गुरुवार, सितंबर 10, 2026

सौर संस्कृति

सौर संस्कृति  स्थल खटांगी सूर्यमंदिर  
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
सौर धर्म (सूर्य उपासना) के संस्थापक की बात है, तो शास्त्रों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को देश में सौर धर्म को प्रसारित करने और सूर्य मंदिरों की स्थापना का मुख्य श्रेय दिया जाता है। साम्ब ने ही कुष्ठ रोग से मुक्ति पाने के लिए भारत के विभिन्न हिस्सों में १२ प्रसिद्ध सूर्य मंदिरों की स्थापना करवाई थी। 
ख़तांगी का सूर्य मंदिर -  बिहार राज्य का  अरवल जिले के सोनभद्र वंशीसूर्यपुर प्रखंड के नेरा नदी के तट पर स्थित  खटांगी गांव मे सूर्यमंदिर अवस्थित है। यहाँ स्थापित भगवान सूर्य  की अत्यंत दुर्लभ प्रतिमा खटांगी गढ़ की उत्खनन  के दौरान २०० वर्ष  पीपल के वृक्ष के नीचे स्थापित की गई थी। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह प्रतिमा मौर्यकालीन पूर्णतः काले पत्थर से निर्मित  भगवान भास्कर सात घोड़ों के रथ पर सवार हैं और उनके सारथी अरुण है । ग्रामीणों एवं सूर्य उपासकों एवं श्रद्धालुओं के सहयोग से वर्ष १९९५ में यहाँ १०८ फीट ऊंचे भव्य और सुंदर सूर्य मंदिर का निर्माण पूरा हुआ है । सौर संस्कृति  के राजा खतांग  ने द्वापर युग में धाता आदित्य की मूर्ति स्थापित किया था। 
सौर संस्कृति और सूर्य उपासना के प्रसिद्ध सूर्य मंदिर में  उमंगा सूर्य मंदिर , औरंगाबाद , राजा एल द्वारा सतयुग में कराई गई थी।  देव व  देवार्क सूर्य मंदिर औरंगाबाद, बिहार गुप्तकालीन (५वीं-६ठी शताब्दी), इसका मुख्य द्वार पश्चिम की ओर है। उलार्क सूर्य मंदिर पालीगंज, पटना (बिहार) भगवान कृष्ण के पुत्र साम्ब द्वारा स्थापित पौराणिक १२ मंदिरों में से एक। कन्दाहा सूर्य मंदिर सहरसा, बिहार द्वापरकालीन मान्यता, जिसे कृष्ण-पुत्र साम्ब से जोड़ा जाता है। बड़ार्क सूर्य मंदिर बड़गांव, नालंदा (बिहार) मगध क्षेत्र का प्राचीन और अत्यंत प्रसिद्ध सूर्य उपासना केंद्र। क़िकट प्रदेश का राजा गय  ने स्वायंभुव मन्वंतर वैवस्वत मन्वंतर के सतयुग में गया में गयॉर्क सूर्यमंदिर गर्भ गृह में अर्यमा आदित्य सूर्य स्थापित है ।  औंगारी धाम सूर्य मंदिर नालंदा, बिहार द्वापरकालीन आस्था का केंद्र, जिसका मुख्य द्वार पश्चिम की ओर है। पुण्यार्क सूर्य मंदिर बाढ़, पटना (बिहार) मगध क्षेत्र के ५ प्रमुख ऐतिहासिक सूर्य मंदिरों में शामिल। कोणार्क सूर्य मंदिर ओडिशा १३वीं शताब्दी में पूर्वी गंग वंश के राजा नरसिंहदेव प्रथम द्वारा निर्मित। मार्तंड सूर्य मंदिर अनंतनाग, जम्मू और कश्मीर ८वीं शताब्दी में कार्कोट राजवंश के राजा ललितादित्य मुक्तापीड द्वारा निर्मित। मोढेरा सूर्य मंदिर मेहसाणा, गुजरात ११वीं शताब्दी में सोलंकी वंश के राजा भीमदेव प्रथम द्वारा निर्मित है ।

गुरुवार, सितंबर 03, 2026

आध्यात्म और शांति स्थल है हरिद्वार

हरिद्वार - सनातन धर्म  संस्कृति की आत्मा का भूगोल 
 सत्येंद्र कुमार पाठक
हरिद्वार केवल एक शहर नहीं है। यह भारत की आत्मा का भूगोल है। नक्शे पर यह उत्तराखंड के हरिद्वार जिले का 2360 वर्ग किमी का एक जिला है, पर चेतना के नक्शे पर यह वह बिंदु है जहाँ हिमालय समाप्त होता है और भारत शुरू होता है। जहाँ शिवालिक पर्वत मैदान को प्रणाम करता है और गंगा पहाड़ों की गोद छोड़कर पहली बार मैदान में उतरती है। इसीलिए इसका नाम हरिद्वार है - हरि का द्वार, हर का द्वार।
29 अगस्त 2026 से 2 सितंबर 2026 तक मुझे यह सौभाग्य मिला कि मैं हरिद्वार को एक यात्री की तरह नहीं, एक इतिहासकार की तरह देख सकूँ। यह केवल मंदिर दर्शन नहीं था, यह चेतना की यात्रा थी। इस यात्रा में मेरे साथ अलग-अलग पड़ावों पर मेरे सहयात्री रहे, जिन्होंने इस यात्रा को और समृद्ध किया । 
  हरिद्वार - जहाँ आत्मा को चेतना मिलती है (29 अगस्त 2026) - अग्रसेन घाट, हंस घाट, हर की पौड़ी और अवधूत आश्रम ।  29 अगस्त 2026 की सुबह हम अवधूत आश्रम में थे। अवधूत आश्रम हरिद्वार का वह केंद्र है जहाँ पुस्तकें भी गंगा हैं। यहाँ  हमने गंगा जल को अंजुली में लेकर बाबा शिवलिंग पर जलाभिषेक किया। "अंजुली का जल अहंकार को धो देता है।" यह बात मेरे मन में बैठ गई। जब हम लोटे से जल चढ़ाते हैं तो हम बड़े बन जाते हैं, दाता बन जाते हैं, पर जब अंजुली से जल चढ़ाते हैं तो हम छोटे, विनम्र, याचक बन जाते हैं। और शिव को विनम्रता ही प्रिय है।
हरिद्वार का इतिहास मन्वंतर काल से शुरू होता है। जिसे आज हम हर की पौड़ी / हरि की पौड़ी कहते हैं, उसका पहला नाम ब्रह्मकुंड था। पुराणों के अनुसार राजा श्वेत ने यहाँ ब्रह्मा जी की घोर तपस्या की थी। ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए और वरदान दिया कि यह स्थान हरि के नाम से जाना जाएगा। इसलिए एक ही स्थान के दो नाम हैं - हर की पौड़ी यानी शिव की पौड़ी और हरि की पौड़ी यानी विष्णु की पौड़ी। शैव और वैष्णव का ऐसा संगम और कहीं नहीं है।
ऐतिहासिक तथ्य यह है कि इसका निर्माण उज्जैन के सम्राट राजा विक्रमादित्य ने अपने भाई भर्तृहरि की याद में पहली शताब्दी ईसा पूर्व में करवाया था। यहाँ आज भी शिला पर भगवान विष्णु के चरण चिह्न अंकित हैं, जिन्हें हरि चरण कहते हैं। समुद्र मंथन की कथा के अनुसार जब धन्वंतरि अमृत कलश लेकर जा रहे थे, तो अमृत की चार बूंदें चार जगह गिरीं - हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक। इसलिए यहाँ कुंभ होता है। 29 अगस्त की संध्या को जब हम डॉ. संगीता सागर, ममता शर्मा और त्रिलोक चंद जी के साथ हर की पौड़ी पर स्नान कर रहे थे, तो लगा जैसे हम केवल 2026 में नहीं, बल्कि उस क्षण में भी हैं जब अमृत गिरा था। वह जल केवल जल नहीं था, वह समय था। उसी दिन हमने दो और घाटों के दर्शन किए - महाराजा अग्रसेन घाट और हंस घाट।
महाराजा अग्रसेन घाट आधुनिक भारत के सामाजिक इतिहास का प्रतीक है। महाराजा अग्रसेन ने 5000 साल पहले एक रुपया और एक ईंट का सिद्धांत दिया था - हर नया बसा व्यक्ति समाज को एक रुपया और एक ईंट देगा, ताकि कोई भी गरीब न रहे। उसी सिद्धांत पर यह घाट बना है। यहाँ कोई पंडा नहीं, कोई शुल्क नहीं, कोई वीवी आई  व्यवस्था नहीं। यह सेवा का घाट है। निःशुल्क चेंजिंग रूम, प्याऊ, कूड़ेदान। यह बताता है कि दान से ही समाज बनता है, लूट से नहीं।
हंस घाट, जिसे मालवीय घाट भी कहते हैं, वैदिक इतिहास का प्रतीक है। मान्यता है कि ब्रह्मा जी के वाहन हंस ने यहाँ तपस्या कर गंगा को प्रसन्न किया था, इसलिए इसका नाम हंस घाट पड़ा। महामना मदन मोहन मालवीय जी ने यहाँ गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए स्नान की व्यवस्था बनवाई थी। बगल में 1936 में बना प्रसिद्ध बिरला टॉवर है, जहाँ से पूरे हरिद्वार का समय चलता है। यह घाट हमें बताता है कि हरिद्वार केवल स्नान की नगरी नहीं, ज्ञान की नगरी भी है।
पर्यावरणीय चेतना - हर की पौड़ी पर संध्या आरती के समय जब हमने हजारों दीये, फूल, पॉलीथीन, अगरबत्ती के पैकेट को गंगा में बहते देखा, तब "भक्ति तो है पर पर्यावरण के प्रति भक्ति नहीं।" हर की पौड़ी पर जल की धारा तेज है, इसलिए कचरा बह जाता है और हमें लगता है गंगा साफ है, पर वह कचरा आगे जाकर कहाँ जाता है? यही तो गंगा प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है। भक्ति के नाम पर हम माँ को ही प्रदूषित कर रहे हैं।
हमने वहीं संकल्प लिया कि आरती में फूल तो चढ़ाएंगे पर पॉलीथीन नहीं, दीया तो जलाएंगे पर प्लास्टिक वाला दीया नहीं। सच्ची आरती वही है जो गंगा को निर्मल रखे। और इसका समाधान हमें अग्रसेन घाट और हंस घाट पर मिला। इन दोनों घाटों पर सफाई है। अग्रसेन घाट पर बकायदा कूड़ेदान लगे हैं, हंस घाट पर गुरुकुल के ब्रह्मचारी प्रतिदिन घाट की सफाई करते हैं। यहाँ जल स्थिर और निर्मल है क्योंकि यहाँ भीड़ नहीं है। यह बताता है कि गंगा को साफ रखने के लिए दो काम करने होंगे - भीड़ को नियंत्रित कर घाटों को बाँटना होगा और हर घाट पर सेवा का भाव लाना होगा। पर्यावरण की रक्षा ही गंगा की सच्ची आरती है।
आध्यात्मिक चेतना - इस पूरी यात्रा की सबसे गहरी अनुभूति आध्यात्मिक थी। 29 अगस्त की संध्या को हर की पौड़ी पर जब 50 पंडितों ने एक साथ महाआरती की, हजारों दीये गंगा में तैरे , शंख बजे, तो जो अनुभूति हुई उसे शब्दों में नहीं लिखा जा सकता। हम सबके हाथ में दीये थे - मेर। दीये की लौ में माँ गंगा का चेहरा दिख रहा था। उस क्षण लगा कि गंगा केवल जल नहीं, प्रकाश है। आरती लेने के बाद जो शांतिपूर्ण और आध्यात्मिक गहराई की अनुभूति हुई, वह जीवन भर की पूंजी बन गई।
यह यात्रा हमें तीन मंत्र देकर गई - ऐतिहासिक चेतना कहती है - अपने परिवार का सम्मान करो, जैसे शिव ने दक्ष को माफ किया। पर्यावरणीय चेतना कहती है - गंगा को माँ समझो, नाली नहीं। आध्यात्मिक चेतना कहती है - अंजुली का जल ही आरती बन जाता है, अगर मन साफ हो।
 शिवालिक की गोद में मातृ-शक्ति के तीन शिखर - मनसा, चंडी और अंजनी (1 सितंबर 2026) - हरिद्वार को लोग समतल मैदान समझते हैं, पर यह भारत के भूगोल की सबसे बड़ी भूल है। सच यह है कि हरिद्वार शिवालिक पर्वत श्रृंखला का द्वार है। यहीं आकर शिवालिक हिमालय से मिलता है और मैदान शुरू होता है। भूगोल की भाषा में शिवालिक सबसे नया पर्वत है, जो आज भी बढ़ रहा है। 1 सितंबर 2026 की सुबह 5:30 बजे, जब हरिद्वार में हल्का कोहरा छाया था और गंगा पर धुंध थी, मैं, डॉ. उषा किरण श्रीवास्तव और डॉ. संगीता सागर के साथ नील पर्वत श्रृंखला की ओर निकल पड़ा। यह यात्रा केवल मंदिर दर्शन नहीं थी, यह हरिद्वार की मातृ संस्कृति का साक्षात्कार था।
हरिद्वार तीन पर्वतों से घिरा है - नील पर्वत, बिल्व पर्वत और नारायण पर्वत। आज हमारा लक्ष्य नील और बिल्व पर्वत था। नीचे नील धारा है और चंडी घाट। चंडी घाट वह घाट है जहाँ से माँ चंडी देवी के लिए रोप-वे शुरू होता है। सुबह के समय यहाँ गंगा बहुत चौड़ी हो जाती है। यहाँ गंगा दो धाराओं में बंट जाती है - मुख्य धारा और नील धारा। नील धारा नील पर्वत के नीचे से बहती है। यहाँ से नील पर्वत का दृश्य ऐसा लगता है जैसे कोई माँ अपनी गोद में हरिद्वार को बैठाए हो। हमने यहाँ आचमन किया और पर्वत चढ़ाई शुरू की।
बिल्व पर्वत पर मनसा देवी - हमने पहले बिल्व पर्वत की चढ़ाई शुरू की। बिल्व पर्वत शिवालिक की दक्षिणी श्रृंखला पर स्थित है। इसकी ऊँचाई लगभग 585 मीटर (1,926 फीट) समुद्र तल से है। बिल्व यानी बेलपत्र का पर्वत। कहते हैं यहाँ प्राचीन काल में बेल के घने जंगल थे, जिनके बेलपत्र सीधे हर की पौड़ी के शिवलिंगों पर चढ़ते थे, इसलिए नाम बिल्व पड़ा। यह मंदिर नील पर्वत नहीं, बिल्व पर्वत की चोटी पर है। यहाँ से हर की पौड़ी सीधे नीचे दिखती है। रोप-वे से 5 मिनट में पहुँचा जा सकता है, पर हमने पैदल मार्ग से चढ़ाई की, जिसमें लगभग 1.5 किमी की चढ़ाई है। माँ मनसा देवी को नागों की देवी और इच्छा देवी कहा जाता है। 51 शक्तिपीठों में यह वह स्थान है जहाँ देवी सती का मन गिरा था, इसलिए नाम मनसा पड़ा। कुछ कथाओं में कहा जाता है कि यहाँ सती के मस्तिष्क का हिस्सा गिरा था। यह मंदिर 1811 में मणिराम ने बनवाया था। मान्यता है कि यहाँ सच्चे मन से जो धागा बांधा जाता है, मन की इच्छा पूरी होती है। मंदिर में पीपल के पेड़ पर हजारों धागे बंधे हैं। डॉ. उषा श्रीवास्तव जी ने यहाँ अपने कला केंद्र के बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए और डॉ. संगीता सागर जी ने अपने परिवार और बीमा परिवार के कल्याण के लिए मौली बांधी।
यहाँ से पूरा हरिद्वार दिखता है। यह शिवालिक का वह बिंदु है जहाँ से पर्वत मैदान में बदल जाता है। यहाँ खड़े होकर समझ आता है कि माँ क्यों ऊँचे पर्वत पर रहती है - ताकि वह अपने सभी बच्चों पर नजर रख सके। यही तो मातृ संस्कृति है।
नील पर्वत पर चंडी देवी - बिल्व पर्वत से उतरकर हम नील पर्वत की ओर गए। नील पर्वत शिवालिक की पूर्वी श्रृंखला पर स्थित है। इसकी ऊँचाई लगभग 2,900 फीट (लगभग 884 मीटर) समुद्र तल से है। यह मनसा से लगभग 300 मीटर ऊँचा है। यह हरिद्वार का सबसे ऊँचा सिद्धपीठ है। यहाँ तक पहुँचने के लिए 3 किमी की खड़ी चढ़ाई है। चंडी देवी मंदिर शक्ति का प्रचंड रूप है। यह 51 शक्तिपीठों में से एक नहीं, पर अति प्रसिद्ध सिद्धपीठ है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार देवी चंडी ने इसी नील पर्वत पर शुंभ और निशुंभ नामक दो राक्षस राजाओं का वध किया था। उनके वध के बाद देवी ने यहीं विश्राम किया। कथा यह भी है कि यहाँ देवी सती के सिर का निशान गिरा था। यह मंदिर 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य जी ने स्थापित किया था और 1929 में कश्मीर नरेश सुचत सिंह ने इसका जीर्णोद्धार करवाया। मंदिर के गर्भगृह में माँ चंडी की दो मूर्तियाँ हैं - एक मुख्य अचल मूर्ति और एक चल मूर्ति। हमने यहाँ चंडी पाठ किया। यहाँ से नील धारा, चंडी घाट और राजाजी नेशनल पार्क का घना जंगल दिखता है। अगर मनसा इच्छा देती है, तो चंडी उस इच्छा को पूरा करने की शक्ति देती है।
नील पर्वत की दूसरी चोटी पर माता अंजनी देवी - चंडी मंदिर से नीचे उतरते समय, नील पर्वत की ही एक दूसरी चोटी पर एक छोटा सा गुप्त मंदिर है - माता अंजनी देवी मंदिर। इसकी ऊँचाई लगभग 800 से 900 मीटर के आसपास है। यह मंदिर भगवान हनुमान की दिव्य माता अंजनी देवी को समर्पित है। यह अंजनी देवी की तपभूमि है। पौराणिक कथा है कि अंजनी देवी ने पुत्र प्राप्ति के लिए नील पर्वत पर हजारों वर्षों तक तपस्या की थी। वायु देवता के आशीर्वाद से उन्हें हनुमान जी जैसा पुत्र प्राप्त हुआ। इसलिए यह हरिद्वार की ऊँची चोटियों पर एक ऐसा चमत्कारी स्थान है, जहाँ संतान प्राप्ति की मन्नत कभी खाली नहीं जाती। हम जब यहाँ पहुँचे तो कई निःसंतान दंपति यहाँ पूजा कर रहे थे। अंदर अंजनी माता की गोद में बाल हनुमान की मूर्ति है। बगल में ही हनुमान जी का छोटा मंदिर है, जहाँ हनुमान जी अपनी माँ की पहरेदारी में खड़े हैं। मनसा इच्छा देती है, चंडी शक्ति देती है, और अंजनी माता संतान यानी वंश देती है। यह तीनों ही नारी के तीन रूप हैं।
मैदान में माया देवी और सप्त सरोवर में भारत माता - जबकि मनसा बिल्व पर, चंडी और अंजनी नील पर हैं, एक और शक्ति है जो मैदान में है - माया देवी मंदिर। यह हरिद्वार शहर के मुख्य क्षेत्र में, हर की पौड़ी और बिरला घाट के पास है। माया देवी हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी हैं। हरिद्वार का पुराना नाम मायापुरी भी इन्हीं के नाम पर है। यहाँ सती की नाभि गिरी थी, इसलिए यह 51 शक्तिपीठों में सबसे महत्वपूर्ण है। यह 11वीं शताब्दी का मंदिर है। बिना माया देवी के दर्शन के मनसा-चंडी की यात्रा अधूरी मानी जाती है। माया देवी वह जड़ हैं, जिनसे बिल्व और नील पर्वत निकले हैं।
पर्वत से नीचे उतरकर हम सप्त सरोवर के पास स्थित भारत माता मंदिर गए। यह 8 मंजिला मंदिर है, जिसे स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी ने बनवाया था और 1983 में इंदिरा गांधी ने इसका उद्घाटन किया था। यह हरिद्वार का इकलौता ऐसा मंदिर है जहाँ किसी देवी-देवता की नहीं, बल्कि भारत माता की पूजा होती है। हर मंजिल पर भारत के इतिहास को दर्शाया गया है - पहली पर भारत माता की 8 फीट ऊँची मूर्ति, दूसरी पर शूर मंदिर, तीसरी पर मातृ मंदिर। डॉ. संगीता जी ने कहा - "गंगा और भारत माता एक ही हैं। दोनों मातृ संस्कृति की प्रतीक हैं। एक जल देती है, दूसरी जीवन।"
अंत में हम वैष्णवी मंदिर गुफा और सदानंद आश्रम गुफा गए। वैष्णवी गुफा नील पर्वत की तलहटी में एक प्राकृतिक गुफा है, जहाँ वैष्णव संतों ने तपस्या की थी। यहाँ विष्णु जी के 24 अवतारों की मूर्तियाँ हैं। सदानंद आश्रम गुफा में 100 साल से अखंड धूना जल रहा है। 1 सितंबर की यह प्रातःकालीन यात्रा दोपहर 12 बजे तक पूरी हुई। 6 घंटे में 6 देवियों और देवताओं के दर्शन - यही हरिद्वार की मातृ संस्कृति है - जहाँ नदी भी माँ है, पर्वत भी माँ है, धरती भी माँ है और देश भी माँ है।
 शांतिकुंज से सप्तऋषि तक - बूंद-बूंद में गंगा, मंत्र-मंत्र में जीवन - 
2 अगस्त 2026 को हरिद्वार में रिमझिम वर्षा हो रही थी। भाद्रपद  का महीना, आकाश में बादल और गंगा में जल की बूंदों की थाप। मेरे साथ थीं डॉ. उषा श्रीवास्तव और डॉ. संगीता सागर। हम तीनों ने छाता बंद कर दिया और वर्षा में भीगते हुए ही शांतिकुंज पहुँचे।
शांतिकुंज युग निर्माण की प्रयोगशाला है। यह केवल आश्रम नहीं, पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा स्थापित एक विचार क्रांति का केंद्र है। आचार्य जी ने 1926 में गायत्री की साधना शुरू की और 24-24 लाख के 24 महापुरश्चरण किए। 1971 में उन्होंने इसे मथुरा से हरिद्वार स्थानांतरित किया। आज यह अखिल विश्व गायत्री परिवार का मुख्यालय है।
हम अपराह्न 12:30 बजे शांतिकुंज पहुँचे। वर्षा तेज थी। प्रवेश करते ही सबसे पहले हमने देवात्मा हिमालय मंदिर और गंगेश्वर शिवलिंग के दर्शन किए। यह शांतिकुंज का हृदय है। कहा जाता है कि यहाँ हिमालय की दिव्य आत्माओं का वास है। हमने यहाँ शिवलिंग पर मानसिक रूप से गायत्री मंत्र से उपासना की।
फिर अन्नपूर्णा भवन में सामूहिक भोजन - कढ़ी, सब्जी-भात, रोटी का सात्विक प्रसाद। प्रतिदिन हजारों लोग निःशुल्क भोजन करते हैं। भोजन के बाद हम ध्यान भवन गए। यह एक अंधेरा कक्ष है, जहाँ पूर्ण सन्नाटा है। केवल गायत्री मंत्र की बहुत धीमी ध्वनि कानों में गूंजती है। हमने 20 मिनट तक "ॐ भूर्भुवः स्वः..." का मौन मानसिक जाप किया। आँखें बंद करते ही लगा जैसे शरीर में प्रकाश भर रहा है।
ध्यान के बाद हमने शांतिकुंज पुस्तकालय, प्रदर्शनी और पौधा प्रदर्शनी का भ्रमण किया। पुस्तकालय में आचार्य जी की लिखी 3000 से अधिक पुस्तकें हैं। प्रदर्शनी में मानव शरीर के षट्चक्रों का वैज्ञानिक मॉडल दिखाया गया है। सबसे सुंदर थी आयुर्वेद पौधा प्रदर्शनी, जहाँ तुलसी, नीम, पीपल, रुद्राक्ष के हजारों पौधे निःशुल्क बाँटे जा रहे थे।
यहाँ एक कड़वा अनुभव भी हुआ, जो लिखना जरूरी है क्योंकि सच ही धर्म है। वर्षा तेज होने पर मैं पौधा प्रदर्शनी के बरामदे में लगी कुर्सी पर बैठकर वर्षा थमने का इंतजार कर रहा था। तभी पीले वस्त्र पहने एक आयुर्वेद विक्रेता ने आकर खड़ी-खोटी सुनाई और कहा - "यहाँ से चले जाइए, वर्षा में यहाँ रहने की जरूरत नहीं है।" उनका व्यवहार बहुत रूखा था। परंतु यह एक अपवाद था। नेपाल से आए कर्मी और प्रसाद वितरण करने वाले स्वयंसेवकों का व्यवहार बहुत आत्मीय रहा। उन्होंने कहा - "वर्षा गायत्री माँ का आशीर्वाद है, भीगिए।" यह घटना भी एक सीख दे गई - बड़ी संस्थाओं में भी व्यक्ति का व्यवहार ही धर्म बनता है।
वहाँ से मात्र 2 किमी दूर है सप्तऋषि आश्रम। इसका इतिहास शांतिकुंज से भी हजारों साल पुराना है। पुराणों के अनुसार जब गंगा हिमालय से मैदान में आई, तो उसका वेग इतना तेज था कि पृथ्वी फट जाती। तब सात महान ऋषियों - कश्यप, अत्रि,भारद्वाज, विश्वामित्र, वशिष्ठ, जमदग्नि और गौतम ने यहाँ तपस्या कर गंगा के वेग को रोका। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा यहाँ सात धाराओं में बंट गई। इसलिए इस स्थान को सप्त सरोवर कहा जाता है। आज भी यहाँ गंगा सात धाराओं में बहती है। वर्षा में सप्तऋषि का दृश्य अद्भुत था। हर धारा पर जल बूंदें गिर रही थीं और धुंध में इंद्रधनुष बन रहा था। मुख्य मंदिर में वशिष्ठ और अरुंधति की मूर्ति एक साथ है, जो भारतीय दाम्पत्य के अखंड प्रेम का प्रतीक है। परिसर में ही माता सरस्वती, तिरुपति बालाजी, बाबा गंगेश्वर शिवलिंग, संकटमोचन हनुमान जी और राम-लखन-जानकी का मंदिर है, जहाँ सावन का झूला पड़ा था। यह यात्रा दोपहर 3:30 बजे तक चली। तीन घंटे हम भीगते रहे, पर मन भीगता रहा भक्ति से।
यात्रा पूरी नहीं, शुरू होती है । 29 अगस्त को अग्रसेन घाट ने सेवा सिखाई, हंस घाट ने ज्ञान, हर की पौड़ी ने मोक्ष और अवधूत आश्रम ने सिखाया कि पुस्तकें भी गंगा हैं। 1 सितंबर को बिल्व पर्वत ने इच्छा, नील पर्वत ने शक्ति, अंजनी ने वंश, माया ने जन्म और भारत माता ने राष्ट्र बोध सिखाया। 2 अगस्त को शांतिकुंज ने सिखाया कि गायत्री मंत्र ही असली गंगा है, जो मन को साफ करती है और सप्तऋषि ने सिखाया कि ज्ञान सात धाराओं में बंटकर भी एक ही रहता है।
हरिद्वार का भूगोल ही उसका अध्यात्म है - दक्षिण में बिल्व (585 मीटर) पर मनसा, पूर्व में नील (884 मीटर) पर चंडी, उसी नील की दूसरी चोटी (800-900 मीटर) पर अंजनी, मैदान में माया और सप्त सरोवर में भारत माता। इसी को सनातन धर्म की मातृ संस्कृति कहते हैं। शिवालिक पर्वत केवल पत्थर नहीं, माँ की गोद है। और हरिद्वार वह स्थान है जहाँ पर्वत माँ बन जाता है और गंगा बेटी बनकर उसके चरणों में बहती है।
हमने केवल मंदिर नहीं, अपनी माँ के चार रूप देखे - मन की इच्छा, आत्मा की शक्ति, वंश का संस्कार और राष्ट्र का बोध। जो एक बार हरिद्वार के घाटों पर अंजुली में जल लेकर शिव को याद करता है, वह जीवन भर गंगा को अपने साथ ले जाता है। इसलिए हरिद्वार की यात्रा कभी पूरी नहीं होती, वहीं से शुरू होती है।

