हरिद्वार - सनातन धर्म संस्कृति की आत्मा का भूगोल
सत्येंद्र कुमार पाठक
हरिद्वार केवल एक शहर नहीं है। यह भारत की आत्मा का भूगोल है। नक्शे पर यह उत्तराखंड के हरिद्वार जिले का 2360 वर्ग किमी का एक जिला है, पर चेतना के नक्शे पर यह वह बिंदु है जहाँ हिमालय समाप्त होता है और भारत शुरू होता है। जहाँ शिवालिक पर्वत मैदान को प्रणाम करता है और गंगा पहाड़ों की गोद छोड़कर पहली बार मैदान में उतरती है। इसीलिए इसका नाम हरिद्वार है - हरि का द्वार, हर का द्वार।
29 अगस्त 2026 से 2 सितंबर 2026 तक मुझे यह सौभाग्य मिला कि मैं हरिद्वार को एक यात्री की तरह नहीं, एक इतिहासकार की तरह देख सकूँ। यह केवल मंदिर दर्शन नहीं था, यह चेतना की यात्रा थी। इस यात्रा में मेरे साथ अलग-अलग पड़ावों पर मेरे सहयात्री रहे, जिन्होंने इस यात्रा को और समृद्ध किया ।
हरिद्वार - जहाँ आत्मा को चेतना मिलती है (29 अगस्त 2026) - अग्रसेन घाट, हंस घाट, हर की पौड़ी और अवधूत आश्रम । 29 अगस्त 2026 की सुबह हम अवधूत आश्रम में थे। अवधूत आश्रम हरिद्वार का वह केंद्र है जहाँ पुस्तकें भी गंगा हैं। यहाँ हमने गंगा जल को अंजुली में लेकर बाबा शिवलिंग पर जलाभिषेक किया। "अंजुली का जल अहंकार को धो देता है।" यह बात मेरे मन में बैठ गई। जब हम लोटे से जल चढ़ाते हैं तो हम बड़े बन जाते हैं, दाता बन जाते हैं, पर जब अंजुली से जल चढ़ाते हैं तो हम छोटे, विनम्र, याचक बन जाते हैं। और शिव को विनम्रता ही प्रिय है।
हरिद्वार का इतिहास मन्वंतर काल से शुरू होता है। जिसे आज हम हर की पौड़ी / हरि की पौड़ी कहते हैं, उसका पहला नाम ब्रह्मकुंड था। पुराणों के अनुसार राजा श्वेत ने यहाँ ब्रह्मा जी की घोर तपस्या की थी। ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए और वरदान दिया कि यह स्थान हरि के नाम से जाना जाएगा। इसलिए एक ही स्थान के दो नाम हैं - हर की पौड़ी यानी शिव की पौड़ी और हरि की पौड़ी यानी विष्णु की पौड़ी। शैव और वैष्णव का ऐसा संगम और कहीं नहीं है।
ऐतिहासिक तथ्य यह है कि इसका निर्माण उज्जैन के सम्राट राजा विक्रमादित्य ने अपने भाई भर्तृहरि की याद में पहली शताब्दी ईसा पूर्व में करवाया था। यहाँ आज भी शिला पर भगवान विष्णु के चरण चिह्न अंकित हैं, जिन्हें हरि चरण कहते हैं। समुद्र मंथन की कथा के अनुसार जब धन्वंतरि अमृत कलश लेकर जा रहे थे, तो अमृत की चार बूंदें चार जगह गिरीं - हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक। इसलिए यहाँ कुंभ होता है। 29 अगस्त की संध्या को जब हम डॉ. संगीता सागर, ममता शर्मा और त्रिलोक चंद जी के साथ हर की पौड़ी पर स्नान कर रहे थे, तो लगा जैसे हम केवल 2026 में नहीं, बल्कि उस क्षण में भी हैं जब अमृत गिरा था। वह जल केवल जल नहीं था, वह समय था। उसी दिन हमने दो और घाटों के दर्शन किए - महाराजा अग्रसेन घाट और हंस घाट।
