सोमवार, अगस्त 10, 2026

आश्विन माह की विरासत

: काल-चक्र की संधि पर आश्विन मास
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
सनातन धर्म की काल-गणना केवल दिनों और महीनों का लेखा-जोखा नहीं है, अपितु यह खगोलीय घटनाओं, प्रकृति परिवर्तन, आध्यात्मिक चेतना और मानव-इतिहास का एक जीवंत ताना-बाना है। हिन्दू पंचांग के बारह महीनों में आश्विन मास (जिसे लोकभाषा में 'क्वार' या 'कुँआर' भी कहा जाता है) को एक अत्यंत विशिष्ट, रहस्यमयी और ऊर्जावान संधि-काल माना गया है। भाद्रपद (भादों) की मूसलाधार वर्षा और उमस के समाप्त होते ही आश्विन मास का आगमन होता है, जो अपने साथ स्वच्छ नीला आकाश, बहती हुई निर्मल हवाएँ, खिली हुई धूप और शरद ऋतु की हल्की सिहरन लेकर आता है। खगोलीय दृष्टि से यह मास शरद विषुव  के समकालीन है, जब दिन और रात संतुलन की अवस्था में होते हैं। धार्मिक दृष्टि से यह वह कालखंड है जहाँ अदृश्य जगत् (पितृलोक, भूत-प्रेत, सूक्ष्म सत्ताएँ) और दृश्य जगत् (मानव सभ्यता, शक्ति-उपासना, राजसत्ता) एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े होते हैं।
आश्विन मास के दोनों पक्षों (कृष्ण एवं शुक्ल पक्ष), तिथि-वार देव व पितृ-समर्पण, बहु-साम्प्रदायिक साधनाओं, वैश्विक संस्कृतियों में इसके अस्तित्व और मन्वंतर काल से लेकर आधुनिक युग तक के ऐतिहासिक व साम्राज्यिक अवदान का एक वृहद् और प्रामाणिक अध्ययन प्रस्तुत करता है। ज्योतिष काल-गणना में महीनों का नामकरण उस मास की पूर्णिमा तिथि को चंद्रमा के नक्षत्र पर निर्भर करता है। आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को चंद्रमा अश्विनी नक्षत्र के निकट या उससे युक्त होता है। इसी कारण इस मास का नाम 'आश्विन' पड़ा। वैदिक साहित्य में इसे 'अश्वयुज' कहा गया है। 'अश्व' गति, ऊर्जा और सूर्य के रथ के घोड़ों का प्रतीक है, जो इस बात का संकेत है कि इस महीने से सूर्य की गति और किरणों का स्वभाव बदलने लगता है।बिहार, , झारखंड ,  उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि में इसे जनभाषा में 'क्वार' या 'कुँआर' कहा जाता है। यह शब्द संस्कृत के 'कन्या' (कन्या राशि में सूर्य का प्रवेश) अथवा 'कुँवार' (नवीनता/स्वच्छता) से व्युत्पन्न माना जाता है।
आश्विन मास से शरद ऋतु का विधिवत आरंभ होता है। कालिदास ने अपने महाकाव्य ऋतुसंहारम् में शरद ऋतु का वर्णन एक नववधू के रूप में किया है। इस महीने में प्रकृति में निम्नलिखित परिवर्तन देखने को मिलते हैं:
 नदियों और तालाबों का गंदला जल शांत होकर शीशे की तरह पारदर्शी हो जाता है। आकाश मेघ-रहित होकर गहरा नीला दिखाई देता है।: खेतों और नदियों के किनारे सफेद कांस के फूल खिल उठते हैं, जो शरद के आगमन की घोषणा करता है । जलाशयों में लाल-सफेद कमल और रात्रि में कुमुद (कुमुदिनी) के पुष्प अपनी सुगंध बिखेरते हैं।: ग्रीष्म की तपन और वर्षा की नमी के बाद आश्विन मास की हवा स्वास्थ्यवर्धक और त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) को संतुलित करने वाली मानी जाती है।
