रामायण की आधारशिला: देवी शांता और ऋषि श्रृंगी
सत्येन्द्र कुमार पाठक
वाल्मीकि रामायण और उत्तरवर्ती राम-कथाओं में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का चरित्र केंद्रबिंदु है, किंतु इस विशाल वटवृक्ष का बीज जिस त्याग और आध्यात्मिक शक्ति से अंकुरित हुआ, वह नाम है— देवी शांता। राजा दशरथ की ज्येष्ठ पुत्री और श्री राम की बड़ी बहन शांता का जीवन केवल एक राजकुमारी की कहानी नहीं है, बल्कि यह उत्तर भारत के राजवंशों और मध्य-पूर्व भारत की ऋषि परंपरा के बीच एक जीवंत सेतु है। उनके पति, ऋषि श्रृंगी, उस काल के अद्वितीय तपस्वी थे, जिनके यज्ञ प्रताप से इक्ष्वाकु वंश का उत्तराधिकार सुरक्षित हुआ।
अयोध्या से अंग देश तक का सफर - देवी शांता का जन्म अयोध्या के महाराज दशरथ और माता कौशल्या की प्रथम संतान के रूप में हुआ। वे विलक्षण प्रतिभा की धनी और वेदों में निष्णात थीं। मैत्री और वचन का पालन: अयोध्या के पड़ोसी और दशरथ के घनिष्ठ मित्र अंग देश के राजा रोमपाद और उनकी पत्नी एवं माता कौशल्या की बहन वर्षिणी संतानहीन थे। अपने मित्र और बहन के जीवन के सूनेपन को दूर करने के लिए अयोध्या राजा दशरथ ने अपनी प्राणप्रिय पुत्री शांता को उन्हें गोद दे दिया। प्राचीन काल में पुत्र और पुत्री में कोई भेद नहीं था और एक पुत्री ने अपने पिता के वचन और मित्रता की मर्यादा रखने के लिए सहर्ष अपना राजमहल त्याग दिया।
ऋषि श्रृंगी: विलक्षण जन्म और अजेय तपस्या - ऋषि श्रृंगी (ऋष्यश्रृंग) का व्यक्तित्व पौराणिक साहित्य में अत्यंत विशिष्ट है। उनके पिता महर्षि विभाण्डक थे, जिन्होंने कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए उन्हें घने वनों में पाला था। पौराणिक उत्पत्ति: विभाण्डक ऋषि के तप से भयभीत होकर देवराज इंद्र ने अप्सरा उर्वशी को भेजा था, जिसके बाद श्रृंगी ऋषि का जन्म हुआ। एक अन्य मान्यता के अनुसार उनका जन्म मृगी के गर्भ से हुआ था, जिसके कारण उनके मस्तक पर एक सींग (शृंग) था। प्रकृति पर विजय: ऋषि श्रृंगी के तप का प्रभाव ऐसा था कि उनके चरणों के स्पर्श मात्र से प्रकृति अपना स्वभाव बदल लेती थी। उनके इसी प्रभाव के कारण अंग देश को भयंकर अकाल से मुक्ति मिली और राजा रोमपाद ने अपनी दत्तक पुत्री शांता का विवाह उनसे कर दिया है।
जब अयोध्या के राजा दशरथ संतान न होने के कारण ग्लानि और चिंता में डूबे थे, तब महर्षि वशिष्ठ ने ऋषि श्रृंगी के आह्वान का सुझाव दिया। शांता ने अपने पति ऋषि श्रृंगी को अयोध्या चलने और अपने पिता के कुल की रक्षा के लिए यज्ञ करने को प्रेरित किया। यज्ञ का फल: अयोध्या में सरयू तट पर हुए 'पुत्रकामेष्टि यज्ञ' की आहुतियों से जो दिव्य चरु (खीर) प्रकट हुआ, उसी के अंश से श्री राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म हुआ। इस प्रकार, शांता न केवल राम की बहन थीं, बल्कि उनके अवतार की मार्गदर्शिका भी बनी ।
