श्रद्धा, शब्द और शिवत्व: मालवा से काशी तक की अंतर्यात्रा
जब यात्रा ही गंतव्य बन जाए तब जीवन की आपाधापी के बीच कुछ क्षण ऐसे आते हैं जब आत्मा परमात्मा की पुकार सुनती है। अप्रैल 2026 की तपती दोपहरी मेरे लिए केवल सूर्य का ताप लेकर नहीं आई, बल्कि आत्मिक शांति का संदेश लेकर आई। 16 अप्रैल से 25 अप्रैल तक की मेरी यह यात्रा केवल पर्यटन नहीं थी; यह आस्था के धागों में पिरोया गया एक ऐसा अनुभव था, जहाँ उज्जैन का मौन, इंदौर का सम्मान, ओंकारेश्वर का जल और काशी का मोक्ष एक ही सूत्र में बंधे थे। उज्जैन – शिप्रा के तट पर मौन का उद्घोष (16-18 अप्रैल) से मौन तीर्थ की शरण में: मेरी यात्रा का श्रीगणेश बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन से हुआ। 16 अप्रैल को जब मैंने मौन तीर्थ पीठ में कदम रखा, तो शिप्रा नदी की शीतल मंद बयार ने मेरा स्वागत किया। यह स्थान अपने नाम के अनुरूप ही शांत और गंभीर है। यहाँ प्रथम पड़ाव में मैंने भगवान शिव, राम-लक्ष्मण-जानकी और नवग्रहों के दर्शन किए। यहाँ स्थित कल्पवृक्ष के नीचे बैठना ऐसा था मानो समय ठहर गया हो। मौनी बाबा के समाधि स्थल पर उनकी तपस्या की ऊर्जा आज भी महसूस की जा सकती है। हनुमान जी के दर्शन और शिप्रा के तट पर शाम की आरती ने मन को उस शांति से भर दिया, जिसकी तलाश आधुनिक मनुष्य को उम्र भर रहती है। महाकाल का सान्निध्य और तंत्र की भूमि:पर 17 अप्रैल की सुबह उज्जैन की भोर से हुई। ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर के दर्शन और उपासना ने तन-मन को ऊर्जा के एक नए उच्च स्तर पर पहुँचा दिया। इसके बाद चिंतामण गणेश का आशीर्वाद लिया। उज्जैन केवल मंदिरों का शहर नहीं, बल्कि इतिहास की परतों का जीवंत प्रमाण है। भतृहरि गुफा की संकरी गलियों में वैराग्य की सुगंध थी, तो हरसिद्धि माता और गढ़ कालिका के दरबार में शक्ति का अद्भुत प्रभाव। काल भैरव और विक्रमादित्य गढ़ के दर्शन ने मालवा के गौरवशाली वैभव की याद दिला दी। साहित्यिक और आध्यात्मिक सम्मान का गौरव:में 18 अप्रैल का दिन मेरे जीवन के स्वर्णिम पृष्ठों में अंकित हो गया। संदीपनी आश्रम में श्री कृष्ण की शिक्षा स्थली के दर्शन के बाद, मौन तीर्थ पीठ की ओर से आयोजित एक भव्य समारोह में मुझे सम्मानित किया गया। महामंडलेश्वर स्वामी डॉ. सुमानानंद गिरि जी महाराज के सान्निध्य में, 'मानस अर्चन' के संपादक हिमांशु कौशिक और समीक्षा शर्मा द्वारा प्रदत्त 'भगवान गंगाधर सदाशिव' प्रतीक और 'मानस सुमन अभिनंदन ग्रन्थ' प्राप्त करना मेरे लेखन और साधना की सार्थकता थी। 'युग पुरुष की आध्यात्मिक यात्रा' और 'सत्संग सुमन' जैसी कृतियों ने मेरे बौद्धिक क्षितिज को नया विस्तार दिया।
: इंदौर – जहाँ सम्मान और साहित्य का मिलन हुआ (19 अप्रैल) को उज्जैन की आध्यात्मिक ऊर्जा लेकर मैं इंदौर पहुँचा। यहाँ 19 अप्रैल को श्री मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति के प्रांगण में एक अद्भुत दृश्य था। यहाँ आस्था का स्थान बौद्धिक विमर्श ने ले लिया। महारत्न इंदौर अलंकरण सम्मान 2026:के तहत कवि, कला और कलाकार कल्याण कोष द्वारा आयोजित इस भव्य समारोह में मुझे 'महारत्न इंदौर अलंकरण' से नवाजा गया। आयोजक जितेंद्र शिवहरे, श्री मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति के मंत्री और हिंदी परिवार के अध्यक्ष हरे राम बाजपेयी जी के कर-कमलों से सम्मानित होना किसी भी रचनाकार के लिए गर्व का विषय है। यहाँ की हवा में साहित्य के प्रति जो अनुराग था, उसने मुझे यह महसूस कराया कि शब्द ही वह सेतु हैं जो मनुष्य को अमरता प्रदान करते हैं।
