बेलोन माता सर्वमंगला और बेलवन
सत्येन्द्र कुमार पाठक
देवीभागवत पुराण एवं स्मृति ग्रंथों में माता सर्वमंगला का उल्लेख मिलता है। उत्तरप्रदेश राज्य का बुलंदशहर जिले के नरौरा में स्थित बेलोन का गंगा तट पर बेलोन मंदिर के गर्भगृह में माता मसर्वमंगला स्थापित है । सुख समृद्धि की देवी माता बेलोन सर्वमंगला मंदिर में गुप्त माघी व श्रावण नवरात्रि , वासंती व चैत्र तथा शारदीय व अश्विन नवरात्र में शाक्त अनुयायी उपासना माता सर्वमंगला को कर मनोवांक्षित फल प्राप्त करते हैं । बेलोन सर्वमंगला मंदिर का निर्माण राजा राव भूप सिंह द्वारा स्थापित किया गया है। शाक्त सम्प्रदाय के अनुयायी द्वारा 12 शुक्ल अष्टमी को माता सर्वमंगला की उपासना कर अभीष्ट फल प्राप्त करते है ।
शाक्त शास्त्र के अनुसार सतयुग में गंगा तट पर बेल वृक्षो की उत्पत्ति एवं माता सती का रूधिर गिरने और माता पार्वती और भगवान शिव का प्रिय स्थल होने के कारण बेलवन स्थान को बिलोन कहलाने लगा है। . कहा जाता है। पतित पावनी गंगा मैया के राजघाट, कलकतिया एवं नरौरा घाट पवित्र है। मां बेलोन भवानी के प्रादुर्भाव मां बेलोन वाली को साक्षात देवादिदेव महादेव की अद्धांगिनी माता सती का स्वरूप है। इसे लेकर दो अलग-अलग दंत कथाएं सामने आती हैं। चूंकि मां बेलोन वाली के प्रादुर्भाव को लेकर अभी कोई किसी तरह का लिखित दस्तावेज नहीं है। मां बेलोन वाली वीरासन में एवं मातासती का एक पैर पाताल में है । दक्ष प्रजापति द्वारा ब्रह्मेष्टि यज्ञ में देवादिदेव महादेव की अवहेलना, पिता के असहनीय व्यवहार से दुखी होकर मां सती द्वारा देह त्यागने और इससे कुपित महादेव के गुणों यज्ञ विध्वंस कर भगवान शिव के कंधे पर स्थित माता सती का का रक्त की बूंदे बेलवन स्थल पर गिर था ।
भगवान शिव और माता पार्वती एक बार पृथ्वी भ्रमण करते-करते गंगा नदी के पश्चिमी छोर के पास स्थित बेलवन क्षेत्र में माता पार्वती को एक शीला दिखाई पड़ने पर बैठने के लिए ललायित हुई। भगवान शिव से माता अपनी इच्छा शीला पर बैठने के लिए प्रकट की और भगवान शिव की अनुमति मिलने पर वह सिला पर बैठ गई। मां पार्वती के विश्राम करने पर भगवान शिव भी पास वटवृक्ष के पास आसन लगाकर बैठ गए। शीला मध्य में माता पार्वती के विश्राम करने के दौरान कर रहीं माता पार्वती के पैर बालक द्वारा दबाने लगा। बालक द्वारा पैर दबाने के दौरान देखकर माता पार्वती ने आनंद और आश्चर्य का मिश्रित भाव व्यक्त करते हुए भगवान महादेव से कहा कि हे प्राणनाथ यह बालक कौन है और इस सिला पर बैठकर मैं इतनी आनंद विभार क्यों हूं। भगवान महादेव ने माता पार्वती को राजा दक्ष के यज्ञ प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कहा कि पिता के अपमान जनक व्यवहार से दुखी होकर जब पूर्व जन्म में तुमने देह को लेकर आकाश मार्ग से गुजर रहे थे। तब सती के शरीर से एक मां का लोथड़ा और खून की कुछ बूंद जिस सिला पर पड़ी और इसके गर्भग्रह में समा गई। यहलंगुरिया बालक सती का अंश हैं यह बालक तभी से आपके दर्शन की इच्छा के साथ उपासना कर रहा था। आज तुम्हारे साक्षात दर्शन से इसकी उपासना पूरी हो गई। इस पर भाव विहवल मां पार्वती ने बालक को गोद में उठा लिया। माता पार्वती बालक के साथ कुछ समय यहां रहीं। उसी समय भगवान शिव ने कहा कि आज से यह सिला साक्षात तुम्हारा स्वरूप होगा, और मां