सोमवार, सितंबर 21, 2026

ओंकारेश्वर  व महाकाल की नगरी में आध्यात्मिक अमृत 
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
भारतीय संस्कृति में तीर्थाटन का अर्थ केवल घूमना नहीं, बल्कि अपनी जड़ों और आध्यात्मिक चेतना से जुड़ना है। इसी पावन संकल्प के साथ हमने मध्यप्रदेश की प्राचीन नगरी उज्जैन (अवंतिका) की यात्रा की रूपरेखा बनाई। बिहार के मगध क्षेत्र (जहानाबाद एवं गया) की ज्ञान भूमि से निकलकर बाबा महाकाल की शरण में जाने का उत्साह शब्दों से परे था। इस यात्रा में मेरे साथ स्वर्णिम कला केंद्र की अध्यक्षा डॉ. ऊषा किरण श्रीवास्तव, जीवनधारा नमामि गंगे बिहार की उपाध्यक्ष डॉ. संगीता सागर  जैसे प्रबुद्ध साथी थे, जिनकी उपस्थिति ने इस यात्रा को एक बौद्धिक और सांस्कृतिक विमर्श का रूप दे दिया।
बिहार से मालवा की ओर १४ अप्रैल २०२६ को हमारी यात्रा का प्रथम चरण शुरू हुआ। जहानाबाद से मुजफ्फरपुर तक की दूरी हमने विभिन्न साधनों से तय की और शाम ७ बजे मुजफ्फरपुर पहुँचे। यहाँ रात्रि विश्राम के उपरांत, १५ अप्रैल की सुबह ६ बजे हम मुजफ्फरपुर रेलवे स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस में सवार हुए। रेल की खिड़की से बदलते परिदृश्य और साथ में चल रहे संवादों ने सफर को जीवंत बनाए रखा। १६ अप्रैल की शाम ४:३० बजे जब ट्रेन उज्जैन जंक्शन पहुँची, तो हवा में बिखरी भस्म और लोबान की महक ने बता दिया कि हम काल के अधिपति की नगरी में आ चुके हैं। मौनी आश्रम (मौन तीर्थ) उज्जैन पहुँचते ही हमारा पड़ाव बना मौनी आश्रम। शिप्रा नदी के तट पर स्थित यह स्थान अपनी शांति और एकांत के लिए विख्यात है। १६ से १८ अप्रैल तक यहाँ प्रवास के दौरान हमने पाया कि यह केवल एक आश्रम नहीं, बल्कि अंतर्मन की यात्रा का केंद्र है। आश्रम परिसर में मोर की गूँज, चारों ओर वृक्षों के झुरमुट और समीप ही कल-कल बहती शिप्रा नदी एक ऐसा वातावरण निर्मित करती है जहाँ शब्द स्वतः मौन हो जाते हैं। यहाँ का 'मौन तीर्थ' साधकों के लिए तपस्थली है, जिसने हमारी थकान को आध्यात्मिक ऊर्जा में बदल दिया।
उज्जैन का ऐतिहासिक और पौराणिक वैभव का १७ अप्रैल की सुबह हमारे भ्रमण का मुख्य केंद्र थी। उज्जैन, जिसे इतिहास में अवंतिका, विशाला, उज्जयिनी, पद्मावती और कनकश्रृंगा जैसे अनेक नामों से विभूषित किया गया है, भारत की सात पवित्रतम पुरियों (सप्तपुरियों) में से एक है। यह नगरी सम्राट विक्रमादित्य के न्याय, महाकवि कालिदास की अमर रचनाओं और खगोल विज्ञान के प्राचीन केंद्र के रूप में विश्वविख्यात है। यहाँ से कर्क रेखा गुजरती है, जो इसे ब्रह्मांडीय गणनाओं का केंद्र बनाती है।
महाकाल दर्शन: काल के स्वामी का सान्निध्य में सुबह ६ बजे हमने श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन किए। १२ ज्योतिर्लिंगों में महाकाल का स्थान अद्वितीय है क्योंकि यह एकमात्र 'दक्षिणमुखी' ज्योतिर्लिंग है। शास्त्रों में दक्षिण दिशा मृत्यु की दिशा मानी गई है, और महाकाल मृत्यु के भी काल हैं। मंदिर के गर्भगृह की दिव्यता और भस्म आरती की ऊर्जा ने रोम-रोम को पुलकित कर दिया।
हमारी यात्रा का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव था सांदीपनी मुनि आश्रम। यह वह भूमि है जहाँ साक्षात भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और उनके सखा सुदामा ने ६४ कलाओं और १४ विद्याओं की शिक्षा ग्रहण की थी। आश्रम में स्थित अंकपात वह स्थान है जहाँ श्रीकृष्ण अपनी स्लेट (पाटी) धोया करते थे। यहाँ गुरु सांदीपनी द्वारा स्थापित सर्वेश्वर महादेव के दर्शन हुए, जहाँ नंदी जी की खड़ी प्रतिमा एक दुर्लभ दृश्य प्रस्तुत करती है। इसके बाद हम काल भैरव मंदिर पहुँचे। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार काल भैरव उज्जैन के सेनापति या नगर रक्षक हैं। यहाँ भगवान को मदिरा का भोग लगाने की परंपरा सदियों पुरानी है, जो आज भी कौतूहल और श्रद्धा का विषय बनी हुई है।
मंगलनाथ और खगोल विज्ञान शिप्रा के तट पर स्थित मंगलनाथ मंदिर को मंगल ग्रह की जन्मस्थली माना जाता है। भौगोलिक दृष्टि से यह स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ की 'भात पूजा' विशेष फलदायी मानी जाती है। हमने वहाँ के प्राचीन महत्व और मत्स्य पुराण में वर्णित कथाओं का स्मरण किया ।चिंतामणि गणेश: माता सीता द्वारा स्थापित षट् विनायकों में से एक, जहाँ श्रद्धालु अपनी चिंताओं के निवारण हेतु आते हैं। पास ही स्थित ८० फीट गहरी लक्ष्मण बावड़ी ऐतिहासिक इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट उदाहरण है।।गढ़ कालिका और हरसिद्धि: ५१ शक्तिपीठों में से एक गढ़ कालिका और सम्राट विक्रमादित्य की आराध्य देवी हरसिद्धि माता के मंदिर में शक्ति की प्रचंड उपस्थिति का अनुभव हुआ।।भर्तृहरि गुफाएं: राजा भरथरी, जिन्होंने राजपाठ त्यागकर वैराग्य अपनाया, उनकी तपस्थली ने हमें जीवन की नश्वरता और ज्ञान की महत्ता का बोध कराया है।
मालवा का स्वाद और सांस्कृतिक आनंद भ्रमण के दौरान भोजन का आनंद भी अद्भुत रहा। साईं भोजन आश्रम में हमने मालवा के पारंपरिक व्यंजनों का रसास्वादन किया। दाल-बाटी, चूरमा, चावल, ताजी छाछ और लड्डू—इस सात्विक और स्वादिष्ट भोजन ने यात्रा के आनंद को पूर्ण कर दिया। सांस्कृतिक गतिविधियों का अवलोकन करते हुए हमने स्थानीय कला और लोक जीवन को करीब से देखा । मौनी आश्रम में आश्रम में अध्ययन रत शिक्षार्थियों एवं कर्मचारियों द्वारा जलपान एवं भोजन करने और समर्पण का अनुभव साथ ही संध्या आरती में आध्यात्म में सराबोर हुआ । हनुमान जी , राम लक्ष्मण जानकी , जगन्नाथ , कल्पवृक्ष , नवग्रह की मूर्तियों का दर्शन कर मन को आध्यात्मिक रुप में आत्म विभोर कर दिया ।ही 
शिप्रा नदी केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि उज्जैन की जीवनधारा है। इसके रामघाट पर हर १२ वर्ष में होने वाला सिंहस्थ कुंभ विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक समागम है। जीवनधारा नमामि गंगे के सदस्यों के रूप में हमारे लिए शिप्रा का संरक्षण और उसकी स्वच्छता का अवलोकन करना एक नैतिक जिम्मेदारी की तरह था। नदी के किनारे बने मंदिर और घाट भारतीय स्थापत्य कला की श्रेष्ठता को दर्शाते हैं। एक नई चेतना के साथ वापसी १८ अप्रैल को जब हमारी यह यात्रा पूर्ण हुई, तो हमारे पास केवल चित्रों का संग्रह नहीं, बल्कि अनुभवों का एक महासागर था। उज्जैन की गलियों में इतिहास बोलता है और उसके मंदिरों में श्रद्धा सांस लेती है। मुजफ्फरपुर से उज्जैन तक का यह सफर अध्यात्म, शिक्षा, इतिहास और संस्कृति का एक अनूठा सम्मिश्रण रहा।

 इस प्रवास ने यह सिद्ध कर दिया कि ज्ञान और भक्ति जब मिलते हैं, तो जीवन स्वयं एक तीर्थ बन जाता है। महाकाल की इस नगरी से हमने यह सीख ली कि 'काल' (समय) निरंतर है, और हमारी यात्रा उसी अनंत के साथ एकाकार होने का एक लघु प्रयास है।
 मांधाता पर्वत  व नर्मदा - सृष्टि के आरंभ से ही भारतीय महाद्वीप की नदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं रही हैं, बल्कि वे संस्कृति, अध्यात्म, दर्शन और स्थापत्य की प्रवाहमयी धारा रही हैं। मध्य भारत के विशाल भूभाग को सिंचित करने वाली पुण्यतोया नर्मदा (रेवा) की महिमा समस्त पौराणिक साहित्य में अद्वितीय मानी गई है। जहाँ देश की अधिकांश नदियाँ पूर्व की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी में लीन हो जाती हैं, वहीं नर्मदा जी भ्रंश घाटी (Rift Valley) के कठिन मार्गों को भेदती हुई पश्चिम दिशा की ओर अग्रसर होती हैं और अंततः गुजरात के भरूच के समीप खंभात की खाड़ी (अरब सागर) में विलीन होती हैं। नर्मदा के 1,312 किलोमीटर के इस पावन प्रवाह क्षेत्र में अनगिनत तीर्थ, संगम और ऐतिहासिक नगर बसे हैं। किंतु मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में स्थित 'मांधाता पर्वत' (ओंकारेश्वर) का स्थान सर्वाधिक विलक्षण और अलौकिक है। यहाँ नर्मदा नदी और उसकी सहायक धारा 'कावेरी' (मध्य प्रदेश की कावेरी) के अद्वितीय संगम से प्राकृतिक रूप से 'ॐ' (ओंकार) के आकार वाले द्वीप का निर्माण होता है। यह मांधाता द्वीप केवल एक भौगोलिक संरचना नहीं है, बल्कि यह मन्वंतरों की तपोभूमि, पंचदेव परंपरा (सौर, शाक्त, ब्रह्म, शैव, और वैष्णव) का केंद्र तथा विभिन्न महान भारतीय राजवंशों द्वारा निर्मित मंदिर स्थापत्य का जीवन-ग्रंथ है। 
संस्मरण-आलेख में मांधाता पर्वत के प्राकट्य, इसके पौराणिक मन्वंतर कालीन इतिहास, विभिन्‍न राजवंशों द्वारा निर्मित मंदिरों, नर्मदा के पावन संगमों, और नर्मदेश्वर शिवलिंग के वैशिष्ट्य का विस्तृत, प्रामाणिक और सांगोपांग विवेचन प्रस्तुत किया गया है।