. आश्विन कृष्ण पक्ष: पितृ पक्ष - आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या (महालया) तक के 15 दिनों को पितृ पक्ष, श्राद्ध पक्ष या महालया पक्ष कहा जाता है। सनातन दर्शन मानता है कि मानव शरीर केवल भौतिक नहीं है; यह तीन ऋणात्मक दायित्वों से बंधा है—देव-ऋण, ऋषि-ऋण और पितृ-ऋण। आश्विन कृष्ण पक्ष पितृ-ऋण से मुक्त होने और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का वार्षिक अवसर है।पितृ पक्ष में प्रत्येक तिथि का अपना एक विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व है। व्यक्ति जिस तिथि को मृत्यु को प्राप्त होता है, उसी तिथि को उसके निमित्त तर्पण व पिंडदान किया जाता है। प्रतिपदा नाना-नानी श्राद्ध, प्रथम मृत आत्माएं इस तिथि को माता के पिता (नाना-नानी) के तर्पण का विधान है। इसके अतिरिक्त वर्ष के दौरान मृत हुए स्वजनों का प्रथम तर्पण होता है।
द्वितीया वसु रूप पितर द्वितीय तिथि को दिवंगत हुए परिजनों का पूजन। इसमें पितरों को 'वसु' रूप मानकर जल दिया जाता है।तृतीया रुद्र रूप पितर तृतीया को मृत पूर्वजों के लिए। पितरों का 'रुद्र' रूप में ध्यान किया जाता है।चतुर्थी संकष्टी गणेश व आदित्य रूप पितर गणेश पूजन के साथ इस तिथि को मृत परिजनों हेतु तर्पण। पितरों का 'आदित्य' रूप में आह्वान।पंचमी कुँवारे मृत जन (अविवाहित पितर) उन स्वजनों/परिवारजनों का श्राद्ध जिनकी मृत्यु विवाह से पूर्व (अल्पायु या कुँवारी अवस्था में) हो गई हो।षष्ठी अकाल मृत व अज्ञात पितर दुर्घटना, बीमारी या असमय काल-कवलित हुए परिजनों के निमित्त विशेष धूप-ध्यान व अर्पण।सप्तमी सप्तर्षि एवं ज्ञान-मार्ग के पूर्वज ऋषियों तथा ज्ञान/शिक्षा की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले पूर्वजों का स्मरण।
अष्टमी जीमूतवाहन (जितिया / जिउतिया व्रत) माताएँ अपनी संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य और सर्व-विपत्ति से रक्षा हेतु गंधर्वराज जीमूतवाहन, चील (चील्हो) और सियार (सियारो) की कथा सुनकर कठोर निर्जला व्रत रखती हैं।नवमी मातृ नवमी (अविधवा नवमी) कुल की सभी दिवंगत माताओं, दादियों, नानियों तथा सुहागिन (अविधवा) स्त्रियों का तर्पण। यह तिथि नारी-शक्ति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है।दशमी गृहस्थ पितर घर-परिवार के दिवंगत वरिष्ठ गृहस्थों का श्राद्ध।एकादशी इंदिरा एकादशी (श्रीहरि विष्णु) इस एकादशी का व्रत रखकर उसका पुण्य पितरों को समर्पित किया जाता है, जिससे उन्हें अधोगति से मुक्ति मिलती है।द्वादशी संन्यासी व यति श्राद्ध उन पूर्वजों या गुरुओं का तर्पण जिन्होंने संन्यास ग्रहण कर लिया था या जो यति-साधु थे।
त्रयोदशी बाल-श्राद्ध एवं काक/पीपल पूजन असमय मृत बालकों का श्राद्ध। इस दिन काक (कौवे) और पीपल वृक्ष को विशेष रूप से ग्रास दिया जाता है।चतुर्दशी शस्त्र-हत (अकाल/हिंसा में मृत) श्राद्ध युद्ध, अस्त्र-शस्त्र, दुर्घटना, विष, जल में डूबने, अग्नि या सर्पघात से मृत लोगों का विशेष श्राद्ध। सामान्य मृत पितरों का श्राद्ध इस दिन वर्जित माना गया है।अमावस्या सर्वपितृ अमावस्या (महालया) जिन पितरों की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, या जो भूल-बिसर गए हों, उन सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों, नागों, असुरों, प्रेतों और समस्त जीवों का महा-तर्पण।
2.2 'आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तम्': सार्वभौमिक करुणा की भावना सनातन धर्म का तर्पण केवल अपने सगे-संबंधियों तक सीमित नहीं है। पितृ पक्ष के तर्पण-मंत्रों में कहा गया है:
"आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवाः। तृप्यन्तु पितरः सर्वे मातृमातामहादयः॥"
