मंगलवार, सितंबर 01, 2026

हरिद्वार परिभ्रमण

हरिद्वार  : शिवालिक की गोद में मातृ-शक्ति 
 सत्येंद्र कुमार पाठक 
हरिद्वार को लोग समतल मैदान समझते हैं, पर यह भारत के भूगोल की सबसे बड़ी भूल है। सच यह है कि हरिद्वार शिवालिक पर्वत श्रृंखला का द्वार है। यहीं आकर शिवालिक हिमालय मैदान से मिलता है और गंगा पहाड़ों को छोड़कर मैदान में आती है। इसीलिए इसे हरिद्वार - हरि का द्वार कहा गया। 01  सितंबर 2026 की सुबह 5:30 बजे, जब हरिद्वार में हल्का कोहरा छाया था और गंगा पर धुंध थी, मैं, स्वर्णिम कला केंद्र मुजफ्फरपुर की अध्यक्ष डॉ. उषा किरण श्रीवास्तव और मुजफ्फरपुर  , बिहार  की डॉ. संगीता सागर के साथ नीलगिरि पर्वत श्रृंखला की ओर निकल पड़ा। यह यात्रा केवल मंदिर दर्शन नहीं थी, यह हरिद्वार की मातृ संस्कृति का साक्षात्कार था।
नील पर्वत और चंडी घाट - जहाँ से यात्रा शुरू होती है, हरिद्वार तीन पर्वतों से घिरा है - नील पर्वत, बिल्व पर्वत और नारायण पर्वत। आज हमारा लक्ष्य नील और बिल्व पर्वत था। नीचे नील धारा है और चंडी घाट। चंडी घाट वह घाट है जहाँ से माँ चंडी देवी के लिए रोप-वे शुरू होता है। सुबह के समय यहाँ गंगा बहुत चौड़ी हो जाती है। यहाँ गंगा दो धाराओं में बंट जाती है - मुख्य धारा और नील धारा। नील धारा नील पर्वत के नीचे से बहती है। यहाँ से नील पर्वत का दृश्य ऐसा लगता है जैसे कोई माँ अपनी गोद में हरिद्वार को बैठाए हो। हमने यहाँ आचमन किया और पर्वत चढ़ाई शुरू की। चंडी घाट पर खड़े होकर ही समझ आता है कि हरिद्वार का भूगोल ही उसका अध्यात्म है।
 बिल्व पर्वत पर मनसा देवी - जहाँ मन की इच्छा पूरी होती है ।
हमने पहले बिल्व पर्वत की चढ़ाई शुरू की। बिल्व पर्वत शिवालिक की दक्षिणी श्रृंखला पर स्थित है। इसकी ऊँचाई लगभग *585 मीटर (1,926 फीट) समुद्र तल से* है। बिल्व यानी बेलपत्र का पर्वत। कहते हैं यहाँ प्राचीन काल में बेल के घने जंगल थे, जिनके बेलपत्र सीधे हर की पौड़ी के शिवलिंगों पर चढ़ते थे, इसलिए नाम बिल्व पड़ा। यह मंदिर नील पर्वत नहीं, बिल्व पर्वत की चोटी पर है। यहाँ से हर की पौड़ी सीधे नीचे दिखती है। रोप-वे से 5 मिनट में पहुँचा जा सकता है, पर हमने पैदल मार्ग से चढ़ाई की, जिसमें लगभग 1.5 किमी की चढ़ाई है।
माँ मनसा देवी को नागों की देवी और इच्छा देवी कहा जाता है। 51 शक्तिपीठों में यह वह स्थान है जहाँ देवी सती का मन गिरा था, इसलिए नाम मनसा पड़ा। कुछ कथाओं में कहा जाता है कि यहाँ सती के मस्तिष्क का हिस्सा गिरा था। यह मंदिर 1811 में मणिराम ने बनवाया था। मान्यता है कि यहाँ सच्चे मन से जो धागा बांधा जाता है, मन की इच्छा पूरी होती है। मंदिर में पीपल के पेड़ पर हजारों धागे बंधे हैं। डॉ. उषा श्रीवास्तव जी ने यहाँ अपने कला केंद्र के बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए और डॉ. संगीता सागर जी ने अपने परिवार और बीमा परिवार के कल्याण के लिए मौली बांधी।
यहाँ से पूरा हरिद्वार दिखता है - नीचे बहती गंगा, हर की पौड़ी के दीये और दूर तक फैला 2360 वर्ग किमी का हरिद्वार जिला। यह शिवालिक का वह बिंदु है जहाँ से पर्वत मैदान में बदल जाता है। यहाँ खड़े होकर समझ आता है कि माँ क्यों ऊँचे पर्वत पर रहती है - ताकि वह अपने सभी बच्चों पर नजर रख सके। यही तो मातृ संस्कृति है। मन इच्छा देता है। नील पर्वत पर चंडी देवी - जहाँ आत्मा को शक्ति मिलती है । 