मंगलवार, सितंबर 01, 2026

हरिद्वार परिभ्रमण

हरिद्वार  : शिवालिक की गोद में मातृ-शक्ति 
 सत्येंद्र कुमार पाठक 
हरिद्वार को लोग समतल मैदान समझते हैं, पर यह भारत के भूगोल की सबसे बड़ी भूल है। सच यह है कि हरिद्वार शिवालिक पर्वत श्रृंखला का द्वार है। यहीं आकर शिवालिक हिमालय मैदान से मिलता है और गंगा पहाड़ों को छोड़कर मैदान में आती है। इसीलिए इसे हरिद्वार - हरि का द्वार कहा गया। 01  सितंबर 2026 की सुबह 5:30 बजे, जब हरिद्वार में हल्का कोहरा छाया था और गंगा पर धुंध थी, मैं, स्वर्णिम कला केंद्र मुजफ्फरपुर की अध्यक्ष डॉ. उषा किरण श्रीवास्तव और मुजफ्फरपुर  , बिहार  की डॉ. संगीता सागर के साथ नीलगिरि पर्वत श्रृंखला की ओर निकल पड़ा। यह यात्रा केवल मंदिर दर्शन नहीं थी, यह हरिद्वार की मातृ संस्कृति का साक्षात्कार था।
नील पर्वत और चंडी घाट - जहाँ से यात्रा शुरू होती है, हरिद्वार तीन पर्वतों से घिरा है - नील पर्वत, बिल्व पर्वत और नारायण पर्वत। आज हमारा लक्ष्य नील और बिल्व पर्वत था। नीचे नील धारा है और चंडी घाट। चंडी घाट वह घाट है जहाँ से माँ चंडी देवी के लिए रोप-वे शुरू होता है। सुबह के समय यहाँ गंगा बहुत चौड़ी हो जाती है। यहाँ गंगा दो धाराओं में बंट जाती है - मुख्य धारा और नील धारा। नील धारा नील पर्वत के नीचे से बहती है। यहाँ से नील पर्वत का दृश्य ऐसा लगता है जैसे कोई माँ अपनी गोद में हरिद्वार को बैठाए हो। हमने यहाँ आचमन किया और पर्वत चढ़ाई शुरू की। चंडी घाट पर खड़े होकर ही समझ आता है कि हरिद्वार का भूगोल ही उसका अध्यात्म है।
 बिल्व पर्वत पर मनसा देवी - जहाँ मन की इच्छा पूरी होती है ।
हमने पहले बिल्व पर्वत की चढ़ाई शुरू की। बिल्व पर्वत शिवालिक की दक्षिणी श्रृंखला पर स्थित है। इसकी ऊँचाई लगभग *585 मीटर (1,926 फीट) समुद्र तल से* है। बिल्व यानी बेलपत्र का पर्वत। कहते हैं यहाँ प्राचीन काल में बेल के घने जंगल थे, जिनके बेलपत्र सीधे हर की पौड़ी के शिवलिंगों पर चढ़ते थे, इसलिए नाम बिल्व पड़ा। यह मंदिर नील पर्वत नहीं, बिल्व पर्वत की चोटी पर है। यहाँ से हर की पौड़ी सीधे नीचे दिखती है। रोप-वे से 5 मिनट में पहुँचा जा सकता है, पर हमने पैदल मार्ग से चढ़ाई की, जिसमें लगभग 1.5 किमी की चढ़ाई है।
माँ मनसा देवी को नागों की देवी और इच्छा देवी कहा जाता है। 51 शक्तिपीठों में यह वह स्थान है जहाँ देवी सती का मन गिरा था, इसलिए नाम मनसा पड़ा। कुछ कथाओं में कहा जाता है कि यहाँ सती के मस्तिष्क का हिस्सा गिरा था। यह मंदिर 1811 में मणिराम ने बनवाया था। मान्यता है कि यहाँ सच्चे मन से जो धागा बांधा जाता है, मन की इच्छा पूरी होती है। मंदिर में पीपल के पेड़ पर हजारों धागे बंधे हैं। डॉ. उषा श्रीवास्तव जी ने यहाँ अपने कला केंद्र के बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए और डॉ. संगीता सागर जी ने अपने परिवार और बीमा परिवार के कल्याण के लिए मौली बांधी।
यहाँ से पूरा हरिद्वार दिखता है - नीचे बहती गंगा, हर की पौड़ी के दीये और दूर तक फैला 2360 वर्ग किमी का हरिद्वार जिला। यह शिवालिक का वह बिंदु है जहाँ से पर्वत मैदान में बदल जाता है। यहाँ खड़े होकर समझ आता है कि माँ क्यों ऊँचे पर्वत पर रहती है - ताकि वह अपने सभी बच्चों पर नजर रख सके। यही तो मातृ संस्कृति है। मन इच्छा देता है। नील पर्वत पर चंडी देवी - जहाँ आत्मा को शक्ति मिलती है । 
बिल्व पर्वत से उतरकर हम नील पर्वत की ओर गए। नील पर्वत शिवालिक की पूर्वी श्रृंखला पर स्थित है। इसकी ऊँचाई *लगभग 2,900 फीट (लगभग 884 मीटर) समुद्र तल से* है। यह मनसा से लगभग 300 मीटर ऊँचा है। यह हरिद्वार का सबसे ऊँचा सिद्धपीठ है। यहाँ तक पहुँचने के लिए 3 किमी की खड़ी चढ़ाई है।
चंडी देवी मंदिर शक्ति का प्रचंड रूप है। यह 51 शक्तिपीठों में से एक नहीं, पर अति प्रसिद्ध सिद्धपीठ है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार देवी चंडी ने इसी नील पर्वत पर शुंभ और निशुंभ नामक दो राक्षस राजाओं का वध किया था। उनके वध के बाद देवी ने यहीं विश्राम किया। कथा यह भी है कि यहाँ देवी सती के सिर का निशान गिरा था। यह मंदिर 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य जी ने स्थापित किया था और 1929 में कश्मीर नरेश सुचत सिंह ने इसका जीर्णोद्धार करवाया। मंदिर के गर्भगृह में माँ चंडी की दो मूर्तियाँ हैं - एक मुख्य अचल मूर्ति और एक चल मूर्ति। यहाँ हनुमान जी और भैरव जी भी पहरेदार के रूप में हैं। हमने यहाँ चंडी पाठ किया। यहाँ से नील धारा, चंडी घाट और राजाजी नेशनल पार्क का घना जंगल दिखता है। हवा में जंगली फूलों की महक है। यहाँ की ऊर्जा बिल्कुल अलग है - यहाँ उग्र शक्ति है, जो डर को मारती है। अगर मनसा इच्छा देती है, तो चंडी उस इच्छा को पूरा करने की शक्ति देती है।
 नील पर्वत की दूसरी चोटी पर माता अंजनी देवी - जहाँ वंश मिलता है ।  चंडी मंदिर से नीचे उतरते समय, नील पर्वत की ही एक दूसरी चोटी पर एक छोटा सा गुप्त मंदिर है, जिसके बारे में बहुत कम यात्रियों को पता है - माता अंजनी देवी मंदिर।* इसकी ऊँचाई लगभग *800 से 900 मीटर के आसपास है, यानी चंडी मंदिर के समीप ही। यह मंदिर भगवान हनुमान की दिव्य माता अंजनी देवी को समर्पित है। यह अंजनी देवी की तपभूमि है। पौराणिक कथा है कि अंजनी देवी ने पुत्र प्राप्ति के लिए नील पर्वत पर हजारों वर्षों तक तपस्या की थी। वायु देवता के आशीर्वाद से उन्हें हनुमान जी जैसा पुत्र प्राप्त हुआ। इसलिए यह हरिद्वार की ऊँची चोटियों पर एक ऐसा चमत्कारी स्थान है, जहाँ संतान प्राप्ति की मन्नत कभी खाली नहीं जाती।
हम जब यहाँ पहुँचे तो कई निःसंतान दंपति यहाँ पूजा कर रहे थे। मंदिर छोटा है, अंदर अंजनी माता की गोद में बाल हनुमान की मूर्ति है। चेहरे पर ममता है। बगल में ही हनुमान जी का छोटा मंदिर है, जहाँ हनुमान जी अपनी माँ की पहरेदारी में खड़े हैं, सिंदूर से लिपटे हुए।
मनसा इच्छा देती है, चंडी शक्ति देती है, और अंजनी माता संतान यानी वंश देती है। यह तीनों ही नारी के तीन रूप हैं।" सच है - एक ही पर्वत श्रृंखला पर नारी के तीन रूप विराजमान हैं।
माया देवी मंदिर - मैदान में माँ, जो तीनों शिखरों की जननी है*
जबकि मनसा बिल्व पर्वत पर, चंडी और अंजनी नील पर्वत पर हैं, एक और शक्ति है जो मैदान में है - *माया देवी मंदिर।* यह हरिद्वार शहर के मुख्य क्षेत्र में, हर की पौड़ी और बिरला घाट के पास है।
माया देवी हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी हैं। हरिद्वार का पुराना नाम मायापुरी भी इन्हीं के नाम पर है। यहाँ सती की नाभि गिरी थी, इसलिए यह 51 शक्तिपीठों में सबसे महत्वपूर्ण है। यह 11वीं शताब्दी का मंदिर है। बिना माया देवी के दर्शन के मनसा-चंडी की यात्रा अधूरी मानी जाती है। माया देवी वह जड़ हैं, जिनसे बिल्व और नील पर्वत निकले हैं।
भारत माता मंदिर, वैष्णवी गुफा और सदानंद आश्रम गुफा है। पर्वत से नीचे उतरकर हम सप्त सरोवर के पास स्थित *भारत माता मंदिर* गए। यह 8 मंजिला मंदिर है, जिसे स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी ने बनवाया था और 1983 में इंदिरा गांधी ने इसका उद्घाटन किया था। यह हरिद्वार का इकलौता ऐसा मंदिर है जहाँ किसी देवी-देवता की नहीं, बल्कि भारत माता की पूजा होती है। हर मंजिल पर भारत के इतिहास को दर्शाया गया है। डॉ. संगीता जी ने कहा - "गंगा और भारत माता एक ही हैं। दोनों मातृ संस्कृति की प्रतीक हैं। एक जल देती है, दूसरी जीवन।"
अंत में हम *वैष्णवी मंदिर गुफा* और *सदानंद आश्रम गुफा* गए। वैष्णवी गुफा नील पर्वत की तलहटी में एक प्राकृतिक गुफा है, जहाँ वैष्णव संतों ने तपस्या की थी। अंदर बहुत ठंडक है। यहाँ विष्णु जी के 24 अवतारों की छोटी-छोटी मूर्तियाँ हैं। गुफा की दीवारों से पानी टपकता है, जिसे चरणामृत माना जाता है। सदानंद आश्रम गुफा में सदानंद स्वामी जी ने 40 साल तक मौन तपस्या की थी। अंदर विभिन्न देवियों के मंदिर हैं और 100 साल से अखंड धूना जल रहा है।
 हरिद्वार का भूगोल ही उसका अध्यात्म है ।  01 सितंबर की यह प्रातःकालीन यात्रा दोपहर 12 बजे तक पूरी हुई। 6 घंटे में हमने 6 देवियों और देवताओं के दर्शन किए। नील और बिल्व पर्वत ने हमें हरिद्वार की मातृ संस्कृति का असली अर्थ समझाया - दक्षिण में बिल्व पर्वत (585 मीटर) पर मनसा - जो मन की इच्छा पूरी करती है। पूर्व में नील पर्वत (884 मीटर) पर चंडी - जो आत्मा को शक्ति और ऊर्जा देती है। उसी नील पर्वत की दूसरी चोटी (800-900 मीटर) पर अंजनी - जो संतान और संस्कार देती है।
  माया देवी - जो इन तीनों शिखरों को जन्म देती है।और सप्त सरोवर में भारत माता - जो इन सबको जोड़कर राष्ट्र का बोध कराती हैं। इसी को सनातन धर्म की मातृ संस्कृति कहते हैं। शिवालिक पर्वत केवल पत्थर नहीं, माँ की गोद है। और हरिद्वार वह स्थान है जहाँ पर्वत माँ बन जाता है और गंगा बेटी बनकर उसके चरणों में बहती है। आज लगा कि हमने केवल मंदिर नहीं, अपनी माँ के चार रूप देखे। सच ही तो है - मन की इच्छा, आत्मा की शक्ति, वंश का संस्कार और राष्ट्र का बोध - यही तो माँ 