अर्थात् ब्रह्मा से लेकर तिनके तक, देव, ऋषि, पितर, मानव, भूत, प्रेत, पशु-पक्षी और यहाँ तक कि जल में रहने वाले सूक्ष्म जीव भी इस जलांजलि से तृप्त हों। यह विधान सिखाता है कि आश्विन कृष्ण पक्ष संपूर्ण सृष्टि के पारिस्थितिक और सूक्ष्म-संतुलन का काल है।आश्विन शुक्ल पक्ष: शक्ति-साधना - अमावस्या के बाद जैसे ही सूर्य और चंद्रमा का पुनर्मिलन होकर आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा आती है, वातावरण का शोक और गंभीरता समाप्त हो जाती है। यह पक्ष सृष्टि के पुनरुत्थान, शक्ति के प्राकट्य और अंधकार पर प्रकाश की विजय का पर्व बन जाता है।प्रतिपदा मां शैलपुत्री, घटस्थापना (कलश) शारदीय नवरात्रि का भव्य शुभारंभ। कलश (घट) में ब्रह्मा, विष्णु, महेश, मातृकाओं और समस्त नदियों/समुद्रों का आह्वान किया जाता है। द्वितीया मां ब्रह्मचारिणी अनंत तप, संयम और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी की साधना।तृतीया मां चंद्रघंटा मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र धारण करने वाली देवी, जो साधक को निर्भयता प्रदान करती हैं।चतुर्थी मां कूष्मांडा अपनी मंद हंसी से ब्रह्मांड (अंड) की रचना करने वाली आद्यशक्ति का पूजन। पंचमी मां स्कंदमाता एवं उपांग ललिता व्रत भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता का पूजन। वात्सल्य, वाक्-सिद्धि और संतान-सुख की प्राप्ति।षष्ठी मां कात्यायनी व कात्यायन ऋषि महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रकट देवी। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की दात्री। इस दिन से बंगाल में दुर्गा पूजा का सार्वजनिक उत्सव (बोधन) आरंभ होता है।सप्तमी मां कालरात्रि (महासरस्वती का अवगाहन) अंधकार, भय और काल का नाश करने वाली भयानक रूपी किंतु शुभंकरी देवी। पत्र-पत्रिका (नवपत्रिका) का प्रवेश।अष्टमी मां महागौरी (महाअष्टमी / दुर्गा अष्टमी) महानिशा पूजा, संधि-पूजा (अष्टमी और नवमी का संधि काल)। शक्तिपीठों में बलि व विशेष आहुतियाँ। नवमी मां सिद्धिदात्री (महानवमी) समस्त सिद्धियों को देने वाली देवी का पूजन। नवदुर्गा अनुष्ठान की पूर्णता, कन्या पूजन (नौ बालिकाओं का भोजन), हवन और अपराजिता देवी का विशेष पूजन। दशमी विजयादशमी (दशहरा) / प्रभु श्रीराम / शमी वृक्ष भगवान श्रीराम द्वारा रावण का वध, मां दुर्गा द्वारा महिषासुर का वध। शमी (छेंउकर) वृक्ष पूजन, अपराजिता पूजन और शस्त्र-पूजन। विजय यात्रा का शुभारंभ।एकादशी पापांकुशा एकादशी (भगवान पद्मनाभ/विष्णु) मन रूपी हाथी को भक्ति रूपी अंकुश से नियंत्रित करने और सर्व-पापों के क्षय हेतु श्रीहरि का व्रत।द्वादशी वामन अवतार एवं गोविंद पूजन भगवान विष्णु के वामन रूप का स्मरण और तुलसी-पूजन।त्रयोदशी प्रदोष व्रत (भगवान शिव-पार्वती) सायंकाल में प्रदोष काल के दौरान भगवान शिव के अपराजित और नीलकंठ स्वरूप का अर्चन। चतुर्दशी कामेश्वर शिव व महालक्ष्मी पूर्व-आह्वान शरद पूर्णिमा की पूर्व संध्या पर जागरण और शिव-शक्ति का ध्यान। पूर्णिमा शरद पूर्णिमा (कोजागरी) / महालक्ष्मी / श्रीकृष्ण / अश्विनी कुमार खगोलीय अमृत वर्षा: माना जाता है कि इस रात चंद्रमा 16 कलाओं से पूर्ण होकर अमृत बरसाता है। कोजागरी पूजा: लक्ष्मी जी पूछती हैं "को जागर्ति?" (कौन जाग रहा है?)। श्रीकृष्ण की दिव्य रासलीला का दिन। देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमारों का पूजन। खीर बनाकर खुले आकाश के नीचे रखने की परंपरा।
4. सम्प्रदाय-गत दृष्टिकोण: विविध पंथों में आश्विन मास की साधना
सनातन धर्म की सुंदरता उसकी विविधता में है। आश्विन मास में भारत के विभिन्न दार्शनिक और धार्मिक सम्प्रदाय अपनी-अपनी परंपराओं के अनुसार साधना करते हैं।  शाक्त सम्प्रदाय (शक्ति उपासना) - शाक्तों के लिए आश्विन मास वर्ष का सबसे बड़ा कालखंड है। शारदीय नवरात्रि में दशमहाविद्या (काली, तारा, त्रिपुरसुंदरी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला) और नवदुर्गा का अनुष्ठान किया जाता है। तंत्र साधना में आश्विन की निशाओं (विशेषकर महाअष्टमी और महानिशा) को परम सिद्धिदायक माना गया है।
 वैष्णव सम्प्रदाय - श्रीराम भक्ति: आश्विन मास भगवान श्रीराम के रावण-विजय का समय है। इस पूरे महीने में भारत के कोने-कोने में रामलीला का मंचन होता है। भगवान श्रीकृष्ण एवं रासलीला: आश्विन पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा) को वैष्णव जन 'रास पूर्णिमा' कहते हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार इसी रात्रि को श्रीकृष्ण ने वृंदावन में गोपियों के साथ महारास रचाया था, जो जीवात्मा और परमात्मा के महामिलन का प्रतीक है।शैव संस्कृति : विजयादशमी के दिन भगवान शिव के 'अपराजित' स्वरूप का पूजन होता है। शिव को काल का नियंता मानकर उनसे विजय का वरदान माँगा जाता है। सौर संस्कृति : वर्षा ऋतु के बाद जब सूर्य अपनी किरणों को उग्रता से मुक्त कर सुखद बनाते हैं, तब सौर-मार्गी साधक आश्विन में आरोग्य-प्राप्ति हेतु सूर्योपनिषद् और आदित्यहृदय स्तोत्र का पाठ करते है
अश्विनी कुमार पूजन: वैदिक देवताओं में अश्विनी कुमार 'दिव्य वैद्य' (आयुर्वेद के आचार्य) हैं। स्वास्थ्य और सुंदरता की प्राप्ति के लिए आश्विन में इनका ध्यान किया जाता है। वृक्ष व जल तत्व: विजयादशमी पर शमी (प्रोसोपिस सिनेरेरिया) और अपराजिता के पौधे की पूजा की जाती है। महाभारत के अनुसार पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान अपने अस्त्र-शस्त्र शमी वृक्ष में ही छिपाए थे। कलश स्थापना के माध्यम से जल-तत्व और अखंड ज्योति के माध्यम से अग्नि-तत्व की पूजा संपूर्ण आश्विन मास का मूल आधार है।
आश्विन मास का महत्व केवल भारत की भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं है। खगोलीय दृष्टि से सितंबर-अक्टूबर का यह समय दुनिया की अनेक प्राचीन और मध्यकालीन संस्कृतियों में ऐतिहासिक मोड़ और उत्सवों का समय रहा है:। 
पवारणा दिवस : आश्विन पूर्णिमा को बौद्ध परंपरा में 'पवारणा दिवस' कहा जाता है। आषाढ़ से आश्विन तक तीन महीने बौद्ध भिक्षु 'वर्षावास' (एक स्थान पर रहकर साधना) करते हैं। आश्विन पूर्णिमा को वर्षावास समाप्त होता है और भिक्षु पुनः लोक-कल्याण हेतु धम्म-प्रचार के लिए निकलते हैं। सम्राट अशोक का धम्म-विजय: बौद्ध इतिहास के अनुसार, सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद आश्विन मास के दौरान ही हिंसा का मार्ग त्यागकर बौद्ध धम्म स्वीकार किया था और अपनी सेना को 'दिग्विजय' के स्थान पर 'धम्म-विजय' के लिए भेजा था।
 जैन संस्कृति: आत्म-विशुद्धि और स्वाध्याय - जैन धर्म में भाद्रपद के 'पर्युषण पर्व' और क्षमावाणी दिवस के बाद आश्विन मास आत्म-निरीक्षण और स्वाध्याय का काल होता है। इस समय जैन श्रमण अपनी वर्षाकालीन स्थिरता को पूर्ण कर यात्राओं का पुनरारंभ करते हैं यहूदी  एवं पारसी परंपराएं
यहूदी पंचांग -  आश्विन मास के समकालीन यहूदी पंचांग का सातवाँ महीना 'तिशरी' आता है। इसमें यहूदी धर्म के सबसे पवित्र त्यौहार—रोश हशनाह  - नया वर्ष ,  योम किप्पूर  - प्रायश्चित का दिन) और सुकौत  - फसल उत्सव) मनाए जाते हैं। पारसी/इरानी परंपरा : प्राचीन फारस (इरान) में आश्विन के समय 'मेहर' महीने में मेहरगान  उत्सव मनाया जाता था। यह न्याय के देवता 'मिथ्र' (वैदिक मित्र/सूर्य) को समर्पित शरद-उत्सव था। यवन (ग्रीक), ईसाई एवं इस्लाम संस्कृति का संदर्भ ग्रीक व पश्चिमी खगोलशास्त्र: यूनानी सभ्यता में शरद विषुव (Equinox) के समय प्रकृति के संतुलन का उत्सव मनाया जाता था। ईसाई व इस्लामिक कालखंड: मध्यकाल में वर्षा ऋतु के समाप्त होते ही आश्विन (सितंबर-अक्टूबर) के महीने में रेशम मार्ग और समुद्री व्यापारिक मार्ग पूरी तरह खुल जाते थे। ईसाई और इस्लामिक व्यापारी काफिले इस समय यात्राएँ सुगम मानते थे, जिससे विचारों, मसालों और शिल्पकला का वैश्विक आदान-प्रदान होत था। 
सनातन कालक्रम में आश्विन मास केवल एक धार्मिक काल नहीं है; यह युद्ध, राजनीति, सीमा-विस्तार (सीमांतोल्लंघन) और साम्राज्यीय पुनर्गठन का ऐतिहासिक मास रहा है। चाणक्य के अर्थशास्त्र से लेकर मराठा साम्राज्य तक, आश्विन मास की विजयादशमी को 'अभियान की तिथि' माना गया है। राजा सुरथ और समाधि वैश्य: मार्कंडेय पुराण (दुर्गा सप्तशती) के अनुसार, स्वारोचिष मन्वंतर में अपना राज्य गंवाने के बाद राजा सुरथ और समाधि वैश्य ने महर्षि मेधा के आश्रम में रहकर आश्विन मास में ही देवी की मिट्टी की मूर्ति बनाकर शक्ति-साधना की थी, जिससे उन्हें पुनः साम्राज्य प्राप्त हुआ। तुलसीदास और रामचरितमानस: गोस्वामी तुलसीदास जी ने आश्विन मास के ऐतिहासिक व आध्यात्मिक महत्व को लोक-लोकंतर तक पहुँचाने के लिए रामलीला की परंपरा को सुदृढ़ है।: वर्षा ऋतु में चार महीने तक नदियाँ उफान पर होती थीं और कीचड़ के कारण रथ व पैदल सेना का चलना असंभव था। आश्विन मास में भूमि सूख जाती थी। कौटिल्य (चाणक्य) के अर्थशास्त्र के अनुसार, राजाओं को विजयादशमी के दिन अपने शस्त्रों, घोड़ों और हाथियों की पूजा (नीराजन विधि) करके सीमा-विस्तार हेतु 'यात्रा' पर निकलना चाहिए। गुप्त साम्राज्य: सम्राट समुद्रगुप्त और चंद्रगुप्त द्वितीय 'विक्रमादित्य' के समय विजयादशमी को सैन्य परेड और राज्योत्सव के रूप में मनाया जाता है। 
मध्यकालीन भारत में दक्षिण के विजयनगर साम्राज्य में आश्विन मास का 'महानवमी उत्सव' वैभव का चरम बिंदु था। विदेशी यात्रियों का विवरण: पुर्तगाली यात्री डोमिंगो पेस और फ़ारसी राजदूत अब्दुर रज्जाक ने विजयनगर के महानवमी उत्सव का भव्य वर्णन किया है। : हम्पी में स्थित इस विशाल पत्थर के मंच से राजा कृष्णदेवराय नौ दिनों तक देवी पूजा देखते थे, कुश्ती प्रतियोगिताओं, नृत्यों, हाथियों के जुलूस और अपनी चतुरंगिणी सेना के पराक्रम का निरीक्षण करते थे ।।मराठा इतिहास में आश्विन मास की विजयादशमी का स्थान सर्वोच्च है: छत्रपति शिवाजी महाराज: शिवाजी महाराज विजयादशमी के दिन शमी वृक्ष की पूजा करते थे और सोने की पत्तियों (शमी पत्र) का आदान-प्रदान करके अपने किलों से निकलकर मुग़ल क्षेत्रों की ओर सैन्य अभियान शुरू करते थे। इसे मराठी में 'सीमांतोल्लंघन' (राज्य की सीमा लांघना) कहा जाता था।
पेशवा काल: पेशवाओं के समय पुणे में विजयादशमी पर विशाल 'दशहरा दरबार' सजता था, जहाँ मराठा सरदार अपनी निष्ठा व्यक्त करते थे और आगामी वर्ष के युद्ध अभियानों की योजना बनाते थे।  आधुनिक युग में आश्विन मास की दुर्गा पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान न रहकर विश्व कला और संस्कृति का सबसे बड़ा खुला मंच बन चुकी है। वर्ष 2021 में यूनेस्को  ने 'कोलकाता की दुर्गा पूजा' को मानव जाति की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता दी।: कर्नाटका के मैसूर महल में आश्विन मास की दशमी को निकलने वाली जंबू सवारी (हाथियों का जुलूस) प्राचीन विजयनगर की परंपरा को आज भी जीवंत रखे हुए है।: उत्तर भारत में दिल्ली, वाराणसी और अयोध्या से लेकर ट्रिनिडाड, मॉरीशस और फिजी जैसे देशों तक आश्विन मास में रामलीलाओं का मंचन भारतीय प्रवासियों को अपनी जड़ों से जोड़े रखता है। 
भौगोलिक और भाषाई विविधताओं के कारण इस पावन महीने को अलग-अलग क्षेत्रों में विभिन्न नामों से पुकारा जाता है । बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान में : आश्विन, अश्विन, क्वार, कुँआर। संस्कृत व वैदिक साहित्य: अश्वयुज। पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा: आश्विन (Aashwin) — यहाँ यह महालया, दुर्गा पूजा और कोजागरी लक्ष्मी पूजा का पर्याय है।महाराष्ट्र एवं गुजरात: आश्विन (Ashvin) — गरबा, डांडिया और नवरात्रि के गरबो उत्सव का काल।तमिलनाडु (दक्षिण भारत): पुरट्टासी (Purattasi) — तमिल सौर पंचांग का छठा/सातवाँ मास, जो भगवान वेंकटेश्वर (विष्णु) को पूर्णतः समर्पित होता है। इस महीने में तमिलनाडु में सात्विक भोजन और शनिवार व्रत का विशेष नियम है। केरल (मलयि: मल्यालम): कन्नी मासम  — जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करता है। ओडिशा: आश्विन  — दुर्गा पूजा व कोजागरी पूर्णिमा का समय।शरद विषुव काल वैश्विक खगोलशास्त्र में दिन-रात की समानता का समय। तिशरी  यहूदी धर्म पंचांग का सातवां पवित्र मास। मेहर  प्राचीन पारसी/इरानी पंचांग का सातवां मास।: बौद्ध विश्व (श्रीलंका, थाईलैंड, म्यांमार, लाओस) में वर्षावास समाप्ति का मास। पश्चिमी ज्योतिष में सूर्य का कन्या से तुला राशि में संक्रमण है। 
 कालजयी चेतना का महाप्रवाह आश्विन मास केवल कैलेंडर का एक पन्ना नहीं है; यह सनातन चेतना का महासमंदर है जिसमें अध्यात्म, खगोलशास्त्र, प्रकृति, साहित्य, युद्ध-नीति और वैश्विक इतिहास का जल आकर मिलता है। सआश्विन का कृष्ण पक्ष हमें अतीत, अपने पूर्वजों, अपनी जड़ों और यहाँ तक कि अदृश्य सूक्ष्म जीवों के प्रति नम्र होना और कृतज्ञता व्यक्त करना सिखाता है। आश्विन का शुक्ल पक्ष हमें भविष्य, नई ऊर्जा, शक्ति की साधना, असत्य पर सत्य की विजय और जीवन के आनंद उत्सव को मनाने का संदेश देता है।मन्वंतर काल के राजा सुरथ से लेकर विजयनगर के महाराजाओं, छत्रपति शिवाजी और आज के आधुनिक समाज तक—आश्विन मास भारतीय संस्कृति की उस अखंड धारा का प्रतीक रहा है जो कभी सूखती नहीं। यह मास मानव को याद दिलाता है कि जब-जब समाज में अंधकार, अज्ञान और असत्य रूपी महिषासुर या रावण का प्रभाव बढ़ेगा, तब-तब आश्विन की नवरात्रि और विजयादशमी हमें सत्य, न्याय और भगवती शक्ति के पुनर्जागरण का मार्ग दिखाती रहेगी।

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