बिल्व पर्वत से उतरकर हम नील पर्वत की ओर गए। नील पर्वत शिवालिक की पूर्वी श्रृंखला पर स्थित है। इसकी ऊँचाई *लगभग 2,900 फीट (लगभग 884 मीटर) समुद्र तल से* है। यह मनसा से लगभग 300 मीटर ऊँचा है। यह हरिद्वार का सबसे ऊँचा सिद्धपीठ है। यहाँ तक पहुँचने के लिए 3 किमी की खड़ी चढ़ाई है।
चंडी देवी मंदिर शक्ति का प्रचंड रूप है। यह 51 शक्तिपीठों में से एक नहीं, पर अति प्रसिद्ध सिद्धपीठ है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार देवी चंडी ने इसी नील पर्वत पर शुंभ और निशुंभ नामक दो राक्षस राजाओं का वध किया था। उनके वध के बाद देवी ने यहीं विश्राम किया। कथा यह भी है कि यहाँ देवी सती के सिर का निशान गिरा था। यह मंदिर 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य जी ने स्थापित किया था और 1929 में कश्मीर नरेश सुचत सिंह ने इसका जीर्णोद्धार करवाया। मंदिर के गर्भगृह में माँ चंडी की दो मूर्तियाँ हैं - एक मुख्य अचल मूर्ति और एक चल मूर्ति। यहाँ हनुमान जी और भैरव जी भी पहरेदार के रूप में हैं। हमने यहाँ चंडी पाठ किया। यहाँ से नील धारा, चंडी घाट और राजाजी नेशनल पार्क का घना जंगल दिखता है। हवा में जंगली फूलों की महक है। यहाँ की ऊर्जा बिल्कुल अलग है - यहाँ उग्र शक्ति है, जो डर को मारती है। अगर मनसा इच्छा देती है, तो चंडी उस इच्छा को पूरा करने की शक्ति देती है।
 नील पर्वत की दूसरी चोटी पर माता अंजनी देवी - जहाँ वंश मिलता है ।  चंडी मंदिर से नीचे उतरते समय, नील पर्वत की ही एक दूसरी चोटी पर एक छोटा सा गुप्त मंदिर है, जिसके बारे में बहुत कम यात्रियों को पता है - माता अंजनी देवी मंदिर।* इसकी ऊँचाई लगभग *800 से 900 मीटर के आसपास है, यानी चंडी मंदिर के समीप ही। यह मंदिर भगवान हनुमान की दिव्य माता अंजनी देवी को समर्पित है। यह अंजनी देवी की तपभूमि है। पौराणिक कथा है कि अंजनी देवी ने पुत्र प्राप्ति के लिए नील पर्वत पर हजारों वर्षों तक तपस्या की थी। वायु देवता के आशीर्वाद से उन्हें हनुमान जी जैसा पुत्र प्राप्त हुआ। इसलिए यह हरिद्वार की ऊँची चोटियों पर एक ऐसा चमत्कारी स्थान है, जहाँ संतान प्राप्ति की मन्नत कभी खाली नहीं जाती।
हम जब यहाँ पहुँचे तो कई निःसंतान दंपति यहाँ पूजा कर रहे थे। मंदिर छोटा है, अंदर अंजनी माता की गोद में बाल हनुमान की मूर्ति है। चेहरे पर ममता है। बगल में ही हनुमान जी का छोटा मंदिर है, जहाँ हनुमान जी अपनी माँ की पहरेदारी में खड़े हैं, सिंदूर से लिपटे हुए।
मनसा इच्छा देती है, चंडी शक्ति देती है, और अंजनी माता संतान यानी वंश देती है। यह तीनों ही नारी के तीन रूप हैं।" सच है - एक ही पर्वत श्रृंखला पर नारी के तीन रूप विराजमान हैं।
माया देवी मंदिर - मैदान में माँ, जो तीनों शिखरों की जननी है*
जबकि मनसा बिल्व पर्वत पर, चंडी और अंजनी नील पर्वत पर हैं, एक और शक्ति है जो मैदान में है - *माया देवी मंदिर।* यह हरिद्वार शहर के मुख्य क्षेत्र में, हर की पौड़ी और बिरला घाट के पास है।