: ओंकारेश्वर – नर्मदा की लहरों पर शिव-नाम (20-21 अप्रैल) तक नर्मदे हर: माँ के जल का स्पर्श:कर 20 अप्रैल को मेरी यात्रा का रुख खंडवा जिले के ओंकारेश्वर की ओर हुआ। नर्मदा नदी के तट पर स्थित प्रवास स्थल से माँ नर्मदा की कल-कल ध्वनि साफ़ सुनाई दे रही थी। नर्मदा का जल केवल पानी नहीं, बल्कि साक्षात चेतना है। मैंने माँ के पावन जल का स्पर्श किया और अपनी यात्रा की सफलता के लिए कृतज्ञता ज्ञापित की।
ज्योतिर्लिंग और संगम स्नान:का संदर्भ में ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग और ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग के स्पर्श और दर्शन ने अंतरात्मा को तृप्त कर दिया। यहाँ नर्मदा और कावेरी नदी का संगम है। नौका द्वारा संगम के मध्य पहुँचकर स्नान और ध्यान करना एक ऐसा अनुभव था जिसे शब्दों में बांधना कठिन है। जल परिक्रमा के दौरान मांधाता पर्वत के चारों ओर फैले शिवत्व को महसूस किया। ऋण मुक्तेश्वर और द्वारकाधीश के दर्शन के बाद रात्रि में नर्मदा आरती का वह दृश्य अविस्मरणीय था, जब हजारों दीपकों ने जल को स्वर्ण की आभा से भर दिया था।
: काशी – मोक्ष की नगरी और अविनाशी ऊर्जा (22-24 अप्रैल) में इंदौर से बनारस का महासफर: में 21 अप्रैल को इंदौर में साहित्यकार प्रेमानंद सरस्वती जी के साथ हुई लंबी चर्चा ने मुझे मानसिक रूप से काशी की यात्रा के लिए तैयार कर दिया था। 22 अप्रैल को बस द्वारा इंदौर से वाराणसी के लिए प्रस्थान किया। विंध्य की पहाड़ियों को पार करते हुए मन केवल एक ही नाम जप रहा था—"हर हर महादेव"।
बाबा विश्वनाथ का दरबार: में 23 अप्रैल को सुबह काशी की धरती पर कदम रखा। गंगा के घाटों की वह सीढ़ियाँ, जहाँ हजारों वर्षों से ऋषि-मुनि तपस्या करते आए हैं, आज मेरी प्रतीक्षा कर रही थीं। बाबा विश्वनाथ के दर्शन, उपासना और अभिषेक के बाद ऐसा लगा मानो यात्रा का उद्देश्य सिद्ध हो गया। काशी की हवा में ही एक अलग तरह का 'फक्कड़पन' और 'वैराग्य' है। रात्रि में गंगा के घाट पर बैठकर बहते जल को देखना, जीवन की नश्वरता और परमात्मा की अनंतता का साक्षात्कार कराता है।
स्मृतियों का पाथेय (24-25 अप्रैल) के तहत 24 अप्रैल को बनारस की गलियों से विदा लेकर मैं औरंगाबाद पहुँचा। यहाँ रात्रि विश्राम के दौरान पिछले दस दिनों की सभी स्मृतियाँ एक चलचित्र की तरह आँखों के सामने घूमने लगीं। 25 अप्रैल को जब ट्रेन द्वारा अपने गंतव्य जहानाबाद पहुँचा, तो मैं वह व्यक्ति नहीं था जो 16 अप्रैल को घर से निकला था।
अक्सर लोग पूछते हैं कि तीर्थ यात्रा से क्या लाभ? इस यात्रा ने मुझे सिखाया कि: मौन (उज्जैन) में ही शक्ति का केंद्र है। सम्मान (इंदौर) उत्तरदायित्व बढ़ाता है। समर्पण (ओंकारेश्वर) ही ऋणों से मुक्ति दिलाता है । श्रद्धा (काशी) ही अंतिम सत्य है। मेरी यह यात्रा 'शिप्रा' से शुरू होकर 'नर्मदा' के धैर्य और 'गंगा' की पवित्रता तक पहुँची। यह संस्मरण उन सभी महानुभावों और देव-शक्तियों को समर्पित है, जिन्होंने इस पथ पर मेरा मार्गदर्शन किया।
16-18 अप्रैल में उज्जैन मौन तीर्थ वास, महाकाल दर्शन, 'भगवान गंगाधर सदाशिव' सम्मान , 19 अप्रैल इंदौर 'महारत्न इंदौर अलंकरण सम्मान 2026', हिंदी साहित्य समिति में सम्मान। 20-22 अप्रैल ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग स्पर्श, नर्मदा-कावेरी संगम स्नान, दीप दान, जल परिक्रमा। 23 23 अप्रैल वाराणसी बाबा विश्वनाथ दर्शन, गंगा पूजन एवं रात्रि विश्राम हुआ है। 24 अप्रैल औरंगाबाद , 25 अप्रैल जहानाबाद सकुशल गृह आगमन।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें