सोमवार, मार्च 29, 2021

शाकद्वीप : शक संबत...



        वेदों , पुराणों और जयोतिष ग्रंथों में विश्व की भूभाग को स्वायंभुव मनु और शतरुपा के अंश से उत्पन्न पुत्रों में वीर , प्रियव्रत तथा उत्तानपाद द्वारा  सात द्वीपों में विभक्त किया गया है। प्रियब्रत द्वारा  अपने पुत्र महात्मा भव्य को शाकद्वीप का स्वामी बनाया  है । भव्य के पुत्रों में जलद , कुमार, सुकुमार, मनीरक , कुसुमोद , गोदाकी तथा महाद्रुम द्वारा अपने अपने नाम पर देश की स्थापना की गयी थी। शाकद्वीप में मग ( ब्राह्मण ), मागध ( क्षत्रिय ) , मानस ( वैश्य ) तथा मंदग ( शूद्र ) है। शाकद्वीप की भूमि पर भगवान सूर्य आराध्य देव है। प्राचीन काल में शाकद्वीप के निवासी को शाकद्वीपीय , शाकद्वीप, शकद्वीप , शकदीप सकलदीपी , सकल , शकल  और  शक , स्किथी , स्किथिया , प्राचीन मध्य एशिया में कहा गया था।  प्राचीन भारतीय, ईरानी, यूनानी और चीनी स्रोत इनका अलग-अलग है।  स्किथी विश्व के शक प्राचीन ईरानी भाषा-परिवार की बोली बोलते थे और इनका अन्य स्किथी-सरमती लोगों से सम्बन्ध था। शकों का भारत के इतिहास पर गहरा असर रहा है क्योंकि यह युएझ़ी लोगों के दबाव से भारतीय उपमहाद्वीप में घुस आये और  साम्राज्य बनाया था । भारतीय राष्ट्रीय कैलंडर 'शक संवत'  है।  इतिहासकार के अनुसार  दक्षिण एशियाई साम्राज्य को 'शकास्तान' कहा हैं । शकस्थान में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, सिंध, ख़ैबर-पख़्तूनख़्वा और अफ़्ग़ानिस्तान शामिल थे। पहली शताब्दी ई. पू.  में स्किथिया और सरमतिया , मध्य एशिया का भौतिक मानचित्र, पश्चिमोत्तर में कॉकस से पूर्वोत्तर में मंगोलिया तक स्किथियों के सोने के अवशेष, बैक्ट्रिया की तिलिया तेपे पुरातन-स्थल से ३०० ईसापूर्व में मध्य एशिया के पज़ियरिक क्षेत्र से शक (स्किथी) घुड़सवार थे। 
शक प्राचीन आर्यों के वैदिक कालीन रहे हैं । शाकद्वीप पर बसने के कारण शाक अथवा शक कह गया है ।  पुराणों  के अनुसार शक्तिशाली राजा सगर द्वारा शक को देश निकाला गया था । हूणों द्वारा शकों को शाकल द्वीप क्षेत्र से खदेड़ दिया गया था। जिसके परिणाम स्वरुप शकों का कई क्षेत्रों में बिखराव हुआ। पुराणों में शक   की उत्पत्ति सूर्यवंशी राजा नरिष्यंत  है। राजा सगर ने राजा नरिष्यंत को राज्यच्युत तथा देश से निर्वासित किया था। वर्णाश्रम आदि के नियमों का पालन न करने के कारण तथा ब्राह्मणों से अलग रहने के कारण वे म्लेच्छ हो गए थे। उन्हीं के वंशज शक कहलाए। शकद्वीप के नाम से मध्य एशिया प्रसिद्ध था। यूनानी लोग शक  देश को 'सीरिया' कहते थे।  मध्य एशिया के रहनेवाला शक है। शक साम्राज्य  बड़ी प्रतापशालिनी थी। ईसा से दो सौ वर्ष पूर्व  शक ने मथुरा और महाराष्ट्र पर अपना अधिकार कर लिया था। शक को देवपुत्र कहते थे। इन्होंने १९० वर्ष तक भारत पर राज्य किया था। इनमें कनिष्क और हविष्क आदि बड़े बड़े प्रतापशाली राजा हुए हैं।भारत के पश्चिमोत्तर भाग कापीसा प्रदेश  और गांधार  प्रदेश  में यवनों के कारण ठहर न सके और बोलन घाटी पार कर भारत में प्रविष्ट हुए। तत्पश्चात् उन्होंने पुष्कलावती एवं तक्षशिला पर अधिकार कर लिया और वहाँ से यवन हट गए। 72 ई. पू. शकों का प्रतापी नेता मोअस उत्तर पश्चिमांत के प्रदेशों का शासक था। उसने महाराजाधिराज महाराज की उपाधि धारण की जो उसकी मुद्राओं पर अंकित है। उसी ने अपने अधीन क्षत्रपों की नियुक्ति की जो तक्षशिला, मथुरा, महाराष्ट्र और उज्जैन में शासन करते थे।  शक विदेशी समझे जाते थे यद्यपि उन्होंने शैव मत को स्वीकार कर किया था। मालव जन ने विक्रमादित्य के नेतृत्व में मालवा से शकों का राज्य समाप्त कर दिया और इस विजय के स्मारक रूप में विक्रम संवत् का प्रचलन किया । शकों के अन्य राज्यों का शकारि विक्रमादित्य गुप्तवंश के चंद्रगुप्त द्वितीय ने समाप्त करके एकच्छत्र राज्य स्थापित किया। शकों को अन्य विदेशी जातियों की भाँति भारतीय समाज ने आत्मसात् कर लिया। शकों की प्रारंभिक विजयों का स्मारक शक संवत् प्रचलित है। शक प्राचीन मध्य एशिया में रहने वाली स्किथी लोगों की एक जनजाति या जनजातियों का समूह था। प्राचीन भारतीय, ईरानी, यूनानी और चीनी स्रोत इनका अलग-अलग विवरण देते हैं। इतिहासकार मानते हैं कि ‘शक स्किथी थे, लेकिन सभी स्किथी शक नहीं थे’, यानि ‘शक’ स्किथी समुदाय के अन्दर के कुछ हिस्सों का जाति नाम था ।
शकों के प्रारंभिक इतिहास की जानकारी के लिये हमें चीनी स्रोतों पर निर्भर रहना पङता है। इनमें पान-कू कृत सिएन-हान-शू अर्थात् प्रथम हान वंश का इतिहास तथा फान-ए कृत हाऊ-हान – शू अर्थात् परवर्ती हान वंश का इतिहास उल्लेखनीय है। 11 शक वंश के शासकों का इतिहास हिस्ट्री आँफ रुल्स आँफ शाक डायनोस्टी 
इनके अध्ययन से यू-ची, हूण तथा पार्थियन जाति के साथ शकों के संघर्ष तथा उनके प्रसार का ज्ञान होता है। चीनी ग्रंथ तथा लेखक शकों की सई अथवा सई वांग कहते हैं।भारत में शासन करने वाले शक तथा पल्लव शासकों का ज्ञान हमें मुख्य रूप से उनके लेखों तथा सिक्कों से होता है। शकों के प्रमुख लेख निम्नलिखित हैं-राजवुल का मथुरा सिंह शीर्ष, स्तंभलेख।शोडास का मथुरा दानपत्रलेख।नहपानकालीन नासिक के गुहालेख।नहपानकालीन जुन्नार का गुहालेख।उषावदान के नासिक गुहालेख।रुद्रदामन का अंधौ (कच्छ की खाङी) का लेख।रुद्रदामन का गिरनार (जूनागढ) का लेख। सातवाहन राजाओं के लेखों से शकों के साथ उनके संबंधों का ज्ञान होता है। लेखों के अतिरिक्त पश्चिमी तथा उत्तरी पश्चिमी भारत के बङे भाग से शक राजाओं के बहुसंख्यक सिक्के प्राप्त हुए हैं। कनिष्क के लेखों से पता चलता है, कि कुछ शक-क्षत्रप तथा महाक्षत्रप उसकी अधीनता में देश के कुछ भागों में शासन करते थे। रामायण तथा महाभारत जैसे भारतीय साहित्यों में यवन, पल्लव आदि विदेशी जातियों के साथ शकों का उल्लेख होता है। कात्यायन एवं पतंजलि शकों से परिचित थे। मनुस्मृति में  शकों का उल्लेख मिलता है।पुराणों में  शक, मुरुण्ड, यवन जातियों का उल्लेक मिलता है। भारतीय ग्रंथों में गार्गीसंहिता, विशाखादत्त कृत देवीचंद्रगुप्तम, बाण कृत हर्षचरित, राजशेखर कृत काव्यमीमांसा में  शकों का उल्लेख मिलता है।जैन ग्रंथों में शकों के विषय में विस्तृत जानकारी मिलती है। जैन ग्रंथ कालकाचार्य कथानक में उज्जयिनी के ऊपर शकों के आक्रमण तथा विक्रमादित्य द्वारा उनके पराजित किये जाने का उल्लेख मिलता है।भारतीय साहित्य में शकों के प्रदेश  को शकद्वीप अथवा शकस्थान कहा गया है।शकों की उत्पत्ति तथा प्रसार- शक मूलतः सीरदरया के उत्तर में निवास करने वाली एक खानदेश तथा बर्बर जाति थी। चीनी ग्रंथों से पता चलता है कि, 165 ईसा पूर्व के लगभग यू-ची नामक एक अन्य जाति ने उन्हें परास्त कर वहाँ सेर खदेङ दिया। शकों ने सीरदया पार कर बल्ख (बैक्ट्रिया) पर अधिकार कर लिया तथा वहाँ के यवनों को परास्त कर भगा दिया। परंतु यू-ची जाति ने वहाँ भी उनका पीछा किया तथा पुनः परास्त हुये। पराजित शक जाति दो शाखाओं में विभक्त हो गयी। उनकी एक शाखा दक्षिण की ओर गयी तथा कि-पिन (कपिशा) पर अधिकार कर लिया। दूसरी शाखा पश्चिम में ईरान की ओर गईा।वहाँ उसे शक्तिशाली पार्थियन सम्राटों से युद्ध करना पङा। शकों ने दो पार्थियन राजाओं फ्रात द्वितीय तथा आर्तबान पार्थियन सम्राटों को पराजित कर पूर्वी ईरान तथा एरियाना के प्रदेशों पर अधिकार कर लिया। परंतु पार्थियन नरेश मिथ्रदात द्वितीय ने शकों को बुरी तरह परास्त कर ईरान के पूर्वी प्रदेशों पर पुनः अधिकार कर लिया। यहाँ से भागकर शक हेलमंड घाटी (दक्षिणी अफगानिस्तान) में आये तथा वहीं बस गये। इस स्थान को शकस्थान (सीस्तान) कहा गया। यहाँ से कंधार और बोलन दर्रा होते हुये वे सिंधु नदी – घाटी में जा पहुँचे। उन्होंने सिंध प्रदेश में अपना निवास-स्थान बना लिया। शकों के साथ संपर्क के कारण इस स्थान को शक-द्वीप कहा गया। इस प्रकार भारत में शक पूर्वी ईरान से होकर आये थे। उन्होंने पश्चिमोत्तर प्रदेशों से यवन-सत्ता को समाप्त कर उत्तरापथ एवं पश्चिमी भारत के बङे भू-भाग पर अपना अधिकार कर लिया। तक्षशिला, मथुरा, महाराष्ट्र, उज्जयिनी आदि स्थानों में शकों की भिन्न-2 शाखायें स्थापित हुई। शक नरेशों के भारतीय प्रदेशों के शासक क्षत्रप कहे जाते थे। शाकद्वीप के निवासी प्रकृति पूजक में भगवान सूर्य  की उपासना , चंद्रमा , बरगद , आँवला , पीपल , नीम , शाक  पेड. , नदियों में गंगा , सरस्वती  नदियाँ की पूजन का महत्वपूर्ण स्थान है । यहां के निवासियों में मग द्वारा आयुर्वेद , चिकित्सा पद्धति का जन्म  दिया गया है।
ईरान , उज्जयिनी , कंधार , कनिष्क ,कपिशा , कालकाचार्य काव्यमीमांसा , क्षत्रपखानदेश ,गार्गी संहिता जैन ग्रंथ ,तक्षशिलादेवीचंद्रगुप्तम ,पान-कू कृत सिएन-हान-शूफान-ए कृत हाऊ-हान - शूबल्खबाणबैक्ट्रियाबोलन दर्रा मथुरामहाराष्ट्र यू-चीविक्रमादित्य ,शक-द्वीपशकद्वीप शकस्थान , सई वांग , हर्षचरितहूण तथा पार्थियन। भारत में मौर्योत्तर इंडो-ग्रीक(हिन्द-यवन) शासकों का इतिहास में शकों की प्रमुख शाखाओं का वर्णन में अशोकआधुनिक भारतआधुनिक भारतीय इतिहास में सकल्याणी का चालुक्य वंशगुप्त , कालगुप्त काल में चोल जनवरीजैन,  धर्मदक्षिण भारत में दिल्ली सल्तनत ,  पल्लव राजवंश प्रमुख स्थलप्रश्न एवं प्राचीन भारत ,  फ्रांस की क्रांतिबादामी का चालुक्य वंशबौद्ध कालभक्ति आंदोलन मध्यकालीन मुगल काल , मौर्य काल का मौर्य साम्राज्य का युद्धवर्द्धन वंश , विश्व का वेंगी के चालुक्यवैदिक काल ,वैदिक काल का शाकंभरी का चौहान वंशसम सामयिकीसम , सामयिकीसिंधु घाटी सभ्यतासिंधु घाटी सभ्यता स्त्रोंतस्लाइड , हर्षवर्धन है। शाकद्वीप की चर्चा ब्रह्म , विष्णु, शिव ,लिंग , वाराह ,स्कंद ,गरुड़ , ब्रह्मांड ,मत्स्य ,अग्नि, कुर्म ,सांब, नारद भविष्य ,पद्म ,वायु ब्रह्मवैवर्त पुराणों , देवी भागवत मार्कण्डेय पुराण , महाभारत  में है ।इतिहास के  अनुसार शाकद्वीप के निवासियों को शाक , शक कहा गया है। चीन के इतिहासकार पान कू की पुस्तक सिएन - हान् - शू , फान -ए रचित हाऊ - हान - शू में शकों को सई , साई , सई वांग का उल्लेख मिलता है । भारत में शाकद्वीप को शाक प्रदेश कहा जाता है । शक ने 128 ई.पू. में पार्थियन राजा फ्रांत तथा 123 ई. पू . आर्तवान को पराजित करपूर्वी ईरान और एरियाना पर अधिकार कर शाक संस्कृति फैलाया था। शाकद्वीप संस्कृति में सौर धर्म प्रमुख है । बिहार का मगध , अंग , मिथिला , वैशाली  साम्राज्य , झारखंड , उडीसा , गुजरात , राजस्थान , उतरप्रदेश , मध्यप्रदेश , मिश्र , ईरान ,गंधार ,पेशावर ,महाराष्ट्र  आदि स्थान पर शक का शासन था । मगध साम्राज्य की राजधानी  राजगीर , पाटलिपुत्र , वैशाली , प्रतिष्ठान पुर में विभिन्न राजाओं द्वारा स्थापित किया गया है । राजा प्टथु काल में राजा मागध द्वारा मगध साम्राज्य का निर्माण कर गया मे राजधानी बनाया था। 6400 ई.पू. महाभारत काल में शाकद्वीप सम्राट कर्तार्जुन काल और वर्तमान समय के मानचित्र के अनुसार शाकद्वीप में उतरी अमेरिका , ग्रीनलैंड, वेस्टइंडीज ,कोलंबिया, इक्वडोर शामिल था । शाकद्वीपीय ब्राह्मण को मग , दिव्य, वेदांग , भोजक ,वाचक, साधक , सौर , ऋतब्रत। , वाचक , याजक , शाक , मगी कहा जाता है । वायु के साथ चलने की शक्ति को शाक कहा जाता है। इरान में मगियों ने 1000 ई. पू . अवेस्था ( जेद अवेस्ता ) में सूर्य और अग्नि की उपासना का उल्लेख है। शाकद्वीपीय ब्राह्मण को  आर् , अर्क , आदित्य, किरण ,कर और मंडल के रूप में ख्याति है । शाकद्वीपीय ब्राह्मण ने भगवान सूर्य और चंद्र तथा ग्रह के आधार पर ज्योतिष शास्त्र की उद्भव किया तथा आयुर्वेद , चिकित्सा का उत्पत्ति कर मानव जीवन के कल्याण कर प्रकृति के संरक्षण और संवर्धन का मंत्र दिया है।

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