रविवार, अगस्त 02, 2026

नागपंचमी और नाग संस्कृति

नाग संस्कृति और नाग पंचमी: 
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
भारतीय सभ्यता और संस्कृति विश्वात्मक और उदार दृष्टिकोण की परिचायक रही है। यहाँ प्रकृति के प्रत्येक घटक—चेतन और अचेतन—में ईश्वरीय सत्ता का दर्शन किया गया है। इसी सांस्कृतिक यात्रा का एक अत्यंत प्रामाणिक और प्रभावशाली अध्याय है नाग संस्कृति और उससे जुड़ा पावन पर्व नाग पंचमी। नाग संस्कृति केवल पूजा-पाठ या धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं है; यह भारत के प्रागैतिहासिक काल, वैदिक-पौराणिक आख्यानों, ऐतिहासिक साम्राज्यों, स्थापत्य कला, पारिस्थितिकी तंत्र (Ecology) तथा आध्यात्मिक चेतना का एक अभिन्न अंग रही है। प्रस्तुत आलेख में नाग संस्कृति के सृजनकर्ता नागों, मन्वंतर से लेकर आधुनिक युग तक विभिन्न भारतीय राज्यों में नाग साम्राज्यों व मंदिरों के निर्माण, तथा विविध सम्प्रदायों व जीवन-तत्त्वों में नागपंचमी के बहुआयामी महत्व का विश्लेषणात्मक विवेचन किया गया है।
 नाग संस्कृति - पौराणिक और वैदिक साहित्य के अनुसार, नाग संस्कृति के बीज प्रचेतस के वंश और महर्षि कश्यप एवं उनकी पत्नी कद्रू के माध्यम से बोए गए थे। कद्रू से उत्पन्न नागवंशियों ने न केवल जल, पाताल और पृथ्वी के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी बस्तियाँ बसाईं, बल्कि उन्होंने भारतीय अध्यात्म, समाज और राजनीति में अपना अमूल्य योगदान दिया।।नाग संस्कृति के सृजन और विस्तार में मुख्य रूप से निम्नलिखित नागों की भूमिका ऐतिहासिक व पौराणिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण रही है:।शेषनाग (अनंत): शेषनाग को नाग संस्कृति में स्थायित्व, धैर्य और ब्रह्मांडीय चेतना का प्रतीक माना जाता है। इन्होंने समस्त भौतिक कामनाओं का त्याग कर तपस्या का मार्ग अपनाया और भगवान विष्णु की शय्या के रूप में क्षीरसागर में अपनी सेवा दी। अध्यात्म में इन्हें पृथ्वी के संतुलन और मेरुदंडीय चेतना का आधार माना गया है।
वासुकी नाग: समुद्र मंथन में 'मंथन-रज्जु' (रस्सी) की भूमिका निभाकर वासुकी नाग ने देवों और असुरों के मध्य संतुलन स्थापित किया। वासुकी भगवान शिव के गले का आभूषण बने और औषधि, समुद्र ज्ञान व जल-स्रोतों की रक्षा के अधिष्ठाता देवता के रूप में पूजे गए।।तक्षक नाग: तक्षक ने नाग जाति को एक सुदृढ़ सैनिक और राजनीतिक पहचान दी। खांडवप्रस्थ (आधुनिक दिल्ली-हरियाणा क्षेत्र) और तक्षशिला पर तक्षक नाग का संप्रभु शासन था। महाभारत काल में राजा परीक्षित और जनमेजय के साथ तक्षक का संघर्ष इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ बना।।कर्कोटक नाग: कर्कोटक को विष-विद्या, जल-तत्व और सुरक्षा का स्वामी माना जाता है। राजा नल की कथा तथा कांगड़ा और कश्मीर घाटी के जल-प्रबंध में कर्कोटक नाग का विशिष्ट संदर्भ आता है।
मणिभद्र और महापद्म: ये नाग धन, समृद्धि और निधियों (खजाने) के रक्षक माने गए। इन्होंने प्राचीन व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा और आर्थिक संरचना के निर्माण में योगदान दिया।
आस्तिक मुनि (नाग-संरक्षक): यद्यपि आस्तिक ऋषि महर्षि जरत्कारु और नागकुमारी मनसा के पुत्र थे, परंतु वे नाग संस्कृति के सबसे बड़े रक्षक सिद्ध हुए। उन्होंने राजा जनमेजय के विनाशकारी 'सर्प सत्र यज्ञ' को रोककर नाग जाति को समूल नष्ट होने से बचाया था। नाग पंचमी का त्योहार श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। इसका इतिहास महाभारत काल से लेकर श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं तक फैला हुआ है:राजा जनमेजय का सर्प सत्र और आस्तिक मुनि की है। महाभारत के अनुसार, राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के दंश से हुई थी। पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने हेतु उनके पुत्र राजा जनमेजय ने 'सर्प सत्र यज्ञ' का आयोजन किया। इस महायज्ञ के मन्त्रों के प्रभाव से संसार के समस्त सर्प आहुति बनकर यज्ञ-कुण्ड में गिरने लगे। नाग जाति पर आए इस महासंकट को देखकर माता मनसा के पुत्र आस्तिक मुनि ने जनमेजय के दरबार में प्रवेश किया। ऋषि आस्तिक ने अपने ज्ञान, वेदों की स्तुति और नीतिपूर्ण वचनों से राजा जनमेजय को अत्यंत प्रसन्न किया। जब जनमेजय ने उनसे वर मांगने को कहा, तो आस्तिक मुनि ने सर्प सत्र यज्ञ को तत्काल समाप्त करने का वरदान मांगा। जिस दिन यह यज्ञ समाप्त हुआ और नागों को प्राणदान मिला, वह श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि थी। उसी दिन से नागों की रक्षा और पूजा के प्रतीक रूप में नाग पंचमी पर्व का आरंभ हुआ। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, यमुना नदी को अपने भयानक विष से दूषित करने वाले कालिया नाग का दमन भगवान श्रीकृष्ण ने श्रावण शुक्ल पंचमी को ही किया था। श्रीकृष्ण ने कालिया नाग के फन पर नृत्य कर उसका घमंड तोड़ा और उसे यमुना छोड़कर रमणक द्वीप जाने का आदेश दिया। कालिया को जीवनदान मिलने की स्मृति में भी यह दिन उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
. भारत के राज्यों में नाग साम्राज्य का अवदान एवं प्रमुख नाग मंदिर - भारत का इतिहास साक्ष्य देता है कि नाग केवल पौराणिक पात्र नहीं थे, बल्कि वे एक पराक्रमी मानव जाति और राजवंश (नागवंश) थे, जिन्होंने कुषाणों और शकों जैसी विदेशी शक्तियों को परास्त कर भारत की स्वतंत्रता और सनातन संस्कृति की रक्षा की थी।. उत्तर प्रदेश नाग साम्राज्य: मथुरा, कांतिपुरी और प्रयाग भारशिव-नाग राजाओं के प्रमुख केंद्र थे। राजा नवनाग और वीरसेन ने शकों को हराकर 10 अश्वमेध यज्ञ किए थे। प्रयागराज का नाग वासुकी मंदिर और वाराणसी का तक्षकेश्वर मंदिर। इन मंदिरों का जीर्णोद्धार मराठा काल और गुप्त काल में हुआ।. मध्य प्रदेश नाग साम्राज्य: पद्मावती (आधुनिक ग्वालियर/पवाया) नागवंशियों की राजधानी थी। उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर परिसर में स्थित नागचंद्रेश्वर मंदिर। परमार राजाओं द्वारा निर्मित यह मंदिर केवल नाग पंचमी के दिन (24 घंटे के लिए) खुलता है। इसके अलावा पचमढ़ी में गोंड राजाओं द्वारा संरक्षित नागद्वार गुफा मंदिर स्थित है। बिहार और झारखंड।नाग साम्राज्य: मगध क्षेत्र में प्राचीन नाग शासकों का प्रभाव था। वहीं झारखंड में नागवंशी साम्राज्य की स्थापना प्रथम शताब्दी में राजा फणिमुकुट राय ने की थी। झारखंड राज्य का दुमका जिले के जरमुंडी प्रखंड में स्थित  वासुकीनाथ  मंदिर  में बाबा बासुसुकी नाग शिवलिंग स्थापित है ।प्रमुख मंदिर: बिहार के राजगीर में स्थित मनियार मठ गुप्तकालीन बेलनाकार ईंटों से बना प्राचीन नाग मंदिर है। झारखंड में रांची के निकट सुतियांबे और जगन्नाथपुर नाग पीठ प्रसिद्ध हैं।  उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश।नाग साम्राज्य: गढ़वाल और कुमाऊँ क्षेत्र में कत्युरी राजवंश के समय नाग जातियों का व्यापक प्रभाव रहा। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में बेरीनाग, धौलीनाग, कालीनाग और फेनिनाग मंदिर स्थित हैं।. राजस्थान और गुजरात नाग साम्राज्य: राजस्थान में नागवंशी वीरों का संबंध लोक-देवताओं से जुड़ा है। ददरेवा (चूरू) और खड़नाल में गोगाजी और तेजाजी महाराज के मंदिर हैं जहाँ उन्हें नाग-अवतार माना जाता है। गुजरात के कच्छ में भुजिया नाग मंदिर (भुज किला) और द्वारका में नागनाथ मंदिर स्थापित हैं। महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ का नाग साम्राज्य: छत्तीसगढ़ के कवर्धा में फणि-नागवंश ने 11वीं शताब्दी में शासन किया। छत्तीसगढ़ में भोरमदेव मंदिर समूह नागवंशी वास्तुकला का अनुपम उदाहरण है। महाराष्ट्र के सांगली में बत्तीसा शिराला नाग पूजा का एक ऐतिहासिक स्थल है।. दक्षिण भारतीय राज्य (कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना का नाग साम्राज्य: कदंब, गंग, चोल और त्रावणकोर राजवंशों ने नाग संस्कृति को राजसी संरक्षण दिया। केरल: अलप्पुझा का मन्नारसला नागराज मंदिर 16 एकड़ के प्राकृतिक नाग-वन (सर्पकावु) में फैला है जहाँ 30,000 से अधिक सर्प प्रतिमाएँ हैं। कर्नाटक: कुक्के सुब्रमण्यम मंदिर जहाँ वासुकी नाग की शरणस्थली मानी जाती है।।तमिलनाडु: कन्याकुमारी का नागरकोविल नागराज मंदिर। आंध्र प्रदेश: कृष्णा जिले का मोपिदेवी नाग मंदिर। जम्मू और कश्मीर एवं नागालैंड का नाग साम्राज्य: कश्मीर में 7वीं-8वीं शताब्दी में कार्कोट नाग साम्राज्य (महाराजा ललितादित्य मुक्तापीड) का शासन था, जिन्होंने कश्मीर को जल-प्रबंध और विद्या का केंद्र बनाया। अनंतनाग और वेरीनाग कुंड मंदिर। नागालैंड का नामकरण और वहाँ की जनजातीय परंपराएँ प्राचीन नाग संस्कृति का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। पंजाब, दिल्ली और  हरियाणा का असन्ध (आसंदिवत) क्षेत्र महाभारत कालीन सर्प यज्ञ की भूमि माना जाता है। दिल्ली के मेहरौली क्षेत्र में तोमर राजाओं के समय से पाताल-नाग और योगमाया स्थल नाग परंपरा से जुड़े हैं।
संप्रदायों, धार्मिक दर्शनों एवं जीवन-तत्वों में नागपंचमी का महत्व - नाग संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सर्वसमावेशी प्रकृति है। यह भारत के प्रत्येक संप्रदाय, दर्शन और प्रकृति के तत्वों के साथ गहराई से रची-बसी है: शैव संप्रदाय: भगवान शिव 'नागभूषण' हैं। उनके गले में वासुकी नाग विराजमान हैं। नागपंचमी के दिन शिव और नाग की संयुक्त पूजा जीव और ईश्वर के अभेद संबंध को दर्शाती है। वैष्णव संप्रदाय: भगवान विष्णु शेषनाग पर शयन करते हैं। द्वापर युग में शेषनाग ही श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता बलराम के रूप में अवतरित हुए। नागपंचमी पर बलराम जी और शेषनाग की पूजा वैष्णव परंपरा का मुख्य अंग है। शाक्त संप्रदाय: शाक्त दर्शन में मानव शरीर के भीतर स्थित कुंडलिनी शक्ति को सुप्त सर्पिणी के रूप में देखा गया है। नागपंचमी पर साधना से यह शक्ति जागृत होती है। इसके अतिरिक्त, देवी मनसा (नागेश्वरी) की पूजा शाक्त परंपरा में विष-निवारण के लिए की जाती है। सौर और ब्रह्म संप्रदाय: सूर्य पुराण के अनुसार, सूर्य देव के रथ की रश्मियों में नागों का निवास है जो ब्रह्मांड में ऊर्जा का संचरण करते हैं। ब्रह्मा जी ने नागों को पाताल लोक का अधिपति बनाकर भूगर्भीय संतुलन का दायित्व सौंपा था। देव, मनु और ऋषि: वैवस्वत मनु ने जलप्रलय के समय अपनी नौका को वासुकी नाग की रज्जु (रस्सी) से बाँधकर मानव जाति के बीज की रक्षा की थी। महर्षि कश्यप और ऋषि आस्तिक नाग संस्कृति के बौद्धिक और नैतिक संरक्षक रहे हैं। जल एवं वायु (पर्यावरण संतुलन): प्राचीन काल से ही नागों को जलस्रोतों (बावड़ी, कुएँ, नदियाँ, कुंड) का रक्षक माना गया है। वैज्ञानिक रूप से भी सर्प भूमिगत पर्यावरण और वायु में बदलाव के प्रति अत्यंत संवेदनशील होते हैं। तरु (वृक्ष) संस्कृति: नागपंचमी का पर्व वृक्ष पूजा से सीधे जुड़ा है। दक्षिण भारत और ग्रामीण भारत में पीपल, नीम और बरगद के वृक्षों के नीचे नाग प्रतिमाओं (नागकल) की स्थापना की जाती है। यह परंपरा वनों के संरक्षण का संदेश देती है।
पौराणिक आख्यानों में नागों का स्थान देवताओं और असुरों दोनों के मध्य एक सेतु का रहा है। समुद्र मंथन के समय वासुकी नाग ने स्वयं को मध्यस्थ बनाकर देवताओं और दानवों दोनों का सहयोग प्राप्त किया। नागपंचमी यह सिखाती है कि विरोधी विचारधाराओं के बीच भी सहयोग है। आधुनिक युग में नाग पंचमी का महत्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित हीं है, बल्कि इसके व्यावहारिक और पारिस्थितिकीय  आयाम भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:।पारिस्थितिकी संतुलन एवं कृषक मित्र है। सांप खाद्य श्रृंखला  के अत्यंत महत्वपूर्ण घटक हैं। ये खेतों में फसलों को नष्ट करने वाले चूहों और कीटों को नियंत्रित करते हैं। इसलिए नागपंचमी वास्तव में कृषि और पर्यावरण सुरक्षा का पर्व है।  नागपंचमी के दिन "भूमि की खुदाई न करने" का प्राचीन नियम लागू होता है। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण यह है कि वर्षा ऋतु (सावन) में सर्पों के बिलों में पानी भर जाता है और वे बाहर या जमीन के ऊपरी स्तर पर होते हैं। खुदाई न करने से इन असहाय जीवों की जान बचती है।: जिस दौर में पश्चिमी दुनिया सर्पों को केवल 'विषैला और पाप का प्रतीक' मानती थी, उस दौर में भारतीय संस्कृति ने विषधर जीव में भी ईश्वर का रूप देखकर उसकी रक्षा का नियम बनाया। नागपंचमी "जियो और जीने दो" का सर्वकालिक संदेश देती है।
मन्वंतर के पौराणिक युग से लेकर आधुनिक काल तक, नाग संस्कृति भारत की उस विशाल चेतना का प्रतीक है जो विष में भी अमृत और भयावह जीवों में भी शिवत्व की खोज कर लेती है। राजा जनमेजय के यज्ञ को रोककर आस्तिक मुनि द्वारा नागों को अभयदान दिलाने की घटना आज के आधुनिक युग में जैव-विविधता  और पर्यावरण संरक्षण का सबसे पहला और ऐतिहासिक उदाहरण है। नाग पंचमी केवल नागों की पूजा का दिन नहीं है, बल्कि यह मनुष्य, प्रकृति, जीव-जंतु और धर्म के बीच सह-अस्तित्व के सनातन सूत्र को नया जीवन देने का संकल्प-दिवस है।