माया देवी हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी हैं। हरिद्वार का पुराना नाम मायापुरी भी इन्हीं के नाम पर है। यहाँ सती की नाभि गिरी थी, इसलिए यह 51 शक्तिपीठों में सबसे महत्वपूर्ण है। यह 11वीं शताब्दी का मंदिर है। बिना माया देवी के दर्शन के मनसा-चंडी की यात्रा अधूरी मानी जाती है। माया देवी वह जड़ हैं, जिनसे बिल्व और नील पर्वत निकले हैं।
भारत माता मंदिर, वैष्णवी गुफा और सदानंद आश्रम गुफा है। पर्वत से नीचे उतरकर हम सप्त सरोवर के पास स्थित *भारत माता मंदिर* गए। यह 8 मंजिला मंदिर है, जिसे स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी ने बनवाया था और 1983 में इंदिरा गांधी ने इसका उद्घाटन किया था। यह हरिद्वार का इकलौता ऐसा मंदिर है जहाँ किसी देवी-देवता की नहीं, बल्कि भारत माता की पूजा होती है। हर मंजिल पर भारत के इतिहास को दर्शाया गया है। डॉ. संगीता जी ने कहा - "गंगा और भारत माता एक ही हैं। दोनों मातृ संस्कृति की प्रतीक हैं। एक जल देती है, दूसरी जीवन।"
अंत में हम *वैष्णवी मंदिर गुफा* और *सदानंद आश्रम गुफा* गए। वैष्णवी गुफा नील पर्वत की तलहटी में एक प्राकृतिक गुफा है, जहाँ वैष्णव संतों ने तपस्या की थी। अंदर बहुत ठंडक है। यहाँ विष्णु जी के 24 अवतारों की छोटी-छोटी मूर्तियाँ हैं। गुफा की दीवारों से पानी टपकता है, जिसे चरणामृत माना जाता है। सदानंद आश्रम गुफा में सदानंद स्वामी जी ने 40 साल तक मौन तपस्या की थी। अंदर विभिन्न देवियों के मंदिर हैं और 100 साल से अखंड धूना जल रहा है।
 हरिद्वार का भूगोल ही उसका अध्यात्म है ।  01 सितंबर की यह प्रातःकालीन यात्रा दोपहर 12 बजे तक पूरी हुई। 6 घंटे में हमने 6 देवियों और देवताओं के दर्शन किए। नील और बिल्व पर्वत ने हमें हरिद्वार की मातृ संस्कृति का असली अर्थ समझाया - दक्षिण में बिल्व पर्वत (585 मीटर) पर मनसा - जो मन की इच्छा पूरी करती है। पूर्व में नील पर्वत (884 मीटर) पर चंडी - जो आत्मा को शक्ति और ऊर्जा देती है। उसी नील पर्वत की दूसरी चोटी (800-900 मीटर) पर अंजनी - जो संतान और संस्कार देती है।
  माया देवी - जो इन तीनों शिखरों को जन्म देती है।और सप्त सरोवर में भारत माता - जो इन सबको जोड़कर राष्ट्र का बोध कराती हैं। इसी को सनातन धर्म की मातृ संस्कृति कहते हैं। शिवालिक पर्वत केवल पत्थर नहीं, माँ की गोद है। और हरिद्वार वह स्थान है जहाँ पर्वत माँ बन जाता है और गंगा बेटी बनकर उसके चरणों में बहती है। आज लगा कि हमने केवल मंदिर नहीं, अपनी माँ के चार रूप देखे। सच ही तो है - मन की इच्छा, आत्मा की शक्ति, वंश का संस्कार और राष्ट्र का बोध - यही तो माँ 

 कनखल - भगवान  शिव की ससुराल में एक दिन 
31 अगस्त 2026 की सुबह, ब्रह्म मुहूर्त के बाद जब हरिद्वार अभी सोकर उठ ही रहा था, हमारी छोटी सी टीम कनखल की ओर चल पड़ी। नेतृत्व में मैं, सत्येंद्र कुमार पाठक, साथ में हरियाणा की माटी के सुगंधित कवि त्रिलोक चंद फतेहपुरी, स्वर्णिम कला केंद्र मुजफ्फरपुर की अध्यक्ष और शब्दों की साधिका डॉ. उषा किरण श्रीवास्तव, भारतीय जीवन बीमा मुजफ्फरपुर की सहायक महाप्रबंधक डॉ. संगीता सागर और हरियाणा से आई सरल हृदय संतोष देवी। यह कोई पर्यटन नहीं था, यह एक तीर्थयात्रा थी, एक इतिहास यात्रा थी, एक आत्मा की यात्रा थी।
कनखल को लोग हरिद्वार का उपनगर कहते हैं, पर सच तो यह है कि हरिद्वार कनखल के बाद बसा है। यह वह भूमि है जहाँ सृष्टि के पहले परिवार की कहानी लिखी गई। जहाँ पिता, पुत्री और दामाद के संबंधों ने सनातन धर्म को परिवार की परिभाषा सिखाई। इसलिए कनखल को शिव की ससुराल कहा जाता है।
सुबह 7 बजे हम कनखल घाट पहुँचे। अगर आपने हर की पौड़ी का शोर, भीड़, चीख-पुकार, लाउडस्पीकर पर गंगा आरती देखी है, तो कनखल घाट पर आकर आप चौंक जाएंगे। यहाँ गंगा एकदम शांत, नीली, गहरी और निर्मल बह रही थी। कोई धक्का-मुक्की नहीं, कोई चिल्लाहट नहीं। बस पानी की कल-कल और मंदिरों की घंटी।
पौराणिक मान्यता है कि जब माता सती ने दक्ष के यज्ञ कुंड में प्राण दिए, तो भगवान शिव तांडव करते हुए यहाँ आए और इस घाट पर बैठकर घंटों तक ध्यान किया। उनके आंसूओं से ही गंगा यहाँ शांत हो गई। इसलिए इस घाट को शिव-ध्यान घाट भी कहते हैं।
हमने बारी-बारी से गंगा में डुबकी लगाई। अगस्त के अंत में गंगा का जल हिमालय से सीधा आता है, इसलिए बर्फ जैसा ठंडा था। पानी में पैर डालते ही शरीर में सिहरन हुई, पर डुबकी लगाते ही मन हल्का हो गया। स्थानीय पंडित राधेश्याम जी ने बताया - "यहाँ स्नान करने से पितृ दोष, कालसर्प दोष और शनि की साढ़ेसाती शांत होती है। जो लोग हर की पौड़ी पर केवल स्नान करके चले जाते हैं, उनका तीर्थ आधा अधूरा रह जाता है। कनखल में स्नान किए बिना हरिद्वार की यात्रा पूरी नहीं होती।"
स्नान के बाद हम घाट की सीढ़ियों पर बैठ गए। आँखें बंद कर 10 मिनट ध्यान किया। आँखें बंद करते ही लगा जैसे गंगा की लहरों में ॐ की ध्वनि घुल रही है। त्रिलोक चंद जी ने धीरे से एक दोहा कहा "कनखल की गंगा शांत है, जैसे ससुराल में दामाद का मौन।"
घाट से उठते ही दो कदम पर सफेद संगमरमर का छोटा सा मंदिर है - गंगा मंदिर। यह मंदिर गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के संस्थापक स्वामी श्रद्धानंद जी और पंडित मदन मोहन मालवीय जी की प्रेरणा से 1920 में बनवाया गया था।
गर्भगृह बहुत छोटा है, केवल दो लोग अंदर जा सकते हैं। अंदर 4 फीट ऊँची माँ गंगा की मूर्ति है। माँ मगर पर बैठी हैं, एक हाथ में कलश, दूसरे हाथ में कमल। मूर्ति की आँखें ऐसी हैं जैसे अभी बोल पड़ेंगी। पुजारी जी ने हमें रोली, चावल और गंगा जल दिया और कहा - "यहाँ दर्शन करने से गंगा स्नान का फल दोगुना हो जाता है। क्योंकि यहाँ गंगा केवल नदी नहीं, देवी के रूप में विराजमान हैं।"
"यहाँ आकर जीवन का असली हिसाब समझ आया। बचत तो धन की होती है, पर पुण्य की बचत यहीं होती है।"
गंगा मंदिर से सटे हुए ही काले पत्थर से बना शनि मंदिर है। हरिद्वार में शनि के इतने मंदिर नहीं हैं, पर कनखल का यह शनि मंदिर बहुत प्राचीन माना जाता है। यहाँ शनि देव की 3 फीट ऊँची मूर्ति है, जो काले ग्रेनाइट से बनी है। विशेष बात यह है कि यहाँ शनि देव की आँखों पर पट्टी नहीं है, वे सीधे देखते हैं। मान्यता है कि जब राजा दक्ष ने यज्ञ किया तो नवग्रहों को भी बुलाया था। शनि देव भी आए और यहीं रुक गए। हमने यहाँ सरसों के तेल से अभिषेक किया। पंडित जी ने बताया कि शनिवार को यहाँ तेल चढ़ाने से साढ़ेसाती का प्रभाव कम होता है। हरियाणा से आई संतोष देवी ने यहाँ अपने परिवार के लिए शनि शांति की प्रार्थना की। यह मंदिर बताता है कि गंगा की गोद में न्याय भी है।  दक्ष प्रजापति का यज्ञ स्थल और सती कुंड - जहाँ आज भी नारी के सम्मान की कहानी गूंजती है*
यह हमारी यात्रा का सबसे भावुक और सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव था। शनि मंदिर से 100 मीटर चलने पर एक खुला मैदान आता है। मैदान के बीच में ईंटों से घिरा एक बड़ा हवन कुंड है। कुंड की दीवारें काली पड़ी हैं, जैसे हजारों साल से धुएं ने उन्हें काला कर दिया हो। यही है दक्ष प्रजापति का यज्ञ स्थल।
पुराणों के अनुसार  ब्रह्मा जी के मानस पुत्र दक्ष प्रजापति की राजधानी कनखल में थी। उन्होंने एक बार बहुत बड़ा यज्ञ किया। उन्होंने जानबूझकर अपने दामाद भगवान शिव को नहीं बुलाया क्योंकि उन्हें शिव का वेश - भस्म रमाना, गले में सर्प, जटा-जूट पसंद नहीं था। उनकी पुत्री सती, जो शिव की पत्नी थीं, बिना बुलाए पिता के यज्ञ में आईं। यज्ञ मंडप में जब दक्ष ने शिव का अपमान किया, तो सती यह सहन नहीं कर पाईं। उन्होंने सबके सामने कहा - "जिस पिता ने मेरे पति का अपमान किया, उस पिता के दिए हुए शरीर को मैं नहीं रखूंगी" और उसी हवन कुंड में कूदकर सती हो गईं। कुंड के बगल में एक छोटा सा गहरा कुंड है - *सती कुंड*। यह 10 फीट गहरा है, सीढ़ियों से नीचे उतरना पड़ता है। कुंड का पानी हमेशा गर्म रहता है, कहते हैं यह सती के सती होने की अग्नि का ताप है। कुंड की दीवारों पर सिंदूर और राख लगी है। यहाँ महिलाएँ आज भी अपने सुहाग की रक्षा के लिए मौली बांधती हैं। यह दुनिया में नारी के आत्मसम्मान का पहला स्मारक है। सती ने बताया कि नारी केवल शरीर नहीं, सम्मान है। अगर सम्मान नहीं तो शरीर का त्याग बेहतर है।" उनकी आँखों में आंसू थे। यह स्थान हमें सिखाता है कि परिवार में दामाद का अपमान पूरे परिवार के विनाश का कारण बनता है। दक्षेश्वर महादेव मंदिर - जहाँ शिवलिंग पाताल की ओर देखता है । सती कुंड से 50 कदम की दूरी पर विशाल दक्षेश्वर महादेव मंदिर है। मुख्य द्वार 40 फीट ऊँचा है, जिस पर शिव बारात की मूर्तियाँ बनी हैं। यह मंदिर 1810 में सिल्हट की रानी धनकौर ने बनवाया था और 1962 में उद्योगपति राजा बिड़ला ने इसका जीर्णोद्धार करवाया। मंदिर के गर्भगृह में जाने के लिए 15 सीढ़ियाँ नीचे उतरना पड़ता है। गर्भगृह में अंधेरा है, केवल दीये जल रहे हैं। और बीच में है वह अद्भुत शिवलिंग जिसे देखने दुनिया आती है - पातालमुखी शिवलिंग। यह शिवलिंग जमीन से ऊपर की ओर नहीं, नीचे पाताल की ओर धँसा हुआ है। लगभग 1 फीट नीचे। भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में भी ऐसा शिवलिंग नहीं है। पंडित जी ने कथा सुनाई - जब सती के सती होने की खबर शिव को मिली, तो उन्होंने अपने जटा से वीरभद्र को प्रकट किया। वीरभद्र ने आकर दक्ष का सिर काट दिया और यज्ञ को नष्ट कर दिया। उस समय इस शिवलिंग पर इतना क्रोध आया कि यह पाताल में धँस गया। बाद में देवताओं की प्रार्थना पर शिव शांत हुए, पर शिवलिंग वैसे ही पातालमुखी रहा।
हमने अंजुली में कनखल घाट का गंगा जल लिया और गंगा नदी के तट पर  शिवलिंग  पर जलाभिषेक किया । पातालमुखी शिवलिंग पर  गंगाजल चढ़ाया। जल चढ़ाते ही गर्भगृह में ठंडक बढ़ गई। हमने वहाँ 10 मिनट तक मौन ध्यान किया। लगा जैसे शिव स्वयं साँस ले रहे हैं। - "यह शिवलिंग सिखाता है कि अपमान का घाव कितना गहरा होता है, वह पाताल तक जाता है।"
दक्ष मंदिर के बाहर निकलते ही परिसर में एक और छोटा शिवलिंग है - ब्रह्मेश्वर शिवलिंग। यह सफेद संगमरमर का है। कहते हैं दक्ष का सिर काटने के बाद जब शिव का क्रोध शांत नहीं हो रहा था, तो स्वयं ब्रह्मा जी, जो दक्ष के पिता थे, यहाँ आए और उन्होंने इस शिवलिंग की स्थापना कर शिव की आराधना की। तभी शिव ने दक्ष को बकरे का सिर लगाकर जीवित किया। इसलिए इसे क्षमा का शिवलिंग भी कहते हैं।
 एक ही परिसर में पूरा ब्रह्मांड - गीता से श्री यंत्र तक -  दक्ष मंदिर परिसर इतना बड़ा है कि इसमें एक दिन में सब देखना मुश्किल है। हमने जो मंदिर देखे, वे एक-एक कर अद्भुत थे - गीता मंदिर  एक छोटा सा मंदिर गर्भगृह मे माता  गीता की मूर्ति है। । यहाँ खड़े होकर पूरी गीता पढ़ी जा सकती है। नवग्रह मंदिर  एक ही छत के नीचे 9 ग्रहों की 9 मूर्तियाँ। सभी काले ग्रेनाइट की। बीच में सूर्य और चारों ओर बाकी ग्रह। कहा जाता है कि यहाँ 9 ग्रहों की परिक्रमा करने से ग्रह दोष दूर होता है।
*सिद्धेश्वर महादेव और महामृत्युंजय मंदिर - यहाँ महामृत्युंजय मंत्र का निरंतर जाप होता है। पुजारी ने बताया कि यहाँ 1 लाख महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से अकाल मृत्यु टलती है। कई कैंसर के मरीज यहाँ आकर जाप कराते हैं।
200 साल पुराना रुद्राक्ष वृक्ष -  मंदिर परिसर में एक विशाल रुद्राक्ष का पेड़ है। इसकी उम्र 200 साल से ज्यादा बताई जाती है। आश्चर्य की बात यह है कि इस पेड़ के नीचे एक भी रुद्राक्ष नहीं गिरता। पुजारी स्वयं पेड़ से तोड़कर प्रसाद में रुद्राक्ष देते हैं। हमने भी एक-एक रुद्राक्ष पते प्रसाद में लिया।
श्री रामेश्वर मंदिर - स्फटिक शिवलिंग -  यह हमारी यात्रा का सबसे चमत्कारी अनुभव था। एक छोटे से काँच के मंदिर में स्फटिक यानी क्रिस्टल का शिवलिंग है। यह लगभग 1.5 फीट ऊँचा है। दिन की रोशनी में यह सफेद दिखता है, पर जब पुजारी ने दीया जलाया तो यह नीला हो गया। कहते हैं इसे रामेश्वरम से लाया गया था और यह 500 साल पुराना है। स्फटिक शिवलिंग पर जल चढ़ाने से मन की सारी नकारात्मकता दूर होती है। डॉ. संगीता जी ने यहाँ देर तक ध्यान किया।
श्री यंत्र मंदिर यहाँ माँ लक्ष्मी के श्री यंत्र की पूजा होती है। गर्भगृह में 2 किलो सोने से बना श्री यंत्र है। यहाँ केवल श्री यंत्र के दर्शन से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है, ऐसी मान्यता है। जगद्गुरु आश्रम और हरि-हर मंदिर  अंत में हम जगद्गुरु आश्रम गए, जहाँ शंकराचार्य जी की गद्दी है। और उसके बगल में हरि-हर मंदिर। इस मंदिर में एक ही मूर्ति में आधा शरीर विष्णु का (पीले वस्त्र) और आधा शिव का (बाघम्बर) है। यह मंदिर संदेश देता है कि हरि और हर में कोई भेद नहीं। जो लोग शिव और विष्णु में लड़ते हैं, उन्हें यह मंदिर देखना चाहिए।
कनखल घाट से लेकर हरि-हर मंदिर तक की यह 3 घंटे की यात्रा थी, पर लगा जैसे मन्वंतर काल और 3000 साल का इतिहास देख लिया। कनखल केवल मंदिर नहीं, यह भारत के परिवार की कहानी है। जहाँ पिता दक्ष हैं, पुत्री सती हैं और दामाद शिव हैं। यह कहानी सिखाती है कि परिवार में अहंकार नहीं होना चाहिए, दामाद का अपमान नहीं होना चाहिए, और नारी के सम्मान से बड़ा कोई यज्ञ नहीं। यहाँ आकर समझ आया कि गंगा केवल जल नहीं, संस्कार है। कनखल घाट पर स्नान, दक्ष मंदिर में क्षमा और स्फटिक शिवलिंग में शांति - यही तो जीवन है।
मैं, सत्येंद्र कुमार पाठक, हरियाणा के त्रिलोक चंद जी, डॉ. उषा किरण जी, डॉ. संगीता सागर जी और संतोष देवी - हम पाँचों जब कनखल से वापस अवधूत आश्रम लौटे, तो हमारे झोले में प्रसाद के रुद्राक्ष थे, हाथ में गंगा जल था और मन में एक संकल्प था - "हर घर से एक पुस्तक, हर घाट से स्वच्छ गंगा।" कनखल ने हमें यही सिखाया - इतिहास किताबों में नहीं, पत्थरों और पानी में बहता है।

हरिद्वार में आत्मा को चेतना मिलती है 
हरिद्वार केवल एक शहर नहीं है। यह भारत की आत्मा का भूगोल है। 29 अगस्त 2026 को मैंने अपने साथियों -  जीविका भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रकाश बंधु, हरियाणा के कवि डॉ. त्रिलोक चंद सेन फतेहपुरी, संतोष देवी, भारतीय जीवन बीमा मुजफ्फरपुर की सहायक महाप्रबंधक डॉ. संगीता सागर, राजस्थान की ममता शर्मा, नोएडा के उमानाथ त्रिपाठी, वैशाली की डॉ. रेणु शर्मा, गोरखपुर की कमलेश मिश्रा के साथ हरिद्वार के तीन रूपों को देखा - *ऐतिहासिक हरिद्वार, पर्यावरणीय हरिद्वार और आध्यात्मिक हरिद्वार।* महाराजा अग्रसेन घाट, हंस घाट, हर की पौड़ी, कनखल और अवधूत आश्रम तक की यह यात्रा केवल परिभ्रमण नहीं, चेतना की यात्रा थी।
हरिद्वार का इतिहास, हरिद्वार जिले के 2360 वर्ग किमी के भूगोल से बहुत बड़ा है। यह मन्वंतर काल से शुरू होता है। जिसे आज हम हर की पौड़ी / हरि की पौड़ी कहते हैं, उसका पहला नाम ब्रह्मकुंड 
था। पुराणों के अनुसार राजा श्वेत ने यहाँ ब्रह्मा जी की तपस्या की थी। ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए और वरदान दिया कि यह स्थान हरि के नाम से जाना जाएगा। इसलिए एक ही स्थान के दो नाम हैं - हर की पौड़ी (शिव की) और हरि की पौड़ी (विष्णु की)।
ऐतिहासिक तथ्य यह है कि इसका निर्माण उज्जैन के सम्राट राजा विक्रमादित्य ने अपने भाई भर्तृहरि की याद में पहली शताब्दी ईसा पूर्व में करवाया था। यहाँ आज भी शिला पर भगवान विष्णु के चरण चिह्न अंकित हैं। समुद्र मंथन की कथा के अनुसार जब धन्वंतरि अमृत कलश लेकर जा रहे थे, तो अमृत की 4 बूंदें चार जगह गिरीं - हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक। इसलिए यहाँ कुंभ होता है। 29 अगस्त 2026 की संध्या को जब हम डॉ. संगीता सागर, ममता शर्मा और त्रिलोक चंद जी के साथ यहाँ स्नान कर रहे थे, तो लगा जैसे हम केवल 2026 में नहीं, बल्कि उस क्षण में भी हैं जब अमृत गिरा था।
अग्रसेन घाट और हंस घाट - सामाजिक और वैदिक इतिहास :*
29 अगस्त को हमने जो महाराजा अग्रसेन घाट देखा, वह आधुनिक भारत के सामाजिक इतिहास का प्रतीक है। महाराजा अग्रसेन ने 5000 साल पहले एक रुपया, एक ईंट का सिद्धांत दिया था। उसी सिद्धांत पर यह घाट बना है। यहाँ कोई पंडा नहीं, कोई शुल्क नहीं। यह सेवा का घाट है। यह बताता है कि दान से ही समाज बनता है।
हंस घाट, जिसे मालवीय घाट भी कहते हैं, वैदिक इतिहास का प्रतीक है। मान्यता है कि ब्रह्मा जी के वाहन हंस ने यहाँ तपस्या कर गंगा को प्रसन्न किया था, इसलिए इसका नाम हंस घाट पड़ा। महामना मदन मोहन मालवीय जी ने यहाँ गुरुकुल कांगड़ी के छात्रों के लिए स्नान की व्यवस्था बनवाई थी। बगल में 1936 में बना प्रसिद्ध बिरला टॉवर है। यह घाट हमें बताता है कि हरिद्वार केवल स्नान की नगरी नहीं, ज्ञान की नगरी भी है।
 पर्यावरणीय चेतना : जहाँ गंगा केवल नदी नहीं, जीवन है
हर की पौडी  संध्या आरती के समय जब हमने हजारों दीये, फूल, पॉलीथीन को गंगा में बहते देखा तो  "भक्ति तो है पर पर्यावरण के प्रति भक्ति नहीं।" हर की पौड़ी पर जल की धारा तेज है, इसलिए कचरा बह जाता है, पर वह कचरा आगे जाकर कहाँ जाता है? यही तो गंगा प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है। यहाँ हमने संकल्प लिया कि आरती में फूल तो चढ़ाएंगे पर पॉलीथीन नहीं।
अग्रसेन घाट और हंस घाट पर समाधान  इन दोनों घाटों पर हमने देखा कि कैसे सफाई रखी जा सकती है। अग्रसेन घाट पर कूड़ेदान लगे हैं, प्याऊ है, निःशुल्क चेंजिंग रूम है। हंस घाट पर गुरुकुल के ब्रह्मचारी प्रतिदिन घाट की सफाई करते हैं। यहाँ जल स्थिर और निर्मल है क्योंकि यहाँ भीड़ नहीं है। यह बताता है कि गंगा को साफ रखने के लिए भीड़ को नियंत्रित करना और घाटों को बाँटना जरूरी है। पर्यावरण की रक्षा ही गंगा की सच्ची आरती है।
इस पूरी यात्रा की सबसे गहरी अनुभूति आध्यात्मिक थी।
 29 अगस्त की सुबह अवधूत आश्रम में जब मैंने अपनी अंजुली में गंगा जल लेकर बाबा शिवलिंग पर जलाभिषेक किया, तो प्रकाश बंधु जी ने कहा था - "अंजुली का जल अहंकार को धो देता है।" सच है। जब हम लोटे से जल चढ़ाते हैं तो हम बड़े बन जाते हैं, पर जब अंजुली से जल चढ़ाते हैं तो हम छोटे, विनम्र बन जाते हैं। शिव को विनम्रता ही प्रिय है।
29 अगस्त की संध्या को हर की पौड़ी पर जब 50 पंडितों ने एक साथ आरती की, हजारों दीये गंगा में तैरे, तो जो अनुभूति हुई उसे शब्दों में नहीं लिखा जा सकता। डॉ. संगीता सागर, ममता शर्मा, त्रिलोक चंद जी, संतोष देवी - हम सबके हाथ में दीये थे। दीये की लौ में माँ गंगा का चेहरा दिख रहा था। उस क्षण लगा कि गंगा केवल जल नहीं, प्रकाश है। आरती लेने के बाद जो शांतिपूर्ण और आध्यात्मिक गहराई की अनुभूति हुई, वह जीवन भर की पूंजी बन गई।
यह यात्रा हमें तीन मंत्र देकर गई - ऐतिहासिक चेतना कहती है - अपने परिवार का सम्मान करो, जैसे शिव ने दक्ष को माफ किया।
पर्यावरणीय चेतना कहती है - गंगा को माँ समझो, नाली नहीं।
आध्यात्मिक चेतना कहती है -  अंजुली का जल ही आरती बन जाता है, अगर मन साफ हो।
29 अगस्त को अग्रसेन घाट ने सेवा सिखाई, हंस घाट ने ज्ञान, हर की पौड़ी ने मोक्ष। और अवधूत आश्रम ने सिखाया कि पुस्तकें भी गंगा हैं। इसलिए हरिद्वार की यात्रा पूरी नहीं होती, शुरू होती है। जो एक बार हरिद्वार के घाटों पर अंजुली में जल लेकर शिव को याद करता है, वह जीवन भर गंगा को अपने साथ ले जाता है।