रविवार, जनवरी 25, 2026

मदु गंगा और श्रीलंका

मदु गंगा के मैंग्रोव गलियारों में साहित्य की नाव: मेरी श्रीलंका डायरी
 सत्येन्द्र कुमार पाठक
श्रीलंका, जिसे हिंद महासागर का मोती कहा जाता है, अपनी गोद में न जाने कितने रहस्य और सुंदरता समेटे हुए है। लेकिन 9 जनवरी 2026 की उस सुबह ने मेरे लिए प्रकृति के एक नए और जादुई अध्याय को खोला। अवसर था पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी  के तत्वावधान में आयोजित एक साहित्यिक यात्रा का, जिसमें कलम और संवेदना के धनी साहित्यकारों का समागम था।
कोलंबो एयरपोर्ट  से बेंटोटा: एक नई सुबह की आहट - यात्रा की शुरुआत कोलंबो हवाई अड्डे से हुई। वहाँ की नमी भरी हवा में एक अजीब सा अपनापन था। बस द्वारा जब हम बेंटोटा के लिए निकले, तो मेरे साथ स्वर्णिम कला केंद्र की अध्यक्षा और प्रख्यात कवयित्री डॉ. उषाकिरण श्रीवास्तव, डॉ. संगीता सागर और हिमाचल प्रदेश तथा महाराष्ट्र के लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार उपस्थित थे। बस की खिड़की से बाहर भागते नारियल के पेड़ों और समुद्र की लहरों ने जैसे हमारे साहित्यिक संवादों के लिए एक पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी। कोलंबो से करीब 80 किलोमीटर दक्षिण में स्थित 'बालापिटिया' हमारा गंतव्य था, जहाँ 'मदु गंगा' अपने शांत जल के साथ हमारा इंतज़ार कर रही थी। प्रकृति का 'ग्रीन कैथेड्रल' - मदु गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि श्रीलंका के गाले जिले का गौरव है। यह उराग स्मन हंडिया के पास से निकलती है और अपनी छोटी सी यात्रा में एक विशाल लैगून का रूप ले लेती है। जैसे ही हम नाव पर सवार हुए, मैंग्रोव वनों की सघनता ने हमें चारों ओर से घेर लिया। यहाँ के मैंग्रोव वन किसी 'ग्रीन कैथेड्रल' (हरित गिरजाघर) की तरह प्रतीत होते हैं, जहाँ सूरज की किरणें भी पत्तों से छनकर आती हैं।
नाव सफारी के दौरान मेरा रूबरू होना यहाँ की उस जैव विविधता से हुआ, जिसे दुनिया 'रामसर आर्द्रभूमि' के रूप में जानती है। पानी की सतह पर तैरते पक्षी और किनारे पर धूप सेंकते सरीसृप यह बता रहे थे कि यहाँ 95 प्रजातियों के पौधे और 248 कशेरुकी जीव एक अद्भुत सामंजस्य में रहते हैं। साहित्यकारों  की टिप्पणियों ने उन दृश्यों को काव्यमयी बना दिया। उन्होंने कहा कि "प्रकृति की ये जड़ें हमें सिखाती हैं कि अस्तित्व को बचाए रखने के लिए कितनी गहराई तक मिट्टी और पानी को पकड़ना पड़ता है।"