बुधवार, जुलाई 29, 2026

बाल साहित्य और सावन कृष्ण प्रतिपदा

बाल-मन की उड़ान, परंपरा और वैश्विक परिदृश्य
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
बाल साहित्य केवल शब्द-संयोजन या कहानियों का संकलन नहीं है, बल्कि यह वह नींव है जिस पर किसी भी समाज का बौद्धिक, नैतिक और सांस्कृतिक भविष्य निर्मित होता है। बच्चों की मासूम दुनिया, उनकी असीम उत्सुकता, कल्पनाशीलता और समझने की सहज क्षमता को ध्यान में रखकर रचा गया लेखन ही वास्तविक अर्थों में 'बाल साहित्य' कहलाता है। यह बाल-मन को एक ऐसा कैनवास प्रदान करता है जहाँ वे अपनी सोच के नए रंग भर सकते हैं। भाषा के विकास से लेकर चरित्र निर्माण तक, बाल साहित्य की भूमिका सर्वोपरि रही है। यह बच्चों की शब्दावली को समृद्ध करता है, उन्हें जीवन के व्यावहारिक और नैतिक मूल्यों से जोड़ता है तथा उनमें वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टिकोण का सिंचन करता है। बाल-मन हर उम्र में अलग ढंग से सीखता और सोचता है। इसी मनोविज्ञान को ध्यान में रखते हुए बाल साहित्य को तीन मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है:
शिशु साहित्य (2.5 से 5 वर्ष):यह बाल साहित्य का सबसे प्राथमिक और कोमल रूप है। इस आयु वर्ग के बच्चों के लिए लिखित सामग्री अत्यंत सीमित और चित्र बहुल होती है। रंग-बिरंगे चित्र, संगीतात्मक तुकबंदियाँ और सरल लोरियाँ बच्चों को ध्वनियों और आकृतियों से परिचित कराती हैं। यहाँ मुख्य उद्देश्य केवल मनोरंजन और बच्चों में पुस्तकों के प्रति प्राथमिक आकर्षण पैदा करना होता है।।सामान्य बाल साहित्य (5 से 12 वर्ष):।यह बाल साहित्य का सबसे विस्तृत और लोकप्रिय क्षेत्र है। इस अवस्था में बच्चे स्वयं पढ़ना और समझना शुरू करते हैं। यहाँ पशु-पक्षियों की मनोरंजक कहानियाँ, नैतिक शिक्षा, परी कथाएँ, साहसिक यात्राएँ और हास्य-व्यंग्य शामिल होते हैं। यह साहित्य उनकी कल्पना शक्ति को पंख देता है और सही-गलत का अंतर सिखाता है। किशोर साहित्य (13 से 19 वर्ष):।किशोरावस्था शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक बदलावों का दौर होती है। इस वर्ग के लिए रचा जाने वाला साहित्य उनकी मानसिक उलझनों, पहचान की खोज, पारिवारिक व सामाजिक चुनौतियों और रोमांचक विषयों पर केंद्रित होता है। यह साहित्य उन्हें परिपक्व बनाने और जीवन की वास्तविकताओं को समझने में मार्गदर्शन करता है।
बाल साहित्य का इतिहास मौखिक लोक-कथाओं और नीति-कथाओं से प्रारंभ होकर आज के डिजिटल और ई-बुक युग तक एक लंबा सफर तय कर चुका है। विश्व स्तर पर बाल साहित्य की नींव मौखिक लोक-कथाओं से पड़ी, किंतु समय के साथ इसे लिखित और मुद्रित रूप मिला: यूनान (ग्रीस): ईसा पूर्व 6ठी सदी में ईसप  की कहानियों  ने पशु-पक्षियों के माध्यम से विश्व को पहली बार नीति-कथाओं का उपहार दिया।।चेक/जर्मनी: वर्ष 1658 में जॉन अमोस कोमेनियस ने 'ऑर्बिस पिक्टस' (Orbis Pictus) नामक पुस्तक रची, जिसे बच्चों की दुनिया की पहली सचित्र पुस्तक माना जाता है।।फ्रांस: 1697 में चार्ल्स पेरो ने 'टेल्स ऑफ मदर गूस' के जरिए 'सिंड्रेला' और 'स्लीपिंग ब्यूटी' जैसी परियों की कहानियों को लिखित रूप दिया। इंग्लैंड: 1744 में जॉन न्यूबेरी ने लंदन से 'ए लिटिल प्रिटी पॉकेट-बुक' प्रकाशित की। वे बच्चों के केवल मनोरंजन के लिए किताबें छापने वाले पहले प्रकाशक थे, इसलिए उन्हें 'बाल साहित्य का पिता' कहा जाता है। आगे चलकर 1865 में लुईस कैरोल की 'ऐलिस इन वंडरलैंड' ने बाल साहित्य में फंतासी और कल्पना की नई दिशा खोली। डेनमार्क और जर्मनी: 19वीं सदी में जर्मनी के ग्रिम बंधुओं (ग्रिम्स फेयरी टेल्स) और डेनमार्क के हंस क्रिश्चियन एंडरसन (द अगली डकलिंग) ने मौलिक बाल-कथाओं का वैश्विक खजाना रचा।
भारत में बाल साहित्य की परंपरा प्राचीनकाल से ही अत्यंत समृद्ध रही है: प्राचीन नीति ग्रंथ: ईसा पूर्व 3री सदी में पंडित विष्णु शर्मा द्वारा रचित पंचतंत्र विश्व बाल साहित्य का पहला महान ग्रंथ है। राजा के मूर्ख पुत्रों को व्यावहारिक ज्ञान देने के लिए रची गई ये कहानियाँ आज भी कालजयी हैं। इसी श्रृंखला में पंडित नारायण का हितोपदेश और बौद्ध धर्म की जातक कथाएँ बच्चों को नैतिक और व्यावहारिक शिक्षा देती आ रही हैं।
भारतेंदु युग और पहली पत्रिकाएं: हिंदी में आधुनिक बाल साहित्य की विधिवत शुरुआत 19वीं सदी के उत्तरार्ध से मानी जाती है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की प्रेरणा से 1882 में प्रयाग (इलाहाबाद) से बच्चों की पहली समर्पित पत्रिका 'बाल दर्पण' का प्रकाशन शुरू हुआ।
'बाल सखा' का युग (1917): इलाहाबाद के इंडियन प्रेस से वर्ष 1917 में 'बाल सखा' पत्रिका शुरू हुई। पंडित देवीदत्त शुक्ल के कुशल संपादन में इस पत्रिका ने लगातार 51 वर्षों तक बच्चों का बौद्धिक मार्गदर्शन किया।
बांग्ला: ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने 'वर्ण परिचय' (1855) लिखा। रवींद्रनाथ टैगोर ने 'सहज पाठ' और उपेन्द्रकिशोर रायचौधुरी व सुकुमार राय ने प्रसिद्ध पत्रिका 'संदेश' (1913) की शुरुआत की, जिसे बाद में सत्यजीत रे ने समृद्ध किया। मराठी: 1849 में 'शाला पत्र' से शुरुआत हुई और आगे चलकर साने गुरुजी ने 'श्यामची आई' जैसी संवेदनशील रचना लिखी। तमिल में कवि सुब्रमण्य भारती व अझा वल्लियप्पा, और तेलुगु में 1947 से चेन्नई से प्रकाशित 'चंदामामा' पत्रिका ने बाल साहित्य को नए आयाम दिए ।
स्वतंत्रता के बाद भारत में बाल साहित्य को दिशा देने में बड़े साहित्यकारों और राष्ट्रीय संस्थाओं का अमूल्य योगदान रहा: महान साहित्यकार: मुंशी प्रेमचंद ('ईदगाह', 'दो बैलों की कथा'), सुभद्रा कुमारी चौहान ('कदंब का पेड़'), सोहनलाल द्विवेदी ('दूध-बताशा'), और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ('बतूता का जूता') जैसे दिग्गजों ने बाल साहित्य को उच्च साहित्यिक दर्जा दिलाया।चिल्ड्रन्स बुक ट्रस्ट (1957): प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट के. शंकर पिल्लई द्वारा नई दिल्ली में स्थापित इस ट्रस्ट ने बच्चों के लिए बेहद किफायती और आकर्षक पुस्तकों का निर्माण किया। नेशनल बुक ट्रस्ट : 'नेहरू बाल पुस्तकालय' श्रृंखला के तहत भारत की सभी प्रमुख भाषाओं में बाल साहित्य उपलब्ध कराया। लोकप्रिय पत्रिकाएँ: 20वीं सदी के उत्तरार्ध में पराग, नंदन, चंपक और चंदामामा जैसी पत्रिकाओं ने हर घर में बच्चों के बीच पढ़ने की संस्कृति को जीवित रखा। जयपुर राजस्थान से प्रकाशित बच्चो की दुनिया है।  इक्कीसवीं सदी में बाल साहित्य केवल कागज़ और स्याही तक सीमित नहीं रह गया है। आधुनिक तकनीक, इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के आने से इसका स्वरूप बदला है। आज ई-बुक्स, ऑडियो बुक्स, एनिमेटेड कहानियाँ और डिजिटल पत्रिकाएँ बच्चों की नई रुचियों और प्राथमिकताओं के अनुकूल ढल रही हैं।
आज का बाल साहित्य केवल नैतिक उपदेश देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, अंतरिक्ष विज्ञान, लैंगिक समानता और मानसिक स्वास्थ्य जैसे आधुनिक और व्यावहारिक विषयों को भी अपने भीतर समेट रहा है।बाल साहित्य केवल बच्चों का बहलावा नहीं, बल्कि एक सशक्त समाज के निर्माण की पहली सीढ़ी है। प्राचीन पंचतंत्र की नीति-कथाओं से लेकर बाल दर्पण और आज के डिजिटल प्लेटफॉर्म तक, बाल साहित्य ने हर दौर में बाल-मन को गढ़ने का पावन कार्य किया है। आवश्यकता इस बात की है कि डिजिटल दौर में भी हम अपने बच्चों को अच्छी बाल पुस्तकों और साहित्य से जोड़े रखें, ताकि उनकी सोच संवेदनशील, तार्किक और रचनात्मक बनी रहे। बाल साहित्य का संवर्धन वास्तव में हमारे आने वाले कल का संवर्धन है ।


सावन कृष्ण  प्रतिपदा:  रिमझिम फुहारों से जाग्रत होती है शिव-चेतना,
भारतीय पंचांग की तिथियाँ केवल समय का हिसाब-किताब नहीं रखतीं, बल्कि वे मनुष्य के मन, मौसम और उसकी आध्यात्मिक यात्रा का दिशा-निर्देश करती हैं। जब ज्येष्ठ और आषाढ़ की भीषण गर्मी से झुलसी हुई धरती पर आषाढ़ी पूर्णिमा के बाद सावन का पहला कदम पड़ता है, तो पूरी प्रकृति एक नवजीवन से भर उठती है।।सावन मास के उत्तरार्ध का आरंभ जिस तिथि से होता है, उसे सावन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा कहते हैं। यह वह तिथि है जहाँ से सावन अपनी पूरी रंगत में आता है। चारों ओर फैली हरियाली, बादलों की गड़गड़ाहट, नदियों का उफान और शिवालयों से गूँजती "हर-हर महादेव" की ध्वनि—यह सब मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं, जहाँ भक्त और प्रकृति दोनों ही शिव की भक्ति में लीन हो जाते हैं।: सृष्टि रक्षा और करुणा का पर्व - सावन मास में भगवान शिव के पूजन का पौराणिक आधार 'समुद्र मंथन' की कथा में मिलता है। जब देवों और दानवों ने मिलकर समुद्र का मंथन किया, तो उसमें से चौदह रत्न निकले। लेकिन उन रत्नों के साथ निकला एक अत्यंत भयानक विष—हलाहल। इस विष की तपन और गंध इतनी तीव्र थी कि तीनों लोक जलने लगे। सृष्टि के अस्तित्व पर मँडराते इस संकट को देखकर सभी देवता और ऋषि-मुनि भगवान शिव की शरण में पहुँचे। भगवान शिव ने बिना किसी संकोच के संपूर्ण सृष्टि की रक्षा हेतु उस विष को अपने कण्ठ में उतार लिया। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया, जिसके कारण वे 'नीलकंठ' कहलाए। विष की भयंकर ज्वाला से शिवजी के शरीर का तापमान अत्यधिक बढ़ गया। तब देवताओं ने उनके शरीर को शीतलता प्रदान करने के लिए निरंतर जल की वर्षा की और उन पर बेलपत्र, दूध व भस्म अर्पित की। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, वह समय सावन का ही महीना था। सावन कृष्ण प्रतिपदा इसी नीलकंठ रूपी शिव की करुणा, त्याग और सृष्टि-रक्षा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पावन दिन है।
कृष्ण पक्ष प्रतिपदा का दर्शन: 'मैं' से 'शिव' की ओर यात्रा-  सावन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा का आध्यात्मिक अर्थ बहुत गहरा है। पूर्णिमा के पूर्ण चंद्रमा के बाद जब कृष्ण पक्ष की शुरुआत होती है, तो चंद्रमा की कलाएँ घटने लगती हैं। वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा को 'मन का प्रतीक' माना गया है। जैसे-जैसे चंद्रमा अपनी एक-एक कला घटाता है, वैसे ही यह तिथि हमें संदेश देती है कि साधक को अपने भीतर के 'मैं' (अहंकार), क्रोध, लोभ और वासना को धीरे-धीरे घटाना चाहिए। जब मन का अहंकार घटता है, तभी ईश्वर की कृपा का अनुभव होता है। चंद्रमा अमावस्या को शिव के मस्तक पर पूर्ण रूप से विलीन होने के लिए घटता है। ठीक उसी तरह, सावन कृष्ण प्रतिपदा हमें सिखाती है कि सच्चा भक्त वही है जो अपने मन और बुद्धि को शिव के चरणों में समर्पित कर दे।
मता पार्वती का संकल्प और अखंड सौभाग्य की कामना - सावन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा का संबंध केवल शिव से ही नहीं, बल्कि शक्ति (माता पार्वती) से भी गहरा है। कथाओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करने के लिए सहस्रों वर्षों तक कठोर तपस्या की थी।।माना जाता है कि सावन कृष्ण प्रतिपदा के दिन ही माता पार्वती ने अपने तप का वह कठिन चरण शुरू किया था, जिसमें उन्होंने जल का भी त्याग कर दिया था। उनके इसी अटूट संकल्प से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें स्वीकार किया था। इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए, आज भी इस तिथि पर अविवाहित कन्याएँ योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए और विवाहित स्त्रियाँ अपने पति की दीर्घायु व अखंड सौभाग्य के लिए विशेष व्रत-उपवास रखते है। 
सावन कृष्ण प्रतिपदा केवल मंदिरों के कपाट तक सीमित नहीं है, इसका सीधा संबंध खेतों की माटी और ग्रामीण जनजीवन से है।
सावन के इस समय तक भारत के अधिकांश हिस्सों में खेतों में धान की रोपाई समाप्त हो चुकी होती है। किसान सावन कृष्ण प्रतिपदा के दिन अपने हलों और कृषि यंत्रों को विराम देकर भगवान शिव से प्रार्थना करते हैं कि 'हे भोलेनाथ, बारिश की कृपा बनाए रखना ताकि फसलें लहलहाएँ। सावन में पेड़ लगाने का विशेष धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व है। वर्षा ऋतु में लगाए गए पौधों के जीवित रहने की संभावना सबसे अधिक होती है। इस तिथि को गाँवों में पीपल, बरगद, नीम, आँवला और बेल के पौधे रोपने की परंपरा है। शास्त्रों में कहा गया है कि सावन में लगाया गया एक फलदार या छायादार वृक्ष 1000 शिवलिंगों की पूजा के समान पुण्य देता है।  सावन कृष्ण प्रतिपदा से ही गाँवों में नीम और बरगद की डालियों पर रस्सियों के झूले पड़ जाते हैं। महिलाएँ और नवविवाहिताएँ एक साथ मिलकर 'कजरी' और 'बारहमासा' गाती हैं। ये लोकगीत प्रकृति के सौंदर्य, वर्षा की बूँदों और विरह-मिलन की वेदना को इतने सुंदर ढंग से व्यक्त करते हैं कि पूरा माहौल जीवंत हो उठता है।
सावन कृष्ण प्रतिपदा की पूजा अत्यंत सरल और भावपूर्ण होती है। इसके लिए किसी बड़े आडंबर की आवश्यकता नहीं होती:: सूर्योदय से पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में उठें। घर की सफाई करें और स्नान के जल में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान करें। शिवलिंग का अभिषेक: पास के शिवालय में जाकर या घर में ही पार्थिव (मिट्टी के) शिवलिंग बनाकर सबसे पहले शुद्ध जल से, फिर दूध, दही, घी, शहद और शक्कर (पंचामृत) से अभिषेक करें। शिवलिंग पर मुख्य रूप से बेलपत्र (जो कटे-फटे न हों), धतूरा, भांग, शमी के पत्ते, भस्म और सफ़ेद चंदन लगाएँ। मंत्र एवं जप: में "ॐ नमः शिवाय" का कम से कम 108 बार मानसिक जप करें। यदि स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ हों, तो महामृत्युंजय मंत्र का पाठ करना अत्यंत फलदायी होता है। : इस दिन फलाहार (फल और दूध) ग्रहण करें। भोजन में सादे नमक के स्थान पर सेंधा नमक का प्रयोग करें अथवा संभव हो तो नमक का पूर्ण त्याग करें
सनातन परंपरा में कृष्ण पक्ष को पितरों (पूर्वजों) की तृप्ति का समय भी माना जाता है। सावन कृष्ण प्रतिपदा को जो लोग अपने पितरों के नाम से जल तर्पण करते हैं या तिल-अन्न का दान करते हैं, उनके घर में सुख-शांति बनी रहती है। इसके साथ ही, सावन प्रतिपद दिन दान का सामाजिक महत्व भी है:: चूंकि यह वर्षा ऋतु का समय होता है, इसलिए गरीबों को छाता, सूती वस्त्र, चप्पल और सूखा अनाज दान करने से विशेष पुण्य मिलता है।।जीव-दया भगवान शिवजी 'पशुपतिनाथ' भी हैं—अर्थात सभी जीवों के स्वामी। इस दिन भूखे मवेशियों को हरा चारा देना, कुत्तों को रोटी देना और पक्षियों के लिए पानी रखना ही वास्तविक शिव-पूजा है।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और कंक्रीट के जंगलों में जीवन व्यतीत कर रहे आधुनिक मानव के लिए सावन कृष्ण प्रतिपदा एक संजीवनी की तरह है। यह पर्व हमें तीन सबसे बड़े जीवन-मूल्य सिखाता है: जैसे मानसून में मौसम बदलता रहता है, वैसे ही जीवन में सुख-दुख आते रहते हैं। शिव की भांति विष (विषम परिस्थितियों) को पचाकर भी शांत रहना इस पर्व का सबसे बड़ा सबक है।  जल का अपव्यय रोकना और पेड़ लगाना ही शिवजी पर जल चढ़ाने का वास्तविक अर्थ है  भगवान शिव राजा होकर भी श्मशान की भस्म लपेटते हैं। वे हमें सादगी और समाज के अंतिम व्यक्ति की सेवा का संदेश देते हैं।
पुराणों , स्मृति ग्रंथों के अनुसार समुद्र मंथन के हलाहल विष का पान कर शिव द्वारा सृष्टि की रक्षा। आध्यात्मिक संदेश मन के अहंकार को घटाकर पूर्ण समर्पण की ओर बढ़ना। सांस्कृतिक रंग कजरी लोकगीत, वृक्षारोपण और झूला उत्सव का आरंभ।मुख्य साधना पंचामृत स्नान, बेलपत्र अर्पण, "ॐ नमः शिवाय" का जप। सामाजिक कार्य छाता, वस्त्र, अन्न दान और असहाय जीवों की सेवा है। सावन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा केवल एक कैलेंडर की तारीख या व्रत-त्योहार का दिन नहीं है। यह आत्मा को परमात्मा से जोड़ने, प्रकृति के प्रति अपना आभार व्यक्त करने और अपने भीतर की बुराइयों को त्यागने का एक सुअवसर है।  सावन कृष्ण प्रतिपदा पर हम यह संकल्प लें कि हम केवल मंदिर में जल चढ़ाने तक सीमित नहीं रहेंगे; बल्कि हम प्रकृति को बचाने के लिए एक पौधा ज़रूर लगाएँगे, किसी ज़रूरतमंद के आँसू पोंछेंगे और अपने आचरण को शिव जैसा नीलकंठ (दयालु और सहनशील) बनाएँगे। जब हमारे मन में करुणा और सादगी का यह भाव जागेगा, तभी हमारा सावन मनाना वास्तव में सार्थक होगा।

नंदीश्वर द्वीप और जैन धर्म

नंदीश्वर द्वीप: स्वरूप, पर्वतीय संरचना
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
भारतीय उपमहाद्वीप विभिन्न दार्शनिक चिंतन-धाराओं, साधना-पद्धतियों एवं सांस्कृतिक मूल्यों का विशाल संगम रहा है। यहाँ अनादि काल से विविध मत-मतांतरों ने मानव जीवन को उन्नत बनाने, आचरण को पवित्र करने और परम तत्त्व की प्राप्ति के मार्ग दिखाए हैं। भारतीय चिंतन-धारा जहाँ एक ओर वैदिक, पौराणिक एवं तांत्रिक उपासना-धाराओं (सौर, शाक्त, ब्रह्म, शैव, वैष्णव) से समृद्ध हुई, वहीं दूसरी ओर ऋषि-परंपरा, देव-उपासना और मनु द्वारा निर्मित आचार-संहिताओं ने सामाजिक व्यवस्था को स्थायित्व प्रदान किया। इसी महासमुद्र में जैन दर्शन अपनी अनूठी अहिंसा, स्याद्वाद, कर्म-सिद्धांत और अकृत्रिम (शाश्वत) भूगोल की अवधारणा के साथ विशिष्ट स्थान रखता है। जैन ब्रह्मांड विज्ञान  के अनुसार, यह लोक (सृष्टि) तीन भागों—अधोलोक, मध्यलोक, और ऊर्ध्वलोक—में विभाजित है। मध्यलोक के असंख्य द्वीपों और समुद्रों की श्रृंखला में ८वाँ (आठवाँ) द्वीप 'नंदीश्वर द्वीप' कहलाता है। यह द्वीप अपनी अकृत्रिमता, अलौकिकता और 52 शाश्वत जिनालयों (चैत्यालयों) के कारण जैन धर्म में सर्वाधिक वंदनीय माना गया है।
भारतीय दार्शनिक परंपराएँ एवं जैन संस्कृति का समन्वय - भारतीय संस्कृति एकांगी न होकर बहुआयामी है। इसमें ईश्वर, प्रकृति, आत्मा और लोक-कल्याण के विविध दृष्टिकोण एक साथ प्रवाहित होते हैं: सौर परंपरा: भगवान सूर्य को प्रत्यक्ष देव और जगत् की आत्मा मानकर उनकी उपासना करने वाली धारा। 'गायत्री मंत्र' और 'सूर्य नमस्कार' इसी परंपरा के मूल आधार हैं। शाक्त परंपरा: आद्यशक्ति, जगज्जननी दुर्गा, महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के रूप में मातृ-शक्ति (सृजन एवं विनाश की ऊर्जा) की साधना। ब्रह्म (ब्राह्म) परंपरा: वेदांत दर्शन पर आधारित, जिसमें परब्रह्म (सृष्टिकर्ता ब्रह्मा एवं सर्वव्यापी निर्गुण-सगुण ब्रह्म) की उपासना का विधान है।शैव परंपरा: देवाधिदेव महादेव शिव, लिंग-पूजा, योग और वैराग्य की धारा, जो आत्म-साधना और कल्याणकारी तत्त्व पर बल देती है।वैष्णव परंपरा: जगत के पालनहार भगवान विष्णु एवं उनके पूर्णावतारों (श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि) की भक्ति और शरणागति की परंपरा , ऋषि: ज्ञान-परंपरा के वाहक और मंत्र-द्रष्टा, जिन्होंने सत्य की खोज की।।देव: प्राकृतिक और दिव्य शक्तियाँ जो ब्रह्मांडीय संतुलन बनाए रखती हैं। मनु: मानव सभ्यता के प्रथम पुरुष एवं समाज-शास्त्र (नीति व धर्म) के प्रवर्तक। है। 
जैन संस्कृति: वीतरागता, अहिंसा, अपरिग्रह और स्याद्वाद पर आधारित दर्शन। जैन मान्यता के अनुसार, यह लोक अकृत्रिम (किसी ईश्वर या व्यक्ति द्वारा अनिर्मित) है। इसमें आत्मा ही अपने कर्मों के अनुसार सुख-दुःख का भोग करती है और सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान व सम्यक् चरित्र द्वारा मोक्ष (पूर्ण शुद्धि) प्राप्त कर सकती है।
. नंदीश्वर द्वीप: स्थिति, स्वरूप एवं अलौकिक विस्तार - जैन आगम ग्रंथों (जैसे तिलोयपण्णत्ती, त्रिलोकसार, एवं तत्वार्थसूत्र) के अनुसार, मध्यलोक में लवण समुद्र, धातकीखंड आदि को पार करने के बाद ८वाँ द्वीप नंदीश्वर द्वीप आता है। अकृत्रिमता: जैन दर्शन के अनुसार यह द्वीप अनादि-निधन है; इसका निर्माण किसी मनुष्य, ईश्वर या तीर्थंकर ने नहीं किया। : तिलोयपण्णत्ती के अनुसार, जम्बूद्वीप से आगे प्रत्येक द्वीप और समुद्र का विस्तार दूना-दूना होता जाता है। नंदीश्वर द्वीप का व्यास 1 अरब 63 करोड़ 84 लाख योजन (1,63,84,00000 योजन) है।
मानव-रहित क्षेत्र: जैन आगमों के अनुसार, मनुष्य केवल धातकीखंड द्वीप और पुष्करवर द्वीप के आधे भाग (मानुषोत्तर पर्वत) तक ही निवास कर सकते हैं। मानुषोत्तर पर्वत के पार (जिसमें नंदीश्वर द्वीप शामिल है) मनुष्यों, पशु-पक्षियों या तिर्यंचों का सशरीर प्रवेश संभव नहीं है।  नंदीश्वर द्वीप में चारों निकायों के देवगण (भवनवासी, व्यंतर, ज्योतिषी, और कल्पवासी) ही गमन करते हैं। अत: यहाँ कोई मानवीय जाति या वर्ण व्यवस्था (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) नहीं है। अष्टाह्निका पर्व: वर्ष में तीन बार (कार्तिक, फाल्गुन, और आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से पूर्णिमा तक) ८-८ दिनों का अष्टाह्निका पर्व मनाया जाता है।देवों की महापूजा: इन आठ दिनों में चारों निकायों के देव-देवियाँ नंदीश्वर द्वीप जाकर ५२ शाश्वत जिनालयों में अष्टद्रव्य (जल, चंदन, अक्षत, पुष्प, दीप, धूप, फल, अर्घ्य) से महापूजा एवं उत्सव मनाते हैं। मनुष्यों द्वारा परोक्ष वंदना: चूँकि मनुष्य सशरीर वहाँ नहीं पहुँच सकते, इसलिए श्रावक-श्राविकाएँ मंदिरों में 'नंदीश्वर विधान' और व्रत करके नंदीश्वर द्वीप के जिनालयों की परोक्ष वंदना (भाव-पूजा) करते हैं।
५२ अकृत्रिम पर्वतों (गिरी) एवं चैत्यालयों की भौगोलिक संरचना - नंदीश्वर द्वीप में चारों दिशाओं (पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर) में कुल 52 पर्वत स्थित हैं, और प्रत्येक पर्वत की चोटी पर एक-एक शाश्वत (अकृत्रिम) जिन-मंदिर (चैत्यालय) विराजमान है। पर्वतों का वर्गीकरण (प्रति दिशा रचना) में  अंजनगिरि पर इंद्रनील मणि सदृश (गहरा नीला/काला) 1 4 संख्या प्रति दिशा रचना , दधिमुख पर्वत (स्फटिक/दही सदृश (निर्मल श्वेत) 4 1, रतिकर पर्वत (Ratikar) तपाये स्वर्ण सदृश (स्वर्णमयी पीला) 8 32 कुल योग 13 प्रति दिशा 52 पर्वत (52 जिनालय) , दिशा-वार भौगोलिक विन्यास में अंजनगिरि: प्रत्येक दिशा के केंद्र में 1 विशाल 'अंजनगिरि' पर्वत स्थित है (चारों दिशाओं में 4 अंजनगिरि)। बावड़ियाँ (वापिकाएँ): अंजनगिरि पर्वत के चारों तरफ जल से भरी 4 बावड़ियाँ (नंदा, नंदोत्तर, आनंद, और वर्धमाना) हैं। दधिमुख पर्वत: इन बावड़ियों के बीच में 4 'दधिमुख' पर्वत स्थित हैं (4 × 4 = 16 दधिमुख)। रतिकर पर्वत: बावड़ियों के बाह्य कोनों पर 8 'रतिकर' पर्वत स्थित हैं (8 × 4 = 32 रतिकर)। रचना समीकरण: 1 दिशा = 1 अंजनगिरि + 4 दधिमुख + 8 रतिकर = 13 पर्वत। कुल: 13 पर्वत × 4 दिशाएँ = 52 अकृत्रिम चैत्यालय है। 
प्रत्येक चैत्यालय में भगवान ऋषभदेव, चंद्रप्रभ, वारिषेण और वर्धमान स्वामी आदि तीर्थंकरों की 108-108 शाश्वत पद्मासन मुद्रा में विराजमान अकृत्रिम जिन-प्रतिमाएँ स्थापित हैं। विश्व एवं भारत के विभिन्न राज्यों एवं विश्व में नंदीश्वर मंदिरों का निर्माण - चूँकि वास्तविक नंदीश्वर द्वीप मध्यलोक में स्थित है, इसलिए जैन मतावलंबियों ने भाव-वंदना हेतु पृथ्वी पर नंदीश्वर द्वीप की प्रतिकृतियाँ (त्रिविम मॉडल, नंदीश्वर पट्ट, एवं विशाल मंदिर) निर्मित किए है। उत्तर प्रदेश का हस्तिनापुर (मेरठ): 1980 के दशक में गणिनी प्रमुख आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से 'जंबूद्वीप' परिसर के भीतर विशाल नंदीश्वर द्वीप और जिनालयों का भव्य निर्माण कराया गया। देवबंद, आगरा व मथुरा: मध्यकालीन (मुगल एवं स्थानीय रजवाड़ों के काल) और आधुनिक काल में निर्मित कई नंदीश्वर पट्ट व मंदिर स्थित हैं। मध्य प्रदेश का इंदौर (काँच मंदिर): 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में प्रसिद्ध उद्योगपति सर सेठ हुकमचंद (होलकर राज्य काल) द्वारा इंदौर के काँच मंदिर में काँच-चित्रित और धातु-निर्मित नंदीश्वर द्वीप की अद्भुत प्रतिकृति स्थापित की गई। खनियाधाना (शिवपुरी): यहाँ संगमरमर का विशाल त्रिविम (3D) पंचमेरू एवं नंदीश्वर जिनालय स्थित है।सोनागिरी (दतिया): बुंदेला राजाओं के काल एवं आधुनिक समय में निर्मित नंदीश्वर पट्टिकाएँ एवं जिनालय विद्यमान हैं। राजस्थान का।जालौर, तिजारा (अलवर), जयपुर, अजमेर व उदयपुर: राजपूत काल (चौहान, राठौड़ व कछवाहा राजवंश) से लेकर आधुनिक काल तक 52 जिनालयों की प्रतिकृतियाँ और नंदीश्वर विधान मंडप निर्मित किए गए। अजमेर के 'सोनी जी की नसियाँ' में स्वर्णमयी जैन भूगोल रचना में इसका सुंदर दिग्दर्शन है। झारखंड में सम्मेद शिखरजी (मधुबन): 19वीं और 20वीं सदी में जैन महासंघों द्वारा तेरहपंथी कोठी एवं बीसपंथी कोठी परिसर में विशाल नंदीश्वर द्वीप जिनालयों का निर्माण कराया गया। गुजरात का पाटन, गिरनार, पालिताना व सोनगढ़: सोलंकी साम्राज्य (11वीं-12वीं शताब्दी) के समय से ही नंदीश्वर पट्ट उकेरे जाने की परंपरा रही। आधुनिक काल में सोनगढ़ में विशाल 'श्री पंचमेरु नंदीश्वर जिनालय' निर्मित है।।बिहार - कुंडलपुर (नालंदा) व राजगीर: प्राचीन काल (गुप्त व पाल राजवंशों के काल) से जैन कला के अवशेष रहे हैं। कुंडलपुर में  युग में भव्य नंदीश्वर जिनालय का निर्माण कराया गया। दक्षिण भारत कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना का राजवंश: राष्ट्रकूट, गंगा, और चालुक्य राजवंशों (8वीं से 12वीं शताब्दी) के दौरान पत्थरों पर 52 जिनालयों के नक्काशीदार 'नंदीश्वर पट्ट' बनाने की परंपरा रही (उदा. राजा रचमल्ल के संरक्षण में)।  श्रवणबेलगोला, हम्बुज (हुमचा), मूडबिद्री और वारंगा के पार्श्वनाथ बसदि में मध्यकालीन नंदीश्वर पट्टिकाएँ सुरक्षित हैं। महाराष्ट्र का मुंबई, पुणे, कारंजा (अकोला): मराठा काल के पश्चात एवं आधुनिक काल में दानवीरों व जैन संघों द्वारा भव्य नंदीश्वर जिनालयों की स्थापना की गई।: दिल्ली के चांदनी चौक स्थित लाल मंदिर, रोहतक, अंबाला और देहरादून में 20वीं-21वीं सदी में नंदीश्वर रचनाएँ स्थापित की गईं। पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, छत्तीसगढ़: कोलकाता (बड़ा बाज़ार व पारसनाथ मंदिर) में 19वीं सदी में मारवाड़ी व ओसवाल जैनों द्वारा नंदीश्वर पट्ट स्थापित किए गए।जम्मू-कश्मीर: जम्मू शहर के दिगंबर जैन मंदिर में नंदीश्वर पट्ट विराजमान है। असम व नागालैंड: गुवाहाटी और डिमापुर में 20वीं सदी के उत्तरार्ध में प्रवासी जैन समुदायों द्वारा निर्मित मंदिरों में नंदीश्वर जिनालय स्थापित हैं। जैन धर्मशास्त्रों के अनुसार वास्तविक नंदीश्वर द्वीप मध्यलोक में है। पृथ्वी पर भारत से बाहर ऐतिहासिक प्राचीन साम्राज्यों द्वारा पृथक नंदीश्वर मंदिरों का निर्माण दर्ज नहीं है, परंतु 20वीं और 21वीं सदी में प्रवासी भारतीय जैन संघों  द्वारा वैश्विक स्तर पर प्रतिकृति जिनालय एवं नंदीश्वर पट्ट स्थापित किए गए हैं: नेपाल: काठमांडू स्थित जैन भवन/मंदिर में 52 जिनालयों का नंदीश्वर पट्ट स्थापित है। संयुक्त राज्य अमेरिका में : 20वीं सदी के अंत और 21वीं सदी में प्रवासी भारतीय जैन समाज द्वारा 'सिद्धद्धांतम वर्ल्ड जैन सेंटर' (न्यू जर्सी) तथा विभिन्न जैन सेंटर्स (जैसे शिकागो, लॉस एंजिल्स) में 52 जिनालयों की पट्टिकाएँ और नंदीश्वर जिनालय स्थापित किए गए। यूनाइटेड किंगडम : लेस्टर  जैन मंदिर में संगमरमर और धातु पर उकेरी गई नंदीश्वर द्वीप की भव्य प्रतिकृति विराजमान है।
भारतीय संस्कृति की जननी धारा जहाँ सौर, शाक्त, ब्रह्म, शैव, वैष्णव, और वैदिक ज्ञान-परंपरा से पोषित हुई है, वहीं जैन दर्शन ने इसमें आत्म-विशुद्धि, अहिंसा और लोक-भूगोल की अद्वितीय वैज्ञानिक व आध्यात्मिक चेतना जोड़ी है। नंदीश्वर द्वीप और उसके 52 अकृत्रिम चैत्यालय जैन धर्मावलंबियों के लिए निष्काम भक्ति, वीतरागता और परम शांति के प्रतीक हैं। चूँकि मनुष्य भौतिक रूप से इस अलौकिक द्वीप तक नहीं पहुँच सकता, इसलिए भारत के प्राचीन राजवंशों (राष्ट्रकूट, चालुक्य, सोलंकी, बुंदेला, राजपूत) से लेकर आधुनिक काल के प्रवासी भारतीय जैन संघों तक ने पत्थरों, संगमरमर, काँच और धातुओं पर इसकी भव्य प्रतिकृतियाँ निर्मित की हैं। ये निर्माण श्रद्धालुओं को घर बैठे ही अष्टाह्निका पर्व पर नंदीश्वर द्वीप की भाव-वंदना करने का सुअवसर प्रदान करते हैं।

गुरु पूर्णिमा और व्यास अवतरण

: भारतीय संस्कृति में ज्ञान-परंपरा और गुरु पूर्णिमा
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
भारतीय संस्कृति मूलतः ज्ञान, साधना, त्याग और कृतज्ञता की संस्कृति है। विश्व के इतिहास में भारत को 'जगद्गुरु' की उपाधि से अलंकृत किया गया, तो उसका मूल आधार यहाँ की सुदृढ़ और अक्षुण्ण 'गुरु-शिष्य परंपरा' ही थी। सनातन वाङ्मय में गुरु को केवल एक शिक्षक या सूचनादाता नहीं, बल्कि अज्ञान के तिमिर को मिटाकर ज्ञान के अनंत आलोक से साक्षात्कार कराने वाला साक्षात ब्रह्म का रूप माना गया है।
शास्त्रों में गुरु शब्द की सुंदर और गंभीर व्याख्या प्रस्तुत करते हुए कहा गया है:
'गु'कारस्त्वन्धकारस्तु 'रु'कारस्तन्निरोधकृत्।
अन्धकारविनाशित्वात् गुरुन्नित्यभिधीयते॥
अर्थात्, 'गु' का अर्थ अज्ञान रूपी अंधकार है और 'रु' का अर्थ उसे रोकने वाला अथवा नष्ट करने वाला ज्ञान का प्रकाश है। जो अज्ञान के तिमिर को ज्ञान के आलोक से मिटा दे, वही 'गुरु' है। भारतीय पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि इसी ज्ञान-परंपरा के उत्सव का पावन दिवस है। यह तिथि जहाँ प्रथम वेद-विभाजक, अठारह पुराणों के रचयिता और महाभारत के प्रणेता महर्षि कृष्ण द्वैपायन (वेदव्यास) का प्राकट्य दिवस है, वहीं यह समग्र गुरु-परंपरा के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का महापर्व 'गुरु पूर्णिमा' या 'व्यास पूर्णिमा' भी है।
. आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा: महर्षि वेदव्यास का प्राकट्य एवं व्यास-परंपरा - महर्षि कृष्ण द्वैपायन (वेदव्यास) का प्राकट्य एवं योगदान और आर्ष ग्रंथों के अनुसार, आषाढ़ पूर्णिमा के शुभ दिन महर्षि पराशर और माता सत्यवती के योग से यमुना नदी के तट पर महर्षि कृष्ण द्वैपायन का जन्म हुआ। यमुना नदी के एक द्वीप (द्वैप) पर प्राकट्य होने के कारण इनका नाम 'द्वैपायन' पड़ा। इनका वर्ण श्याम (सांवला) था, इसलिए इन्हें 'कृष्ण' कहा गया।
कालान्तर में, जब इन्होंने अनंत वेद-राशि को जन-सामान्य के बोध हेतु चार भागों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद) में व्यवस्थित व विभाजित (विभाजन/व्यास) किया, तब ये 'वेदव्यास' के नाम से लोक में विख्यात हुए।
स्कंद पुराण और ब्रह्मांड पुराण के अनुसार, इनका जन्म स्थान प्राचीन मत्स्यगंधापुर (वर्तमान उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में कालपी के निकट यमुना तट पर स्थित 'व्यास टीला') माना जाता है। इसके अतिरिक्त, काशी (वाराणसी), कुरुक्षेत्र और बद्रीनाथ के समीप माणा गाँव स्थित 'व्यास गुफा' इनके दीर्घ तप और रचना-कर्म के साक्षी रहे हैं। इन्होंने न केवल वेदों का संकलन किया, बल्कि ब्रह्मसूत्रों, अठारह पुराणों, श्रीमद्भागवत कथा और 'पंचम वेद' के रूप में प्रसिद्ध 'महाभारत' की रचना करके सनातन ज्ञान की अचल नीव रखी।
भारतीय सनातन परंपरा में 'व्यास' केवल एक व्यक्ति का नाम नहीं, बल्कि ज्ञान की एक पीठ (उपाधि) है। विष्णु पुराण तथा देवी भागवत पुराण के अनुसार, प्रत्येक द्वापर युग में वेदांगों के संरक्षण हेतु ज्ञान-पुरुष अवतरित होते हैं, जिन्हें 'व्यास' कहा जाता है। अब तक २८ द्वापर युग व्यतीत हो चुके हैं और उनके २८ व्यास इस प्रकार हैं:
स्वयंभू (ब्रह्मा) , प्रजापति , उशना (शुक्राचार्य) ,बृहस्पति।, सविता (सूर्य) , मृत्यु (यमराज), इन्द्र ,वशिष्ठ, सारस्वत
त्रिधामा , त्रिशिख ,भरद्वाज ,अन्तरिक्ष ,वर्णि।,त्रय्यारुण , धनंजय , क्रतुंजय ,जय , गौतमी , हर्यत्मा , वाजश्रवा , तृणबिन्दु ,ऋक्ष (ऋष्यश्रृंग) , शक्ति (वशिष्ठ पुत्र) , पराशर ,जातूकर्ण्य , देव (देव गुरु)   , कृष्ण द्वैपायन (वर्तमान द्वापर के २८वें वेदव्यास) आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा का दिन इन सभी २८ व्यासों की निरंतर चलती आर्ष ज्ञान-श्रृंखला को नमन करने का दिन है । 
गुरु पूर्णिमा के प्राकट्य और उत्सव के पीछे भारत की विविध आध्यात्मिक धाराओं (वैदिक, योग, बौद्ध और जैन) का अद्भुत संगम है: वैदिक एवं आर्ष परंपरा (व्यास पूजन का प्रारंभ) - किसने प्रारंभ किया: महर्षि वेदव्यास के चार मुख्य शिष्यों—सुमन्तु, जैमिनी, पैल और वैशम्पायन तथा उनके पुत्र महर्षि शुकदेव जी ने। जब वेदव्यास जी ने चारों वेदों का संकलन पूर्ण कर अपने शिष्यों को संपूर्ण वैदिक ज्ञान का उपदेश दिया, तब शिष्यों ने आषाढ़ पूर्णिमा के दिन अपने परम गुरु का चरण-पूजन किया और गुरु-दक्षिणा अर्पित की। उसी ऐतिहासिक दिन से इसे 'व्यास पूर्णिमा' या 'गुरु पूर्णिमा' के रूप में मनाया जाने लगा।
योग परंपरा (आदिगुरु शिव का प्रथम उपदेश)-  भगवान शिव योगिक मान्यता के अनुसार, आषाढ़ पूर्णिमा के दिन ही केदारनाथ के समीप स्थित कांतिसरोवर के तट पर भगवान शिव ने स्वयं को 'आदिगुरु' के रूप में प्रकट किया था। उन्होंने संसार के प्रथम सात साधकों—सप्तऋषियों (कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भरद्वाज) को योग, ध्यान और ज्ञान का प्रथम उपदेश दिया। यही मानव इतिहास में गुरु-शिष्य संबंध की पहली ऐतिहासिक घटना मानी जाती है।
 भगवान बुद्ध एवं उनके प्रथम पाँच भिक्षु शिष्यों ने बौद्ध धर्म में आषाढ़ पूर्णिमा को अत्यंत पवित्र माना जाता है। दिव्य बोधि (ज्ञान) प्राप्त करने के पश्चात् भगवान बुद्ध ने वाराणसी के समीप सारनाथ (ऋषिपतन) के मृगदाव में इसी दिन अपने प्रथम ५ शिष्यों को पहला उपदेश दिया था। इस घटना को 'धम्मचक्कप्पवत्तन' (धर्मचक्र प्रवर्तन) कहा जाता है। बौद्ध भिक्षु इसी तिथि से अपना ३ महीने का 'वर्षावास' भी प्रारंभ करते हैं।। जैन परंपरा के अनुसार, २४वें तीर्थंकर भगवान महावीर ने इसी आषाढ़ पूर्णिमा के दिन इंद्रभूति गौतम (गौतम स्वामी) को अपना प्रथम शिष्य स्वीकार किया था। इसके पश्चात् भगवान महावीर 'गुरु' के रूप में प्रतिष्ठित हुए और जैन शासन में गुरु-शिष्य परंपरा का औपचारिक शुभारंभ हुआ। . मन्वंतर काल से आधुनिक युग तक गुरु-शिष्य परंपरा का ऐतिहासिक अभ्युदय एवं साम्राज्यों का अवदान
भारत में गुरु-शिष्य परंपरा केवल एक व्यक्तिगत साधना नहीं थी, बल्कि यह संपूर्ण राष्ट्र और सभ्यता की जीवन-रेखा थी। प्राचीन काल से ही राजाओं द्वारा गुरुकुलों को स्वायत्तता दी जाती थी और कर-मुक्त भूमि (अग्रहार/ब्रह्मदेय) दान में दी जाती थी।।मन्वंतर काल से लेकर आधुनिक युग तक विभिन्न साम्राज्यों और राजवंशों ने इस परंपरा को जो संरक्षण और प्रोत्साहन दिया, उसका ऐतिहासिक विवरण नीचे दिया गया है:  वैदिक युग में राजा जनक (विदेह) और इक्ष्वाकु वंश के राजाओं ने ऋषियों के आश्रमों को सर्वोच्च राजकीय सम्मान दिया।।याज्ञवल्क्य, वशिष्ठ, विश्वामित्र और भारद्वाज जैसे आचार्यों के गुरुकुल राज्य के नियंत्रण से पूर्णतः मुक्त थे। राजा स्वयं ज्ञान प्राप्त करने हेतु ऋषियों की सभाओं में विनम्रतापूर्वक उपस्थित होते थे।
अवदान: मगध की ऐतिहासिक भूमि ने गुरु-शिष्य परंपरा को राजनीतिक और सांस्कृतिक शिखर पर पहुँचाया। आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त) और उनके शिष्य चंद्रगुप्त मौर्य का संबंध भारतीय इतिहास का सबसे प्रखर गुरु-शिष्य उदाहरण है। मौर्य साम्राज्य ने तक्षशिला जैसे प्राचीन शिक्षण संस्थानों को राजकीय संबल प्रदान किया। सम्राट अशोक ने अपने अभिलेखों में आचार्यों और गुरुजनों के प्रति सम्मान को 'धम्म' का प्रमुख अंग घोषित किया। अवदान: गुप्त राजवंश (चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, कुमारगुप्त आदि) का काल भारतीय शिक्षा और गुरु-शिष्य परंपरा का 'स्वर्ण युग' माना जाता है। सम्राट कुमारगुप्त के शासनकाल में प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय की नींव रखी गई। गुप्त राजाओं ने विद्वानों, ऋषियों और आचार्यों को 'अग्रहार' (कर-मुक्त गाँव) दान में दिए, जिससे गुरुकुल और पीठ बिना किसी आर्थिक दबाव के स्वतंत्र रूप से संचालित हो सकें। सम्राट हर्षवर्धन ने नालंदा विश्वविद्यालय को १०० से अधिक गाँवों का राजस्व समर्पित किया। यहाँ आचार्य शीलभद्र और ह्वेनसांग जैसे गुरु-शिष्य संबंधों के प्रामाणिक साक्ष्य मिलते हैं। इसके पश्चात् बिहार और बंगाल के पाल राजवंश (राजा धर्मपाल, देवपाल) ने विक्रमशिला, ओदंतपुरी और सोमपुर जैसे विशाल महाविहारों (विश्वविद्यालयों) की स्थापना की। यहाँ आचार्य अतीश दीपंकर जैसे महान आचार्यों ने हजारों स्वदेशी व विदेशी शिष्यों को शिक्षा दी।
 दक्षिण भारत के चोल और चालुक्य राजाओं ने 'घटिका' (विद्या केंद्र) और 'साला' (गुरुकुल) परंपरा को अत्यधिक प्रोत्साहित किया। मंदिरों से संबद्ध विद्यापीठों में वेदों, व्याकरण, गणित और शिल्प की शिक्षा दी जाती थी।।मध्यकाल में पुनर्जागरण: जब मध्यकाल में बाह्य आक्रमणों से उत्तर भारत के केंद्र प्रभावित हुए, तब दक्षिण में विजयनगर साम्राज्य का उदय हुआ। महर्षि विद्यारण्य (गुरु) के मार्गदर्शन में हरिहर और बुक्का ने विजयनगर की स्थापना की। इस साम्राज्य ने वेदों के भाष्यकार सायणाचार्य और उनके शिष्यों को संरक्षण देकर वैदिक गुरु-शिष्य परंपरा की रक्षा की। मन्वंतर व वैदिक काल में जनक (विदेह), इक्ष्वाकु वंश ऋषियों (याज्ञवल्क्य, वशिष्ठ) के आश्रमों को पूर्ण स्वायत्तता व सर्वोच्च सम्मान।मगध व मौर्य साम्राज्य चंद्रगुप्त मौर्य, सम्राट अशोक चाणक्य-चंद्रगुप्त परंपरा; तक्षशिला विद्यापीठ का संरक्षण व प्रोत्साहन।गुप्त साम्राज्य चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, कुमारगुप्त नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना; गुरुकुलों हेतु 'अग्रहार' दान।
पाल व वर्धन साम्राज्य सम्राट हर्ष, राजा धर्मपाल विक्रमशिला व ओदंतपुरी की स्थापना; अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परंपरा का प्रसार।चोल व विजयनगर साम्राज्य राजराज चोल, हरिहर-बुक्का 'घटिका' तंत्र; महर्षि विद्यारण्य व सायणाचार्य की वैदिक परंपरा का संरक्षण।आधुनिक काल (पुनर्जागरण) काशी, बड़ौदा रियासतें व समाज स्वामी दयानंद-विरजानंद, रामकृष्ण-विवेकानंद परंपरा द्वारा आर्ष ज्ञान का पुनरुद्धार।
भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा केवल सैद्धांतिक ज्ञान के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने समाज को नैतिक, सांस्कृतिक और समरसता के सूत्र में बाँधने का कार्य किया।।गुरुकुल में राजा का पुत्र हो या रंक का, सभी को एक समान धरातल पर रहकर शिक्षा ग्रहण करनी पड़ती थी। भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा का महर्षि सांदीपनि के आश्रम में एक साथ लकड़ी चुनना और अध्ययन करना इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि गुरु-शिष्य परंपरा ने समाज में समानता और समरसता की नींव रखी। गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से केवल वेद और उपनिषद ही नहीं, बल्कि स्थापत्य कला, मूर्तिकला, आयुर्वेद, संगीत, ज्योतिष और साहित्य का ज्ञान भी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित हुआ।
मगध और प्राकृत/पाली/अपभ्रंश की भूमियों पर आचार्यों ने क्षेत्रीय भाषाओं और लोक-साहित्य को समृद्ध किया। गुरुजनों ने शास्त्रों के गूढ़ ज्ञान को जन-भाषा (जैसे मगही, भोजपुरी, मैथिली, अंगिका आदि) में अनुवादित कर जन-सामान्य तक पहुँचाया। आज के आधुनिक, डिजिटल और सूचना-प्रौद्योगिकी के युग में जहाँ सूचनाओं का अंबार है, वहाँ 'ज्ञान' और 'विवेक' की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। इंटरनेट या कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) केवल 'सूचना' दे सकती है, परंतु उस सूचना को जीवन में कैसे ढालना है, उसका सही 'विवेक' (Wisdom) केवल एक जीवंत गुरु ही दे सकता है।
आज के समय में 'गुरु' का दायरा भी व्यापक हुआ है: प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षक: जो छात्र के चरित्र की नीव रखते हैं।।अध्यात्म व योग गुरु: जो मानसिक शांति और आत्म-साक्षात्कार का मार्ग दिखाते हैं।कला व संगीत के उस्ताद/आचार्य: जो भारतीय संस्कृति की कलात्मक विधाओं को जीवित रखते हैं। वैज्ञानिक व शोध मार्गदर्शक: जो नवीन अनुसंधान द्वारा मानव जाति के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं। आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा केवल एक तिथि या कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण भारतीय सभ्यता के ज्ञान-यज्ञ का उत्सव है। महर्षि वेदव्यास के प्राकट्य से आरंभ हुई यह अविरल ज्ञान-सरिता युगों-युगों से भारत की चेतना को सिंचित करती आ रही है। मन्वंतर के प्राचीन आश्रमों से लेकर मौर्य, गुप्त, चोल और विजयनगर के महान साम्राज्यों ने इस बात को सिद्ध किया कि जिस राष्ट्र में ज्ञान और गुरु का सम्मान होता है, वही राष्ट्र विश्व-मंच पर अमर रहता है। गुरु पूर्णिमा का यह पावन पर्व हमें अपने अहंकार का त्याग कर, कृतज्ञ भाव से अपने आचार्यों, गुरुओं और मार्गदर्शकों के चरणों में नतमस्तक होने तथा ज्ञान के उस शाश्वत आलोक को अपने जीवन में उतारने की अमर प्रेरणा देता है।