पौराणिक मान्यताओं—विशेष रूप से नर्मदा पुराण, मत्स्य पुराण और स्कंद पुराण (रेवा खंड)—के अनुसार नर्मदा जी का प्राकट्य सत्ययुग में हुआ था। कथा है कि एक बार देवाधिदेव भगवान शिव विंध्याचल और मैकल पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य घोर तपस्या में लीन थे। उनकी काया से उत्पन्न पसीने (स्वेद-बिंदुओं) से एक अत्यंत सुंदर, तेजस्विनी और आनंददायिनी कन्या का प्राकट्य हुआ। भगवान शिव ने कन्या को आनंद प्रदान करने वाली देखकर उनका नाम 'नर्मदा' (नर्म = आनंद, दा = देने वाली) रखा। देवताओं और ऋषियों की प्रार्थना पर पृथ्वीलोक पप्राणियों के पापों के क्षालन तथा उन्हें मोक्ष प्रदान करने हेतु नर्मदा जी को अमरकंठी या 'रेवा' के रूप में प्रवाहित किया गया।
नर्मदा जी की पौराणिक महिमा:"गंगा स्नाने तु पूतानि, काश्यां मरणान्मुक्तिः। स्मरणादेव नर्मदायाः, सर्वपापैः प्रमुच्यते॥"(अर्थात् गंगा में स्नान से, काशी में मरण से मोक्ष मिलता है; किंतु नर्मदा जी के केवल स्मरण मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।)।मांधाता पर्वत का पौराणिक संबंध वैवस्वत मन्वंतर के महान सूर्यवंशी (इक्ष्वाकु वंश) चक्रवर्ती राजा मांधाता से है। राजा मांधाता ने इस पर्वत पर बैठकर सहस्रों वर्षों तक भगवान शिव की उग्र तपस्या की थी। उनके कठोर तपोबल और महायज्ञों से प्रसन्न होकर भगवान आशुतोष ने उन्हें दर्शन दिए और राजा मांधाता के अनुरोध पर लोक-कल्याण हेतु यहाँ ज्योतिर्लिंग रूप में सदा-सर्वदा के लिए विराजमान होना स्वीकार किया। तभी से इस पावन पर्वत को 'मांधाता पर्वत' कहा जाने लगा।
अमरकंटक में नर्मदा कुंड से कुछ ही सौ मीटर की दूरी पर 'सोनमुड़ा' नामक स्थान है, जहाँ से सोन नद (सोन भद्र) का उद्गम होता है। लोककथाओं और पौराणिक प्रसंगों के अनुसार, प्राचीन काल में नर्मदा और सोन भद्र के बीच निश्छल प्रेम था। किंतु किसी कारणवश सोन भद्र के मार्ग बदलने (या दासी जुहिला के मोह में पड़ने) के कारण नर्मदा जी अत्यंत रुष्ट हो गईं। उन्होंने अपना मार्ग बदलकर विपरीत दिशा (पूर्व के बजाय पश्चिम) की ओर एकाकी बहना शुरू कर दिया। यही कारण है कि नर्मदा भारत की एकमात्र ऐसी प्रमुख नदी है जो पूर्व से पश्चिम की ओर कठोर चट्टानों को काटती हुई बहती है ।
सनातन संस्कृति में एक अत्यंत प्रसिद्ध और सिद्ध मान्यता है—"नर्मदा का हर कंकर, शिव शंकर है।" यह केवल एक लोक-विश्वास नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक और वैज्ञानिक आधार समाहित है। पुराणों के अनुसार, जब नर्मदा जी ने स्वयं कठोर तपस्या की, तो भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि "हे नर्मदे! तुम्हारे जल के वेग में बहने वाला प्रत्येक पत्थर स्वतः ही बिना किसी पृथक प्राण-प्रतिष्ठा के शिवलिंग (नर्मदेश्वर) माना जाएगा।"  नर्मदा नदी विंध्याचल और सतपुड़ा की कठोर चट्टानों के मध्य से तीव्र वेग के साथ बहती है। जल की निरंतर रगड़ और घर्षण से नदी की तलहटी में स्थित पत्थर प्राकृतिक रूप से चिकने, गोलाकार और अंडाकार (शिवलिंग के आकार में) ढल जाते हैं।।दैवीय चिह्नो युक्त  नर्मदेश्वर पत्थरों पर प्राकृतिक रूप से जनेऊ, त्रिशूल, अर्धचंद्र, सूर्य या तिलक जैसी विविध रंगीन आकृतियाँ स्वतः उभर आती हैं। स्मृति ग्रंथों एवं शास्त्रों के अनुसार, नर्मदेश्वर शिवलिंग को घर या देवालय में स्थापित करने के लिए किसी तांत्रिक या वैदिक प्राण-प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि ये प्राकृतिक रूप से 'स्वयंभू' और अनंत शिव-ऊर्जा से ओत-प्रोत माने जाते हैं।
. मांधाता पर्वत पर मन्वंतर से आज तक निर्मित प्रमुख मंदिर एवं निर्माणकर्ता साम्राज्य - मांधाता पर्वत (ओंकारेश्वर) भारतीय स्थापत्य कला, मूर्तिकला और धार्मिक इतिहास का एक ऐसा महाकोश है, जहाँ मन्वंतर कालीन पौराणिक काल से लेकर 18वीं-19वीं शताब्दी के होल्कर साम्राज्य तक लगातार मंदिरों का निर्माण, जीर्णोद्धार और विस्तार होता रहा। यहाँ मुख्य रूप से नागर शैली, भूमिश शैली और मराठा/होल्कर स्थापत्य शैली का अद्भुत संगम दिखाई देता है।
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर (मुख्य मंदिर)।संबद्ध साम्राज्य/शासक: पौराणिक काल में सूर्यवंशी राजा मांधाता; ऐतिहासिक काल में परमार राजवंश (10वीं-13वीं शताब्दी) और तत्पश्चात महारानी अहिल्याबाई होल्कर (18वीं शताब्दी)। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग भारत के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह मंदिर मांधाता पर्वत के निचले हिस्से में नर्मदा तट पर स्थित है। मंदिर पाँच मंजिला है, जिसकी प्रत्येक मंजिल पर अलग-अलग देव विग्रह स्थापित हैं:।प्रथम तल: श्री ओंकारेश्वर (मूल ज्योतिर्लिंग) , द्वितीय तल: श्री महाकालेश्वर तृतीय तल: श्री सिद्धनाथ चतुर्थ तल: श्री गुप्तेश्वर। पंचम तल: श्री ध्वजधारी महादेव। परमार कालीन विशाल नक्काशीदार स्तंभ और गर्भगृह का भूमिश शैली का शिखर इसकी कलात्मक भव्यता को दर्शाता है। 18वीं शताब्दी में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने इसका पुनरुद्धार करवाया और यहाँ प्रतिदिन 1,100 पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजन करने की परंपरा शुरू की।।अमलेश्वर (ममलेश्वर) मंदिर परमार राजवंश (11वीं शताब्दी) तथा चौहान / भील नायक राजा। नर्मदा के दक्षिणी तट (शिवपुरी/अमलेश्वर क्षेत्र) पर स्थित यह मंदिर अत्यंत प्राचीन है। पौराणिक मान्यतानुसार ओंकारेश्वर और अमलेश्वर (ममलेश्वर) दोनों मिलकर एक ही ज्योतिर्लिंग का पूर्ण स्वरूप बनाते हैं ("एकं लिंगं द्विधा भिन्नम्")। यह शुद्ध परमार कालीन नागर/भूमिश स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसके गर्भगृह, सभा मंडप और बाहरी दीवारों पर देव-कन्याओं, नर्तकियों और पौराणिक दृश्यों का सुंदर अंकन है।
सिद्धनाथ (सिद्धेश्वर) मंदिर: परमार राजवंश (10वीं से 12वीं शताब्दी)। यह मंदिर मांधाता पर्वत के ऊपरी पठार पर स्थित है। यद्यपि मध्यकाल में हुए आक्रमणों के कारण यह आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गया था, किंतु इसके अवशेष आज भी इसकी भव्यता की गवाही देते हैं।
 इस मंदिर का आधार हाथियों की उकेरी गई मूर्तियों (गजाधर) से सुसज्जित है। इसके ऊंचे और विशाल स्तंभों पर की गई सूक्ष्म नक्काशी परमार कालीन मूर्तिकला की पराकाष्ठा है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है। ऋणामुक्तेश्वर और ऋणमोचन मंदिर: होल्कर राजवंश एवं स्थानीय मराठा सूबेदार।। नर्मदा और कावेरी के संगम क्षेत्र के निकट स्थित इस मंदिर में दर्शन करने से जीव को पित्र ऋण, देव ऋण और ऋषि ऋण से मुक्ति मिलती है। यहाँ विशेष रूप से कार्तिक और वैशाख मास में श्रद्धालु विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। गौरी सोमनाथ मंदिर (विशाल ममलेश्वर) परमार राजवंश तथा स्थानीय गोंड व चौहान राजा।: मांधाता पहाड़ी पर स्थित यह तीन मंजिला मंदिर एक अत्यंत विशाल शिवलिंग के लिए प्रसिद्ध है। यह शिवलिंग काले चिकने कसौटी पत्थर (Basalt) से निर्मित है, जिसकी ऊँचाई लगभग 6 फीट है। जनश्रुति है कि प्राचीन काल में इस शिवलिंग में देखने पर व्यक्ति को अपने पुनर्जन्म का आभास होता था।
चौबीस अवतार मंदिर और सप्तमातृका मंदिर परमार राजवंश (11वीं-12वीं शताब्दी)। मांधाता पर्वत पर स्थित यह मंदिर समूह सनातन धर्म की वैष्णव और शाक्त (देवी) परंपरा के सुंदर समन्वय को दर्शाता है। यहाँ भगवान विष्णु के 24 अवतारों की अति सुंदर पाषाण प्रतिमाएं उकेरी गई हैं। साथ ही ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इंद्राणी और चामुंडा—इन 'सप्तमातृकाओं' का प्राचीन मंदिर स्थित है।।ओंकार मठ और शंकराचार्य गुफा आदि शंकराचार्य (8वीं शताब्दी) एवं राष्ट्रकूट / गुर्जर-प्रतिहार काल है।
मांधाता पर्वत की तलहटी में वह ऐतिहासिक गुफा स्थित है जहाँ जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने अपने गुरु गोविंद भगवत्पाद से दीक्षा प्राप्त की थी और 'अद्वैत वेदांत' के सिद्धांत को सुदृढ़ किया था। हाल ही में यहाँ 108 फीट ऊँची आदि शंकराचार्य की प्रतिमा ('स्टैच्यू ऑफ वननेस' / एकात्मता की प्रतिमा) का निर्माण कर इस स्थल को अंतरराष्ट्रीय वेदांत केंद्र के रूप में विकसित किया गया है।  नर्मदा तट के प्रमुख ऐतिहासिक साम्राज्य, नगर और संगम - नर्मदा नदी केवल आध्यात्मिक चेतना की वाहक नहीं रही, बल्कि इसके तटों पर भारत के कई प्रतापी राजवंशों का वैभव पनपा। अमरकंटक से लेकर भरूच तक नर्मदा के किनारे कई ऐतिहासिक नगर और संगम स्थित है।माहिष्मती (महेश्वर) हैहय वंश (राजा सहस्रार्जुन), महारानी अहिल्याबाई होल्कर प्राचीन काल एवं 18वीं शताब्दी सहस्रार्जुन की प्राचीन राजधानी; महारानी अहिल्याबाई ने इसे होल्कर साम्राज्य की राजधानी बनाया, नर्मदा तट पर विशाल किला, महेश्वर घाट और रेशमी महेश्वरी साड़ियों की नींव रखी।।ओंकारेश्वर (मांधाता) सूर्यवंश (राजा मांधाता), परमार राजवंश, चौहान मन्वंतर काल, 10वीं–13वीं शताब्दी 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक; मांधाता द्वीप 'ॐ' आकृति में स्थित है।
