बिहार की माटी ; माँ की ममता
सत्येंद्र कुमार पाठक
जितिया: बिहार की माटी में जीवित जीमूतवाहन की त्याग-कथा
मातृत्व, लोकविश्वास और करुणा का वह पर्व, जिसमें सदियों पुरानी कथा आज भी सांस लेती है
बिहार की सांस्कृतिक स्मृति में कुछ पर्व ऐसे हैं, जिनकी पहचान केवल पूजा-पद्धति से नहीं, बल्कि लोककथा, लोकगीत और पीढ़ियों से चली आ रही सामूहिक स्मृतियों से होती है। जितिया, जिसे जीवित्पुत्रिका या जिउतिया भी कहा जाता है, ऐसा ही एक पर्व है। संतान के दीर्घ जीवन, आरोग्य और मंगल की कामना से किया जाने वाला यह व्रत विशेष रूप से माताओं के बीच आस्था का बड़ा पर्व है। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई-मधेश के अनेक हिस्सों में इसकी परंपरा आज भी दिखाई देती है।बिहार में जितिया का संसार और भी आत्मीय है। यहाँ यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि माँ की ममता, स्त्री की साधना, लोकगीतों की मिठास और पारिवारिक-सामुदायिक स्मृति का उत्सव बन जाता है। इसके केंद्र में है राजा जीमूतवाहन की वह कथा, जिसमें एक राजा ने किसी अपने स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि एक दूसरे प्राणी के जीवन की रक्षा के लिए अपना जीवन तक संकट में डाल दिया।
यही कारण है कि जितिया की कथा सुनते समय मिथिला की माताओं के लिए जीमूतवाहन केवल पौराणिक पात्र नहीं रह जाते; वे त्याग और करुणा के प्रतीक बन जाते हैं।
कथा का नायक कौन है जीमूतवाहन?
जीमूतवाहन का उल्लेख संस्कृत साहित्य की महत्वपूर्ण परंपरा में मिलता है। महाकवि हर्ष के संस्कृत नाटक ‘नागानन्द’ में उनकी कथा प्रमुख रूप से सामने आती है। इसके अतिरिक्त कथासरित्सागर की कथा-परंपरा में भी जीमूतवाहन का प्रसंग मिलता है।
इन साहित्यिक आख्यानों में जीमूतवाहन को विद्याधर वंश का राजा बताया गया है। भारतीय पौराणिक कल्पना में विद्याधर ऐसे दिव्य या अलौकिक प्राणी माने गए हैं, जिनके पास असाधारण शक्तियाँ होती हैं। कथा के अनुसार जीमूतवाहन के पिता का नाम जीमूतकेतु था। वे एक धार्मिक और प्रजावत्सल राजा थे। जीमूतवाहन स्वयं भी राजसी वैभव से अधिक धर्म, दया और परोपकार को महत्व देते थे। उनका राज्य कांचनपुर बताया गया है। लेकिन जीवन में एक ऐसा मोड़ आया, जब उन्होंने राजपाट और सांसारिक वैभव से दूरी बना ली और पिता के साथ मलय पर्वत की ओर चले गए। यहीं उनके जीवन में मलयवती का प्रवेश हुआ। कथा के अनुसार मलयवती सिद्धों के राजा विश्वावसु की पुत्री थीं। दोनों का विवाह हुआ। किंतु विवाह और गृहस्थ जीवन के बाद भी जीमूतवाहन का मूल स्वभाव—दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझना—बदला नहीं।
एक माँ का विलाप और बदल गया इतिहास है ! मलय पर्वत के आसपास की कथा में एक दिन जीमूतवाहन की दृष्टि एक अत्यंत दुखी युवक पर पड़ी। वह नागकुमार शंखचूड़ था।
नागों और गरुड़ के बीच वैर की पौराणिक कथा भारतीय साहित्य में प्रसिद्ध है। जीमूतवाहन ने देखा कि शंखचूड़ की बारी गरुड़ के सामने जाने की थी। उसकी वृद्ध माता अपने पुत्र को मृत्यु के मुख में जाता देखकर विलाप कर रही थी।
यह दृश्य जीमूतवाहन को भीतर तक विचलित कर गया।
राजा होने के बावजूद उन्होंने अपने पद, अपने जीवन और अपने भविष्य के बारे में नहीं सोचा। उन्होंने सोचा—एक माँ के सामने उसके पुत्र की मृत्यु हो रही है और यदि मैं उसे बचा सकता हूँ तो मुझे ऐसा करना चाहिए। यहीं से जीमूतवाहन की कथा त्याग की ऐसी मिसाल बन जाती है, जिसे भारतीय लोकस्मृति ने सदियों तक सँजोकर रखा।
नागकुमार के स्थान पर स्वयं लेट गए ,जीमूतवाहन ने शंखचूड़ को उसके घर जाने के लिए कहा और स्वयं उसके स्थान पर जाने का निर्णय लिया। उन्होंने नागकुमार के स्थान पर स्वयं को प्रस्तुत कर दिया। गरुड़ वहाँ पहुँचा और जीमूतवाहन को नाग समझकर अपने पंजों में उठा लिया। कथा का सबसे मार्मिक पक्ष यही है कि जीमूतवाहन ने अपने प्राण बचाने का कोई प्रयास नहीं किया।
जब गरुड़ को उनके वास्तविक परिचय और त्याग का पता चला, तो वह भी इस असाधारण करुणा से प्रभावित हुआ। कथा के अनुसार अंततः नागों की बलि की परंपरा समाप्त हुई और अनेक प्राणियों के जीवन की रक्षा का मार्ग खुला।
इस कथा का संदेश केवल इतना नहीं कि एक राजा ने अपना जीवन दाँव पर लगाया। इसका बड़ा संदेश यह है कि सच्चा धर्म वह है जिसमें दूसरे के दुःख को देखकर मनुष्य निष्क्रिय न रहे।
जितिया में क्यों याद किए जाते हैं जीमूतवाहन?
यही प्रश्न जितिया की सांस्कृतिक आत्मा को समझने में मदद करता है। जितिया व्रत संतान के जीवन और मंगल की कामना से किया जाता है। जीमूतवाहन की कथा में भी एक माँ के पुत्र के जीवन की रक्षा सबसे महत्वपूर्ण घटना है।
एक ओर शंखचूड़ की माँ अपने पुत्र को बचाने के लिए व्याकुल है, दूसरी ओर जीमूतवाहन उस माँ के दुःख को समझकर स्वयं को संकट में डाल देते हैं।
इस प्रकार कथा में माँ और पुत्र का संबंध तथा दूसरे के लिए त्याग—दोनों भाव एक साथ दिखाई देते हैं।
लोकपरंपरा ने इन्हीं भावों को अपने तरीके से आत्मसात किया और जीमूतवाहन को जितिया व्रत के साथ जोड़ दिया।
मिथिला में जितिया: व्रत से आगे लोकजीवन
मिथिला में कोई भी बड़ा पर्व केवल धार्मिक विधि नहीं होता। उसके साथ गीत, भोजन, रिश्ते, स्मृतियाँ और स्थानीय लोकाचार जुड़ जाते हैं। जितिया भी इससे अलग नहीं है।
व्रत के दिनों में महिलाओं के बीच इसकी चर्चा, कथा-वाचन और पारंपरिक गीतों की परंपरा रही है। गाँवों में पहले यह दृश्य सामान्य था कि एक घर की बुजुर्ग महिला दूसरी महिलाओं और बच्चों को जितिया की कथा सुनाती थी।
कथा सुनाने की यह परंपरा अपने आप में एक लोक-विद्यालय थी। किताबों में दर्ज इतिहास से अलग, ऐसी कथाओं के माध्यम से परिवार की महिलाएँ आने वाली पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक स्मृति सौंपती थीं।
आज जीवनशैली बदल रही है, लेकिन यह परंपरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। अनेक परिवारों में आज भी जितिया के अवसर पर कथा और पूजा के माध्यम से वही सांस्कृतिक स्मृति दोहराई जाती है।
ओठगन से निर्जला व्रत तक
जितिया की तैयारी और अनुष्ठान में क्षेत्रीय विविधताएँ मिलती हैं। कई स्थानों पर व्रत से पहले ओठगन की परंपरा है। इसके बाद व्रती महिलाएँ कठिन उपवास का संकल्प लेती हैं।
जितिया व्रत का निर्जला स्वरूप विशेष रूप से प्रसिद्ध है। व्रती महिलाएँ संतान के कल्याण की कामना से अन्न और जल का त्याग करती हैं।
यह उपवास केवल शारीरिक संयम नहीं माना जाता, बल्कि लोकविश्वास में इसे संकल्प, श्रद्धा और मातृत्व की परीक्षा के रूप में देखा जाता है।
हालाँकि आधुनिक संदर्भ में स्वास्थ्य का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। लंबे समय तक निर्जला उपवास हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित नहीं हो सकता। इसलिए परंपरा का सम्मान करते हुए भी व्यक्तिगत स्वास्थ्य और चिकित्सकीय सलाह को ध्यान में रखना जरूरी है।
लोकगीतों में उतरती माँ की ममता
मिथिला की पहचान उसके लोकगीतों से है। विवाह हो, सोहर हो, छठ हो या कोई अन्य पर्व—गीतों के बिना मिथिला की लोकसंस्कृति अधूरी लगती है।
जितिया में भी लोकगीतों का अपना संसार है। इन गीतों में संतान के लिए मंगलकामना, माँ की चिंता, परिवार की खुशहाली और व्रत की कठिन साधना के भाव मिलते हैं।
इन गीतों का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इनमें शास्त्रीय भाषा की औपचारिकता नहीं, बल्कि लोकभाषा की सहज आत्मीयता होती है।
एक माँ अपनी संतान के लिए जो भाव मन में रखती है, वही लोकगीतों में स्वर पाता है। इसलिए जितिया के गीतों को केवल धार्मिक गीत कह देना उनके सांस्कृतिक महत्व को छोटा करना होगा। वे मिथिला के स्त्री-जीवन और उसकी भावनात्मक दुनिया के मौखिक दस्तावेज भी हैं।
स्त्रियों का अपना सांस्कृतिक संसार
जितिया में स्त्रियाँ केवल व्रती नहीं होतीं। वे इस पर्व की मुख्य वाहक भी हैं।
व्रत की तैयारी, पूजा, कथा, गीत और अगली पीढ़ी को परंपरा से परिचित कराने की जिम्मेदारी मुख्यतः उन्हीं के माध्यम से आगे बढ़ती रही है।
इस दृष्टि से जितिया मिथिला की स्त्रियों की सांस्कृतिक भूमिका को समझने का भी एक महत्वपूर्ण अवसर है।
घर के भीतर होने वाला यह अनुष्ठान दरअसल व्यापक सामाजिक स्मृति का निर्माण करता है। एक पीढ़ी की दादी जिस कथा को अपनी पोती को सुनाती है, वह केवल कथा नहीं होती—उसमें उस परिवार और समाज की कई पीढ़ियों का अनुभव छिपा होता है।
एक जरूरी ऐतिहासिक सावधानी
जीमूतवाहन के नाम को लेकर एक महत्वपूर्ण भ्रम भी मिलता है।
जितिया की कथा वाले जीमूतवाहन को 12वीं शताब्दी के प्रसिद्ध धर्मशास्त्री जीमूतवाहन से अलग समझना चाहिए। मध्यकालीन भारत के धर्मशास्त्रकार जीमूतवाहन को दायभाग के रचयिता के रूप में जाना जाता है। उनका संबंध बंगाल की विद्वत् परंपरा से था।
इसके विपरीत जितिया की कथा के जीमूतवाहन साहित्यिक-पौराणिक परंपरा के विद्याधर राजा हैं, जिनकी कथा नागानन्द और कथासरित्सागर जैसी रचनाओं में मिलती है।
समान नाम के कारण दोनों को एक ही व्यक्ति मानना उचित नहीं है।
बदलते समय में जितिया
आज मिथिला का सामाजिक जीवन तेजी से बदल रहा है। संयुक्त परिवारों की जगह छोटे परिवार ले रहे हैं। गाँवों से शहरों की ओर पलायन हुआ है। लोकगीतों की जगह कई बार मोबाइल फोन और सोशल मीडिया ने ले ली है।
फिर भी जितिया का सांस्कृतिक महत्व समाप्त नहीं हुआ।
बल्कि नए माध्यमों ने इसके गीतों और कथाओं को दूर-दराज के लोगों तक पहुँचाने का नया रास्ता खोल दिया है। विदेशों में रहने वाले मिथिलावासी भी अपने घर-परिवार की परंपराओं को डिजिटल माध्यमों से जोड़ रहे हैं।
इस बदलते समय में चुनौती यह है कि परंपरा केवल कर्मकांड बनकर न रह जाए। उसके पीछे छिपे करुणा, त्याग, मातृत्व और लोक-स्मृति के मूल भाव भी अगली पीढ़ी तक पहुँचें।
जीमूतवाहन की कथा का आज के लिए अर्थ
जीमूतवाहन की कथा को आज पढ़ते हुए उसका अर्थ केवल धार्मिक विश्वास तक सीमित नहीं रहता।
एक ऐसे समय में जब समाज में व्यक्तिगत स्वार्थ और प्रतिस्पर्धा की चर्चा अक्सर होती है, जीमूतवाहन का चरित्र दूसरे के जीवन को अपने जीवन से अधिक महत्व देने की कल्पना सामने रखता है।
उन्होंने यह नहीं पूछा कि सामने वाला किस जाति, समुदाय या कुल का है। उन्होंने केवल इतना देखा कि एक माँ अपने पुत्र को खोने वाली है और उसके दुःख को कम करने के लिए वे कुछ कर सकते हैं।
यही इस कथा की सबसे मानवीय शक्ति है।
निष्कर्ष
जितिया मिथिला की मिट्टी में रचा-बसा ऐसा पर्व है, जिसमें धर्म और लोकजीवन एक-दूसरे से अलग नहीं दिखाई देते। व्रत है, तो उसके साथ कथा है; कथा है, तो उसके साथ लोकगीत हैं; और लोकगीत हैं, तो उनमें माँ की ममता और परिवार की स्मृति जीवित है।
राजा जीमूतवाहन की कथा इस पूरे पर्व को एक गहरा नैतिक अर्थ देती है। उन्होंने एक नागकुमार के प्राण बचाने के लिए स्वयं को गरुड़ के सामने प्रस्तुत किया। उनका त्याग लोकस्मृति में इसलिए अमर हुआ क्योंकि उसमें किसी पुरस्कार या स्वार्थ की अपेक्षा नहीं थी।
बिहार की माताएँ जब जितिया के दिन संतान की दीर्घायु के लिए संकल्प लेती हैं, तो उनके हाथों में केवल पूजा की सामग्री नहीं होती—उनके साथ सदियों पुरानी एक कथा भी होती है।
वह कथा कहती है कि जीवन का मूल्य केवल अपने लिए जीने में नहीं, बल्कि किसी दूसरे के जीवन की रक्षा करने में भी है।
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