शुक्रवार, जनवरी 02, 2026

जल , जंगल और जमीन

जल, जंगल, जमीन: मानवता की संस्कृति
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
'जल, जंगल और जमीन'—ये तीन शब्द मात्र भौतिक संसाधन नहीं हैं, बल्कि ये उस त्रिकोण का निर्माण करते हैं जिसके भीतर पृथ्वी का समस्त जीवन स्पंदित होता है। यदि ब्रह्मांड में पृथ्वी को 'नीला ग्रह' कहा जाता है, तो इसका श्रेय इन्हीं तत्वों को जाता है। मानव सभ्यता के इतिहास पर दृष्टि डालें तो स्पष्ट होता है कि हमारी प्रगति की कहानी इन्हीं तीन तत्वों के इर्द-गिर्द बुनी गई है। लेकिन आज, जब हम 21वीं सदी के तीसरे दशक में खड़े हैं, यह आधार स्तंभ डगमगा रहा है। महान आदिवासी नायक बिरसा मुंडा ने जिस "जल, जंगल, जमीन" के हक की लड़ाई शुरू की थी, वह आज केवल आदिवासियों की नहीं, बल्कि पूरी मानवता के अस्तित्व की लड़ाई बन चुकी है।
 सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक जुड़ाव में भारतीय मानस में प्रकृति को कभी भी 'उपभोग की वस्तु' नहीं माना गया। हमारी संस्कृति में नदियों को 'माँ' का दर्जा दिया गया है—गंगा, यमुना, नर्मदा केवल जलधाराएं नहीं, बल्कि मोक्षदायिनी और जीवनदायिनी शक्तियां हैं। वनों को 'तपोवन' कहा गया, जहाँ ऋषियों ने ज्ञान प्राप्त किया।
आदिवासी समाज के लिए तो जंगल उनका देवालय है। उनके लोकगीतों की लय और नृत्यों की थाप में पत्तों की सरसराहट और बारिश की बूंदों का संगीत घुला होता है। उनके लिए जमीन का एक टुकड़ा केवल संपत्ति नहीं, बल्कि उनके पूर्वजों की स्मृति और उनकी पहचान (Identity) है। 'पत्थलगड़ी' जैसे आंदोलन इसी सांस्कृतिक स्वायत्तता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का उद्घोष हैं। यह हमें याद दिलाता है कि जब तक जमीन सुरक्षित है, तब तक संस्कृति जीवित है।
 पृथ्वी के फेफड़े और रक्त का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो 'जल, जंगल और जमीन' एक अटूट चक्र (Cycle) में बंधे हैं: जंगल (पृथ्वी के फेफड़े): वन न केवल कार्बन सोखते हैं और ऑक्सीजन प्रदान करते हैं, बल्कि वे वर्षा चक्र को नियंत्रित करते हैं। वनों का विनाश सीधे तौर पर ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन को निमंत्रण देता है।
जल (जीवन का अमृत): बिना जल के न कृषि संभव है, न उद्योग और न ही जीवन। नदियों का सूखना या उनका प्रदूषित होना एक मृतप्राय सभ्यता की ओर इशारा करता है। जमीन (अन्नपूर्णा): मिट्टी केवल धूल नहीं है; यह वह उपजाऊ आधार है जो अरबों जीव-जंतुओं और वनस्पतियों को आश्रय देती है। रसायनों के अत्यधिक प्रयोग और खनन ने इस आधार को खोखला कर दिया है।. विकास की अंधी दौड़ और विनाश के संकेत की पूंजीवादी विचारधारा ने प्रकृति को 'बाजार' बना दिया है। 'विकास' केनाम पर जो नीतियां बनाई जा रही हैं, उनमें अक्सर पारिस्थितिक संतुलन  की अनदेखी की जाती है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के पहाड़ों में हाल के वर्षों में आई आपदाएं—चाहे वह भूस्खलन हो या अचानक आई बाढ़—प्रकृति की इसी चेतावनी का परिणाम हैं।
