बुधवार, मई 06, 2026

इला और बुध

मनु, इला-बुध संगम और गयासुर का धर्म-साम्राज्य
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
भारतीय वास्तुकला, धर्म और दर्शन के मानचित्र पर मगध और गया का स्थान ध्रुव तारे के समान अचल है। प्रायः इतिहास की पुस्तकों में मगध का आरंभ हर्यक वंश या बिंबिसार से माना जाता है, परंतु पौराणिक आख्यान और 'वायु पुराण' जैसे ग्रंथ हमें समय की उस गहरी धारा में ले जाते हैं जहाँ इतिहास और अध्यात्म का मिलन होता है। वर्तमान सप्तम वैवस्वत मन्वंतर के अधिपति मनु की संतान परंपरा और प्रतापी असुर राज गयासुर के तप ने इस भूमि को 'कीकट' (अपवित्र) से 'गया' (सर्वाधिक पवित्र) तीर्थ में परिवर्तित कर दिया।
 वैवस्वत मनु और इला का प्रादुर्भाव: एक वंश का बीज - मन्वंतर के संस्थापक सप्तम मनु वैवस्वत (विवस्वान/सूर्य के पुत्र) समस्त मानव जाति के पूर्वज माने जाते हैं। उनके जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना ने चंद्रवंश और सूर्यवंश के बीच के सेतु का निर्माण किया। पुत्रेष्टि यज्ञ और इला का जन्म: मनु ने संतान प्राप्ति के लिए मित्र और वरुण देवताओं के निमित्त एक महायज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ के विधान और संकल्प के सूक्ष्म भेदों के कारण 'इला' नाम की कन्या का प्रादुर्भाव हुआ। इला का स्वरूप भारतीय पौराणिक इतिहास में अत्यंत विलक्षण है, क्योंकि वे समय-समय पर पुरुष (सुद्युम्न) और स्त्री (इला) के रूप में परिवर्तित होती रहीं। इला का जन्म केवल एक शारीरिक जन्म नहीं, बल्कि देवत्व और मानुषी चेतना के मिलन का प्रतीक था। बुध और इला का मिलन: चंद्रवंश की आधारशिला - इला का संपर्क चंद्रमा और तारा के पुत्र बुध से हुआ। बुध, जो बुद्धि और विवेक के अधिपति माने जाते हैं, और इला के मिलन से पुरूरवा का जन्म हुआ, जिनसे चंद्रवंश आगे बढ़ा। परंतु इसी परंपरा में आगे चलकर ऐसी विभूतियाँ हुईं जिन्होंने भारत के भौगोलिक और राजनीतिक मानचित्र को आकार दिया। बुध और इला के वंशानुगत प्रभाव से ही उस पराक्रमी नेतृत्व का जन्म हुआ जिसने मगध की ऊसर भूमि को ज्ञान और शक्ति की उर्वर भूमि बनाया।
पौराणिक संदर्भों के अनुसार, बुध और इला की संतान परंपरा में गय, उत्कल और विशाल नामक तीन प्रतापी राजा हुए। इन तीनों ने मिलकर प्राचीन भारत के तीन विशाल प्रांतों और नगरों की स्थापना की: राजा गय (मगध): इन्होंने 'गया' नगर को अपनी राजधानी बनाया और मगध के विस्तृत भू-भाग पर शासन किया।
राजा उत्कल (उड़ीसा): इन्होंने पूर्व की ओर बढ़कर 'उत्कल' प्रदेश की नींव रखी, जिसे आज हम ओडिशा के नाम से जानते हैं। राजा विशाल (वैशाली): इन्होंने उत्तर बिहार में 'वैशाली' नगर की स्थापना की, जो कालान्तर में विश्व का प्रथम गणतंत्र बना।
इन तीनों भाइयों ने न केवल नगर बसाए, बल्कि एक ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था विकसित की जिसने हज़ारों वर्षों तक आर्यावर्त का नेतृत्व किया।  राजा गयासुर: असुर संस्कृति और सौर धर्म का उत्कर्ष में इतिहास में 'गय' नाम के दो उल्लेख मिलते हैं—एक राजर्षि गय और दूसरे गयासुर। गयासुर के काल में मगध को कीकट प्रदेश कहा जाता था। तत्कालीन समय में 'असुर' शब्द का प्रयोग उन लोगों के लिए भी होता था जो एक अलग जीवन पद्धति का पालन करते थे, परंतु गयासुर का चरित्र वैदिक मर्यादाओं से ओतप्रोत था। सौर धर्म का विकास: गयासुर भगवान सूर्य के अनन्य उपासक थे। उन्होंने कीकट प्रदेश में सौर ऊर्जा और सूर्य उपासना को राजकीय संरक्षण दिया। उनके तप के कारण ही गया क्षेत्र में सौर संप्रदाय का अत्यधिक प्रभाव बढ़ा। आज भी गया के 'दक्षिणार्क' और 'उत्तरार्क' सूर्य मंदिर इसी प्राचीन परंपरा के अवशेष हैं।
असुर संस्कृति का रूपांतरण: गयासुर ने असुर संस्कृति को विध्वंस से हटाकर सृजन की ओर मोड़ा। उन्होंने सिद्ध किया कि भक्ति पर किसी विशेष कुल का एकाधिकार नहीं है। गयासुर द्वारा सनातन धर्म का व्यापक संगठन में गयासुर की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने तत्कालीन समाज में व्याप्त विभिन्न धार्मिक मतभेदों को समाप्त कर एकता स्थापित की। उन्होंने गया क्षेत्र में पाँच प्रमुख संप्रदायों का समन्वय किया: सौर संप्रदाय: सूर्य की उपासना को जीवन का आधार बनाया। शाक्त संप्रदाय: शक्ति की देवी (मंगला गौरी) की उपासना को सुदृढ़ किया। शैव संप्रदाय: महादेव के मंदिरों की स्थापना कर लोक कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया। ब्रह्म संप्रदाय: ब्रह्मा जी के मानस तीर्थों और यज्ञ परंपरा को पुनर्जीवित किया। वैष्णव संप्रदाय: भगवान विष्णु (गदाधर) को सर्वोच्च आराध्य मानकर शरणागति का मार्ग दिखाया। सौर संप्रदाय का स्थलों में गया , उमंगा पर्वत एवं देव में राजा एल द्वारा सूर्य मंदिर , पंडारक , बेलाउर, ओंगारी, हंडिया , बराबर पर्वत समूह की सूर्यांक गिरी , अनेकों स्थान है। सौर सांप्रदाय एवं सूर्योपासना केंद्र में मग ब्राह्मण  मुख्य थे । मग ब्राह्मण द्वारा प्रकृति के देव भगवान सूर्य , नदी , जल , अग्नि , भूमि , वायु की उपासना , संरक्षण एवं संवर्धन किया गया । देव , मानव , असुर अनेक  संस्कृति का रक्षक गयासुर था । 
इन्हीं पाँचों धाराओं के मिलन से आधुनिक सनातन धर्म का स्वरूप विकसित हुआ।
. गयासुर का महादान और विष्णु पद की स्थापना - कीकट प्रदेश का राजा गयासुर के कठिन तप से उनकी देह इतनी पवित्र हो गई कि जो भी उन्हें स्पर्श करता या देखता, वह पापमुक्त होकर वैकुंठ को प्राप्त होता। इससे यमलोक रिक्त होने लगा। तब भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी ने गयासुर से उनके शरीर पर यज्ञ करने की प्रार्थना की।: गयासुर ने सहर्ष स्वीकार किया और अपनी देह धर्म हेतु दान कर दी। उनकी देह के ऊपर स्वयं भगवान विष्णु ने अपनी गदा धारण की, ताकि वे स्थिर रह सकें। गयासुर ने अंतिम इच्छा प्रकट की कि— "हे प्रभु! यह स्थान मेरे नाम से जाना जाए और जो भी यहाँ अपने पितरों का श्राद्ध करे, उन्हें मोक्ष प्राप्त हो।" भगवान विष्णु ने 'तथास्तु' कहा और वहाँ स्वयं 'विष्णुपद' के रूप में स्थित है। इस पौराणिक पृष्ठभूमि ने मगध को एक ऐसा सुरक्षा कवच प्रदान किया कि यहाँ की भूमि 'शक्ति' और 'भक्ति' दोनों का केंद्र बन गई।
कीकट से गया तक: वह भूमि जिसे कभी वेदों में उपेक्षित कहा गया था (कीकट), गयासुर और मनु के वंशजों के कारण मोक्षदायिनी बन गई। राजा विशाल द्वारा स्थापित वैशाली और गय द्वारा स्थापित गया, प्राचीन भारतीय शहरीकरण  के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
वैवस्वत मनु की पुत्री इला और बुध के संयोग से शुरू हुई यह यात्रा गयासुर के आत्म-बलिदान पर आकर एक आध्यात्मिक शिखर प्राप्त करती है। मगध, उत्कल और वैशाली का निर्माण केवल ईंट-पत्थरों का संचय नहीं था, बल्कि वह सौर, शाक्त, वैष्णव और शैव संस्कृतियों के मेल से बना एक विचार था। राजा गयासुर द्वारा स्थापित परंपराओं ने ही मगध को वह ऊर्जा दी, जिसने आगे चलकर महान सम्राटों और बुद्ध जैसे महापुरुषों को अपनी ओर आकर्षित किया। आज भी गया के विष्णुपद मंदिर और फल्गु नदी के तट पर उमड़ने वाला जनसैलाब उस महान 'असुर' राजा और मनु के वंशजों की अमर गाथा सुनाता है।
संदर्भ युक्त स्रोत: वायु पुराण: गया महात्म्य खंड। गरुड़ पुराण। श्रीमद्भागवत महापुराण: नवम स्कंध (मनु वंश विवरण)। महाभारत: वन पर्व (तीर्थ यात्रा पर्व)। प्राचीन मगध का इतिहास: ऋग्वेद और अथर्ववेद के कीकट संदर्भ।

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