रविवार, जुलाई 26, 2026

नीलांचल की वादियां और शाक्त स्थल

यात्रा संस्मरण : नीलांचल की वादियां और शाक्त स्थल 
सत्येंद्र कुमार पाठक 
नीलांचल  पर्वतमाला की वादियों में बसे प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण पावन ब्रह्मपुत्र नदी की  धरा असम राज्य का गुवाहाटी के कामख्या   में 9 जुलाई से 14 जुलाई 2023 तक असम की प्रकृति, संस्कृति, रहन सहन, वेशभूषा, कृषि, पर्यटन एवं धर्म सम्बंधी अनेक जानकारी हमें प्राप्त हुआ । . कामख्या  सांवैधानिक एवं पुरातन  दृष्टि से शक्तिपीठ  है ।  कामख्या  का प्रधान, निशान व विधान , रहन-सहन, बोली-भाषा और वेशभूषा और उपासना स्थल मनमोहक है ।
 नीलांचल  की गोद में बसा गुवाहाटी और कामाख्या  अपनी प्राचीन संस्कृति के लिए जाना जाता है और अपनी प्राकृतिक सुन्दरता  के कारण  पर्यटकों की पसंदीदा जगह है । असम कृषि प्रधान राज्य  की मुख्य फसल धान व मक्का और चाय  है । 9 जुलाई 2023 को रात्रि 8:  .00 बजे जहानाबाद रेलवे स्टेशन रेलगाड़ी द्वारा पटना राजेन्द्र नगर टर्मिनल जक्शन 11 : 00 रात्रि पहुँचा था । राजेंद्र नगर टर्मिनल पटना रेलवे स्टेशन से  रात्रि 11: 15 बजे 13248 कामख्या कैपिटल एक्सप्रेस   रेलगाड़ी द्वारा फतुहा ,वख्तियापुर ,न्यू बरौनी ,खगड़िया ,मानसी ,काढ़ागोला , कटिहार ,बारसोई ,सिलीगुड़ी न्यूमाल होते हुए 953 किमि दूरी तय करते हुए  कामख्या रेलवेस्टेशन कामाख्या पर 10 जुलाई 2023 को  रात्रि  10 : 30 बजे मैं  कामख्या रेलवेस्टेशन पंहुंच गया था । असम की वादियों में चाय बागान एवं कसैली के वृक्ष देखने मे अच्छा लगा । मेरे साथ पंजाब नेशनल बैंक के सेवानिवृत्त पदाधिकारी सत्येंद्र कुमार मिश्र थे ।   हम लोग रात्रि 11 बजे कामख्या रेलवेस्टेशन के रेस्टोरेंट में पहुंच कर खाना खाया बाद में कामख्या रेलवेस्टेशन स्टेशन के यात्री ठहराव के लिए होटल में जगह नहीं रहने के कारण स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर रातें गुजारनी पड़ी थी । कामाख्या स्टेशन से 11 जुलाई 2023 को  4 : 50 सुबह स्टेशन परिसर  से  6 किमि दूरी तय करने के लिए चार पहिया वाहन के माध्यम से कामख्या पहुँच गया था । कामाख्या के बंगले रोड का काका होटल में एक हजार रुपए प्रतिदिन की दर से हम सबके ठहरने के लिए व्यवस्था की गयी थी ।  होटल के कमरे में सामान रखकर सभी ने लगभग सुबह 7 .00 बजे स्नान ध्यान किया । गुवाहाटी के मेरे मित्र  महेशनाथ द्वारा  कामख्या मंदिर से मोबाइल द्वारा खबर दिया गया कि महेशनाथ इंतजार कर रहे हैं । मै और मिश्र जी  के साथ 11 जुलाई को  कामख्या माता के दर्शन एवं मंदिर के बाहर बाजार की रौनक देखने निकल गया । दूकान में कामख्या माता  की  चुनरी , धूपबत्ती , नारियल , अन्य पूजा सामग्री  लिया । दुकानदार एवं कामख्या के निवासी  हिंदी अच्छी तरह समझते  तथा बोलते   है । कामख्या निवासी असमिया और बांग्ला भाषा का प्रयोग करते है । हम मिश्र जी और महेशनाथ 8 बजे समय पर कामख्या मंदिर के कई सीढियां पार करते हुए नारियल फोड़ा , धूपबत्ती जलाया ,  कामख्या मंदिर के गर्भगृह में पहुँच कर माता का दर्शन किया । माता का दर्शन करने के पश्चात कामख्या मंदिर की परिक्रमा करने के बाद बलि स्थल , बाजरंगबली , यज्ञकुंड , माता तारा , माता छिन्नमस्ता का दर्शन किया । मंदिर परिसर में माता कामख्या को अर्पित कबूतर , बकरी एवं खस्सी , बकरे पर नजर पड़े थे । कामख्या मंदिर परिसर में मैं , मिश्र जी और महेशनाथ द्वारा मिश्र द्वारा लिखित दुर्गासप्तशती का पद्यानुवाद का लोकार्पण किया गया था । 11 जुलाई को 2 बजे भोजनालय में तीनों मिलकर खाना खाने के बाद अपने विश्राम स्थल पर आ गया था । होटल में विश्राम करने के बाद संध्या 6 बजे माता कामख्या का दर्शन एवं भोजनालय में भोजन कर 9 बजे रात्रि में होटल आए रात्रि में विश्राम किया । माता कामख्या का 12 जुलाई को 8 बजे सुबह में   कामाख्या स्थित कामेश्वर मंदिर  के गर्भगृह में स्थापित बाबा कमेश्वरनाथ का दर्शन कर माता कामख्या   दर्शन कर की पूरी परिक्रमा की । मैं और मिश्र जी  ने घूम-घूम कर अपने अपने मोबाइल में इस दृश्य को कैद किया ।  कामख्या की  सड़कों पर घूमते हुये जगह जगह हमें  मंदिर एवं कई तरह के रुद्राक्ष , कसैली फल , काली हल्दी , मृगमरीचिका , दुकानें देखने का अवसर मिला था । सड़के साफ स्तर थे । 12 जुलाई को बगलामुखी मंदिर , भुवनेश्वरी मंदिर , उमानंद मंदिर , भैरवी मंदिर के दर्शन का कार्यक्रम बना था । मिश्र जी का एकादशी होने के कारण  उपवास था । मैं , मिश्र जी एवं महेशनाथ   सुबह 10:30 बजे  बस द्वारा उमानाथ मंदिर के लिए रवाना हुए । ब्रह्मपुत्र नदी के मध्य स्थित  उमानंद मंदिर  जाने का यातायात साधन जहाज था । ब्रह्मपुत्र नदी में जल का तीब्र बहाव के कारण जहाज मार्ग  अवरुद्ध था । रोपवे द्वारा उमानंद मंदिर का दर्शन किया । लेकिन वहां पहुंचने में हमें दो   घंटे लग गये. रास्ते भर हरे-भरे पेड़ पौधों से घिरे पहाड़ियों को निहारते  रहे.  ऐसा लग रहा था मानो  पूरा कामख्या नीलांचल  पर्वत  में बसा है । नीलांचल  पर्वत की ऊंचाइयों में दूर-दूर तक एक एक, दो-दो घर दृष्टिगोचर हुये. पहाड़ी के बीच बीच में छोटे छोटे खेत बनाये गये है, 100-200 वर्ग फीट के  खेत दिखाई दिये. जहां जगह मिली लोगों ने थोड़ा  समतल कर खेत बना लिया  है । . वहां के किसान कहीं कहीं धान की कटाई कर रहे थे  तो कहीं धान की रोपाई . यानी धान की कटाई और रोपाई का काम साथ-साथ चल रहा था. कुछ खेतों में भुट्टे के पौधे  दिखाई दिये.  भुट्टे के पौधों की ऊंचाई 4-5 फीट की हो गई थी.पहाड़ी की ऊपरी सतह से निकलने वाले झरने के  पानी को छोटी-छोटी नालियां बनाकर खेतों में सिचाई की व्यवस्था  की गई  है ।   ब्रह्मपुत्र  नदी में अच्छा खासा पानी था ।  मैं , मिश्र जी एवं महेशनाथ ने बगलामुखी मंदिर के गर्भगृह में स्थित माता बगला गुफा , अन्य तंत्र साधना स्थल का दर्शन और वगुला को देखा । मिश्र जी ने थकावट महसूस करने के बाद वे विश्राम करने होटल चले गए थे । मैं और महेशनाथ ने नीलांचल पर्वत पर न8निर्मित प्राचीन शाक्त स्थल का परिभ्रमण के दौरान ब्रह्मपुत्र नदी , भुवनेश्वरी मंदिर के गर्भगृह में स्थित माता भुवनेश्वरी की उपासना और दर्शन किया । माता भुवनेश्वरी के दर्शन करने के बाद माता भैरवी मंदिर का दर्शन एवं भैरवी कुंड का दर्शन किया था । भैरवी कुंड में मछलियां , कछुए एवं बत्तक तैर रहे थे । दर्शनार्थी द्वारा भैरवी कुंड में स्थित मछलियों , कछुओं और बत्तकों को गुथे हुए आटे , चावल के दाने दे रहे थे । यहाँ अजीव जैसा लगा कि जिस किसी को दाना दिया जता उसे दूसरे जीव शामिल नही होते थे । भैरवी कुंड में रहने वाले जीव में आत्मसम्मान था । माता कामख्या मंदिर का परिक्रमा करने के बाद सौभाग्य कुंड का दर्शन एवं जल पिया ।  सौभाग्य कुंड के दर्शन करने के बाद सौभाग्य मंडप में विश्राम के दौरान चाय पिया । माता छिन्नमस्ता मंदिर परिसर में खिचड़ी और खीर का प्रसाद ग्रहण किया था ।  12 जुलाई को 6 बजे संध्या बस द्वारा  गुवाहाटी में भिन्न भिन्न स्थलों और हवाई अड्डे एवं महेशनाथ जी के घर पहुँचा । महेशनाथ जी का परिवार में उनकी पत्नी एवं पुत्री से बातें हुईं । मुझे उनके परिवार द्वारा अंगवस्त्र , कसैली का फल एवं पैन के पत्तों द्वारा सम्मानित किया गया । वहाँ पर नास्ते एवं चाय पीने के बाद 9 बजे कामख्या विश्राम स्थल आ गए । साथ मे महेशनाथ जी थे । 13 जुलाई को तांत्रिक संत एवं मां बगलामुखी के साधक माई महाराज द्वारा मुझे बगलामुखी यंत्र दे कर सम्मानित किया तथा मिश्र जी द्वारा द्वयपायन पुस्तक महाराज जी को समर्पित किया गया । जीवन का अत्यंत   अदभूत छन था  जब हम नीलांचल  के सर्वोच्च शिखर एवं शाक्त सम्प्रदाय के विभिन्न स्थलों एवं ब्रह्मपुत्र नदी की यात्रा पूरी हो चुकी थी । , अब हमें सीधे आनंद विहार ट्रैन  पकड़ना था ।  कामख्या से  दोपहर  12 : 45  बजे पाटलिपुत्र  के लिए ट्रेन  थी । मै और मिश्र जी माता कामख्या का दर्शन कर बिना भोजन किये ट्रेन  में बैठ गए .।  13 जुलाई को कामख्या स्टेशन से 12 : 40 दोपहर में 12505 उत्तरपूर्व एक्सप्रेस द्वारा रंगिया ,बरपेटा ,न्यू बंगाईगाँव ,कोकराझार ,न्यू कोच बिहार ,न्यू जलपाईगुड़ी , , बारसोई होते हुए 14 जुलाई को 873 किमि दूरी तय करने के बाद सुबह 5 : 35 बजे पाटलिपुत्र जंक्शन पहुँचा । पाटलिपुत्र जंक्शन से तिनपहिया वहां से पटना जंक्शन आकर शताब्दी ट्रेन से सुबह 8 बजे जहानबाद पहुँचा था । नीलांचल पर्वत की वादियाँ एवं ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर बसे घर एवं ब्रह्मपुत्र नदी में में स्थित  पहाड़ियाँ मनमोहक लग रहा था ।

गुरुवार, जुलाई 23, 2026

भारतीय शिक्षा।

 भारतीय शिक्षा का नव-उत्थान: राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
राष्ट्र निर्माण और शिक्षा की नई दिशा में शिक्षा केवल अक्षर ज्ञान, डिग्रियों के संग्रहण या आजीविका अर्जित करने का सीमित माध्यम नहीं है; यह किसी भी राष्ट्र की चेतना, उसके सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सामाजिक-आर्थिक स्वावलंबन का मूल आधार होती है। भारत जैसे विविध, बहुसांस्कृतिक और विशाल जनसंख्या वाले देश में शिक्षा नीति केवल एक प्रशासनिक ढांचा नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ी के निर्माण की रूपरेखा होती है।
21वीं सदी अभूतपूर्व परिवर्तनों की सदी है। एक ओर जहाँ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ,  ऑटोमेशन, डेटा साइंस और त्वरित तकनीकी विकास ने वैश्विक कार्य-संस्कृति को बदल दिया है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक चुनौतियों (जैसे जलवायु परिवर्तन, नैतिक संकट और मानसिक स्वास्थ्य) से निपटने के लिए मानवीय मूल्यों की आवश्यकता रेखांकित हुई है। ऐसे दौर में भारत के सामने यह दोहरी चुनौती थी कि वह अपनी सदियों पुरानी सांस्कृतिक और नैतिक जड़ों को भी सुरक्षित रखे और अपने युवाओं को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के योग्य भी बनाए।
29 जुलाई 2020 को घोषित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इसी वैश्विक और राष्ट्रीय आवश्यकता का ऐतिहासिक उत्तर है। लगभग तीन दशकों (1986 की शिक्षा नीति) के लंबे अंतराल के बाद आई यह नीति भारतीय शिक्षा व्यवस्था को 'रटने की पुरानी पद्धति' से मुक्त कर अनुभवात्मक, कौशल-आधारित, बहु-विषयक और समावेशी दृष्टिकोण की ओर ले जाती है।
: गुरुकुल परंपरा से मैकाले कालीन क्षरण तक भारतीय शिक्षा के नवीन दृष्टिकोण के महत्त्व को पूरी तरह समझने के लिए इसके ऐतिहासिक विकासक्रम को तीन प्रमुख कालखंडों में देखना आवश्यक है। प्राचीन गुरुकुल युग  में चरित्र निर्माण एन ई, अनुभव पी 2020 , चरित्र निर्माण मूल्य नवाचार , अनुभवात्मक व मौखिक, लिखित अभ्यास , तकनिक , और प्राचीन मूल्य , स्वावलंबी  व प्रकृति से जुड़ाव लक्ष्य था । औपनिवेशिक/मैकाले दौर में  परीक्षा व अंक केंद्रित सोच , रटने की पद्धति , लिपिक तैयार करने की सोच और वैश्विक ज्ञान महाशक्ति का लक्ष्य और नवीन दृष्टिकोण (NEP 2020) में कौशल , अनुभवात्मक ज्ञान व आधुनिक  स्वावलंबी का लक्ष्य निर्धारित है। 
 प्राचीन भारत में शिक्षा का मुख्य ध्येय था— “सा विद्या या विमुक्तये” (अर्थात शिक्षा वही है जो अज्ञानता, संकीर्णता और मानसिक दासता से मुक्ति दिलाए)। ज्ञान संस्कृति और नैतिक संस्कृति का  प्राचीन गुरुकुलों में ज्ञान केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं था। वहाँ गुरु और शिष्य के बीच संवाद, शास्त्रार्थ और व्यवहार का गहन संबंध था। गणित, खगोलशास्त्र (आर्यभट्ट, वराहमिहिर), आयुर्वेद (चरक, सुश्रुत), दर्शन, योग और स्थापत्य कला के साथ-साथ नैतिक मूल्यों, पर्यावरण-चेतना और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की शिक्षा दी जाती थी।
मौखिक व लिखित परंपरा का संतुलन के लिए गुरुकुलों में श्रुति और स्मृति के माध्यम से स्मरण शक्ति और चिंतन क्षमता का विकास किया जाता था, जिसके बाद लिखित ग्रंथों का गहन अध्ययन होता था। निजीकरण रहित सामाजिक दायित्व का प्राचीन भारत में आज की तरह निजी व्यावसायिक विद्यालय नहीं थे। गुरुकुल समाज और राजाओं के संरक्षण में चलते थे, जहाँ सभी वर्ग के योग्य विद्यार्थियों को समान शिक्षा और जीवन-कौशल सिखाए जाते थे।
औपनिवेशिक काल का प्रभाव और 'रटने की पद्धति' में 19वीं सदी में लॉर्ड मैकाले द्वारा लागू की गई शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य भारतीय संस्कृति को नीचा दिखाना और ब्रिटिश शासन के प्रशासनिक कार्यों के लिए लिपिक  क्लर्क तैयार करना था। इस व्यवस्था ने भारतीय युवाओं की मौलिक सोच और स्वतंत्र चिंतन को समाप्त कर दिया एवं सृजनात्मकता ह्रास है।  अंक-केंद्रित एवं परीक्षा-आधारित व्यवस्था: शिक्षा का मापदंड केवल परीक्षा में प्राप्त अंक बन गए। छात्र 'क्या सीखना है' के बजाय 'परीक्षा कैसे पास करनी है' पर केंद्रित हो गए, जिससे रटने की पद्धति हावी हो गई।
. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का मूल उद्देश्य भारत को एक वैश्विक ज्ञान महाशक्ति  बनाना है। यह नीति केवल इस बात पर ध्यान केंद्रित नहीं करती कि विद्यार्थियों को 'क्या पढ़ना है', बल्कि इस बात पर बल देती है कि उन्हें 'कैसे सोचना है' और 'कैसे सीखना है'। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत प्रारंभिक स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा और डिजिटल एकीकरण तक क्रांतिकारी कदम उठाए गए हैं।
स्कूली शिक्षा के पुराने 10+2 ढांचे को पूरी तरह समाप्त कर बाल विकास की विभिन्न मनोवैज्ञानिक और शारीरिक अवस्थाओं के अनुसार 5+3+3+4 मॉडल लागू किया गया है ।फाउंडेशनल 3 वर्ष प्री-स्कूल + कक्षा 1-2 (आयु 3 से 8 वर्ष)खेल-कूद, गतिविधि-आधारित शिक्षण और बुनियादी साक्षरता व संख्याज्ञान (FLN) पर विशेष बल। प्रिपरेटरी कक्षा 3 से 5 (आयु 8 से 11 वर्ष)अनुभवात्मक शिक्षण, खेल और गतिविधियों के माध्यम से भाषा और गणितीय सोच का विकास। मिडिल कक्षा 6 से 8 (आयु 11 से 14 वर्ष)विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान में अमूर्त अवधारणाओं का परिचय और वोकेशनल (व्यावसायिक) स्किल्स।
सेकेंडरी कक्षा 9 से 12 (आयु 14 से 18 वर्ष)गंभीर चिंतन ,  लचीलापन, विषयों का स्वतंत्र चयन और बोर्ड परीक्षाओं के तनाव में कमी। पारंपरिक शिक्षा प्रणाली में कला , विज्ञान  और वाणिज्य के बीच जो कठोर विभाजन था, उसे समाप्त कर दिया गया है। अब यदि कोई छात्र भौतिक विज्ञान  पढ़ना चाहता है, तो वह उसके साथ संगीत, चित्रकला, इतिहास या अर्थशास्त्र भी चुन सकता है। संतुलित मस्तिष्क विकास की  व्यवस्था विद्यार्थी के विश्लेषणात्मक (Left Brain) और रचनात्मक (Right Brain) दोनों पहलुओं का संतुलित विकास सुनिश्चित करती है। उच्च शिक्षा में ड्रॉप-आउट दर को कम करने और छात्रों के समय/संसाधनों की सुरक्षा के लिए यह एक दूरदर्शी कदम है । 
1 वर्ष पूरा करने पर: प्रमाण पत्र , 2 वर्ष पूरा करने पर: एडवांस डिप्लोमा , 3 वर्ष पूरा करने पर: स्नातक डिग्री , 
4 वर्ष पूरा करने पर: शोध के साथ स्नातक , छात्रों के क्रेडिट्स 'एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट' में डिजिटल रूप से सुरक्षित रहते हैं, जिससे वे अपनी इच्छानुसार ब्रेक लेकर भविष्य में कहीं से भी अपनी शिक्षा पुनः शुरू कर सकते हैं। व्यवसायिक शिक्षा  को मुख्य पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया गया है। कक्षा 6 से कोडिंग व वोकेशनल ट्रेनिंग: विद्यार्थियों को शुरुआती उम्र में ही कोडिंग, रोबोटिक्स, कारपेंटरी, बागवानी और वित्तीय साक्षरता जैसे व्यावहारिक कौशल सिखाए जा रहे हैं। 10 दिनों का 'बैगलेस पीरियड' के दौरान विद्यार्थी स्थानीय कारीगरों, शिल्पकारों, वैज्ञानिकों और व्यवसायियों के साथ प्रत्यक्ष कार्य अनुभव  प्राप्त करते हैं।
भारतीय ज्ञान प्रणाली में शिक्षा को देश की जड़ों से जोड़ने के लिए प्राचीन और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक संदर्भों के साथ शामिल किया गया है: आयुर्वेद, योग, प्राचीन भारतीय गणित, पर्यावरण संरक्षण और साहित्य का अध्ययन शामिल किया गया है।  मातृभाषा में शिक्षा में  प्राथमिक स्तर (कक्षा 5 तक) शिक्षा का माध्यम मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा रखने पर विशेष बल दिया गया है, क्योंकि शोध सिद्ध करते हैं कि बच्चे अपनी मातृभाषा में अवधारणाओं को अधिक सरलता और गहराई से समझते हैं।
डिजिटल एकीकरण और आधुनिक तकनीक में अपार आईडी  प्रत्येक विद्यार्थी की एक एकीकृत डिजिटल पहचान  जिससे उसके सभी शैक्षणिक रिकॉर्ड, क्रेडिट्स और प्रमाण पत्र एक स्थान पर सुरक्षित रहते हैं।ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स में राष्ट्रीय पोर्टल के माध्यम से देश के दूर-दराज के क्षेत्रों में भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है।
360-डिग्री समग्र प्रगति कार्ड केवल अंकों के स्थान पर विद्यार्थी के व्यवहार, सहपाठियों के फीडबैक ,  स्व-मूल्यांकन और शिक्षकों के अवलोकन के आधार पर रिपोर्ट कार्ड तैयार किया जा रहा है। तुलना का आधार में प्राचीन गुरुकुल प्रणालीपुराना (औपनिवेशिक/10+2) ढांचानवीन दृष्टिकोण (राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020)  मूल उद्देश्य में चरित्र निर्माण, आत्म-साक्षात्कारपरीक्षा उत्तीर्ण करना व रोजगारकौशल विकास, नवाचार व सर्वांगीण विकास शिक्षण विधिअनुभवात्मक, संवाद व चिंतनरटने की पद्धति (Rote Learning)अनुभवात्मक, गतिविधि व डिजिटल आधारित है।  विषय संरचनालचीला व जीवनोपयोगीकला/विज्ञान/वाणिज्य की कठोर सीमाबहु-विषयक व लचीला तकनीकमौखिक व ताड़पत्र/पांडुलिपिश्यामपट्ट व सीमित प्रयोगAI, डिजिटल प्लेटफॉर्म व अपार आईडी मूल्यांकनगुरु द्वारा सतत अवलोकनवार्षिक परीक्षा व अंक पत्र360-डिग्री समग्र प्रगति कार्ड
क्रियान्वयन की चुनौतियाँ और समाधान की दिशा - यद्यपि यह नवीन दृष्टिकोण अत्यंत दूरदर्शी और क्रांतिकारी है, परंतु 1.4 अरब की आबादी वाले विविध भारत में इसके सफल क्रियान्वयन के लिए कुछ प्रमुख चुनौतियों का समाधान आवश्यक है:व्यापक शिक्षक प्रशिक्षण: रटने की पुरानी परिपाटी से हटकर अनुभवात्मक और कौशल-आधारित शिक्षण देने के लिए लाखों शिक्षकों को निरंतर प्रशिक्षित करना। डिजिटल विभाजन  को कम करना: ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में हाई-स्पीड इंटरनेट, कंप्यूटर और डिजिटल उपकरणों की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करना। वित्तपोषण एवं बुनियादी ढांचा का : शिक्षा क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं,आधुनिक प्रयोगशालाओं और वोकेशनल सेंटर्स के निर्माण के लिए जीडीपी का 6% व्यय करने के लक्ष्य को प्राप्त करना है ।
भारतीय शिक्षा का नवीन दृष्टिकोण केवल एक नीतिगत दस्तावेज या प्रशासनिक फेरबदल नहीं है; यह भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण और 21वीं सदी के तकनीकी उत्थान का महासंगम है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 प्राचीन गुरुकुल परंपरा के नैतिक, ज्ञान और जीवन-मूल्यों तथा आधुनिक युग की डिजिटल तकनीक, एआई और कौशल-आधारित आवश्यकताओं का एक अनूठा संतुलन प्रस्तुत करती है। रटने की संकीर्ण व्यवस्था से मुक्त होकर स्वतंत्र रूप से सोचना, समझना और सृजन करना ही इस नवीन दृष्टिकोण की आत्मा है। यह बदलाव हमारेka  युवाओं को केवल आजीविका कमाने के योग्य ही नहीं बनाएगा, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर, संवेदनशील, नवोन्मेषी और जिम्मेदार नागरिक बनाएगा, जो भारत को पुनः विश्व मंच पर 'विश्व गुरु' के रूप में स्थापित करने में अपनी केंद्रीय भूमिका निभाएंगे ।