त्रिपुरी (जबलपुर / तेवर) कलचुरी राजवंश (त्रिपुरी के कलचुरी) 9वीं से 12वीं शताब्दी कलचुरी राजाओं की राजधानी; नर्मदा के तट पर भेड़ाघाट (संगमरमर की चट्टानें), धुआँधार जलप्रपात और प्रसिद्ध 'चौसठ योगिनी मंदिर' का निर्माण। मंडला गोंड राजवंश (राजा हृदय शाह, रानी दुर्गावती) 16वीं–17वीं शताब्दी नर्मदा और बंजर नदी के संगम पर बसा नगर; गोंड राजाओं ने यहाँ मोती महल और अभेद्य दुर्ग बनवाए।
भृगुक्षेत्र (भरूच) मौर्य, गुप्त, सोलंकी/चौहान, मुग़ल प्राचीन काल से मध्यकाल तक प्राचीन 'भड़ौच' या 'भृगुकच्छ'—भारत का एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय समुद्री बंदरगाह, जहाँ से पश्चिम एशिया व रोम के साथ व्यापार होता था। केवड़िया (एकता नगर) आधुनिक भारत 21वीं शताब्दी नर्मदा पर स्थित सरदार सरोवर बाँध और विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' (सदार वल्लभभाई पटेल) का स्थल। है ।
5. नर्मदा की सहायक नदियाँ, प्रमुख संगम और तटवर्ती नगर - नर्मदा नदी के संपूर्ण 1,312 किलोमीटर के प्रवाह क्षेत्र में कुल 41 सहायक नदियाँ आकर मिलती हैं। इनमें से 22 नदियाँ बाएँ तट (सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला) से और 19 नदियाँ दाएँ तट (विंध्याचल पर्वत श्रृंखला) से आकर संगम बनाती हैं।।भ्रंश घाटी में बहने के कारण नर्मदा का प्रवाह अनूठा है। दक्षिण (सतपुड़ा) से आने वाली नदियाँ पहाड़ी वेग और प्रपात बनाती हुई आती हैं, जबकि उत्तर (विंध्याचल) से आने वाली नदियाँ शांत और मंद गति से आकर नर्मदा में विलीन होती हैं। भौगोलिक महत्व तवा नदी  (नर्मदा की सबसे बड़ी सहायक नदी बांद्राभान , जिला नर्मदापुरम (म.प्र.) नर्मदापुरम (होशंगाबाद) यह नर्मदा का सबसे विशाल संगम है। यहाँ प्रतिवर्ष प्रसिद्ध 'बांद्राभान मेला' आयोजित होता है। कावेरी नदी (मध्य प्रदेश वाली) ओंकारेश्वर, जिला खंडवा ओंकारेश्वर (मांधाता) कावेरी और नर्मदा का यह संगम मांधाता द्वीप ('ॐ' आकार) का निर्माण करता है। यहाँ कोटितीर्थ और ऋणमोचन संगम स्थित है। हिरन नदी सांकल / जबलपुर सीमा जबलपुर / पाटन दाएँ तट (उत्तर) से मिलने वाली प्रमुख नदी। जबलपुर का प्रसिद्ध भेड़ाघाट क्षेत्र इस संगम के निकट है। बरना नदी वामन घाट, जिला रायसेन बाड़ी / रायसेन पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यहाँ भगवान विष्णु के 'वामन अवतार' से जुड़ा स्थल स्थित है। तंदोनी नदी पांडवद्वीप, जिला रायसेन रायसेन / सिलवानी क्षेत्र पांडवों के अज्ञातवास से जुड़ा पौराणिक संगम स्थल।।बंजर नदी मंडला, मध्य प्रदेश मंडला शहर बंजर और नर्मदा नदियाँ मंडला नगर को तीन ओर से घेरकर एक प्राकृतिक कुंडल बनाती हैं, जिसके मध्य गोंड किला स्थित है। शेर एवं शक्कर नदी नरसिंहपुर जिला, म.प्र. नरसिंहपुर / गाडरवारा सतपुड़ा की पहाड़ियों से निकलकर नरसिंहपुर के उपजाऊ मैदानी भाग में नर्मदा जी से संगम बनाती हैं। दूधी नदी होशंगाबाद-नरसिंहपुर सीमा पिपरिया / सोहागपुर के पास बाएँ तट से आकर नर्मदा में मिलने वाली प्रमुख सतपुड़ा कालीन नदी। ओरसांग नदी चांदोद, जिला वडोदरा (गुजरात) चांदोद / डभोई गुजरात में नर्मदा और ओरसांग का संगम अत्यंत पवित्र माना जाता है। इसे 'गुजरात का प्रयाग' या प्रमुख 'पितृ-तर्पण स्थल' कहा जाता है। 
भारत की अधिकांश नदियाँ (जैसे गंगा, यमुना, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी) मैदानी भागों से बहते हुए पूर्व दिशा की ओर जाती हैं और बंगाल की खाड़ी में गिरने से पूर्व विशाल डेल्टा (Delta) का निर्माण करती हैं। किंतु नर्मदा नदी का भौगोलिक व्यवहार इससे पूर्णतः भिन्न है:। नर्मदा मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात से होकर पश्चिम दिशा में बहती है।।नर्मदा नदी कठोर चट्टानी भ्रंश घाटियों  के बीच से होकर बहती है। तीव्र ढलान और वेग के कारण यह अपने साथ भारी मात्रा में गाद  जमा नहीं होने देती।  समुद्र में विलीन होते समय नर्मदा जी डेल्टा बनाने के बजाय एश्चुअरी बनाती हैं। जहाँ नदी का ताजा मीठा जल और समुद्र का खारा जल आपस में सीधे टकराते हैं, उसे ज्वारनदमुख कहते हैं।अंतिम महा-संगम: गुजरात के ऐतिहासिक भरूच (Bharuch) जिले के समीप नर्मदा जी 'खंभात की खाड़ी' में जाकर अरब सागर में लीन हो जाती हैं। भरूच का विमलेश्वर और कबीरवड क्षेत्र इस अंतिम महा-संगम का साक्षी बनता है।
मांधाता पर्वत का सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक: पंचदेव परंपरा का केंद्र है।  मांधाता पर्वत केवल स्थापत्य या नदियों के संगम का स्थल नहीं है, बल्कि यह सनातन धर्म की पंचदेव परंपरा और विविध आध्यात्मिक धाराओं का अद्वितीय संगम स्थल रहा है: शैव संप्रदाय: 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के कारण यह अनादि काल से शैव परंपरा का सर्वोच्‍च केंद्र है। वैष्णव संप्रदाय: मांधाता पर स्थित विष्णु के चौबीस अवतारों का मंदिर और लक्ष्मी-नारायण मंदिर वैष्णव भक्तों की आस्था का केंद्र है।।शाक्त संप्रदाय: यहाँ स्थित सप्तमातृका मंदिर, महिषासुरमर्दिनी मंदिर और आनंद भैरवी मंदिर देवी शक्ति के उपासकों की सिद्ध पीठ हैं। सौर संप्रदाय: सूर्यवंशी सम्राट मांधाता की तपोभूमि होने के कारण यह सूर्य उपासना का भी ऐतिहासिक केंद्र रहा है। अद्वैत वेदांत की तपोभूमि: जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने इसी मांधाता पर्वत पर अपने गुरु गोविंद भगवत्पाद के चरणों में बैठकर ज्ञान प्राप्त किया था और यहीं से संपूर्ण भारत में अद्वैत वेदांत का संदेश प्रसारित किया था।
 जीवनदायिनी रेवा और मांधाता की अमर चेतना स्थल अमरकंटक की मैकल पहाड़ियों से प्रादुर्भूत होकर खंभात की खाड़ी तक बहने वाली नर्मदा जी केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक चेतना की रीढ़ हैं। मन्वंतरों से लेकर आज तक मांधाता पर्वत पर परमार, कलचुरी, गोंड और होल्कर जैसे महान राजवंशों द्वारा निर्मित मंदिर स्थापत्य भारतीय शिल्प शास्त्र के स्वर्ण युग को दर्शाते हैं। तवा, कावेरी, बरना, बंजर और ओरसांग जैसी 41 सहायक नदियों को अपने आँचल में समेटती हुई नर्मदा जी जहाँ प्राकृतिक समृद्धि लाती हैं, वहीं इसके तट पर स्थित नर्मदेश्वर पत्थर जन-जन को शिवत्व का बोध कराते हैं। मांधाता पर्वत पर गूंजती "हर हर नर्मदे, हर हर महादेव" की ध्वनि आज भी हर श्रद्धालु के हृदय में वही आनंद उत्पन्न करती है जो सत्ययुग में नर्मदा के प्रथम अवतरण पर उत्पन्न हुआ था। रेवा तट की यह यात्रा वास्तव में समय, इतिहास और अध्यात्म के असीम सागर में डुबकी लगाने के समान है।

गुरुवार, सितंबर 10, 2026

सौर संस्कृति

सौर संस्कृति  स्थल खटांगी सूर्यमंदिर  
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
सौर धर्म (सूर्य उपासना) के संस्थापक की बात है, तो शास्त्रों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को देश में सौर धर्म को प्रसारित करने और सूर्य मंदिरों की स्थापना का मुख्य श्रेय दिया जाता है। साम्ब ने ही कुष्ठ रोग से मुक्ति पाने के लिए भारत के विभिन्न हिस्सों में १२ प्रसिद्ध सूर्य मंदिरों की स्थापना करवाई थी। 
ख़तांगी का सूर्य मंदिर -  बिहार राज्य का  अरवल जिले के सोनभद्र वंशीसूर्यपुर प्रखंड के नेरा नदी के तट पर स्थित  खटांगी गांव मे सूर्यमंदिर अवस्थित है। यहाँ स्थापित भगवान सूर्य  की अत्यंत दुर्लभ प्रतिमा खटांगी गढ़ की उत्खनन  के दौरान २०० वर्ष  पीपल के वृक्ष के नीचे स्थापित की गई थी। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह प्रतिमा मौर्यकालीन पूर्णतः काले पत्थर से निर्मित  भगवान भास्कर सात घोड़ों के रथ पर सवार हैं और उनके सारथी अरुण है । ग्रामीणों एवं सूर्य उपासकों एवं श्रद्धालुओं के सहयोग से वर्ष १९९५ में यहाँ १०८ फीट ऊंचे भव्य और सुंदर सूर्य मंदिर का निर्माण पूरा हुआ है । सौर संस्कृति  के राजा खतांग  ने द्वापर युग में धाता आदित्य की मूर्ति स्थापित किया था। 
सौर संस्कृति और सूर्य उपासना के प्रसिद्ध सूर्य मंदिर में  उमंगा सूर्य मंदिर , औरंगाबाद , राजा एल द्वारा सतयुग में कराई गई थी।  देव व  देवार्क सूर्य मंदिर औरंगाबाद, बिहार गुप्तकालीन (५वीं-६ठी शताब्दी), इसका मुख्य द्वार पश्चिम की ओर है। उलार्क सूर्य मंदिर पालीगंज, पटना (बिहार) भगवान कृष्ण के पुत्र साम्ब द्वारा स्थापित पौराणिक १२ मंदिरों में से एक। कन्दाहा सूर्य मंदिर सहरसा, बिहार द्वापरकालीन मान्यता, जिसे कृष्ण-पुत्र साम्ब से जोड़ा जाता है। बड़ार्क सूर्य मंदिर बड़गांव, नालंदा (बिहार) मगध क्षेत्र का प्राचीन और अत्यंत प्रसिद्ध सूर्य उपासना केंद्र। क़िकट प्रदेश का राजा गय  ने स्वायंभुव मन्वंतर वैवस्वत मन्वंतर के सतयुग में गया में गयॉर्क सूर्यमंदिर गर्भ गृह में अर्यमा आदित्य सूर्य स्थापित है ।  औंगारी धाम सूर्य मंदिर नालंदा, बिहार द्वापरकालीन आस्था का केंद्र, जिसका मुख्य द्वार पश्चिम की ओर है। पुण्यार्क सूर्य मंदिर बाढ़, पटना (बिहार) मगध क्षेत्र के ५ प्रमुख ऐतिहासिक सूर्य मंदिरों में शामिल। कोणार्क सूर्य मंदिर ओडिशा १३वीं शताब्दी में पूर्वी गंग वंश के राजा नरसिंहदेव प्रथम द्वारा निर्मित। मार्तंड सूर्य मंदिर अनंतनाग, जम्मू और कश्मीर ८वीं शताब्दी में कार्कोट राजवंश के राजा ललितादित्य मुक्तापीड द्वारा निर्मित। मोढेरा सूर्य मंदिर मेहसाणा, गुजरात ११वीं शताब्दी में सोलंकी वंश के राजा भीमदेव प्रथम द्वारा निर्मित है ।

गुरुवार, सितंबर 03, 2026

आध्यात्म और शांति स्थल है हरिद्वार

हरिद्वार - सनातन धर्म  संस्कृति की आत्मा का भूगोल 
 सत्येंद्र कुमार पाठक
हरिद्वार केवल एक शहर नहीं है। यह भारत की आत्मा का भूगोल है। नक्शे पर यह उत्तराखंड के हरिद्वार जिले का 2360 वर्ग किमी का एक जिला है, पर चेतना के नक्शे पर यह वह बिंदु है जहाँ हिमालय समाप्त होता है और भारत शुरू होता है। जहाँ शिवालिक पर्वत मैदान को प्रणाम करता है और गंगा पहाड़ों की गोद छोड़कर पहली बार मैदान में उतरती है। इसीलिए इसका नाम हरिद्वार है - हरि का द्वार, हर का द्वार।
29 अगस्त 2026 से 2 सितंबर 2026 तक मुझे यह सौभाग्य मिला कि मैं हरिद्वार को एक यात्री की तरह नहीं, एक इतिहासकार की तरह देख सकूँ। यह केवल मंदिर दर्शन नहीं था, यह चेतना की यात्रा थी। इस यात्रा में मेरे साथ अलग-अलग पड़ावों पर मेरे सहयात्री रहे, जिन्होंने इस यात्रा को और समृद्ध किया । 
  हरिद्वार - जहाँ आत्मा को चेतना मिलती है (29 अगस्त 2026) - अग्रसेन घाट, हंस घाट, हर की पौड़ी और अवधूत आश्रम ।  29 अगस्त 2026 की सुबह हम अवधूत आश्रम में थे। अवधूत आश्रम हरिद्वार का वह केंद्र है जहाँ पुस्तकें भी गंगा हैं। यहाँ  हमने गंगा जल को अंजुली में लेकर बाबा शिवलिंग पर जलाभिषेक किया। "अंजुली का जल अहंकार को धो देता है।" यह बात मेरे मन में बैठ गई। जब हम लोटे से जल चढ़ाते हैं तो हम बड़े बन जाते हैं, दाता बन जाते हैं, पर जब अंजुली से जल चढ़ाते हैं तो हम छोटे, विनम्र, याचक बन जाते हैं। और शिव को विनम्रता ही प्रिय है।
हरिद्वार का इतिहास मन्वंतर काल से शुरू होता है। जिसे आज हम हर की पौड़ी / हरि की पौड़ी कहते हैं, उसका पहला नाम ब्रह्मकुंड था। पुराणों के अनुसार राजा श्वेत ने यहाँ ब्रह्मा जी की घोर तपस्या की थी। ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए और वरदान दिया कि यह स्थान हरि के नाम से जाना जाएगा। इसलिए एक ही स्थान के दो नाम हैं - हर की पौड़ी यानी शिव की पौड़ी और हरि की पौड़ी यानी विष्णु की पौड़ी। शैव और वैष्णव का ऐसा संगम और कहीं नहीं है।
ऐतिहासिक तथ्य यह है कि इसका निर्माण उज्जैन के सम्राट राजा विक्रमादित्य ने अपने भाई भर्तृहरि की याद में पहली शताब्दी ईसा पूर्व में करवाया था। यहाँ आज भी शिला पर भगवान विष्णु के चरण चिह्न अंकित हैं, जिन्हें हरि चरण कहते हैं। समुद्र मंथन की कथा के अनुसार जब धन्वंतरि अमृत कलश लेकर जा रहे थे, तो अमृत की चार बूंदें चार जगह गिरीं - हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक। इसलिए यहाँ कुंभ होता है। 29 अगस्त की संध्या को जब हम डॉ. संगीता सागर, ममता शर्मा और त्रिलोक चंद जी के साथ हर की पौड़ी पर स्नान कर रहे थे, तो लगा जैसे हम केवल 2026 में नहीं, बल्कि उस क्षण में भी हैं जब अमृत गिरा था। वह जल केवल जल नहीं था, वह समय था। उसी दिन हमने दो और घाटों के दर्शन किए - महाराजा अग्रसेन घाट और हंस घाट।
महाराजा अग्रसेन घाट आधुनिक भारत के सामाजिक इतिहास का प्रतीक है। महाराजा अग्रसेन ने 5000 साल पहले एक रुपया और एक ईंट का सिद्धांत दिया था - हर नया बसा व्यक्ति समाज को एक रुपया और एक ईंट देगा, ताकि कोई भी गरीब न रहे। उसी सिद्धांत पर यह घाट बना है। यहाँ कोई पंडा नहीं, कोई शुल्क नहीं, कोई वीवी आई  व्यवस्था नहीं। यह सेवा का घाट है। निःशुल्क चेंजिंग रूम, प्याऊ, कूड़ेदान। यह बताता है कि दान से ही समाज बनता है, लूट से नहीं।
हंस घाट, जिसे मालवीय घाट भी कहते हैं, वैदिक इतिहास का प्रतीक है। मान्यता है कि ब्रह्मा जी के वाहन हंस ने यहाँ तपस्या कर गंगा को प्रसन्न किया था, इसलिए इसका नाम हंस घाट पड़ा। महामना मदन मोहन मालवीय जी ने यहाँ गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए स्नान की व्यवस्था बनवाई थी। बगल में 1936 में बना प्रसिद्ध बिरला टॉवर है, जहाँ से पूरे हरिद्वार का समय चलता है। यह घाट हमें बताता है कि हरिद्वार केवल स्नान की नगरी नहीं, ज्ञान की नगरी भी है।
पर्यावरणीय चेतना - हर की पौड़ी पर संध्या आरती के समय जब हमने हजारों दीये, फूल, पॉलीथीन, अगरबत्ती के पैकेट को गंगा में बहते देखा, तब "भक्ति तो है पर पर्यावरण के प्रति भक्ति नहीं।" हर की पौड़ी पर जल की धारा तेज है, इसलिए कचरा बह जाता है और हमें लगता है गंगा साफ है, पर वह कचरा आगे जाकर कहाँ जाता है? यही तो गंगा प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है। भक्ति के नाम पर हम माँ को ही प्रदूषित कर रहे हैं।
हमने वहीं संकल्प लिया कि आरती में फूल तो चढ़ाएंगे पर पॉलीथीन नहीं, दीया तो जलाएंगे पर प्लास्टिक वाला दीया नहीं। सच्ची आरती वही है जो गंगा को निर्मल रखे। और इसका समाधान हमें अग्रसेन घाट और हंस घाट पर मिला। इन दोनों घाटों पर सफाई है। अग्रसेन घाट पर बकायदा कूड़ेदान लगे हैं, हंस घाट पर गुरुकुल के ब्रह्मचारी प्रतिदिन घाट की सफाई करते हैं। यहाँ जल स्थिर और निर्मल है क्योंकि यहाँ भीड़ नहीं है। यह बताता है कि गंगा को साफ रखने के लिए दो काम करने होंगे - भीड़ को नियंत्रित कर घाटों को बाँटना होगा और हर घाट पर सेवा का भाव लाना होगा। पर्यावरण की रक्षा ही गंगा की सच्ची आरती है।
आध्यात्मिक चेतना - इस पूरी यात्रा की सबसे गहरी अनुभूति आध्यात्मिक थी। 29 अगस्त की संध्या को हर की पौड़ी पर जब 50 पंडितों ने एक साथ महाआरती की, हजारों दीये गंगा में तैरे , शंख बजे, तो जो अनुभूति हुई उसे शब्दों में नहीं लिखा जा सकता। हम सबके हाथ में दीये थे - मेर। दीये की लौ में माँ गंगा का चेहरा दिख रहा था। उस क्षण लगा कि गंगा केवल जल नहीं, प्रकाश है। आरती लेने के बाद जो शांतिपूर्ण और आध्यात्मिक गहराई की अनुभूति हुई, वह जीवन भर की पूंजी बन गई।
यह यात्रा हमें तीन मंत्र देकर गई - ऐतिहासिक चेतना कहती है - अपने परिवार का सम्मान करो, जैसे शिव ने दक्ष को माफ किया। पर्यावरणीय चेतना कहती है - गंगा को माँ समझो, नाली नहीं। आध्यात्मिक चेतना कहती है - अंजुली का जल ही आरती बन जाता है, अगर मन साफ हो।
 शिवालिक की गोद में मातृ-शक्ति के तीन शिखर - मनसा, चंडी और अंजनी (1 सितंबर 2026) - हरिद्वार को लोग समतल मैदान समझते हैं, पर यह भारत के भूगोल की सबसे बड़ी भूल है। सच यह है कि हरिद्वार शिवालिक पर्वत श्रृंखला का द्वार है। यहीं आकर शिवालिक हिमालय से मिलता है और मैदान शुरू होता है। भूगोल की भाषा में शिवालिक सबसे नया पर्वत है, जो आज भी बढ़ रहा है। 1 सितंबर 2026 की सुबह 5:30 बजे, जब हरिद्वार में हल्का कोहरा छाया था और गंगा पर धुंध थी, मैं, डॉ. उषा किरण श्रीवास्तव और डॉ. संगीता सागर के साथ नील पर्वत श्रृंखला की ओर निकल पड़ा। यह यात्रा केवल मंदिर दर्शन नहीं थी, यह हरिद्वार की मातृ संस्कृति का साक्षात्कार था।
हरिद्वार तीन पर्वतों से घिरा है - नील पर्वत, बिल्व पर्वत और नारायण पर्वत। आज हमारा लक्ष्य नील और बिल्व पर्वत था। नीचे नील धारा है और चंडी घाट। चंडी घाट वह घाट है जहाँ से माँ चंडी देवी के लिए रोप-वे शुरू होता है। सुबह के समय यहाँ गंगा बहुत चौड़ी हो जाती है। यहाँ गंगा दो धाराओं में बंट जाती है - मुख्य धारा और नील धारा। नील धारा नील पर्वत के नीचे से बहती है। यहाँ से नील पर्वत का दृश्य ऐसा लगता है जैसे कोई माँ अपनी गोद में हरिद्वार को बैठाए हो। हमने यहाँ आचमन किया और पर्वत चढ़ाई शुरू की।
बिल्व पर्वत पर मनसा देवी - हमने पहले बिल्व पर्वत की चढ़ाई शुरू की। बिल्व पर्वत शिवालिक की दक्षिणी श्रृंखला पर स्थित है। इसकी ऊँचाई लगभग 585 मीटर (1,926 फीट) समुद्र तल से है। बिल्व यानी बेलपत्र का पर्वत। कहते हैं यहाँ प्राचीन काल में बेल के घने जंगल थे, जिनके बेलपत्र सीधे हर की पौड़ी के शिवलिंगों पर चढ़ते थे, इसलिए नाम बिल्व पड़ा। यह मंदिर नील पर्वत नहीं, बिल्व पर्वत की चोटी पर है। यहाँ से हर की पौड़ी सीधे नीचे दिखती है। रोप-वे से 5 मिनट में पहुँचा जा सकता है, पर हमने पैदल मार्ग से चढ़ाई की, जिसमें लगभग 1.5 किमी की चढ़ाई है। माँ मनसा देवी को नागों की देवी और इच्छा देवी कहा जाता है। 51 शक्तिपीठों में यह वह स्थान है जहाँ देवी सती का मन गिरा था, इसलिए नाम मनसा पड़ा। कुछ कथाओं में कहा जाता है कि यहाँ सती के मस्तिष्क का हिस्सा गिरा था। यह मंदिर 1811 में मणिराम ने बनवाया था। मान्यता है कि यहाँ सच्चे मन से जो धागा बांधा जाता है, मन की इच्छा पूरी होती है। मंदिर में पीपल के पेड़ पर हजारों धागे बंधे हैं। डॉ. उषा श्रीवास्तव जी ने यहाँ अपने कला केंद्र के बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए और डॉ. संगीता सागर जी ने अपने परिवार और बीमा परिवार के कल्याण के लिए मौली बांधी।