जब हम जंगलों को काटकर कंक्रीट के जंगल खड़ा करते हैं या पहाड़ों का सीना चीरकर अनियंत्रित खनन करते हैं, तो हम केवल जमीन नहीं खोते, बल्कि उस सुरक्षा कवच को नष्ट कर देते हैं जो सदियों से हमें आपदाओं से बचाता आया है। विडंबना यह है कि 'वन अधिकार अधिनियम' जैसे कानून कागजों पर तो सशक्त दिखते हैं, लेकिन धरातल पर स्थानीय समुदायों और आदिवासियों को उनकी अपनी ही जड़ों से बेदखल करने की साजिशें जारी हैं।
 संरक्षण का एकमात्र मार्ग विश्व आदिवासी दिवस (9 अगस्त) जैसे अवसर हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि आधुनिक समाज ने प्रगति के नाम पर क्या खोया है। आदिवासी समुदाय का यह नारा—"जल, जंगल, जमीन हमारा है"—स्वामित्व का अहंकार नहीं, बल्कि संरक्षण की जिम्मेदारी का बोध है। वे प्रकृति के स्वामी नहीं, बल्कि उसके 'ट्रस्टी' बनकर रहते हैं।
आदिवासी दर्शन हमें सिखाता है कि प्रकृति से उतना ही लो जितना जीवन के लिए आवश्यक है। यदि हमने उनके इस संघर्ष और मूल्यों को नहीं अपनाया, तो आने वाली पीढ़ियां एक ऐसे मरुस्थल में पैदा होंगी जहाँ धन तो होगा, लेकिन पीने को स्वच्छ पानी और सांस लेने को शुद्ध हवा नहीं होगी। यदि हमें मानवता को बचाना है, तो हमें अपने दृष्टिकोण में आमूलचूल परिवर्तन करना होगा । : विकास ऐसा हो जो भविष्य की पीढ़ियों की जरूरतों से समझौता न करे। स्थानीय समुदायों की भागीदारी: नीति निर्धारण में उन लोगों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए जो जमीन से जुड़े हैं।
केवल वृक्षारोपण नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को फिर से जीवित करने की आवश्यकता है। 'जल, जंगल और जमीन' का संरक्षण कोई दान या उपकार नहीं है, बल्कि यह हमारे स्वयं के अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है। बिरसा मुंडा का संघर्ष हमें याद दिलाता है कि जब सत्ता और स्वार्थ प्रकृति को निगलने का प्रयास करें, तब प्रतिरोध ही एकमात्र विकल्प रह जाता है। प्रकृति का विनाश वास्तव में मनुष्य का आत्मघाती कदम है। हमें यह समझना होगा कि हम प्रकृति के मालिक नहीं, उसका एक छोटा सा हिस्सा हैं। यदि हम जल को शुद्ध, जंगल को हरा और जमीन को उर्वर बनाए रखने में सफल रहे, तभी हमारी संस्कृति और सभ्यता का अस्तित्व बचा रहेगा। आने वाला कल इस बात पर निर्भर करेगा कि आज हम इन तीन स्तंभों का कितना सम्मान करते हैं।

करपी , अरवल , बिहार 804419
9472987491

गुरुवार, जनवरी 01, 2026

स्वर्ण लंका से आधुनिक राष्ट्र तक

श्रीलंका: स्वर्ण लंका से आधुनिक राष्ट्र तक का अद्भुत संगम 
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
हिन्द  महासागर का एक चमकता पन्ना हिंद महासागर के शांत नीले जल में एक नीलम की  चमकता यह छोटा सा द्वीप राष्ट्र 'श्रीलंका' केवल एक देश नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के विकास, पौराणिक गाथाओं और प्राकृतिक सुंदरता का एक जीवंत संग्रहालय है। भारत के दक्षिणी छोर से मात्र 31 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह देश सदियों से व्यापारियों, नाविकों और आध्यात्मिक साधकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। संस्कृत में 'श्री' का अर्थ है लक्ष्मी व आदरणीय और 'लंका' का अर्थ है द्वीप। यह नाम ही इसकी गरिमा और प्राचीनता को बयां करता है।
. पुराणों के अनुसार : देवशिल्पी की रचना और कुबेर का वैभव श्रीलंका का इतिहास केवल कागज के पन्नों पर नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की रग-रग में बसे 'युगों' की कथाओं में मिलता है।
सतयुग और रत्नद्वीप: संहिताओं और स्मृति ग्रंथों  के अनुसार  रत्नद्वीप का निर्माण स्वयं देव-शिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने किया था। भगवान शिव और माता पार्वती के निवास के लिए बनाई गई यह नगरी पूरी तरह सोने की थी। ऋषि विश्रवा ने अपनी चतुराई से इसे शिवजी से दान में मांग लिया और बाद में उनके पुत्र कुबेर यहाँ के पहले राजा बने। उस समय इसे 'रत्नद्वीप' कहा जाता था, जहाँ देवताओं जैसा ऐश्वर्य और सुख-सुविधाएं विद्यमान थीं।
त्रेतायुग में रावण का शासन और विज्ञान का शिखर श्रीलंका के इतिहास का सबसे चर्चित और प्रभावशाली काल त्रेतायुग है। कुबेर के सौतेले भाई कैकसी पुत्र रावण ने अपनी कठोर तपस्या के बल पर ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया और कुबेर को विस्थापित कर लंका का अधिपति बन बैठा।
रावण को केवल एक योद्धा के रूप में देखना उसके व्यक्तित्व के साथ अन्याय होगा। वह अपने समय का सबसे बड़ा वैज्ञानिक और विद्वान था। दशानन का रहस्य: उसे 'दशानन' (दस सिर वाला) इसलिए कहा जाता था क्योंकि उसे चारों वेदों और छह शास्त्रों का पूर्ण ज्ञान था। विमान शास्त्र: रावण के पास 'पुष्पक विमान' था। आधुनिक शोधकर्ता इसे 'एयरोडायनामिक्स' का प्राचीन प्रमाण मानते हैं। श्रीलंका के 'वारियापोला' और 'गुरुलोपोथा' जैसे स्थानों को आज भी रावण के विमानों के लैंडिंग पैड के रूप में जाना जाता है। आयुर्वेद और खगोल विज्ञान: उसने 'अर्क प्रकाश' नामक पुस्तक लिखी, जिसमें 'डिस्टिलेशन' की प्रक्रिया का वर्णन है। उसकी 'रावण संहिता' आज भी ज्योतिष शास्त्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ  है। श्रीलंका के माताले जिले में स्थित 'सिगिरिया' की चट्टान प्राचीन इंजीनियरिंग का एक ऐसा चमत्कार है, जिसे अक्सर रावण के काल से जोड़कर देखा जाता है। शिखर पर नगर नियोजन: 600 फीट ऊंची खड़ी चट्टान के ऊपर एक पूरा शहर बसाया गया था। इतने भारी पत्थरों को उस ऊंचाई तक ले जाना आज भी इंजीनियरों के लिए शोध का विषय है। हाइड्रोलिक सिस्टम: यहाँ के बगीचों में ऐसे फव्वारे हैं, जो बिना किसी बिजली या मोटर के, केवल गुरुत्वाकर्षण और जल-दबाव (Pressure) के सिद्धांत पर चलते हैं। दर्पण दीवार को इतना पॉलिश किया गया था कि राजा इसमें अपना प्रतिबिंब देख सकता था। सदियों बाद भी इसकी चमक बरकरार है । आस्था की गवाही देते स्थान आज भी श्रीलंका में कई ऐसे स्थान हैं जो रामायण की घटनाओं को जीवंत करते हैं: अशोक वाटिका (सीता एलिया): यहाँ के सीता अम्मन मंदिर के पास चट्टानों पर विशाल पैरों के निशान मिलते हैं, जिन्हें हनुमान जी का माना जाता है। एला स्थान 'रावण गुफा' और 'रावण जलप्रपात' के लिए प्रसिद्ध है। माना जाता है कि यहाँ सुरंगों का एक जटिल जाल है। रामसेतु: नासाकी सैटेलाइट तस्वीरों में मन्नार की खाड़ी में दिखने वाली चट्टानें आज भी उस महान वानर सेना के पुरुषार्थ की याद दिलाता है। द्वापर युग के बाद, कलियुग के प्रारंभ में श्रीलंका ने एक नया मोड़ लिया। राजकुमार विजय (543 ईसा पूर्व): उत्तर भारत के राजकुमार विजय ने यहाँ 'सिंहल वंश' की स्थापना की।सम्राट अशोक का प्रभाव: राजा देवानम्पिया तिस्सा के काल में सम्राट अशोक के पुत्र महिंदा और पुत्री संघमित्रा यहाँ बौद्ध धर्म और पवित्र 'बोधि वृक्ष' की शाखा लेकर आए। इसके बाद श्रीलंका बौद्ध संस्कृति और शिक्षा का विश्व केंद्र बन गया। अनुराधापुरा और पोलोन्नारुवा: ये प्राचीन राजधानियां अपनी विशाल मूर्तिकला और जलाशयों के लिए जानी जाती हैं। कैंडी (Kandy) श्रीलंका का अंतिम स्वतंत्र राज्य थाश्रीलंका को 'पूर्व का मोती' उसकी बेमिसाल खूबसूरती के कारण कहा जाता है। सीलोन टी: नुवारा एलिया की धुंध भरी पहाड़ियाँ दुनिया की बेहतरीन चाय का उत्पादन करती हैं।  याला नेशनल पार्क में तेंदुओं की दहाड़ है, तो मिरिसा के नीले तटों पर व्हेल मछलियों का नृत्य। यहाँ के मसाले, विशेषकर दालचीनी, सदियों से वैश्विक व्यापार का आधार रहे हैं। आधुनिक श्रीलंका: संघर्ष और पुनर्निर्माण 1948 में ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता मिलने के बाद श्रीलंका ने शिक्षा और स्वास्थ्य में दक्षिण एशिया में बेहतरीन प्रदर्शन किया। हालांकि, 26 साल तक चले गृहयुद्ध (2009 में समाप्त) ने देश की अर्थव्यवस्था को गहरी चोट पहुँचाई।
वर्तमान में, श्रीलंका अपनी आर्थिक चुनौतियों से जूझते हुए अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौट रहा है। राजधानी श्री जयवर्धनेपुरा कोट्टे और वित्तीय केंद्र कोलंबो आधुनिक गगनचुंबी इमारतों और औपनिवेशिक वास्तुकला का मिश है ।श्रीलंका केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं है, यह एक 'अनुभूति' है। इसकी हवा में मसालों की खुशबू है, मंदिरों में बुद्ध की शांति है, और पहाड़ियों में रामायण की गूँज है। रावण की वैज्ञानिक दृष्टि और सिगिरिया की वास्तुकला यह सिद्ध करती है कि प्राचीन काल में यह द्वीप ज्ञान और तकनीक का वैश्विक केंद्र था।
स्वर्ण लंका की वह चमक आज भी इसके खंडहरों, इसकी संस्कृति और इसके लोगों की चिर-परिचित मुस्कान में सुरक्षित है। चाहे आप इतिहास प्रेमी हों या आध्यात्मिक खोजी, श्रीलंका का हर कोना आपसे कुछ कहता है—एक गौरवशाली अतीत और एक संघर्षशील लेकिन उज्ज्वल भविष्य की कहान