 भारतीय राजनीति और ज्ञान परंपरा 
भारतीय राजनीति की जड़ें केवल आधुनिक औपनिवेशिक इतिहास, पश्चिमी अवधारणाओं या आजादी के बाद बने संवैधानिक ढाँचे तक ही सीमित नहीं हैं। इसका एक अत्यंत प्राचीन, समृद्ध और सुदृढ़ वैचारिक आधार है, जिसे 'भारतीय ज्ञान परंपरा' (Indian Knowledge Systems) के नाम से जाना जाता है। प्राचीन काल से ही भारत में राजनीति को केवल 'सत्ता प्राप्ति' या 'शासन चलाने का साधन' नहीं माना गया, बल्कि इसे समाज में व्यवस्था, धर्म, नीति और 'लोक-कल्याण' की स्थापना का सर्वोच्च माध्यम स्वीकार किया गया। प्राचीन विचारकों ने राजनीति को जीवन के अन्य अंगों से अलग करके नहीं देखा, बल्कि इसे नैतिक मूल्यों और मानवीय कर्तव्यों के साथ जोड़कर देखा। यह ज्ञान परंपरा हज़ारों वर्षों के अनुभव, चिंतन, संवाद और प्रयोगों का परिणाम है, जिसने भारत को न केवल सांस्कृतिक रूप से एकजुट रखा, बल्कि शासन व्यवस्था और न्यायशास्त्र के क्षेत्र में भी दुनिया को एक नई दृष्टि दी।
. 'राजधर्म' और लोक-कल्याण  - प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन का केंद्रीय दर्शन 'राजधर्म' की अवधारणा में निहित है। 'राजधर्म' का अर्थ राजा या शासक के वे नैतिक, सामाजिक और राजनीतिक कर्तव्य हैं, जिनका पालन करना शासन के संचालन के लिए अनिवार्य माना गया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र, वेद, उपनिषद, मनुस्मृति, शुक्रनीति तथा महाभारत (विशेषकर 'शांति पर्व') जैसे महान ग्रंथों में राजधर्म की विशद व्याख्या मिलती है। प्रजासुखे सुखं राज्ञः (प्रजा का कल्याण ही राजा का कल्याण है): , कौटिल्य ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ अर्थशास्त्र में राजा के कर्तव्यों को स्पष्ट करते हुए लिखा है:, "प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्। , नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्॥" अर्थात्, प्रजा के सुख में ही राजा का सुख निहित है और प्रजा के हित में ही उसका हित है। राजा का अपना कोई व्यक्तिगत प्रिय या अप्रिय नहीं होता; प्रजा को जो प्रिय और हितकर लगे, वही राजा के लिए भी हितकर है। यह विचार आधुनिक लोकतंत्र के 'जन कल्याणकारी राज्य' (Welfare State) की अवधारणा का मूल आधार है।
प्राचीन ग्रंथों में शासन और न्याय व्यवस्था को बनाए रखने के लिए 'दंडनीति' का विधान किया गया। दंडनीति का अर्थ केवल सजा देना नहीं था, बल्कि समाज में अराजकता (मात्स्यन्याय—जहाँ शक्तिशाली कमजोर को दबाता है) को समाप्त करना था। दंडनीति का प्राथमिक उद्देश्य समाज के हर वर्ग के लिए न्याय सुनिश्चित करना, दुर्बलों की रक्षा करना और नैतिक मूल्यों का संरक्षण करना था । 
प्रायः यह भ्रांति फैलाई जाती है कि लोकतंत्र या गणतांत्रिक व्यवस्था भारत के लिए एक पश्चिमी आयात है। परंतु भारतीय इतिहास और प्राचीन साहित्य इस बात के साक्षी हैं कि भारत में राजतंत्र के साथ-साथ गणतांत्रिक व्यवस्था की भी अत्यंत सुदृढ़ परंपरा रही है। वैदिक काल की संस्थाएं — 'सभा' और 'समिति': - वैदिक काल में राजा की निरंकुशता पर अंकुश लगाने के लिए और सामूहिक निर्णय लेने के लिए 'सभा' और 'समिति' जैसी लोकतांत्रिक संस्थाएं विद्यमान थीं। 'सभा' में समाज के वरिष्ठ एवं प्रबुद्ध लोग शामिल होते थे, जबकि 'समिति' आम जनमानस की प्रतिनिधि सभा होती थी। ऋग्वेद और अथर्ववेद में सामूहिक चिंतन और एकमत होकर निर्णय लेने के महत्व पर बल दिया गया है (समानो मन्त्रः समितिः समानी)।ईसा पूर्व छठी शताब्दी में भारत में वैशाली (लिच्छवि), शाक्य, मल्ल और कंबोज जैसे शक्तिशाली गणराज्य (गणसंघ) अस्तित्व में थे। वैशाली के लिच्छवि गणराज्य को विश्व का पहला गणतंत्र माना जाता है। यहाँ राजा का चुनाव जनता या प्रतिनिधियों द्वारा होता था। संस्थागारों  में मतदान, प्रस्ताव प्रस्तुत करने और बहस के माध्यम से निर्णय लेने की एक पूर्ण विकसित और पारदर्शी प्रक्रिया मौजूद थी। भगवान बुद्ध ने भी बौद्ध संघों की कार्यप्रणाली के लिए इन्हीं गणतांत्रिक नियमों को अपनाया था।
आधुनिक राष्ट्र-निर्माण और स्वतंत्रता संग्राम पर प्रभाव - भारतीय ज्ञान परंपरा की यह विचार-धारा केवल प्राचीन काल तक सीमित नहीं रही, बल्कि 19वीं और 20वीं शताब्दी के स्वतंत्रता संग्राम में यह राष्ट्रीय चेतना की सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरी। आधुनिक विचारकों ने भारतीय ज्ञान परंपरा के शाश्वत सिद्धांतों को आधुनिक राजनीतिक संघर्ष का आधार बनाया। महात्मा गांधी और सत्य-अहिंसा:महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन को केवल राजनीतिक अधिकार प्राप्त करने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे एक नैतिक आंदोलन बनाया। उन्होंने उपनिषदों, भगवद्गीता और जैन/बौद्ध परंपराओं से 'सत्य', 'अहिंसा' और 'अपरिग्रह' के सिद्धांतों को लिया और इन्हें सत्याग्रह तथा सविनय अवज्ञा जैसे राजनीतिक साधनों के रूप में ढाला। गांधीजी का 'रामराज्य' का विचार वास्तव में सर्वोदय और लोक-कल्याणकारी राजधर्म का ही आधुनिक रूप था।
सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्रीय चेतना में स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविंदो घोष, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और पंडित मदन मोहन मालवीय जैसे विचारकों ने भारतीय ज्ञान परंपरा का गहन अध्ययन किया। स्वामी विवेकानंद ने 'आत्मवत सर्वभूतेषु' (सभी जीवों में स्वयं को देखना) के विचार द्वारा भारत के युवाओं में आत्म-सम्मान और राष्ट्र-सेवा की भावना जगाई। अरविंदो घोष ने भारत को केवल एक भौगोलिक भू-भाग न मानकर एक 'जीवंत सांस्कृतिक इकाई' के रूप में रेखांकित किया।  आज के 21वीं सदी के परिदृश्य में, जहाँ पूरी दुनिया राजनीतिक नैतिकता के संकट, भ्रष्टाचार और शासन की जटिलताओं से जूझ रही है, भारतीय ज्ञान परंपरा अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है। आधुनिक सुशासन की अवधारणा में जिन बातों—पारदर्शिता, उत्तरदायित्व, जन-सहभागिता और न्याय—पर जोर दिया जाता है, वे सभी 'राजधर्म' और कौटिल्य के 'सप्तांग सिद्धांत' (राज्य के सात अंग) में पहले से ही समाहित हैं।
वर्तमान में, भारत सरकार का शिक्षा मंत्रालय 'भारतीय ज्ञान प्रणाली'  प्रभाग के माध्यम से इस समृद्ध विरासत को आधुनिक शिक्षा, अनुसंधान और नीति-निर्माण में एकीकृत करने का प्रयास कर रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति  2020 के तहत भी प्राचीन भारतीय चिंतन, राजनीति और अर्थशास्त्र को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जा रहा है, ताकि भावी पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़कर आधुनिक समस्याओं का समाधान खोज सके। भारतीय राजनीति और भारतीय ज्ञान परंपरा का संबंध आत्मा और शरीर के समान है। प्राचीन गणराज्यों की लोकतांत्रिक प्रक्रिया से लेकर महाभारत के राजधर्म और गांधीजी के सत्याग्रह तक—भारतीय राजनीतिक चिंतन हमेशा से मानवता, न्याय और नैतिक मूल्यों के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। आज जब भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में उभर रहा है, तो अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा के आलोक में आधुनिक राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था का संचालन करना न केवल भारत के लिए, बल्कि सम्पूर्ण विश्व कल्याण के लिए एक अनुकरणीय मार्ग सिद्ध हो सकता है।

मंगलवार, जुलाई 21, 2026

भारतीय परंपरा और पर्यावरण संस्कृति

 भारतीय परंपरा और आधुनिक समाज: जड़ों से शिखर तक 
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
भारत केवल एक भू-भाग या देश नहीं है, बल्कि यह एक निरंतर प्रवाहमान जीवंत सभ्यता है। भारतीय संस्कृति और परंपरा का इतिहास सहस्त्राब्दियों पुराना है। युग बदले, शासक बदले, और समय-समय पर भौगोलिक व राजनीतिक सीमाएं बदलीं, लेकिन भारतीय परंपरा की चेतना आज भी अक्षुण्ण है। २१वीं सदी में, जब वैश्विक दुनिया तेज़ी से बदल रही है, औद्योगिक क्रांति, वैश्वीकरण और डिजिटल युग ने हमारे जीवन को नए ढांचे में ढाल दिया है। ऐसे समय में एक सवाल उठना स्वाभाविक है—"क्या प्राचीन भारतीय परंपराएं आज के आधुनिक समाज में प्रासंगिक हैं, या ये केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित रह गई हैं?" वास्तविकता यह है कि भारतीय परंपरा और आधुनिक समाज के बीच का संबंध संघर्ष का नहीं, बल्कि एक अनोखे और सुंदर समन्वय का है। भारत की परंपरा कोई जड़ या पत्थर की लकीर नहीं है, बल्कि यह एक बहती हुई नदी की तरह है, जिसने समय-समय पर नई धाराओं और विचारों को अपने में समाहित किया है।
भारतीय परंपरा का आधार केवल कर्मकांड, रीति-रिवाज या धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं। इसके मूल में एक गहरा जीवन-दर्शन और मानवीय मूल्यों का ढांचा है, जिसने भारत को हमेशा एक सशक्त सामाजिक पहचान दी है:
वसुधैव कुटुंबकम (वैश्विक बंधुत्व): "अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुंबकम्॥" अर्थात 'यह मेरा है और यह पराया है, ऐसी सोच संकीर्ण मन वालों की होती है। उदार हृदय वालों के लिए तो संपूर्ण पृथ्वी ही एक परिवार है।' यह विचार भारतीय समाज की वैश्विक सौहार्द और समावेशिता की नींव है। भारतीय मनीषा ने जीवन को व्यवस्थित करने के लिए चार स्तंभ तय किए—धर्म (नैतिकता व कर्तव्य), अर्थ (भौतिक संसाधन), काम (इच्छाएं व सुख), और मोक्ष (आत्म-साक्षात्कार)। यह मॉडल सिखाता है कि धन और इच्छाएं गलत नहीं हैं, यदि वे धर्म और नीति के दायरे में हों। प्राचीन काल से ही भारत में वृक्षों, नदियों, पशुओं और पर्वतों की पूजा का विधान रहा है। यह केवल अंधविश्वास नहीं, बल्कि पर्यावरण के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने का वैज्ञानिक जीवन-मूल्य था। पाश्चात्य संस्कृति में जहां 'व्यक्तिवाद'  को प्राथमिकता दी जाती है, वहीं भारतीय परंपरा में 'सामूहिकता' और 'परिवार' को केंद्र में रखा जाता है।
यदि हम गहराई से विश्लेषण करें, तो पाएंगे कि आधुनिक समाज जिन चुनौतियों से जूझ रहा है, उनके समाधान के लिए वह पुनः भारतीय परंपराओं की ओर लौट रहा है। आज की आधुनिक जीवनशैली भौतिक रूप से जितनी समृद्ध है, मानसिक रूप से उतनी ही तनावग्रस्त है। ऐसे में प्राचीन भारतीय योग और ध्यान पूरे विश्व के लिए एक वरदान सिद्ध हुए हैं। पतंजलि के अष्टांग योग को आज दुनिया भर में मानसिक शांति, तनाव प्रबंधन और शारीरिक फिटनेस के लिए अपनाया जा रहा है। आयुर्वेद और सात्विक जीवनशैली को अब केवल पारंपरिक ज्ञान नहीं, बल्कि एक निवारक स्वास्थ्य प्रणाली के रूप में देखा जा रहा है। आधुनिक समाज में जो 'वेलनेस इंडस्ट्री'  उभर रही है, उसकी जड़ें प्राचीन भारत की जीवनशैली में ही हैं।
आधुनिकता ने शहरों का विस्तार किया और 'एकल परिवारों' का चलन बढ़ाया। इसके बावजूद, भारतीय समाज की यह खूबी है कि संकट के समय आज भी पूरा परिवार और रिश्तेदार एक साथ खड़े होते हैं। बुजुर्गों का आदर, बच्चों को पारंपरिक संस्कार देना, और दुखों को बांटना—ये ऐसे मूल्य हैं जो आधुनिक समाज को अवसाद और अकेलेपन  की भयावह समस्या से बचाते हैं। भारत के विविध त्योहार , दशहरा , दीपावली, होली, छठ , कर्मा , क्रिसमस , ईद, पोंगल, ओणम केवल धार्मिक गतिविधियां नहीं हैं, बल्कि ये सामाजिक समरसता, भाईचारे और आर्थिक चक्र को गति देने के महान साधन हैं।
आज पूरा विश्व 'जलवायु परिवर्तन'  के भयानक दौर से गुजर रहा है। पश्चिमी सभ्यता के अत्यधिक उपभोगवाद ने धरती के संसाधनों को सुखा दिया है। ऐसे समय में भारतीय परंपरा का 'अपरिग्रह' (ज़रूरत से ज़्यादा जमा न करना) और प्रकृति के प्रति आदर का भाव ही सतत विकास का रास्ता दिखाता है। भारतीय रसोई में स्थानीय व मौसमी खान-पान, कपड़ों में खादी व सूत का उपयोग, और प्राकृतिक संसाधनों का आदर आज के ईकोफ्रेंड ' आंदोलनों का मूल रूप हैं। परंपरा और आधुनिकता के बीच का द्वंद्व में परंपरा और आधुनिकता का मिलन हमेशा पूरी तरह सहज नहीं होता। कई स्तरों पर वैचारिक संघर्ष और मतभेद भी पैदा होते हैं । जाति व्यवस्था, रूढ़िवादिता और पदानुक्रम समतावाद, व्यक्तिगत योग्यता और समानता कुप्रथाओं का अंत और मानवीय मूल्यों की रक्षा , समाज और परिवार की इच्छा को प्राथमिकता अभिव्यक्ति, करियर और विवाह में व्यक्तिगत पसंद आपसी संवाद और अंतर-पीढ़ीगत सम्मान , सोच व दृष्टिकोण आस्था, रीति-रिवाज और अंधविश्वास वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तर्क और प्रश्न पूछने की छूट तार्किक परंपरा को अपनाना और अंधविश्वास को छोड़ना भारतीय परंपरा के नाम पर सदियों से चली आ रही जातिगत असमानता, दहेज प्रथा, लिंग-भेद और अंधविश्वास को आज का शिक्षित और आधुनिक समाज स्वीकार करने को तैयार नहीं है। आधुनिक शिक्षा ने लोगों को सवाल पूछने और इन बुराइयों के खिलाफ आवाज़ उठाने की शक्ति दी है। आधुनिक युवा वर्ग स्वतंत्रता, निजता और अपने जीवन के फैसले खुद लेने में विश्वास रखता है। वहीं, पुरानी पीढ़ी परंपरा और सामाजिक मर्यादाओं का हवाला देती है। इससे परिवारों में वैचारिक मतभेद देखने को मिलते हैं।
"परंपरा हमारी जड़ें हैं, और आधुनिकता हमारे पंख। यदि जड़ें काट दी जाएं तो पंख काम नहीं आएंगे, और यदि पंख न हों तो जड़ें हमें एक ही जगह बांधकर रख देंगी।" भविष्य के सशक्त समाज का निर्माण परंपरा और आधुनिकता में से किसी एक को चुनकर नहीं, बल्कि दोनों के विवेकपूर्ण समन्वय से ही संभव है।  हमें राजा राममोहन राय और स्वामी विवेकानंद जैसे समाज सुधारकों के विचारों पर चलना होगा। परंपरा का वह भाग जो संकीर्ण, अमानवीय और शोषणकारी है (जैसे जातिवाद व अंधविश्वास), उसे बिना झिझक त्याग देना चाहिए।
परंपरा से हमें 'सहानुभूति, नैतिकता, मानसिक ठहराव और पारिवारिक संबल' मिलना चाहिए, जबकि आधुनिकता से हमें 'वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तकनीकी उन्नति, समानता और मानवाधिकार' अपनाने चाहिए। भारतीय परंपरा और आधुनिक समाज एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। आधुनिकता यदि हमें गति, सुविधा और तकनीक प्रदान करती है, तो परंपरा हमें दिशा, अर्थ और आत्मिक संतुष्टि देती है। एक भारतवासी के रूप में हमारी सबसे बड़ी सफलता इसी बात में है कि हम चंद्रमा और मंगल तक पहुंचने की आधुनिक तकनीक भी विकसित करें, और साथ ही अपनी जड़ों, मानवीय संवेदनाओं और महान सांस्कृतिक मूल्यों को भी जीवंत रखें। यही संतुलन भारत को एक नई और सशक्त दिशा प्रदान करेगा।

 भारतीय ज्ञान परंपरा और पर्यावरण: संतुलन और सतत विकास
प्रकृति केवल मानव के जीवन का आधार ही नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक चेतना की आत्मा है। आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, पारिस्थितिक असंतुलन और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन जैसे गंभीर संकटों से जूझ रही है, तब समाधान की खोज में वैश्विक समुदाय की दृष्टि प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा की ओर टिकती है। वेदों, उपनिषदों, अरण्यकों और पुराणों में प्रकृति को किसी निर्जीव, यांत्रिक या केवल भोग्या वस्तु के रूप में नहीं, बल्कि ईश्वर के सजीव और चेतन स्वरूप में देखा गया है। आधुनिक पश्चिमी दृष्टिकोण जहाँ प्रकृति पर विजय प्राप्त करने और उसके असीमित दोहन को विकास की कुंजी मानता आया है, वहीं भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र प्रकृति के साथ 'सह-अस्तित्न , पूरकता' और 'संतुलन' बनाए रखना है। आज की आधुनिक शब्दावली में जिसे 'सतत विकास' कहा जाता है, वह भारतीय जीवन-शैली में सदियों से समाहित एक सहज विचार रहा है। 
भारतीय दर्शन की यह आधारभूत मान्यता है कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड और मानव शरीर एक ही संरचनात्मक सिद्धांतों से निर्मित हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा है:
"क्षिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम शरीरा॥"
सृष्टि का यह ढाँचा पाँच मूलभूत तत्वों (पंचमहाभूत) पर टिका हुआ है: पृथ्वी (क्षिति): धारक शक्ति, पोषण और धैर्य का प्रतीक। जल: जीवन का संवाहक और शुद्धता का स्रोत।।अग्नि (पावक): ऊर्जा, ताप और रूपांतरण का प्रतीक। वायु (समीर): प्राणशक्ति, जिसके बिना एक क्षण भी जीवन संभव नहीं। आकाश (गगन): विस्तार, शब्द और चेतना का माध्यम है। भारतीय ज्ञान परंपरा यह सिखाती है कि इन पाँचों तत्वों का परस्पर तालमेल ही प्रकृति का संतुलन बनाए रखता है। जब तक मनुष्य इन तत्वों का सम्मान करता है, तब तक सृष्टि में सुख और शांति बनी रहती है। ईशावास्योपनिषद का प्रसिद्ध मंत्र हमें यही संदेश देता है:
"ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥"
अर्थात्, इस जगत् में जो कुछ भी चेतन या अचेतन है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है। इसलिए इसका उपभोग त्यागपूर्वक (ज़रूरत के अनुसार) करो, लालच मत करो; क्योंकि धन और संसाधन किसी एक के नहीं हैं। यह श्लोक आधुनिक उपभोक्तावाद पर सीधा प्रहार करता है और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की प्रेरणा देता है।
प्रकृति का देवत्वीकरण और श्रद्धा भाव - भारतीय संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण को किसी बाहरी कानून या सरकारी दंड के भय से नहीं, बल्कि 'श्रद्धा', 'संस्कार' और 'कृतज्ञता' के माध्यम से समाज की दिनचर्या में पिरोया गया था। प्रकृति की हर उस इकाई को, जो जीवन का पोषण करती है, देवत्व प्रदान किया गया ।  भारत में नदियाँ केवल जल निकाय नहीं हैं, उन्हें 'लोकमाता' माना गया। गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु और कावेरी जैसी नदियों की पूजा, आरती और उनमें पवित्र स्नान की परंपरा वास्तव में जल निकायों को प्रदूषण से मुक्त रखने और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक सामाजिक माध्यम थी। वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माने जाने वाले पेड़ों को धार्मिक महत्व दिया गया:।पीपल और बरगद (वट): प्रचुर मात्रा में ऑक्सीजन देने वाले और विशाल जैव-विविधता को आश्रय देने वाले इन वृक्षों की पूजा की परंपरा बनाई गई।।तुलसी और नीम: तुलसी को हर घर के आँगन में स्थान दिया गया, जो वायु शोधन और औषधीय गुणों का भंडार है।।अरण्य संस्कृति: हमारे ऋषियों के आश्रम वनों (अरण्यों) में होते थे, जहाँ 'अरण्य संस्कृति' का विकास हुआ। वनों को काटना महापाप माना जाता था। भूमि और पर्वतों के प्रति आदर होती है ।
ऋग्वेद और अथर्ववेद के 'भूमि सूक्त' में कहा गया है:"माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः" (अर्थात् पृथ्वी मेरी माता है और मैं इसका पुत्र हूँ।)।इस भावना ने मनुष्य को कभी भूमि का शोषक नहीं बनने दिया। हिमालय, गोवर्धन जैसे पर्वतों को देवस्वरूप मानकर उनकी अखंडता की रक्षा की गई । आधुनिक विज्ञान आज खाद्य श्रृंखला और पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन की बात करता है। भारतीय ज्ञान परंपरा में यह ज्ञान हजारों वर्षों से आचरण में लाया जा रहा है। जैन, बौद्ध और सनातन परंपरा में जीव मात्र के प्रति दया और अहिंसा को सर्वोच्च नैतिक मूल्य माना गया। देव-वाहन और वन्यजीव संरक्षण: हमारे देवी-देवताओं के वाहनों का अवलोकन करें तो एक अद्भुत पारिस्थितिक संतुलन दिखाई देता है: शिव के साथ वृषभ (बैल) और सर्प। विष्णु के साथ गरुड़। दुर्गा के साथ सिंह। गणेश के साथ मूषक (चूहा)। कार्तिकेय के साथ मयूर है। पीपल , बरगद , आंवला , शाक  वृक्ष एवं पौधों में तुलसी , नदियां  की प्रधानता और पूजन की परंपरा है । 
प्राकृतिक रूप से सर्प और मूषक, या सिंह और बैल एक-दूसरे के विरोधी हैं, लेकिन देव-प्रतिमाओं में वे एक साथ शांति से रहते हैं। यह रूपक समाज को यह संदेश देता है कि प्रकृति में हर जीव का अपना स्थान है और जैव विविधता की रक्षा करना मनुष्य का धार्मिक कर्तव्य है।
प्राचीन भारत में पर्यावरण प्रबंधन केवल दर्शन तक सीमित नहीं था, बल्कि व्यावहारिक तकनीक में भी दिखाई देता था: भारत के विभिन्न हिस्सों में जल संचयन की अद्भुत प्रणालियाँ विकसित की गईं:
: राजस्थान और गुजरात जैसे शुष्क क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन के लिए कलात्मक बावड़ियों ( रानी की वाव, चाँद बावड़ी) का निर्माण किया गया, जो भू-जल स्तर को बढ़ाती थीं। बिहार , झारखंड उत्तरप्रदेश उड़ीसा , बंगाल में जल संचयन एवं जल संरक्षण एवं सम्बर्धांके लिए सरोवर , आहार , कूप का निर्माण तथा वृक्षारोपण  किया जाता था ।  जोहड़, तालाब और आहाड़-पाइन: सामुदायिक भागीदारी से जल का संग्रहण और कृषि के लिए कुशल उपयोग किया जाता था। भारत के कई राज्यों ( मेघालय में 'लॉ लिंगदोह', महाराष्ट्र में 'देवराई', केरल का  'कावू') में जंगलों के बड़े हिस्सों को देवताओं के नाम पर आरक्षित रखा जाता था। इन पवित्र उपवनों में लकड़ी काटना, शिकार करना या पेड़ की पत्ती तोड़ना भी वर्जित था। आज ये उपवन विलुप्तप्राय औषधीय पौधों और वन्यजीवों के लिए प्राकृतिक बायोस्फीयर रिज़र्व के रूप में काम कर रहे हैं।
आधुनिक युग की भौतिकवादी दौड़ ने प्रकृति के साथ हमारे इस रिश्ते को तोड़ा है, जिसके दुष्परिणाम आज प्रदूषण, चक्रवात, बेमौसम बारिश और नई बीमारियों के रूप में सामने आ रहे हैं। इस संकट काल में भारतीय जीवन-पद्धतियाँ विश्व के लिए मार्गदर्शक बनी हैं: आयुर्वेद: केवल चिकित्सा पद्धति नहीं है, बल्कि प्रकृति के नियमों के अनुसार जीने की कला है। यह ऋतुचर्या और प्राकृतिक जड़ी-बूटियों के माध्यम से शरीर और पर्यावरण के सामंजस्य पर जोर देता है।।योग मनुष्य की चेतना को सूक्ष्म से विराट (प्रकृति) के साथ जोड़ता है।: भारतीय चिंतन हमेशा 'जरूरत' (Need) पर आधारित जीवन का समर्थन करता है, न कि 'लालच' पर प्राचीन संस्कृत श्लोक में संपूर्ण ब्रह्मांडीय संतुलन की प्रार्थना की गई है:
"प्रकृतिः पंचभूतानि ग्रहाः लोकाः स्वरास्तथा।
दिशः कालश्च सर्वेषां सदा कुर्वन्तु मंगलम्।।"
(अर्थात्: त्रिगुणात्मक प्रकृति, पाँचों महाभूत, नवग्रह, तीनों लोक, सातों स्वर, दसों दिशाएँ और काल — ये सभी घटक आपस में संतुलित व्यवहार करते हुए समस्त ब्रह्मांड का सदा मंगल करें।)
पर्यावरण के बिना मानव सभ्यता के अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती। पश्चिमी औद्योगिक मॉडल ने भौतिक समृद्धि तो दी, लेकिन पृथ्वी को विनाश के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। इस वैश्विक संकट का समाधान केवल नई तकनीक में नहीं, बल्कि हमारी सोच और जीवन-शैली के परिवर्तन में है। भारतीय ज्ञान परंपरा हमें सिखाती है कि प्रकृति हमारी दासी नहीं, बल्कि हमारी माता है। यदि हमें आने वाली पीढ़ियों के लिए एक हरित और सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित करना है, तो हमें अपनी सनातन जड़ों की ओर लौटना होगा। 'उपभोग' के स्थान पर 'सह-अस्तित्व' और 'शोषण' के स्थान पर 'पोषण' के इस भारतीय दृष्टिकोण को अपनाकर ही हम संपूर्ण विश्व और पर्यावरण का कल्याण कर सकते है ।