यहाँ से पूरा हरिद्वार दिखता है। यह शिवालिक का वह बिंदु है जहाँ से पर्वत मैदान में बदल जाता है। यहाँ खड़े होकर समझ आता है कि माँ क्यों ऊँचे पर्वत पर रहती है - ताकि वह अपने सभी बच्चों पर नजर रख सके। यही तो मातृ संस्कृति है।
नील पर्वत पर चंडी देवी - बिल्व पर्वत से उतरकर हम नील पर्वत की ओर गए। नील पर्वत शिवालिक की पूर्वी श्रृंखला पर स्थित है। इसकी ऊँचाई लगभग 2,900 फीट (लगभग 884 मीटर) समुद्र तल से है। यह मनसा से लगभग 300 मीटर ऊँचा है। यह हरिद्वार का सबसे ऊँचा सिद्धपीठ है। यहाँ तक पहुँचने के लिए 3 किमी की खड़ी चढ़ाई है। चंडी देवी मंदिर शक्ति का प्रचंड रूप है। यह 51 शक्तिपीठों में से एक नहीं, पर अति प्रसिद्ध सिद्धपीठ है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार देवी चंडी ने इसी नील पर्वत पर शुंभ और निशुंभ नामक दो राक्षस राजाओं का वध किया था। उनके वध के बाद देवी ने यहीं विश्राम किया। कथा यह भी है कि यहाँ देवी सती के सिर का निशान गिरा था। यह मंदिर 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य जी ने स्थापित किया था और 1929 में कश्मीर नरेश सुचत सिंह ने इसका जीर्णोद्धार करवाया। मंदिर के गर्भगृह में माँ चंडी की दो मूर्तियाँ हैं - एक मुख्य अचल मूर्ति और एक चल मूर्ति। हमने यहाँ चंडी पाठ किया। यहाँ से नील धारा, चंडी घाट और राजाजी नेशनल पार्क का घना जंगल दिखता है। अगर मनसा इच्छा देती है, तो चंडी उस इच्छा को पूरा करने की शक्ति देती है।
नील पर्वत की दूसरी चोटी पर माता अंजनी देवी - चंडी मंदिर से नीचे उतरते समय, नील पर्वत की ही एक दूसरी चोटी पर एक छोटा सा गुप्त मंदिर है - माता अंजनी देवी मंदिर। इसकी ऊँचाई लगभग 800 से 900 मीटर के आसपास है। यह मंदिर भगवान हनुमान की दिव्य माता अंजनी देवी को समर्पित है। यह अंजनी देवी की तपभूमि है। पौराणिक कथा है कि अंजनी देवी ने पुत्र प्राप्ति के लिए नील पर्वत पर हजारों वर्षों तक तपस्या की थी। वायु देवता के आशीर्वाद से उन्हें हनुमान जी जैसा पुत्र प्राप्त हुआ। इसलिए यह हरिद्वार की ऊँची चोटियों पर एक ऐसा चमत्कारी स्थान है, जहाँ संतान प्राप्ति की मन्नत कभी खाली नहीं जाती। हम जब यहाँ पहुँचे तो कई निःसंतान दंपति यहाँ पूजा कर रहे थे। अंदर अंजनी माता की गोद में बाल हनुमान की मूर्ति है। बगल में ही हनुमान जी का छोटा मंदिर है, जहाँ हनुमान जी अपनी माँ की पहरेदारी में खड़े हैं। मनसा इच्छा देती है, चंडी शक्ति देती है, और अंजनी माता संतान यानी वंश देती है। यह तीनों ही नारी के तीन रूप हैं।
मैदान में माया देवी और सप्त सरोवर में भारत माता - जबकि मनसा बिल्व पर, चंडी और अंजनी नील पर हैं, एक और शक्ति है जो मैदान में है - माया देवी मंदिर। यह हरिद्वार शहर के मुख्य क्षेत्र में, हर की पौड़ी और बिरला घाट के पास है। माया देवी हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी हैं। हरिद्वार का पुराना नाम मायापुरी भी इन्हीं के नाम पर है। यहाँ सती की नाभि गिरी थी, इसलिए यह 51 शक्तिपीठों में सबसे महत्वपूर्ण है। यह 11वीं शताब्दी का मंदिर है। बिना माया देवी के दर्शन के मनसा-चंडी की यात्रा अधूरी मानी जाती है। माया देवी वह जड़ हैं, जिनसे बिल्व और नील पर्वत निकले हैं।
पर्वत से नीचे उतरकर हम सप्त सरोवर के पास स्थित भारत माता मंदिर गए। यह 8 मंजिला मंदिर है, जिसे स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी ने बनवाया था और 1983 में इंदिरा गांधी ने इसका उद्घाटन किया था। यह हरिद्वार का इकलौता ऐसा मंदिर है जहाँ किसी देवी-देवता की नहीं, बल्कि भारत माता की पूजा होती है। हर मंजिल पर भारत के इतिहास को दर्शाया गया है - पहली पर भारत माता की 8 फीट ऊँची मूर्ति, दूसरी पर शूर मंदिर, तीसरी पर मातृ मंदिर। डॉ. संगीता जी ने कहा - "गंगा और भारत माता एक ही हैं। दोनों मातृ संस्कृति की प्रतीक हैं। एक जल देती है, दूसरी जीवन।"
अंत में हम वैष्णवी मंदिर गुफा और सदानंद आश्रम गुफा गए। वैष्णवी गुफा नील पर्वत की तलहटी में एक प्राकृतिक गुफा है, जहाँ वैष्णव संतों ने तपस्या की थी। यहाँ विष्णु जी के 24 अवतारों की मूर्तियाँ हैं। सदानंद आश्रम गुफा में 100 साल से अखंड धूना जल रहा है। 1 सितंबर की यह प्रातःकालीन यात्रा दोपहर 12 बजे तक पूरी हुई। 6 घंटे में 6 देवियों और देवताओं के दर्शन - यही हरिद्वार की मातृ संस्कृति है - जहाँ नदी भी माँ है, पर्वत भी माँ है, धरती भी माँ है और देश भी माँ है।
 शांतिकुंज से सप्तऋषि तक - बूंद-बूंद में गंगा, मंत्र-मंत्र में जीवन - 
2 अगस्त 2026 को हरिद्वार में रिमझिम वर्षा हो रही थी। भाद्रपद  का महीना, आकाश में बादल और गंगा में जल की बूंदों की थाप। मेरे साथ थीं डॉ. उषा श्रीवास्तव और डॉ. संगीता सागर। हम तीनों ने छाता बंद कर दिया और वर्षा में भीगते हुए ही शांतिकुंज पहुँचे।
शांतिकुंज युग निर्माण की प्रयोगशाला है। यह केवल आश्रम नहीं, पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा स्थापित एक विचार क्रांति का केंद्र है। आचार्य जी ने 1926 में गायत्री की साधना शुरू की और 24-24 लाख के 24 महापुरश्चरण किए। 1971 में उन्होंने इसे मथुरा से हरिद्वार स्थानांतरित किया। आज यह अखिल विश्व गायत्री परिवार का मुख्यालय है।
हम अपराह्न 12:30 बजे शांतिकुंज पहुँचे। वर्षा तेज थी। प्रवेश करते ही सबसे पहले हमने देवात्मा हिमालय मंदिर और गंगेश्वर शिवलिंग के दर्शन किए। यह शांतिकुंज का हृदय है। कहा जाता है कि यहाँ हिमालय की दिव्य आत्माओं का वास है। हमने यहाँ शिवलिंग पर मानसिक रूप से गायत्री मंत्र से उपासना की।
फिर अन्नपूर्णा भवन में सामूहिक भोजन - कढ़ी, सब्जी-भात, रोटी का सात्विक प्रसाद। प्रतिदिन हजारों लोग निःशुल्क भोजन करते हैं। भोजन के बाद हम ध्यान भवन गए। यह एक अंधेरा कक्ष है, जहाँ पूर्ण सन्नाटा है। केवल गायत्री मंत्र की बहुत धीमी ध्वनि कानों में गूंजती है। हमने 20 मिनट तक "ॐ भूर्भुवः स्वः..." का मौन मानसिक जाप किया। आँखें बंद करते ही लगा जैसे शरीर में प्रकाश भर रहा है।
ध्यान के बाद हमने शांतिकुंज पुस्तकालय, प्रदर्शनी और पौधा प्रदर्शनी का भ्रमण किया। पुस्तकालय में आचार्य जी की लिखी 3000 से अधिक पुस्तकें हैं। प्रदर्शनी में मानव शरीर के षट्चक्रों का वैज्ञानिक मॉडल दिखाया गया है। सबसे सुंदर थी आयुर्वेद पौधा प्रदर्शनी, जहाँ तुलसी, नीम, पीपल, रुद्राक्ष के हजारों पौधे निःशुल्क बाँटे जा रहे थे।
यहाँ एक कड़वा अनुभव भी हुआ, जो लिखना जरूरी है क्योंकि सच ही धर्म है। वर्षा तेज होने पर मैं पौधा प्रदर्शनी के बरामदे में लगी कुर्सी पर बैठकर वर्षा थमने का इंतजार कर रहा था। तभी पीले वस्त्र पहने एक आयुर्वेद विक्रेता ने आकर खड़ी-खोटी सुनाई और कहा - "यहाँ से चले जाइए, वर्षा में यहाँ रहने की जरूरत नहीं है।" उनका व्यवहार बहुत रूखा था। परंतु यह एक अपवाद था। नेपाल से आए कर्मी और प्रसाद वितरण करने वाले स्वयंसेवकों का व्यवहार बहुत आत्मीय रहा। उन्होंने कहा - "वर्षा गायत्री माँ का आशीर्वाद है, भीगिए।" यह घटना भी एक सीख दे गई - बड़ी संस्थाओं में भी व्यक्ति का व्यवहार ही धर्म बनता है।
वहाँ से मात्र 2 किमी दूर है सप्तऋषि आश्रम। इसका इतिहास शांतिकुंज से भी हजारों साल पुराना है। पुराणों के अनुसार जब गंगा हिमालय से मैदान में आई, तो उसका वेग इतना तेज था कि पृथ्वी फट जाती। तब सात महान ऋषियों - कश्यप, अत्रि,भारद्वाज, विश्वामित्र, वशिष्ठ, जमदग्नि और गौतम ने यहाँ तपस्या कर गंगा के वेग को रोका। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा यहाँ सात धाराओं में बंट गई। इसलिए इस स्थान को सप्त सरोवर कहा जाता है। आज भी यहाँ गंगा सात धाराओं में बहती है। वर्षा में सप्तऋषि का दृश्य अद्भुत था। हर धारा पर जल बूंदें गिर रही थीं और धुंध में इंद्रधनुष बन रहा था। मुख्य मंदिर में वशिष्ठ और अरुंधति की मूर्ति एक साथ है, जो भारतीय दाम्पत्य के अखंड प्रेम का प्रतीक है। परिसर में ही माता सरस्वती, तिरुपति बालाजी, बाबा गंगेश्वर शिवलिंग, संकटमोचन हनुमान जी और राम-लखन-जानकी का मंदिर है, जहाँ सावन का झूला पड़ा था। यह यात्रा दोपहर 3:30 बजे तक चली। तीन घंटे हम भीगते रहे, पर मन भीगता रहा भक्ति से।
यात्रा पूरी नहीं, शुरू होती है । 29 अगस्त को अग्रसेन घाट ने सेवा सिखाई, हंस घाट ने ज्ञान, हर की पौड़ी ने मोक्ष और अवधूत आश्रम ने सिखाया कि पुस्तकें भी गंगा हैं। 1 सितंबर को बिल्व पर्वत ने इच्छा, नील पर्वत ने शक्ति, अंजनी ने वंश, माया ने जन्म और भारत माता ने राष्ट्र बोध सिखाया। 2 अगस्त को शांतिकुंज ने सिखाया कि गायत्री मंत्र ही असली गंगा है, जो मन को साफ करती है और सप्तऋषि ने सिखाया कि ज्ञान सात धाराओं में बंटकर भी एक ही रहता है।
