा मतलब है डुग्गू। यदि हम संस्कृत व्याकरण की बात करें, तो 'हार' शब्द 'हृ' (Hree) धातु में 'आर' प्रत्यय लगाने से बना है। 'हृ' का अर्थ होता है— हरण कर लेना या चुरा लेना।
मम्मी: यानी जो मन को चुरा ले, वह हार है?
दादाजी: बिल्कुल! मनुष्य को सबसे ज्यादा विचलित करने वाला उसका 'मन' ही है। जो व्यक्ति अपने मन के वेग से हार जाता है, वही असली पराजय है। इसीलिए हमारे बुजुर्गों ने कहा है— "मन के हारे हार है, मन के जीते जीत!" असली हार तब नहीं होती जब तुम मैदान में हारते हो, असली हार तब होती है जब तुम मन से हार मान लेते हो।
पुच्चू: (वाटिका की ओर देखते हुए) दादाजी, अमरूद के पेड़ पर पक्षियों का झुंड बैठा है, क्या वे भी हार हैं?
दादाजी: (हँसते हुए) शाबाश पुच्चू! तुमने तो कमाल कर दिया। हमारे पूर्वी उत्तर प्रदेश की देशज बोलियों में 'हार' का एक और सुंदर अर्थ है— 'समूह' या 'झुंड'। पुराने लोग कहते थे— 'बैलों का हार' जा रहा है। जैसे 'मोतियों का हार' मोतियों का समूह है, वैसे ही जहाँ एकता और समूह हो, उसे भी हार कहा जाता है।
डुग्गू: यानी हार का मतलब मेल-जोल भी है?
दादाजी: हाँ, जहाँ सब एक सूत्र में पिरोए हों, वही असली 'हार' है।
(दालान में शांति छा जाती है। सूर्य ढल रहा है और वातावरण भक्तिमय हो गया है।)
दादाजी: (गंभीर स्वर में) हे प्रिय शिष्यों! 'हार' को समझने की अंतिम सीढ़ी है— 'शरणागति'। जब मनुष्य संसार की उलझनों से थक जाता है, तब उसे ईश्वर के चरणों में अपनी 'हार' मान लेनी चाहिए। यह हार कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी ताकत है। भगवान कृष्ण ने अर्जुन से कहा था:
सर्व धर्मान् परित्यज मामेकं शरणं ब्रज।
अहं सर्व पापेभ्यो मोक्षयिस्यामि मा शुच॥
पापा: इसका सरल अर्थ क्या हुआ पिताजी?
दादाजी: इसका अर्थ है— "सारे धर्मों (दुनिया की उलझनों, सोच और अहंकार) को छोड़कर बस मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे सभी पापों और चिंताओं से मुक्त कर दूँगा। तू शोक मत कर।" यानी जब हम परमात्मा के सामने अपनी जिद 'हार' जाते हैं, तब हमारी वास्तविक 'जीत' शुरू होती है।
मम्मी: (गले में फूलों की माला पहनते हुए) आज तो 'हार' शब्द ने हमारी आँखें खोल दीं।
डुग्गू: (पुच्चू का हाथ पकड़कर) पुच्चू, अब मैं लूडो में हारूँगा तो दुखी नहीं होऊँगा, क्योंकि मेरी हार मुझे जीतने का नया तरीका सिखाएगी।
पुच्चू: और मैं दादाजी के पास आकर अपनी अक्ल की 'हार' मान लूँगा ताकि मैं उनसे और ज्ञान सीख सकूँ!
(सब जोर से हँसते हैं। पापा और मम्मी दादाजी के पैर छूते हैं। बच्चे वाटिका की ओर दौड़ जाते हैं।)
दादाजी: (आसमान की ओर देखते हुए) जीवन एक हार है, जो प्रभु के गले में सज जाए तो धन्य हो जाए।
(पर्दा गिरता है।)
शिक्षा: हार जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। चाहे वह गले का आभूषण हो, सीखने का माध्यम हो या ईश्वर के प्रति समर्पण— 'हार' हमें विनम्र और महान बनाती है। 

फुलवाड़ी की पाठशाला
नदी किनारे सजी बगिया, खुशबू मंद-मंद मुस्काती,
गेंदा, गुलाब ,बेली  और चमेली, सबको पास बुलाती।
 उड़हुल बजयंत्री खिलखिलाता, जैसे कोई दीप जला,