सर्व मंगला देवी के नाम से विख्यात होगा । व्यक्ति शुक्ल पक्ष की बारह अष्टमी तुम्हारे दर्शन करेगा। उसे मनवांछित फल प्राप्त होगा। यह बालक लांगुरिया के नाम से जाना जाएगा। लांगुरिया एवं शीला के दर्शन से ही मां सर्व मंगला देवी की यात्रा पूरी होगी। जब मां पार्वती यहां से चलने को हुई तो उनके शरीर से एक छायाकृति निकली और सिला में समाहित होने से शिला सर्वमंगला मूर्ति के रूप में बदल गई। सर्वमंगला मंदिर से 250 गज दूर भगवान शिव ने विश्राम स्थान पर वटकेश्वर महादेव मंदिर हो गया। त्रेतायुग में भगवान राम , द्वापर में राक्षसों के बढ़ते अत्याचार से लोग त्राहि-त्राहि करने लगे। ब्रज से लगे कोल वत्मान में अलीगढ़ क्षेत्र के कोल राक्षस ने आतंक बरपा रखा था। आसपास की जनता ने भगवान कृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता दाऊ बलराम से कोल के आतंक से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। इसी के बाद बलराम ने कोल राक्षस मारा गया। इससे क्षेत्र की जनता को काफी राहत मिली। कोल का वध करने के बाद बलराम जी ने रामघाट पर गंगा में स्नान करने दौरान उन्हें दैवीय शक्ति के प्रभाव की अनुभूति प्राप्त कर बलराम विलवन क्षेत्र में पहुंच गए। यहां देवी के दर्शन की इच्छा के साथ उन्होंने घोर तप किया और इससे प्रसन्न होकर मां सर्वमंगला देवी ने उन्हें दर्शन दिये। देवी ने बलराम से कहा कि वह उनकी खंडित शक्ति को पूर्ण प्रतिष्ठित करें। इसके बाद बलराम ने मां सर्वमंगला देवी के दर्शन को पूर्ण प्रतिष्ठित किया। मां सर्वमंगला देवी के दर्शन की अभिलाषा से बलराम ने चैत्र शुक्ल पक्ष की अष्टमी को तपस्या शुरू की और अगली चैत्र शुक्ल भी अष्टमी को मां ने उन्हें दर्शन देकर तपस्या का समापन कराया। चैत्र सुक्ल पक्ष की अष्टमी को मां सर्वमंगला देवी के दर्शन का विशेष महत्व माना जाता है। कालचक्र बदलने से क्षेत्र में भूस्खलन हुआ नतीजतन बेलों का बगीचा जमीन में समा गया और मां सर्वमंगला देवी की जहां मूर्ति थी । बेलवन क्षेत्र टापू में बदल गया। बेलवन को वेलवं , लांगुरिया , बेलवा , विवलेश्वर स्थल , बसावच , खेड़ा कहा जाता था । खेड़ा निवासियों द्वारा भूगर्भ में समाहित मां सर्वमंगला देवी की मूर्ति प्रकट होने के दौरान मूर्ति के सिर का छोटा सा हिस्सा बाहर चमकता था। घसियारे इसे पत्थर की सिला समझकर इस पर अपनी खुरपी की धार बनाया करते थे। इससे मां को काफी पीड़ा होती थी। मां के सिर में खुरपी पर धार रखने के लिए की जाने वाली घिसाई से गड्ढा हो गया था ।मुगल बादशाह जहांगीर शिकार खेलते हुए बिलवन क्षेत्र में सेनापति अनीराम बड़बूजर के साथ आया था। अचानक एक शेर ने जहांगीर पर आक्रमण कर दिया। जहांगीर को शेर से बचाने के लिए बड्बूजर ने अपनी जान की परवाह न कर शेर के मुंह में अपना हाथ डाल दिया। पास ही खड़ा शहजादा खुर्रम यह घटना देख रहा था । सेनापति अनिराम की जिंदादिली से काफी प्रभावित हुआ। उसने सेनापति को संकट में फंसा देखकर अपनी तलवार से शेर पर पीछे से वार कर उसे मार डाला। जहांगीर ने सेनापति की बहादुरी से खुश होकर उसे 1556 गांवों एवं बिल्वन की जमींदारी पुरस्कार में दी। बिलवन क्षेत्र भी इसी में शामिल था। समय चक्र फिर बदला। जहांगीर के सेनापति बड्बूजर के वंशज राव भूपसिंह ने बेलवन क्षेत्र में हवेली बनवाई और पूजा पाठ में रम गए। मां सर्वमंगला ने भूपसिंह को स्वप्न दिया कि वह अमुक स्थान में जमीन में दबी है। अतः उनकी मूर्ति जहां है वहां खुदाई करवाकर उसका भवन बनवा दें। राव भूपसिंह को स्वप्न तो याद रहा। पर वह स्थान याद नहीं रहा जहां मां ने अपनी मूर्ति होने की जानकारी दी थी। अब तो राव भूपसिंह की बेचैनी बढ़ने लगी। जब पीड़ा असहनीय हो गई तो उन्होंने बनारस के विद्वान ब्राह्मणों को बुलाकर अपनी समस्या बताई।ब्राह्मणों ने राव को इसके लिए सतचंडी यज्ञ करने का सुझाव दिया। राव तुरंत तैयार हो गए। शतचंडी यज्ञ हुआ और यजमान बने राव ने रात्रि विश्राम यज्ञ प्रांगण में ही किया। रात्रि में मां सर्वमंगला देवी ने उन्हें फिर स्वप्न दिया और वह स्थान बताया जहां उनकी प्रतिमा दबी थी। सुबह होते ही राव ने ब्राह्मणों को स्वप्न की जानकारी दी और ब्राह्मणों के निर्देश पर राव भूपसिंह ने मां द्वारा बताये स्थान पर खुदाई शुरू कराई तो वहां मां की इस मूर्ति को देखकर राव ने इसे अपनी हवेली के बाहर लगाने का मन बनाया। मजदूरों को मूर्ति सुरक्षित निकालने का हुक्म दिया। मजदूरों ने काफी कोशिश की मगर हार थक्कर बैठ गए। मूर्ति के एक पैर का कोई ओर छोर नहीं मिला। तब मां ने राव को बताया कि उनका एक पैर पाताल में है। इसलिए मेरा इसी स्थान पर मंदिर बनवाओ। और इसी तरह मां सर्वमंगला देवी के मंदिर का निर्माण हुआ। बताया जाता है कि राव भूप सिंह के वंशज कल्याण सिंह के कोई संतान नहीं हुई। इससे वह काफी विचलित हुए और बनारस के विद्वान दर्माचार्यों की शरण ली। धर्माचायों ने कहा कि जब तक मैया का चढ़ावा खाना बंद नहीं करोगे, संतान सुख असंभव है। कल्याण सिंह ने इस पर तुरंत अमल किया और मैया की पूजा सेवा के लिए दो ब्राह्मणों को दायित्व सौंप दिया। इसी के बाद राव कल्याण सिंह को संतान की प्राप्ति हुई। बेलोन वाली मैया के प्रांगण में हर साल बलिदान दिवस भी मनाया जाता है। यह चैत्र शुक्ल की त्रयोदश एवं आश्विन माह के शुक्लपक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है। तीन दशक पूर्व .बकरे की बलि दी जाती थी। मां बेलोन का भवन जहां बना है वह बेलपत्रों का वन क्षेत्र है। प्रारंभ में लोग
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बेलोन माता सर्वमंगला और बेलवन
सत्येन्द्र कुमार पाठक
देवीभागवत पुराण एवं स्मृति ग्रंथों में माता सर्वमंगला का उल्लेख मिलता है। उत्तरप्रदेश राज्य का बुलंदशहर जिले के नरौरा में स्थित बेलोन का गंगा तट पर बेलोन मंदिर के गर्भगृह में माता मसर्वमंगला स्थापित है । सुख समृद्धि की देवी माता बेलोन सर्वमंगला मंदिर में गुप्त माघी व श्रावण नवरात्रि , वासंती व चैत्र तथा शारदीय व अश्विन नवरात्र में शाक्त अनुयायी उपासना माता सर्वमंगला को कर मनोवांक्षित फल प्राप्त करते हैं । बेलोन सर्वमंगला मंदिर का निर्माण राजा राव भूप सिंह द्वारा स्थापित किया गया है। शाक्त सम्प्रदाय के अनुयायी द्वारा 12 शुक्ल अष्टमी को माता सर्वमंगला की उपासना कर अभीष्ट फल प्राप्त करते है ।