ऋषि श्रृंगी और शांता का पदचिह्न बिहार और झारखंड के कण-कण में अंकित है। लखीसराय (ऋषि श्रृंगी धाम): बिहार के लखीसराय जिले के चंडीस्थान के पास पहाड़ियों में स्थित यह स्थल श्रृंगी ऋषि की मुख्य साधना स्थली माना जाता है। यहाँ की पहाड़ियों पर बना मंदिर और कल-कल बहता जलप्रपात आज भी उनकी उपस्थिति का आभास कराता है। मुंगेर और भागलपुर: यह प्राचीन अंग प्रदेश का हृदय स्थल है। मुंगेर के वनों में विभाण्डक ऋषि का आश्रम था और भागलपुर के निकट चंपापुरी में शांता का पालन-पोषण हुआ। यहाँ के लोकगीतों में आज भी शांता के त्याग और श्रृंगी ऋषि द्वारा वर्षा कराने के प्रसंग मिलते हैं। बाँका और देवघर: मन्दार पर्वत से लेकर बैद्यनाथ धाम तक के क्षेत्र में ऋषियों का विचरण क्षेत्र रहा है। मान्यता है कि अंग से अयोध्या की यात्रा के दौरान ऋषि श्रृंगी ने इन तपोभूमियों पर विश्राम किया था। गया और नवादा: मगध का यह क्षेत्र मोक्ष और ज्ञान की भूमि है। नवादा की कौआकोल पहाड़ियों को कई विद्वान श्रृंगी ऋषि की एकांत साधना से जोड़कर देखते हैं।
छत्तीसगढ़ (सिहावा पर्वत) और महानदी का आध्यात्मिक नाता में छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में स्थित सिहावा पर्वत श्रृंगी ऋषि और देवी शांता की सबसे प्रमुख कर्मभूमि मानी जाती है। , महानदी का उद्गम ऋषि श्रृंगी के कमंडल से हुआ है। यहाँ शांता और श्रृंगी ऋषि का प्राचीन मंदिर है, जो वनवासी संस्कृति और सनातन परंपरा के मिलन का केंद्र है। साधना का केंद में गृहस्थ जीवन के बाद ऋषि श्रृंगी और शांता ने इसी शांत वन क्षेत्र में अपनी अंतिम साधना की थी। उत्तर से दक्षिण तक देवी शांता और ऋषि श्रृंगी की पहचान क्षेत्रीय सीमाओं को पार कर चुकी है। हिमाचल प्रदेश (कुल्लू): हिमाचल में उन्हें वर्षा के देवता और कुलदेवता के रूप में पूजा जाता है। कुल्लू के बंजार में उनका ऐतिहासिक मंदिर है । रामायण सर्किट के माध्यम से इन स्थलों को वैश्विक पर्यटन और शोध से जोड़ा जा रहा है। भारत के अलावा श्रीलंका और नेपाल में भी शांता को एक "सांस्कृतिक कड़ी" के रूप में मान्यता प्राप्त है, जिन्होंने रघुकुल के विस्तार में अदृश्य भूमिका निभाई। समन्वय की अधिष्ठात्री शांता का चरित्र तीन स्तरों पर समन्वय स्थापित करता है:। उन्होंने दो राज्यों (अयोध्या और अंग) के संबंधों को प्रगाढ़ किया। उन्होंने एक कठोर तपस्वी को लोक कल्याण के लिए सामाजिक उत्तरदायित्वों से जोड़ा। उनके और उनके पति के नाम पर स्थित मंदिर उत्तर में कुल्लू से लेकर, पूर्व में मगध-अंग और मध्य में छत्तीसगढ़ तक फैले हैं, जो भारत की सांस्कृतिक अखंडता को दर्शाते हैं
देवी शांता रामायण की वह 'अघोषित' महानायिका हैं, जिन्होंने स्वयं को नेपथ्य में रखा ताकि भगवान श्री राम का प्राकट्य हो सके और धर्म की स्थापना हो सके। आज जब हम अयोध्या में श्री राम लला के दर्शन करते हैं, तो हमें उस महान बहन और उनके तेजस्वी ऋषि पति के प्रति भी कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए, जिन्होंने अपने तप और त्याग से इस महान गाथा की आधारशिला रखी है।
संदर्भ - वाल्मीकि रामायण, क्षेत्रीय गजेटियर (बिहार-छत्तीसगढ़), स्थानीय लोक गाथाएं और पौराणिक शोध लेख।
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