 कनखल - भगवान  शिव की ससुराल में एक दिन 
31 अगस्त 2026 की सुबह, ब्रह्म मुहूर्त के बाद जब हरिद्वार अभी सोकर उठ ही रहा था, हमारी छोटी सी टीम कनखल की ओर चल पड़ी। नेतृत्व में मैं, सत्येंद्र कुमार पाठक, साथ में हरियाणा की माटी के सुगंधित कवि त्रिलोक चंद फतेहपुरी, स्वर्णिम कला केंद्र मुजफ्फरपुर की अध्यक्ष और शब्दों की साधिका डॉ. उषा किरण श्रीवास्तव, भारतीय जीवन बीमा मुजफ्फरपुर की सहायक महाप्रबंधक डॉ. संगीता सागर और हरियाणा से आई सरल हृदय संतोष देवी। यह कोई पर्यटन नहीं था, यह एक तीर्थयात्रा थी, एक इतिहास यात्रा थी, एक आत्मा की यात्रा थी।
कनखल को लोग हरिद्वार का उपनगर कहते हैं, पर सच तो यह है कि हरिद्वार कनखल के बाद बसा है। यह वह भूमि है जहाँ सृष्टि के पहले परिवार की कहानी लिखी गई। जहाँ पिता, पुत्री और दामाद के संबंधों ने सनातन धर्म को परिवार की परिभाषा सिखाई। इसलिए कनखल को शिव की ससुराल कहा जाता है।
सुबह 7 बजे हम कनखल घाट पहुँचे। अगर आपने हर की पौड़ी का शोर, भीड़, चीख-पुकार, लाउडस्पीकर पर गंगा आरती देखी है, तो कनखल घाट पर आकर आप चौंक जाएंगे। यहाँ गंगा एकदम शांत, नीली, गहरी और निर्मल बह रही थी। कोई धक्का-मुक्की नहीं, कोई चिल्लाहट नहीं। बस पानी की कल-कल और मंदिरों की घंटी।
पौराणिक मान्यता है कि जब माता सती ने दक्ष के यज्ञ कुंड में प्राण दिए, तो भगवान शिव तांडव करते हुए यहाँ आए और इस घाट पर बैठकर घंटों तक ध्यान किया। उनके आंसूओं से ही गंगा यहाँ शांत हो गई। इसलिए इस घाट को शिव-ध्यान घाट भी कहते हैं।
हमने बारी-बारी से गंगा में डुबकी लगाई। अगस्त के अंत में गंगा का जल हिमालय से सीधा आता है, इसलिए बर्फ जैसा ठंडा था। पानी में पैर डालते ही शरीर में सिहरन हुई, पर डुबकी लगाते ही मन हल्का हो गया। स्थानीय पंडित राधेश्याम जी ने बताया - "यहाँ स्नान करने से पितृ दोष, कालसर्प दोष और शनि की साढ़ेसाती शांत होती है। जो लोग हर की पौड़ी पर केवल स्नान करके चले जाते हैं, उनका तीर्थ आधा अधूरा रह जाता है। कनखल में स्नान किए बिना हरिद्वार की यात्रा पूरी नहीं होती।"
स्नान के बाद हम घाट की सीढ़ियों पर बैठ गए। आँखें बंद कर 10 मिनट ध्यान किया। आँखें बंद करते ही लगा जैसे गंगा की लहरों में ॐ की ध्वनि घुल रही है। त्रिलोक चंद जी ने धीरे से एक दोहा कहा "कनखल की गंगा शांत है, जैसे ससुराल में दामाद का मौन।"
घाट से उठते ही दो कदम पर सफेद संगमरमर का छोटा सा मंदिर है - गंगा मंदिर। यह मंदिर गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के संस्थापक स्वामी श्रद्धानंद जी और पंडित मदन मोहन मालवीय जी की प्रेरणा से 1920 में बनवाया गया था।
गर्भगृह बहुत छोटा है, केवल दो लोग अंदर जा सकते हैं। अंदर 4 फीट ऊँची माँ गंगा की मूर्ति है। माँ मगर पर बैठी हैं, एक हाथ में कलश, दूसरे हाथ में कमल। मूर्ति की आँखें ऐसी हैं जैसे अभी बोल पड़ेंगी। पुजारी जी ने हमें रोली, चावल और गंगा जल दिया और कहा - "यहाँ दर्शन करने से गंगा स्नान का फल दोगुना हो जाता है। क्योंकि यहाँ गंगा केवल नदी नहीं, देवी के रूप में विराजमान हैं।"
"यहाँ आकर जीवन का असली हिसाब समझ आया। बचत तो धन की होती है, पर पुण्य की बचत यहीं होती है।"
गंगा मंदिर से सटे हुए ही काले पत्थर से बना शनि मंदिर है। हरिद्वार में शनि के इतने मंदिर नहीं हैं, पर कनखल का यह शनि मंदिर बहुत प्राचीन माना जाता है। यहाँ शनि देव की 3 फीट ऊँची मूर्ति है, जो काले ग्रेनाइट से बनी है। विशेष बात यह है कि यहाँ शनि देव की आँखों पर पट्टी नहीं है, वे सीधे देखते हैं। मान्यता है कि जब राजा दक्ष ने यज्ञ किया तो नवग्रहों को भी बुलाया था। शनि देव भी आए और यहीं रुक गए। हमने यहाँ सरसों के तेल से अभिषेक किया। पंडित जी ने बताया कि शनिवार को यहाँ तेल चढ़ाने से साढ़ेसाती का प्रभाव कम होता है। हरियाणा से आई संतोष देवी ने यहाँ अपने परिवार के लिए शनि शांति की प्रार्थना की। यह मंदिर बताता है कि गंगा की गोद में न्याय भी है।  दक्ष प्रजापति का यज्ञ स्थल और सती कुंड - जहाँ आज भी नारी के सम्मान की कहानी गूंजती है*
यह हमारी यात्रा का सबसे भावुक और सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव था। शनि मंदिर से 100 मीटर चलने पर एक खुला मैदान आता है। मैदान के बीच में ईंटों से घिरा एक बड़ा हवन कुंड है। कुंड की दीवारें काली पड़ी हैं, जैसे हजारों साल से धुएं ने उन्हें काला कर दिया हो। यही है दक्ष प्रजापति का यज्ञ स्थल।
पुराणों के अनुसार  ब्रह्मा जी के मानस पुत्र दक्ष प्रजापति की राजधानी कनखल में थी। उन्होंने एक बार बहुत बड़ा यज्ञ किया। उन्होंने जानबूझकर अपने दामाद भगवान शिव को नहीं बुलाया क्योंकि उन्हें शिव का वेश - भस्म रमाना, गले में सर्प, जटा-जूट पसंद नहीं था। उनकी पुत्री सती, जो शिव की पत्नी थीं, बिना बुलाए पिता के यज्ञ में आईं। यज्ञ मंडप में जब दक्ष ने शिव का अपमान किया, तो सती यह सहन नहीं कर पाईं। उन्होंने सबके सामने कहा - "जिस पिता ने मेरे पति का अपमान किया, उस पिता के दिए हुए शरीर को मैं नहीं रखूंगी" और उसी हवन कुंड में कूदकर सती हो गईं। कुंड के बगल में एक छोटा सा गहरा कुंड है - *सती कुंड*। यह 10 फीट गहरा है, सीढ़ियों से नीचे उतरना पड़ता है। कुंड का पानी हमेशा गर्म रहता है, कहते हैं यह सती के सती होने की अग्नि का ताप है। कुंड की दीवारों पर सिंदूर और राख लगी है। यहाँ महिलाएँ आज भी अपने सुहाग की रक्षा के लिए मौली बांधती हैं। यह दुनिया में नारी के आत्मसम्मान का पहला स्मारक है। सती ने बताया कि नारी केवल शरीर नहीं, सम्मान है। अगर सम्मान नहीं तो शरीर का त्याग बेहतर है।" उनकी आँखों में आंसू थे। यह स्थान हमें सिखाता है कि परिवार में दामाद का अपमान पूरे परिवार के विनाश का कारण बनता है। दक्षेश्वर महादेव मंदिर - जहाँ शिवलिंग पाताल की ओर देखता है । सती कुंड से 50 कदम की दूरी पर विशाल दक्षेश्वर महादेव मंदिर है। मुख्य द्वार 40 फीट ऊँचा है, जिस पर शिव बारात की मूर्तियाँ बनी हैं। यह मंदिर 1810 में सिल्हट की रानी धनकौर ने बनवाया था और 1962 में उद्योगपति राजा बिड़ला ने इसका जीर्णोद्धार करवाया। मंदिर के गर्भगृह में जाने के लिए 15 सीढ़ियाँ नीचे उतरना पड़ता है। गर्भगृह में अंधेरा है, केवल दीये जल रहे हैं। और बीच में है वह अद्भुत शिवलिंग जिसे देखने दुनिया आती है - पातालमुखी शिवलिंग। यह शिवलिंग जमीन से ऊपर की ओर नहीं, नीचे पाताल की ओर धँसा हुआ है। लगभग 1 फीट नीचे। भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में भी ऐसा शिवलिंग नहीं है। पंडित जी ने कथा सुनाई - जब सती के सती होने की खबर शिव को मिली, तो उन्होंने अपने जटा से वीरभद्र को प्रकट किया। वीरभद्र ने आकर दक्ष का सिर काट दिया और यज्ञ को नष्ट कर दिया। उस समय इस शिवलिंग पर इतना क्रोध आया कि यह पाताल में धँस गया। बाद में देवताओं की प्रार्थना पर शिव शांत हुए, पर शिवलिंग वैसे ही पातालमुखी रहा।
हमने अंजुली में कनखल घाट का गंगा जल लिया और गंगा नदी के तट पर  शिवलिंग  पर जलाभिषेक किया । पातालमुखी शिवलिंग पर  गंगाजल चढ़ाया। जल चढ़ाते ही गर्भगृह में ठंडक बढ़ गई। हमने वहाँ 10 मिनट तक मौन ध्यान किया। लगा जैसे शिव स्वयं साँस ले रहे हैं। - "यह शिवलिंग सिखाता है कि अपमान का घाव कितना गहरा होता है, वह पाताल तक जाता है।"
दक्ष मंदिर के बाहर निकलते ही परिसर में एक और छोटा शिवलिंग है - ब्रह्मेश्वर शिवलिंग। यह सफेद संगमरमर का है। कहते हैं दक्ष का सिर काटने के बाद जब शिव का क्रोध शांत नहीं हो रहा था, तो स्वयं ब्रह्मा जी, जो दक्ष के पिता थे, यहाँ आए और उन्होंने इस शिवलिंग की स्थापना कर शिव की आराधना की। तभी शिव ने दक्ष को बकरे का सिर लगाकर जीवित किया। इसलिए इसे क्षमा का शिवलिंग भी कहते हैं।
 एक ही परिसर में पूरा ब्रह्मांड - गीता से श्री यंत्र तक -  दक्ष मंदिर परिसर इतना बड़ा है कि इसमें एक दिन में सब देखना मुश्किल है। हमने जो मंदिर देखे, वे एक-एक कर अद्भुत थे - गीता मंदिर  एक छोटा सा मंदिर गर्भगृह मे माता  गीता की मूर्ति है। । यहाँ खड़े होकर पूरी गीता पढ़ी जा सकती है। नवग्रह मंदिर  एक ही छत के नीचे 9 ग्रहों की 9 मूर्तियाँ। सभी काले ग्रेनाइट की। बीच में सूर्य और चारों ओर बाकी ग्रह। कहा जाता है कि यहाँ 9 ग्रहों की परिक्रमा करने से ग्रह दोष दूर होता है।
*सिद्धेश्वर महादेव और महामृत्युंजय मंदिर - यहाँ महामृत्युंजय मंत्र का निरंतर जाप होता है। पुजारी ने बताया कि यहाँ 1 लाख महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से अकाल मृत्यु टलती है। कई कैंसर के मरीज यहाँ आकर जाप कराते हैं।
200 साल पुराना रुद्राक्ष वृक्ष -  मंदिर परिसर में एक विशाल रुद्राक्ष का पेड़ है। इसकी उम्र 200 साल से ज्यादा बताई जाती है। आश्चर्य की बात यह है कि इस पेड़ के नीचे एक भी रुद्राक्ष नहीं गिरता। पुजारी स्वयं पेड़ से तोड़कर प्रसाद में रुद्राक्ष देते हैं। हमने भी एक-एक रुद्राक्ष पते प्रसाद में लिया।
श्री रामेश्वर मंदिर - स्फटिक शिवलिंग -  यह हमारी यात्रा का सबसे चमत्कारी अनुभव था। एक छोटे से काँच के मंदिर में स्फटिक यानी क्रिस्टल का शिवलिंग है। यह लगभग 1.5 फीट ऊँचा है। दिन की रोशनी में यह सफेद दिखता है, पर जब पुजारी ने दीया जलाया तो यह नीला हो गया। कहते हैं इसे रामेश्वरम से लाया गया था और यह 500 साल पुराना है। स्फटिक शिवलिंग पर जल चढ़ाने से मन की सारी नकारात्मकता दूर होती है। डॉ. संगीता जी ने यहाँ देर तक ध्यान किया।
श्री यंत्र मंदिर यहाँ माँ लक्ष्मी के श्री यंत्र की पूजा होती है। गर्भगृह में 2 किलो सोने से बना श्री यंत्र है। यहाँ केवल श्री यंत्र के दर्शन से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है, ऐसी मान्यता है। जगद्गुरु आश्रम और हरि-हर मंदिर  अंत में हम जगद्गुरु आश्रम गए, जहाँ शंकराचार्य जी की गद्दी है। और उसके बगल में हरि-हर मंदिर। इस मंदिर में एक ही मूर्ति में आधा शरीर विष्णु का (पीले वस्त्र) और आधा शिव का (बाघम्बर) है। यह मंदिर संदेश देता है कि हरि और हर में कोई भेद नहीं। जो लोग शिव और विष्णु में लड़ते हैं, उन्हें यह मंदिर देखना चाहिए।
कनखल घाट से लेकर हरि-हर मंदिर तक की यह 3 घंटे की यात्रा थी, पर लगा जैसे मन्वंतर काल और 3000 साल का इतिहास देख लिया। कनखल केवल मंदिर नहीं, यह भारत के परिवार की कहानी है। जहाँ पिता दक्ष हैं, पुत्री सती हैं और दामाद शिव हैं। यह कहानी सिखाती है कि परिवार में अहंकार नहीं होना चाहिए, दामाद का अपमान नहीं होना चाहिए, और नारी के सम्मान से बड़ा कोई यज्ञ नहीं। यहाँ आकर समझ आया कि गंगा केवल जल नहीं, संस्कार है। कनखल घाट पर स्नान, दक्ष मंदिर में क्षमा और स्फटिक शिवलिंग में शांति - यही तो जीवन है।
मैं, सत्येंद्र कुमार पाठक, हरियाणा के त्रिलोक चंद जी, डॉ. उषा किरण जी, डॉ. संगीता सागर जी और संतोष देवी - हम पाँचों जब कनखल से वापस अवधूत आश्रम लौटे, तो हमारे झोले में प्रसाद के रुद्राक्ष थे, हाथ में गंगा जल था और मन में एक संकल्प था - "हर घर से एक पुस्तक, हर घाट से स्वच्छ गंगा।" कनखल ने हमें यही सिखाया - इतिहास किताबों में नहीं, पत्थरों और पानी में बहता है।

हरिद्वार में आत्मा को चेतना मिलती है 
हरिद्वार केवल एक शहर नहीं है। यह भारत की आत्मा का भूगोल है। 29 अगस्त 2026 को मैंने अपने साथियों -  जीविका भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रकाश बंधु, हरियाणा के कवि डॉ. त्रिलोक चंद सेन फतेहपुरी, संतोष देवी, भारतीय जीवन बीमा मुजफ्फरपुर की सहायक महाप्रबंधक डॉ. संगीता सागर, राजस्थान की ममता शर्मा, नोएडा के उमानाथ त्रिपाठी, वैशाली की डॉ. रेणु शर्मा, गोरखपुर की कमलेश मिश्रा के साथ हरिद्वार के तीन रूपों को देखा - *ऐतिहासिक हरिद्वार, पर्यावरणीय हरिद्वार और आध्यात्मिक हरिद्वार।* महाराजा अग्रसेन घाट, हंस घाट, हर की पौड़ी, कनखल और अवधूत आश्रम तक की यह यात्रा केवल परिभ्रमण नहीं, चेतना की यात्रा थी।
हरिद्वार का इतिहास, हरिद्वार जिले के 2360 वर्ग किमी के भूगोल से बहुत बड़ा है। यह मन्वंतर काल से शुरू होता है। जिसे आज हम हर की पौड़ी / हरि की पौड़ी कहते हैं, उसका पहला नाम ब्रह्मकुंड 
था। पुराणों के अनुसार राजा श्वेत ने यहाँ ब्रह्मा जी की तपस्या की थी। ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए और वरदान दिया कि यह स्थान हरि के नाम से जाना जाएगा। इसलिए एक ही स्थान के दो नाम हैं - हर की पौड़ी (शिव की) और हरि की पौड़ी (विष्णु की)।
ऐतिहासिक तथ्य यह है कि इसका निर्माण उज्जैन के सम्राट राजा विक्रमादित्य ने अपने भाई भर्तृहरि की याद में पहली शताब्दी ईसा पूर्व में करवाया था। यहाँ आज भी शिला पर भगवान विष्णु के चरण चिह्न अंकित हैं। समुद्र मंथन की कथा के अनुसार जब धन्वंतरि अमृत कलश लेकर जा रहे थे, तो अमृत की 4 बूंदें चार जगह गिरीं - हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक। इसलिए यहाँ कुंभ होता है। 29 अगस्त 2026 की संध्या को जब हम डॉ. संगीता सागर, ममता शर्मा और त्रिलोक चंद जी के साथ यहाँ स्नान कर रहे थे, तो लगा जैसे हम केवल 2026 में नहीं, बल्कि उस क्षण में भी हैं जब अमृत गिरा था।
अग्रसेन घाट और हंस घाट - सामाजिक और वैदिक इतिहास :*
29 अगस्त को हमने जो महाराजा अग्रसेन घाट देखा, वह आधुनिक भारत के सामाजिक इतिहास का प्रतीक है। महाराजा अग्रसेन ने 5000 साल पहले एक रुपया, एक ईंट का सिद्धांत दिया था। उसी सिद्धांत पर यह घाट बना है। यहाँ कोई पंडा नहीं, कोई शुल्क नहीं। यह सेवा का घाट है। यह बताता है कि दान से ही समाज बनता है।
हंस घाट, जिसे मालवीय घाट भी कहते हैं, वैदिक इतिहास का प्रतीक है। मान्यता है कि ब्रह्मा जी के वाहन हंस ने यहाँ तपस्या कर गंगा को प्रसन्न किया था, इसलिए इसका नाम हंस घाट पड़ा। महामना मदन मोहन मालवीय जी ने यहाँ गुरुकुल कांगड़ी के छात्रों के लिए स्नान की व्यवस्था बनवाई थी। बगल में 1936 में बना प्रसिद्ध बिरला टॉवर है। यह घाट हमें बताता है कि हरिद्वार केवल स्नान की नगरी नहीं, ज्ञान की नगरी भी है।
 पर्यावरणीय चेतना : जहाँ गंगा केवल नदी नहीं, जीवन है
हर की पौडी  संध्या आरती के समय जब हमने हजारों दीये, फूल, पॉलीथीन को गंगा में बहते देखा तो  "भक्ति तो है पर पर्यावरण के प्रति भक्ति नहीं।" हर की पौड़ी पर जल की धारा तेज है, इसलिए कचरा बह जाता है, पर वह कचरा आगे जाकर कहाँ जाता है? यही तो गंगा प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है। यहाँ हमने संकल्प लिया कि आरती में फूल तो चढ़ाएंगे पर पॉलीथीन नहीं।
अग्रसेन घाट और हंस घाट पर समाधान  इन दोनों घाटों पर हमने देखा कि कैसे सफाई रखी जा सकती है। अग्रसेन घाट पर कूड़ेदान लगे हैं, प्याऊ है, निःशुल्क चेंजिंग रूम है। हंस घाट पर गुरुकुल के ब्रह्मचारी प्रतिदिन घाट की सफाई करते हैं। यहाँ जल स्थिर और निर्मल है क्योंकि यहाँ भीड़ नहीं है। यह बताता है कि गंगा को साफ रखने के लिए भीड़ को नियंत्रित करना और घाटों को बाँटना जरूरी है। पर्यावरण की रक्षा ही गंगा की सच्ची आरती है।
इस पूरी यात्रा की सबसे गहरी अनुभूति आध्यात्मिक थी।
 29 अगस्त की सुबह अवधूत आश्रम में जब मैंने अपनी अंजुली में गंगा जल लेकर बाबा शिवलिंग पर जलाभिषेक किया, तो प्रकाश बंधु जी ने कहा था - "अंजुली का जल अहंकार को धो देता है।" सच है। जब हम लोटे से जल चढ़ाते हैं तो हम बड़े बन जाते हैं, पर जब अंजुली से जल चढ़ाते हैं तो हम छोटे, विनम्र बन जाते हैं। शिव को विनम्रता ही प्रिय है।
29 अगस्त की संध्या को हर की पौड़ी पर जब 50 पंडितों ने एक साथ आरती की, हजारों दीये गंगा में तैरे, तो जो अनुभूति हुई उसे शब्दों में नहीं लिखा जा सकता। डॉ. संगीता सागर, ममता शर्मा, त्रिलोक चंद जी, संतोष देवी - हम सबके हाथ में दीये थे। दीये की लौ में माँ गंगा का चेहरा दिख रहा था। उस क्षण लगा कि गंगा केवल जल नहीं, प्रकाश है। आरती लेने के बाद जो शांतिपूर्ण और आध्यात्मिक गहराई की अनुभूति हुई, वह जीवन भर की पूंजी बन गई।
यह यात्रा हमें तीन मंत्र देकर गई - ऐतिहासिक चेतना कहती है - अपने परिवार का सम्मान करो, जैसे शिव ने दक्ष को माफ किया।
पर्यावरणीय चेतना कहती है - गंगा को माँ समझो, नाली नहीं।
आध्यात्मिक चेतना कहती है -  अंजुली का जल ही आरती बन जाता है, अगर मन साफ हो।
29 अगस्त को अग्रसेन घाट ने सेवा सिखाई, हंस घाट ने ज्ञान, हर की पौड़ी ने मोक्ष। और अवधूत आश्रम ने सिखाया कि पुस्तकें भी गंगा हैं। इसलिए हरिद्वार की यात्रा पूरी नहीं होती, शुरू होती है। जो एक बार हरिद्वार के घाटों पर अंजुली में जल लेकर शिव को याद करता है, वह जीवन भर गंगा को अपने साथ ले जाता है।