हरिद्वार का भूगोल ही उसका अध्यात्म है - दक्षिण में बिल्व (585 मीटर) पर मनसा, पूर्व में नील (884 मीटर) पर चंडी, उसी नील की दूसरी चोटी (800-900 मीटर) पर अंजनी, मैदान में माया और सप्त सरोवर में भारत माता। इसी को सनातन धर्म की मातृ संस्कृति कहते हैं। शिवालिक पर्वत केवल पत्थर नहीं, माँ की गोद है। और हरिद्वार वह स्थान है जहाँ पर्वत माँ बन जाता है और गंगा बेटी बनकर उसके चरणों में बहती है।
हमने केवल मंदिर नहीं, अपनी माँ के चार रूप देखे - मन की इच्छा, आत्मा की शक्ति, वंश का संस्कार और राष्ट्र का बोध। जो एक बार हरिद्वार के घाटों पर अंजुली में जल लेकर शिव को याद करता है, वह जीवन भर गंगा को अपने साथ ले जाता है। इसलिए हरिद्वार की यात्रा कभी पूरी नहीं होती, वहीं से शुरू होती है।

मंगलवार, सितंबर 01, 2026

हरिद्वार परिभ्रमण

हरिद्वार  : शिवालिक की गोद में मातृ-शक्ति 
 सत्येंद्र कुमार पाठक 
हरिद्वार को लोग समतल मैदान समझते हैं, पर यह भारत के भूगोल की सबसे बड़ी भूल है। सच यह है कि हरिद्वार शिवालिक पर्वत श्रृंखला का द्वार है। यहीं आकर शिवालिक हिमालय मैदान से मिलता है और गंगा पहाड़ों को छोड़कर मैदान में आती है। इसीलिए इसे हरिद्वार - हरि का द्वार कहा गया। 01  सितंबर 2026 की सुबह 5:30 बजे, जब हरिद्वार में हल्का कोहरा छाया था और गंगा पर धुंध थी, मैं, स्वर्णिम कला केंद्र मुजफ्फरपुर की अध्यक्ष डॉ. उषा किरण श्रीवास्तव और मुजफ्फरपुर  , बिहार  की डॉ. संगीता सागर के साथ नीलगिरि पर्वत श्रृंखला की ओर निकल पड़ा। यह यात्रा केवल मंदिर दर्शन नहीं थी, यह हरिद्वार की मातृ संस्कृति का साक्षात्कार था।
नील पर्वत और चंडी घाट - जहाँ से यात्रा शुरू होती है, हरिद्वार तीन पर्वतों से घिरा है - नील पर्वत, बिल्व पर्वत और नारायण पर्वत। आज हमारा लक्ष्य नील और बिल्व पर्वत था। नीचे नील धारा है और चंडी घाट। चंडी घाट वह घाट है जहाँ से माँ चंडी देवी के लिए रोप-वे शुरू होता है। सुबह के समय यहाँ गंगा बहुत चौड़ी हो जाती है। यहाँ गंगा दो धाराओं में बंट जाती है - मुख्य धारा और नील धारा। नील धारा नील पर्वत के नीचे से बहती है। यहाँ से नील पर्वत का दृश्य ऐसा लगता है जैसे कोई माँ अपनी गोद में हरिद्वार को बैठाए हो। हमने यहाँ आचमन किया और पर्वत चढ़ाई शुरू की। चंडी घाट पर खड़े होकर ही समझ आता है कि हरिद्वार का भूगोल ही उसका अध्यात्म है।
 बिल्व पर्वत पर मनसा देवी - जहाँ मन की इच्छा पूरी होती है ।
हमने पहले बिल्व पर्वत की चढ़ाई शुरू की। बिल्व पर्वत शिवालिक की दक्षिणी श्रृंखला पर स्थित है। इसकी ऊँचाई लगभग *585 मीटर (1,926 फीट) समुद्र तल से* है। बिल्व यानी बेलपत्र का पर्वत। कहते हैं यहाँ प्राचीन काल में बेल के घने जंगल थे, जिनके बेलपत्र सीधे हर की पौड़ी के शिवलिंगों पर चढ़ते थे, इसलिए नाम बिल्व पड़ा। यह मंदिर नील पर्वत नहीं, बिल्व पर्वत की चोटी पर है। यहाँ से हर की पौड़ी सीधे नीचे दिखती है। रोप-वे से 5 मिनट में पहुँचा जा सकता है, पर हमने पैदल मार्ग से चढ़ाई की, जिसमें लगभग 1.5 किमी की चढ़ाई है।
माँ मनसा देवी को नागों की देवी और इच्छा देवी कहा जाता है। 51 शक्तिपीठों में यह वह स्थान है जहाँ देवी सती का मन गिरा था, इसलिए नाम मनसा पड़ा। कुछ कथाओं में कहा जाता है कि यहाँ सती के मस्तिष्क का हिस्सा गिरा था। यह मंदिर 1811 में मणिराम ने बनवाया था। मान्यता है कि यहाँ सच्चे मन से जो धागा बांधा जाता है, मन की इच्छा पूरी होती है। मंदिर में पीपल के पेड़ पर हजारों धागे बंधे हैं। डॉ. उषा श्रीवास्तव जी ने यहाँ अपने कला केंद्र के बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए और डॉ. संगीता सागर जी ने अपने परिवार और बीमा परिवार के कल्याण के लिए मौली बांधी।
यहाँ से पूरा हरिद्वार दिखता है - नीचे बहती गंगा, हर की पौड़ी के दीये और दूर तक फैला 2360 वर्ग किमी का हरिद्वार जिला। यह शिवालिक का वह बिंदु है जहाँ से पर्वत मैदान में बदल जाता है। यहाँ खड़े होकर समझ आता है कि माँ क्यों ऊँचे पर्वत पर रहती है - ताकि वह अपने सभी बच्चों पर नजर रख सके। यही तो मातृ संस्कृति है। मन इच्छा देता है। नील पर्वत पर चंडी देवी - जहाँ आत्मा को शक्ति मिलती है । 
बिल्व पर्वत से उतरकर हम नील पर्वत की ओर गए। नील पर्वत शिवालिक की पूर्वी श्रृंखला पर स्थित है। इसकी ऊँचाई *लगभग 2,900 फीट (लगभग 884 मीटर) समुद्र तल से* है। यह मनसा से लगभग 300 मीटर ऊँचा है। यह हरिद्वार का सबसे ऊँचा सिद्धपीठ है। यहाँ तक पहुँचने के लिए 3 किमी की खड़ी चढ़ाई है।
चंडी देवी मंदिर शक्ति का प्रचंड रूप है। यह 51 शक्तिपीठों में से एक नहीं, पर अति प्रसिद्ध सिद्धपीठ है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार देवी चंडी ने इसी नील पर्वत पर शुंभ और निशुंभ नामक दो राक्षस राजाओं का वध किया था। उनके वध के बाद देवी ने यहीं विश्राम किया। कथा यह भी है कि यहाँ देवी सती के सिर का निशान गिरा था। यह मंदिर 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य जी ने स्थापित किया था और 1929 में कश्मीर नरेश सुचत सिंह ने इसका जीर्णोद्धार करवाया। मंदिर के गर्भगृह में माँ चंडी की दो मूर्तियाँ हैं - एक मुख्य अचल मूर्ति और एक चल मूर्ति। यहाँ हनुमान जी और भैरव जी भी पहरेदार के रूप में हैं। हमने यहाँ चंडी पाठ किया। यहाँ से नील धारा, चंडी घाट और राजाजी नेशनल पार्क का घना जंगल दिखता है। हवा में जंगली फूलों की महक है। यहाँ की ऊर्जा बिल्कुल अलग है - यहाँ उग्र शक्ति है, जो डर को मारती है। अगर मनसा इच्छा देती है, तो चंडी उस इच्छा को पूरा करने की शक्ति देती है।
 नील पर्वत की दूसरी चोटी पर माता अंजनी देवी - जहाँ वंश मिलता है ।  चंडी मंदिर से नीचे उतरते समय, नील पर्वत की ही एक दूसरी चोटी पर एक छोटा सा गुप्त मंदिर है, जिसके बारे में बहुत कम यात्रियों को पता है - माता अंजनी देवी मंदिर।* इसकी ऊँचाई लगभग *800 से 900 मीटर के आसपास है, यानी चंडी मंदिर के समीप ही। यह मंदिर भगवान हनुमान की दिव्य माता अंजनी देवी को समर्पित है। यह अंजनी देवी की तपभूमि है। पौराणिक कथा है कि अंजनी देवी ने पुत्र प्राप्ति के लिए नील पर्वत पर हजारों वर्षों तक तपस्या की थी। वायु देवता के आशीर्वाद से उन्हें हनुमान जी जैसा पुत्र प्राप्त हुआ। इसलिए यह हरिद्वार की ऊँची चोटियों पर एक ऐसा चमत्कारी स्थान है, जहाँ संतान प्राप्ति की मन्नत कभी खाली नहीं जाती।
हम जब यहाँ पहुँचे तो कई निःसंतान दंपति यहाँ पूजा कर रहे थे। मंदिर छोटा है, अंदर अंजनी माता की गोद में बाल हनुमान की मूर्ति है। चेहरे पर ममता है। बगल में ही हनुमान जी का छोटा मंदिर है, जहाँ हनुमान जी अपनी माँ की पहरेदारी में खड़े हैं, सिंदूर से लिपटे हुए।
मनसा इच्छा देती है, चंडी शक्ति देती है, और अंजनी माता संतान यानी वंश देती है। यह तीनों ही नारी के तीन रूप हैं।" सच है - एक ही पर्वत श्रृंखला पर नारी के तीन रूप विराजमान हैं।
माया देवी मंदिर - मैदान में माँ, जो तीनों शिखरों की जननी है*
जबकि मनसा बिल्व पर्वत पर, चंडी और अंजनी नील पर्वत पर हैं, एक और शक्ति है जो मैदान में है - *माया देवी मंदिर।* यह हरिद्वार शहर के मुख्य क्षेत्र में, हर की पौड़ी और बिरला घाट के पास है।
माया देवी हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी हैं। हरिद्वार का पुराना नाम मायापुरी भी इन्हीं के नाम पर है। यहाँ सती की नाभि गिरी थी, इसलिए यह 51 शक्तिपीठों में सबसे महत्वपूर्ण है। यह 11वीं शताब्दी का मंदिर है। बिना माया देवी के दर्शन के मनसा-चंडी की यात्रा अधूरी मानी जाती है। माया देवी वह जड़ हैं, जिनसे बिल्व और नील पर्वत निकले हैं।
भारत माता मंदिर, वैष्णवी गुफा और सदानंद आश्रम गुफा है। पर्वत से नीचे उतरकर हम सप्त सरोवर के पास स्थित *भारत माता मंदिर* गए। यह 8 मंजिला मंदिर है, जिसे स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी ने बनवाया था और 1983 में इंदिरा गांधी ने इसका उद्घाटन किया था। यह हरिद्वार का इकलौता ऐसा मंदिर है जहाँ किसी देवी-देवता की नहीं, बल्कि भारत माता की पूजा होती है। हर मंजिल पर भारत के इतिहास को दर्शाया गया है। डॉ. संगीता जी ने कहा - "गंगा और भारत माता एक ही हैं। दोनों मातृ संस्कृति की प्रतीक हैं। एक जल देती है, दूसरी जीवन।"
अंत में हम *वैष्णवी मंदिर गुफा* और *सदानंद आश्रम गुफा* गए। वैष्णवी गुफा नील पर्वत की तलहटी में एक प्राकृतिक गुफा है, जहाँ वैष्णव संतों ने तपस्या की थी। अंदर बहुत ठंडक है। यहाँ विष्णु जी के 24 अवतारों की छोटी-छोटी मूर्तियाँ हैं। गुफा की दीवारों से पानी टपकता है, जिसे चरणामृत माना जाता है। सदानंद आश्रम गुफा में सदानंद स्वामी जी ने 40 साल तक मौन तपस्या की थी। अंदर विभिन्न देवियों के मंदिर हैं और 100 साल से अखंड धूना जल रहा है।