शाक्त शास्त्र के अनुसार सतयुग में गंगा तट पर बेल वृक्षो की उत्पत्ति एवं माता सती का रूधिर गिरने और माता पार्वती और भगवान शिव का प्रिय स्थल होने के कारण बेलवन स्थान को बिलोन कहलाने लगा है। . कहा जाता है। पतित पावनी गंगा मैया के राजघाट, कलकतिया एवं नरौरा घाट पवित्र है। मां बेलोन भवानी के प्रादुर्भाव मां बेलोन वाली को साक्षात देवादिदेव महादेव की अद्धांगिनी माता सती का स्वरूप है। इसे लेकर दो अलग-अलग दंत कथाएं सामने आती हैं। चूंकि मां बेलोन वाली के प्रादुर्भाव को लेकर अभी कोई किसी तरह का लिखित दस्तावेज नहीं है। मां बेलोन वाली वीरासन में एवं मातासती का एक पैर पाताल में है । दक्ष प्रजापति द्वारा ब्रह्मेष्टि यज्ञ में देवादिदेव महादेव की अवहेलना, पिता के असहनीय व्यवहार से दुखी होकर मां सती द्वारा देह त्यागने और इससे कुपित महादेव के गुणों यज्ञ विध्वंस कर भगवान शिव के कंधे पर स्थित माता सती का का रक्त की बूंदे बेलवन स्थल पर गिर था ।
भगवान शिव और माता पार्वती एक बार पृथ्वी भ्रमण करते-करते गंगा नदी के पश्चिमी छोर के पास स्थित बेलवन क्षेत्र में माता पार्वती को एक शीला दिखाई पड़ने पर बैठने के लिए ललायित हुई। भगवान शिव से माता अपनी इच्छा शीला पर बैठने के लिए प्रकट की और भगवान शिव की अनुमति मिलने पर वह सिला पर बैठ गई। मां पार्वती के विश्राम करने पर भगवान शिव भी पास वटवृक्ष के पास आसन लगाकर बैठ गए। शीला मध्य में माता पार्वती के विश्राम करने के दौरान कर रहीं माता पार्वती के पैर बालक द्वारा दबाने लगा। बालक द्वारा पैर दबाने के दौरान देखकर माता पार्वती ने आनंद और आश्चर्य का मिश्रित भाव व्यक्त करते हुए भगवान महादेव से कहा कि हे प्राणनाथ यह बालक कौन है और इस सिला पर बैठकर मैं इतनी आनंद विभार क्यों हूं। भगवान महादेव ने माता पार्वती को राजा दक्ष के यज्ञ प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कहा कि पिता के अपमान जनक व्यवहार से दुखी होकर जब पूर्व जन्म में तुमने देह को लेकर आकाश मार्ग से गुजर रहे थे। तब सती के शरीर से एक मां का लोथड़ा और खून की कुछ बूंद जिस सिला पर पड़ी और इसके गर्भग्रह में समा गई। यहलंगुरिया बालक सती का अंश हैं यह बालक तभी से आपके दर्शन की इच्छा के साथ उपासना कर रहा था। आज तुम्हारे साक्षात दर्शन से इसकी उपासना पूरी हो गई। इस पर भाव विहवल मां पार्वती ने बालक को गोद में उठा लिया। माता पार्वती बालक के साथ कुछ समय यहां रहीं। उसी समय भगवान शिव ने कहा कि आज से यह सिला साक्षात तुम्हारा स्वरूप होगा, और मां सर्व मंगला देवी के नाम से विख्यात होगा । व्यक्ति शुक्ल पक्ष की बारह अष्टमी तुम्हारे दर्शन करेगा। उसे मनवांछित फल प्राप्त होगा। यह बालक लांगुरिया के नाम से जाना जाएगा। लांगुरिया एवं शीला के दर्शन से ही मां सर्व मंगला देवी की यात्रा पूरी होगी। जब मां पार्वती यहां से चलने को हुई तो उनके शरीर से एक छायाकृति निकली और सिला में समाहित होने से शिला सर्वमंगला मूर्ति के रूप में बदल गई। सर्वमंगला मंदिर से 250 गज दूर भगवान शिव ने विश्राम स्थान पर वटकेश्वर महादेव मंदिर हो गया। त्रेतायुग में भगवान राम , द्वापर में राक्षसों के बढ़ते अत्याचार से लोग त्राहि-त्राहि करने लगे। ब्रज से लगे कोल वत्मान में अलीगढ़ क्षेत्र के कोल राक्षस ने आतंक बरपा रखा था। आसपास की जनता ने भगवान कृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता दाऊ बलराम से कोल के आतंक से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। इसी के बाद बलराम ने कोल राक्षस मारा गया। इससे क्षेत्र की जनता को काफी राहत मिली। कोल का वध करने के बाद बलराम जी ने रामघाट पर गंगा में स्नान करने दौरान उन्हें दैवीय शक्ति के प्रभाव की अनुभूति प्राप्त कर बलराम विलवन क्षेत्र में पहुंच गए। यहां देवी के दर्शन की इच्छा के साथ उन्होंने घोर तप किया और इससे प्रसन्न होकर मां सर्वमंगला देवी ने उन्हें दर्शन दिये। देवी ने बलराम से कहा कि वह उनकी खंडित शक्ति को पूर्ण प्रतिष्ठित करें। इसके बाद बलराम ने मां सर्वमंगला देवी के दर्शन को पूर्ण प्रतिष्ठित किया। मां सर्वमंगला देवी के दर्शन की अभिलाषा से बलराम ने चैत्र शुक्ल पक्ष की अष्टमी को तपस्या शुरू की और अगली चैत्र शुक्ल भी अष्टमी को मां ने उन्हें दर्शन देकर तपस्या का समापन कराया। चैत्र सुक्ल पक्ष की अष्टमी को मां सर्वमंगला देवी के दर्शन का विशेष महत्व माना जाता है। कालचक्र बदलने से क्षेत्र में भूस्खलन हुआ नतीजतन बेलों का बगीचा जमीन में समा गया और मां सर्वमंगला देवी की जहां मूर्ति थी । बेलवन क्षेत्र टापू में बदल गया। बेलवन को वेलवं , लांगुरिया , बेलवा , विवलेश्वर स्थल , बसावच , खेड़ा कहा जाता था । खेड़ा निवासियों द्वारा भूगर्भ में समाहित मां सर्वमंगला देवी की मूर्ति प्रकट होने के दौरान मूर्ति के सिर का छोटा सा हिस्सा बाहर चमकता था। घसियारे इसे पत्थर की सिला समझकर इस पर अपनी खुरपी की धार बनाया करते थे। इससे मां को काफी पीड़ा होती थी। मां के सिर में खुरपी पर धार रखने के लिए की जाने वाली घिसाई से गड्ढा हो गया था ।मुगल बादशाह जहांगीर शिकार खेलते हुए बिलवन क्षेत्र में सेनापति अनीराम बड़बूजर के साथ आया था। अचानक एक शेर ने जहांगीर पर आक्रमण कर दिया। जहांगीर को शेर से बचाने के लिए बड्बूजर ने अपनी जान की परवाह न कर शेर के मुंह में अपना हाथ डाल दिया। पास ही खड़ा शहजादा खुर्रम यह घटना देख रहा था । सेनापति अनिराम की जिंदादिली से काफी प्रभावित हुआ। उसने सेनापति को संकट में फंसा देखकर अपनी तलवार से शेर पर पीछे से वार कर उसे मार डाला। जहांगीर ने सेनापति की बहादुरी से खुश होकर उसे 1556 गांवों एवं बिल्वन की जमींदारी पुरस्कार में दी। बिलवन क्षेत्र भी इसी में शामिल था। समय चक्र फिर बदला। जहांगीर के सेनापति बड्बूजर के वंशज राव भूपसिंह ने बेलवन क्षेत्र में हवेली बनवाई और पूजा पाठ में रम गए। मां सर्वमंगला ने भूपसिंह को स्वप्न दिया कि वह अमुक स्थान में जमीन में दबी है। अतः उनकी मूर्ति जहां है वहां खुदाई करवाकर उसका भवन बनवा दें। राव भूपसिंह को स्वप्न तो याद रहा। पर वह स्थान याद नहीं रहा जहां मां ने अपनी मूर्ति होने की जानकारी दी थी। अब तो राव भूपसिंह की बेचैनी बढ़ने लगी। जब पीड़ा असहनीय हो गई तो उन्होंने बनारस के विद्वान ब्राह्मणों को बुलाकर अपनी समस्या बताई।ब्राह्मणों ने राव को इसके लिए सतचंडी यज्ञ करने का सुझाव दिया। राव तुरंत तैयार हो गए। शतचंडी यज्ञ हुआ और यजमान बने राव ने रात्रि विश्राम यज्ञ प्रांगण में ही किया। रात्रि में मां सर्वमंगला देवी ने उन्हें फिर स्वप्न दिया और वह स्थान बताया जहां उनकी प्रतिमा दबी थी। सुबह होते ही राव ने ब्राह्मणों को स्वप्न की जानकारी दी और ब्राह्मणों के निर्देश पर राव भूपसिंह ने मां द्वारा बताये स्थान पर खुदाई शुरू कराई तो वहां मां की इस मूर्ति को देखकर राव ने इसे अपनी हवेली के बाहर लगाने का मन बनाया। मजदूरों को मूर्ति सुरक्षित निकालने का हुक्म दिया। मजदूरों ने काफी कोशिश की मगर हार थक्कर बैठ गए। मूर्ति के एक पैर का कोई ओर छोर नहीं मिला। तब मां ने राव को बताया कि उनका एक पैर पाताल में है। इसलिए मेरा इसी स्थान पर मंदिर बनवाओ। और इसी तरह मां सर्वमंगला देवी के मंदिर का निर्माण हुआ। बताया जाता है कि राव भूप सिंह के वंशज कल्याण सिंह के कोई संतान नहीं हुई। इससे वह काफी विचलित हुए और बनारस के विद्वान दर्माचार्यों की शरण ली। धर्माचायों ने कहा कि जब तक मैया का चढ़ावा खाना बंद नहीं करोगे, संतान सुख असंभव है। कल्याण सिंह ने इस पर तुरंत अमल किया और मैया की पूजा सेवा के लिए दो ब्राह्मणों को दायित्व सौंप दिया। इसी के बाद राव कल्याण सिंह को संतान की प्राप्ति हुई। बेलोन वाली मैया के प्रांगण में हर साल बलिदान दिवस भी मनाया जाता है। यह चैत्र शुक्ल की त्रयोदश एवं आश्विन माह के शुक्लपक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है। तीन दशक पूर्व .बकरे की बलि दी जाती थी। मां बेलोन का भवन जहां बना है वह बेलपत्रों का वन क्षेत्र है। प्रारंभ में लोग
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बेलोन माता सर्वमंगला और बेलवन
सत्येन्द्र कुमार पाठक
देवीभागवत पुराण एवं स्मृति ग्रंथों में माता सर्वमंगला का उल्लेख मिलता है। उत्तरप्रदेश राज्य का बुलंदशहर जिले के नरौरा में स्थित बेलोन का गंगा तट पर बेलोन मंदिर के गर्भगृह में माता मसर्वमंगला स्थापित है । सुख समृद्धि की देवी माता बेलोन सर्वमंगला मंदिर में गुप्त माघी व श्रावण नवरात्रि , वासंती व चैत्र तथा शारदीय व अश्विन नवरात्र में शाक्त अनुयायी उपासना माता सर्वमंगला को कर मनोवांक्षित फल प्राप्त करते हैं । बेलोन सर्वमंगला मंदिर का निर्माण राजा राव भूप सिंह द्वारा स्थापित किया गया है। शाक्त सम्प्रदाय के अनुयायी द्वारा 12 शुक्ल अष्टमी को माता सर्वमंगला की उपासना कर अभीष्ट फल प्राप्त करते है ।
शाक्त शास्त्र के अनुसार सतयुग में गंगा तट पर बेल वृक्षो की उत्पत्ति एवं माता सती का रूधिर गिरने और माता पार्वती और भगवान शिव का प्रिय स्थल होने के कारण बेलवन स्थान को बिलोन कहलाने लगा है। . कहा जाता है। पतित पावनी गंगा मैया के राजघाट, कलकतिया एवं नरौरा घाट पवित्र है। मां बेलोन भवानी के प्रादुर्भाव मां बेलोन वाली को साक्षात देवादिदेव महादेव की अद्धांगिनी माता सती का स्वरूप है। इसे लेकर दो अलग-अलग दंत कथाएं सामने आती हैं। चूंकि मां बेलोन वाली के प्रादुर्भाव को लेकर अभी कोई किसी तरह का लिखित दस्तावेज नहीं है। मां बेलोन वाली वीरासन में एवं मातासती का एक पैर पाताल में है । दक्ष प्रजापति द्वारा ब्रह्मेष्टि यज्ञ में देवादिदेव महादेव की अवहेलना, पिता के असहनीय व्यवहार से दुखी होकर मां सती द्वारा देह त्यागने और इससे कुपित महादेव के गुणों यज्ञ विध्वंस कर भगवान शिव के कंधे पर स्थित माता सती का का रक्त की बूंदे बेलवन स्थल पर गिर था ।
भगवान शिव और माता पार्वती एक बार पृथ्वी भ्रमण करते-करते गंगा नदी के पश्चिमी छोर के पास स्थित बेलवन क्षेत्र में माता पार्वती को एक शीला दिखाई पड़ने पर बैठने के लिए ललायित हुई। भगवान शिव से माता अपनी इच्छा शीला पर बैठने के लिए प्रकट की और भगवान शिव की अनुमति मिलने पर वह सिला पर बैठ गई। मां पार्वती के विश्राम करने पर भगवान शिव भी पास वटवृक्ष के पास आसन लगाकर बैठ गए। शीला मध्य में माता पार्वती के विश्राम करने के दौरान कर रहीं माता पार्वती के पैर बालक द्वारा दबाने लगा। बालक द्वारा पैर दबाने के दौरान देखकर माता पार्वती ने आनंद और आश्चर्य का मिश्रित भाव व्यक्त करते हुए भगवान महादेव से कहा कि हे प्राणनाथ यह बालक कौन है और इस सिला पर बैठकर मैं इतनी आनंद विभार क्यों हूं। भगवान महादेव ने माता पार्वती को राजा दक्ष के यज्ञ प्रसंग का वृतांत सुनाते हुए कहा कि पिता के अपमान जनक व्यवहार से दुखी होकर जब पूर्व जन्म में तुमने देह को लेकर आकाश मार्ग से गुजर रहे थे। तब सती के शरीर से एक मां का लोथड़ा और खून की कुछ बूंद जिस सिला पर पड़ी और इसके गर्भग्रह में समा गई। यहलंगुरिया बालक सती का अंश हैं यह बालक तभी से आपके दर्शन की इच्छा के साथ उपासना कर रहा था। आज तुम्हारे साक्षात दर्शन से इसकी उपासना पूरी हो गई। इस पर भाव विहवल मां पार्वती ने बालक को गोद में उठा लिया। माता पार्वती बालक के साथ कुछ समय यहां रहीं। उसी समय भगवान शिव ने कहा कि आज से यह सिला साक्षात तुम्हारा स्वरूप होगा, और मां सर्व मंगला देवी के नाम से विख्यात होगा । व्यक्ति शुक्ल पक्ष की बारह अष्टमी तुम्हारे दर्शन करेगा। उसे मनवांछित फल प्राप्त होगा। यह बालक लांगुरिया के नाम से जाना जाएगा। लांगुरिया एवं शीला के दर्शन से ही मां सर्व मंगला देवी की यात्रा पूरी होगी। जब मां पार्वती यहां से चलने को हुई तो उनके शरीर से एक छायाकृति निकली और सिला में समाहित होने से शिला सर्वमंगला मूर्ति के रूप में बदल गई। सर्वमंगला मंदिर से 250 गज दूर भगवान शिव ने विश्राम स्थान पर वटकेश्वर महादेव मंदिर हो गया। त्रेतायुग में भगवान राम , द्वापर में राक्षसों के बढ़ते अत्याचार से लोग त्राहि-त्राहि करने लगे। ब्रज से लगे कोल वत्मान में अलीगढ़ क्षेत्र के कोल राक्षस ने आतंक बरपा रखा था। आसपास की जनता ने भगवान कृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता दाऊ बलराम से कोल के आतंक से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। इसी के बाद बलराम ने कोल राक्षस मारा गया। इससे क्षेत्र की जनता को काफी राहत मिली। कोल का वध करने के बाद बलराम जी ने रामघाट पर गंगा में स्नान करने दौरान उन्हें दैवीय शक्ति के प्रभाव की अनुभूति प्राप्त कर बलराम विलवन क्षेत्र में पहुंच गए। यहां देवी के दर्शन की इच्छा के साथ उन्होंने घोर तप किया और इससे प्रसन्न होकर मां सर्वमंगला देवी ने उन्हें दर्शन दिये। देवी ने बलराम से कहा कि वह उनकी खंडित शक्ति को पूर्ण प्रतिष्ठित करें। इसके बाद बलराम ने मां सर्वमंगला देवी के दर्शन को पूर्ण प्रतिष्ठित किया। मां सर्वमंगला देवी के दर्शन की अभिलाषा से बलराम ने चैत्र शुक्ल पक्ष की अष्टमी को तपस्या शुरू की और अगली चैत्र शुक्ल भी अष्टमी को मां ने उन्हें दर्शन देकर तपस्या का समापन कराया। चैत्र सुक्ल पक्ष की अष्टमी को मां सर्वमंगला देवी के दर्शन का विशेष महत्व माना जाता है। कालचक्र बदलने से क्षेत्र में भूस्खलन हुआ नतीजतन बेलों का बगीचा जमीन में समा गया और मां सर्वमंगला देवी की जहां मूर्ति थी । बेलवन क्षेत्र टापू में बदल गया। बेलवन को वेलवं , लांगुरिया , बेलवा , विवलेश्वर स्थल , बसावच , खेड़ा कहा जाता था । खेड़ा निवासियों द्वारा भूगर्भ में समाहित मां सर्वमंगला देवी की मूर्ति प्रकट होने के दौरान मूर्ति के सिर का छोटा सा हिस्सा बाहर चमकता था। घसियारे इसे पत्थर की सिला समझकर इस पर अपनी खुरपी की धार बनाया करते थे। इससे मां को काफी पीड़ा होती थी। मां के सिर में खुरपी पर धार रखने के लिए की जाने वाली घिसाई से गड्ढा हो गया था ।मुगल बादशाह जहांगीर शिकार खेलते हुए बिलवन क्षेत्र में सेनापति अनीराम बड़बूजर के साथ आया था। अचानक एक शेर ने जहांगीर पर आक्रमण कर दिया। जहांगीर को शेर से बचाने के लिए बड्बूजर ने अपनी जान की परवाह न कर शेर के मुंह में अपना हाथ डाल दिया। पास ही खड़ा शहजादा खुर्रम यह घटना देख रहा था । सेनापति अनिराम की जिंदादिली से काफी प्रभावित हुआ। उसने सेनापति को संकट में फंसा देखकर अपनी तलवार से शेर पर पीछे से वार कर उसे मार डाला। जहांगीर ने सेनापति की बहादुरी से खुश होकर उसे 1556 गांवों एवं बिल्वन की जमींदारी पुरस्कार में दी। बिलवन क्षेत्र भी इसी में शामिल था। समय चक्र फिर बदला। जहांगीर के सेनापति बड्बूजर के वंशज राव भूपसिंह ने बेलवन क्षेत्र में हवेली बनवाई और पूजा पाठ में रम गए। मां सर्वमंगला ने भूपसिंह को स्वप्न दिया कि वह अमुक स्थान में जमीन में दबी है। अतः उनकी मूर्ति जहां है वहां खुदाई करवाकर उसका भवन बनवा दें। राव भूपसिंह को स्वप्न तो याद रहा। पर वह स्थान याद नहीं रहा जहां मां ने अपनी मूर्ति होने की जानकारी दी थी। अब तो राव भूपसिंह की बेचैनी बढ़ने लगी। जब पीड़ा असहनीय हो गई तो उन्होंने बनारस के विद्वान ब्राह्मणों को बुलाकर अपनी समस्या बताई।ब्राह्मणों ने राव को इसके लिए सतचंडी यज्ञ करने का सुझाव दिया। राव तुरंत तैयार हो गए। शतचंडी यज्ञ हुआ और यजमान बने राव ने रात्रि विश्राम यज्ञ प्रांगण में ही किया। रात्रि में मां सर्वमंगला देवी ने उन्हें फिर स्वप्न दिया और वह स्थान बताया जहां उनकी प्रतिमा दबी थी। सुबह होते ही राव ने ब्राह्मणों को स्वप्न की जानकारी दी और ब्राह्मणों के निर्देश पर राव भूपसिंह ने मां द्वारा बताये स्थान पर खुदाई शुरू कराई तो वहां मां की इस मूर्ति को देखकर राव ने इसे अपनी हवेली के बाहर लगाने का मन बनाया। मजदूरों को मूर्ति सुरक्षित निकालने का हुक्म दिया। मजदूरों ने काफी कोशिश की मगर हार थक्कर बैठ गए। मूर्ति के एक पैर का कोई ओर छोर नहीं मिला। तब मां ने राव को बताया कि उनका एक पैर पाताल में है। इसलिए मेरा इसी स्थान पर मंदिर बनवाओ। और इसी तरह मां सर्वमंगला देवी के मंदिर का निर्माण हुआ। बताया जाता है कि राव भूप सिंह के वंशज कल्याण सिंह के कोई संतान नहीं हुई। इससे वह काफी विचलित हुए और बनारस के विद्वान दर्माचार्यों की शरण ली। धर्माचायों ने कहा कि जब तक मैया का चढ़ावा खाना बंद नहीं करोगे, संतान सुख असंभव है। कल्याण सिंह ने इस पर तुरंत अमल किया और मैया की पूजा सेवा के लिए दो ब्राह्मणों को दायित्व सौंप दिया। इसी के बाद राव कल्याण सिंह को संतान की प्राप्ति हुई। बेलोन वाली मैया के प्रांगण में हर साल बलिदान दिवस भी मनाया जाता है। यह चैत्र शुक्ल की त्रयोदश एवं आश्विन माह के शुक्लपक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है। तीन दशक पूर्व .बकरे की बलि दी जाती थी। मां बेलोन का भवन जहां बना है वह बेलपत्रों का वन क्षेत्र है। प्रारंभ में लोग
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