महाराजा अग्रसेन घाट आधुनिक भारत के सामाजिक इतिहास का प्रतीक है। महाराजा अग्रसेन ने 5000 साल पहले एक रुपया और एक ईंट का सिद्धांत दिया था - हर नया बसा व्यक्ति समाज को एक रुपया और एक ईंट देगा, ताकि कोई भी गरीब न रहे। उसी सिद्धांत पर यह घाट बना है। यहाँ कोई पंडा नहीं, कोई शुल्क नहीं, कोई वीवी आई व्यवस्था नहीं। यह सेवा का घाट है। निःशुल्क चेंजिंग रूम, प्याऊ, कूड़ेदान। यह बताता है कि दान से ही समाज बनता है, लूट से नहीं।
हंस घाट, जिसे मालवीय घाट भी कहते हैं, वैदिक इतिहास का प्रतीक है। मान्यता है कि ब्रह्मा जी के वाहन हंस ने यहाँ तपस्या कर गंगा को प्रसन्न किया था, इसलिए इसका नाम हंस घाट पड़ा। महामना मदन मोहन मालवीय जी ने यहाँ गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए स्नान की व्यवस्था बनवाई थी। बगल में 1936 में बना प्रसिद्ध बिरला टॉवर है, जहाँ से पूरे हरिद्वार का समय चलता है। यह घाट हमें बताता है कि हरिद्वार केवल स्नान की नगरी नहीं, ज्ञान की नगरी भी है।
पर्यावरणीय चेतना - हर की पौड़ी पर संध्या आरती के समय जब हमने हजारों दीये, फूल, पॉलीथीन, अगरबत्ती के पैकेट को गंगा में बहते देखा, तब "भक्ति तो है पर पर्यावरण के प्रति भक्ति नहीं।" हर की पौड़ी पर जल की धारा तेज है, इसलिए कचरा बह जाता है और हमें लगता है गंगा साफ है, पर वह कचरा आगे जाकर कहाँ जाता है? यही तो गंगा प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है। भक्ति के नाम पर हम माँ को ही प्रदूषित कर रहे हैं।
हमने वहीं संकल्प लिया कि आरती में फूल तो चढ़ाएंगे पर पॉलीथीन नहीं, दीया तो जलाएंगे पर प्लास्टिक वाला दीया नहीं। सच्ची आरती वही है जो गंगा को निर्मल रखे। और इसका समाधान हमें अग्रसेन घाट और हंस घाट पर मिला। इन दोनों घाटों पर सफाई है। अग्रसेन घाट पर बकायदा कूड़ेदान लगे हैं, हंस घाट पर गुरुकुल के ब्रह्मचारी प्रतिदिन घाट की सफाई करते हैं। यहाँ जल स्थिर और निर्मल है क्योंकि यहाँ भीड़ नहीं है। यह बताता है कि गंगा को साफ रखने के लिए दो काम करने होंगे - भीड़ को नियंत्रित कर घाटों को बाँटना होगा और हर घाट पर सेवा का भाव लाना होगा। पर्यावरण की रक्षा ही गंगा की सच्ची आरती है।
आध्यात्मिक चेतना - इस पूरी यात्रा की सबसे गहरी अनुभूति आध्यात्मिक थी। 29 अगस्त की संध्या को हर की पौड़ी पर जब 50 पंडितों ने एक साथ महाआरती की, हजारों दीये गंगा में तैरे , शंख बजे, तो जो अनुभूति हुई उसे शब्दों में नहीं लिखा जा सकता। हम सबके हाथ में दीये थे - मेर। दीये की लौ में माँ गंगा का चेहरा दिख रहा था। उस क्षण लगा कि गंगा केवल जल नहीं, प्रकाश है। आरती लेने के बाद जो शांतिपूर्ण और आध्यात्मिक गहराई की अनुभूति हुई, वह जीवन भर की पूंजी बन गई।
यह यात्रा हमें तीन मंत्र देकर गई - ऐतिहासिक चेतना कहती है - अपने परिवार का सम्मान करो, जैसे शिव ने दक्ष को माफ किया। पर्यावरणीय चेतना कहती है - गंगा को माँ समझो, नाली नहीं। आध्यात्मिक चेतना कहती है - अंजुली का जल ही आरती बन जाता है, अगर मन साफ हो।