 हरिद्वार का भूगोल ही उसका अध्यात्म है ।  01 सितंबर की यह प्रातःकालीन यात्रा दोपहर 12 बजे तक पूरी हुई। 6 घंटे में हमने 6 देवियों और देवताओं के दर्शन किए। नील और बिल्व पर्वत ने हमें हरिद्वार की मातृ संस्कृति का असली अर्थ समझाया - दक्षिण में बिल्व पर्वत (585 मीटर) पर मनसा - जो मन की इच्छा पूरी करती है। पूर्व में नील पर्वत (884 मीटर) पर चंडी - जो आत्मा को शक्ति और ऊर्जा देती है। उसी नील पर्वत की दूसरी चोटी (800-900 मीटर) पर अंजनी - जो संतान और संस्कार देती है।
  माया देवी - जो इन तीनों शिखरों को जन्म देती है।और सप्त सरोवर में भारत माता - जो इन सबको जोड़कर राष्ट्र का बोध कराती हैं। इसी को सनातन धर्म की मातृ संस्कृति कहते हैं। शिवालिक पर्वत केवल पत्थर नहीं, माँ की गोद है। और हरिद्वार वह स्थान है जहाँ पर्वत माँ बन जाता है और गंगा बेटी बनकर उसके चरणों में बहती है। आज लगा कि हमने केवल मंदिर नहीं, अपनी माँ के चार रूप देखे। सच ही तो है - मन की इच्छा, आत्मा की शक्ति, वंश का संस्कार और राष्ट्र का बोध - यही तो माँ 

 कनखल - भगवान  शिव की ससुराल में एक दिन 
31 अगस्त 2026 की सुबह, ब्रह्म मुहूर्त के बाद जब हरिद्वार अभी सोकर उठ ही रहा था, हमारी छोटी सी टीम कनखल की ओर चल पड़ी। नेतृत्व में मैं, सत्येंद्र कुमार पाठक, साथ में हरियाणा की माटी के सुगंधित कवि त्रिलोक चंद फतेहपुरी, स्वर्णिम कला केंद्र मुजफ्फरपुर की अध्यक्ष और शब्दों की साधिका डॉ. उषा किरण श्रीवास्तव, भारतीय जीवन बीमा मुजफ्फरपुर की सहायक महाप्रबंधक डॉ. संगीता सागर और हरियाणा से आई सरल हृदय संतोष देवी। यह कोई पर्यटन नहीं था, यह एक तीर्थयात्रा थी, एक इतिहास यात्रा थी, एक आत्मा की यात्रा थी।
कनखल को लोग हरिद्वार का उपनगर कहते हैं, पर सच तो यह है कि हरिद्वार कनखल के बाद बसा है। यह वह भूमि है जहाँ सृष्टि के पहले परिवार की कहानी लिखी गई। जहाँ पिता, पुत्री और दामाद के संबंधों ने सनातन धर्म को परिवार की परिभाषा सिखाई। इसलिए कनखल को शिव की ससुराल कहा जाता है।
सुबह 7 बजे हम कनखल घाट पहुँचे। अगर आपने हर की पौड़ी का शोर, भीड़, चीख-पुकार, लाउडस्पीकर पर गंगा आरती देखी है, तो कनखल घाट पर आकर आप चौंक जाएंगे। यहाँ गंगा एकदम शांत, नीली, गहरी और निर्मल बह रही थी। कोई धक्का-मुक्की नहीं, कोई चिल्लाहट नहीं। बस पानी की कल-कल और मंदिरों की घंटी।
पौराणिक मान्यता है कि जब माता सती ने दक्ष के यज्ञ कुंड में प्राण दिए, तो भगवान शिव तांडव करते हुए यहाँ आए और इस घाट पर बैठकर घंटों तक ध्यान किया। उनके आंसूओं से ही गंगा यहाँ शांत हो गई। इसलिए इस घाट को शिव-ध्यान घाट भी कहते हैं।
हमने बारी-बारी से गंगा में डुबकी लगाई। अगस्त के अंत में गंगा का जल हिमालय से सीधा आता है, इसलिए बर्फ जैसा ठंडा था। पानी में पैर डालते ही शरीर में सिहरन हुई, पर डुबकी लगाते ही मन हल्का हो गया। स्थानीय पंडित राधेश्याम जी ने बताया - "यहाँ स्नान करने से पितृ दोष, कालसर्प दोष और शनि की साढ़ेसाती शांत होती है। जो लोग हर की पौड़ी पर केवल स्नान करके चले जाते हैं, उनका तीर्थ आधा अधूरा रह जाता है। कनखल में स्नान किए बिना हरिद्वार की यात्रा पूरी नहीं होती।"
स्नान के बाद हम घाट की सीढ़ियों पर बैठ गए। आँखें बंद कर 10 मिनट ध्यान किया। आँखें बंद करते ही लगा जैसे गंगा की लहरों में ॐ की ध्वनि घुल रही है। त्रिलोक चंद जी ने धीरे से एक दोहा कहा "कनखल की गंगा शांत है, जैसे ससुराल में दामाद का मौन।"
घाट से उठते ही दो कदम पर सफेद संगमरमर का छोटा सा मंदिर है - गंगा मंदिर। यह मंदिर गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के संस्थापक स्वामी श्रद्धानंद जी और पंडित मदन मोहन मालवीय जी की प्रेरणा से 1920 में बनवाया गया था।
गर्भगृह बहुत छोटा है, केवल दो लोग अंदर जा सकते हैं। अंदर 4 फीट ऊँची माँ गंगा की मूर्ति है। माँ मगर पर बैठी हैं, एक हाथ में कलश, दूसरे हाथ में कमल। मूर्ति की आँखें ऐसी हैं जैसे अभी बोल पड़ेंगी। पुजारी जी ने हमें रोली, चावल और गंगा जल दिया और कहा - "यहाँ दर्शन करने से गंगा स्नान का फल दोगुना हो जाता है। क्योंकि यहाँ गंगा केवल नदी नहीं, देवी के रूप में विराजमान हैं।"
"यहाँ आकर जीवन का असली हिसाब समझ आया। बचत तो धन की होती है, पर पुण्य की बचत यहीं होती है।"
गंगा मंदिर से सटे हुए ही काले पत्थर से बना शनि मंदिर है। हरिद्वार में शनि के इतने मंदिर नहीं हैं, पर कनखल का यह शनि मंदिर बहुत प्राचीन माना जाता है। यहाँ शनि देव की 3 फीट ऊँची मूर्ति है, जो काले ग्रेनाइट से बनी है। विशेष बात यह है कि यहाँ शनि देव की आँखों पर पट्टी नहीं है, वे सीधे देखते हैं। मान्यता है कि जब राजा दक्ष ने यज्ञ किया तो नवग्रहों को भी बुलाया था। शनि देव भी आए और यहीं रुक गए। हमने यहाँ सरसों के तेल से अभिषेक किया। पंडित जी ने बताया कि शनिवार को यहाँ तेल चढ़ाने से साढ़ेसाती का प्रभाव कम होता है। हरियाणा से आई संतोष देवी ने यहाँ अपने परिवार के लिए शनि शांति की प्रार्थना की। यह मंदिर बताता है कि गंगा की गोद में न्याय भी है।  दक्ष प्रजापति का यज्ञ स्थल और सती कुंड - जहाँ आज भी नारी के सम्मान की कहानी गूंजती है*
यह हमारी यात्रा का सबसे भावुक और सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव था। शनि मंदिर से 100 मीटर चलने पर एक खुला मैदान आता है। मैदान के बीच में ईंटों से घिरा एक बड़ा हवन कुंड है। कुंड की दीवारें काली पड़ी हैं, जैसे हजारों साल से धुएं ने उन्हें काला कर दिया हो। यही है दक्ष प्रजापति का यज्ञ स्थल।
पुराणों के अनुसार  ब्रह्मा जी के मानस पुत्र दक्ष प्रजापति की राजधानी कनखल में थी। उन्होंने एक बार बहुत बड़ा यज्ञ किया। उन्होंने जानबूझकर अपने दामाद भगवान शिव को नहीं बुलाया क्योंकि उन्हें शिव का वेश - भस्म रमाना, गले में सर्प, जटा-जूट पसंद नहीं था। उनकी पुत्री सती, जो शिव की पत्नी थीं, बिना बुलाए पिता के यज्ञ में आईं। यज्ञ मंडप में जब दक्ष ने शिव का अपमान किया, तो सती यह सहन नहीं कर पाईं। उन्होंने सबके सामने कहा - "जिस पिता ने मेरे पति का अपमान किया, उस पिता के दिए हुए शरीर को मैं नहीं रखूंगी" और उसी हवन कुंड में कूदकर सती हो गईं। कुंड के बगल में एक छोटा सा गहरा कुंड है - *सती कुंड*। यह 10 फीट गहरा है, सीढ़ियों से नीचे उतरना पड़ता है। कुंड का पानी हमेशा गर्म रहता है, कहते हैं यह सती के सती होने की अग्नि का ताप है। कुंड की दीवारों पर सिंदूर और राख लगी है। यहाँ महिलाएँ आज भी अपने सुहाग की रक्षा के लिए मौली बांधती हैं। यह दुनिया में नारी के आत्मसम्मान का पहला स्मारक है। सती ने बताया कि नारी केवल शरीर नहीं, सम्मान है। अगर सम्मान नहीं तो शरीर का त्याग बेहतर है।" उनकी आँखों में आंसू थे। यह स्थान हमें सिखाता है कि परिवार में दामाद का अपमान पूरे परिवार के विनाश का कारण बनता है। दक्षेश्वर महादेव मंदिर - जहाँ शिवलिंग पाताल की ओर देखता है । सती कुंड से 50 कदम की दूरी पर विशाल दक्षेश्वर महादेव मंदिर है। मुख्य द्वार 40 फीट ऊँचा है, जिस पर शिव बारात की मूर्तियाँ बनी हैं। यह मंदिर 1810 में सिल्हट की रानी धनकौर ने बनवाया था और 1962 में उद्योगपति राजा बिड़ला ने इसका जीर्णोद्धार करवाया। मंदिर के गर्भगृह में जाने के लिए 15 सीढ़ियाँ नीचे उतरना पड़ता है। गर्भगृह में अंधेरा है, केवल दीये जल रहे हैं। और बीच में है वह अद्भुत शिवलिंग जिसे देखने दुनिया आती है - पातालमुखी शिवलिंग। यह शिवलिंग जमीन से ऊपर की ओर नहीं, नीचे पाताल की ओर धँसा हुआ है। लगभग 1 फीट नीचे। भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में भी ऐसा शिवलिंग नहीं है। पंडित जी ने कथा सुनाई - जब सती के सती होने की खबर शिव को मिली, तो उन्होंने अपने जटा से वीरभद्र को प्रकट किया। वीरभद्र ने आकर दक्ष का सिर काट दिया और यज्ञ को नष्ट कर दिया। उस समय इस शिवलिंग पर इतना क्रोध आया कि यह पाताल में धँस गया। बाद में देवताओं की प्रार्थना पर शिव शांत हुए, पर शिवलिंग वैसे ही पातालमुखी रहा।
हमने अंजुली में कनखल घाट का गंगा जल लिया और गंगा नदी के तट पर  शिवलिंग  पर जलाभिषेक किया । पातालमुखी शिवलिंग पर  गंगाजल चढ़ाया। जल चढ़ाते ही गर्भगृह में ठंडक बढ़ गई। हमने वहाँ 10 मिनट तक मौन ध्यान किया। लगा जैसे शिव स्वयं साँस ले रहे हैं। - "यह शिवलिंग सिखाता है कि अपमान का घाव कितना गहरा होता है, वह पाताल तक जाता है।"
दक्ष मंदिर के बाहर निकलते ही परिसर में एक और छोटा शिवलिंग है - ब्रह्मेश्वर शिवलिंग। यह सफेद संगमरमर का है। कहते हैं दक्ष का सिर काटने के बाद जब शिव का क्रोध शांत नहीं हो रहा था, तो स्वयं ब्रह्मा जी, जो दक्ष के पिता थे, यहाँ आए और उन्होंने इस शिवलिंग की स्थापना कर शिव की आराधना की। तभी शिव ने दक्ष को बकरे का सिर लगाकर जीवित किया। इसलिए इसे क्षमा का शिवलिंग भी कहते हैं।
 एक ही परिसर में पूरा ब्रह्मांड - गीता से श्री यंत्र तक -  दक्ष मंदिर परिसर इतना बड़ा है कि इसमें एक दिन में सब देखना मुश्किल है। हमने जो मंदिर देखे, वे एक-एक कर अद्भुत थे - गीता मंदिर  एक छोटा सा मंदिर गर्भगृह मे माता  गीता की मूर्ति है। । यहाँ खड़े होकर पूरी गीता पढ़ी जा सकती है। नवग्रह मंदिर  एक ही छत के नीचे 9 ग्रहों की 9 मूर्तियाँ। सभी काले ग्रेनाइट की। बीच में सूर्य और चारों ओर बाकी ग्रह। कहा जाता है कि यहाँ 9 ग्रहों की परिक्रमा करने से ग्रह दोष दूर होता है।
*सिद्धेश्वर महादेव और महामृत्युंजय मंदिर - यहाँ महामृत्युंजय मंत्र का निरंतर जाप होता है। पुजारी ने बताया कि यहाँ 1 लाख महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से अकाल मृत्यु टलती है। कई कैंसर के मरीज यहाँ आकर जाप कराते हैं।
200 साल पुराना रुद्राक्ष वृक्ष -  मंदिर परिसर में एक विशाल रुद्राक्ष का पेड़ है। इसकी उम्र 200 साल से ज्यादा बताई जाती है। आश्चर्य की बात यह है कि इस पेड़ के नीचे एक भी रुद्राक्ष नहीं गिरता। पुजारी स्वयं पेड़ से तोड़कर प्रसाद में रुद्राक्ष देते हैं। हमने भी एक-एक रुद्राक्ष पते प्रसाद में लिया।
श्री रामेश्वर मंदिर - स्फटिक शिवलिंग -  यह हमारी यात्रा का सबसे चमत्कारी अनुभव था। एक छोटे से काँच के मंदिर में स्फटिक यानी क्रिस्टल का शिवलिंग है। यह लगभग 1.5 फीट ऊँचा है। दिन की रोशनी में यह सफेद दिखता है, पर जब पुजारी ने दीया जलाया तो यह नीला हो गया। कहते हैं इसे रामेश्वरम से लाया गया था और यह 500 साल पुराना है। स्फटिक शिवलिंग पर जल चढ़ाने से मन की सारी नकारात्मकता दूर होती है। डॉ. संगीता जी ने यहाँ देर तक ध्यान किया।
श्री यंत्र मंदिर यहाँ माँ लक्ष्मी के श्री यंत्र की पूजा होती है। गर्भगृह में 2 किलो सोने से बना श्री यंत्र है। यहाँ केवल श्री यंत्र के दर्शन से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है, ऐसी मान्यता है। जगद्गुरु आश्रम और हरि-हर मंदिर  अंत में हम जगद्गुरु आश्रम गए, जहाँ शंकराचार्य जी की गद्दी है। और उसके बगल में हरि-हर मंदिर। इस मंदिर में एक ही मूर्ति में आधा शरीर विष्णु का (पीले वस्त्र) और आधा शिव का (बाघम्बर) है। यह मंदिर संदेश देता है कि हरि और हर में कोई भेद नहीं। जो लोग शिव और विष्णु में लड़ते हैं, उन्हें यह मंदिर देखना चाहिए।
कनखल घाट से लेकर हरि-हर मंदिर तक की यह 3 घंटे की यात्रा थी, पर लगा जैसे मन्वंतर काल और 3000 साल का इतिहास देख लिया। कनखल केवल मंदिर नहीं, यह भारत के परिवार की कहानी है। जहाँ पिता दक्ष हैं, पुत्री सती हैं और दामाद शिव हैं। यह कहानी सिखाती है कि परिवार में अहंकार नहीं होना चाहिए, दामाद का अपमान नहीं होना चाहिए, और नारी के सम्मान से बड़ा कोई यज्ञ नहीं। यहाँ आकर समझ आया कि गंगा केवल जल नहीं, संस्कार है। कनखल घाट पर स्नान, दक्ष मंदिर में क्षमा और स्फटिक शिवलिंग में शांति - यही तो जीवन है।
मैं, सत्येंद्र कुमार पाठक, हरियाणा के त्रिलोक चंद जी, डॉ. उषा किरण जी, डॉ. संगीता सागर जी और संतोष देवी - हम पाँचों जब कनखल से वापस अवधूत आश्रम लौटे, तो हमारे झोले में प्रसाद के रुद्राक्ष थे, हाथ में गंगा जल था और मन में एक संकल्प था - "हर घर से एक पुस्तक, हर घाट से स्वच्छ गंगा।" कनखल ने हमें यही सिखाया - इतिहास किताबों में नहीं, पत्थरों और पानी में बहता है।

हरिद्वार में आत्मा को चेतना मिलती है 
हरिद्वार केवल एक शहर नहीं है। यह भारत की आत्मा का भूगोल है। 29 अगस्त 2026 को मैंने अपने साथियों -  जीविका भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रकाश बंधु, हरियाणा के कवि डॉ. त्रिलोक चंद सेन फतेहपुरी, संतोष देवी, भारतीय जीवन बीमा मुजफ्फरपुर की सहायक महाप्रबंधक डॉ. संगीता सागर, राजस्थान की ममता शर्मा, नोएडा के उमानाथ त्रिपाठी, वैशाली की डॉ. रेणु शर्मा, गोरखपुर की कमलेश मिश्रा के साथ हरिद्वार के तीन रूपों को देखा - *ऐतिहासिक हरिद्वार, पर्यावरणीय हरिद्वार और आध्यात्मिक हरिद्वार।* महाराजा अग्रसेन घाट, हंस घाट, हर की पौड़ी, कनखल और अवधूत आश्रम तक की यह यात्रा केवल परिभ्रमण नहीं, चेतना की यात्रा थी।
हरिद्वार का इतिहास, हरिद्वार जिले के 2360 वर्ग किमी के भूगोल से बहुत बड़ा है। यह मन्वंतर काल से शुरू होता है। जिसे आज हम हर की पौड़ी / हरि की पौड़ी कहते हैं, उसका पहला नाम ब्रह्मकुंड 
था। पुराणों के अनुसार राजा श्वेत ने यहाँ ब्रह्मा जी की तपस्या की थी। ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए और वरदान दिया कि यह स्थान हरि के नाम से जाना जाएगा। इसलिए एक ही स्थान के दो नाम हैं - हर की पौड़ी (शिव की) और हरि की पौड़ी (विष्णु की)।
ऐतिहासिक तथ्य यह है कि इसका निर्माण उज्जैन के सम्राट राजा विक्रमादित्य ने अपने भाई भर्तृहरि की याद में पहली शताब्दी ईसा पूर्व में करवाया था। यहाँ आज भी शिला पर भगवान विष्णु के चरण चिह्न अंकित हैं। समुद्र मंथन की कथा के अनुसार जब धन्वंतरि अमृत कलश लेकर जा रहे थे, तो अमृत की 4 बूंदें चार जगह गिरीं - हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक। इसलिए यहाँ कुंभ होता है। 29 अगस्त 2026 की संध्या को जब हम डॉ. संगीता सागर, ममता शर्मा और त्रिलोक चंद जी के साथ यहाँ स्नान कर रहे थे, तो लगा जैसे हम केवल 2026 में नहीं, बल्कि उस क्षण में भी हैं जब अमृत गिरा था।
अग्रसेन घाट और हंस घाट - सामाजिक और वैदिक इतिहास :*
29 अगस्त को हमने जो महाराजा अग्रसेन घाट देखा, वह आधुनिक भारत के सामाजिक इतिहास का प्रतीक है। महाराजा अग्रसेन ने 5000 साल पहले एक रुपया, एक ईंट का सिद्धांत दिया था। उसी सिद्धांत पर यह घाट बना है। यहाँ कोई पंडा नहीं, कोई शुल्क नहीं। यह सेवा का घाट है। यह बताता है कि दान से ही समाज बनता है।
हंस घाट, जिसे मालवीय घाट भी कहते हैं, वैदिक इतिहास का प्रतीक है। मान्यता है कि ब्रह्मा जी के वाहन हंस ने यहाँ तपस्या कर गंगा को प्रसन्न किया था, इसलिए इसका नाम हंस घाट पड़ा। महामना मदन मोहन मालवीय जी ने यहाँ गुरुकुल कांगड़ी के छात्रों के लिए स्नान की व्यवस्था बनवाई थी। बगल में 1936 में बना प्रसिद्ध बिरला टॉवर है। यह घाट हमें बताता है कि हरिद्वार केवल स्नान की नगरी नहीं, ज्ञान की नगरी भी है।
 पर्यावरणीय चेतना : जहाँ गंगा केवल नदी नहीं, जीवन है
हर की पौडी  संध्या आरती के समय जब हमने हजारों दीये, फूल, पॉलीथीन को गंगा में बहते देखा तो  "भक्ति तो है पर पर्यावरण के प्रति भक्ति नहीं।" हर की पौड़ी पर जल की धारा तेज है, इसलिए कचरा बह जाता है, पर वह कचरा आगे जाकर कहाँ जाता है? यही तो गंगा प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है। यहाँ हमने संकल्प लिया कि आरती में फूल तो चढ़ाएंगे पर पॉलीथीन नहीं।
अग्रसेन घाट और हंस घाट पर समाधान  इन दोनों घाटों पर हमने देखा कि कैसे सफाई रखी जा सकती है। अग्रसेन घाट पर कूड़ेदान लगे हैं, प्याऊ है, निःशुल्क चेंजिंग रूम है। हंस घाट पर गुरुकुल के ब्रह्मचारी प्रतिदिन घाट की सफाई करते हैं। यहाँ जल स्थिर और निर्मल है क्योंकि यहाँ भीड़ नहीं है। यह बताता है कि गंगा को साफ रखने के लिए भीड़ को नियंत्रित करना और घाटों को बाँटना जरूरी है। पर्यावरण की रक्षा ही गंगा की सच्ची आरती है।
इस पूरी यात्रा की सबसे गहरी अनुभूति आध्यात्मिक थी।
 29 अगस्त की सुबह अवधूत आश्रम में जब मैंने अपनी अंजुली में गंगा जल लेकर बाबा शिवलिंग पर जलाभिषेक किया, तो प्रकाश बंधु जी ने कहा था - "अंजुली का जल अहंकार को धो देता है।" सच है। जब हम लोटे से जल चढ़ाते हैं तो हम बड़े बन जाते हैं, पर जब अंजुली से जल चढ़ाते हैं तो हम छोटे, विनम्र बन जाते हैं। शिव को विनम्रता ही प्रिय है।
29 अगस्त की संध्या को हर की पौड़ी पर जब 50 पंडितों ने एक साथ आरती की, हजारों दीये गंगा में तैरे, तो जो अनुभूति हुई उसे शब्दों में नहीं लिखा जा सकता। डॉ. संगीता सागर, ममता शर्मा, त्रिलोक चंद जी, संतोष देवी - हम सबके हाथ में दीये थे। दीये की लौ में माँ गंगा का चेहरा दिख रहा था। उस क्षण लगा कि गंगा केवल जल नहीं, प्रकाश है। आरती लेने के बाद जो शांतिपूर्ण और आध्यात्मिक गहराई की अनुभूति हुई, वह जीवन भर की पूंजी बन गई।
यह यात्रा हमें तीन मंत्र देकर गई - ऐतिहासिक चेतना कहती है - अपने परिवार का सम्मान करो, जैसे शिव ने दक्ष को माफ किया।
पर्यावरणीय चेतना कहती है - गंगा को माँ समझो, नाली नहीं।
आध्यात्मिक चेतना कहती है -  अंजुली का जल ही आरती बन जाता है, अगर मन साफ हो।
29 अगस्त को अग्रसेन घाट ने सेवा सिखाई, हंस घाट ने ज्ञान, हर की पौड़ी ने मोक्ष। और अवधूत आश्रम ने सिखाया कि पुस्तकें भी गंगा हैं। इसलिए हरिद्वार की यात्रा पूरी नहीं होती, शुरू होती है। जो एक बार हरिद्वार के घाटों पर अंजुली में जल लेकर शिव को याद करता है, वह जीवन भर गंगा को अपने साथ ले जाता है।