रविवार, अगस्त 23, 2026

चंपारण। सत्याग्रह

चम्पारण सत्याग्रह : पंडित राजकुमार शुक्ल  और महात्मा गांधी के सत्याग्रह का संगम
सत्येन्द्र कुमार पाठक
किसान की पीड़ा से निकला वह आंदोलन, जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को दिया ‘सत्याग्रह’ का नया हथियार । स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वर्ष 1917 का चम्पारण सत्याग्रह केवल नील की खेती के खिलाफ किसानों के संघर्ष की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारतीय जनआंदोलनों के इतिहास में सत्य, अहिंसा और शांतिपूर्ण प्रतिरोध की एक ऐसी निर्णायक शुरुआत थी, जिसने आगे चलकर देश के स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा बदल दी। इस ऐतिहासिक आंदोलन के पीछे एक ओर हजारों किसानों की वर्षों पुरानी पीड़ा थी, तो दूसरी ओर एक साधारण किसान पंडित राजकुमार शुक्ल की अदम्य जिद, साहस और लोक आग्रह था। इसी आग्रह का संगम जब महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा के सिद्धांत से हुआ, तब चम्पारण की धरती पर इतिहास रचा गया। चम्पारण सत्याग्रह ने न केवल अंग्रेजी शासन और नीलहे बागान मालिकों की दमनकारी व्यवस्था को चुनौती दी, बल्कि इसने यह भी सिद्ध किया कि संगठित जनशक्ति, सत्य और अहिंसा के माध्यम से अन्यायपूर्ण शासन के विरुद्ध प्रभावी संघर्ष किया जा सकता है।
तिनकठिया प्रथा ने किसानों का जीवन किया था बेहाल.19वीं शताब्दी और 20वीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में बिहार का चम्पारण क्षेत्र नील की खेती के लिए प्रसिद्ध था। यहां अंग्रेज बागान मालिकों ने किसानों पर ‘तिनकठिया प्रथा’ जैसी दमनकारी व्यवस्था थोप रखी थी। इसके तहत किसानों को अपनी जमीन के एक निश्चित हिस्से पर नील की खेती करने के लिए मजबूर किया जाता था।.नील की खेती किसानों के लिए घाटे का सौदा थी। उन्हें उचित मूल्य नहीं मिलता था और खेती की शर्तें भी बागान मालिक तय करते थे। नील की खेती से जमीन की उर्वरता प्रभावित होती थी, जबकि किसान आर्थिक रूप से लगातार कमजोर होते जा रहे थे।
जो किसान इस व्यवस्था का विरोध करते, उन्हें लगान, जुर्माने, दबाव और अन्य प्रकार के उत्पीड़न का सामना करना पड़ता था। स्थानीय प्रशासन और न्याय व्यवस्था पर भी अंग्रेज बागान मालिकों के प्रभाव के कारण किसानों को न्याय मिलना कठिन था।.ऐसे वातावरण में चम्पारण के किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि उनकी पीड़ा को प्रभावी ढंग से देश के सामने कौन रखे।
राजकुमार शुक्ल ने उठाया किसानों की आवाज बनने का बीड़ा.चम्पारण के सतवरिया गांव के किसान पंडित राजकुमार शुक्ल स्वयं भी नील की खेती और बागान व्यवस्था की समस्याओं से परिचित थे। वे बहुत बड़े नेता नहीं थे, न उनके पास कोई राजनीतिक संगठन था और न ही कोई प्रभावशाली पद। लेकिन उनके भीतर किसानों की पीड़ा को लेकर असाधारण दृढ़ता थी। उन्होंने तय कर लिया कि चम्पारण की समस्या को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने के लिए किसी बड़े नेता को यहां लाना जरूरी है।.इसी संकल्प के साथ वे दिसंबर 1916 में लखनऊ में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में पहुंचे। वहां उन्होंने अनेक नेताओं से चम्पारण आने और किसानों की स्थिति देखने का आग्रह किया, लेकिन उनकी बात को अपेक्षित महत्व नहीं मिला। आखिरकार उनकी मुलाकात दक्षिण अफ्रीका से भारत लौट चुके मोहनदास करमचंद गांधी से हुई।
गांधी से मुलाकात और शुरू हुई ऐतिहासिक जिद.राजकुमार शुक्ल ने गांधी से आग्रह किया कि वे चम्पारण चलकर किसानों की वास्तविक स्थिति देखें। गांधी उस समय अनेक कार्यों में व्यस्त थे और उन्होंने तत्काल चम्पारण जाने का आश्वासन नहीं दिया। लेकिन शुक्ल पीछे हटने वाले नहीं थे।.गांधी जहां जाते, शुक्ल वहां पहुंच जाते। लखनऊ से कानपुर और फिर गांधी के साबरमती आश्रम पहुंचने तक उन्होंने अपना आग्रह नहीं छोड़ा। उनकी यह दृढ़ता धीरे-धीरे गांधी का ध्यान आकर्षित करने लगी।.राजकुमार शुक्ल की यही जिद अंततः सफल हुई और गांधी ने चम्पारण आने का निर्णय लिया।.यह घटना भारतीय इतिहास में इस बात का महत्वपूर्ण उदाहरण है कि कभी-कभी किसी आंदोलन की शुरुआत किसी बड़े राजनीतिक मंच से नहीं, बल्कि एक साधारण व्यक्ति के अटूट लोक आग्रह से होती है।
1917 में चम्पारण पहुंचे महात्मा गांधी.अप्रैल 1917 में गांधी बिहार पहुंचे। पटना में डॉ. राजेंद्र प्रसाद से संपर्क के बाद वे मुजफ्फरपुर गए, जहां आचार्य जे.बी. कृपलानी से भी उनका संपर्क हुआ। इसके बाद वे चम्पारण के मोतिहारी पहुंचे। गांधी के चम्पारण पहुंचने की खबर तेजी से किसानों के बीच फैल गई। किसानों को पहली बार ऐसा लगा कि उनकी पीड़ा सुनने के लिए देश का एक बड़ा नेता उनके बीच आया है।.अंग्रेज प्रशासन गांधी के आगमन से चिंतित हो उठा। मोतिहारी के प्रशासन ने उन्हें चम्पारण छोड़ने का आदेश दिया। गांधी ने इस आदेश का पालन करने से इनकार कर दिया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि किसानों की वास्तविक स्थिति जाने बिना वे चम्पारण नहीं छोड़ेंगे।
यही वह क्षण था, जब गांधी के सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा की विचारधारा का चम्पारण की धरती पर व्यावहारिक प्रयोग शुरू हुआ।.अदालत के बाहर उमड़ा किसानों का सैलाब गांधी को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया गया। लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई की खबर सुनकर बड़ी संख्या में किसान अदालत के बाहर जमा हो गए।.यह दृश्य अंग्रेज प्रशासन के लिए अप्रत्याशित था। हजारों किसानों की शांतिपूर्ण उपस्थिति ने यह संदेश दे दिया कि अब चम्पारण का किसान अकेला नहीं है।.गांधी ने किसानों से हिंसा न करने और अनुशासन बनाए रखने का आग्रह किया। अंततः प्रशासन को गांधी के खिलाफ कार्रवाई में पीछे हटना पड़ा और उन्हें किसानों की समस्याओं की जांच करने की अनुमति मिली।
यह घटना गांधी के नेतृत्व में भारत में सत्याग्रह की पहली बड़ी सफल प्रयोगशाला के रूप में देखी गई। भाषण नहीं, गांव-गांव जाकर सुनी किसानों की पीड़ा.चम्पारण में गांधी ने केवल बड़े-बड़े भाषण देने की रणनीति नहीं अपनाई। उन्होंने समस्या की जड़ तक पहुंचने का रास्ता चुना।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद, ब्रजकिशोर प्रसाद, अनुग्रह नारायण सिंह, जे.बी. कृपलानी सहित अनेक स्थानीय कार्यकर्ताओं और वकीलों के सहयोग से किसानों की शिकायतें दर्ज की जाने लगीं।गांधी और उनके सहयोगी गांव-गांव गए। किसानों से उनकी समस्याएं सुनी गईं और उनके बयान दर्ज किए गए। बड़ी संख्या में किसानों की गवाही ने नीलहे बागान मालिकों की मनमानी और किसानों पर पड़ रहे आर्थिक दबाव के प्रमाण सामने रखे। यह आंदोलन केवल भावनात्मक अपील नहीं रहा, बल्कि तथ्य, दस्तावेज और किसानों के प्रत्यक्ष बयानों पर आधारित एक संगठित जांच अभियान में बदल गया।
सरकार को बनानी पड़ी जांच समिति.गांधी के बढ़ते जनसमर्थन और किसानों की शिकायतों के प्रमाण सामने आने के बाद ब्रिटिश सरकार को मामले की जांच के लिए समिति गठित करनी पड़ी। गांधी को भी इस जांच समिति में शामिल किया गया।.समिति के सामने किसानों की समस्याएं और नील की खेती से संबंधित दमनकारी व्यवस्थाएं रखी गईं। जांच के बाद किसानों के हित में सुधार की प्रक्रिया शुरू हुई और अंततः तिनकठिया व्यवस्था को समाप्त करने की दिशा में निर्णायक कदम उठाया गया।चम्पारण के किसानों के लिए यह केवल आर्थिक राहत नहीं थी, बल्कि वर्षों से चले आ रहे भय और अन्याय के खिलाफ आत्मविश्वास की पहली बड़ी जीत थी।
चम्पारण ने गांधी को बनाया जननेता.चम्पारण सत्याग्रह का प्रभाव केवल चम्पारण तक सीमित नहीं रहा। इस आंदोलन ने गांधी की कार्यपद्धति को भारतीय परिस्थितियों में स्थापित किया।
सत्य, अहिंसा, जनसंपर्क, प्रत्यक्ष जांच और शांतिपूर्ण प्रतिरोध—इन सभी तत्वों ने आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की महत्वपूर्ण रणनीति का रूप लिया।.चम्पारण ने गांधी को यह विश्वास दिया कि भारत की वास्तविक शक्ति उसके गांवों और किसानों में निहित है। दूसरी ओर किसानों को भी यह भरोसा मिला कि संगठित होकर और अहिंसक तरीके से वे अन्याय का मुकाबला कर सकते हैं।
इतिहास के दो नायकों को साथ याद करना जरूरी.चम्पारण सत्याग्रह का इतिहास लिखते समय महात्मा गांधी का योगदान निर्विवाद रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। लेकिन इस आंदोलन की शुरुआत के पीछे पंडित राजकुमार शुक्ल की भूमिका को भी समान गंभीरता से याद किया जाना चाहिए।
यदि राजकुमार शुक्ल गांधी को चम्पारण आने के लिए लगातार प्रेरित नहीं करते, तो संभव है कि गांधी का चम्पारण आगमन उस समय न हुआ होता। दूसरी ओर गांधी के नेतृत्व, संगठन क्षमता और सत्याग्रह की शक्ति ने शुक्ल की स्थानीय पीड़ा को राष्ट्रीय मुद्दे में बदल दिया।
इस अर्थ में चम्पारण सत्याग्रह दो शक्तियों का संगम था—राजकुमार शुक्ल का लोक आग्रह और महात्मा गांधी का सत्याग्रह।.राजकुमार शुक्ल उस दीपक की तरह थे, जो चम्पारण के अंधेरे में किसानों की पीड़ा लेकर जल रहा था। गांधी उस प्रकाश की तरह आए, जिसने उस छोटे से दीपक को राष्ट्रीय आंदोलन की मशाल में बदल दिया।
आज भी प्रासंगिक है चम्पारण का संदेश
आज जब देश किसान, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और जनभागीदारी जैसे विषयों पर लगातार चर्चा कर रहा है, तब चम्पारण सत्याग्रह का संदेश पहले से भी अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है।
चम्पारण हमें सिखाता है कि लोकतंत्र में आम नागरिक की आवाज को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। एक साधारण किसान भी यदि अपने अधिकार और समाज के हित के लिए दृढ़ता से आवाज उठाता है, तो उसकी आवाज परिवर्तन की शुरुआत बन सकती है.. इतिहास केवल बड़े नेताओं और राजनीतिक संस्थाओं से नहीं बनता। इतिहास उन अनाम और सामान्य लोगों के संघर्ष से भी बनता है, जो अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस करते हैं।
इसलिए चम्पारण को याद करते समय महात्मा गांधी के साथ पंडित राजकुमार शुक्ल को भी नमन करना आवश्यक है। गांधी ने सत्याग्रह को दिशा दी, लेकिन शुक्ल के लोक आग्रह ने उस सत्याग्रह को चम्पारण की धरती तक पहुंचाया।चम्पारण की धरती से निकला यही संदेश आज भी भारत के लोकतांत्रिक जीवन के लिए प्रेरणा है—सत्य के साथ खड़ा व्यक्ति अकेला हो सकता है, लेकिन यदि उसका आग्रह जनहित में हो तो वह परिवर्तन की शुरुआत जरूर कर सकता है।

शुक्रवार, अगस्त 14, 2026

जहानाबाद की विरासत

जहानाबाद लोक सभा एवं उसके प्रमुख विधान सभा क्षेत्रों का  जन प्रतिनिधि
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
बिहार का जहानाबाद जिला ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। प्राचीन मगध साम्राज्य का केंद्रीय हिस्सा रहा यह क्षेत्र न केवल अपनी पौराणिक एवं ऐतिहासिक धरोहरों (जैसे बाणावर पहाड़ और मखदुमपुर के ऐतिहासिक टीले) के लिए जाना जाता है, बल्कि स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में भी इसकी एक विशिष्ट और प्रखर पहचान रही है।।वर्ष 1952 के प्रथम आम चुनाव से लेकर वर्तमान 2025-2026 के राजनीतिक परिदृश्य तक, जहानाबाद लोक सभा क्षेत्र और इसके अंतर्गत आने वाली प्रमुख विधान सभा सीटों—जहानाबाद, मखदुमपुर और घोसी—ने बिहार और देश की राजनीति को गहरा प्रभावित किया है। इस क्षेत्र से चुने गए जन प्रतिनिधियों (विधायकों और सांसदों) ने अपने-अपने कालखंडों में न केवल जन-आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व किया, बल्कि क्षेत्र के बुनियादी ढांचे, शिक्षा, कृषि, सामाजिक समरसता और विधायी विकास में ऐतिहासिक योगदान भी दिया।।1952 से 2025 तक जहानाबाद लोक सभा तथा जहानाबाद, मखदुमपुर एवं घोसी विधान सभा क्षेत्रों के प्रतिनिधियों की यात्रा है।
जहानाबाद लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र: - जहानाबाद लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र का गठन औपचारिक रूप से 1957 में हुआ (1952 के प्रथम आम चुनाव में यह क्षेत्र गया-पूर्व या गया-सह-शहाबाद का हिस्सा था)। इस संसदीय क्षेत्र ने भारतीय राजनीति के विभिन्न दौर देखे हैं—कांग्रेस का शुरुआती दौर, वामपंथी विचारधारा का चरम उत्कर्ष, समाजवादी आंदोलनों का प्रभाव और तत्पश्चात क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व।
संसदीय प्रतिनिधियों की सूची 1957–2025
चुनाव वर्ष निर्वाचित सांसद राजनीतिक दल
1957 सत्यभामा देवी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
1962 सत्यभामा देवी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
1967 चंद्रशेखर सिंह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI)
1971 चंद्रशेखर सिंह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI)
1977 हरि लाल प्रसाद सिन्हा जनता पार्टी
1980 महेन्द्र प्रसाद (किंग महेन्द्र) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (I)
1984 रामाश्रय प्रसाद सिंह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI)
1989 रामाश्रय प्रसाद सिंह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI)
1991 रामाश्रय प्रसाद सिंह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI)
1996 रामाश्रय प्रसाद सिंह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI)
1998 सुरेन्द्र प्रसाद यादव राष्ट्रीय जनता दल (RJD)
1999 अरुण कुमार जनता दल (यूनाइटेड)
2004 गणेश प्रसाद सिंह यादव राष्ट्रीय जनता दल (RJD)
2009 डॉ. जगदीश शर्मा जनता दल (यूनाइटेड)
2014 डॉ. अरुण कुमार राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (RLSP)
2019 चंदेश्वर प्रसाद चंद्रवंशी जनता दल (यूनाइटेड)
2024 सुरेन्द्र प्रसाद यादव राष्ट्रीय जनता दल (RJD)
सांसदों का ऐतिहासिक अवदान।- सत्यभामा देवी (1957–1967): स्वतंत्रता के बाद के शुरुआती दशक में जहानाबाद के संसदीय गठन के समय सत्यभामा देवी ने क्षेत्र की बुनियादी प्रशासनिक और सामाजिक नीव रखी। उन्होंने ग्रामीण शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और कृषि आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए केंद्र स्तर पर पैरवी की।।चंद्रशेखर सिंह एवं रामाश्रय प्रसाद सिंह (वामपंथी दौर): 1960 और 1980-90 के दशकों में जहानाबाद वामपंथी राजनीति का गढ़ बना। सीपीआई के रामाश्रय प्रसाद सिंह लगातार चार बार (1984 से 1996) सांसद चुने गए। इस दौर में सांसदों का मुख्य योगदान खेतिहर मजदूरों, किसानों के अधिकारों की रक्षा, भूमि सुधार के प्रश्नों को संसद में मजबूती से उठाना और शोषित वर्गों को राजनीतिक आवाज देना रहा।।महेन्द्र प्रसाद (किंग महेन्द्र) (1980): उद्योगपति और समाजसेवी के रूप में विख्यात महेन्द्र प्रसाद ने जहानाबाद के विकास के लिए संस्थागत और आर्थिक सोच को बढ़ावा दिया। डॉ. जगदीश शर्मा एवं डॉ. अरुण कुमार: 1990 के दशक के उत्तरार्ध और 2000 के दशक में इन नेताओं ने जहानाबाद में उच्च शिक्षा, रेल कनेक्टिविटी, सड़कों के संजाल (सड़क नेटवर्क) और स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। चंदेश्वर प्रसाद चंद्रवंशी एवं सुरेन्द्र प्रसाद यादव: हाल के वर्षों में सांसदों का अवदान मुख्य रूप से राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण, सोन और पुनपुन नदी घाटी से जुड़ी सिंचाई परियोजनाओं, बाढ़ और सुखाड़ प्रबंधन तथा जहानाबाद शहर के शहरी पुनरुद्धार पर केंद्रित रहा है।
 जहानाबाद विधान सभा सीट:।जहानाबाद विधान सभा क्षेत्र जिला मुख्यालय का केंद्र होने के कारण राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण रहा है।
विधायकों की सूची (1952–2025)
वर्ष निर्वाचित विधायक राजनीतिक दल
1952 शिवभजन सिंह सोशलिस्ट पार्टी
1967 महाबीर चौधरी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
1977 रामचन्द्र यादव जनता पार्टी
1980 तारा गुप्ता भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
1985 सैयद असगर हुसैन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
1990 हरी लाल यादव निर्दलीय
1995 मुद्रिका सिंह यादव जनता दल
2000 मुन्नी लाल यादव राष्ट्रीय जनता दल 
2005 (फरवरी/अक्टूबर) सच्चिदानंद यादव राष्ट्रीय जनता दल
2010 अभिराम शर्मा जनता दल (यूनाइटेड)
2015 मुद्रिका सिंह यादव राष्ट्रीय जनता दल
2018 (उपचुनाव) कुमार कृष्ण मोहन उर्फ सुदय यादव राष्ट्रीय जनता दल 
2020 कुमार कृष्ण मोहन उर्फ सुदय यादव राष्ट्रीय जनता दल 
2025 राहुल शर्मा राष्ट्रीय जनता दल 
प्रतिनिधियों का योगदान - प्रारंभिक एवं मध्य काल (1952–1980): शिवभजन सिंह और महाबीर चौधरी जैसे नेताओं ने जहानाबाद को अनुमंडल स्तर से जिला स्तर की बुनियादी आवश्यकताओं की ओर अग्रसर करने में प्रारंभिक भूमिका निभाई। उन्होंने स्थानीय विद्यालयों और स्वास्थ्य केंद्रों की स्थापना पर जोर दिया।।मुद्रिका सिंह यादव का अवदान: मुद्रिका सिंह यादव का जहानाबाद के विकास में विशेष योगदान माना जाता है। बिहार सरकार में मंत्री रहते हुए उन्होंने जहानाबाद को जिले का दर्जा मिलने के बाद प्रशासनिक भवनों का निर्माण, मॉडल अस्पतालों की स्थापना और ग्रामीण सड़कों का व्यापक निर्माण कराया।।अभिराम शर्मा एवं सुदय यादव: 2010 के बाद के दौर में जहानाबाद शहर का तेजी से शहरीकरण हुआ। बिजली आपूर्ति में ऐतिहासिक सुधार, जहानाबाद कोर्ट रेलवे स्टेशन व मुख्य स्टेशन का सुंदरीकरण, और विभिन्न उच्च शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना में इन प्रतिनिधियों की भूमिका रही।।राहुल शर्मा (2025): युवा नेतृत्व के रूप में राहुल शर्मा का ध्यान जहानाबाद के युवा रोजगार, तकनीकी शिक्षा और शहरी ड्रेनेज व इंफ्रास्ट्रक्चर के आधुनिकीकरण पर केंद्रित रहा है।
मखदुमपुर विधान सभा सीट: मखदुमपुर विधान सभा क्षेत्र जहानाबाद का एक ऐतिहासिक क्षेत्र है, जहाँ प्रसिद्ध बाणावर (बराबर) की गुफाएं स्थित हैं। यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित रही है और इसने राज्य स्तर के कई बड़े नेताओं को जन्म दिया है।
विधायकों की सूची (1952–2025)
वर्ष निर्वाचित विधायक राजनीतिक दल
1952 रामेश्वर यादव निर्दलीय
1957 मिथिलेश्वर प्रसाद सिंह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
1962 सुखदेव प्रसाद वर्मा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
1967 एल. राम संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी
1969 महाबीर चौधरी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
1972 राम स्वरूप राम भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
1977 राम जतन सिन्हा जनता पार्टी
1980 रामाश्रय प्रसाद सिंह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
1985 राम जतन सिन्हा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
1990 बागी कुमार वर्मा जनता दल
1995 बागी कुमार वर्मा जनता दल
2000 बागी कुमार वर्मा राष्ट्रीय जनता दल 
2005 (फरवरी) रामाश्रय प्रसाद सिंह लोक जनशक्ति पार्टी 
2005 (अक्टूबर) कृष्णनंदन प्रसाद वर्मा राष्ट्रीय जनता दल 
2010 जीतन राम मांझी जनता दल (यूनाइटेड)
2015 सूबेदार दास राष्ट्रीय जनता दल 
2020 सतीश कुमार राष्ट्रीय जनता दल 
2025 सूबेदार दास राष्ट्रीय जनता दल 
प्रतिनिधियों का योगदान - राम जतन सिन्हा एवं बागी कुमार वर्मा: इन नेताओं ने मखदुमपुर के ग्रामीण इलाकों में शिक्षा के प्रसार और नहर प्रणालियों के विस्तार के लिए कार्य किया। बागी कुमार वर्मा के कार्यकाल में जहानाबाद और मखदुमपुर के बीच सड़क संपर्क को सुदृढ़ किया गया।।जीतन राम मांझी (पूर्व मुख्यमंत्री, बिहार): 2010 में जीतन राम मांझी के प्रतिनिधित्व के दौरान मखदुमपुर को राज्य स्तर पर बड़ी पहचान मिली। उनके कार्यकाल में बाणावर पर्यटन क्षेत्र का विकास, मगध महाविधालय का सुदृढ़ीकरण, ग्रामीण पुलों का निर्माण और दलित व वंचित वर्गों के कल्याण के लिए अनेक योजनाएं शुरू की गईं।।कृष्णनंदन प्रसाद वर्मा एवं सूबेदार दास: इन जनप्रतिनिधियों ने क्षेत्र के अस्पतालों के उन्नयन, ग्रामीण पक्की सड़कों (प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना) तथा पेयजल सुविधाओं के विस्तार में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
 घोसी विधान सभा सीट: - घोसी विधान सभा क्षेत्र जहानाबाद जिले की राजनीति का एक अत्यंत चर्चित और प्रभावशाली क्षेत्र रहा है। घोसी की राजनीति में दिग्गज नेताओं की उपस्थिति रही है, जिन्होंने राज्य स्तर की राजनीति को भी दिशा दी।
विधायकों की सूची (1952–2025)
वर्ष निर्वाचित विधायक राजनीतिक दल
1952 रामचन्द्र यादव निर्दलीय
1957 रामाश्रय प्रसाद सिंह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 
1962 मिथिलेश्वर प्रसाद सिंह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
1967 रामाश्रय प्रसाद सिंह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 
1969 कौशलेन्द्र प्रसाद सिंह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
1972 रामाश्रय प्रसाद सिंह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 
1977 डॉ. जगदीश शर्मा जनता पार्टी
1980 डॉ. जगदीश शर्मा भारतीय जनता पार्टी 
1985 डॉ. जगदीश शर्मा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
1990 डॉ. जगदीश शर्मा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
1995 डॉ. जगदीश शर्मा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
2000 डॉ. जगदीश शर्मा निर्दलीय
2005 (फरवरी/अक्टूबर) डॉ. जगदीश शर्मा जनता दल (यूनाइटेड)
2009 (उपचुनाव) शांति शर्मा निर्दलीय
2010 राहुल शर्मा जनता दल (यूनाइटेड)
2015 कृष्णनंदन प्रसाद वर्मा जनता दल (यूनाइटेड)
2020 रामबली सिंह यादव भाकपा (माले) लिबरेशन
2025 ऋतुराज कुमार जनता दल (यूनाइटेड)
प्रतिनिधियों का योगदान - डॉ. जगदीश शर्मा का ऐतिहासिक कार्यकाल: घोसी विधान सभा का उल्लेख डॉ. जगदीश शर्मा के बिना अधूरा है। वे लगातार 1977 से 2005 तक इस सीट से विधायक रहे। उनके लगभग तीन दशकों के कार्यकाल में घोसी में अभूतपूर्व ढांचागत विकास हुआ। उन्होंने ब्लॉक मुख्यालयों के निर्माण, डिग्री कॉलेजों की स्थापना, कावर और फल्गु नदी से जुड़ी स्थानीय सिंचाई परियोजनाओं और क्षेत्र के प्रत्येक गांव को पक्की सड़क से जोड़ने में ऐतिहासिक योगदान दिया।।राहुल शर्मा एवं कृष्णनंदन प्रसाद वर्मा: 2010 के बाद, राहुल शर्मा और कृष्णनंदन प्रसाद वर्मा (जिन्होंने बिहार के शिक्षा मंत्री के रूप में भी सेवा दी) ने घोसी में उच्च शिक्षा के स्तर को सुधारने, नए उच्च विद्यालयों की स्वीकृति देने और तकनीकी प्रशिक्षण संस्थानों (ITI व पॉलिटेक्निक) के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।।रामबली सिंह यादव एवं ऋतुराज कुमार (2020–2025): हालिया दौर में घोसी के प्रतिनिधियों का ध्यान कृषि संकट, बटाईदार किसानों के अधिकार, बाढ़ व सुखाड़ से निपटने की स्थायी व्यवस्था और पारदर्शी स्थानीय प्रशासन पर केंद्रित रहा है।।1952 से लेकर 2025 तक के 70 से अधिक वर्षों के लोकतांत्रिक सफर में जहानाबाद लोक सभा और इसके अंतर्गत आने वाले जहानाबाद, मखदुमपुर और घोसी विधान सभा क्षेत्रों के जन प्रतिनिधियों ने क्षेत्र के सर्वांगीण विकास में अपनी-अपनी भूमिकाएं निभाई हैं। 1950 और 60 के दशक में जहाँ कांग्रेस का मुख्य प्रभाव था, वहीं 1970 से 1990 के दशक तक वामपंथी और सामाजिक न्याय आंदोलनों ने आम जनता और शोषित वर्गों को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाया।। 1990 के बाद से जन प्रतिनिधियों का अवदान केवल सामाजिक आंदोलनों तक सीमित न रहकर बिजली, सड़क, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे बुनियादी ढांचों के निर्माण की ओर स्थानांतरित हुआ।। इस क्षेत्र के विधायकों और सांसदों (जैसे डॉ. जगदीश शर्मा, जीतन राम मांझी, रामाश्रय प्रसाद सिंह, मुद्रिका सिंह यादव और कृष्णनंदन प्रसाद वर्मा) ने बिहार सरकार और भारत सरकार के मंत्रालयों में रहकर जहानाबाद की समस्याओं को राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर मजबूती से उठाया।।जहानाबाद संसदीय क्षेत्र और इसके विधायकों व सांसदों का अवदान केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने मगध क्षेत्र के इस ऐतिहासिक भू-भाग को आधुनिकता, शिक्षा और सामाजिक विकास की ओर ले जाने का निरंतर प्रयास किया है।

मंगलवार, अगस्त 11, 2026

आत्म ज्योतिर्लिंग देवघर और संथाल

बाबा आत्मलिंगम ज्योतिर्लिंग रावणेश्वर ज्योतिर्लिंग देवघर  , झारखंड 
वासुकीनाथ , जरमुंडी , दुमका , झारखंड 
सावन माह  और आत्मलिंगम वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग 
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
भारत की सनातन परंपरा मात्र पूजा-पद्धति की एक व्यवस्था नहीं, अपितु मन्वंतर काल से अक्षुण्ण प्रवाहित होती आ रही दार्शनिक, ऐतिहासिक एवं सामाजिक चेतना की अविरल धारा है। इस संस्कृति के केंद्र में भगवान शिव का तत्त्व स्थापित है, जिन्हें 'काल के भी काल' महाकाल और 'कल्याणकारी' माना गया है।