मंगरू, झगडू, बुधना पहुँचे, करने खेल का सिलसिला।
मंगरू बोला— "देखो भाई, बारह साल का मैं हुआ,
पर इस प्रकृति से ही मैंने, जीना और हँसना छुआ।
आम, जामुन और अमरूद, मीठे फल ये देते हैं,
बदले में हमसे बस, थोड़ी सी सेवा लेते हैं।"
झगडू बोला— "ग्यारह की उम्र, जोश है मुझमें भारी,
पर देखो, कटहल की छाल है कितनी खुरदरी और प्यारी।
आंवला जो खाएगा, सेहत अपनी बनाएगा,
विटामिन 'सी' की शक्ति से, कभी न वो घबराएगा।"
छोटा बुधना नौ साल का, नदी देख हर्षाया,
"शीतल जल है जीवन अपना", उसने सबको समझाया।
"पानी स्वच्छ रहे सदा, और पेड़ न कोई काटें,
आओ हम सब मिलकर, जग में हरियाली बाँटें।"
तभी आए सोमर काका, तीस साल का अनुभव साथ,
बच्चों के सिर पर रखा, उन्होंने बड़े प्यार से हाथ।
बोले— "खेल का मैदान हो या, ये पेड़ों की छाया,
प्रकृति ही है सबसे बड़ी, ईश्वर की अनमोल माया।"
सबने मिलकर ली शपथ, "हम धरती को स्वर्ग बनाएँगे,
पेड़ लगाएँ, जल बचाएँ, जग को सुंदर दिखाएँगे।"
पंछी चहके, कलियाँ महकीं, हुआ ज्ञान का उजियारा,
सुखी रहे ये उपवन अपना, सुखी रहे जग सारा।
कविता से सीख: पर्यावरण संरक्षण: पेड़-पौधे हमें ऑक्सीजन और फल देते हैं, उनका ख्याल रखना हमारा कर्तव्य है।
सेहत का राज: आंवला और मौसमी फल खाने से शरीर स्वस्थ रहता है। स्वच्छता: नदियों और पानी के स्रोतों को साफ रखना जीवन के लिए अनिवार्य है। तालमेल: खेलकूद के साथ-साथ प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता भी जरूरी है।

 बाल कहानी 
जादुई ब्रेक और रफ्तार का रहस्य 
आदर्श विद्यालय की कक्षा पाँचवीं 'ब' में आज कुछ अलग ही हलचल थी। भौतिक विज्ञान के शिक्षक श्री मोहन जी हमेशा अपने अनोखे प्रयोगों के लिए जाने जाते थे। कक्षा में डुग्गू, पुच्चू, पीहू, शशांक और अंशिका अग्रिम पंक्तियों में बैठे थे।
शिक्षक ने चॉक उठाई और ब्लैकबोर्ड पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा— "ब्रेक "।
उन्होंने कक्षा की ओर मुड़कर पूछा, "बच्चों, बताओ कार में ब्रेक क्यों होते हैं?"
सबसे पहले शशांक ने हाथ उठाया, "सर, बहुत आसान है! कार को रोकने के लिए।"
तभी पीहू बोली, "ताकि हम कार की स्पीड कम कर सकें और उसे कंट्रोल में रख सकें।"
अंशिका ने अपनी बात जोड़ी, "सर, अगर सामने कोई आ जाए, तो टक्कर से बचने के लिए ब्रेक जरूरी हैं।"
शिक्षक मुस्कुराए। उन्होंने देखा कि डुग्गू और पुच्चू पीछे बैठकर कुछ सोच रहे थे। जल्द ही पूरी क्लास से वही घिसे-पिटे जवाब आने लगे। शिक्षक ने अपना चश्मा ठीक किया और बोले, "बच्चों, आप सबकी बातें सही हैं, पर मेरा मानना है कि कार में ब्रेक हमें उसे और तेज़ चलाने की हिम्मत देते हैं।"
पूरी कक्षा में सन्नाटा छा गया। शशांक ने पुच्चू की तरफ देख कर फुसफुसाया, "लगता है आज सर का दिमाग भौतिक विज्ञान के किसी कठिन फार्मूले में उलझ गया है! ब्रेक से गाड़ी रुकती है या तेज़ चलती है?"
शिक्षक ने सबकी उलझन भाँप ली। उन्होंने कहा, "कल्पना करो बच्चों, तुम्हें एक ऐसी कार दी जाए जो दुनिया की सबसे तेज़ कार हो, लेकिन उसमें 'ब्रेक' न हों। क्या तुम उसे 100 या 150 की स्पीड पर चलाओगे?"
सबने एक सुर में चिल्लाकर कहा, "कभी नहीं सर! वह तो मौत का कुआं बन जाएगी।"
शिक्षक ने मेज पर हाथ रखते हुए कहा, "यही तो रहस्य है। चूंकि हमें पता है कि हमारे पास एक शक्तिशाली 'ब्रेक' है, इसीलिए हम एक्सीलेटर दबाने की हिम्मत करते हैं। ब्रेक हमें सुरक्षा का अहसास दिलाते हैं, जिससे हम अपनी मंजिल की ओर तेज़ रफ्तार से दौड़ पाते हैं। बिना ब्रेक के तो हम डर के मारे गाड़ी स्टार्ट भी नहीं करेंगे।
लंच ब्रेक हुआ। डुग्गू, पुच्चू, पीहू, शशांक और अंशिका पीपल के पेड़ के नीचे बैठे थे।
डुग्गू: "यार, सर की बात ने तो मेरा दिमाग ही घुमा दिया। मैं तो हमेशा सोचता था कि मम्मी-पापा जब मुझे टोकते हैं, तो वे मेरी लाइफ के ब्रेक हैं।"
पुच्चू: "हाँ भाई! कल ही की बात ले लो, मैं देर तक गेम खेलना चाहता था, पर पापा ने 'ब्रेक' लगा दिया और कहा—सो जाओ। मुझे बहुत गुस्सा आया था।"
पीहू: "और मुझे जब मम्मी रोज़ सुबह जल्दी उठकर योग करने को कहती हैं, तो मुझे लगता है कि वे मेरी नींद और मजे में बाधा डाल रही हैं।"
अंशिका, जो काफी समझदार थी, बोली, "सोचो, अगर ये 'ब्रेक' न हों तो क्या होगा? अगर पुच्चू सारी रात गेम खेलेगा, तो सुबह स्कूल में सो जाएगा और पढ़ाई में पिछड़ जाएगा। अगर पीहू सेहत का ध्यान नहीं रखेगी, तो बीमार पड़ जाएगी। इसका मतलब है कि ये रोक-टोक हमें और बेहतर बनाने के लिए है।"
शाम को डुग्गू और पुच्चू जब घर लौटे, तो उनके चेहरे पर एक नई चमक थी। उन्होंने अपनी माता-पिता को स्कूल में हुई पूरी बात सुनाई।
पिताजी ने उन्हें पास बिठाया और बोले, "बच्चों, शिक्षक ने तुम्हें जीवन का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाया है। हमारे समाज में नियम, कानून, माता-पिता के सवाल और शिक्षकों की डांट—ये सब 'ब्रेक' की तरह ही हैं। ये तुम्हें बांधने के लिए नहीं, बल्कि तुम्हें सुरक्षित रखने के लिए हैं ताकि तुम अपनी जिंदगी की रेस में कभी दुर्घटना का शिकार न हो।"
माता ने रसोई से आते हुए कहा, "जैसे एक पतंग तभी तक ऊँची उड़ती है जब तक उसकी डोर किसी के हाथ में होती है। वह डोर 'ब्रेक' की तरह उसे नियंत्रित करती है। जिस पल डोर कट जाती है, पतंग ऊँची नहीं जाती, बल्कि नीचे गिरकर कहीं झाड़ियों में फंस जाती है।
समय बीतता गया। परीक्षा के दिन करीब थे। शशांक और अंशिका ने खुद पर कड़ा अनुशासन लागू किया। उन्होंने अपने खेल-कूद के समय पर 'ब्रेक' लगाया ताकि वे पढ़ाई में 'रफ्तार' पकड़ सकें। वहीं डुग्गू और पुच्चू ने भी तय किया कि वे अपने माता-पिता के हर सवाल को एक 'चेक पॉइंट' की तरह देखेंगे। जब कभी वे भटकते, उनके बड़े उन्हें टोक देते। रिजल्ट का दिन आया। डुग्गू और पुच्चू ने अपनी कक्षा में सबसे ज्यादा अंक हासिल किए। वे दोनों दौड़कर अपने शिक्षक और माता-पिता के पास गए। डुग्गू: "सर, आज हमें समझ आया। अगर आपने और हमारे माता-पिता ने हमारे गलत फैसलों पर 'ब्रेक' न लगाया होता, तो आज हम सफलता की इस रफ्तार तक कभी नहीं पहुँच पाते।
शिक्षक ने पूरी कक्षा को एक अंतिम सीख दी, जो हम सबके लिए जरूरी है  ब्रेक का मतलब रुकना नहीं, बल्कि सही समय पर सही गति चुनना है। कभी-कभी जीवन में कठिन परिस्थितियाँ आती हैं जो हमें रोक देती हैं। उसे बाधा मत समझो। वह एक मौका होता है खुद को बेहतर बनाने का।: जिनके जीवन में अच्छे सलाहकार (ब्रेक) होते हैं, वही लोग बड़े जोखिम लेने का साहस जुटा पाते हैं।
 डुग्गू और उसके दोस्तों ने एक डायरी बनाई, जिसका नाम रखा— "मेरे प्यारे ब्रेक"। इसमें वे उन सभी बातों को लिखते थे जहाँ किसी ने उन्हें टोका या सुधारा था। वे समझ चुके थे कि जीवन में फिसलने से अच्छा है कि कोई हमें थामने वाला हो।
बच्चों, जब भी आपके माता-पिता या शिक्षक आपसे सवाल करें, आपकी गलतियों को सुधारें या आपको कुछ करने से रोकें, तो चिढ़ें नहीं। याद रखें, वे आपके जीवन की कार के वे 'ब्रेक' हैं जो आपको बिना किसी दुर्घटना के आपकी मंजिल (सपनों) तक सबसे तेज़ और सुरक्षित पहुँचाना चाहते हैं। अगली बार जब कोई आपको टोके, तो मुस्कुराइए और सोचिए कि आपकी कार अब और तेज़ चलने के लिए तैयार हो रही है!


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें