चम्पारण सत्याग्रह : पंडित राजकुमार शुक्ल और महात्मा गांधी के सत्याग्रह का संगम
सत्येन्द्र कुमार पाठक
किसान की पीड़ा से निकला वह आंदोलन, जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को दिया ‘सत्याग्रह’ का नया हथियार । स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वर्ष 1917 का चम्पारण सत्याग्रह केवल नील की खेती के खिलाफ किसानों के संघर्ष की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारतीय जनआंदोलनों के इतिहास में सत्य, अहिंसा और शांतिपूर्ण प्रतिरोध की एक ऐसी निर्णायक शुरुआत थी, जिसने आगे चलकर देश के स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा बदल दी। इस ऐतिहासिक आंदोलन के पीछे एक ओर हजारों किसानों की वर्षों पुरानी पीड़ा थी, तो दूसरी ओर एक साधारण किसान पंडित राजकुमार शुक्ल की अदम्य जिद, साहस और लोक आग्रह था। इसी आग्रह का संगम जब महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा के सिद्धांत से हुआ, तब चम्पारण की धरती पर इतिहास रचा गया। चम्पारण सत्याग्रह ने न केवल अंग्रेजी शासन और नीलहे बागान मालिकों की दमनकारी व्यवस्था को चुनौती दी, बल्कि इसने यह भी सिद्ध किया कि संगठित जनशक्ति, सत्य और अहिंसा के माध्यम से अन्यायपूर्ण शासन के विरुद्ध प्रभावी संघर्ष किया जा सकता है।
तिनकठिया प्रथा ने किसानों का जीवन किया था बेहाल.19वीं शताब्दी और 20वीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में बिहार का चम्पारण क्षेत्र नील की खेती के लिए प्रसिद्ध था। यहां अंग्रेज बागान मालिकों ने किसानों पर ‘तिनकठिया प्रथा’ जैसी दमनकारी व्यवस्था थोप रखी थी। इसके तहत किसानों को अपनी जमीन के एक निश्चित हिस्से पर नील की खेती करने के लिए मजबूर किया जाता था।.नील की खेती किसानों के लिए घाटे का सौदा थी। उन्हें उचित मूल्य नहीं मिलता था और खेती की शर्तें भी बागान मालिक तय करते थे। नील की खेती से जमीन की उर्वरता प्रभावित होती थी, जबकि किसान आर्थिक रूप से लगातार कमजोर होते जा रहे थे।
जो किसान इस व्यवस्था का विरोध करते, उन्हें लगान, जुर्माने, दबाव और अन्य प्रकार के उत्पीड़न का सामना करना पड़ता था। स्थानीय प्रशासन और न्याय व्यवस्था पर भी अंग्रेज बागान मालिकों के प्रभाव के कारण किसानों को न्याय मिलना कठिन था।.ऐसे वातावरण में चम्पारण के किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि उनकी पीड़ा को प्रभावी ढंग से देश के सामने कौन रखे।
राजकुमार शुक्ल ने उठाया किसानों की आवाज बनने का बीड़ा.चम्पारण के सतवरिया गांव के किसान पंडित राजकुमार शुक्ल स्वयं भी नील की खेती और बागान व्यवस्था की समस्याओं से परिचित थे। वे बहुत बड़े नेता नहीं थे, न उनके पास कोई राजनीतिक संगठन था और न ही कोई प्रभावशाली पद। लेकिन उनके भीतर किसानों की पीड़ा को लेकर असाधारण दृढ़ता थी। उन्होंने तय कर लिया कि चम्पारण की समस्या को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने के लिए किसी बड़े नेता को यहां लाना जरूरी है।.इसी संकल्प के साथ वे दिसंबर 1916 में लखनऊ में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में पहुंचे। वहां उन्होंने अनेक नेताओं से चम्पारण आने और किसानों की स्थिति देखने का आग्रह किया, लेकिन उनकी बात को अपेक्षित महत्व नहीं मिला। आखिरकार उनकी मुलाकात दक्षिण अफ्रीका से भारत लौट चुके मोहनदास करमचंद गांधी से हुई।
गांधी से मुलाकात और शुरू हुई ऐतिहासिक जिद.राजकुमार शुक्ल ने गांधी से आग्रह किया कि वे चम्पारण चलकर किसानों की वास्तविक स्थिति देखें। गांधी उस समय अनेक कार्यों में व्यस्त थे और उन्होंने तत्काल चम्पारण जाने का आश्वासन नहीं दिया। लेकिन शुक्ल पीछे हटने वाले नहीं थे।.गांधी जहां जाते, शुक्ल वहां पहुंच जाते। लखनऊ से कानपुर और फिर गांधी के साबरमती आश्रम पहुंचने तक उन्होंने अपना आग्रह नहीं छोड़ा। उनकी यह दृढ़ता धीरे-धीरे गांधी का ध्यान आकर्षित करने लगी।.राजकुमार शुक्ल की यही जिद अंततः सफल हुई और गांधी ने चम्पारण आने का निर्णय लिया।.यह घटना भारतीय इतिहास में इस बात का महत्वपूर्ण उदाहरण है कि कभी-कभी किसी आंदोलन की शुरुआत किसी बड़े राजनीतिक मंच से नहीं, बल्कि एक साधारण व्यक्ति के अटूट लोक आग्रह से होती है।
1917 में चम्पारण पहुंचे महात्मा गांधी.अप्रैल 1917 में गांधी बिहार पहुंचे। पटना में डॉ. राजेंद्र प्रसाद से संपर्क के बाद वे मुजफ्फरपुर गए, जहां आचार्य जे.बी. कृपलानी से भी उनका संपर्क हुआ। इसके बाद वे चम्पारण के मोतिहारी पहुंचे। गांधी के चम्पारण पहुंचने की खबर तेजी से किसानों के बीच फैल गई। किसानों को पहली बार ऐसा लगा कि उनकी पीड़ा सुनने के लिए देश का एक बड़ा नेता उनके बीच आया है।.अंग्रेज प्रशासन गांधी के आगमन से चिंतित हो उठा। मोतिहारी के प्रशासन ने उन्हें चम्पारण छोड़ने का आदेश दिया। गांधी ने इस आदेश का पालन करने से इनकार कर दिया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि किसानों की वास्तविक स्थिति जाने बिना वे चम्पारण नहीं छोड़ेंगे।
यही वह क्षण था, जब गांधी के सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा की विचारधारा का चम्पारण की धरती पर व्यावहारिक प्रयोग शुरू हुआ।.अदालत के बाहर उमड़ा किसानों का सैलाब गांधी को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया गया। लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई की खबर सुनकर बड़ी संख्या में किसान अदालत के बाहर जमा हो गए।.यह दृश्य अंग्रेज प्रशासन के लिए अप्रत्याशित था। हजारों किसानों की शांतिपूर्ण उपस्थिति ने यह संदेश दे दिया कि अब चम्पारण का किसान अकेला नहीं है।.गांधी ने किसानों से हिंसा न करने और अनुशासन बनाए रखने का आग्रह किया। अंततः प्रशासन को गांधी के खिलाफ कार्रवाई में पीछे हटना पड़ा और उन्हें किसानों की समस्याओं की जांच करने की अनुमति मिली।
यह घटना गांधी के नेतृत्व में भारत में सत्याग्रह की पहली बड़ी सफल प्रयोगशाला के रूप में देखी गई। भाषण नहीं, गांव-गांव जाकर सुनी किसानों की पीड़ा.चम्पारण में गांधी ने केवल बड़े-बड़े भाषण देने की रणनीति नहीं अपनाई। उन्होंने समस्या की जड़ तक पहुंचने का रास्ता चुना।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद, ब्रजकिशोर प्रसाद, अनुग्रह नारायण सिंह, जे.बी. कृपलानी सहित अनेक स्थानीय कार्यकर्ताओं और वकीलों के सहयोग से किसानों की शिकायतें दर्ज की जाने लगीं।गांधी और उनके सहयोगी गांव-गांव गए। किसानों से उनकी समस्याएं सुनी गईं और उनके बयान दर्ज किए गए। बड़ी संख्या में किसानों की गवाही ने नीलहे बागान मालिकों की मनमानी और किसानों पर पड़ रहे आर्थिक दबाव के प्रमाण सामने रखे। यह आंदोलन केवल भावनात्मक अपील नहीं रहा, बल्कि तथ्य, दस्तावेज और किसानों के प्रत्यक्ष बयानों पर आधारित एक संगठित जांच अभियान में बदल गया।
सरकार को बनानी पड़ी जांच समिति.गांधी के बढ़ते जनसमर्थन और किसानों की शिकायतों के प्रमाण सामने आने के बाद ब्रिटिश सरकार को मामले की जांच के लिए समिति गठित करनी पड़ी। गांधी को भी इस जांच समिति में शामिल किया गया।.समिति के सामने किसानों की समस्याएं और नील की खेती से संबंधित दमनकारी व्यवस्थाएं रखी गईं। जांच के बाद किसानों के हित में सुधार की प्रक्रिया शुरू हुई और अंततः तिनकठिया व्यवस्था को समाप्त करने की दिशा में निर्णायक कदम उठाया गया।चम्पारण के किसानों के लिए यह केवल आर्थिक राहत नहीं थी, बल्कि वर्षों से चले आ रहे भय और अन्याय के खिलाफ आत्मविश्वास की पहली बड़ी जीत थी।
चम्पारण ने गांधी को बनाया जननेता.चम्पारण सत्याग्रह का प्रभाव केवल चम्पारण तक सीमित नहीं रहा। इस आंदोलन ने गांधी की कार्यपद्धति को भारतीय परिस्थितियों में स्थापित किया।
सत्य, अहिंसा, जनसंपर्क, प्रत्यक्ष जांच और शांतिपूर्ण प्रतिरोध—इन सभी तत्वों ने आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की महत्वपूर्ण रणनीति का रूप लिया।.चम्पारण ने गांधी को यह विश्वास दिया कि भारत की वास्तविक शक्ति उसके गांवों और किसानों में निहित है। दूसरी ओर किसानों को भी यह भरोसा मिला कि संगठित होकर और अहिंसक तरीके से वे अन्याय का मुकाबला कर सकते हैं।
इतिहास के दो नायकों को साथ याद करना जरूरी.चम्पारण सत्याग्रह का इतिहास लिखते समय महात्मा गांधी का योगदान निर्विवाद रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। लेकिन इस आंदोलन की शुरुआत के पीछे पंडित राजकुमार शुक्ल की भूमिका को भी समान गंभीरता से याद किया जाना चाहिए।
यदि राजकुमार शुक्ल गांधी को चम्पारण आने के लिए लगातार प्रेरित नहीं करते, तो संभव है कि गांधी का चम्पारण आगमन उस समय न हुआ होता। दूसरी ओर गांधी के नेतृत्व, संगठन क्षमता और सत्याग्रह की शक्ति ने शुक्ल की स्थानीय पीड़ा को राष्ट्रीय मुद्दे में बदल दिया।
इस अर्थ में चम्पारण सत्याग्रह दो शक्तियों का संगम था—राजकुमार शुक्ल का लोक आग्रह और महात्मा गांधी का सत्याग्रह।.राजकुमार शुक्ल उस दीपक की तरह थे, जो चम्पारण के अंधेरे में किसानों की पीड़ा लेकर जल रहा था। गांधी उस प्रकाश की तरह आए, जिसने उस छोटे से दीपक को राष्ट्रीय आंदोलन की मशाल में बदल दिया।
आज भी प्रासंगिक है चम्पारण का संदेश
आज जब देश किसान, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और जनभागीदारी जैसे विषयों पर लगातार चर्चा कर रहा है, तब चम्पारण सत्याग्रह का संदेश पहले से भी अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है।
चम्पारण हमें सिखाता है कि लोकतंत्र में आम नागरिक की आवाज को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। एक साधारण किसान भी यदि अपने अधिकार और समाज के हित के लिए दृढ़ता से आवाज उठाता है, तो उसकी आवाज परिवर्तन की शुरुआत बन सकती है.. इतिहास केवल बड़े नेताओं और राजनीतिक संस्थाओं से नहीं बनता। इतिहास उन अनाम और सामान्य लोगों के संघर्ष से भी बनता है, जो अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस करते हैं।
इसलिए चम्पारण को याद करते समय महात्मा गांधी के साथ पंडित राजकुमार शुक्ल को भी नमन करना आवश्यक है। गांधी ने सत्याग्रह को दिशा दी, लेकिन शुक्ल के लोक आग्रह ने उस सत्याग्रह को चम्पारण की धरती तक पहुंचाया।चम्पारण की धरती से निकला यही संदेश आज भी भारत के लोकतांत्रिक जीवन के लिए प्रेरणा है—सत्य के साथ खड़ा व्यक्ति अकेला हो सकता है, लेकिन यदि उसका आग्रह जनहित में हो तो वह परिवर्तन की शुरुआत जरूर कर सकता है।
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