सोमवार, सितंबर 28, 2026

कैमूर परिभ्रमण

कैमूर  परिभ्रमण
सत्येंद्र कुमार पाठक 
2000 वर्ष पुराना जीवित मंदिर : कैमूर जिले के भगवानपुर प्रखंड के रामगढ़ स्थित कैमूर पर्वत समूह की मुण्डेश्वरी श्रृंखला पर स्थित माँ मुण्डेश्वरी धाम से अधौरा प्रखंड के तेल्हार कुण्ड और तेल्हार झरना तक का 3000 शब्दों में विस्तृत इतिहास, आध्यात्मिक चमत्कार और पर्यटन परिभ्रमण - जहाँ गर्भगृह में माता मुण्डेश्वरी और पंचमुखी शिव एक साथ, 510 सीढ़ियों की चढ़ाई, नंदी-नारियल-त्रिशूल-जल की परंपरा, पाषाण मूर्तियों की नक्काशी, हवन कुण्ड की अग्नि और पहाड़ी नदी की कल-कल में बसा है बिहार का गौरव - साहित्यकार व इतिहासकार सत्येन्द्र कुमार पाठक और जिला जीविका प्रशिक्षण अधिकारी प्रवीण कुमार पाठक की ऐतिहासिक यात्रा
आज 27 सितंबर 2026 है। आज विश्व पर्यटन दिवस है। पूरी दुनिया घूमने की बात कर रही है। पर मैं कहता हूँ - यदि घूमना है तो अपना बिहार घूमो। अपना कैमूर घूमो। क्योंकि कैमूर की पहाड़ी पर एक ऐसा मंदिर है जो 2000 साल से लगातार जीवित है, जहाँ पूजा कभी बंद नहीं हुई। नाम है - माँ मुण्डेश्वरी धाम।
आज का परिभ्रमण दो चरणों में हुआ। पहला चरण - भगवानपुर प्रखंड के रामगढ़ स्थित कैमूर पर्वत समूह की मुण्डेश्वरी श्रृंखला पर स्थित मुण्डेश्वरी मंदिर और दूसरा चरण - अधौरा प्रखंड का तेल्हार कुण्ड और तेल्हार झरना।
परिभ्रमण दल में  मैं स्वयं सत्येन्द्र कुमार पाठक  साहित्यकार, इतिहासकार, बाल साहित्य में "सृजन श्रेष्ठ" सम्मान प्राप्त तथा  प्रवीण कुमार पाठक ,  प्रशिक्षण अधिकारी, जिला जीविका, औरंगाबाद है।
कैमूर जिला बिहार का सबसे पश्चिमी जिला है। पहले रोहतास का हिस्सा था, 1991 में अलग जिला बना। इस जिले में कैमूर पर्वत है, जो विंध्य पर्वत श्रृंखला का पूर्वी छोर है। यह पर्वत 100 किलोमीटर लंबा, 50 किलोमीटर चौड़ा है।
मुण्डेश्वरी श्रृंखला -  भगवानपुर प्रखंड में रामगढ़ गांव से 3 किलोमीटर दूर कैमूर पर्वत की सबसे ऊँची चोटी है - ऊँचाई 608 फीट। इसी चोटी को मुण्डेश्वरी श्रृंखला कहते हैं। यहाँ कई छोटी-छोटी पहाड़ियां जुड़ी हैं, इसलिए श्रृंखला कहा जाता है।
मंदिर तक पहुंचने के लिए दो रास्ते हैं ।  नीचे से ऊपर तक 510 पक्की सीढ़ियां। हर 50 सीढ़ी पर विश्राम चबूतरा। युवा, श्रद्धालु इसी से जाते हैं। सड़क मार्ग  चार पहिया और दो पहिया वाहन के लिए सड़क। बुजुर्ग, दिव्यांग, सामान इसी से जाता है। हम लोग द्वीपहिया मोटर साइकिल  से गए।
तेल्हार कुण्ड और झरना -  मुण्डेश्वरी से 40 किलोमीटर दूर अधौरा प्रखंड में है तेल्हार। अधौरा बिहार का सबसे ऊँचा और सबसे दुर्गम प्रखंड है, समुद्र तल से 1500 फीट ऊँचा। इसे अंग्रेजों ने "बिहार का शिमला" कहा था। यहीं है तेल्हार कुण्ड - पहाड़ के ऊपर से पानी गिरता है तो नीचे 100 फीट गहरा प्राकृतिक कुण्ड बन गया है, जो साल भर नहीं सूखता। इसी कुण्ड से आगे 100 फीट नीचे गिरता है तेल्हार झरना । 
पौराणिक युग - चंड-मुंड वध - दुर्गा सप्तशती में कथा है - शुंभ-निशुंभ नाम के दो राक्षस थे। उनके दो सेनापति थे - चंड और मुंड। माँ दुर्गा ने चंड का वध किया तो नाम पड़ा चामुंडा और मुंड का वध किया तो नाम पड़ा मुण्डेश्वरी। कहा जाता है कि इसी पर्वत पर मुंड का वध हुआ था, इसलिए यह पर्वत मुण्डेश्वरी पर्वत कहलाया।
. मौर्य और कुषाण युग - 108 ईस्वी - 1904 में अंग्रेज पुरातत्वविद् ब्लॉच ने यहाँ एक शिलालेख खोजा। उस पर लिखा था "महासामंत महाराज उदयसेन के शासन के 30वें वर्ष में।" अर्थात्  शक संवत 30 । मुण्डेश्वरी मंदिर का इतिहास 4 युगों नई मूर्तियां लगीं। चीनी यात्री ह्वेनसांग जब 635 ईस्वी में यहाँ आया तो उसने लिखा - "कैमूर पर्वत पर एक ऊँचा मंदिर है जहाँ लोग दिन-रात पूजा करते हैं और बलि देते हैं पर जीव हत्या नहीं करते।"
1850 में अंग्रेजों ने इसे खंडहर समझा। 1970 में बिहार सरकार ने इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया। 2000 में सड़क बनी। 2015 में बिहार सरकार ने इसे पर्यटन स्थल घोषित किया है।
मुण्डेश्वरी मंदिर का सबसे बड़ा आश्चर्य है गर्भगृह। आमतौर पर भारत में या तो शक्तिपीठ होता है या शिव मंदिर। पर मुण्डेश्वरी में दोनों एक साथ हैं।
गर्भगृह में माता मुण्डेश्वरी काले पत्थर की चतुर्भुजी मूर्ति, महिषासुरमर्दिनी रूप में। मूर्ति कई बार खंडित हुई, मुस्लिम आक्रमण में तोड़ी गई, फिर हिंदू राजाओं ने जोड़ी। आज भी मूर्ति पर जोड़ के निशान दिखते हैं। पंचमुखी शिवलिंग - माता के ठीक बगल में। यह उत्तर भारत का एकमात्र पंचमुखी शिवलिंग है जो देवी के साथ है। चार मुख चार दिशाओं में और पांचवां मुख ऊपर। चार मुख चार वेदों - ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद के प्रतीक हैं और पांचवां मुख मोक्ष का। इसलिए कहा जाता है - जो शिव को पूजेगा उसे शक्ति मिलेगी और जो शक्ति को पूजेगा उसे शिव मिलेंगे। यही अद्वैत का सिद्धांत है।
मंदिर परिसर में  नंदी, नारियल, जल, त्रिशूल, पाषाण मूर्तियां और हवन कुण्ड है।  "मुण्डेश्वरी मंदिर परिसर में नंदी, नारियल, जल, त्रिशूल तथा शिवलिंग पर समर्पित किया जाता है एवं अनेक पाषाण युक्त मूर्ति एवं पाषाण पर नक्काशीदार है। हवन-पूजन कुण्ड है।"  मंदिर के मुख्य द्वार के सामने जाली के अंदर नंदी महाराज बैठे हैं। यह नंदी 7वीं सदी का है। नंदी पर लाल चुनरी और गेंदे की माला। नंदी सीधे गर्भगृह के शिवलिंग को देख रहे हैं। आपकी तस्वीर में जाली पर हजारों चुनरियां बंधी हैं, वही नंदी का स्थान है। नारियल स्थल  परिसर में बोर्ड लगा है - "नारियल स्थल - कृपया नारियल यहीं फोड़े।" यह बहुत अच्छी व्यवस्था है। पहले लोग गर्भगृह में ही नारियल फोड़ते थे, जिससे गंदगी होती थी। अब ट्रस्ट ने अलग स्थान बनाया है। नवरात्र में यहाँ रोज 5000 से ज्यादा नारियल फोड़े जाते हैं।
 जल, त्रिशूल, शिवलिंग पर समर्पण हेतु भक्त तीन चीजें चढ़ाते हैं - जल (कर्मनाशा और सोन नदी का जल), त्रिशूल (छोटा लोहे का त्रिशूल, मन्नत पूरी होने पर) और नारियल। शिवलिंग पर जल, बेलपत्र और भस्म चढ़ता है। अनेक पाषाण युक्त मूर्तियां और नक्काशीदार पत्थर  यह मंदिर का सबसे बड़ा खजाना है। मंदिर नागर शैली में बना है, अष्टकोणीय आकार में। बिना सीमेंट-चूना के, केवल पत्थर पर पत्थर रखकर। दीवारों पर - प्रवेश द्वार पर द्वारपाल की मूर्तियां - हाथ में गदा। गंगा-यमुना, गणेश, विष्णु, सूर्य, नवग्रह की मूर्तियां।  छत पर कमल और कीर्तिमुख की नक्काशी। जाली पर बंधी 10 हजार से ज्यादा मन्नतों की चुनरियां। हर चुनरी एक कहानी है।
हवन-पूजन कुण्ड - मंदिर के सामने बड़ा हवन कुण्ड है। यहाँ चैत्र और शारदीय नवरात्र में 9 दिन तक अखंड हवन होता है। कहा जाता है कि इस कुण्ड की राख को खेत में डालने से फसल अच्छी होती है।
 आध्यात्मिक चमत्कार - जो विज्ञान भी नहीं समझ पाया मुण्डेश्वरी के 5 चमत्कार प्रसिद्ध हैं - रंग बदलने वाला शिवलिंग -  गर्भगृह में पंचमुखी शिवलिंग दिन में 3 बार रंग बदलता है - सुबह सुनहरा, दोपहर में हल्का काला, शाम को फिर सुनहरा। वैज्ञानिक इसे सूर्य के प्रकाश का प्रभाव कहते हैं, पर पुजारी कहते हैं - यह शिव की लीला है। अहिंसक बलि - दुनिया में कहीं नहीं है । यहाँ बकरे की बलि दी जाती है, पर बकरा मरता नहीं। यह दुनिया में इकलौता मंदिर है जहाँ अहिंसक बलि होती है। पुजारी बकरे को माता के सामने लाते हैं, मंत्र पढ़ते हैं, अक्षत (चावल) फेंकते हैं। बकरा बेहोश हो जाता है, गिर जाता है। लोग समझते हैं कि माता ने बलि स्वीकार कर ली। फिर बकरे को छोड़ दिया जाता है। 2000 साल से यह परंपरा चल रही है। ह्वेनसांग ने भी इसका उल्लेख किया है।
 मन्नतों की चुनरी जाली पर बंधी चुनरियों की संख्या 10 हजार से ज्यादा है। मान्यता है कि सच्चे मन से चुनरी बांधने पर मन्नत पूरी होती है। मन्नत पूरी होने पर फिर से आकर चुनरी बांधनी होती है। आपकी तस्वीर में यही चुनरियां दिख रही हैं।
रात में बजने वाली घंटियां - पुजारी बताते हैं कि रात में जब मंदिर बंद हो जाता है, तब अंदर से घंटियों और शंख की आवाज आती है। कई लोगों ने सुनी है। कहा जाता है कि रात में देवता यहाँ पूजा करते हैं।  माता  मुण्डेश्वरी , भगवान शिव  की पंचमुखी शिवलिंग  का दर्शन एवम  उपासना पूजन से मानसिक शांति तथा आध्यात्मिक उर्जा का  संचार  का अनुभव हुआ।  
तेल्हार कुण्ड का कभी न सूखना - अधौरा का तेल्हार कुण्ड गर्मी में भी नहीं सूखता। जबकि कैमूर के बाकी झरने सूख जाते हैं। कहा जाता है कि इस कुण्ड का संबंध पाताल लोक से है ।
तेल्हार कुण्ड का इतिहास भी मुण्डेश्वरी जितना ही पुराना है। युग  
पांडव काल में अज्ञातवास के समय पांडव यहाँ रुके थे। भीम ने इस कुण्ड को अपने गदा से बनाया था। इसलिए स्थानीय लोग इसे "भीम कुण्ड" भी कहते हैं। आपकी तस्वीर में जो गुफा दिख रही है, उसे "भीम की गुफा" कहा जाता है। इस कुण्ड का पानी कभी खराब नहीं होता। महीनों तक बोतल में रखो, खराब नहीं होगा। वैज्ञानिक इसे मिनरल वाटर कहते हैं। तेल्हार झरना 100 फीट ऊँचा है। बरसात में इसका रूप विकराल होता है। पर यही झरना कैमूर की जीवन रेखा है। नीचे कई गांव इसी के पानी से खेती करते हैं।
 मंदिर के निकास द्वार की तस्वीर कहती है - यहाँ से निकलते ही मोक्ष मिलता है। मुख्य मंदिर की तस्वीर कहती है - 2000 साल से यह पत्थर ऐसे ही खड़ा है। माला पहने श्रद्धालु की तस्वीर (मैं स्वयं) कहती है - पीढ़ी बदल रही है पर आस्था वही है। नंदी और चुनरी की तस्वीर कहती है - हर चुनरी एक मन्नत है। नदी और गुफा की तस्वीर कहती है - कैमूर केवल मंदिर नहीं, प्रकृति भी है। झरना की तस्वीर कहती है - बिहार में भी शिमला जैसा झरना है।
आज 27 सितंबर 2026 को मुण्डेश्वरी धाम से तेल्हार कुण्ड तक का यह परिभ्रमण मेरे जीवन के अविस्मरणीय परिभ्रमणों में से एक है। मुण्डेश्वरी की 510 सीढ़ी, चढ़ते-चढ़ते सांस फूली, पर माता के दरबार में पहुंचते ही, सारी थकान भूली। तेल्हार का पानी कहता है, रुक जाओ दो घड़ी,कैमूर की घाटी कहती है, लिख दो एक और कड़ी।"
मुसहरवा बाबा - तेल्हार कुण्ड  जाने के क्रम  में मुसहरवा  मंदिर  में स्थापित  मुसहरवा बाबा  का दर्शन किया।  यहा  भक्त गण  बीडी  अर्पित कर  बीडी पीते है । प्रसाद में बीडी दिया जाता है  और मनोकामना  पूर्ण करते है ।

 सुअरा नदी और तेल्हार कुण्ड,  भभुआ 
55 किमी लंबी कैमूर की जीवन रेखा सुअरा नदी जिसे सुवरा या सुवरन नदी भी कहा जाता है - तेल्हार कुण्ड और कैमूर पहाड़ियों से निकलकर भभुआ शहर, भगवानपुर और अधौरा के दर्जनों गाँवों को सींचती, अंत में दुर्गावती नदी में मिलती मौसमी नदी का जीर्णोद्धार ही कैमूर के किसानों का भविष्य है - मुण्डेश्वरी धाम से तेल्हार कुण्ड तक के परिभ्रमण में मिला नदी का सच । 
बिहार के कैमूर जिले की चर्चा आते ही लोग मुण्डेश्वरी धाम, तेल्हार कुण्ड और कर्कट जलप्रपात की बात करते हैं। पर कोई यह नहीं बताता कि इन सभी को जोड़ने वाली एक नदी है - सुअरा नदी।
इसे स्थानीय लोग सुवरा व सुअरा नदी और पुराने दस्तावेजों में सुवरन नदी भी कहा जाता है।
27 सितंबर 2026 को विश्व पर्यटन दिवस पर जब हम लोगों ने भगवानपुर प्रखंड के रामगढ़ स्थित मुण्डेश्वरी श्रृंखला से अधौरा प्रखंड के तेल्हार कुण्ड और तेल्हार झरना तक का परिभ्रमण किया, तो इसी नदी के किनारे-किनारे हम द्विपहिया मोटर साइकिल से गए। रास्ते में मुसहरवा बाबा मंदिर में बीड़ी प्रसाद भी चढ़ाया।
आज उसी सुअरा नदी का विस्तृत इतिहास, भूगोल और महत्व आपको बता रहा हूँ। परिभ्रमण दल में   सत्येन्द्र कुमार पाठक, साहित्यकार, इतिहासकार, बाल साहित्यकार, सृजन श्रेष्ठ सम्मान प्राप्त एवं  प्रवीण कुमार पाठक, प्रशिक्षण अधिकारी, जिला जीविका, औरंगाबाद शामिल है। 
सुअरा नदी बिहार के कैमूर जिले की एक प्रमुख छोटी और मौसमी नदी है। मौसमी का मतलब - यह साल भर नहीं बहती। बरसात में उफान पर और गर्मी में पतली धारा बनकर बहती है।
सुवरा नदी, सुवरन नदी की लंबाई  लगभग 55 किलोमीटर तथा  
-उद्गम  कैमूर की पहाड़ियां, तेल्हार कुण्ड व आसपास के पहाड़ी ,   प्रवाह क्षेत्र  अधौरा, भगवानपुर, भभुआ प्रखंड और   दुर्गावती नदी की सहायक नदी के रूप में मिलती है। दुर्गावती आगे कर्मनाशा में और कर्मनाशा गंगा में मिलती है। यह नदी कैमूर पर्वत समूह से प्रवाहित 55 किमी लंबी नदी है, पूरी तरह कैमूर जिले में है, पर इसका पानी रोहतास जिले के कुछ गांवों तक भी जाता है।
सुअरा नदी का जन्म तेल्हार कुण्ड से होता है।
अधौरा प्रखंड में तेल्हार कुण्ड है - 100 फीट गहरा प्राकृतिक कुण्ड, जो साल भर नहीं सूखता। इसी कुण्ड से पानी रिस-रिस कर नीचे गिरता है और वही पानी छोटी-छोटी धाराओं में मिलकर सुअरा नदी बन जाता है। तेल्हार कुण्ड के अलावा कैमूर पहाड़ियों से निकलने वाले कई झरने, बरसाती नाले और वर्षा का पानी भी इसमें मिलता है। इसलिए बरसात में यह नदी विकराल रूप ले लेती है। आपकी जो 4 तस्वीरें हैं - नदी के बीच चट्टान पर बैठना, गुफा में बैठना, झरना के मुहाने पर खड़ा होना - वह सभी सुअरा नदी के उद्गम क्षेत्र की ही हैं। हम लोगों ने वहीं देखा - पहाड़ से गिरता पानी एक कुण्ड में इकट्ठा हो रहा है और कुण्ड से आगे एक नदी बनकर बह रहा है। वही सुअरा है। : प्रवाह मार्ग - पहाड़ से भभुआ शहर तक है। सुअरा नदी का 55 किमी का सफर 3 प्रखंडों में बंटा है -
 अधौरा प्रखंड (0 से 20 किमी) जन्म से 20 किमी तक यह पहाड़ी नदी है। पहाड़ों के बीच, जंगलों के बीच बहती है। यहाँ पानी सबसे साफ है। आदिवासी खरवार, चेरो जनजाति इसी के पानी से खेती करते हैं। रास्ते में मुसहरवा बाबा मंदिर पड़ता है, जहाँ बीड़ी प्रसाद चढ़ता है। हमने वहीं स्नान किया।
. भगवानपुर प्रखंड (20 से 40 किमी) यहाँ नदी मैदान में उतरती है। मुण्डेश्वरी श्रृंखला के ठीक नीचे से बहती है। भगवानपुर के रामगढ़, भगवानपुर गांव के लोग इसी नदी से सिंचाई करते हैं। मुण्डेश्वरी धाम आने वाले भक्त इसी नदी में पैर धोते हैं। भभुआ प्रखंड (40 से 55 किमी) भभुआ शहर के पास से गुजरती है। भभुआ जिला मुख्यालय है। शहर की गंदगी मिलने से यहाँ पानी थोड़ा गंदा हो जाता है। अंत में यह दुर्गावती नदी में मिल जाती है।
सुअरा नदी  किसानों की जीवन रेखा है। कैमूर सूखा जिला माना जाता है। यहाँ नहरें कम हैं। इसलिए सुअरा नदी ही किसानों की जीवन रेखा है। भभुआ प्रखंड के 25 गांव , भगवानपुर प्रखंड के 20 गांव , अधौरा प्रखंड के 15 गांव के किसानों को सिंचाई में मदद मिलती है। लगभग 10 हजार एकड़ जमीन की सिंचाई इसी से होती है। तेल्हार कुण्ड में लोग पिकनिक मनाते हैं, वैसे सुअरा नदी किनारे भी इको टूरिज्म पार्क बन सकता है।
 सुअरा नदी और मुण्डेश्वरी - आध्यात्मिक संबंध सुअरा नदी का मुण्डेश्वरी से सीधा संबंध है। कहा जाता है कि पहले मुण्डेश्वरी मंदिर में जलाभिषेक सुअरा नदी के जल से ही होता था। पुजारी तेल्हार कुण्ड से जल लाते थे। आज भी नवरात्र में इसी नदी के जल से माता का अभिषेक होता है। इसलिए मुण्डेश्वरी धाम का परिभ्रमण सुअरा नदी के बिना अधूरा है। सुअरा नदी केवल 55 किमी लंबी नदी नहीं, यह कैमूर की आत्मा है। यह पहाड़ से निकलती है, जंगल को सींचती है, आदिवासियों को पानी देती है, मुण्डेश्वरी का जलाभिषेक करती है, भभुआ शहर को छूती है और अंत में दुर्गावती में मिलकर गंगा तक जाती है। तेल्हार कुण्ड का पानी, मुसहरवा बाबा की बीड़ी, मुण्डेश्वरी की 510 सीढ़ियां और सुअरा नदी की कल-कल - यही चार मिलकर कैमूर का संपूर्ण पर्यटन बनाते हैं।
मुण्डेश्वरी की 510 सीढ़ी, चढ़ते-चढ़ते सांस फूली, पर माता के दरबार में पहुंचते ही सारी थकान भूली। तेल्हार का पानी कहता है, रुक जाओ दो घड़ी, सुअरा की धारा कहती है, बहती हूँ मैं बड़ी-बड़ी।.जय माँ मुण्डेश्वरी, जय तेल्हार कुण्ड, जय मुसहरवा बाबा, जय सुअरा नदी, जय कैमूर, जय बिहार।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें