सत्येन्द्र कुमार पाठक
लेखन व परिकल्पना: 'जीवनधारा नमामि गंगे' के बिहार अध्ययन पर आधारित
समय: ३० से ३५ मिनट (विस्तृत मंचन) उद्देश्य: बच्चों के माध्यम से कंक्रीट के बढ़ते अतिक्रमण, नदियों के प्रदूषण और जल संकट के प्रति समाज को जगाना।
पात्र परिचय मुख्य बाल पात्र (जागरूक टोली): डुग्गू (१० वर्ष): समझदार, तार्किक और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील लड़का।।शशांक (१० वर्ष): आधुनिक गैजेट्स और कंक्रीट की चकाचौंध से प्रभावित, जो बाद में बदलता है। अंशिका (१२ वर्ष): टोली का सबसे बड़ा लड़का, जो तथ्यों और आंकड़ों (नमामि गंगे की रिपोर्ट) से सबको अवगत कराता है। पुच्चू (६ वर्ष): चंचल, मासूम और अपनी बातों से बड़ों को निरुत्तर करने वाला। पीहू (५ वर्ष): प्रकृति प्रेमी, जो पशु-पक्षियों और पेड़ों का दर्द महसूस करती है।
व्यस्क पात्र (आधुनिक समाज के प्रतिनिधि):
पापा: जमीन और फ्लैट के बिजनेस में व्यस्त, प्रकृति से कटे हुए।
मम्मी: घरेलू व आधुनिक विलासिता में व्यस्त, कचरा प्रबंधन के प्रति लापरवाह।
दादा जी: ७० वर्षीय बुजुर्ग, अतीत के साक्षी और वर्तमान दुर्दशा पर दुखी मार्गदर्शन
मां गंगा / नदियाँ (प्रतीक रूप): मटमैले, फटे कपड़ों में लिपटी एक बालिका, जिस पर प्लास्टिक का कचरा चिपका है।
कंक्रीट का दानव (भू-माफिया): काले कपड़ों में, हाथ में ईंट-पत्थर का कटआउट लिए
मंच का आधा हिस्सा (दाहिना): एक आधुनिक लिविंग रूम, जहाँ बड़ा टीवी, एसी का कटआउट और आलीशान सोफा है।
मंच का आधा हिस्सा (बायाँ): गंगा नदी का सांकेतिक किनारा। जहाँ सूखी मिट्टी, प्लास्टिक की बोतलें, थर्माकोल के टुकड़े और एक सूखा, पुराना कुआँ (कूप) दिखाई दे रहा है। पृष्ठभूमि में कंक्रीट की ऊंची इमारतों के पोस्टर लगे हैं।
(मंच पर तेज पीली रोशनी है, जो असहनीय गर्मी को दर्शाती है। बैकग्राउंड में 'लू' (गर्म हवा) और चिड़ियों के तड़पने की आवाजें हैं। लिविंग रूम वाले हिस्से में शशांक मोबाइल पर गेम खेल रहा है। डुग्गू, पुच्चू और पीहू पसीना पोंछते हुए हाथ के पंखे से हवा कर रहे हैं।)
पुच्चू: (रोने जैसी आवाज में) भैया! कूलर से तो आग के गोले निकल रहे हैं। फ्रिज की बर्फ भी पिघल गई। बिजली कब आएगी?
पीहू: पुच्चू, बिजली आ भी गई तो पानी कहाँ है? मम्मी सुबह से कह रही हैं कि समरसेबल पंप ने पानी छोड़ दिया है। बोरिंग सूख गई है!
डुग्गू: (गंभीरता से) सूखेगी नहीं तो क्या होगा? शशांक के पापा जिस नई २५ मंजिला बिल्डिंग में फ्लैट ले रहे हैं, उसके चक्कर में मोहल्ले के तीन पुराने पेड़ काट दिए गए। जहाँ पेड़ नहीं होंगे, वहाँ बारिश कैसे होगी?
शशांक: (मोबाइल से नजरें हटाकर) अरे डुग्गू, तुम भी दादा जी जैसी बातें करते हो! पेड़ कटेंगे तभी तो ऊंची इमारतें बनेंगी। लिफ्ट होगी, स्विमिंग पूल होगा। विकास इसी को तो कहते हैं! तुम लोग भी उसी कंक्रीट के आलीशान भवन में आ जाओ ना।
अंशिका : (मंच पर प्रवेश करते हुए, हाथ में एक फाइल और अखबार है) विकास? शशांक, जिसे तुम विकास कह रहे हो, वो असल में हमारी भावी पीढ़ी के लिए 'विनाश का एक्सप्रेस-वे' है। हम एक आत्मघाती दौर में जी रहे हैं!
शशांक: आत्मघाती? अधिक भैया, जरा साफ-साफ बताओ।
अंशिका : साफ सुनना है तो सुनो। ' अभी हाल ही में बिहार की नदियों और कुओं की स्थिति पर एक व्यापक अध्ययन किया है। उनकी रिपोर्ट के निष्कर्ष हमारी आंखें खोलने वाले हैं।
(तभी दादा जी लाठी टेकते हुए मंच पर आते हैं। उनके पीछे मम्मी और पापा भी आते हैं, पापा फोन पर किसी से बात कर रहे हैं।)
पापा: (फोन पर) हाँ भाई, वो जो नदी के किनारे वाला प्लॉट है, उसमें रात-रात भर मिट्टी डंप करवाओ। नदी का पानी वैसे भी कम हो गया है। पूरा (बाढ़ क्षेत्र) पाट दो। वहाँ 'आलीशान गंगा व्यू अपार्टमेंट' खड़ा करना है। करोड़ों का फायदा होगा!
(जैसे ही पापा 'मिट्टी पाटने' की बात करते हैं, मंच के बाईं ओर (नदी के किनारे) मद्धम रोशनी होती है। 'मां गंगा' के रूप में एक बच्ची मंच पर आती है। उसके गले में प्लास्टिक की बोतलों की माला है, हाथों में चिप्स के पैकेट और पैरों में नालियों के गंदे पाइप लिपटे हैं। वह दर्द से कराह रही है।)
दादा जी: (पापा का फोन छीनते हुए) रुक जाओ रमेश! रुक जाओ! तुम लोग अपनी तिजोरियां भरने के लिए उस माँ का गला घोंट रहे हो जिसने इस सभ्यता को पाला है।
मम्मी: अरे पिताजी! आप भी भावुक हो जाते हैं। विकास की नीति यही है। नदियाँ तो बहती ही रहेंगी, जमीन खाली पड़ी है तो घर क्यों न बने?
अंशिका : चाची, जमीन खाली नहीं है, वो नदी का 'पाट' है, उसका घर है। 'नमामि गंगे' के अध्ययन के अनुसार, कल तक जिन नदियों का जल 'आचमन' (पीने और पूजा) के योग्य था, आज हमने उन्हें घरों की गंदी नालियों, फैक्ट्रियों के कचरे, प्लास्टिक और चाय के कुल्हड़ों का 'ग्लोबल डस्टबिन' बना दिया है!
डुग्गू: (गंगा पात्र की ओर इशारा करते हुए) देखो पापा! देखो मम्मी! हमारी संवेदनहीनता ने पवित्र जलधाराओं को मैला नाला बना दिया है।
गंगा (पात्र): (रुंधे गले से कविता पाठ)
"मैं मोक्षदायिनी गंगा हूँ, मैं सोन की पावन धारा हूँ,
तुम कंक्रीट के भूखे हो, मैं जीवन का सहारा हूँ।
मेरे सीने पर कंक्रीट उगाकर, तुम कैसे जी पाओगे?
जब जल ही नहीं बचेगा जग में, तो सोना-चांदी खाओगे?"
पीहू: (दौड़कर गंगा पात्र का हाथ पकड़ती है) नहीं माँ! हमें माफ कर दो। दादा जी, हमारी बाकी नदियों का क्या हाल है?
दादा जी: बेटा, बहुत भयावह स्थिति है। बिहार की प्रमुख और ऐतिहासिक नदियाँ आज दम तोड़ रही हैं:
गंगा और सोन नद: मोक्षदायिनी गंगा और अपनी विशालता के लिए विख्यात सोन नद का जलस्तर इतनी तेजी से घट रहा है कि गंगा कई-कई सौ मीटर पीछे खिसक गई है।
पुनपुन और फल्गु: पितृ-तर्पण की भूमि कही जाने वाली ये नदियाँ आज अपने ही उद्धार के लिए आँसू बहा रही हैं। फल्गु का अंतःसलिला (जमीन के नीचे बहने वाला) स्वरूप गायब हो चुका है और सतह पर सिर्फ कचरे का साम्राज्य है।
गंडक, बागमती, दरधा और जमुनी: उत्तर से दक्षिण बिहार तक की ये नदियाँ सिल्टेशन (गाद) और पानी की भारी कमी से जूझ रही हैं। ये अब सिर्फ बरसात में जीवित दिखती हैं, बाकी समय मृतप्राय हो जाती हैं।
(मंच पर अचानक एक डरावना संगीत बजता है। 'कंक्रीट का दानव' (काले कपड़ों में भू-माफिया का प्रतीक) प्रवेश करता है। वह कुएँ के कटआउट के ऊपर एक बड़ी कंक्रीट की दीवार का पोस्टर चिपका देता है।)
पुच्चू: (डरकर दादा जी के पीछे छिपते हुए) दादा जी, वो देखो! उसने हमारी गली के पुराने कुएँ को बंद कर दिया!
पापा: अरे पुच्चू, डरो मत। वो तो मजदूर हैं। मैंने ही कहा था कि उस पुराने कुएँ को मलबे से पाटकर वहाँ गाड़ियों की पार्किंग बना दी जाए। अब कुएँ की जरूरत किसे है?
अंशिका : (गुस्से में) अंकल! यही सबसे आत्मघाती कदम है। कूप (कुएं) कभी गांवों और शहरों की जीवनरेखा थे। वे केवल पानी का स्रोत नहीं थे, बल्कि भूजल पुनर्भरण का प्राकृतिक तंत्र थे। जब बारिश होती थी, तो इन कुओं के माध्यम से पानी जमीन के नीचे जाता था। आज आपने कुओं को पाटकर उन पर इमारतें तान दीं, जिससे प्रकृति का पूरा वाटर-रिचार्ज सिस्टम ही ध्वस्त हो गया!
शशांक: (सोचते हुए) ओह! तभी हमारे समरसेबल में पानी आना बंद हो गया है। क्योंकि जमीन के अंदर पानी जाने का रास्ता तो हमने खुद ही ब्लॉक कर दिया है!
दादा जी: बिल्कुल सही समझे शशांक। भू-माफिया और स्वार्थी तत्वों ने नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को पाटकर 'मकान बनाने का उद्योग' शुरू कर दिया है। नदी के किनारों पर जो वृक्ष मिट्टी के कटाव को रोकते थे, उन्हें अंधाधुंध काट दिया गया। हम नदियों को भरकर आशियाना तो बना रहे हैं, लेकिन भूल रहे हैं कि जब नदी उफान पर आएगी, तो यह कंक्रीट का साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा।
मम्मी: लेकिन अधिक बेटा, सरकार और जल संसाधन विभाग क्या कर रहे हैं? करोड़ों-अरबों का बजट आता है नदियों की सफाई के लिए!
अंशिका : (व्यंग्य की हंसी हंसते हुए) चाची! योजनाएं बनती हैं, आलीशान दफ्तरों में बैठकें होती हैं, लेकिन धरातल पर सब कुछ सिर्फ 'खानापूर्ति' और कागजी घोड़ों की दौड़ तक सीमित रह गया है। फाइलों को मोटा करने वाले बहुत हैं, लेकिन नदियों को उनका पुराना स्वरूप लौटाने वाला कोई 'सच्चा उद्धारक' नजर नहीं आता।
डुग्गू: जब तक नीतियों में ईमानदारी और क्रियान्वयन में कड़ाई नहीं होगी, तब तक बजट पानी की तरह बहता रहेगा और नदियाँ सूखती रहेंगी।
पीहू: तो क्या हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे? क्या हमारी नदियाँ सिर्फ किताबों और इतिहास के नक्शों में रह जाएंगी?
पापा: (गंभीर और शर्मिंदा होते हुए) नहीं बच्चों... तुम लोगों ने आज मेरी आँखें खोल दीं। मैं अपने फायदे के लिए आने वाली पीढ़ी का भविष्य बेच रहा था। मैं आज ही नदी के किनारे वाली साइट का काम रुकवाता हूँ।
मम्मी: और मैं कसम खाती हूँ कि आज से सिंगल-यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल बंद! हमारे घर का कचरा किसी जलस्रोत में नहीं जाएगा।
(मंच पर सभी पात्र (बच्चे, माता-पिता, दादा जी) एक कतार में खड़े होते हैं। बैकग्राउंड में एक प्रेरणादायक और गंभीर संगीत गूंजता है। गंगा पात्र के ऊपर से कचरा हटा दिया जाता है और वह मुस्कुराती है।)
शशांक: (अपना मोबाइल दिखाते हुए) मैं अब इस पर गेम नहीं खेलूंगा, बल्कि पर्यावरण और नदियों को बचाने के लिए रील और वीडियो बनाकर पूरी दुनिया को जागरूक करूँगा।
पुच्चू: मैं हर हफ्ते एक नया पौधा लगाऊंगा और उसमें पानी दूंगा!
डुग्गू: प्रकृति, पर्यावरण, जल, सरोवर और वृक्ष—ये हमारी विलासिता की वस्तुएं नहीं हैं, ये हमारे जीवित रहने की बुनियादी शर्तें हैं!
अंशिका : 'जीवनधारा नमामि गंगे' का यह अध्ययन केवल एक रिपोर्ट नहीं, हमारे समाज के लिए आखिरी चेतावनी है।
(सभी बच्चे आगे बढ़कर दर्शकों की ओर हाथ फैलाते हैं।)
सब एक साथ (कोरस):
"आज बिहार और देश की ये नदियाँ मौन खड़ी होकर किसी सच्चे उद्धारक की राह देख रही हैं।
अब फैसला इस समाज को, यानी आपको करना है...
आपको कंक्रीट की अंधी चकाचौंध चाहिए या जीवन देने वाला शुद्ध जल?
बोलिए... आप क्या चुनेंगे?!"
(पृष्ठभूमि में नमामि गंगे' का नारा गूंजता है। सभी पात्र 'जल ही जीवन है' की तख्ती लहराते हैं।)
पटाक्षेप पर्दा गिरता है ।
विकास की अंधी दौड़ में सिसकती नदियां
आज का मानव एक ऐसे आत्मघाती दौर में जी रहा है, जहाँ विकास की परिभाषा केवल कंक्रीट के जंगलों और बहुमंजिला इमारतों तक सिमट कर रह गई है। इस तथाकथित 'भौतिकवादी युग' में हमने अपनी जीवनदायिनी पृथ्वी, नदियों, ऐतिहासिक सरोवरों और पर्यावरण के रक्षक वृक्षों का बेरहमी से दोहन शुरू कर दिया है। हमने इसे ही अपनी 'विकासवादी नीति' मान लिया है। विडंबना देखिए, जिस प्रकृति की छाती को चीरकर, नदियों को सुखाकर और पेड़ों को काटकर हम आलीशान मकान खड़े कर रहे हैं, उसे ही हम अपनी 'भलाई' का दौर समझ बैठे हैं। हकीकत यह है कि यह भलाई नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए तबाही का रास्ता तैयार किया जा रहा है। बिहार की नदियों, सरोवरों की वर्तमान स्थिति तथा कूपों (कुओं) के अस्तित्व पर एक व्यापक अध्ययन किया गया। इस अध्ययन के निष्कर्ष अत्यंत भयावह और समाज की आंखें खोलने वाले हैं।
कल तक जिन नदियों और जलाशयों का जल आचमन के योग्य था, आज उन्हें घरों की गंदी नालियों, फैक्ट्रियों के कचरे, प्लास्टिक, बोतलों और चाय के कुल्हड़ों का 'ग्लोबल डस्टबिन' बना दिया गया है। हमारी आस्था और पर्यावरण की रीढ़ कहे जाने वाले जलस्रोत आज कचरे के ढेर में तब्दील हो चुके हैं। हमारी संवेदनहीनता ने पवित्र जलधाराओं को मैला नाला बना दिया है। अध्ययन के अनुसार, बिहार की प्रमुख और ऐतिहासिक नदियों की स्थिति आज अत्यंत दयनीय और चिंताजनक हो चुकी है:
गंगा और सोन नद: मोक्षदायिनी मां गंगा और अपनी विशालता के लिए विख्यात सोन नद का जलस्तर तेजी से घट रहा है। सोन नद का सूखना और गंगा का कई-कई सौ मीटर पीछे चले जाना एक बड़े जल-संकट की आहट है। पुनपुन और फल्गु: पितृ तर्पण और मोक्ष की भूमि कही जाने वाली पुनपुन और फल्गु नदियां आज अपने ही उद्धार के लिए आंसू बहा रही हैं। फल्गु का अंतःसलिला स्वरूप तो गायब हो ही रहा है, इसकी सतह पर कचरे का साम्राज्य स्थापित हो चुका है।
गंडक, बागमती, दरधा और जमुनी: उत्तर से लेकर दक्षिण बिहार तक बहने वाली ये नदियां सिल्टेशन (गाद), कचरा डंपिंग और पानी की भारी कमी से जूझ रही हैं। ये नदियां अब केवल वर्षाकाल में जीवित दिखती हैं, बाकी समय ये मृतप्राय हो जाती हैं। कूपों (कुओं) की विदाई: कभी गांवों की जीवनरेखा कहे जाने वाले पारंपरिक कूप (कुएं) आज पूरी तरह इतिहास के पन्नों में दर्ज होने की कगार पर हैं। अधिकांश कुओं को पाटकर उन पर इमारतें तान दी गई हैं, जिससे भूजल पुनर्भरण का प्राकृतिक तंत्र पूरी तरह ध्वस्त हो गया है। बिहार की नदियां आज केवल प्रदूषण से ही नहीं, बल्कि 'अतिक्रमण के चंगुल' में बुरी तरह फंसी हुई हैं। नदियों की जमीन को कब्जाने और उनकी भराई करके प्लॉट काटने का एक अनियंत्रित 'मकान बनाने का उद्योग' चल पड़ा है। भू-माफियाओं और स्वार्थी तत्वों ने नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को पाट दिया है।
नदी के पाट को छोटा करके कंक्रीट के ढांचे खड़े किए जा रहे हैं। इसके साथ ही, नदियों के किनारों पर लगे उन वृक्षों की अंधाधुंध कटाई हो रही है जो मिट्टी के कटाव को रोकते थे और नदी को जीवन देते थे। हम नदियों को भरकर अपना आशियाना तो बना रहे हैं, लेकिन भूल रहे हैं कि जब नदी अपना रास्ता बदलेगी या उफान पर आएगी, तो यह कंक्रीट का साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा।
इस विनाश लीला के बीच सबसे बड़ा सवाल सरकारी तंत्र और जल संसाधन विभागों की कार्यप्रणाली पर उठता है। नदियों की सुरक्षा, सफाई और पुनरुद्धार के नाम पर बड़े-बड़े विभाग तो बना दिए गए, करोड़ों-अरबों के बजट भी आवंटित किए गए, लेकिन धरातल पर सब कुछ सिर्फ 'खानापूर्ति' और कागजी घोड़ों तक ही सीमित रह गया।
योजनाएं बनती हैं, बैठकें होती हैं, लेकिन नदियों को उनका पुराना स्वरूप लौटाने वाला कोई 'सच्चा उद्धारक' नजर नहीं आता। जब तक नीतियों में ईमानदारी और क्रियान्वयन में कड़ाई नहीं होगी, तब तक ये विभाग केवल फाइलों को मोटा करने का साधन मात्र बने रहेंगे।
प्रकृति, पर्यावरण, जल, सरोवर और वृक्ष—ये सब हमारी विलासिता की वस्तुएं नहीं, बल्कि हमारे जीवित रहने की बुनियादी शर्तें हैं। लेकिन हमने अपने ही हाथों अपनी इन जीवनधाराओं का गला घोंट दिया है। 'जीवनधारा नमामि गंगे' का यह अध्ययन संपूर्ण समाज और शासन-प्रशासन के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यदि आज भी हम नहीं संभले, नदियों से अतिक्रमण नहीं हटा, प्लास्टिक और नालियों का गंदा पानी गिरना बंद नहीं हुआ, और वृक्षों की कटाई पर रोक नहीं लगी, तो आने वाले कुछ ही वर्षों में बिहार की ये नदियां केवल किताबों और इतिहास के नक्शों में ही दिखाई देंगी। आज ये सभी नदियां मौन खड़ी होकर किसी सच्चे उद्धारक की राह देख रही हैं। अब फैसला समाज को करना है कि उसे कंक्रीट की अंधी चकाचौंध चाहिए या जीवन देने वाला शुद्ध जल!