सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारत के मानचित्र पर मगध का क्षेत्र सदैव ज्ञान, सत्ता और अध्यात्म का केंद्र रहा है। किंतु मगध के भीतर एक ऐसा रहस्यमयी और समृद्ध भूभाग है जिसे प्राचीन काल में 'हिरण्य प्रदेश' के नाम से जाना जाता था। सोन (प्राचीन हिरण्यबाहु) और पुनपुन (आदि गंगा) नदियों के मध्य स्थित यह क्षेत्र सभ्यता के उस आरंभिक काल का गवाह है, जहाँ देवताओं और ऋषियों का मिलन होता था। वर्तमान में यह क्षेत्र बिहार के अरवल, औरंगाबाद, पटना और झारखंड के पलामू जिले तक विस्तृत है। हिरण्य प्रदेश की यात्रा को सतयुग की ऋषि परंपरा से शुरू होकर आधुनिक काल के औद्योगिक विकास तक पहुँचती है।
हिरण्य प्रदेश का अस्तित्व सृष्टि के नियामक भगवान सूर्य से जुड़ा है। पौराणिक ग्रंथों और स्थानीय श्रुतियों के अनुसार, यह भूमि सौर संस्कृति का आदि केंद्र है। भगवान सूर्य की भार्या माता संज्ञा के पुत्र वैवस्वत मनु हुए, जिन्हें मानव सभ्यता का आदि पुरुष माना जाता है। वैवस्वत मनु के पुत्र राजा शर्याति ने हिरण्यबाहु नदी के तटवर्ती क्षेत्रों को अपनी राजधानी और तपोस्थली बनाया। शर्याति का शासन काल वह समय था जब राज्य संचालन और ऋषि साधना एक दूसरे के पूरक थे। हिरण्य प्रदेश की सर्वाधिक लोकप्रिय और चमत्कारिक गाथा महर्षि च्यवन से जुड़ी है। इसी धरा पर राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या और महर्षि च्यवन का विवाह हुआ। यह केवल एक विवाह की कथा नहीं, बल्कि आयुर्वेद के उदय की कहानी है। हिरण्य प्रदेश की भूमि पर देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमारों ने वृद्ध और जर्जर च्यवन ऋषि को अपनी दिव्य औषधियों से पुनर्यौवन प्रदान किया था। च्यवन ऋषि की स्मृति में अश्विनी कुमारों ने जिस प्रथम औषधि अवलेह का निर्माण किया, उसे आज हम 'च्यवनप्राश' के नाम से जानते हैं। इसके निर्माण में यहाँ की जलवायु और विशेषकर सोन के तटीय क्षेत्रों में उगने वाले आंवले का विशेष महत्व था। हिरण्य प्रदेश की भौगोलिक स्थिति ने ही इसके इतिहास को आकार दिया है। यह क्षेत्र दो पवित्र नदियों के दोआब में स्थित होने के कारण कृषि और अध्यात्म दोनों के लिए श्रेष्ठ रहा।
प्राचीन काल में 'हिरण्यबाहु' का अर्थ है 'स्वर्ण के समान भुजाओं वाली'। इसके जल में स्वर्ण कणों की उपस्थिति के कारण इसे यह नाम मिला। आज भी स्थानीय लोग इसके पुराने मार्ग के अवशेषों को 'बह' कहकर पुकारते हैं। यह नदी केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि हिरण्य प्रदेश की व्यापारिक और सांस्कृतिक जीवनरेखा थी।भृगुरारी: यह स्थान पुनपुन और मदार नदी के संगम पर स्थित है। यहाँ महर्षि भृगु ने तपस्या की थी। आज भी यहाँ पितृ पक्ष के दौरान भारी भीड़ उमड़ती है, जिसे 'गया' के समान फलदायी माना जाता है। जम्भोर में बटाने और पुनपुन नदियों का संगम होता है। यह स्थान वैष्णव, शैव और शाक्त तीनों धाराओं के अनुयायियों के लिए पूजनीय है। हिरण्य प्रदेश के अंतर्गत अरवल जिले के करपी, अरवल, कलेर; कुरथा , वंशी , औरंगाबाद जिले के गोह, हसपुरा, ओबरा; पटना जिले के पालीगंज, विक्रम, मनेर फतुहा , दानापुर , पुनपुन प्रखंड और पलामू जिले का चंदवा क्षेत्र आता है।
हिरण्य प्रदेश ने संस्कृतियों का भारी संघर्ष और समन्वय देखा है। यहाँ जहाँ एक ओर 'देवा संस्कृति' (सौर, शाक्त, शैव , वैष्णव ) प्रचलित थी, वहीं दूसरी ओर असुर संस्कृति के अनुयायी पलोमा और पुलोमी भी इसी क्षेत्र में सक्रिय थे। पंच-संस्कृति का संगम हिरण्य प्रदेश वह दुर्लभ स्थान है जहाँ पाँच प्रमुख हिंदू धाराएं—सौर, शाक्त, शैव, ब्रह्म और वैष्णव—एक साथ पल्लवित हुईं। देवकुंड: यहाँ का दूधेश्वरनाथ मंदिर प्राचीन शैव और सौर उपासना का केंद्र है। करपी जगदंबा स्थान: यह शाक्त संस्कृति का प्राचीन गढ़ है, जहाँ माँ शक्ति की पूजा सदियों से अखंड है। मधुश्रवा और च्यवनेश्वर: ऋषि मधुश्रवा की तपोस्थली और च्यवनेश्वर शिवलिंग आज भी ऋषि परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।
इतिहास का मध्यकाल हिरण्य प्रदेश के लिए साहित्य और राजनीतिक परिवर्तनों का युग था।
सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल में यह क्षेत्र संस्कृत साहित्य का शिखर था। बाणभट्ट: विश्व प्रसिद्ध ग्रंथ 'कादंबरी' के रचयिता बाणभट्ट का संबंध इसी भूमि से था। मयूर भट्ट: 'चंडीशतक' के रचयिता मयूर भट्ट की नगरी 'मायर' थी। कालांतर में शमशेर खां ने इस स्थान का नाम बदलकर शमशेरनगर कर दिया। मुगल काल 1660 ई में इस क्षेत्र का सामरिक महत्व बढ़ा। दाउदनगर: मुगल सूबेदार गवर्नर ऑफ बिहार दाऊद खान ने इस नगर को बसाया, जो आज औरंगाबाद का प्रमुख व्यापारिक केंद्र है। अरवल और आलवी प्रदेश: 'है है आलवी यक्ष' ने अरवल नगर की स्थापना कर इसे अपनी राजधानी बनाया। पटना का पटनदेवी , अन्नपूर्णा , शीतला मंदिर , उलार का सूर्य मंदिर
सूफीवाद: सम्मान साहेब अरवल , अमझर शरीफ में हजरत सैय्यदना मोहम्मद जिलानी और मनेर शरीफ के संतों ने यहाँ हिंदू-मुस्लिम एकता और सूफी अध्यात्म की नई धारा प्रवाहित की।
हिरण्य प्रदेश का एक और गौरवशाली अध्याय यहाँ का प्राचीन कागज उद्योग है। अरवल का 'कागजी मोहल्ला' भारत के हस्तशिल्प इतिहास का एक अनमोल रत्न है। अरवली कागज' की तकनीक के कारीगर पुराने सूती चिथड़ों और सोन के जल से जो कागज बनाते थे, वह अपनी मजबूती के लिए प्रसिद्ध था। मुगल दरबार के सभी महत्वपूर्ण दस्तावेज इसी 'अरवली कागज' पर लिखे जाते थे। ब्रिटिश काल: स्पेनिश ट्रेडर, डॉन राफेल सालानो द्वारा इंडिगो फैक्ट्री की स्थापना 1840 ई में की । यूरोपीय अधिकारियों ने इस उद्योग के महत्व को समझा। सलोना स्टेट के दस्तावेजों में इस उद्योग के स्वर्ण युग का वर्णन मिलता है। सोन नहर के निर्माण ने इस क्षेत्र की कृषि और परिवहन व्यवस्था को और मजबूती दी।
हिरण्य प्रदेश की मिट्टी के नीचे दबे अवशेषों ने इतिहासकारों को आश्चर्यचकित किया है। बेलखारा शिलालेख (११९६ ई.) करपी प्रखंड के बेलखारा से प्राप्त संस्कृत शिलालेख भारत के संक्रमण काल का सबसे बड़ा प्रमाण है। यह शिलालेख उस समय की वीरता और धर्म के प्रति अडिगता को पत्थर पर उकेरता है। पंचतीर्थ , खटांगी , सच्चई ऐतिहासिक स्थल हैं।
लारी गढ़ से प्राप्त पालकालीन मूर्तियाँ और सती स्मारक इस क्षेत्र की कलात्मक श्रेष्ठता को दर्शाते हैं। यहाँ से मिली विष्णु और सूर्य की प्रतिमाएँ पाल शैली का उत्कृष्ट नमूना हैं। इसी प्रकार करपी, सच्चई और कुर्था के टीले प्राचीन गढ़ों और बौद्ध विहारों के साक्ष्य पेश करते हैं। हिरण्य प्रदेश की सबसे बड़ी सांस्कृतिक देन 'आरोग्य' है। कार्तिक शुक्ल पक्ष नवमी (अक्षय नवमी) का उत्सव यहाँ च्यवन ऋषि के नवजीवन की स्मृति में मनाया जाता है। आंवला वृक्ष की महत्ता और आयुर्वेद की संस्कृति यहाँ के जनजीवन के रोम-रोम में बसी है।
हिरण्य प्रदेश केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज एक नाम नहीं, बल्कि एक जीवंत विरासत है। सतयुग के च्यवन ऋषि से लेकर ब्रिटिश काल के कागजी मोहल्ले तक, इस भूमि ने हर काल में मानवता को कुछ न कुछ दिया है। लारी गढ़ की पालकालीन मूर्तियाँ, बेलखारा का शिलालेख, और सलोना स्टेट के दस्तावेज आज इस बात की मांग करते हैं कि इस 'हिरण्य सभ्यता' को पुनर्जीवित किया जाए और इसे विश्व धरोहर के रूप में मान्यता दिलाई जाए। ऋषि वत्स, बाणभट्ट और मधुश्रवा की यह तपोभूमि आज भी शोधार्थियों और अध्यात्म प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करती है। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम इस 'हिरण्य प्रदेश' के गौरव को आने वाली पीढ़ियों के लिए अक्षुण्ण बनाए रखें।
संदर्भ सूची: पुराण संदर्भ: वैवस्वत मनु वंशावली एवं च्यवन ऋषि कथा। पुरातात्विक साक्ष्य: बेलखारा शिलालेख (११९६ ई.) एवं लारी गढ़ उत्खनन रिपोर्ट। ऐतिहासिक ग्रंथ: कादंबरी (बाणभट्ट), चंडीशतक (मयूर भट्ट)।
प्रशासनिक रिकॉर्ड: सलोना स्टेट खतियान एवं गया डिस्ट्रिक्ट गजेटियर 1906,1957। हिरण्यबाहु (सोन) नदी के प्रवाह मार्ग और 'बह' का भौगोलिक अध्ययन।
कारुष प्रदेश: आदि-सांस्कृतिक उद्भव
भारतीय उपमहाद्वीप के मानचित्र पर गंगा, सोन और कर्मनाशा नदियों के मध्य स्थित भूभाग, जिसे प्राचीन काल में 'कारुष प्रदेश' कहा जाता था, केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं है। यह सभ्यता के उदय, ऋषि संस्कृति के विस्तार, असुर शक्तियों के दमन और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की चेतना का केंद्र रहा है। वैवस्वत मनु के पुत्र करुष से लेकर बाबू कुंवर सिंह की तलवार तक, यह प्रदेश निरंतर भारत की नियति को गढ़ता रहा है।
वैवस्वत मन्वंतर और करुष:- पुराणों के अनुसार, सृष्टि के वर्तमान चक्र 'वैवस्वत मन्वंतर' में राजा वैवस्वत मनु के नौ पुत्र हुए, जिनमें से एक का नाम करुष था। करुष ने जिस भूभाग पर अपना आधिपत्य स्थापित किया और जहाँ एक नई संस्कृति की नींव रखी, उसे 'कारुष' कहा गया। इससे पूर्व इस क्षेत्र को 'गांगेय प्रदेश' (गंगा की गोद में बसा क्षेत्र) के नाम से जाना जाता था। प्राचीन कारुष प्रदेश के मध्य में आधुनिक बिहार के बक्सर, भोजपुर, रोहतास, कैमूर और उत्तर प्रदेश का गाजीपुर जिला शामिल था। इसकी सीमाओं को दक्षिण में कैमूर पर्वत समूह और पश्चिम में कर्मनाशा नदी सुरक्षित करती थी। यह क्षेत्र अपनी उर्वरता और सामरिक स्थिति के कारण 'देवों' और 'मानवों' के आकर्षण का केंद्र रहा। कर्मनाशा नदी है ।
कारुष प्रदेश का हृदय स्थल बक्सर (व्याघ्रसर) महर्षि विश्वामित्र की तपोभूमि 'सिद्धाश्रम' के रूप में विख्यात हुआ। यहाँ ऋषि संस्कृति ने अपने ज्ञान और विज्ञान को विकसित किया था । त्रेतायुग में यह क्षेत्र 'मलद और करुष' नामक दो जनपदों में विभक्त था, जहाँ ताड़का और सुबाहु जैसे राक्षसों का आतंक था। यह 'राक्षस संस्कृति' वस्तुतः उस विचारधारा का प्रतीक थी जो यज्ञों और ऋषि-ज्ञान में बाधा डालती थी। मर्यादा पुरुषोत्तम राम और लक्ष्मण का इस क्षेत्र में आगमन भारतीय इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था। अहिल्या उद्धार: गौतम आश्रम (अहिरौली) में राम ने पत्थर बन चुकी अहिल्या का उद्धार कर सामाजिक न्याय की स्थापना की। ताड़का वध: बक्सर की भूमि पर राम ने अधर्म की प्रतीक ताड़का का वध किया, जो असुर संस्कृति के अंत और आर्य संस्कृति के विजय का उद्घोष था।
सूर्यवंशी राजा हरिश्चंद्र के पुत्र रोहिताश्व ने इस क्षेत्र को सैन्य शक्ति प्रदान की। उन्होंने कैमूर की दुर्गम पहाड़ियों पर रोहतासगढ़ किले का निर्माण कराया। यह किला आज भी प्राचीन इंजीनियरिंग का चमत्कार माना जाता है, जो सदियों तक अजेय रहा।
मध्यकाल के आगमन पर, धार के परमार राजा भोज ने इस क्षेत्र के मैदानी भागों को नई पहचान दी।भाषाई पहचान: राजा भोज के नाम पर इस क्षेत्र का नाम 'भोजपुर' पड़ा और यहाँ की बोली 'भोजपुरी' के रूप में विश्वविख्यात हुई।
स्थापत्य: बेलाउर का सूर्य मंदिर और अन्य धार्मिक संरचनाएं राजा भोज की सांस्कृतिक दूरदर्शिता के प्रमाण हैं।
कारुष प्रदेश की भूमि 'शक्ति' और 'शिव' के उपासकों का संगम रही है। यहाँ के प्रमुख धार्मिक स्थल न केवल आस्था के केंद्र हैं, बल्कि स्थापत्य कला के उत्कृष्ट नमूने भी हैं: ब्रह्मेश्वर नाथ (ब्रह्मपुर): बक्सर का यह मंदिर पौराणिक काल से 'पंचकोशी परिक्रमा' का मुख्य पड़ाव रहा है। गुप्ताधाम (रोहतास): कैमूर की कंदराओं में स्थित यह गुप्त महादेव का मंदिर चूना पत्थर की प्राकृतिक गुफाओं का अद्भुत उदाहरण है। माँ तुतला भवानी: रोहतास में जलप्रपात के मध्य स्थित यह शक्तिपीठ प्रकृति और धर्म के सुंदर समन्वय को दर्शाता है। मुंडेश्वरी मंदिर (भभुआ): इसे भारत का सबसे प्राचीन 'जीवित मंदिर' माना जाता है, जहाँ गुप्तकालीन कला के साक्ष्य आज भी मिलते हैं।
मुगलकाल में सासाराम शेरशाह सूरी की शक्ति का केंद्र बना। शेरशाह ने यहाँ से न केवल प्रशासनिक सुधार (जैसे लगान व्यवस्था) शुरू किए, बल्कि 'ग्रैंड ट्रंक रोड' के माध्यम से इस क्षेत्र को वैश्विक व्यापारिक मार्ग से जोड़ दिया।
कारुष प्रदेश की मिट्टी में पौरुष कूट-कूट कर भरा है। जगदीशपुर के बाबू कुंवर सिंह ने ८० वर्ष की आयु में आरा, बक्सर और सासाराम के क्रांतिकारियों को संगठित कर ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी। कैमूर की पहाड़ियाँ और नोखा-विक्रमगंज के मैदान क्रांतिकारियों के लिए गुरिल्ला युद्ध के अजेय क्षेत्र बन गए। बक्सर का उत्खनन से प्राप्त मौर्यकालीन और गुप्तकालीन टेराकोटा की मूर्तियाँ और मृदभांड (Pottery) यह सिद्ध करते हैं कि यहाँ की सभ्यता अत्यंत विकसित थी। कैमूर के शैलचित्र: की पहाड़ियों में स्थित प्रागैतिहासिक गुफा चित्र यह बताते हैं कि वैवस्वत मन्वंतर से भी पहले यहाँ मानव बसावट थी। रोहतासगढ़ की सुरंगें, सासाराम के अवशेष और बेलाउर जैसे प्राचीन मंदिरों को पुरातात्विक संरक्षण की नितांत आवश्यकता है। बिहार—जिसमें आरा, सासाराम, बक्सर और भभुआ जैसे जिले शामिल हैं—प्राचीन कारुष प्रदेश की विरासत को ही आगे बढ़ा रहा है।शिक्षा और साहित्य: विक्रमगंज, पिरो और नोखा जैसे नगर अब शिक्षा के बड़े केंद्र हैं। कृषि और उद्योग: सोन नदी की नहरों ने इस क्षेत्र को बिहार का 'अन्न भंडार' बना दिया है। कारुष प्रदेश का इतिहास यह सिखाता है कि भूगोल बदल सकता है, लेकिन संस्कृति की धारा निरंतर प्रवाहित होती रहती है। विश्वामित्र का ज्ञान, राम का मर्यादा-पथ, रोहिताश्व की दृढ़ता, राजा भोज की विद्वत्ता और कुंवर सिंह की वीरता—ये सभी तत्व मिलकर 'कारुष की आत्मा' का निर्माण करते हैं।
संदर्भ सूची: श्रीमद्भागवत पुराण एवं वायु पुराण (कारुष वंश वर्णन) वाल्मीकि रामायण (बालकांड - विश्वामित्र आश्रम प्रसंग) भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण - बक्सर एवं रोहतास उत्खनन रिपोर्ट स्थानीय लोकगाथाएं एवं ऐतिहासिक अभिलेख (कुंवर सिंह गाथा) , शेरशाह सूरी और मध्यकालीन बिहार के प्रशासनिक दस्तावेज ।
कीकट से मगध तक: एक महासभ्यता का उदय
प्राचीन भारतीय वांग्मय में मगध के प्रारंभिक स्वरूप को 'कीकट' प्रदेश के रूप में जाना गया है। ऋग्वेद (1.53.14) में कीकट का उल्लेख मिलता है, जहाँ इसे एक ऐसे प्रदेश के रूप में वर्णित किया गया है जिसकी अपनी विशिष्ट संस्कृति थी। यह क्षेत्र भौगोलिक रूप से पुनपुन और फल्गु नदी के मध्य स्थित था। वैवस्वत मन्वंतर के कालखंड में, यह क्षेत्र न केवल राजनीतिक सत्ता का केंद्र बना, बल्कि यह ब्रह्मांडीय चेतना और पितृ-तर्पण का वैश्विक केंद्र भी बना। गयासुर जैसे असुर राजाओं की भक्ति और ऋषियों के तप ने इस भूमि को 'मोक्षदायिनी' बना दिया है।
गयासुर का पौराणिक वंशवृक्ष और आध्यात्मिक प्रभाव - राजा गयासुर का व्यक्तित्व विरोधाभासों और महानता का अद्भुत संगम है। वे असुर कुल के थे, परंतु उनकी चेतना शुद्ध वैष्णव थी। गयासुर का संबंध वैवस्वत मनु के वंश से है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार:: वैवस्वत मनु की पुत्री इला और बुध (चंद्रमा और तारा के पुत्र) के संसर्ग से उत्पन्न वंश परंपरा में गयासुर का उदय हुआ। भक्ति का स्वरूप: गयासुर ने कठोर तपस्या द्वारा भगवान विष्णु को प्रसन्न किया। उनका शरीर इतना पवित्र हो गया कि उनके दर्शन मात्र से पापी से पापी व्यक्ति भी स्वर्ग जाने लगा। पितृपक्ष और गयासुर का वरदान -जब यमराज ने धर्म के संतुलन के बिगड़ने की शिकायत की, तब भगवान विष्णु ने गयासुर के वक्ष स्थल पर अपने चरण रखकर उन्हें स्थिर किया। गयासुर ने अपनी देह को यज्ञ की वेदी बना दिया। इसके बदले उन्होंने दो वरदान मांगे:यह क्षेत्र 'गया' के नाम से जाना जाए।अश्विन कृष्ण प्रतिपदा से अमावस्या तक की अवधि 'पितृपक्ष' कहलाए, जिसमें किया गया तर्पण पितरों को मोक्ष प्रदान करे।
कीकट प्रदेश की नदियाँ केवल जलमार्ग नहीं हैं; वे 'पितृ-मार्ग' और 'देव-मार्ग' हैं। फल्गु नदी: गुप्त गंगा का रहस्य फल्गु नदी का निर्माण दो धाराओं के मिलन से होता है: निलांजन (निरंजना): इसे 'पूर्वा फाल्गुनी' कहा गया है। मोहाना: इसे 'उत्तरा फाल्गुनी' कहा गया है। इन दोनों के संगम के बाद इसे फल्गुनी या फल्गु कहा जाता है। सीता जी के श्राप के कारण यह नदी 'अंतःसलिला' (जमीन के नीचे बहने वाली) हो गई, इसीलिए इसे 'गुप्त गंगा' भी कहा जाता है।पुनपुन नदी को 'आदि-गंगा' और पितृ नदी माना गया है। गया श्राद्ध की शुरुआत अक्सर पुनपुन के तट से ही होती है। इसके अतिरिक्त, इस क्षेत्र में आद्री, मदार, धावा, पैमार, तिलैया, सकरी, मोरहर और दरधा जैसी नदियों का जाल है, जो इस भू-भाग की कृषि और आध्यात्मिक उर्वरता का आधार हैं।
कीकट प्रदेश पर्वतों से घिरा एक प्राकृतिक दुर्ग रहा है। इन पर्वतों का अपना आध्यात्मिक इतिहास है। ब्रह्मयोनि समूह ब्रह्मयोनि, भस्म पहाड़ी, डूंगरी यहाँ ब्रह्मा जी ने सृष्टि के निमित्त यज्ञ किया था। रामशिला-प्रेतशिला रामशिला, प्रेतशिला, कटारी पितृ दोष निवारण और पिण्डदान के प्रमुख स्थल। बराबर समूह कौवाडोल, नागार्जुन, मुरली मौर्यकालीन गुफाएं और आजीवक संप्रदाय का केंद्र।राजगीर समूह सतघरवा, बाजारी, लोहरवा, सोंगा, थारी सामरिक दृष्टि से अभेद्य, मगध की प्राचीन रक्षा पंक्ति है।
ऋषि पर्वत श्रृंगी ऋषि, पवई, पचार, लोमश गिरी महान ऋषियों के निवास और तपस्या स्थल है। कीकट प्रदेश में केवल राजाओं का शासन नहीं था, बल्कि ऋषियों का 'ज्ञान-शासन' था। प्रमुख ऋषि: लोमश, दुर्वासा, गौतम, उर्वेला, ध्रुव और काकभुसुंडि ने यहाँ आश्रम स्थापित किए। उपासना के केंद्र: * विष्णुपद: जहाँ भगवान के चरण साक्षात् विद्यमान हैं। मंगलागौरी और सीताकुंड: शक्ति और सतीत्व के प्रतीक। सूर्य मंदिर: प्रातःकालीन, मध्याह्न और संध्याकालीन सूर्य की त्रिकाल उपासना। अक्षयवट: वह अमर वृक्ष जो प्रलय काल में भी नष्ट नहीं होता है।
सत्ता का हस्तांतरण एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना थी। अंग प्रदेश के राजा बेन के मंथन से उत्पन्न राजा मागध ने इस क्षेत्र की बागडोर संभाली राजा मागध ने ही इस क्षेत्र का नाम 'मगध' रखा। उनके वंशज राजा वसु ने मगध की सीमाओं को विस्तार दिया और अपनी राजधानी को गया के खुले मैदानों से हटाकर राजगीर की सुरक्षित पहाड़ियों के बीच स्थापित किया। राजा वसु के काल में हुए 'ब्रह्मेष्ठि यज्ञ' में 31 कोटि देवताओं (12 आदित्य, 8 वसु, 11 रुद्र) के शामिल होने की कथा यहाँ के सांस्कृतिक वैभव को दर्शाती है। राजगीर (गिरिव्रज) ने शताब्दियों तक मगध की रक्षा की। जरासंध के पराक्रम और अजातशत्रु की महत्वाकांक्षा ने मगध को भारत की महाशक्ति बना दिया। अंततः, राजा उदयन ने जल-दुर्ग के सामरिक महत्व को समझा और गंगा, सोन एवं पुनपुन के संगम पर पाटलिपुत्र नगर की नींव रखी थी ।
मगध की सबसे बड़ी विशेषता इसका समन्वयवाद था। यहाँ सनातन धर्म की सभी शाखाएं (शैव, वैष्णव, शाक्त) फली-फूलीं। यहीं पर 'वृक्ष संस्कृति' (वट, पीपल, पलास) का विकास हुआ। यही वह भूमि थी जहाँ भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ और भगवान महावीर का निर्वाण हुआ है। कीकट प्रदेश से शुरू होकर मगध साम्राज्य के पाटलिपुत्र तक की यह यात्रा भारत के 'आध्यात्मिक लोकतंत्र' और 'राजनीतिक एकीकरण' की कहानी है। गयासुर का त्याग जहाँ व्यक्ति को मोक्ष की ओर ले जाता है, वहीं मगध के राजाओं का पुरुषार्थ समाज को स्थिरता प्रदान करता है। आज भी गया की नदियाँ और राजगीर के पहाड़ उस महान विरासत की गवाही देते हैं, जिसने भारत को विश्व के मानचित्र पर 'सोने की चिड़िया' और 'विश्वगुरु' के रूप में स्थापित किया। मगध साम्राज्य में चाणक्य आर्यभट्ट आर्यभट्ट , नागार्जुन , चंद्रगुप्त अशोक की कर्मस्थली रही है ।
संदर्भ - वायु पुराण: गरुड़ पुराण , गया माहात्म्य खंड (गयासुर और पितृ तर्पण का विवरण)। ऋग्वेद: मंडल 1, सूक्त 53 (कीकट प्रदेश का प्राचीनतम उल्लेख)। महाभारत: सभा पर्व (जरासंध और राजगीर का वर्णन)। श्रीमद्भागवत पुराण: राजा बेन और मागध की उत्पत्ति। ऐतिहासिक साक्ष्य: कनिंघम की रिपोर्ट और मगध के पुरातात्विक उत्खनन। स्थानीय लोकश्रुति: फल्गु और पुनपुन नदी के संगम का मौखिक इतिहास। डिस्ट्रिक्ट गजेटियर गया 1906 ,1957
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