आषाढ़ के अंत के साथ ही जब श्रावण (सावन) मास का आगमन होता है, तो संपूर्ण आर्यावर्त शिवमय हो उठता है। सावन मास का प्रत्येक दिन, विशेषकर इसके सोमवार, प्रकृति और पुरुष के एकात्म भाव, तप, त्याग और लोक-कल्याण के उत्सव के रूप में मनाए जाते हैं। सावन का दूसरा सोमवार इस शृंखला में अत्यंत विशेष माना गया है, क्योंकि यह साधना की पराकाष्ठा, जल-अर्पण की परंपरा और समुद्र मंथन की लोक-कल्याणकारी कथा से सीधा संबंध रखता है।। सावन माह के दूसरे सोमवार की पौराणिक व ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, शैव-शाक्त व नाग संस्कृति के अंतरसंबंध, 12 ज्योतिर्लिंगों एवं उप-ज्योतिर्लिंगों के साम्राज्यिक , नाथ संप्रदाय के योगदान तथा बिहार-झारखंड के प्रमुख शैव तीर्थों (बैद्यनाथ, बासुकीनाथ, और अजगैबीनाथ है।
पौराणिक कालक्रम के अनुसार, सावन माह का सीधा संबंध मन्वंतर कालीन समुद्र मंथन से है। श्रीमद्भागवत पुराण एवं शिव पुराण के अनुसार, जब देवों और असुरों द्वारा क्षीरसागर का मंथन किया जा रहा था, तब चौदह रत्नों से पूर्व अत्यंत दाहक 'हलाहल' नामक विष निकला। इस विष की ज्वाला से तीनों लोक जलने लगे। सृष्टि की रक्षा हेतु भगवान शिव ने बिना किसी संकोच के उस विष का पान कर लिया और उसे अपने कंठ में रोक लिया, जिससे वे 'नीलकंठ' कहलाए। विष के तीव्र ताप से शिवजी के शरीर में उत्पन्न जलन को शांत करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने उत्तरवाहिनी नदियों और पवित्र जलाशयों से लाकर उन पर जल अर्पित किया। यह घटना सावन मास में घटी थी। तभी से सावन के प्रत्येक सोमवार, विशेष रूप से द्वितीय सोमवार को, भगवान शिव पर जलाभिषेक और दुग्धाभिषेक करने की सनातन परंपरा का प्रादुर्भाव हुआ।
वैदिक एवं पौराणिक काल से निकलकर जब शिव-उपासना ऐतिहासिक कालखंडों में पहुँची, तो भारत के विभिन्न राजवंशों ने शैव स्थलों को स्थापत्य और संस्कृति के केंद्र के रूप में स्थापित किया।।गुप्त साम्राज्य (4वीं-6ठी शताब्दी ई.): गुप्त काल को हिंदू धर्म के पुनर्जागरण का युग माना जाता है। इस काल में त्रिपुरी, भूमरा, और नचना कुठार में प्रथम बार पत्थर के सुव्यवस्थित शिव मंदिरों का निर्माण हुआ। चोल एवं पल्लव राजवंश: दक्षिण भारत में चोल शासक राजा राज चोल प्रथम ने तंजौर में 'बृहदेश्वर मंदिर' का निर्माण कराकर शैव स्थापत्य को वैश्विक पहचान दी। राष्ट्रकूट साम्राज्य: राजा कृष्ण प्रथम ने एलोरा में एक ही चट्टान को ऊपर से नीचे काटकर विश्व प्रसिद्ध 'कैलाश मंदिर' का निर्माण कराया, जो स्थापत्य कला का अद्भुत चमत्कार है। परमार एवं चंदेल वंश: मालवा के राजा भोज ने धार और भोजपुर में भव्य शिव मंदिरों की नींव रखी, जबकि चंदेल शासकों ने खजुराहो में कंदरिया महादेव का निर्माण कराया। मराठा साम्राज्य एवं अहिल्याबाई होल्कर: 18वीं शताब्दी में जब मध्यकालीन आक्रमणों के कारण भारत के अधिकांश ज्योतिर्लिंग और शिव धाम क्षतिग्रस्त हो चुके थे, तब मालवा की महारानी पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर ने सोमनाथ, काशी विश्वनाथ, ओंकारेश्वर, घृष्णेश्वर और त्र्यंबकेश्वर का पुनरुद्धार करवाकर सनातन संस्कृति को नया जीवन दिया।
. शैव, शाक्त एवं नाग संस्कृति - भारतीय धर्मदर्शन में शैव (शिव के उपासक), शाक्त (शक्ति/देवी की उपासक) और नाग संस्कृति कोई पृथक धाराएं नहीं हैं, बल्कि ये एक ही वैदिक सत्य के विभिन्न आयाम है।  शिव 'चेतना' (पुरुष) हैं और शक्ति 'ऊर्जा' (प्रकृति)। बिना शक्ति के शिव 'शव' समान हैं और बिना शिव के शक्ति अनियंत्रित ऊर्जा है। सावन मास में जहाँ सोमवार को भगवान शिव की पूजा होती है, वहीं मंगलवार को देवी पार्वती के निमित्त 'मंगला गौरी व्रत' रखा जाता है। यह परंपरा शैव और शाक्त धारा के अटूट संबंध का प्रत्यक्ष प्रमाण है। 'अर्धनारीश्वर' रूप इसी दार्शनिक सत्य को अभिव्यक्त करता है।
नाग संस्कृति - नाग संस्कृति भारत की प्राचीनतम मूलनिवासी और लोक-संस्कृतियों में से एक रही है। भगवान शिव ने विषधर नागों को अपने गले का हार बनाकर यह संदेश दिया कि जो समाज में उपेक्षित, त्याज्य या विषैले माने जाते हैं, शिव उन्हें भी अपने हृदय से लगाते हैं। सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को 'नागपंचमी' के रूप में मनाना शैव और नाग संस्कृति के ऐतिहासिक समन्वय को दर्शाता है।
भारत की भौगोलिक एवं सांस्कृतिक एकता को एक सूत्र में पिरोने का कार्य 12 ज्योतिर्लिंगों ने किया है। ये ज्योतिर्लिंग केवल धार्मिक केंद्र नहीं हैं, बल्कि विभिन्न ऐतिहासिक साम्राज्यों के राजकीय संरक्षण के गवाह भी रहे हैं।.ज्योतिर्लिंग - सोमनाथगिर सोमनाथ, गुजरातचालुक्य (सोलंकी) राजवंश, अहिल्याबाई होल्कर एवं स्वतंत्र भारत में सरदार पटेल द्वारा पुनरुद्धार। मल्लिकार्जुनश्रीशैलम, आंध्र प्रदेशकाकतीय राजवंश, विजयनगर साम्राज्य (राजा हरिहर एवं बुक्का)।।महाकालेश्वरउज्जैन, मध्य प्रदेशअवंती साम्राज्य, परमार वंश, एवं सिंधिया राजवंश।
ओंकारेश्वर खंडवा, मध्य प्रदेशपरमार राजवंश तथा होल्कर साम्राज्य। केदारनाथरुद्रप्रयाग, उत्तराखंडआदि शंकराचार्य द्वारा पुनरुद्धार, कत्यूरी एवं गढ़वाल राजवंश। भीमाशंकर पुणे, महाराष्ट्र मराठा साम्राज्य (छत्रपति शिवाजी महाराज के पिता शाहजी भोसले व पेशवा काल)। काशी विश्वनाथ वाराणसी, उत्तर प्रदेशगुप्त काल, कल्याणी के चालुक्य, और अहिल्याबाई होल्कर (1777 ई.)। त्र्यंबकेश्वर नासिक, महाराष्ट्रपेशवा बालाजी बाजीराव (नानासाहेब पेशवा) द्वारा निर्मित। वैद्यनाथ देवघर, झारखंडगुप्त काल, गिद्धौर राजवंश (राजा पूरन मल)। नागेश्वर द्वारका, गुजरातस्थानीय सेतबंध राजवंश व गुप्तकालीन प्रभाव। रामेश्वरम रामनाथपुरम, तमिलनाडुचोल, पांड्य साम्राज्य एवं सेटुपति (रामनाड) राजा। घृष्णेश्वर औरंगाबाद (छत्रपति संभाजीनगर), महाराष्ट्रमालोजी राजे भोसले (शिवाजी महाराज के दादा) व अहिल्याबाई होल्कर है। 
12 उप-ज्योतिर्लिंग - शिव पुराण (कोटिरुद्र संहिता) के अनुसार, मुख्य ज्योतिर्लिंगों के आभामंडल के अंतर्गत 12 उप-ज्योतिर्लिंगों की भी मान्यता है: अंतकेश (सोमनाथ का उप-ज्योतिर्लिंग) , रुद्रेश्वर (मल्लिकार्जुन का उप-ज्योतिर्लिंग) , दुग्धेश्वर (महाकालेश्वर का उप-ज्योतिर्लिंग) , कर्दमेश्वर (ओंकारेश्वर का उप-ज्योतिर्लिंग) , भूतेश्वर (केदारनाथ का उप-ज्योतिर्लिंग) , भीमेश्वर (भीमाशंकर का उप-ज्योतिर्लिंग) , त्रिलोचन (काशी विश्वनाथ का उप-ज्योतिर्लिंग) , बाणेश्वर (त्र्यंबकेश्वर का उप-ज्योतिर्लिंग) , वक्रेश्वर (वैद्यनाथ का उप-ज्योतिर्लिंग) , भुजंगेश्वर (नागेश्वर का उप-ज्योतिर्लिंग) , गुहेश्वर (रामेश्वरम का उप-ज्योतिर्लिंग) , व्याघ्रेश्वर (घृष्णेश्वर का उप-ज्योतिर्लिंग) है । 
नवनाथ (9 नाथ) एवं नाथ संप्रदाय - हठयोग, तंत्र और शिव-साधना को जन-जन तक पहुँचाने में नाथ संप्रदाय का योगदान ऐतिहासिक रहा है। नाथ परंपरा के आदिगुरु स्वयं भगवान शिव (आदिनाथ) माने जाते हैं।
मत्स्येंद्रनाथ (मछंदरनाथ): नाथ परंपरा के प्रथम मानुषी गुरु। इनका प्रभाव क्षेत्र नेपाल, असम (कामरूप) और दक्षिण भारत रहा। गोरखनाथ (गोरक्षनाथ): संप्रदाय के मुख्य संगठक। इनका केंद्र गोरखपुर (उत्तर प्रदेश), पंजाब, गढ़वाल और नेपाल रहा। गहनीनाथ (गाहणीनाथ): महाराष्ट्र के आलंदी और त्र्यंबकेश्वर क्षेत्र में हठयोग का प्रसार किया। (ये संत ज्ञानेश्वर के दादागुरु थे)। जालंधरनाथ: पंजाब (जालंधर शहर इन्हीं के नाम पर है) एवं हिमाचल प्रदेश। काणिफनाथ: बंगाल, ओडिशा और महाराष्ट्र के सीमावर्ती क्षेत्र। भर्तरीनाथ (राजा भर्तृहरि): उज्जैन (मध्य प्रदेश) एवं अलवर (राजस्थान)। रेवणनाथ: कर्नाटक और दक्षिण महाराष्ट्र क्षेत्र। नागनाथ: महाराष्ट्र (नागनाथ औंढा और मराठवाड़ा क्षेत्र)। चरपटीनाथ: हिमाचल प्रदेश (चंबा) और नेपाल का पर्वतीय क्षेत्रहै ।
नेपाल के मल्ल राजवंश, मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश, मारवाड़ के राठौड़ राजवंश (राजा मानसिंह के समय) और गढ़वाल के शाह शासकों ने नाथ सिद्धों को राजकीय संरक्षण प्रदान किया और अनेक नाथ मठों की स्थापना की।
झारखंड के सिद्ध पीठ: देवघर (बैद्यनाथ) एवं बासुकीनाथ - पूर्वी भारत में संताल परगना का क्षेत्र शैव साधना का सबसे बड़ा केंद्र है। यहाँ बैद्यनाथ धाम और बासुकीनाथ धाम की जोड़ी अद्वितीय है। झारखंड राज्य का देवघर जिला मुख्यालय देवघर में  वैद्यनाथ मंदिर के गर्भगृह में रावणेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थापित है । इन्हें बाबाधाम , बैजनाथ , बैजूनाथ , बोल बम कहा गया है । बिहार राज्य  का भागलपुर जिले के जहांगरा व सुल्तानगंज स्थित उत्तरवाहिनी गंगा में शैव संस्कृति उपासक अजगैबीनाथ नाथ को साक्षी मानकर उत्तरवाहिनी गंगा में स्नान ध्यान एवं जलभर कर सावन कांवर यात्रा 105 किमी  पैदल चल कर डाक बंब एवं सामान्य बंब के रूप में झारखंड राज्य का देवघर जिले के  बाबा बैद्यनाथ  का जलाभिषेक  करते है । वैद्यनाथ धाम के बाबा वैद्यनाथ  के जलाभिषेक करने के बाद  श्रद्धालुओं द्वारा विभिन्न वाहनों के माध्यम से 45 किमी की यात्रा करने के बाद दुमका जिले का का जरमुंडी स्थित बाबा बासुकीनाथ पर उपासक  जलाभिषेक कर अपनी मनोकामना पूर्ति करते हैं। 
त्रेतायुग व रामायण काल में लंकापति रावण ने कैलाश पर कठोर तपस्या कर भगवान शिव से 'आत्मलिंग' प्राप्त किया। शिवजी ने शर्त रखी कि रास्ते में यदि इसे पृथ्वी पर रखा, तो यह वहीं स्थापित हो जाएगा। देवघर के समीप रावण को विष्णु जी की माया से तीव्र लघुशंका हुई। उसने लिंग 'बैजू' नामक ग्वाले (भगवान विष्णु/वरुण देव के अंश) को थमा दिया। भार अधिक होने पर ग्वाले ने लिंग भूमि पर रख दिया। रावण के अनेक प्रयासों के बाद भी लिंग उखड़ नहीं सका। 'वैद्यनाथ' नामकरण: रावण द्वारा काटे गए अपने दस सिरों का उपचार भगवान शिव ने एक वैद्य की भाँति किया, इसलिए यह 'वैद्यनाथ' कहलाए। स्थानीय संथाल परंपरा में 'बैजू ग्वाला' की भक्ति के कारण इन्हें 'बाबा बैजनाथ' भी कहा जाता है। ऐतिहासिक मंदिर निर्माण (1596 ई.): ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, वर्तमान मुख्य मंदिर के भव्य शिखर और प्रांगण का निर्माण गिद्धौर राजवंश के 5वें राजा राजा पूरन मल  द्वारा 1596 ई. में कराया गया था। मंदिर के शीर्ष पर स्थित त्रिपुंड और पंचशूल इसी काल की स्थापत्य कला के प्रतीक हैं।
बाबा बासुकीनाथ धाम जरमुंडी, दुमका जिला, झारखंड (देवघर से लगभग 42 किमी) पर स्थित है ।पौराणिक पृष्ठभूमि: मान्यता है कि समुद्र मंथन में रस्सी बने नागराज वासुकी ने मंथन के पश्चात अपने शरीर के दाह और कष्ट को शांत करने के लिए यहाँ भगवान शिव की आराधना की थी। लोककथा के अनुसार, 'बासु' नाम के एक स्थानीय निर्धन चरवाहे को कंद-मूल खोदते समय एक शिला से रक्त बहता दिखा। उसने उसकी पूजा की, जिससे उस स्थान का नाम 'बासुकीनाथ' पड़ा।।मंदिर की वर्तमान संरचना का निर्माण 16वीं से 18वीं शताब्दी के मध्य स्थानीय जमींदारों एवं मराठा काल के दौरान हुआ।।'दीवानी' और 'फौजदारी' दरबार का सिद्धांत: देवघर (बैद्यनाथ): इसे शिव की 'दीवानी अदालत' माना जाता है, जहाँ भक्त अपनी मनोकामनाओं की अर्जी दाखिल करते हैं। बासुकीनाथ: इसे शिव की 'फौजदारी अदालत' कहा जाता है, जहाँ त्वरित सुनवाई और न्याय की मान्यता है। कांवड़ यात्रा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती जब तक भक्त बैद्यनाथ के बाद बासुकीनाथ में जल अर्पित न कर दें।
अजगैबीनाथ धाम (सुलतानगंज) -  सावन मास में विश्व की सबसे लंबी पैदल धार्मिक यात्रा (105 किमी) सुलतानगंज से प्रारंभ होती है, जहाँ उत्तरवाहिनी गंगा से जल उठाकर कांवड़िया देवघर की ओर प्रस्थान करते हैं। अजगैबीनाथ मंदिर: स्थापना व निर्माण  सुलतानगंज, भागलपुर जिला, बिहार (गंगा नदी के मध्य स्थित प्राकृतिक ग्रेनाइट चट्टान पर)। है। पौराणिक उत्पत्ति: भगवान शिव के 'अजगव' नामक धनुष के नाम पर इस स्थान का नाम 'अजगैबीनाथ' पड़ा। यह महर्षि जाह्नु (Jahnu) की तपोभूमि थी। जब भगीरथ के पीछे आ रही गंगा का वेग महर्षि के आश्रम को बहाने लगा, तो मुनि ने संपूर्ण गंगा का आचमन कर लिया। बाद में भगीरथ की प्रार्थना पर महर्षि ने अपनी जांघ काटकर गंगा को मुक्त किया, जिससे गंगा 'जाह्नवी' कहलाईं। यहाँ गंगा का उत्तर दिशा की ओर मुड़ना (उत्तरवाहिनी) इसे अत्यंत पवित्र बनाता है। 
पाल काल (8वीं-12वीं शताब्दी): मंदिर का प्राथमिक ऐतिहासिक ढांचा और चट्टानों पर उकेरी गई मूर्तियाँ पाल राजवंश के समय की हैं। चट्टानों पर गुप्तकालीन शैली की नक्काशी भी दिखाई देती है।
आधुनिक पुनरुद्धार (1885 ई.): वर्तमान मंदिर के मुख्य ढांचे का जीर्णोद्धार 1885 ई. में रानी कलावती और बनैली/गिद्धौर रियासत के सहयोग से कराया गया था। प्राचीन नाम ('जहांगीरा'): सुलतानगंज का प्राचीन पौराणिक और ऐतिहासिक नाम 'जहांगीरा' था। यह शब्द वास्तव में संस्कृत के 'जह्नु-गिरि' (महर्षि जाह्नु का पर्वत) या 'जह्नु-गृह' का अपभ्रंश रूप है। : वैदिक काल में यह महर्षि जाह्नु के आश्रम के रूप में बसा जिसे जहांगरा , जाह्नू नगर कहा गया है । महाभारत काल में यह अंगराज कर्ण के अंग प्रदेश का भाग थ।
('सुलतानगंज'): मुस्लिम सल्तनत काल एवं मुगल काल (16वीं-17वीं सदी) के दौरान व्यापारिक और प्रशासनिक गतिविधियों के कारण 'जहांगीरा' के समीप के बाजारी क्षेत्र का नाम बदलकर 'सुलतानगंज' (सुलतान का बाजार) कर दिया गया, जो कालान्तर में संपूर्ण नगर का नाम बन गया।
सावन माह का दूसरा सोमवार केवल एक व्रत या पूजा का दिन नहीं है, बल्कि यह मन्वंतर काल से चली आ रही भारतीय चेतना, प्रकृति संरक्षण और समाज के अंतिम व्यक्ति तक को शिव-तत्त्व से जोड़ने का प्रतीक है। प्राचीन भारत के राजवंशों (गुप्त, चोल, राष्ट्रकूट, परमार, मराठा) ने मंदिर स्थापत्य के माध्यम से जिस सांस्कृतिक ताने-बाने को बुना था, वह आज भी सुलतानगंज से देवघर और बासुकीनाथ तक की कांवड़ यात्रा में जीवंत दिखाई देता है।।शैव, शाक्त, नाग और नाथ परंपराओं का यह संगम भारत की 'अनेकमेव अद्वैत' (विभिन्नता में एकता) की दार्शनिक भावना को सिद्ध करता है।
. संदर्भ -  व्यास, वेद. शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता एवं कोटिरुद्र संहिता). गीता प्रेस, गोरखपुर. श्रीमद्भागवत महापुराण (अष्टम स्कंध - समुद्र मंथन प्रसंग). गीता प्रेस, गोरखपुर., पी. सी. रॉय. चौधरी  (1965). बिहार जिला गजेटियर: संताल परगना. बिहार सरकार, पटना., डॉ. राजबलि पांडेय . (2018). भारतीय हिंदू संस्कृति और इतिहास. मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली., उपिंदर. सिंह  (2008). ए हिस्ट्री ऑफ एंशिएंट एंड अर्ली मेडिवल इंडिया: फ्रॉम द स्टोन एज टू द 12 थ सेंचुरी. पीयर्सन एजुकेशन. , आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी . नाथ संप्रदाय. राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली., झारखंड पर्यटन एवं सांस्कृतिक विकास बोर्ड. देवघर एवं बासुकीनाथ धाम का ऐतिहासिक व पुरातात्विक सर्वेक्षण दस्तावेज.

 जनजातीय संस्कृति का कालजयी संगम
भारतीय उपमहाद्वीप का पूर्वी अंचल, विशेष रूप से वर्तमान झारखंड राज्य का संथाल परगना प्रमंडल, अनादिकाल से ही अध्यात्म, प्रकृति और संस्कृति का एक अनूठा संगम स्थल रहा है। लगभग 14,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक विशाल भू-भाग में विस्तृत यह क्षेत्र केवल एक प्रशासनिक या भौगोलिक इकाई मात्र नहीं है, बल्कि यह सनातन पौराणिक आख्यानों, उत्तर-गुप्तकालीन शिलालेखों, मध्यकालीन जन-आंदोलनों और भारत की प्राचीनतम जनजातीय सभ्यताओं में से एक—संथाल समाज—की जीवन-दृष्टि का जीवंत दस्तावेज है।
उत्तर में पवित्र गंगा नदी के मैदानी इलाकों से लेकर दक्षिण और पूर्व में छोटानागपुर के वनाच्छादित पठारों तक विस्तृत यह क्षेत्र विविध आध्यात्मिक धाराओं—शैव, शाक्त, वैष्णव, सौर, बौद्ध (वज्रयान), और सरना (प्रकृति पूजा)—का महासंगम स्थल रहा है। इस क्षेत्र का हृदयस्थल है 'देवघर', जिसका शाब्दिक अर्थ ही "देवताओं का घर" (देव + घर) है। देवघर केवल तीर्थयात्रियों का गंतव्य नहीं है, बल्कि यह भारत की प्राचीन सभ्यता, वैदिक परंपरा और जनजातीय स्वशासन व्यवस्था के अंतर्संबंधों को प्रदर्शित करने वाला एक अद्भुत ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक मंच है।
देवघर और संथाल परगना की भू-आकृति केवल पर्वतों, नदियों और वनों का समूह नहीं है, बल्कि प्रत्येक प्राकृतिक संरचना के साथ कई पौराणिक कथाएं, वैदिक संदर्भ और प्रागैतिहासिक तथ्य जुड़े हुए हैं।
देवघर की पर्वत श्रृंखलाएं प्राचीन काल से ऋषियों, मुनियों और आक्रांताओं के आकर्षण का केंद्र रही हैं:। देवघर नगर से लगभग 10 किलोमीटर पूर्व में स्थित त्रिकूट पर्वत तीन प्रमुख शिखरों का समूह है, जिन्हें पौराणिक मान्यता के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और महेश (त्रिदेव) का प्रतीक  है। जनश्रुतियों और क्षेत्रीय आख्यानों के अनुसार, लंकापति रावण का पुष्पक विमान इसी पर्वत मार्ग से होकर गुजरता था।
19वीं और 20वीं सदी में महर्षि द्विपेन्द्रनाथ ठाकुर ने त्रिकूट।पर्वत को अपनी पवित्र तपोभूमि बनाया। यहाँ स्थित त्रिकुटाचल आश्रम आज भी साधकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। तपोवन (तपोवर्धन):प्राकृतिक गुफाओं से आच्छादित यह पहाड़ी स्थल सनातन साधना परंपरा का एक अत्यंत प्राचीन केंद्र रहा है। रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि ने अपनी साधना के कुछ वर्ष यहाँ बिताए थे। आधुनिक काल में स्वामी बालानंद ब्रह्मचारी जी ने इन प्राकृतिक गुफाओं में गहन तपस्या की और सिद्धि प्राप्त की। यहाँ स्थित शिव मंदिर और गुफाएँ आज भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करती हैं। नंदन पहाड़: देवघर नगर के समीप स्थित नंदन पहाड़ी भगवान शिव के वाहन नंदी को समर्पित है। वर्तमान में इसे एक सुंदर मंदिर परिसर और बाल उद्यान के रूप में विकसित किया गया है, जो अध्यात्म और पर्यटन का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है। पुथरा पहाड़ एवं पथरड्डा पहाड़ी:ये पहाड़ियां धार्मिक दृष्टिकोण के साथ-साथ पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यहाँ से प्राप्त शैलचित्र, प्राचीन मृदभांड और पाषाण कालीन उपकरण इस बात की पुष्टि करते हैं कि इस क्षेत्र में प्रागैतिहासिक काल  से ही मानव बसावट विद्यमान थी।
संथाल परगना और देवघर की नदियां केवल जल का स्रोत नहीं हैं; वे इस क्षेत्र की कृषि, अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी की जीवनरेखा हैं। अजय नदी मुंगेर (बिहार) की पहाड़ियां यह देवघर और संपूर्ण संथाल परगना की सबसे प्रमुख जलधारा है। यह दक्षिण-पूर्व की ओर बहती हुई पश्चिम बंगाल में गंगा (भागीरथी) से मिलती है। इसका उल्लेख पौराणिक ग्रंथों में भी मिलता है। मयूरक्षी नदी (मोर नदी) देवघर के समीपवर्ती त्रिकूट पहाड़ी क्षेत्र यह नदी क्षेत्र की सिंचाई प्रणाली का मुख्य आधार है। इस पर बना 'मसांजोर बांध' (कनाडा डैम) पूरे प्रमंडल के लिए ऐतिहासिक महत्व रखता है। जयंती, पथरो एवं धारुआ क्षेत्रीय छोटी नदियां एवं पहाड़ियां ये मौसमी नदियां स्थानीय ग्रामीण पारिस्थितिकी तंत्र और कृषि व्यवस्था का मूल आधार हैं। यमुनाजोर देवघर नगर के समीप प्रवाहित धारा पौराणिक आख्यानों में वर्णित यह एक पवित्र धारा है, जिसका संबंध मंदिर प्रांगण के अनुष्ठानों से रहा है।
बाबा वैद्यनाथ मंदिर परिसर और उसके आसपास स्थित जल निकायों का संबंध सीधे रामायण कालीन कथाओं  और तंत्र साधना से जोड़ा जाता है: शिवगंगा (मानसरोवर): बाबा वैद्यनाथ मंदिर से लगभग 200 मीटर उत्तर में स्थित यह एक विशाल प्राचीन सरोवर है। जब लंकापति रावण भगवान शिव के 'कामना लिंग' को कैलाश से लंका ले जा रहा था, तब उसे यहाँ तीव्र लघुशंका की अनुभूति हुई। उसने शिवलिंग को एक चरवाहे (बैजू) को सौंप दिया। आचमन हेतु जल न मिलने पर वरुण देव के आह्वान से इस सरोवर का निर्माण हुआ। इसे 'मानसरोवर' का ही एक रूप माना जाता है। हरिला जोरी एवं हंसकुण्ड: देवघर के उत्तर में स्थित हरिला जोरी वह पावन स्थल है जहाँ 'हरि' (भगवान विष्णु) और 'हर' (भगवान शिव) का मिलन हुआ था। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु यहाँ देव रूप धारण कर रावण से शिवलिंग पुन: प्राप्त करने की योजना में सम्मिलित हुए थे।
चंद्रकूप: वैद्यनाथ मंदिर प्रांगण के भीतर स्थित यह एक अति प्राचीन कुआँ है। जनश्रुति के अनुसार, रावण ने विश्व के समस्त पवित्र तीर्थों का जल लाकर इस कुएं में संचित किया था ताकि शिवलिंग का अभिषेक किया जा सके। आज भी मंदिर के गुप्त अनुष्ठानों में इसका विशेष महत्व है। रावण खाड़  सरोवर हैं। 
देवघर भारत के उन विरले तीर्थों में से एक है जहाँ एक ही प्रांगण में द्वादश ज्योतिर्लिंग और 51 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ दोनों विद्यमान हैं। बाबा वैद्यनाथ मंदिर (कामना ज्योतिर्लिंग - :रावणेश्वर ज्योतिर्लिंग  भगवान शिव के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इसे 'कामना लिंग' कहा जाता है, अर्थात यहाँ श्रद्धा से मांगी गई प्रत्येक मनोकामना पूर्ण होती है। मंदिर का मुख्य शिखर 72 फीट ऊँचा है और इसके शीर्ष पर पंचशूल स्थापित है। श्रावण मास में यहाँ विश्व का सबसे लंबा (105 किलोमीटर) कांवर मेला लगता है, जहाँ श्रद्धालु सुल्तानगंज से गंगाजल लाकर बाबा का जलाभिषेक करते हैं।
हृदयपीठ / हार्दपीठ (शक्तिपीठ): - मुख्य ज्योतिर्लिंग मंदिर के ठीक सामने माँ पार्वती का भव्य मंदिर स्थित है। पौराणिक मतानुसार, जब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के मृत शरीर के खंड किए थे, तब यहाँ माँ सती का 'हृदय' गिरा था। इसलिए यह स्थान शक्तिपीठ के रूप में पूजनीय है। मुख्य मंदिर और पार्वती मंदिर के शिखरों को लाल धागे से जोड़ना (गठबंधन) यहाँ का एक अनूठा अनुष्ठान है, जो शिव और शक्ति के एकाकार का प्रतीक है।
नौलाखा मंदिर: - स्वामी बालानंद आश्रम के समीप स्थित यह मंदिर स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है। 146 फीट ऊँचे इस राधा-कृष्ण मंदिर का निर्माण 20वीं सदी के प्रारंभ में पथरिया घाट की रानी चारुशीला देवी के दान से हुआ था। उस समय इसके निर्माण में ₹9 लाख का व्यय आया था, जिसके कारण लोकवाणी में इसे 'नौलाखा मंदिर' कहा जाने लगा।
सत्संग नगर: - परमप्रेममय श्रीश्री ठाकुर अनुकूलचंद्र जी द्वारा स्थापित यह विश्व प्रसिद्ध आध्यात्मिक और सामाजिक केंद्र है। यहाँ संपूर्ण भारत और विदेशों से लाखों अनुयायी आत्म-उन्नति, सह-अस्तित्व और मानवता का संदेश प्राप्त करने आते हैं।
बासुकीनाथ मंदिर: - यद्यपि यह स्थान देवघर जिले की सीमा से सटे दुमका जिले में स्थित है, परंतु धार्मिक परंपरा के अनुसार वैद्यनाथ धाम में जलाभिषेक करने के उपरांत बासुकीनाथ में पूजा-अर्चना किए बिना यह यात्रा अपूर्ण मानी जाती है। लोक परंपरा में वैद्यनाथ को 'दीवानी' और बासुकीनाथ को 'फौजदारी' दरबार माना गया है।
देवघर और संथाल परगना का इतिहास केवल पौराणिक मान्यताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्राचीन शिलालेखों और पुरातात्विक साक्ष्यों से भी प्रमाणित है: मगध साम्राज्य के सीमावर्ती क्षेत्र में स्थित होने के कारण इस क्षेत्र पर गुप्त और उत्तर-गुप्त सम्राटों का गहरा प्रभाव रहा। उत्तर-गुप्त सम्राट आदित्यसेन के काल के ऐतिहासिक शिलालेख और स्थापत्य अवशेष देवघर तथा समीपवर्ती मंदार (बांका व संथाल परगना सीमा) क्षेत्र में आज भी देखे जा सकते हैं।
पाल एवं सेन राजवंश (8वीं से 12वीं शताब्दी): का पाल काल में यहाँ शैव मत के साथ-साथ बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा और तंत्र साधना का अभूतपूर्व विकास हुआ। देवघर तंत्र साधना के एक प्रमुख केंद्र के रूप में उभरा। यहाँ से प्राप्त बौद्ध मूर्तियाँ और तंत्र-साधना के अवशेष इस बात के प्रमाण हैं। गिद्धौर राजवंश (1596 ई.): का 16वीं शताब्दी में गिद्धौर के राजा पूरनमल ने बाबा वैद्यनाथ मंदिर के मुख्य शिखर और अग्रभाग का भव्य जीर्णोद्धार कराया था। मंदिर के शिलालेख में राजा पूरनमल के इस योगदान का उल्लेख स्पष्ट रूप से मिलता है। नागवंशी एवं चेरो शासक: का झारखंड के स्थानीय नागवंशी और चेरो राजवंशों ने इस पूरे वनांचल भू-भाग को बाह्य आक्रांताओं के आक्रमणों से सुरक्षित रखा और यहाँ की सांस्कृतिक स्वायत्तता को बनाए रखा।
देवघर का नामकरण विभिन्न कालखंडों में इसकी भौगोलिक और सांस्कृतिक विशेषताओं के आधार पर परिवर्तित होता रहा है: वैदिक काल में  हरीतकीवन एवं केतकीवन (हर्रे के सघन वनों और केतकी पुष्पों की प्रचुरता के कारण) , त्रेतायुग , [रामायण ,  रावण काल में रावणवन या चिताभूमि (रावण कथा एवं तंत्र-साधना हेतु श्मशान भूमि होने के कारण , लोक परंपरा  वैद्यनाथ धाम / बैजू धाम (संथाल/भील चरवाहे 'बैजू' द्वारा शिवलिंग की सेवा का लोक-आख्या , आधुनिक प्रशासनिक काल ,  देवघर ("देवताओं का निवास स्थान" है। 
: संथाल परगना का बहु-सांस्कृतिक एवं बहु-धार्मिक महासंगम - संथाल परगना क्षेत्र किसी एक विशिष्ट धार्मिक धारा या जाति तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह विविध संस्कृतियों का एक समन्वयात्मक केंद्र रहा है:
सौर संस्कृति (सूर्य उपासना): यहाँ सनातन परंपरा का महान पर्व 'छठ पूजा' अत्यंत निष्ठा से मनाया जाता है। वहीं दूसरी ओर, क्षेत्र की प्राचीन पहाड़िया जनजातियों में प्राचीन काल से ही 'बेरू' (सूर्य) की पूजा का विधान रहा है।।शाक्त एवं तंत्र संस्कृति:।कामाख्या और तारापीठ के मध्य स्थित होने तथा स्वयं शक्तिपीठ होने के कारण देवघर तंत्र-साधना का केंद्र रहा है। यहाँ महाविद्याओं की पूजा और सती-उपासना जन-जीवन का अभिन्न अंग है।
शैव एवं वैष्णव ('हरि-हर') परंपरा: शिव और विष्णु की संयुक्त पूजा का अद्भुत समन्वय हरिला जोरी, बैद्यनाथ मंदिर और नौलाखा मंदिर की संस्कृति में स्पष्ट दिखाई देता है। असुर एवं धातु-शिल्प संस्कृति: पौराणिक संदर्भों में यह क्षेत्र रावण, बाणासुर और ताड़का वध से जुड़े दंडकारण्य का भाग माना गया है। इस वनांचल की प्राचीन धातु-शिल्प और लौह-प्रौद्योगिकी का संबंध प्राचीन 'असुर' जनजाति से जोड़ा जाता है। नाग, तरु एवं जल संस्कृति: लोक-जीवन में मनसा देवी (नाग पूजा), कर्म वृक्ष की पूजा (करम परब), तथा नदियों और पोखरों को जीवंत देव मानने की परंपरा सनातन और जनजातीय संस्कृतियों के सहज मिश्रण को दर्शाती है।
संथाल समाज भारत का सबसे बड़ा और प्राचीन समरूप जनजातीय समुदाय है। इनकी अपनी विशिष्ट भाषा, संस्कृति, दर्शन और एक सुदृढ़ सामाजिक-गणतांत्रिक संरचना है।।प्रजातीय समूह: नृवैज्ञानिक दृष्टि से संथाल समाज मुख्य रूप से प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉइड प्रजातीय समूह से संबंधित है। इनकी मातृभाषा संथाली है, जो भाषा-परिवार की दृष्टि से ऑस्ट्रो-एशियाटिक (Austro-Asiatic) परिवार की 'मुंडा' उप-शाखा के अंतर्गत आती है।।ओल चिकी लिपि: संथाली भाषा की अपनी स्वतंत्र लिपि 'ओल चिकी' (Ol Chiki) है। इसका आविष्कार महान भाषाविद पंडित रघुनाथ मुर्मू ने वर्ष 1925 में किया था। इसी समृद्ध लिपि और साहित्य के बल पर संथाली भाषा को भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल किया गया।
संथालों की वाचिक परंपरा के अनुसार, संपूर्ण मानव जाति की उत्पत्ति 'हंस-हंसली' नामक दो पवित्र पक्षियों के अंडों से हुई है। इन अंडों से प्रथम पुरुष पिलछू हड़ाम तथा प्रथम स्त्री पिलछू बूढ़ी (Pilchu Burhi) का जन्म हुआ।।इस प्रथम दंपति से 7 पुत्र और 7 पुत्रियों का जन्म हुआ, जिनसे संथाल समाज के 12 मुख्य गोत्रों (किली - Kili) का विकास हुआ। संथाल समाज में जन्म आधारित कोई ऊँच-नीच या जातिप्रथा नहीं है; यह एक पूर्णतः समतावादी (Egalitarian) समाज है। संथाल समाज में समगोत्री विवाह (एक ही किली में विवाह) पूर्णतः वर्जित है।
संथाल गोत्रों की पारंपरिक सामाजिक भूमिकाएं:- मुर्मू  किल ब गोत्र के लोग   पुजारी, गुरु, ठाकुर, बौद्धिक वर्ग है  जिनके द्वारा शिक्षा, धर्म और आध्यात्मिक मार्गदर्शन दिया जाता है। सोरेन गोत्र किल के लोग सिपाही, योद्धा, सैन्य बल के द्वारा  समाज और क्षेत्रीय सीमाओं की रक्ष , हेम्ब्रम गोत्र किल द्वारा  राजा, शासक वर्ग के लोग  प्रशासकीय दायित्व और न्याय व्यवस्था , ,मरांडी गोत्र किल के लोग किसान, व्यापारी द्वारा आर्थिक और कृषि प्रबंधन , ,किस्कू  पारंपरिक राजा/प्रशासक, टूडू  संगीतकार, ढोल वादक, शिल्प कला ,बास्के (Baske) भोजन विश्लेषक, कृषि प्रसंस्करण बेसरा, चौड़े, बेदिया, पौरिया, हाँसदा कृषि, शिकार, सुरक्षा, लोक-कला एवं अन्य सामाजिक दायित्व है। 
संथाल जीवन दर्शन का मूल आधार प्रकृति के साथ तादात्म्य है। इनके धर्म को 'सरना धर्म' या प्रकृति पूजा कहा जाता है। इसमें ईश्वर और प्रकृति अलग-अलग नहीं हैं; प्रकृति ही ईश्वर का दृश्य रूप है। प्रमुख देवी-देवता एवं पवित्र स्थल: में मारंग बुरु (Marang Buru): संथाल समाज के सर्वोच्च आराध्य देव हैं। इन्हें 'महान पर्वत देव' तथा पूरी सृष्टि का रक्षक माना जाता है।।जाहेर एरा (Jaher Era): ये संथालों की ग्राम देवी हैं। इनका निवास गाँव के बाहर सखुआ/साल के पवित्र वृक्षों के कुंज में होता है, जिसे 'जाहेर थान' कहा जाता है। जाहेर थान में कोई मूर्ति नहीं होती, केवल पवित्र वृक्षों की पूजा की जाती है। मोड़ेको-तुरुईको: सीमा और लोक-कल्याण की रक्षा करने वाले पंच-देवता।।मांझी हड़ाम: संथालों के पूर्वज देव, जिनकी पूजा गाँव के मुख्य चौपाल यानी 'मांझी थान' पर की जाती है। वे सामाजिक न्याय के प्रतीक हैं।
प्रकृति-केंद्रित प्रमुख पर्व में सोहराय संथालों का सबसे बड़ा त्योहार है, जो फसल कटने की खुशी में (पौष/कार्तिक मास में) मनाया जाता है। इसमें मवेशियों (गाय-बैल) की पूजा और उनके प्रति आभार व्यक्त किया जाता है। बाहा (Baha): यह वसंतोत्सव है। जब तक जाहेर थान में सखुआ (साल) के नए फूलों और पत्तों को प्रकृति माँ को समर्पित नहीं किया जाता, तब तक कोई भी संथाल नया फूल या फल नहीं तोड़ता। यह पर्यावरण संरक्षण का अनूठा उदाहरण है। करम व करमा - कृषि समृद्धि, भ्रातृ-प्रेम और प्रकृति की उपजाऊ शक्ति की पूजा का पर्व है। 
 'दामिन-इ-कोह' एवं हूल क्रांति संथाल समुदाय का इतिहास निरंतर संघर्ष, प्रवास और अपनी स्वायत्तता की रक्षा का इतिहास रहा है। संथालों की लोक-परंपरागत स्मृतियों के अनुसार उनका प्रवास मार्ग निम्नलिखित रहा है:
अहिरी पिपरी (हजारीबाग/मध्य भारत) ,चायचंपा (छोटा नागपुर पठार , स्वतंत्र किले एवं स्वर्ण काल) ➔ साओंत/सामंतभूम (बंगाल) ➔ दामिन-इ-कोह (संथाल परगना) , अहिरी पिपरी एवं चायचंपा: संथाल लोकगीतों के अनुसार उनका प्रारंभिक समृद्ध निवास 'अहिरी पिपरी' था। तत्पश्चात वे 'चायचंपा' में बसे, जिसे संथाल इतिहास का 'स्वर्ण युग' माना जाता है जहाँ उनके स्वतंत्र किले थे।
साओंत से 'संथाल' नामकरण: मुगलों और अन्य बाहरी शासकों के दबाव में वे बंगाल के 'सामंतभूम' (साओंत क्षेत्र, वर्तमान बांकुड़ा व मिदनापुर) चले गए। इसी 'साओंत' शब्द के आधार पर इस समुदाय को 'संथाल' कहा जाने लगा।
दामिन-इ-कोह की स्थापना (1832 ई.) 18वीं शताब्दी के अंत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने राजमहल की पहाड़ियों में निवास करने वाली उग्र 'पहाड़िया जनजाति' को नियंत्रित करने और राजस्व बढ़ाने के उद्देश्य से संथालों को यहाँ बसने के लिए आमंत्रित किया। वर्ष 1832 में अंग्रेजों ने राजमहल की पहाड़ियों के लगभग 14,000+ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को 'दामिन-इ-कोह' (Damin-i-Koh) घोषित कर दिया। संथालों ने अपने अथक परिश्रम से इस बीहड़ वनांचल को उपजाऊ कृषि भूमि में परिवर्तित कर दिया। शोषण के विरुद्ध महासंग्राम: हूल क्रांति में जब ब्रिटिश शासन, उनके पिट्ठू जमींदारों और बाहरी महाजनों (जिन्हें संथाल 'दिकू' कहते थे) ने संथालों की ज़मीनों पर कब्ज़ा करना और उनका आर्थिक-शारीरिक शोषण करना शुरू किया, तो संथालों ने सशस्त्र विद्रोह का बिगुल फूंका।. तिलका मांझी विद्रोह (1784-1785 ई.): बाबा तिलका मांझी (तिलका मुर्मू) भारत के प्रथम जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी माने जाते हैं। उन्होंने 1784 में भागलपुर में अंग्रेज क्लीवलैंड को अपने तीर से मार गिराया। 1785 में उन्हें धोखे से पकड़कर भागलपुर में बरगद के पेड़ पर फांसी दे दी गई।
. महान संथाल हूल (30 जून 1855): ऐतिहासिक जनसभा: 30 जून 1855 को साहिबगंज जिले के भोगनाडीह गाँव में 50,000 से अधिक संथाल एकत्र हुए।  सिद्धू, कान्हू, चांद और भैरव (चारों भाई) तथा उनकी वीरांगना बहनों फूलों और झानो ने इस महाविद्रोह का नेतृत्व किया।
संथाल स्वराज की घोषणा: सिद्धू को 'राजा', कान्हू को 'मंत्री', चांद को 'सेनापति' और भैरव को 'प्रशासक' चुना गया। उन्होंने अंग्रेजों को लगान देने से इनकार कर दिया और अपनी संप्रभुता की घोषणा की। विद्रोह का दमन एवं परिणाम: अंग्रेजों ने इस विद्रोह को दबाने के लिए मार्शल लॉ लागू किया और भयंकर दमनचक्र चलाया जिसमें 20,000 से अधिक संथाल शहीद हुए। यद्यपि सिद्धू-कान्हू शहीद हो गए, परंतु इस विद्रोह ने 1857 की क्रांति की नींव रखी।: इस विद्रोह के दबाव में अंग्रेजों को विवश होकर 'संथाल परगना' नामक अलग जिला बनाना पड़ा और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (SPT Act) लागू करना पड़ा, जिसने जनजातीय भूमि के हस्तांतरण पर रोक लगाई ।  संथाल समाज की सबसे बड़ी विशेषता उनकी लोकतांत्रिक, पारदर्शी और विकेंद्रीकृत स्वशासन व्यवस्था है, जिसे 'मांझी-परगना शासन व्यवस्था' कहा जाता है। यह व्यवस्था आज भी संथाल परगना में प्रशासनिक और सामाजिक रूप से प्रासंगिक है।
प्रशासनिक संरचना एवं पदसोपान:[गाँव स्तर: मांझी हड़ाम   देश स्तर 5-10 गाँव: देश मांझी परगना स्तर/15-20 गाँव: परगणैत , मांझी हड़ाम : गाँव का प्रमुख प्रशासनिक और न्यायिक प्रमुख। गाँव के सभी सामाजिक और पारिवारिक विवादों का निपटारा मांझी हड़ाम की अध्यक्षता में होता है।।जोग मांझी: मांझी हड़ाम का सहायक, जो युवाओं के नैतिक आचरण और विवाह संबंधी मामलों की देखरेख करता है। प्रामाणिक (उप-मांझी): मांझी हड़ाम की अनुपस्थिति में गाँव का कार्यभार संभालता है।
गोड़ैत: गाँव का संदेशवाहक या सचिव, जो बैठक की सूचना ग्रामीणों तक पहुँचाता है। नायके: गाँव का धार्मिक प्रमुख या पुजारी, जो जाहेर थान में पूजा-अर्चना संपन्न कराता है। कुड़ाम नायके: गाँव की बाहरी सीमाओं पर दुष्ट आत्माओं से रक्षा हेतु पूजा करने वाला उप-पुजारी। परगणैत: 15 से 20 गांवों के समूह (परगना) का प्रमुख। जब कोई मामला गाँव स्तर पर नहीं सुलझता, तो उसे परगणैत के पास भेजा जाता है।।बिटलाहा: संथाल समाज में सामाजिक नियमों (विशेषकर समगोत्री विवाह या गंभीर सामाजिक अपराध) का उल्लंघन करने पर दिया जाने वाला सबसे कठोर दंड 'बिटलाहा' (सामाजिक बहिष्कार) है।  संपूर्ण संथाल परगना का यह भू-भाग केवल एक भौगोलिक क्षेत्र मात्र नहीं है, बल्कि यह भारत की प्राचीन सनातन परंपरा और स्वाभिमानी जनजातीय जीवन-दर्शन का कालजयी संगम है। एक तरफ जहाँ बाबा वैद्यनाथ धाम का ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ आध्यात्मिक चेतना को ऊर्जा प्रदान करते हैं, वहीं दूसरी ओर संथाल समाज का प्रकृति-केंद्रित जीवन, उनकी समतावादी गोत्र व्यवस्था, ऐतिहासिक हूल क्रांति का शौर्य और मांझी-परगना जैसी स्वशासन प्रणाली भारत के वास्तविक गणतांत्रिक मूल्यों को रेखांकित करती है।
यह पावन भूमि हमें सिखाती है कि किस प्रकार अध्यात्म और प्रकृति, आधुनिकता और परंपरा, तथा सनातन धर्म और जनजातीय संस्कृति एक साथ सह-अस्तित्व में रहकर एक समृद्ध और अखंड भारतीय संस्कृति का निर्माण करते हैं।
संदर्भ  - , सत्येन्द्र कुमार पाठक (2024), मगध क्षेत्र की विरासत, क्षेत्रीय इतिहास एवं संस्कृति अध्ययन प्रकाशन।   एल.एस.एस.ओ मॉली (1910), बिहार एंड उड़ीसा डिस्ट्रिक्ट गज़ेटियर्स: संथाल परगना, पटना। मुर्मू, पंडित रघुनाथ (1925), ओल चिकी एवं संथाली साहित्य का विकास, आदिवासी शोध संस्थान।।रसैल, आर.वी. एवं हीरालाल (1916), द ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ द सेंट्रल प्रोविंस ऑफ इंडिया, लंदन।।संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (SPT Act, 1949), बिहार सरकार प्रशासनिक अभिलेख।।भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), दक्षिण बिहार एवं संथाल परगना के पुरातात्विक अवशेष रिपोर्ट।

