बुधवार, मई 06, 2026

जीवन की परीक्षा

बाल नाटक: जीवन ही परीक्षा है
सत्येंद्र कुमार पाठक 
पात्र:
दादा जी: (एक अनुभवी और विद्वान व्यक्ति)
पापा: (गंभीर और संजीदा पिता)
मम्मी: (स्नेहपूर्ण और सहायक माँ)
दिव्यांशु: (१० वर्ष, समझदार और जिज्ञासु बालक)
प्रियांशु: (६ वर्ष, चंचल और मासूम बालक)
स्थान: विद्यालय का सुंदर परिसर और एक शांत कक्षा।
दृश्य: विद्यालय के मैदान में आम, अमरूद और जामुन के बड़े पेड़ हैं। अंगूर की बेलें लटकी हैं। एक छोटा सा तालाब है जिसमें मछलियां तैर रही हैं और चारों ओर रंग-बिरंगे फूल खिले हैं।
दृश्य १: विद्यालय का सुंदर परिसर
(दोपहर का समय। दिव्यांशु और प्रियांशु स्कूल के बगीचे में तालाब के किनारे बैठे हैं। दिव्यांशु के हाथ में एक किताब है, जबकि प्रियांशु तालाब की मछलियों को देख रहा है।)
प्रियांशु: (उत्साह से) भैया, देखो! यह सुनहरी मछली कितनी तेजी से तैर रही है। इसे न कोई होमवर्क करना है, न कोई परीक्षा देनी है। काश हम भी मछली होते!
दिव्यांशु: (मुस्कुराते हुए) छोटा है तू अभी, इसलिए ऐसा सोच रहा है। दादा जी कहते हैं कि इस दुनिया में जो भी आया है, उसे अपनी परीक्षा खुद देनी पड़ती है। इन मछलियों को भी दाना ढूंढने और खुद को बड़ी मछलियों से बचाने की परीक्षा रोज़ देनी पड़ती है।
प्रियांशु: पर भैया, कल मेरी गणित की परीक्षा है। मुझे बहुत डर लग रहा है। मम्मी कहती हैं अगर अच्छे नंबर नहीं आए तो परिणाम बुरा होगा।
(तभी पीछे से दादा जी, पापा और मम्मी प्रवेश करते हैं। वे बच्चों को लेने स्कूल आए हैं।)
दादा जी: बिल्कुल सही कहा दिव्यांशु! प्रियांशु बेटा, डरो मत। डरेगा तो परीक्षा बोझ लगेगी, और अगर इसे खेल समझोगे तो मज़ा आएगा।
दृश्य २: विद्यालय की कक्षा (परीक्षा का दिन)
(मंच पर एक प्रतीकात्मक कक्षा का दृश्य है। दिव्यांशु और प्रियांशु अपनी-अपनी बेंच पर बैठे हैं। वातावरण शांत है। शिक्षक (नेपथ्य से) पर्चे बांटते हैं।)
दिव्यांशु: (स्वगत) ईश्वर ने हमें यह जीवन बुद्धि और कर्म के लिए दिया है। मुझे एकाग्र होना होगा।
प्रियांशु: (पेंसिल चबाते हुए) सवाल तो कठिन हैं, पर पापा ने कहा था कि संघर्ष ही जीवन है। मुझे कोशिश करनी चाहिए।
(समय बीतता है। दोनों भाई मेहनत से लिखते हैं। दृश्य धीरे-धीरे घर की बैठक (ड्राइंग रूम) में बदल जाता है।)
दृश्य ३: घर की बैठक (संवाद और शिक्षा)
(परीक्षा खत्म हो चुकी है। पूरा परिवार साथ बैठा है। मेज पर आम और जामुन रखे हैं।)
पापा: तो बच्चों, कैसी रही परीक्षा?
दिव्यांशु: पापा, मैंने अपनी पूरी ताकत लगा दी। जैसा आपने सिखाया था कि जीवन मार्ग में पग-पग पर कांटे होते हैं, वैसे ही कुछ सवाल भी कांटों की तरह उलझाने वाले थे, पर मैंने हार नहीं मानी।
दादा जी: (शाबाशी देते हुए) बहुत खूब! बेटा, यह जीवन केवल सुख भोगने के लिए नहीं है। इसे सुखद बनाना पड़ता है। जैसे इस बगीचे में सुंदर फूल खिलाने के लिए माली को कांटों वाली झाड़ियों को खुद हटाना पड़ता है, वैसे ही हमें भी अपने रास्ते की मुश्किलें चुनकर हटानी होंगी ताकि हमारे बाद आने वाले 'पथिकों' यानी छोटे बच्चों को वह परेशानी न झेलनी पड़े।
मम्मी: (प्रियांशु की ओर देखते हुए) और हमारा छोटा वीर कैसा है?
प्रियांशु: मम्मी, शुरुआत में तो लगा कि मैं नर्क में फंस गया हूँ (सब हंसते हैं), पर फिर मुझे याद आया कि मेहनत ही स्वर्ग का रास्ता है। मैंने हर सवाल को हल करने की कोशिश की।
पापा: बच्चों, याद रखना। सुख ही स्वर्ग है। जब हम सफल होते हैं और खुश होते हैं, तो वह पल हमें बहुत लंबा लगता है पर जल्दी बीत जाता है। और जब हम दुखी होते हैं, तो वह समय कटता ही नहीं। पर दोनों ही स्थितियाँ हमें कुछ सिखाती हैं।
दादा जी: (गंभीरता से) मानव का यह जीवन ईश्वर की सबसे बड़ी कृति है। यह जीवन आजीवन संघर्षों और चुनौतियों से भरा रहेगा। तुम्हारी आज की परीक्षा तो बस एक छोटी सी शुरुआत है। असल परीक्षा तो तब होगी जब तुम समाज में निकलोगे।
दिव्यांशु: दादा जी, क्या परिणाम ही सब कुछ है?
दादा जी: नहीं दिव्यांशु। परीक्षा और परिणाम के बीच का जो सेतु है, वह है 'परिश्रम'। यदि तुम्हारी तैयारी पक्की है और कर्मनिष्ठ हो, तो परिणाम सुखद होगा और पृथ्वी पर ही स्वर्ग की अनुभूति होगी। लेकिन यदि बिना तैयारी के जाओगे, तो असफलता का नर्क झेलना पड़ेगा।
दृश्य ४: शिक्षा
(सभी पात्र मंच के सामने आते हैं। पीछे तालाब और पेड़ों का दृश्य फिर से जीवंत हो उठता है।)
मम्मी: (दर्शकों से) याद रखिए, बच्चों का जीवन केवल किताबों तक सीमित नहीं है। उन्हें प्रकृति से भी सीखना चाहिए।पापा: चुनौतियां आएंगी, कांटे भी मिलेंगे। पर कांटों से डरकर रुकना नहीं है।
दिव्यांशु: हमें कर्मठ बनना है।
प्रियांशु: और हर परीक्षा के लिए तैयार रहना है!
दादा जी: शिक्षा: "मानव जीवन एक निरंतर चलने वाली परीक्षा है। यहाँ सफलता का स्वर्ग और असफलता का नर्क हमारे ही परिश्रम और तैयारी पर निर्भर करता है। हमें ऐसा जीवन जीना चाहिए कि हमारे कर्मों से दूसरों का मार्ग भी सुगम हो जाए।"
(सब एक साथ प्रणाम करते हैं। पर्दा गिरता है।)
समाप्त 

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