शिवालिक की गोद में मातृ-शक्ति के तीन शिखर - मनसा, चंडी और अंजनी (1 सितंबर 2026) - हरिद्वार को लोग समतल मैदान समझते हैं, पर यह भारत के भूगोल की सबसे बड़ी भूल है। सच यह है कि हरिद्वार शिवालिक पर्वत श्रृंखला का द्वार है। यहीं आकर शिवालिक हिमालय से मिलता है और मैदान शुरू होता है। भूगोल की भाषा में शिवालिक सबसे नया पर्वत है, जो आज भी बढ़ रहा है। 1 सितंबर 2026 की सुबह 5:30 बजे, जब हरिद्वार में हल्का कोहरा छाया था और गंगा पर धुंध थी, मैं, डॉ. उषा किरण श्रीवास्तव और डॉ. संगीता सागर के साथ नील पर्वत श्रृंखला की ओर निकल पड़ा। यह यात्रा केवल मंदिर दर्शन नहीं थी, यह हरिद्वार की मातृ संस्कृति का साक्षात्कार था।
हरिद्वार तीन पर्वतों से घिरा है - नील पर्वत, बिल्व पर्वत और नारायण पर्वत। आज हमारा लक्ष्य नील और बिल्व पर्वत था। नीचे नील धारा है और चंडी घाट। चंडी घाट वह घाट है जहाँ से माँ चंडी देवी के लिए रोप-वे शुरू होता है। सुबह के समय यहाँ गंगा बहुत चौड़ी हो जाती है। यहाँ गंगा दो धाराओं में बंट जाती है - मुख्य धारा और नील धारा। नील धारा नील पर्वत के नीचे से बहती है। यहाँ से नील पर्वत का दृश्य ऐसा लगता है जैसे कोई माँ अपनी गोद में हरिद्वार को बैठाए हो। हमने यहाँ आचमन किया और पर्वत चढ़ाई शुरू की।
बिल्व पर्वत पर मनसा देवी - हमने पहले बिल्व पर्वत की चढ़ाई शुरू की। बिल्व पर्वत शिवालिक की दक्षिणी श्रृंखला पर स्थित है। इसकी ऊँचाई लगभग 585 मीटर (1,926 फीट) समुद्र तल से है। बिल्व यानी बेलपत्र का पर्वत। कहते हैं यहाँ प्राचीन काल में बेल के घने जंगल थे, जिनके बेलपत्र सीधे हर की पौड़ी के शिवलिंगों पर चढ़ते थे, इसलिए नाम बिल्व पड़ा। यह मंदिर नील पर्वत नहीं, बिल्व पर्वत की चोटी पर है। यहाँ से हर की पौड़ी सीधे नीचे दिखती है। रोप-वे से 5 मिनट में पहुँचा जा सकता है, पर हमने पैदल मार्ग से चढ़ाई की, जिसमें लगभग 1.5 किमी की चढ़ाई है। माँ मनसा देवी को नागों की देवी और इच्छा देवी कहा जाता है। 51 शक्तिपीठों में यह वह स्थान है जहाँ देवी सती का मन गिरा था, इसलिए नाम मनसा पड़ा। कुछ कथाओं में कहा जाता है कि यहाँ सती के मस्तिष्क का हिस्सा गिरा था। यह मंदिर 1811 में मणिराम ने बनवाया था। मान्यता है कि यहाँ सच्चे मन से जो धागा बांधा जाता है, मन की इच्छा पूरी होती है। मंदिर में पीपल के पेड़ पर हजारों धागे बंधे हैं। डॉ. उषा श्रीवास्तव जी ने यहाँ अपने कला केंद्र के बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए और डॉ. संगीता सागर जी ने अपने परिवार और बीमा परिवार के कल्याण के लिए मौली बांधी।
यहाँ से पूरा हरिद्वार दिखता है। यह शिवालिक का वह बिंदु है जहाँ से पर्वत मैदान में बदल जाता है। यहाँ खड़े होकर समझ आता है कि माँ क्यों ऊँचे पर्वत पर रहती है - ताकि वह अपने सभी बच्चों पर नजर रख सके। यही तो मातृ संस्कृति है।