करपी , अरवल , बिहार 804419

सोमवार, अगस्त 10, 2026

आश्विन माह की विरासत

: काल-चक्र की संधि पर आश्विन मास
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
सनातन धर्म की काल-गणना केवल दिनों और महीनों का लेखा-जोखा नहीं है, अपितु यह खगोलीय घटनाओं, प्रकृति परिवर्तन, आध्यात्मिक चेतना और मानव-इतिहास का एक जीवंत ताना-बाना है। हिन्दू पंचांग के बारह महीनों में आश्विन मास (जिसे लोकभाषा में 'क्वार' या 'कुँआर' भी कहा जाता है) को एक अत्यंत विशिष्ट, रहस्यमयी और ऊर्जावान संधि-काल माना गया है। भाद्रपद (भादों) की मूसलाधार वर्षा और उमस के समाप्त होते ही आश्विन मास का आगमन होता है, जो अपने साथ स्वच्छ नीला आकाश, बहती हुई निर्मल हवाएँ, खिली हुई धूप और शरद ऋतु की हल्की सिहरन लेकर आता है। खगोलीय दृष्टि से यह मास शरद विषुव  के समकालीन है, जब दिन और रात संतुलन की अवस्था में होते हैं। धार्मिक दृष्टि से यह वह कालखंड है जहाँ अदृश्य जगत् (पितृलोक, भूत-प्रेत, सूक्ष्म सत्ताएँ) और दृश्य जगत् (मानव सभ्यता, शक्ति-उपासना, राजसत्ता) एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े होते हैं।
आश्विन मास के दोनों पक्षों (कृष्ण एवं शुक्ल पक्ष), तिथि-वार देव व पितृ-समर्पण, बहु-साम्प्रदायिक साधनाओं, वैश्विक संस्कृतियों में इसके अस्तित्व और मन्वंतर काल से लेकर आधुनिक युग तक के ऐतिहासिक व साम्राज्यिक अवदान का एक वृहद् और प्रामाणिक अध्ययन प्रस्तुत करता है। ज्योतिष काल-गणना में महीनों का नामकरण उस मास की पूर्णिमा तिथि को चंद्रमा के नक्षत्र पर निर्भर करता है। आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को चंद्रमा अश्विनी नक्षत्र के निकट या उससे युक्त होता है। इसी कारण इस मास का नाम 'आश्विन' पड़ा। वैदिक साहित्य में इसे 'अश्वयुज' कहा गया है। 'अश्व' गति, ऊर्जा और सूर्य के रथ के घोड़ों का प्रतीक है, जो इस बात का संकेत है कि इस महीने से सूर्य की गति और किरणों का स्वभाव बदलने लगता है।बिहार, , झारखंड ,  उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि में इसे जनभाषा में 'क्वार' या 'कुँआर' कहा जाता है। यह शब्द संस्कृत के 'कन्या' (कन्या राशि में सूर्य का प्रवेश) अथवा 'कुँवार' (नवीनता/स्वच्छता) से व्युत्पन्न माना जाता है।
आश्विन मास से शरद ऋतु का विधिवत आरंभ होता है। कालिदास ने अपने महाकाव्य ऋतुसंहारम् में शरद ऋतु का वर्णन एक नववधू के रूप में किया है। इस महीने में प्रकृति में निम्नलिखित परिवर्तन देखने को मिलते हैं:
 नदियों और तालाबों का गंदला जल शांत होकर शीशे की तरह पारदर्शी हो जाता है। आकाश मेघ-रहित होकर गहरा नीला दिखाई देता है।: खेतों और नदियों के किनारे सफेद कांस के फूल खिल उठते हैं, जो शरद के आगमन की घोषणा करता है । जलाशयों में लाल-सफेद कमल और रात्रि में कुमुद (कुमुदिनी) के पुष्प अपनी सुगंध बिखेरते हैं।: ग्रीष्म की तपन और वर्षा की नमी के बाद आश्विन मास की हवा स्वास्थ्यवर्धक और त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) को संतुलित करने वाली मानी जाती है।
. आश्विन कृष्ण पक्ष: पितृ पक्ष - आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या (महालया) तक के 15 दिनों को पितृ पक्ष, श्राद्ध पक्ष या महालया पक्ष कहा जाता है। सनातन दर्शन मानता है कि मानव शरीर केवल भौतिक नहीं है; यह तीन ऋणात्मक दायित्वों से बंधा है—देव-ऋण, ऋषि-ऋण और पितृ-ऋण। आश्विन कृष्ण पक्ष पितृ-ऋण से मुक्त होने और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का वार्षिक अवसर है।पितृ पक्ष में प्रत्येक तिथि का अपना एक विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व है। व्यक्ति जिस तिथि को मृत्यु को प्राप्त होता है, उसी तिथि को उसके निमित्त तर्पण व पिंडदान किया जाता है। प्रतिपदा नाना-नानी श्राद्ध, प्रथम मृत आत्माएं इस तिथि को माता के पिता (नाना-नानी) के तर्पण का विधान है। इसके अतिरिक्त वर्ष के दौरान मृत हुए स्वजनों का प्रथम तर्पण होता है।
द्वितीया वसु रूप पितर द्वितीय तिथि को दिवंगत हुए परिजनों का पूजन। इसमें पितरों को 'वसु' रूप मानकर जल दिया जाता है।तृतीया रुद्र रूप पितर तृतीया को मृत पूर्वजों के लिए। पितरों का 'रुद्र' रूप में ध्यान किया जाता है।चतुर्थी संकष्टी गणेश व आदित्य रूप पितर गणेश पूजन के साथ इस तिथि को मृत परिजनों हेतु तर्पण। पितरों का 'आदित्य' रूप में आह्वान।पंचमी कुँवारे मृत जन (अविवाहित पितर) उन स्वजनों/परिवारजनों का श्राद्ध जिनकी मृत्यु विवाह से पूर्व (अल्पायु या कुँवारी अवस्था में) हो गई हो।षष्ठी अकाल मृत व अज्ञात पितर दुर्घटना, बीमारी या असमय काल-कवलित हुए परिजनों के निमित्त विशेष धूप-ध्यान व अर्पण।सप्तमी सप्तर्षि एवं ज्ञान-मार्ग के पूर्वज ऋषियों तथा ज्ञान/शिक्षा की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले पूर्वजों का स्मरण।
अष्टमी जीमूतवाहन (जितिया / जिउतिया व्रत) माताएँ अपनी संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य और सर्व-विपत्ति से रक्षा हेतु गंधर्वराज जीमूतवाहन, चील (चील्हो) और सियार (सियारो) की कथा सुनकर कठोर निर्जला व्रत रखती हैं।नवमी मातृ नवमी (अविधवा नवमी) कुल की सभी दिवंगत माताओं, दादियों, नानियों तथा सुहागिन (अविधवा) स्त्रियों का तर्पण। यह तिथि नारी-शक्ति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है।दशमी गृहस्थ पितर घर-परिवार के दिवंगत वरिष्ठ गृहस्थों का श्राद्ध।एकादशी इंदिरा एकादशी (श्रीहरि विष्णु) इस एकादशी का व्रत रखकर उसका पुण्य पितरों को समर्पित किया जाता है, जिससे उन्हें अधोगति से मुक्ति मिलती है।द्वादशी संन्यासी व यति श्राद्ध उन पूर्वजों या गुरुओं का तर्पण जिन्होंने संन्यास ग्रहण कर लिया था या जो यति-साधु थे।
त्रयोदशी बाल-श्राद्ध एवं काक/पीपल पूजन असमय मृत बालकों का श्राद्ध। इस दिन काक (कौवे) और पीपल वृक्ष को विशेष रूप से ग्रास दिया जाता है।चतुर्दशी शस्त्र-हत (अकाल/हिंसा में मृत) श्राद्ध युद्ध, अस्त्र-शस्त्र, दुर्घटना, विष, जल में डूबने, अग्नि या सर्पघात से मृत लोगों का विशेष श्राद्ध। सामान्य मृत पितरों का श्राद्ध इस दिन वर्जित माना गया है।अमावस्या सर्वपितृ अमावस्या (महालया) जिन पितरों की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, या जो भूल-बिसर गए हों, उन सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों, नागों, असुरों, प्रेतों और समस्त जीवों का महा-तर्पण।
2.2 'आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तम्': सार्वभौमिक करुणा की भावना सनातन धर्म का तर्पण केवल अपने सगे-संबंधियों तक सीमित नहीं है। पितृ पक्ष के तर्पण-मंत्रों में कहा गया है:
"आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवाः। तृप्यन्तु पितरः सर्वे मातृमातामहादयः॥"
अर्थात् ब्रह्मा से लेकर तिनके तक, देव, ऋषि, पितर, मानव, भूत, प्रेत, पशु-पक्षी और यहाँ तक कि जल में रहने वाले सूक्ष्म जीव भी इस जलांजलि से तृप्त हों। यह विधान सिखाता है कि आश्विन कृष्ण पक्ष संपूर्ण सृष्टि के पारिस्थितिक और सूक्ष्म-संतुलन का काल है।आश्विन शुक्ल पक्ष: शक्ति-साधना - अमावस्या के बाद जैसे ही सूर्य और चंद्रमा का पुनर्मिलन होकर आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा आती है, वातावरण का शोक और गंभीरता समाप्त हो जाती है। यह पक्ष सृष्टि के पुनरुत्थान, शक्ति के प्राकट्य और अंधकार पर प्रकाश की विजय का पर्व बन जाता है।प्रतिपदा मां शैलपुत्री, घटस्थापना (कलश) शारदीय नवरात्रि का भव्य शुभारंभ। कलश (घट) में ब्रह्मा, विष्णु, महेश, मातृकाओं और समस्त नदियों/समुद्रों का आह्वान किया जाता है। द्वितीया मां ब्रह्मचारिणी अनंत तप, संयम और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी की साधना।तृतीया मां चंद्रघंटा मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र धारण करने वाली देवी, जो साधक को निर्भयता प्रदान करती हैं।चतुर्थी मां कूष्मांडा अपनी मंद हंसी से ब्रह्मांड (अंड) की रचना करने वाली आद्यशक्ति का पूजन। पंचमी मां स्कंदमाता एवं उपांग ललिता व्रत भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता का पूजन। वात्सल्य, वाक्-सिद्धि और संतान-सुख की प्राप्ति।षष्ठी मां कात्यायनी व कात्यायन ऋषि महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रकट देवी। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की दात्री। इस दिन से बंगाल में दुर्गा पूजा का सार्वजनिक उत्सव (बोधन) आरंभ होता है।सप्तमी मां कालरात्रि (महासरस्वती का अवगाहन) अंधकार, भय और काल का नाश करने वाली भयानक रूपी किंतु शुभंकरी देवी। पत्र-पत्रिका (नवपत्रिका) का प्रवेश।अष्टमी मां महागौरी (महाअष्टमी / दुर्गा अष्टमी) महानिशा पूजा, संधि-पूजा (अष्टमी और नवमी का संधि काल)। शक्तिपीठों में बलि व विशेष आहुतियाँ। नवमी मां सिद्धिदात्री (महानवमी) समस्त सिद्धियों को देने वाली देवी का पूजन। नवदुर्गा अनुष्ठान की पूर्णता, कन्या पूजन (नौ बालिकाओं का भोजन), हवन और अपराजिता देवी का विशेष पूजन। दशमी विजयादशमी (दशहरा) / प्रभु श्रीराम / शमी वृक्ष भगवान श्रीराम द्वारा रावण का वध, मां दुर्गा द्वारा महिषासुर का वध। शमी (छेंउकर) वृक्ष पूजन, अपराजिता पूजन और शस्त्र-पूजन। विजय यात्रा का शुभारंभ।एकादशी पापांकुशा एकादशी (भगवान पद्मनाभ/विष्णु) मन रूपी हाथी को भक्ति रूपी अंकुश से नियंत्रित करने और सर्व-पापों के क्षय हेतु श्रीहरि का व्रत।द्वादशी वामन अवतार एवं गोविंद पूजन भगवान विष्णु के वामन रूप का स्मरण और तुलसी-पूजन।त्रयोदशी प्रदोष व्रत (भगवान शिव-पार्वती) सायंकाल में प्रदोष काल के दौरान भगवान शिव के अपराजित और नीलकंठ स्वरूप का अर्चन। चतुर्दशी कामेश्वर शिव व महालक्ष्मी पूर्व-आह्वान शरद पूर्णिमा की पूर्व संध्या पर जागरण और शिव-शक्ति का ध्यान। पूर्णिमा शरद पूर्णिमा (कोजागरी) / महालक्ष्मी / श्रीकृष्ण / अश्विनी कुमार खगोलीय अमृत वर्षा: माना जाता है कि इस रात चंद्रमा 16 कलाओं से पूर्ण होकर अमृत बरसाता है। कोजागरी पूजा: लक्ष्मी जी पूछती हैं "को जागर्ति?" (कौन जाग रहा है?)। श्रीकृष्ण की दिव्य रासलीला का दिन। देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमारों का पूजन। खीर बनाकर खुले आकाश के नीचे रखने की परंपरा।
4. सम्प्रदाय-गत दृष्टिकोण: विविध पंथों में आश्विन मास की साधना
सनातन धर्म की सुंदरता उसकी विविधता में है। आश्विन मास में भारत के विभिन्न दार्शनिक और धार्मिक सम्प्रदाय अपनी-अपनी परंपराओं के अनुसार साधना करते हैं।  शाक्त सम्प्रदाय (शक्ति उपासना) - शाक्तों के लिए आश्विन मास वर्ष का सबसे बड़ा कालखंड है। शारदीय नवरात्रि में दशमहाविद्या (काली, तारा, त्रिपुरसुंदरी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला) और नवदुर्गा का अनुष्ठान किया जाता है। तंत्र साधना में आश्विन की निशाओं (विशेषकर महाअष्टमी और महानिशा) को परम सिद्धिदायक माना गया है।
 वैष्णव सम्प्रदाय - श्रीराम भक्ति: आश्विन मास भगवान श्रीराम के रावण-विजय का समय है। इस पूरे महीने में भारत के कोने-कोने में रामलीला का मंचन होता है। भगवान श्रीकृष्ण एवं रासलीला: आश्विन पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा) को वैष्णव जन 'रास पूर्णिमा' कहते हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार इसी रात्रि को श्रीकृष्ण ने वृंदावन में गोपियों के साथ महारास रचाया था, जो जीवात्मा और परमात्मा के महामिलन का प्रतीक है।शैव संस्कृति : विजयादशमी के दिन भगवान शिव के 'अपराजित' स्वरूप का पूजन होता है। शिव को काल का नियंता मानकर उनसे विजय का वरदान माँगा जाता है। सौर संस्कृति : वर्षा ऋतु के बाद जब सूर्य अपनी किरणों को उग्रता से मुक्त कर सुखद बनाते हैं, तब सौर-मार्गी साधक आश्विन में आरोग्य-प्राप्ति हेतु सूर्योपनिषद् और आदित्यहृदय स्तोत्र का पाठ करते है
अश्विनी कुमार पूजन: वैदिक देवताओं में अश्विनी कुमार 'दिव्य वैद्य' (आयुर्वेद के आचार्य) हैं। स्वास्थ्य और सुंदरता की प्राप्ति के लिए आश्विन में इनका ध्यान किया जाता है। वृक्ष व जल तत्व: विजयादशमी पर शमी (प्रोसोपिस सिनेरेरिया) और अपराजिता के पौधे की पूजा की जाती है। महाभारत के अनुसार पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान अपने अस्त्र-शस्त्र शमी वृक्ष में ही छिपाए थे। कलश स्थापना के माध्यम से जल-तत्व और अखंड ज्योति के माध्यम से अग्नि-तत्व की पूजा संपूर्ण आश्विन मास का मूल आधार है।
आश्विन मास का महत्व केवल भारत की भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं है। खगोलीय दृष्टि से सितंबर-अक्टूबर का यह समय दुनिया की अनेक प्राचीन और मध्यकालीन संस्कृतियों में ऐतिहासिक मोड़ और उत्सवों का समय रहा है:। 
पवारणा दिवस : आश्विन पूर्णिमा को बौद्ध परंपरा में 'पवारणा दिवस' कहा जाता है। आषाढ़ से आश्विन तक तीन महीने बौद्ध भिक्षु 'वर्षावास' (एक स्थान पर रहकर साधना) करते हैं। आश्विन पूर्णिमा को वर्षावास समाप्त होता है और भिक्षु पुनः लोक-कल्याण हेतु धम्म-प्रचार के लिए निकलते हैं। सम्राट अशोक का धम्म-विजय: बौद्ध इतिहास के अनुसार, सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद आश्विन मास के दौरान ही हिंसा का मार्ग त्यागकर बौद्ध धम्म स्वीकार किया था और अपनी सेना को 'दिग्विजय' के स्थान पर 'धम्म-विजय' के लिए भेजा था।
 जैन संस्कृति: आत्म-विशुद्धि और स्वाध्याय - जैन धर्म में भाद्रपद के 'पर्युषण पर्व' और क्षमावाणी दिवस के बाद आश्विन मास आत्म-निरीक्षण और स्वाध्याय का काल होता है। इस समय जैन श्रमण अपनी वर्षाकालीन स्थिरता को पूर्ण कर यात्राओं का पुनरारंभ करते हैं यहूदी  एवं पारसी परंपराएं
यहूदी पंचांग -  आश्विन मास के समकालीन यहूदी पंचांग का सातवाँ महीना 'तिशरी' आता है। इसमें यहूदी धर्म के सबसे पवित्र त्यौहार—रोश हशनाह  - नया वर्ष ,  योम किप्पूर  - प्रायश्चित का दिन) और सुकौत  - फसल उत्सव) मनाए जाते हैं। पारसी/इरानी परंपरा : प्राचीन फारस (इरान) में आश्विन के समय 'मेहर' महीने में मेहरगान  उत्सव मनाया जाता था। यह न्याय के देवता 'मिथ्र' (वैदिक मित्र/सूर्य) को समर्पित शरद-उत्सव था। यवन (ग्रीक), ईसाई एवं इस्लाम संस्कृति का संदर्भ ग्रीक व पश्चिमी खगोलशास्त्र: यूनानी सभ्यता में शरद विषुव (Equinox) के समय प्रकृति के संतुलन का उत्सव मनाया जाता था। ईसाई व इस्लामिक कालखंड: मध्यकाल में वर्षा ऋतु के समाप्त होते ही आश्विन (सितंबर-अक्टूबर) के महीने में रेशम मार्ग और समुद्री व्यापारिक मार्ग पूरी तरह खुल जाते थे। ईसाई और इस्लामिक व्यापारी काफिले इस समय यात्राएँ सुगम मानते थे, जिससे विचारों, मसालों और शिल्पकला का वैश्विक आदान-प्रदान होत था। 
सनातन कालक्रम में आश्विन मास केवल एक धार्मिक काल नहीं है; यह युद्ध, राजनीति, सीमा-विस्तार (सीमांतोल्लंघन) और साम्राज्यीय पुनर्गठन का ऐतिहासिक मास रहा है। चाणक्य के अर्थशास्त्र से लेकर मराठा साम्राज्य तक, आश्विन मास की विजयादशमी को 'अभियान की तिथि' माना गया है। राजा सुरथ और समाधि वैश्य: मार्कंडेय पुराण (दुर्गा सप्तशती) के अनुसार, स्वारोचिष मन्वंतर में अपना राज्य गंवाने के बाद राजा सुरथ और समाधि वैश्य ने महर्षि मेधा के आश्रम में रहकर आश्विन मास में ही देवी की मिट्टी की मूर्ति बनाकर शक्ति-साधना की थी, जिससे उन्हें पुनः साम्राज्य प्राप्त हुआ। तुलसीदास और रामचरितमानस: गोस्वामी तुलसीदास जी ने आश्विन मास के ऐतिहासिक व आध्यात्मिक महत्व को लोक-लोकंतर तक पहुँचाने के लिए रामलीला की परंपरा को सुदृढ़ है।: वर्षा ऋतु में चार महीने तक नदियाँ उफान पर होती थीं और कीचड़ के कारण रथ व पैदल सेना का चलना असंभव था। आश्विन मास में भूमि सूख जाती थी। कौटिल्य (चाणक्य) के अर्थशास्त्र के अनुसार, राजाओं को विजयादशमी के दिन अपने शस्त्रों, घोड़ों और हाथियों की पूजा (नीराजन विधि) करके सीमा-विस्तार हेतु 'यात्रा' पर निकलना चाहिए। गुप्त साम्राज्य: सम्राट समुद्रगुप्त और चंद्रगुप्त द्वितीय 'विक्रमादित्य' के समय विजयादशमी को सैन्य परेड और राज्योत्सव के रूप में मनाया जाता है। 
मध्यकालीन भारत में दक्षिण के विजयनगर साम्राज्य में आश्विन मास का 'महानवमी उत्सव' वैभव का चरम बिंदु था। विदेशी यात्रियों का विवरण: पुर्तगाली यात्री डोमिंगो पेस और फ़ारसी राजदूत अब्दुर रज्जाक ने विजयनगर के महानवमी उत्सव का भव्य वर्णन किया है। : हम्पी में स्थित इस विशाल पत्थर के मंच से राजा कृष्णदेवराय नौ दिनों तक देवी पूजा देखते थे, कुश्ती प्रतियोगिताओं, नृत्यों, हाथियों के जुलूस और अपनी चतुरंगिणी सेना के पराक्रम का निरीक्षण करते थे ।।मराठा इतिहास में आश्विन मास की विजयादशमी का स्थान सर्वोच्च है: छत्रपति शिवाजी महाराज: शिवाजी महाराज विजयादशमी के दिन शमी वृक्ष की पूजा करते थे और सोने की पत्तियों (शमी पत्र) का आदान-प्रदान करके अपने किलों से निकलकर मुग़ल क्षेत्रों की ओर सैन्य अभियान शुरू करते थे। इसे मराठी में 'सीमांतोल्लंघन' (राज्य की सीमा लांघना) कहा जाता था।
पेशवा काल: पेशवाओं के समय पुणे में विजयादशमी पर विशाल 'दशहरा दरबार' सजता था, जहाँ मराठा सरदार अपनी निष्ठा व्यक्त करते थे और आगामी वर्ष के युद्ध अभियानों की योजना बनाते थे।  आधुनिक युग में आश्विन मास की दुर्गा पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान न रहकर विश्व कला और संस्कृति का सबसे बड़ा खुला मंच बन चुकी है। वर्ष 2021 में यूनेस्को  ने 'कोलकाता की दुर्गा पूजा' को मानव जाति की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता दी।: कर्नाटका के मैसूर महल में आश्विन मास की दशमी को निकलने वाली जंबू सवारी (हाथियों का जुलूस) प्राचीन विजयनगर की परंपरा को आज भी जीवंत रखे हुए है।: उत्तर भारत में दिल्ली, वाराणसी और अयोध्या से लेकर ट्रिनिडाड, मॉरीशस और फिजी जैसे देशों तक आश्विन मास में रामलीलाओं का मंचन भारतीय प्रवासियों को अपनी जड़ों से जोड़े रखता है। 
भौगोलिक और भाषाई विविधताओं के कारण इस पावन महीने को अलग-अलग क्षेत्रों में विभिन्न नामों से पुकारा जाता है । बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान में : आश्विन, अश्विन, क्वार, कुँआर। संस्कृत व वैदिक साहित्य: अश्वयुज। पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा: आश्विन (Aashwin) — यहाँ यह महालया, दुर्गा पूजा और कोजागरी लक्ष्मी पूजा का पर्याय है।महाराष्ट्र एवं गुजरात: आश्विन (Ashvin) — गरबा, डांडिया और नवरात्रि के गरबो उत्सव का काल।तमिलनाडु (दक्षिण भारत): पुरट्टासी (Purattasi) — तमिल सौर पंचांग का छठा/सातवाँ मास, जो भगवान वेंकटेश्वर (विष्णु) को पूर्णतः समर्पित होता है। इस महीने में तमिलनाडु में सात्विक भोजन और शनिवार व्रत का विशेष नियम है। केरल (मलयि: मल्यालम): कन्नी मासम  — जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करता है। ओडिशा: आश्विन  — दुर्गा पूजा व कोजागरी पूर्णिमा का समय।शरद विषुव काल वैश्विक खगोलशास्त्र में दिन-रात की समानता का समय। तिशरी  यहूदी धर्म पंचांग का सातवां पवित्र मास। मेहर  प्राचीन पारसी/इरानी पंचांग का सातवां मास।: बौद्ध विश्व (श्रीलंका, थाईलैंड, म्यांमार, लाओस) में वर्षावास समाप्ति का मास। पश्चिमी ज्योतिष में सूर्य का कन्या से तुला राशि में संक्रमण है। 
 कालजयी चेतना का महाप्रवाह आश्विन मास केवल कैलेंडर का एक पन्ना नहीं है; यह सनातन चेतना का महासमंदर है जिसमें अध्यात्म, खगोलशास्त्र, प्रकृति, साहित्य, युद्ध-नीति और वैश्विक इतिहास का जल आकर मिलता है। सआश्विन का कृष्ण पक्ष हमें अतीत, अपने पूर्वजों, अपनी जड़ों और यहाँ तक कि अदृश्य सूक्ष्म जीवों के प्रति नम्र होना और कृतज्ञता व्यक्त करना सिखाता है। आश्विन का शुक्ल पक्ष हमें भविष्य, नई ऊर्जा, शक्ति की साधना, असत्य पर सत्य की विजय और जीवन के आनंद उत्सव को मनाने का संदेश देता है।मन्वंतर काल के राजा सुरथ से लेकर विजयनगर के महाराजाओं, छत्रपति शिवाजी और आज के आधुनिक समाज तक—आश्विन मास भारतीय संस्कृति की उस अखंड धारा का प्रतीक रहा है जो कभी सूखती नहीं। यह मास मानव को याद दिलाता है कि जब-जब समाज में अंधकार, अज्ञान और असत्य रूपी महिषासुर या रावण का प्रभाव बढ़ेगा, तब-तब आश्विन की नवरात्रि और विजयादशमी हमें सत्य, न्याय और भगवती शक्ति के पुनर्जागरण का मार्ग दिखाती रहेगी।