दालचीनी द्वीप: जहाँ हवा में स्वाद घुल जाता है । यात्रा का सबसे सुगंधित पड़ाव था 'दालचीनी द्वीप' । मदु गंगा के पेट में बसे करीब 25-28 द्वीपों में से यह सबसे प्रमुख है। द्वीप पर उतरते ही दालचीनी की तीखी और मीठी खुशबू ने हमारा स्वागत किया। यहाँ हमने देखा कि कैसे स्थानीय निवासी पीढ़ियों से चली आ रही विधि से दालचीनी की छाल निकालते हैं।।व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए वह क्षण अविस्मरणीय था जब हमने वहाँ की पारंपरिक दालचीनी की चाय का स्वाद लिया। नारियल के पानी और ताजे पाइन (Pine) के साथ वह चाय एक उत्सव की तरह थी। स्मृति के तौर पर हमने वहाँ से लंकाई 2000 रुपये में शुद्ध दालचीनी, बारीक चूर्ण और उसका अर्क (Extract) खरीदा। वह खरीदारी मात्र एक सौदा नहीं, बल्कि उस द्वीप के श्रमजीवियों के प्रति एक सम्मान था।
आस्था, इतिहास और मिलन का संगम मदु नदी के बीचों-बीच स्थित कोठदुवा मंदिर (Kothduwa Temple) हमारी आध्यात्मिक जिज्ञासा का केंद्र बना। द्वीप पर स्थित यह बौद्ध मंदिर शांति का पर्याय है। यहाँ के ऐतिहासिक महत्व को जानकर हम चकित रह गए—अमरपुरा निकया संप्रदाय का पहला दीक्षा समारोह यहीं हुआ था। जब हमारी नाव उस बिंदु पर पहुँची जहाँ मदु गंगा अपना अस्तित्व हिंद महासागर को समर्पित कर देती है, तो वह दृश्य अलौकिक था।मैंने  इसे मानवता के वैश्विक संबंधों से जोड़ते हुए कहा कि "साहित्य भी इसी मिलन बिंदु की तरह है जहाँ विभिन्न संस्कृतियाँ एक होकर प्रेम के महासागर में गिरती हैं।" मीठे और खारे पानी का वह मिलन स्थल जीवन के द्वंद्व और शांति का प्रतीक जान पड़ा।
जल झोपड़ियाँ और मशगूल मन में वृक्षों और बांसों की बनी जल झोपड़ियाँ पर्यटकों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं हैं। उन झोपड़ियों में बैठकर जब हमने प्रकृति को निहारा, तो समय जैसे ठहर गया। बिहार , हिमाचल और महाराष्ट्र से आए साहित्यकारों ने जब अपनी क्षेत्रीय संस्कृतियों के साथ मदु गंगा की विहार ,  तुलना की, तो लगा कि प्रकृति पूरी दुनिया को एक ही सूत्र में पिरोती है। मछलियों के साथ रूबरू होना और जल-जीवन को इतने करीब से देखना एक ऐसी अनुभूति थी जो महानगरों की सीमेंट की दुनिया में दुर्लभ है।  एक अमिट छाप 9 जनवरी 2026 की शाम जब हम वापस लौटे, तो हमारे मन-मस्तिष्क में मदु गंगा की लहरें हिलोरे ले रही थीं। यह यात्रा केवल घूमने-फिरने की नहीं थी, बल्कि यह सत्येन्द्र कुमार पाठक की नजरों में प्रकृति, साहित्य और संस्कृति का एक त्रिकोणीय संगम थी। 2000 रुपये की दालचीनी और अर्क तो बस एक प्रतीक थे, असली कमाई वह मानसिक ऊर्जा थी जो हमें उस 'मैंग्रोव मैजिक' से मिली। श्रीलंका की मदु नदी आज भी मेरे भीतर कल-कल कर रही है। वह नारियल पानी का स्वाद, दालचीनी की खुशबू और बुद्ध की शांत प्रतिमा—यह सब अब मेरी स्मृतियों का हिस्सा हैं, जो आने वाले कई वर्षों तक मेरी कलम को स्याही प्रदान करती रहेंगी।
प्रमुख आकर्षणों की एक झलक में  बोट सफारी, कोठदुवा बुद्ध मंदिर, मैंग्रोव टनल। ,खरीदें: शुद्ध दालचीनी, दालचीनी का तेल और अर्क , : 2003 में रामसर साइट के रूप में नामित, जैव विविधता का खजाना।साहित्यिक संगम है।

शुक्रवार, जनवरी 23, 2026

मिथिला से श्रीलंका तक

मिथिला से लंका तक: मर्यादा पुरुषोत्तम और सिया के पदचिह्न
सत्येन्द्र कुमार पाठक
रामायण केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि भारत और उसके पड़ोसी देशों की सांस्कृतिक धड़कन है। एक जिज्ञासु यात्री के रूप में जब मैंने भगवान राम और माता सीता के जीवन से जुड़े तीन सबसे महत्वपूर्ण पड़ावों—जनकपुर, अयोध्या और अशोक वाटिका की यात्रा शुरू की, तो मुझे अहसास हुआ कि ये स्थान केवल पत्थर और मिट्टी के ढांचे नहीं, बल्कि जीवंत इतिहास हैं। यह यात्रा प्रेम, कर्तव्य और धैर्य के उस त्रिकोण को समझने की कोशिश थी, जिसने भारतीय उपमहाद्वीप के चरित्र को गढ़ा है। जनकपुर जहाँ उत्सव कभी समाप्त नहीं होता है। मेरी यात्रा की शुरुआत हुई नेपाल के तराई क्षेत्र में स्थित जनकपुर से। जैसे ही मैंने इस शहर की सीमा में प्रवेश किया, कानों में 'सिया-राम' की मधुर धुन और मैथिली भाषा की मिठास घुलने लगी। जानकी मंदिर की भव्यता: जनकपुर का मुख्य आकर्षण 'जानकी मंदिर' है। सफेद संगमरमर से बना यह विशाल मंदिर हिंदू-राजपूत और इस्लामी वास्तुकला का एक अनूठा संगम है। इसे 'नौ लखा मंदिर' भी कहा जाता है। मंदिर के गर्भ गृह में खड़ा होकर जब मैंने माता सीता की शांत प्रतिमा को देखा, तो मन उस युग में चला गया जब राजा जनक को हल चलाते समय भूमि से एक पुत्री प्राप्त हुई थी।।विवाह मंडप की जीवंतता: मंदिर परिसर के पास ही वह मंडप है जहाँ राम-जानकी का विवाह हुआ था। यहाँ की दीवारों पर आज भी उस विवाह के दृश्यों को इतनी बारीकी से उकेरा गया है कि लगता है मानो शहनाइयां अभी बज उठेंगी। जनकपुर के 'धनुष सागर' और 'गंगा सागर' जैसे पवित्र सरोवरों के तट पर शाम की आरती आपको एक अलग ही आध्यात्मिक शांति से भर देती है। जनकपुर हमें सिखाता है कि बेटी केवल पराया धन नहीं, बल्कि पूरे समाज का गर्व होती है।
 अयोध्या — मर्यादा और धर्म की शाश्वत नगरी जनकपुर की कोमलता को समेटे हुए मैं उत्तर प्रदेश की पावन नगरी अयोध्या पहुँचा। सरयू नदी के तट पर बसी यह नगरी आज अपने एक नए और भव्य स्वरूप में दुनिया के सामने है।।नया वैभव और प्राचीन गौरव अयोध्या में कदम रखते ही 'जय श्री राम' का जयघोष वातावरण में ऊर्जा भर देता है। हाल ही में निर्मित भव्य राम मंदिर की नक्काशी और पत्थरों की मजबूती मर्यादा पुरुषोत्तम के चरित्र की याद दिलाती है। नागर शैली में बने इस मंदिर के गर्भगृह में रामलला की मनमोहक मूर्ति को देखकर भक्त अपनी सुध-बुध खो बैठते हैं।
अनुशासन की नगरी अयोध्या केवल भव्यता नहीं, बल्कि अनुशासन का नाम है। 'हनुमानगढ़ी' की 76 सीढ़ियाँ चढ़ते हुए जब मैंने अयोध्या का विहंगम दृश्य देखा, तो अहसास हुआ कि क्यों इसे अपराजेय नगरी कहा जाता था। 'कनक भवन' की सुंदरता देखकर माता सीता के प्रति अयोध्यावासियों के प्रेम का पता चलता है। सरयू के तट पर शाम को होने वाली आरती और दीपदान का दृश्य ऐसा लगता है मानो आकाश के तारे धरती पर उतर आए हों। अयोध्या हमें संदेश देती है कि राजधर्म और व्यक्तिगत सुख में से जब चुनना हो, तो मर्यादा हमेशा सर्वोपरि होनी चाहिए।
अशोक वाटिका — विरह, धैर्य और शक्ति की भूमि यात्रा का अंतिम और सबसे भावुक पड़ाव था श्रीलंका का नुवारा एलिया क्षेत्र, जिसे रामायण काल में अशोक वाटिका कहा जाता था। उत्तर भारत की गर्मी और अयोध्या की भीड़भाड़ से दूर, यह स्थान घने जंगलों, ऊंचे पहाड़ों और झरनों के बीच स्थित है। सीता एलिया का सन्नाटा स्थल पर पहुँचते ही वातावरण में एक अजीब सी गंभीरता महसूस होती है। 'सीता अम्मन मंदिर' उसी स्थान पर बना है जहाँ सीता जी ने 10-12 महीने बंदी के रूप में बिताए थे। मंदिर के बगल में बहता झरना ऐसा प्रतीत होता है मानो आज भी माता सीता के विरह की कथा सुना रहा हो।
हनुमान जी के पदचिह्न और जलती हुई मिट्टी: यहाँ की चट्टानों पर बड़े-बड़े गड्ढे मौजूद हैं, जिन्हें 'हनुमान जी के पदचिह्न' माना जाता है। सबसे आश्चर्यजनक अनुभव था उस्सांगोडा (Ussangoda) की यात्रा। यहाँ की मिट्टी आज भी काली है। वैज्ञानिक तर्क चाहे जो भी हों, लेकिन स्थानीय लोककथाएं कहती हैं कि यह वही स्थान है जिसे हनुमान जी ने अपनी पूंछ की आग से जलाकर राख कर दिया था। अशोक वाटिका में सीता जी का अशोक वृक्ष के नीचे बैठना और रावण के ऐश्वर्य को तिनके के समान ठुकरा देना, नारी शक्ति और आत्मसम्मान का सबसे बड़ा उदाहरण है।
जनकपुर से शुरू होकर अयोध्या के वैभव से गुजरती हुई अशोक वाटिका की राख तक पहुँचने वाली यह यात्रा जीवन के संपूर्ण चक्र को दर्शाती है। जनकपुर प्रेम और पारिवारिक मूल्यों का प्रतीक है। अयोध्या कर्तव्य, न्याय और समाज के प्रति जिम्मेदारी का केंद्र है। अशोक वाटिका हमें सिखाती है कि जब सब कुछ छीन लिया जाए, तब भी आपका चरित्र और आपका आत्मबल ही आपकी सबसे बड़ी शक्ति होता है। आज भी, जब हम इन स्थानों की यात्रा करते हैं, तो हमें लगता है कि रामायण कोई पुरानी कहानी नहीं बल्कि एक शाश्वत सत्य है जो भौगोलिक सीमाओं को पार कर भारत, नेपाल और श्रीलंका को एक ही धागे में पिरोता है। यह यात्रा केवल दर्शन के लिए नहीं, बल्कि अपने भीतर के 'राम' और 'सीता' को जगाने की एक कोशिश है।