गुरुवार, जुलाई 16, 2026

पुरुषोत्तम क्षेत्र जगन्नाथ पूरी

पावन पुरुषोत्तम क्षेत्र: श्री जगन्नाथ पुरी का सांस्कृतिक। वैभव
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
भारतीय चेतना का स्पंदन केंद्र पूरी है। भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म के इतिहास में जिन चार परम पावन धामों की परिकल्पना की गई है, उनमें पूर्वी तट पर स्थित श्री जगन्नाथ पुरी (ओडिशा) का स्थान अद्वितीय है। महोदधि (बंगाल की खाड़ी) के नील जल तरंगों से प्रक्षालित पूरी  पावन नगरी न केवल एक प्रमुख तीर्थस्थल है, बल्कि यह भारतीय दर्शन, इतिहास, वास्तुकला, कला और लोक-आस्था का एक ऐसा सघन संगम है, जिसने सदियों से संपूर्ण विश्व को अपनी ओर आकर्षित किया है। पौराणिक ग्रंथों और शास्त्रों में पुरी को 'पुरुषोत्तम क्षेत्र', 'शंख क्षेत्र', 'श्रीक्षेत्र', 'नीलांचल' और 'नीलाद्रि' पूरी , जगन्नाथ पूरी जैसे अनेक दिव्य नामों से विभूषित किया गया है। यहाँ के अधिष्ठाता देव स्वयं जगत् के स्वामी 'श्री जगन्नाथ' हैं, जो अपनी बहन सुभद्रा और अग्रज बलभद्र (बलराम) के साथ रत्नसिंहासन पर विराजमान हैं। जगन्नाथ संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता इसका समन्वयकारी चरित्र है, जहाँ आदिवासी परंपराओं से लेकर वैदिक ऋचाओं तक, और बौद्ध-जैन दर्शन से लेकर मध्यकालीन भक्ति आंदोलन तक की धाराएं एकाकार हो जाती हैं।
भौगोलिक दृष्टि से पुरी भारत के पूर्वी राज्य ओडिशा का एक तटीय जिला और शहर है। यह 19.81 ∘  N अक्षांश और 85.83 ∘  E देशांतर पर स्थित है। इसके पूर्व में बंगाल की खाड़ी का अनत विस्तार है, जो इस धर्मनगरी को एक विशिष्ट प्राकृतिक सौंदर्य और नैसर्गिकता प्रदान करता है। शंख क्षेत्र: पुरी का भौगोलिक आकार एक शंख की भांति माना गया है, जिसका नाभि-केंद्र स्वयं श्री जगन्नाथ का मुख्य मंदिर है।।पुरुषोत्तम क्षेत्र: 'पुरुषोत्तम' का अर्थ है पुरुषों में उत्तम अर्थात् स्वयं विष्णु। स्कंद पुराण के अनुसार, यह क्षेत्र आदि काल से विष्णु का अत्यंत प्रिय निवास स्थान रहा है। नीलांचल/नीलाद्रि: प्राचीन काल में यहाँ एक नीला पर्वत (नीलाद्रि) था, जिसके ऊपर नीलमणि से निर्मित नीलमाधव की पूजा की जाती थी।
स्कंद पुराण के 'उत्कल खंड' में वर्णित कथा के अनुसार, मालव देश के परम प्रतापी और परम विष्णुभक्त राजा इंद्रद्युम्न को स्वप्न में नीलमाधव के दर्शन हुए थे। राजा ने अपने पुरोहित विद्यापति को नीलमाधव की खोज में भेजा। विद्यापति ने खोजी यात्रा के दौरान पाया कि जंगलों में रहने वाले शबर (आदिवासी) कबीले के मुखिया विश्ववासु गुप्त रूप से नीलमाधव की पूजा करते थे।।कालांतर में नीलमाधव की वह दिव्य मूर्ति अंतर्धान हो गई। राजा इंद्रद्युम्न अत्यंत व्याकुल हो उठे। तब आकाशवाणी हुई कि समुद्र में तैरता हुआ एक विशाल देवदारु का काष्ठ (लकड़ी का लट्ठा) प्राप्त होगा, जिससे भगवान की मूर्तियों का निर्माण किया जाए। उस दारु (लकड़ी) को तराशने के लिए स्वयं देव-शिल्पी विश्वकर्मा एक वृद्ध बढ़ई के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने शर्त रखी कि वे २१ दिनों तक बंद द्वार के पीछे मूर्तियों का निर्माण करेंगे और इस बीच कोई भी द्वार नहीं खोलेगा।।परंतु, रानी गुंडिचा की उत्सुकता और आतुरता के कारण राजा ने १५वें दिन ही द्वार खुलवा दिया। अंदर मूर्तियां अधूरी थीं—हाथ-पैर विहीन, केवल धड़ और बड़ी-बड़ी गोल आँखें। शिल्पी अंतर्धान हो चुके थे। राजा को अपनी भूल पर पश्चाताप हुआ, परंतु भगवान ने पुनः स्वप्न में कहा कि वे इसी निराकार-साकार रूप में पृथ्वी पर भक्तों का कल्याण करेंगे। इस प्रकार, 'दारुब्रह्म' के रूप में श्री जगन्नाथ की स्थापना हुई।
 राजवंश, शिलालेख और विकास क्रममें पुरी का इतिहास केवल पौराणिक आख्यानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रामाणिक पुरातात्विक साक्ष्यों, शिलालेखों और ऐतिहासिक दस्तावेजों से भी समृद्ध है। श्री जगन्नाथ मंदिर का विकासक्रम में आदिवासी शबर परंपरा के तहत पुरातन कल से नीलमाधव पूजा व उपासना , उर्वी गंग राजवंश १२ वीं सदी चोड़गंग देव द्वारा वर्तमान जगन्नाथ मंदिर का मुख्य निर्माण एवं गजपति राजवंश द्वारा १५ वीं सदी में सांस्कृतिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था की गई थी ।
मौर्य और गुप्त काल का प्रभाव - यद्यपि पुरी के मुख्य मंदिर का वर्तमान स्वरूप मध्यकाल का है, परंतु मौर्य सम्राट अशोक के कलिंग युद्ध (261 ई.पू.) के समय से ही यह क्षेत्र बौद्ध धर्म के प्रभाव में रहा। कई इतिहासकार मानते हैं कि जगन्नाथ की त्रिमूर्ति में समाहित दर्शन बौद्ध धर्म के त्रिरत्न (बुद्ध, धम्म, संघ) से प्रेरित है। गुप्त काल में वैष्णव धर्म के प्रसार के साथ ही इस क्षेत्र की पहचान एक प्रमुख हिंदू तीर्थ के रूप में सुदृढ़ होने लगी।
पूर्वी गंग राजवंश और अनंतवर्मन चोडगंग देव - वर्तमान गगनचुंबी मंदिर के निर्माण का श्रेय पूर्वी गंग राजवंश के महान शासक महाराज अनंतवर्मन चोडगंग देव (1077–1147 ई. को जाता है। उन्होंने १२वीं शताब्दी की शुरुआत में इस मंदिर का निर्माण कार्य प्रारंभ करवाया। उनके उत्तराधिकारी अनंगभीम देव तृतीय (1211–1238 ई.) ने इस कार्य को पूर्ण कराया और अपने संपूर्ण साम्राज्य को महाप्रभु श्री जगन्नाथ के चरणों में समर्पित कर स्वयं को उनका 'राउत' (सेवक) घोषित किया। यहीं से ओडिशा में 'गजापति' शासन की नींव पड़ी, जहाँ राजा स्वयं को राज्य का वास्तविक शासक न मानकर महाप्रभु जगन्नाथ का प्रतिनिधि या सेवक मानता था।
सुलतान फीरोज शाह तुगलक (1360 ई.) और बाद में काला पहाड़ (बंगाल के सुल्तान का सेनापति, 1568 ई.) जैसे आक्रांताओं ने मंदिर पर भीषण हमले किए और मूर्तियों को नष्ट करने का प्रयास किया। इन संकटकाल के दौरान पुरी के पुजारियों और गजापति राजाओं ने अत्यंत चतुराई से विग्रहों (मूर्तियों) को चिल्का झील के टापुओं और गुफाओं में छिपाकर सुरक्षित रखा। मुगलों और मराठों के शासनकाल में भी मंदिर के प्रशासनिक ढांचे और दैनिक अनुष्ठानों को बनाए रखने के लिए संघर्ष और समझौते किए गए।
जगन्नाथ मंदिर की स्थापत्य कला एवं वास्तुशिल्प - पुरी का मुख्य मंदिर कलिंग वास्तुकला शैली का सर्वोत्कृष्ट और जीवंत उदाहरण है। यह विशाल मंदिर लगभग ४ लाख वर्ग फुट के क्षेत्र में फैला हुआ है, जो चारों ओर से 'मेघनाद पचेरी' (एक विशाल सुरक्षा दीवार) से घिरा हुआ है। कलिंग शैली के अनुरूप मंदिर को मुख्य रूप से चार विशाल कक्षों या मंडपों में विभाजित किया गया है, जो एक के बाद एक श्रेणीबद्ध रूप से जुड़े हुए हैं: क्रमांकमंडप का नामविवरण एवं धार्मिक महत्व -  विमान  मंदिर का गर्भगृह है जहाँ रत्नसिंहासन पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की काष्ठ मूर्तियां विराजमान हैं। इसकी ऊंचाई धरातल से लगभग २१४ फुट है। जगमोहन गर्भगृह के ठीक सामने स्थित मुख्य प्रार्थना कक्ष या दर्शन मंडप है। यहाँ भक्त एकत्र होकर भगवान की आराधना करते हैं। नाट्य मंडप  नृत्य और संगीत के लिए आरक्षित कक्ष था, जहाँ प्राचीन काल में देवदासियां भगवान के समक्ष ओडिसी नृत्य प्रस्तुत करती थीं। भोग मंडप मंदिर का सबसे बाहरी हिस्सा, जहाँ भगवान को अर्पित किए जाने वाले महाप्रसाद का नैवेद्य रखा जाता है और विशेष अनुष्ठान संपन्न होते हैं।
  नीलचक्र और पतितपावन ध्वज - मंदिर के शिखर पर एक अष्टधातु से निर्मित विशाल चक्र स्थापित है, जिसे 'नीलचक्र' कहा जाता है। इस चक्र पर प्रतिदिन एक नया ध्वज फहराया जाता है, जिसे 'पतितपावन बाना' कहते हैं। इस ध्वज को बदलने की प्रक्रिया अत्यंत रोमांचक होती है; मंदिर का एक विशेष सेवक (चोला) बिना किसी सुरक्षा उपकरण के, हवा के विपरीत बहते हुए २१४ फुट ऊंचे शिखर पर चढ़कर इस ध्वज को बदलता है।
 जगन्नाथ संस्कृति का समन्वयवादी दर्शन: आदिवासी परंपरा से वेदांत तक - जगन्नाथ संस्कृति किसी संकीर्ण मत या संप्रदाय तक सीमित नहीं है। यह भारत की विभिन्न आध्यात्मिक धाराओं का एक अद्भुत संश्लेषण (Synthesis) है:।शबर (आदिवासी) और आर्य परंपरा का मिलन है।
भगवान जगन्नाथ के मुख्य पुजारियों को 'दैतापति' कहा जाता है। ये पुजारी गैर-ब्राह्मण हैं और स्वयं को शबर राजा विश्ववासु का वंशज मानते हैं। प्रतिवर्ष रथयात्रा और 'नवकलेवर' के समय सभी मुख्य अनुष्ठान इन्हीं दैतापतियों द्वारा संपन्न किए जाते हैं। यह इस बात का अनूठा प्रमाण है कि सनातन धर्म में आदिवासियों और वनवासियों को कितना उच्च और केंद्रीय स्थान दिया गया है। बौद्ध और जैन दर्शन का प्रभाव में बौद्ध मत: कई इतिहासकारों का मानना है कि जगन्नाथ मंदिर के गर्भगृह में स्थापित मूर्तियों के भीतर जो 'ब्रह्म पदार्थ' है, वह वास्तव में भगवान बुद्ध का दंत अवशेष है। रथयात्रा की परंपरा भी बौद्धों की संघयात्रा से साम्यता रखती है। जैन मत: जैन धर्म के अनुयायी जगन्नाथ को 'जिन्नाथ' (जैन तीर्थंकर) के रूप में देखते हैं। मूर्तियों का त्रिकोणीय विन्यास और कैवल्य (महाप्रसाद को 'कैवल्य वैकुंठ' भी कहा जाता है) की अवधारणा जैन दर्शन के निकट जान पड़ती है।
विभिन्न संप्रदायों का केंद्र पुरी ने भारत के लगभग सभी महान दार्शनिकों और संतों को आकर्षित किया है। आदि शंकराचार्य: ८वीं शताब्दी में जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने पुरी की यात्रा की और यहाँ 'गोवर्धन पीठ' की स्थापना की, जो भारत के चार प्रमुख मठों में से एक है। रामानुजाचार्य व मध्वाचार्य:  विशिष्टाद्वैत और द्वैतवादी आचार्यों ने पुरी में अपने-अपने मठ स्थापित किए और मंदिर की पूजा पद्धति को सुव्यवस्थित करने में योगदान दिया। श्री चैतन्य महाप्रभु: १६वीं शताब्दी में गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के प्रवर्तक श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने जीवन के अंतिम १८ वर्ष पुरी में ही व्यतीत किए। उन्होंने 'संकीर्तन आंदोलन' के माध्यम से जगन्नाथ भक्ति को जन-जन तक पहुँचाया।
दिव्य विग्रह और अनूठा अनुष्ठान: 'नवकलेवर' - संसार के अधिकांश हिंदू मंदिरों में मूर्तियां पत्थर, अष्टधातु या संगमरमर की होती हैं, जिनकी प्राण-प्रतिष्ठा एक बार होने के बाद उन्हें बदला नहीं जाता। परंतु श्री जगन्नाथ मंदिर में मूर्तियां नीम की लकड़ी (दारु) से बनी होती हैं, जिन्हें एक निश्चित अंतराल पर बदला जाता है। इस अलौकिक अनुष्ठान को 'नवकलेवर' (Nabakalebara) कहा जाता है। नवकलेवर अनुष्ठान सामान्यतः हर ८, १२ या १९ वर्ष के बाद आता है, जब हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास में 'मलमास' (अधिकमास) पड़ता है। इसका आध्यात्मिक अर्थ मानव शरीर के पुनर्जन्म के सिद्धांत से जुड़ा है, जैसा कि श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है: वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
दारु (नीम के पेड़) की खोज  में यह कोई साधारण खोज नहीं होती। दैतापति और वनयाग दल के सदस्य गुप्त संकेतों और कड़े नियमों के आधार पर विशिष्ट नीम के वृक्षों की खोज करते हैं। उन वृक्षों में निम्नलिखित लक्षण होने अनिवार्य हैं:पेड़ पर शंख, चक्र, गदा और पद्म के प्राकृतिक चिह्न होने चाहिए। पेड़ के पास कोई श्मशान या बांबी (सांप का बिल) होना चाहिए और वहाँ कोबरा सांप निवास करता हो। पेड़ के ऊपर कोई चिड़िया का घोंसला नहीं होना चाहिए। पेड़ पर कभी बिजली न गिरी हो।
ब्रह्म परिवर्तन - पेड़ को काटकर अत्यंत आदरपूर्वक पुरी लाया जाता है। मंदिर के भीतर बंद द्वारों के पीछे अत्यंत गुप्त रूप से नई मूर्तियां गढ़ी जाती हैं। आषाढ़ कृष्ण चतुर्दशी की मध्यरात्रि को पूरे पुरी शहर की बिजली काट दी जाती है। चारों तरफ घना अंधकार होता है।।मंदिर के सबसे वृद्ध और प्रधान पुजारी की आँखों पर पट्टी बांधी जाती है और हाथों में कपड़े लपेटे जाते हैं। वे पुरानी मूर्तियों के भीतर से 'ब्रह्म पदार्थ' (विष्णु का हृदय माना जाने वाला रहस्यमयी तत्व) निकालते हैं और उसे नई मूर्तियों में स्थापित करते हैं। इस प्रक्रिया को करने वाले पुजारियों का कहना है कि वह पदार्थ अत्यंत स्पंदनशील और सजीव प्रतीत होता है, जैसे कोई जीवित हृदय धड़क रहा हो। इसके पश्चात् पुरानी मूर्तियों को मंदिर परिसर के 'कोइली वैकुंठ' में भू-समाधि दे दी जाती है।
विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा: भ्रातृ-प्रेम और समरसता का उत्सव।- पुरी की रथयात्रा (Rath Yatra) विश्व का सबसे बड़ा और प्राचीनतम रथ उत्सव है। यह आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को आयोजित की जाती है। इस यात्रा में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा अपने मुख्य मंदिर से निकलकर अपनी मौसी के घर 'गुंडिचा मंदिर' जाते हैं।।तीनों भव्य रथों का विवरण।- रथों का निर्माण प्रतिवर्ष अक्षय तृतीया से शुरू होता है। इसमें किसी भी प्रकार के लोहे के कीलों या औजारों का प्रयोग नहीं किया जाता, केवल पारंपरिक लकड़ी की संधियों  का उपयोग होता है।।रथ का नामदेवतालकड़ी के पहियों की संख्यारथ का रंगऊंचाई (फुट) , नंदीघोष भगवान जगन्नाथ१६पीला और लाल४५.६ ,तालध्वज भगवान बलभद्र१४हरा और लाल४५ , देवदलन , देवी सुभद्रा१२काला और लाल४४.६ , छेरा पहरा की अनूठी परंपरा है। रथयात्रा की सबसे महत्वपूर्ण और प्रेरणादायी रस्म है 'छेरा पहरा'। जब तीनों रथ सज-धजकर तैयार हो जाते हैं, तब पुरी के गजापति महाराज (पारंपरिक राजा) पालकी में सवार होकर आते हैं। वे सोने की झाड़ू से रथों के चबूतरे की सफाई करते हैं और उस पर सुगंधित जल छिड़कते हैं।।यह रस्म यह संदेश देती है कि भगवान के दरबार में कोई राजा या रंक नहीं है; संसार का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति भी जगदीश्वर के सामने केवल एक 'झाड़ू लगाने वाला' (सेवक) है। यह सामाजिक समरसता और अहंकार-मुक्ति का चरम उदाहरण है।
आनंद बाज़ार और महाप्रसाद की महिमा - पुरी मंदिर की रसोई को विश्व की सबसे बड़ी पारंपरिक रसोई माना जाता है। यहाँ प्रतिदिन लगभग ५०,००० से अधिक भक्तों के लिए भोजन तैयार किया जाता है, जिसे 'महाप्रसाद' या 'अबढ़ा' कहा जाता है।।महाप्रसाद बनाने की तकनीक अत्यंत अनूठी और वैज्ञानिक है:।भोजन पकाने के लिए केवल मिट्टी के बर्तनों (कुडुआ) का उपयोग किया जाता है।।चूल्हे पर एक के ऊपर एक, ऐसे कुल ७ मिट्टी के बर्तन रखे जाते हैं। आश्चर्यजनक रूप से, जो बर्तन सबसे ऊपर (सातवें नंबर पर) होता है, उसका भोजन सबसे पहले पकता है, और जो सबसे नीचे आग के सीधे संपर्क में होता है, उसका भोजन सबसे अंत में पकता है। मंदिर परिसर में स्थित 'आनंद बाज़ार' में इस महाप्रसाद की बिक्री और वितरण होता है। सनातन धर्म में सामान्यतः छुआछूत और शुचिता के कड़े नियम रहे हैं, परंतु आनंद बाज़ार में सभी सामाजिक बंधन टूट जाते हैं। यहाँ एक ही पात्र से ब्राह्मण और समाज का सबसे वंचित व्यक्ति एक साथ बैठकर महाप्रसाद ग्रहण करते हैं। महाप्रसाद को कभी अपवित्र नहीं माना जाता; जमीन पर गिरे हुए अन्न को भी मस्तक से लगाकर ग्रहण किया जाता है।
पुरी केवल जगन्नाथ मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके आस-पास कई अन्य ऐतिहासिक और प्राकृतिक स्थल हैं जो इसके महत्व को बहुगुणित करते हैं। नरेंद्र सरोवर एक विशाल ऐतिहासिक तालाब है, जिसके मध्य में एक छोटा मंदिर स्थित है। वैशाख मास में यहाँ प्रसिद्ध 'चंदन यात्रा' का आयोजन होता है, जिसमें महाप्रभु की मदनमोहन प्रतिमा को नौका विहार कराया जाता है। स्वर्गद्वार पुरी का पवित्र तट है जहाँ हिंदुओं का अंतिम संस्कार किया जाता है। मान्यता है कि यहाँ प्राण त्यागने वाले या दाह-संस्कार पाने वाले जीव को सीधे मोक्ष (वैकुंठ) की प्राप्ति होती है। पुरी का समुद्र तट - बंगाल की खाड़ी का यह रेतीला तट न केवल पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है, बल्कि यह विश्व प्रसिद्ध 'रेत कला'  के लिए भी विख्यात है। यहाँ के स्थानीय कलाकार सुदर्शन पटनायक ने अपनी सैंड आर्ट से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित की है।।रघुराजपुर - पुरी से लगभग १४ किमी दूर स्थित यह गाँव 'पट्टचित्र'  कला का उद्गम स्थल है। यहाँ का प्रत्येक परिवार पारंपरिक चित्रकला, ताड़ के पत्तों पर नक्काशी और लकड़ी के खिलौने बनाने के कार्य में संलग्न है। यहाँ की सांस्कृतिक विरासत ओडिसी नृत्य के पुरोधा गुरु केलुचरण महापात्र से भी जुड़ी हुई है।
पुरी से जुड़े वैज्ञानिक और अनसुलझे रहस्य - आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के इस युग में भी जगन्नाथ मंदिर से जुड़े कुछ ऐसे प्राकृतिक और भौतिक विस्मय हैं, जिनका वैज्ञानिक सटीक उत्तर देने में असमर्थ रहे हैं:।हवा की विपरीत दिशा में ध्वज का फहराना: सामान्यतः तटीय क्षेत्रों में हवा समुद्र से धरती की ओर चलती है, परंतु मंदिर का मुख्य ध्वज हमेशा हवा की विपरीत दिशा में लहराता है।।गुंबद की परछाई न बनना: विज्ञान के प्रकाश-परावर्तन के नियमों के विपरीत, मुख्य मंदिर के भव्य गुंबद की परछाई दिन के किसी भी समय भूमि पर दिखाई नहीं देती। सिंहद्वार की ध्वनि तकनीक: जैसे ही आप मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार जिसे 'सिंहद्वार' कहा जाता है, में प्रवेश करते हैं, समुद्र की लहरों की गड़गड़ाहट पूरी तरह सुनाई देना बंद हो जाती है। द्वार से एक कदम बाहर आते ही वह ध्वनि पुनः सुनाई देने लगती है। मंदिर के ऊपर से कभी कोई पक्षी या हवाई जहाज उड़ता हुआ दिखाई नहीं देता। इसे 'नो फ्लाई ज़ोन' की तरह माना जाता है, जो प्राकृतिक रूप से घटित होता है।
पूरी शाश्वत शांति और एकात्मता का संदेश है।  श्री जगन्नाथ पुरी केवल एक भौगोलिक स्थान या ईंट-पत्थरों से बना देवालय नहीं है, बल्कि यह समग्र भारतीय अध्यात्म का मूर्त रूप है। यहाँ का दर्शन सिखाता है कि परमात्मा किसी वर्ग, जाति या संप्रदाय का एकाधिकार नहीं है। वे शबर कबीले के नीलमाधव भी हैं, वेदों के पुरुषोत्तम भी हैं, और बौद्धों के बुद्ध भी हैं।।पुरी की रथयात्रा और महाप्रसाद की परंपरामें  वैश्विक भ्रातृत्व (Universal Brotherhood) और समतावादी समाज की अनुपम सीख देती है। आज के इस अशांत और खंडित विश्व में, पुरी की यह उदार, समावेशी और प्रेममयी संस्कृति संपूर्ण मानवता के कल्याण और मानसिक शांति का मार्ग प्रशस्त करती है। नीलाद्रि शिखर पर लहराता हुआ पतितपावन ध्वज सदियों से मानव जाति को यही संदेश दे रहा है कि संकीर्णताओं से ऊपर उठकर जगदीश्वर के चरणों में आत्मसमर्पण करना ही जीवन की वास्तविक पूर्णता है।
संदर्भ - स्कंद पुराण (उत्कल खंड): पुरी के पौराणिक इतिहास, राजा इंद्रद्युम्न की कथा और पुरुषोत्तम क्षेत्र के महात्म्य का मूल संस्कृत स्रोत। मादला पांजी (Madala Panji): पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर का आधिकारिक और ऐतिहासिक दैनिक वृत्तपत्र (Chronicle), जो ताड़ के पत्तों पर प्राचीन काल से लिखा जा रहा है।'ओडिशा का इतिहास' (History of Orissa) - डॉ. हरेकृष्ण महताब: गंग राजवंश के उदय, मंदिर निर्माण के कालखंड और ओडिशा के राजनीतिक-सांस्कृतिक इतिहास की प्रामाणिक पुस्तक।'द कल्ट ऑफ जगन्नाथ एंड द रीजनल ट्रेडिशन ऑफ उड़ीसा' (The Cult of Jagannath and the Regional Tradition of Orissa) - एशमैन, कुल्के एवं त्रिपाठी: जगन्नाथ संस्कृति के सामाजिक, आदिवासी और दार्शनिक पहलुओं पर व्यापक शोध ग्रंथ।भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) रिपोर्ट: जगन्नाथ मंदिर के स्थापत्य, कलिंग शैली के विकास और संरक्षण संबंधी पुरातात्विक प्रलेख।