नील पर्वत पर चंडी देवी - बिल्व पर्वत से उतरकर हम नील पर्वत की ओर गए। नील पर्वत शिवालिक की पूर्वी श्रृंखला पर स्थित है। इसकी ऊँचाई लगभग 2,900 फीट (लगभग 884 मीटर) समुद्र तल से है। यह मनसा से लगभग 300 मीटर ऊँचा है। यह हरिद्वार का सबसे ऊँचा सिद्धपीठ है। यहाँ तक पहुँचने के लिए 3 किमी की खड़ी चढ़ाई है। चंडी देवी मंदिर शक्ति का प्रचंड रूप है। यह 51 शक्तिपीठों में से एक नहीं, पर अति प्रसिद्ध सिद्धपीठ है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार देवी चंडी ने इसी नील पर्वत पर शुंभ और निशुंभ नामक दो राक्षस राजाओं का वध किया था। उनके वध के बाद देवी ने यहीं विश्राम किया। कथा यह भी है कि यहाँ देवी सती के सिर का निशान गिरा था। यह मंदिर 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य जी ने स्थापित किया था और 1929 में कश्मीर नरेश सुचत सिंह ने इसका जीर्णोद्धार करवाया। मंदिर के गर्भगृह में माँ चंडी की दो मूर्तियाँ हैं - एक मुख्य अचल मूर्ति और एक चल मूर्ति। हमने यहाँ चंडी पाठ किया। यहाँ से नील धारा, चंडी घाट और राजाजी नेशनल पार्क का घना जंगल दिखता है। अगर मनसा इच्छा देती है, तो चंडी उस इच्छा को पूरा करने की शक्ति देती है।
नील पर्वत की दूसरी चोटी पर माता अंजनी देवी - चंडी मंदिर से नीचे उतरते समय, नील पर्वत की ही एक दूसरी चोटी पर एक छोटा सा गुप्त मंदिर है - माता अंजनी देवी मंदिर। इसकी ऊँचाई लगभग 800 से 900 मीटर के आसपास है। यह मंदिर भगवान हनुमान की दिव्य माता अंजनी देवी को समर्पित है। यह अंजनी देवी की तपभूमि है। पौराणिक कथा है कि अंजनी देवी ने पुत्र प्राप्ति के लिए नील पर्वत पर हजारों वर्षों तक तपस्या की थी। वायु देवता के आशीर्वाद से उन्हें हनुमान जी जैसा पुत्र प्राप्त हुआ। इसलिए यह हरिद्वार की ऊँची चोटियों पर एक ऐसा चमत्कारी स्थान है, जहाँ संतान प्राप्ति की मन्नत कभी खाली नहीं जाती। हम जब यहाँ पहुँचे तो कई निःसंतान दंपति यहाँ पूजा कर रहे थे। अंदर अंजनी माता की गोद में बाल हनुमान की मूर्ति है। बगल में ही हनुमान जी का छोटा मंदिर है, जहाँ हनुमान जी अपनी माँ की पहरेदारी में खड़े हैं। मनसा इच्छा देती है, चंडी शक्ति देती है, और अंजनी माता संतान यानी वंश देती है। यह तीनों ही नारी के तीन रूप हैं।
मैदान में माया देवी और सप्त सरोवर में भारत माता - जबकि मनसा बिल्व पर, चंडी और अंजनी नील पर हैं, एक और शक्ति है जो मैदान में है - माया देवी मंदिर। यह हरिद्वार शहर के मुख्य क्षेत्र में, हर की पौड़ी और बिरला घाट के पास है। माया देवी हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी हैं। हरिद्वार का पुराना नाम मायापुरी भी इन्हीं के नाम पर है। यहाँ सती की नाभि गिरी थी, इसलिए यह 51 शक्तिपीठों में सबसे महत्वपूर्ण है। यह 11वीं शताब्दी का मंदिर है। बिना माया देवी के दर्शन के मनसा-चंडी की यात्रा अधूरी मानी जाती है। माया देवी वह जड़ हैं, जिनसे बिल्व और नील पर्वत निकले हैं।
पर्वत से नीचे उतरकर हम सप्त सरोवर के पास स्थित भारत माता मंदिर गए। यह 8 मंजिला मंदिर है, जिसे स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी ने बनवाया था और 1983 में इंदिरा गांधी ने इसका उद्घाटन किया था। यह हरिद्वार का इकलौता ऐसा मंदिर है जहाँ किसी देवी-देवता की नहीं, बल्कि भारत माता की पूजा होती है। हर मंजिल पर भारत के इतिहास को दर्शाया गया है - पहली पर भारत माता की 8 फीट ऊँची मूर्ति, दूसरी पर शूर मंदिर, तीसरी पर मातृ मंदिर। डॉ. संगीता जी ने कहा - "गंगा और भारत माता एक ही हैं। दोनों मातृ संस्कृति की प्रतीक हैं। एक जल देती है, दूसरी जीवन।"
अंत में हम वैष्णवी मंदिर गुफा और सदानंद आश्रम गुफा गए। वैष्णवी गुफा नील पर्वत की तलहटी में एक प्राकृतिक गुफा है, जहाँ वैष्णव संतों ने तपस्या की थी। यहाँ विष्णु जी के 24 अवतारों की मूर्तियाँ हैं। सदानंद आश्रम गुफा में 100 साल से अखंड धूना जल रहा है। 1 सितंबर की यह प्रातःकालीन यात्रा दोपहर 12 बजे तक पूरी हुई। 6 घंटे में 6 देवियों और देवताओं के दर्शन - यही हरिद्वार की मातृ संस्कृति है - जहाँ नदी भी माँ है, पर्वत भी माँ है, धरती भी माँ है और देश भी माँ है।
शांतिकुंज से सप्तऋषि तक - बूंद-बूंद में गंगा, मंत्र-मंत्र में जीवन -
2 अगस्त 2026 को हरिद्वार में रिमझिम वर्षा हो रही थी। भाद्रपद का महीना, आकाश में बादल और गंगा में जल की बूंदों की थाप। मेरे साथ थीं डॉ. उषा श्रीवास्तव और डॉ. संगीता सागर। हम तीनों ने छाता बंद कर दिया और वर्षा में भीगते हुए ही शांतिकुंज पहुँचे।
शांतिकुंज युग निर्माण की प्रयोगशाला है। यह केवल आश्रम नहीं, पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा स्थापित एक विचार क्रांति का केंद्र है। आचार्य जी ने 1926 में गायत्री की साधना शुरू की और 24-24 लाख के 24 महापुरश्चरण किए। 1971 में उन्होंने इसे मथुरा से हरिद्वार स्थानांतरित किया। आज यह अखिल विश्व गायत्री परिवार का मुख्यालय है।
हम अपराह्न 12:30 बजे शांतिकुंज पहुँचे। वर्षा तेज थी। प्रवेश करते ही सबसे पहले हमने देवात्मा हिमालय मंदिर और गंगेश्वर शिवलिंग के दर्शन किए। यह शांतिकुंज का हृदय है। कहा जाता है कि यहाँ हिमालय की दिव्य आत्माओं का वास है। हमने यहाँ शिवलिंग पर मानसिक रूप से गायत्री मंत्र से उपासना की।
फिर अन्नपूर्णा भवन में सामूहिक भोजन - कढ़ी, सब्जी-भात, रोटी का सात्विक प्रसाद। प्रतिदिन हजारों लोग निःशुल्क भोजन करते हैं। भोजन के बाद हम ध्यान भवन गए। यह एक अंधेरा कक्ष है, जहाँ पूर्ण सन्नाटा है। केवल गायत्री मंत्र की बहुत धीमी ध्वनि कानों में गूंजती है। हमने 20 मिनट तक "ॐ भूर्भुवः स्वः..." का मौन मानसिक जाप किया। आँखें बंद करते ही लगा जैसे शरीर में प्रकाश भर रहा है।
ध्यान के बाद हमने शांतिकुंज पुस्तकालय, प्रदर्शनी और पौधा प्रदर्शनी का भ्रमण किया। पुस्तकालय में आचार्य जी की लिखी 3000 से अधिक पुस्तकें हैं। प्रदर्शनी में मानव शरीर के षट्चक्रों का वैज्ञानिक मॉडल दिखाया गया है। सबसे सुंदर थी आयुर्वेद पौधा प्रदर्शनी, जहाँ तुलसी, नीम, पीपल, रुद्राक्ष के हजारों पौधे निःशुल्क बाँटे जा रहे थे।
यहाँ एक कड़वा अनुभव भी हुआ, जो लिखना जरूरी है क्योंकि सच ही धर्म है। वर्षा तेज होने पर मैं पौधा प्रदर्शनी के बरामदे में लगी कुर्सी पर बैठकर वर्षा थमने का इंतजार कर रहा था। तभी पीले वस्त्र पहने एक आयुर्वेद विक्रेता ने आकर खड़ी-खोटी सुनाई और कहा - "यहाँ से चले जाइए, वर्षा में यहाँ रहने की जरूरत नहीं है।" उनका व्यवहार बहुत रूखा था। परंतु यह एक अपवाद था। नेपाल से आए कर्मी और प्रसाद वितरण करने वाले स्वयंसेवकों का व्यवहार बहुत आत्मीय रहा। उन्होंने कहा - "वर्षा गायत्री माँ का आशीर्वाद है, भीगिए।" यह घटना भी एक सीख दे गई - बड़ी संस्थाओं में भी व्यक्ति का व्यवहार ही धर्म बनता है।
वहाँ से मात्र 2 किमी दूर है सप्तऋषि आश्रम। इसका इतिहास शांतिकुंज से भी हजारों साल पुराना है। पुराणों के अनुसार जब गंगा हिमालय से मैदान में आई, तो उसका वेग इतना तेज था कि पृथ्वी फट जाती। तब सात महान ऋषियों - कश्यप, अत्रि,भारद्वाज, विश्वामित्र, वशिष्ठ, जमदग्नि और गौतम ने यहाँ तपस्या कर गंगा के वेग को रोका। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा यहाँ सात धाराओं में बंट गई। इसलिए इस स्थान को सप्त सरोवर कहा जाता है। आज भी यहाँ गंगा सात धाराओं में बहती है। वर्षा में सप्तऋषि का दृश्य अद्भुत था। हर धारा पर जल बूंदें गिर रही थीं और धुंध में इंद्रधनुष बन रहा था। मुख्य मंदिर में वशिष्ठ और अरुंधति की मूर्ति एक साथ है, जो भारतीय दाम्पत्य के अखंड प्रेम का प्रतीक है। परिसर में ही माता सरस्वती, तिरुपति बालाजी, बाबा गंगेश्वर शिवलिंग, संकटमोचन हनुमान जी और राम-लखन-जानकी का मंदिर है, जहाँ सावन का झूला पड़ा था। यह यात्रा दोपहर 3:30 बजे तक चली। तीन घंटे हम भीगते रहे, पर मन भीगता रहा भक्ति से।
यात्रा पूरी नहीं, शुरू होती है । 29 अगस्त को अग्रसेन घाट ने सेवा सिखाई, हंस घाट ने ज्ञान, हर की पौड़ी ने मोक्ष और अवधूत आश्रम ने सिखाया कि पुस्तकें भी गंगा हैं। 1 सितंबर को बिल्व पर्वत ने इच्छा, नील पर्वत ने शक्ति, अंजनी ने वंश, माया ने जन्म और भारत माता ने राष्ट्र बोध सिखाया। 2 अगस्त को शांतिकुंज ने सिखाया कि गायत्री मंत्र ही असली गंगा है, जो मन को साफ करती है और सप्तऋषि ने सिखाया कि ज्ञान सात धाराओं में बंटकर भी एक ही रहता है।
हरिद्वार का भूगोल ही उसका अध्यात्म है - दक्षिण में बिल्व (585 मीटर) पर मनसा, पूर्व में नील (884 मीटर) पर चंडी, उसी नील की दूसरी चोटी (800-900 मीटर) पर अंजनी, मैदान में माया और सप्त सरोवर में भारत माता। इसी को सनातन धर्म की मातृ संस्कृति कहते हैं। शिवालिक पर्वत केवल पत्थर नहीं, माँ की गोद है। और हरिद्वार वह स्थान है जहाँ पर्वत माँ बन जाता है और गंगा बेटी बनकर उसके चरणों में बहती है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें