महागाथा प्रीतिकूट (पीरू)
: सत्येंद्र कुमार पाठक
बिहार की पावन धरा इतिहास के किसी एक कालखंड या किसी एक विचारधारा की बपौती नहीं रही है, बल्कि यह वह अनंत कैनवास है जहाँ मानव सभ्यता के विकास के विभिन्न सोपानों ने एक साथ आकार लिया। मगध और भोजपुर की सांस्कृतिक सीमाओं को स्पर्श करता हुआ, वर्तमान औरंगाबाद और अरवल जिलों के मिलन-बिंदु पर स्थित 'प्रीतिकूट' (जिसे मध्यकाल से आज तक 'पीरू' या 'अबू नसीरपुर' कहा जाता है) भारत की उसी बहुरंगी और बहुसांस्कृतिक आत्मा का जीवंत प्रतीक है। यह केवल एक गाँव या 620 हेक्टेयर (6.2 वर्ग किलोमीटर) में फैला एक भौगोलिक भू-भाग नहीं है; यह एक ऐसा ज्ञान-तीर्थ और सांस्कृतिक महासंगम है, जहाँ एक ओर वैदिक ऋचाओं का सस्वर पाठ हुआ, तो दूसरी ओर सूफी संतों की रूहानी कव्वालियों ने दिलों को जोड़ा। यह वह भूमि है जिसने संस्कृत साहित्य के सार्वभौमिक सम्राट महाकवि बाणभट्ट को जन्म दिया, और यह वही भूमि है जहाँ बगदाद के सूफी संतों ने आकर प्रेम और मानवता का संदेश फैलाया। समुद्र तल से 93 मीटर (305 फीट) की ऊंचाई पर अवस्थित यह क्षेत्र 2011 की जनगणना के अनुसार 8537 की आबादी (जिसमें 4372 पुरुष और 4165 स्त्रियां 1334 परिवारों में निवासरत हैं) के साथ आज भी अपनी उस गौरवशाली विरासत को संजोए हुए है, जिसने हर्षवर्धन काल से लेकर मुगल काल और आधुनिक काल तक भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास को गहरे तक प्रभावित किया। प्रस्तुत विस्तृत आलेख विभिन्न ऐतिहासिक साक्ष्यों, साहित्यिक संदर्भों और लोक-परंपराओं के आधार पर प्रीतिकूट के सौर, शाक्त, ब्रह्म, शैव, वैष्णव, ऋषि, पितृ और सूफी अवदानों का एक प्रामाणिक दस्तावेजीकरण है। किसी भी महान सभ्यता या सांस्कृतिक केंद्र के उदय के पीछे वहाँ की भौगोलिक स्थिति और प्राकृतिक संसाधनों का बहुत बड़ा हाथ होता है। प्रीतिकूट के साथ भी यही नियम लागू होता है।
प्राचीन प्रीतिकूट आज के प्रशासनिक मानचित्र पर बिहार राज्य के औरंगाबाद जिले के हसपुरा प्रखंड के अंतर्गत आता है, परंतु इसकी सीमा अरवल जिले के कलेर प्रखंड से ठीक 4 किलोमीटर की दूरी पर मिलती है। यह दोनों सांस्कृतिक क्षेत्रों (मगध और प्राचीन शोण-तटीय संस्कृति) का संधिकाल है। 620 हेक्टेयर के विस्तीर्ण क्षेत्र में फैले इस ऐतिहासिक स्थल की ऊंचाई समुद्र तल से 93 मीटर (305 फीट) है, जो इसे भौगोलिक दृष्टि से सुरक्षित और शांत बनाती थी। इसी सुरक्षा और शांति के कारण प्राचीन मनीषियों ने इसे अपनी साधना के लिए चुना।
प्राचीन ग्रंथों और महाकवि बाणभट्ट की स्व-लिखित कृति 'हर्षचरितम' के अनुसार, यह क्षेत्र पवित्र 'हिरण्यबाहु नदी' के तट पर अवस्थित था। 'हिरण्यबाहु' (जिसका शाब्दिक अर्थ है - सोने की बाहों वाली) वास्तव में 'शोण' या आधुनिक सोन नदी की ही एक प्राचीन, अत्यंत पवित्र उप-धारा थी, जो स्वर्ण-कणों को अपने साथ बहाकर लाती थी। नदी के कछार की उपजाऊ मिट्टी ने जहाँ एक ओर कृषि को समृद्ध किया, वहीं इसके शांत और शीतल किनारों ने तपस्वियों को आकर्षित किया। आज भले ही हिरण्यबाहु नदी समय के थपेड़ों और भौगोलिक परिवर्तनों के कारण विलुप्त हो चुकी है, लेकिन इसके पुरातात्विक और साहित्यिक साक्ष्य आज भी इस भूमि की प्राचीनता को प्रमाणित करते हैं।
प्रीतिकूट के नामकरण और इसके एक महान ज्ञान-केंद्र के रूप में स्थापित होने की कहानी सीधे तौर पर वैदिक ऋषि संस्कृति से जुड़ी हुई है। हिरण्य प्रदेश के भृगु वंशीय ऋषि च्यवन एवं सुकन्या के पुत्र प्रीतिकुट के आदि संस्थापक वात्स्यान गोत्र के प्रवर्तक ऋषि वतस के वंशज पीढ़ियों का अनवरत ज्ञान प्रवाह करने वाले वेदांत चित्रभानु एवं राजदेवी के पुत्र 7 वीं सदी ई का संस्कृत साहित्य गद्यकार बाण भट्ट की जन्म स्थली थी ।
हर्षचरितम के प्रथम उच्छ्वास (अध्याय) के अनुसार, प्रीतिकूट के मूल संस्थापक ऋषि वत्स ही थे। ऋषि वत्स, भृगुवंशीय महान महर्षि च्यवन और सुकन्या के प्रत्यक्ष वंशज थे। उन्हीं के नाम पर इस वंश को 'वात्स्यायन गोत्र' कहा गया। ऋषि वत्स ने ही ज्ञान, तपस्या और वैदिक ऋचाओं के सस्वर पाठ के लिए इस पवित्र क्षेत्र को चुना और यहाँ एक समृद्ध गुरुकुल तथा पावन बस्ती की स्थापना की। चूँकि यह स्थान अपनी प्राकृतिक सुंदरता, नदियों के संगम और शांत वातावरण के कारण सभी को अत्यंत प्रिय था, इसलिए इसका नाम 'प्रीतिकूट' (अर्थात प्रीति या प्रेम का शिखर/घर) पड़ा।
ऋषि वत्स द्वारा प्रीतिकूट की स्थापना का समय वैदिक और उत्तर-वैदिक काल का संधिकाल माना जाता है। यह काल ईसा पूर्व की सदियों पुराना है, जो रामायण और महाभारत कालखंड के समानांतर चलता है। ऐतिहासिक रूप से, ऋषि वत्स द्वारा स्थापित यह वंश और स्थान गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद और हर्षावर्धन काल (589-645 ईस्वी) तथा भवभूति काल (630-640 ईस्वी) में अपने चरमोत्कर्ष पर था। ऋषि वत्स ने प्रीतिकूट को मात्र एक रिहायशी इलाका नहीं बनाया, बल्कि इसे एक 'ब्रह्मपुरी' (विद्वानों की नगरी) के रूप में विकसित किया। यहाँ सामवेद और यजुर्वेद के मंत्रों का अनवरत पाठ होता था। ऋषि वत्स का मत था कि ज्ञान के साथ-साथ जीवन में मर्यादा और सात्विक समृद्धि भी जरूरी है। उनके इस अवदान के कारण ही प्रीतिकूट सदियों तक (पाल, सेन और मुगल काल तक) एक विशिष्ट सांस्कृतिक और बौद्धिक पहचान बनाए रखने में सफल रहा। आज भी यहाँ स्थित संस्कृत विद्यालय इसी प्राचीन ज्ञान परंपरा की अटूट कड़ी है।
. महाकवि बाणभट्ट की जन्म और कर्म स्थली: संस्कृत साहित्य का स्वर्णिम युग में 7वीं सदी ईस्वी में प्रीतिकूट ने वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान दर्ज कराई, जब यहाँ वात्स्यायन गोत्र के वैदिक मनीषी चित्रभानु और उनकी भार्या विदुषी राजदेवी के घर बाणभट्ट का जन्म हुआ। बाणभट्ट बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। उनकी माता राजदेवी का उन पर गहरा प्रभाव था, जो स्वयं एक विदुषी महिला थीं। बाणभट्ट ने शास्त्र और संगीत शास्त्र के प्रकांड ज्ञाता भरकू भारद्वाज को अपना गुरु बनाया। भरकू भारद्वाज के सान्निध्य में रहकर बाणभट्ट ने न केवल वेदों और उपनिषदों का गहन अध्ययन किया, बल्कि संगीत, कला और लोक-संस्कृति में भी असाधारण निपुणता हासिल की।।