महाकाल की नगरी में आध्यात्मिक अमृत
सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारतीय संस्कृति में तीर्थाटन का अर्थ केवल घूमना नहीं, बल्कि अपनी जड़ों और आध्यात्मिक चेतना से जुड़ना है। इसी पावन संकल्प के साथ हमने मध्यप्रदेश की प्राचीन नगरी उज्जैन (अवंतिका) की यात्रा की रूपरेखा बनाई। बिहार के मगध क्षेत्र (जहानाबाद एवं गया) की ज्ञान भूमि से निकलकर बाबा महाकाल की शरण में जाने का उत्साह शब्दों से परे था। इस यात्रा में मेरे साथ स्वर्णिम कला केंद्र की अध्यक्षा डॉ. ऊषा किरण श्रीवास्तव, जीवनधारा नमामि गंगे बिहार की उपाध्यक्ष डॉ. संगीता सागर , भारतीय जीवन बीमा मुजफ्फरपुर के पदाधिकारी श्री अजय कुमार एवं भारतीय जीवन बीमा मुजफ्फरपुर के उच्च स्तरीय सहायक कुमुद सिंहा जैसे प्रबुद्ध साथी थे, जिनकी उपस्थिति ने इस यात्रा को एक बौद्धिक और सांस्कृतिक विमर्श का रूप दे दिया।
बिहार से मालवा की ओर १४ अप्रैल २०२६ को हमारी यात्रा का प्रथम चरण शुरू हुआ। जहानाबाद से मुजफ्फरपुर तक की दूरी हमने विभिन्न साधनों से तय की और शाम ७ बजे मुजफ्फरपुर पहुँचे। यहाँ रात्रि विश्राम के उपरांत, १५ अप्रैल की सुबह ६ बजे हम मुजफ्फरपुर रेलवे स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस में सवार हुए। रेल की खिड़की से बदलते परिदृश्य और साथ में चल रहे संवादों ने सफर को जीवंत बनाए रखा। १६ अप्रैल की शाम ४:३० बजे जब ट्रेन उज्जैन जंक्शन पहुँची, तो हवा में बिखरी भस्म और लोबान की महक ने बता दिया कि हम काल के अधिपति की नगरी में आ चुके हैं। मौनी आश्रम (मौन तीर्थ) उज्जैन पहुँचते ही हमारा पड़ाव बना मौनी आश्रम। शिप्रा नदी के तट पर स्थित यह स्थान अपनी शांति और एकांत के लिए विख्यात है। १६ से १८ अप्रैल तक यहाँ प्रवास के दौरान हमने पाया कि यह केवल एक आश्रम नहीं, बल्कि अंतर्मन की यात्रा का केंद्र है। आश्रम परिसर में मोर की गूँज, चारों ओर वृक्षों के झुरमुट और समीप ही कल-कल बहती शिप्रा नदी एक ऐसा वातावरण निर्मित करती है जहाँ शब्द स्वतः मौन हो जाते हैं। यहाँ का 'मौन तीर्थ' साधकों के लिए तपस्थली है, जिसने हमारी थकान को आध्यात्मिक ऊर्जा में बदल दिया।
उज्जैन का ऐतिहासिक और पौराणिक वैभव का १७ अप्रैल की सुबह हमारे भ्रमण का मुख्य केंद्र थी। उज्जैन, जिसे इतिहास में अवंतिका, विशाला, उज्जयिनी, पद्मावती और कनकश्रृंगा जैसे अनेक नामों से विभूषित किया गया है, भारत की सात पवित्रतम पुरियों (सप्तपुरियों) में से एक है। यह नगरी सम्राट विक्रमादित्य के न्याय, महाकवि कालिदास की अमर रचनाओं और खगोल विज्ञान के प्राचीन केंद्र के रूप में विश्वविख्यात है। यहाँ से कर्क रेखा गुजरती है, जो इसे ब्रह्मांडीय गणनाओं का केंद्र बनाती है।
महाकाल दर्शन: काल के स्वामी का सान्निध्य में सुबह ६ बजे हमने श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन किए। १२ ज्योतिर्लिंगों में महाकाल का स्थान अद्वितीय है क्योंकि यह एकमात्र 'दक्षिणमुखी' ज्योतिर्लिंग है। शास्त्रों में दक्षिण दिशा मृत्यु की दिशा मानी गई है, और महाकाल मृत्यु के भी काल हैं। मंदिर के गर्भगृह की दिव्यता और भस्म आरती की ऊर्जा ने रोम-रोम को पुलकित कर दिया।
हमारी यात्रा का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव था सांदीपनी मुनि आश्रम। यह वह भूमि है जहाँ साक्षात भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और उनके सखा सुदामा ने ६४ कलाओं और १४ विद्याओं की शिक्षा ग्रहण की थी। आश्रम में स्थित अंकपात वह स्थान है जहाँ श्रीकृष्ण अपनी स्लेट (पाटी) धोया करते थे। यहाँ गुरु सांदीपनी द्वारा स्थापित सर्वेश्वर महादेव के दर्शन हुए, जहाँ नंदी जी की खड़ी प्रतिमा एक दुर्लभ दृश्य प्रस्तुत करती है। इसके बाद हम काल भैरव मंदिर पहुँचे। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार काल भैरव उज्जैन के सेनापति या नगर रक्षक हैं। यहाँ भगवान को मदिरा का भोग लगाने की परंपरा सदियों पुरानी है, जो आज भी कौतूहल और श्रद्धा का विषय बनी हुई है।
मंगलनाथ और खगोल विज्ञान शिप्रा के तट पर स्थित मंगलनाथ मंदिर को मंगल ग्रह की जन्मस्थली माना जाता है। भौगोलिक दृष्टि से यह स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ की 'भात पूजा' विशेष फलदायी मानी जाती है। हमने वहाँ के प्राचीन महत्व और मत्स्य पुराण में वर्णित कथाओं का स्मरण किया ।चिंतामणि गणेश: माता सीता द्वारा स्थापित षट् विनायकों में से एक, जहाँ श्रद्धालु अपनी चिंताओं के निवारण हेतु आते हैं। पास ही स्थित ८० फीट गहरी लक्ष्मण बावड़ी ऐतिहासिक इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट उदाहरण है।।गढ़ कालिका और हरसिद्धि: ५१ शक्तिपीठों में से एक गढ़ कालिका और सम्राट विक्रमादित्य की आराध्य देवी हरसिद्धि माता के मंदिर में शक्ति की प्रचंड उपस्थिति का अनुभव हुआ।।भर्तृहरि गुफाएं: राजा भरथरी, जिन्होंने राजपाठ त्यागकर वैराग्य अपनाया, उनकी तपस्थली ने हमें जीवन की नश्वरता और ज्ञान की महत्ता का बोध कराया है।
मालवा का स्वाद और सांस्कृतिक आनंद भ्रमण के दौरान भोजन का आनंद भी अद्भुत रहा। साईं भोजन आश्रम में हमने मालवा के पारंपरिक व्यंजनों का रसास्वादन किया। दाल-बाटी, चूरमा, चावल, ताजी छाछ और लड्डू—इस सात्विक और स्वादिष्ट भोजन ने यात्रा के आनंद को पूर्ण कर दिया। सांस्कृतिक गतिविधियों का अवलोकन करते हुए हमने स्थानीय कला और लोक जीवन को करीब से देखा । मौनी आश्रम में आश्रम में अध्ययन रत शिक्षार्थियों एवं कर्मचारियों द्वारा जलपान एवं भोजन करने और समर्पण का अनुभव साथ ही संध्या आरती में आध्यात्म में सराबोर हुआ । हनुमान जी , राम लक्ष्मण जानकी , जगन्नाथ , कल्पवृक्ष , नवग्रह की मूर्तियों का दर्शन कर मन को आध्यात्मिक रुप में आत्म विभोर कर दिया ।ही
शिप्रा नदी केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि उज्जैन की जीवनधारा है। इसके रामघाट पर हर १२ वर्ष में होने वाला सिंहस्थ कुंभ विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक समागम है। जीवनधारा नमामि गंगे के सदस्यों के रूप में हमारे लिए शिप्रा का संरक्षण और उसकी स्वच्छता का अवलोकन करना एक नैतिक जिम्मेदारी की तरह था। नदी के किनारे बने मंदिर और घाट भारतीय स्थापत्य कला की श्रेष्ठता को दर्शाते हैं। एक नई चेतना के साथ वापसी १८ अप्रैल को जब हमारी यह यात्रा पूर्ण हुई, तो हमारे पास केवल चित्रों का संग्रह नहीं, बल्कि अनुभवों का एक महासागर था। उज्जैन की गलियों में इतिहास बोलता है और उसके मंदिरों में श्रद्धा सांस लेती है। मुजफ्फरपुर से उज्जैन तक का यह सफर अध्यात्म, शिक्षा, इतिहास और संस्कृति का एक अनूठा सम्मिश्रण रहा। इस प्रवास ने यह सिद्ध कर दिया कि ज्ञान और भक्ति जब मिलते हैं, तो जीवन स्वयं एक तीर्थ बन जाता है। महाकाल की इस नगरी से हमने यह सीख ली कि 'काल' (समय) निरंतर है, और हमारी यात्रा उसी अनंत के साथ एकाकार होने का एक लघु प्रयास है।
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