बाणभट्ट ने प्रीतिकूट की माटी को ही अपनी कर्मस्थली बनाया और यहीं बैठकर विश्व साहित्य के दो महान ग्रंथों की रचना की: हर्षचरितम: भारतीय इतिहास का पहला ऐतिहासिक आख्यान है, जिसमें उन्होंने अपने संरक्षक राजा हर्षवर्धन के जीवन और उनके कालखंड (589-645 ईस्वी) का सजीव चित्रण किया है। इसके शुरुआती अध्यायों में बाणभट्ट ने स्वयं अपने गाँव प्रीतिकूट, अपनी कुल-परंपरा और हिरण्यबाहु नदी का अत्यंत सुंदर वर्णन किया है। कादंबरी: दुनिया का पहला उपन्यास (Novel) माना जाता है। गद्य काव्य की यह ऐसी विधा है जिसके बारे में कहा जाता है कि "बाणोच्छिष्टं जगत्सर्वम्" अर्थात संस्कृत साहित्य में जो कुछ भी है, वह बाणभट्ट की जूठन मात्र है। बाणभट्ट की विद्वत्ता से प्रभावित होकर सम्राट हर्षवर्धन ने उन्हें अपने दरबार में 'प्रधान राजकवि' का स्थान दिया। राजा के दरबार में रहने के बावजूद बाणभट्ट का अपनी जन्मभूमि प्रीतिकूट से लगाव कभी कम नहीं हुआ, और वे बार-बार यहाँ आते रहे।
प्रीतिकूट की धार्मिक और सांस्कृतिक बनावट अत्यंत विलक्षण रही है। यह स्थान सनातन धर्म के विभिन्न मतों के बीच कभी भी विवाद का कारण नहीं रहा, बल्कि यहाँ सभी मतों का सुंदर समन्वय (Syncretism) देखने को मिलता है। हिरण्यबाहु (सोन) नदी के तट पर अवस्थित होने के कारण प्रीतिकूट में प्राचीन काल से ही सूर्य पूजा (सौर मत) की गहरी जड़ें रहीं। उदीयमान और अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने की यह परंपरा आज भी बिहार के महापर्व 'छठ' के रूप में इस क्षेत्र में अक्षुण्ण बनी हुई है। विदुषी राजदेवी (बाणभट्ट की माता) की बौद्धिक स्वतंत्रता और बाद के कालखंडों में महिलाओं की आदरणीय स्थिति इस बात का प्रमाण है कि यहाँ 'शक्ति' को ज्ञान और सामर्थ्य के रूप में पूजा गया। मध्यकाल में जब स्थानीय शासकों (जैसे राजा जवाला महाराणा) और उजैनिया राजपूतों का प्रभाव बढ़ा, तो कुलदेवी के रूप में माँ भवानी (दुर्गा) की उपासना यहाँ की संस्कृति का अनिवार्य हिस्सा बन गई। भारतीय धर्म इतिहास में अक्सर शैव (शिव के उपासक) और वैष्णव (विष्णु के उपासक) मतों में द्वंद्व देखने को मिलता है, लेकिन प्रीतिकूट में दोनों का सह-अस्तित्व था: शैव मत: महाकवि बाणभट्ट स्वयं भगवान शिव के परम भक्त थे। 'हर्षचरितम' की शुरुआत ही उन्होंने शिव स्तुति से की है। इस क्षेत्र के आसपास गुप्तकालीन शिव उपासकों की एक लंबी परंपरा रही है। वैष्णव मत: पाल और सेन राजवंशों (11वीं और 12वीं सदी) के समय इस क्षेत्र में वैष्णव मत का गहरा प्रभाव पड़ा। भगवान विष्णु के अवतारों की पूजा, सात्विकता और कीर्तन परंपरा का प्रसार हुआ, जिसे बाणभट्ट के गुरु भरकू भारद्वाज के संगीत शास्त्र ने और अधिक समृद्ध किया। मगध की भूमि (विशेषकर गया और उसके आसपास का क्षेत्र) पूरे विश्व में पितृ तर्पण और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा के लिए विख्यात है। प्रीतिकूट में भी 'पितृ संस्कृति' का गहरा प्रभाव रहा है। यहाँ के लोकजीवन में अपने पूर्वजों की भूमि को नमन करने और उनके नाम पर लोक-कल्याणकारी कार्य (जैसे कुएं खुदवाना, बाग लगवाना, मजार या स्मारक बनवाना) करने की समृद्ध परंपरा रही है।
अमनरुल्लाह खान की प्रसिद्ध पुस्तक 'पीरू: एक परिचय' में एक अत्यंत मार्मिक ऐतिहासिक घटना का उल्लेख मिलता है। इसके अनुसार, मुगल जागीरदार मोहम्मद शाहनवाज की पुत्री जिन्नत प्रवीण सुदूर क्षेत्रों से यात्रा करके विशेष रूप से अपने पूर्वजों की इस पावन माटी पर आई थीं और उन्होंने यहाँ की मिट्टी को नमन किया था। यह घटना रेखांकित करती है कि पीरू की मिट्टी का आकर्षण ऐसा है कि लोग दुनिया में कहीं भी रहें, अपनी जड़ों (Roots) को कभी नहीं भूलते। इसी तरह, बनतारा में स्थित जागीरदार मुबारक चौधरी का ऐतिहासिक मकबरा भी इसी पितृ-स्मृति और स्थापत्य कला का एक जीवंत साक्ष्य है। मध्यकालीन राजनीतिक परिवर्तन और सूफी अध्यात्म का उदय (13वीं - 16वीं सदी) का 13वीं शताब्दी से लेकर 16वीं शताब्दी के बीच प्रीतिकूट के इतिहास में एक नया और स्वर्णिम अध्याय जुड़ा, जिसने इसे 'पीरू' और 'अबू नसीरपुर' जैसी नई पहचान दी तथा इसे सांप्रदायिक सौहार्द का एक महान केंद्र बना दिया था ।
14वीं सदी में इस क्षेत्र के राजनीतिक परिदृश्य में व्यापक बदलाव आया। इस दौरान यहाँ राजा जवाला महाराणा का शासन था। उनके दरबार में एक अत्यंत चतुर और लोकप्रिय विदूषक थे, जिनका नाम पीरू भोपा था। पीरू भोपा का स्थानीय लोकमानस पर इतना गहरा प्रभाव था कि उनके नाम की गूंज इस क्षेत्र के नामकरण के साथ भी जुड़ गई। साल 1242 ईस्वी में, जब मध्य एशिया में मंगोल साम्राज्य अपने प्रारंभिक और आक्रामक चरण में था, अफगानिस्तान के फराह प्रांत के सिरुगन निवासी अबू नासिर पीरू का आगमन इस क्षेत्र में हुआ। उन्होंने यहाँ आकर शांति, मानवता और सह-अस्तित्व की भावना को बल दिया। उन्हीं के आदर में आगे चलकर इस पूरे परगने को 'अबू नसीरपुर' और संक्षेप में 'पीरू' कहा जाने लगा।।इराक की ऐतिहासिक नगरी बगदाद से महान सूफी संत हजरत सैयदना मो. जिलानी अमझरी कादरी का आगमन प्रीतिकूट की भूमि पर हुआ। उन्होंने तत्कालीन प्रीतिकूट के सघन वनों के बीच स्थित एक अत्यंत रमणीय स्थान 'आम्र झर' (आम का झरना या आम्रकुंज) को अपनी तपोभूमि (खानकाह) के रूप में चुना और यहीं पर सूफी संप्रदाय की आधारशिला रखी।
अबू नासिर पीरू 1242 ईस्वी सिरुगन, फराह (अफगानिस्तान) क्षेत्र को 'अबू नसीरपुर' (पीरू) नाम मिला, शांति की स्थापना की। हजरत सैयदना मो. जिलानी अमझरी कादरी मध्यकाल (निधन: जून 1517) बगदाद (इराक) 'आम्र झर' में सूफी संप्रदाय की नींव रखी; हिंदू-मुस्लिम एकता के सूत्रधार थे । उन्होंने जाति, धर्म और वर्ग से ऊपर उठकर प्रेम और रूहानी सूफी संगीत के माध्यम से लोगों के दिलों को जीता जून 1517 ईस्वी के प्रथम सप्ताह में इस महान सूफी संत का निधन (विसाल) हुआ। उनके निधन के बाद से आज तक इस स्थल को 'पवित्रता का स्थल' माना जाता है, जहाँ हर साल हज़ारों श्रद्धालु मन्नतें मांगने आते हैं। यह स्थल गंगा-जमुनी तहजीब का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर उभरा। मुगल काल, शेरशाह सूरी और जागीरदारी व्यवस्था (16वीं - 18वीं सदी) का उत्तर-मध्यकाल में प्रीतिकूट (पीरू) केवल एक सांस्कृतिक केंद्र नहीं रहा, बल्कि यह सामरिक और प्रशासनिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण हो गया। महान अफगान शासक शेरशाह सूरी के शासनकाल में इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति (सासाराम और पटना के बीच होने के कारण) को देखते हुए इसका तेजी से ढांचागत और व्यापारिक विकास किया गया। यह स्थल सूरी साम्राज्य के प्रभाव में एक प्रमुख व्यापारिक मार्ग के रूप में था । मुगल काल के दौरान, 1657-1659 ईस्वी के बीच, जब शाहजहाँ के बड़े पुत्र और अत्यंत उदारवादी विचारक दारा शिकोह बिहार के सूबेदार (Governor) थे, तब उन्होंने पीरू के ऐतिहासिक और सामरिक महत्व को पहचाना। दारा शिकोह ने पीरू को बकायदा एक 'परगना' (प्रशासनिक इकाई) घोषित कर दिया और इसकी जिम्मेदारी कोकलत उजैनियां को सौंप दी। इससे पहले, 1580 ईस्वी में अकबर के काल में ब्रबल सिंह उजैन को पीरू जागीर का शासक बनाया गया था, जिसके बाद यह पूरा क्षेत्र मुगल सैन्य छावनी और प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन आ गया था।
. धर्म परिवर्तन, जागीरदारी और कयाल गढ़ का इतिहास क्षेत्र में धर्म परिवर्तन और राजनीतिक सत्ता के गठजोड़ की भी अनूठी ऐतिहासिक कहानियाँ मिलती हैं:मथुरा चौधरी से गुलाम मुस्तफा खान: सुल्तान फिरोजशाह तुगलक के काल (14वीं सदी) में अरवल जिले के करपी प्रखंड के बंभई गाँव के निवासी मथुरा चौधरी ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया, जिसके बाद उन्हें गुलाम मुस्तफा खान के नाम से जाना गया। आगे चलकर मुगल शासक मोहम्मद शाहनवाज के समय गुलाम मुस्तफा खान, उनके भाई कमल नारायण सिंह और नसरुद्दीन हैदर खान को संयुक्त रूप से पीरू का जागीरदार नियुक्त किया गया। राजा तिलक धारी चौधरी और बनतारा जागीर: इसी प्रकार, कयाल गढ़ के राजा तिलक धारी चौधरी ने भी इस्लाम धर्म अपना लिया और वे बनतारा जागीर के संस्थापक बने। उनके पुत्र मुबारक चौधरी यहाँ के प्रतापी जागीरदार हुए, जिनका ऐतिहासिक और कलात्मक मकबरा आज भी बनतारा में मौजूद है, जो मध्यकालीन स्थापत्य कला की गवाही देता है।
समय बदला, लेकिन पीरू की मिट्टी ने शिक्षा और बौद्धिक चेतना के प्रति अपने झुकाव को कभी कम नहीं होने दिया। प्राचीन काल का जो गुरुकुल था, उसने आधुनिक काल में पुस्तकालय और तकनीकी शिक्षा का रूप ले लिया।
साल 1936 ईस्वी में पीरू में 'पब्लिक उर्दू लाइब्रेरी' की स्थापना की गई। ब्रिटिश भारत के उस दौर में, इस पुस्तकालय ने क्षेत्र में साक्षरता बढ़ाने, उर्दू व हिंदी साहित्य के संरक्षण और स्थानीय युवाओं में वैचारिक व राष्ट्रीय क्रांति को बढ़ावा देने में अमूल्य भूमिका निभाई। यह पुस्तकालय आज भी इस क्षेत्र की बौद्धिक चेतना का प्रतीक है। प्रीतिकूट (पीरू) की प्रतिभा केवल बिहार या भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि सात समंदर पार भी अपना परचम लहरा रही है। उदाहरण के तौर पर, इसी मिट्टी के सपूत इंजीनियर सैफुल्लाह खान अजमेरी वर्तमान में कुवैत सरकार के 'विद्युत एवं जल मंत्रालय' (Ministry of Electricity and Water, Kuwait) में एक प्रतिष्ठित और वरिष्ठ इंजीनियर के रूप में कार्यरत हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि ज्ञान की जो रश्मि ऋषि वत्स और बाणभट्ट ने फैलाई थी, वह आज भी आधुनिक रूप में प्रज्वलित है।
बिहार के औरंगाबाद और अरवल की सीमाओं पर बसा यह छोटा सा क्षेत्र 'प्रीतिकूट' यानी 'पीरू' भारत की अमर साझी विरासत, सनातन सहिष्णुता और मध्यकालीन सूफी संप्रदाय का एक जीवंत और धड़कता हुआ उदाहरण है। प्राचीन काल में ब्रह्म संस्कृति के तहत ऋषि वत्स द्वारा गुरुकुल की स्थापना , 7 सदी में महाकवि बाण भट्ट द्वारा कादंबरी और हर्ष चरितम की रचना , 13-16 वीं सदी में सूफी संतों का आगमन , अमझर में खानकाह की स्थापना ,मुगल कल में दारा शिकोह द्वारा पीरू परगना घोषित एवं उजैनिया राजपूतों का शासन , आधुनिक कल 1936 में पब्लिक उर्दू लाइब्रेरी की स्थापना वैश्विकी पहचान , बाण भट्ट संस्कृत विद्यालय की स्थापना एवं वैश्विक तकनीकी पहचान हुई है। बाणभट्ट की 'कादंबरी' के क्लिष्ट और सुंदर श्लोकों से लेकर सूफी संतों की रूहानी कव्वालियों, अजानों और भजनों तक; और दारा शिकोह के परगने से लेकर 1936 की आधुनिक लाइब्रेरी और संस्कृत विद्यालय तक—इस स्थान ने इतिहास के हर झोंके को अपने भीतर संजोकर रखा है। यह ऐतिहासिक धरोहर आज की नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़े रहने, संकीर्णताओं से ऊपर उठने तथा ज्ञान व आपसी सद्भाव के रास्ते पर चलने की शाश्वत प्रेरणा देती है।
संदर्भ ग्रंथ सूची - बाणभट्ट कृत 'हर्षचरितम' – प्रथम एवं द्वितीय उच्छ्वास (वात्स्यायन वंश और प्रीतिकूट ग्राम का मूल वर्णन)। बाणभट्ट कृत 'कादंबरी' – प्रकथन एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि। अमनरुल्लाह खान – 'पीरू: एक परिचय' (स्थानीय इतिहास, जागीरदारी व्यवस्था और जिन्नत प्रवीण के आगमन का विवरण)। फ्रांसिस बुकानन की 1812 का भ्रमण । बिहार का गया डिस्ट्रिक्ट गजेटियर 1906,1957 – ऐतिहासिक, भौगोलिक और मध्यकालीन प्रशासनिक परगना विवरण। भारत की जनगणना 2011 – पीरू (अबू नसीरपुर) ग्राम के जनसांख्यिकीय आंकड़े (आबादी: 8537, परिवार: 1334)। स्थानीय लोक-श्रुतियां एवं अभिलेख – राजा जवाला महाराणा, पीरू भोपा (14वीं सदी) और हजरत सैयदना मो. जिलानी अमझरी कादरी (निधन 1517 ई.) से संबंधित ऐतिहासिक कड़ियाँ।
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