बुधवार, जुलाई 01, 2026

मां कामाख्या और असम

कामख्या शक्तिपीठ और अम्बुबाची महापर्व:
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
भारत की सनातन संस्कृति में 'शक्ति' की उपासना आदिकाल से सर्वोपरि रही है। पूर्वोत्तर भारत के असम राज्य के कामरूप जिले में, ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर स्थित नीलांचल पर्वत पर अवस्थित मां कामाख्या मंदिर शाक्त संस्कृति, तंत्र साधना और कौल मत का सर्वोच्च एवं महानतम केंद्र है। यह केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि जीवंत चेतना का वह स्थान है जहाँ अध्यात्म, लोक-विश्वास और प्रकृति का अनूठा मिलन होता है। कामाख्या पीठ की महत्ता का चरमोत्कर्ष प्रतिवर्ष आषाढ़ मास में आयोजित होने वाले 'अम्बुबाची मेला' के रूप में प्रकट होता है। यह पर्व केवल एक धार्मिक मेला नहीं है, बल्कि यह 'स्त्री शक्ति', 'जनन क्षमता' (Fertility) और 'धरती माता के विश्राम' का एक ऐसा महापर्व है, जो लोक-लोकाचार, सामाजिक अनुशासन और पर्यावरण संरक्षण की गहरी समझ को अपने भीतर समेटे हुए है। जहाँ आधुनिक विश्व आज 'पारिस्थितिकी संतुलन' (Ecological Balance) की बात कर रहा है, वहीं हमारी प्राचीन परंपराएँ अम्बुबाची के माध्यम से सदियों से प्रकृति को विश्राम देने और उसके पुनर्जीवन का उत्सव मनाती आ रही हैं।
मां कामाख्या शक्तिपीठ की उत्पत्ति की कथा भारतीय वांग्मय के कालिका पुराण, देवी भागवत पुराण और शिव महापुराण में विस्तार से वर्णित है। यह कथा सती के पावन चरित्र, उनके आत्मदाह और सती के विग्रह विच्छेद से जुड़ी हुई है। पुराणों  के अनुसार, प्रजापति दक्ष ने एक भव्य और विराट यज्ञ का आयोजन किया था। इस यज्ञ में उन्होंने समस्त देवी-देवताओं, यक्षों, गंधर्वों और ऋषियों को आमंत्रित किया, परंतु अपने जामाता (दामाद) भगवान शिव के प्रति द्वेष भावना के कारण उन्होंने शिव और सती को निमंत्रण नहीं भेजा। माता सती पिता के घर का उत्सव देखने के लिए भगवान शिव के मना करने के बावजूद वहाँ पहुँच गईं। यज्ञ स्थल पर सती ने न केवल स्वयं का, बल्कि अपने पति देवाधिदेव महादेव का घोर अपमान और निंदा सुनी। सती इस अपमान को सहन न कर सकीं और उन्होंने सतीत्व की रक्षा तथा शिव-निंदा के प्रायश्चित स्वरूप यज्ञ की योग-अग्नि में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए। जब भगवान शिव को सती के आत्मदाह का समाचार मिला, तो उनका तीसरा नेत्र खुल गया। वियोग और महाक्रोध में व्याकुल होकर उन्होंने वीरभद्र को उत्पन्न कर दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर दिया। इसके पश्चात, महादेव सती के पार्थिव शरीर को अपने कंधों पर उठाकर संपूर्ण ब्रह्मांड में 'महातांडव' करने लगे। शिव का यह रौद्र रूप और प्रलयंकारी तांडव देखकर समस्त सृष्टि डोलने लगी और देवताओं में हाहाकार मच गया। सृष्टि की रक्षा और शिव के मोह को भंग करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के मृत शरीर को क्रमशः खंडित करना शुरू किया । 
सुदर्शन चक्र के प्रहार से माता सती के शरीर के 51 टुकड़े अलग-अलग स्थानों पर गिरे, जो आज '51 शक्तिपीठों' के रूप में पूजे जाते हैं। इसी क्रम में, असम के प्राग्ज्योतिषपुर (आधुनिक गुवाहाटी) में स्थित नीलांचल पर्वत पर माता सती का 'योनि भाग' गिरा था। शास्त्रीय संदर्भ: कालिका पुराणे वर्णित है कि महामाया का योनि मंडल नीलांचल पर्वत पर गिरा, जो कामाख्या कहलाया। यहाँ देवी काम-रूप (इच्छा का रूप) धारण करती हैं, इसलिए इसे 'कामख्या' या 'कामाख्या' कहा गया। यह पीठ तंत्र साधना का मूल और कामकला का प्रतीक माना जाता है। यहाँ कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि एक प्राकृतिक शिलाखंड है जिसमें से निरंतर जलधारा प्रवाहित होती रहती है, जिसे 'योनि मुद्रा' के रूप में पूजा जाता है।
. 'अम्बुबाची' शब्द का अर्थ, विज्ञान और मां कामाख्या का रजस्वला होना है। शब्द व्युत्पत्ति और ऋतु विज्ञान
शाब्दिक दृष्टि से 'अम्बुबाची' (Ambubachi) दो शब्दों के मेल से बना है — 'अम्बु' (जल) और 'बाची' (प्रस्फुटन या बोलना)। अतः अम्बुबाची का अर्थ है 'पानी का प्रस्फुटन' या 'जल का बोलना'। वैज्ञानिक और भौगोलिक दृष्टि से, यह समय उत्तर-पूर्वी भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून  के आगमन का होता है। आषाढ़ मास में जब सूर्य मिथुन राशि में प्रवेश करता है, तब वर्षा ऋतु अपने चरम पर होती है। आकाश से गिरने वाली मूसलाधार बारिश से सूखी धरती तृप्त होती है, नदियाँ उफनती हैं और पृथ्वी के भीतर से सोतों (जलधाराओं) का प्रस्फुटन होता है। प्राचीन ऋषियों ने इस भौगोलिक और प्राकृतिक घटना को आध्यात्मिक रूप देते हुए इसे 'धरती माता का रजस्वला होना' माना। सनातन संस्कृति की दूरदर्शिता का प्रमाण यह है कि जहाँ कई संस्कृतियों में महिलाओं के मासिक धर्म  को वर्जित, अशुद्ध या हीन भावना से देखा गया, वहीं शाक्त परंपरा ने इसे सर्वोच्च रचनात्मकता, जनन क्षमता और मातृत्व के प्रतीक के रूप में स्वीकार कर उसकी पूजा की। अम्बुबाची के इन तीन से चार दिनों के दौरान, माना जाता है कि माता कामाख्या साक्षात प्रकृति के रूप में अपने वार्षिक मासिक चक्र से गुजरती हैं। यह उत्सव इस सत्य को उद्घोषित करता है कि सृष्टि की उत्पत्ति की जो प्रक्रिया एक स्त्री के शरीर में होती है, वही प्रक्रिया व्यापक स्तर पर समूचे ब्रह्मांड और धरती माता में भी होती है।
अद्भुत घटना: रक्त वस्त्र और लाल जलधारा - अम्बुबाची की अवधि में मंदिर के गर्भगृह की स्थिति अत्यंत विस्मयकारी होती है। इन दिनों में गर्भगृह के भीतर स्थित प्राकृतिक शिलाखंड से बहने वाली जलधारा का रंग पूरी तरह से लाल हो जाता है। अम्बुबाची वस्त्र (रक्त वस्त्र): उत्सव शुरू होने से पहले, मंदिर के पुजारियों द्वारा गर्भगृह की शिला पर सफेद सूती वस्त्र बिछाए जाते हैं। तीन दिनों के विश्राम के बाद जब कपाट खुलते हैं, तो वे वस्त्र माता के 'रक्त' से पूरी तरह लाल हो चुके होते हैं। इस लाल कपड़े को 'अम्बुबाची वस्त्र' या 'अंगवस्त्र' कहा जाता है।
भक्तों के लिए महत्ता: इस वस्त्र को प्राप्त करने के लिए देश-विदेश के भक्तों में भारी उत्सुकता रहती है। इसे धारण करना या घर के मंदिर में रखना अत्यंत मंगलकारी, बाधा-निवारक और तंत्र-रक्षा सूचक माना जाता है।
बंगाली संस्कृति, समाज और असमिया समाज में अम्बुबाची पर्व का स्थान अनिवार्य और व्यावहारिक है। इसका निर्धारण किसी मनमाने ढंग से नहीं, बल्कि बंगाली पंचांग (पांजी) की अत्यंत सूक्ष्म ज्योतिषीय और शास्त्रीय गणनाओं के आधार पर होता है।
प्रवृत्ति और निवृत्ति की अवधारणा में अम्बुबाची पर्व के दो मुख्य चरण होते हैं । अम्बुबाची प्रवृत्ति: इसका अर्थ है पर्व की शुरुआत या माता के रजस्वला होने का सटीक समय। बंगाली पंचांग के अनुसार, प्रतिवर्ष आषाढ़ मास की 7 तारीख (सूर्य के मिथुन राशि में प्रवेश के आधार पर जून के मध्य में, प्रायः 21 या 22 जून) को अम्बुबाची प्रवृत्ति होती है। पंचांग में इसका समय मिनट और सेकंड तक स्पष्ट रूप से दर्ज होता है। अम्बुबाची निवृत्ति का अर्थ है पर्व की समाप्ति, माता का शुद्धिकरण और कपाट खुलने का समय। यह प्रवृत्ति के ठीक तीन दिन बाद (चौथे दिन) पंचांग द्वारा निर्धारित समय पर संपन्न होती है।
प्रवृत्ति पर्व की शुरुआत (रजस्वला प्रारंभ) आषाढ़ मास की 7 तारीख घरों के नियम बदलना, पूजा बंद, कपाट बंद निवृत्ति पर्व की समाप्ति (शुद्धिकरण) आषाढ़ मास की 10/11 तारीख गृहशुद्धि, कपाट खुलना, भव्य पूजा उत्सव शास्त्रीय मान्यता है कि आषाढ़ के इस कालखंड में सूर्य की किरणें और पृथ्वी की आर्द्रता (नमी) मिलकर एक विशेष ब्रह्मांडीय ऊर्जा का निर्माण करती हैं। यह समय संपूर्ण जड़ और चेतन जगत के 'कायाकल्प' (Rejuvenation) और आंतरिक शुद्धिकरण का होता है, इसलिए बंगाली और असमिया परिवारों में इस कालखंड के नियमों का पालन अत्यंत कड़ाई से किया जाता है
अम्बुबाची के तीन दिनों में असम और बंगाल सहित देश के कई हिस्सों में धार्मिक और घरेलू जीवन का स्वरूप पूरी तरह बदल जाता है। यह काल पूर्ण रूप से 'निवृत्ति' (Inward reflection) और विश्राम का होता है। 
जैसे ही पंचांग के अनुसार 'अम्बुबाची प्रवृत्ति' का समय आता है, नीलांचल पर्वत पर स्थित मां कामाख्या मंदिर के मुख्य कपाट भारी सुरक्षा और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ बंद कर दिए जाते हैं। इन तीन दिनों में मंदिर के भीतर किसी भी मनुष्य का प्रवेश पूर्णतः वर्जित होता है। यही नियम हिंदू घरों के छोटे मंदिरों पर भी लागू होता है:
लाल वस्त्र से ढकना: घरों के मंदिरों के पट या कपाट बंद कर दिए जाते हैं। यदि मंदिर खुला है, तो सभी देवी-देवताओं की मूर्तियों और तस्वीरों को लाल कपड़े से ढक दिया जाता है। स्पर्श निषेध: इन दिनों मूर्तियों या चित्रों को छूना, उन्हें स्नान कराना, भोग लगाना या तिलक लगाना पूरी तरह वर्जित होता है। यहाँ तक कि अगर किसी चित्र में देवी के साथ कोई अन्य देवता (जैसे शिव-पार्वती या राधा-कृष्ण) हैं, तो उनकी भी सामान्य पूजा रोक दी जाती है। अपवाद (नारायण और शालिग्राम): शास्त्रों के अनुसार, केवल भगवान नारायण और शालिग्राम की ऐसी पूजा की जा सकती है जो बिना स्पर्श के, अत्यंत सात्विक रूप से और केवल कुल पुरोहित या घर के ब्राह्मणों द्वारा की जाए। घर की महिलाएं इन तीन-चार दिनों में किसी भी प्रकार की धार्मिक क्रिया, मंत्रोच्चार या अनुष्ठान नहीं करती हैं। वे स्वयं को घर के काम और बाहरी भागदौड़ से दूर रखती हैं। अमनिया (बिना आग का भोजन): इन दिनों में रसोई में अग्नि प्रज्वलित कर देवताओं के लिए भोजन पकाने का निषेध होता है। कुल पुरोहित या ब्राह्मण बिना मूर्तियों को स्पर्श किए अत्यंत सात्विक भाव से केवल दूध और खीरा (ककड़ी) का भोग माता और देवताओं को लगाते हैं। पूरे परिवार के लोग इन दिनों इसी बिना पके हुए सात्विक भोजन, दूध, फल और विशेष रूप से खीरे को अत्यंत श्रद्धा के साथ प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। यह पाचन क्रिया और स्वास्थ्य की दृष्टि से भी वर्षा ऋतु की शुरुआत में शरीर के शुद्धिकरण का एक उत्कृष्ट आयुर्वेद सम्मत तरीका है।
 धरती माता का विश्राम और कृषि निषेध - अम्बुबाची पर्व का सबसे सुंदर और वैज्ञानिक पहलू इसका प्रकृति के साथ जुड़ाव है। सनातन परंपरा केवल कामाख्या की शिला को ही माता नहीं मानती, बल्कि संपूर्ण पृथ्वी को 'धरती माता' , 'अन्नपूर्णा' और 'जीवनदायिनी' मानती है। कृषि कार्यों पर पूर्ण प्रतिबंध है। अम्बुबाची के दौरान चूंकि धरती माता को रजस्वला माना जाता है, इसलिए उन्हें पूर्ण विश्राम देने की परंपरा है। इन तीन दिनों में संपूर्ण पूर्वोत्तर भारत और विशेष रूप से बंगाली एवं असमिया ग्रामीण समाजों में कृषि कार्य पूरी तरह ठप रहता है: खेतों में हल चलाना सख्त मना होता है। कुदाल मारना, फावड़ा चलाना या किसी भी उद्देश्य से मिट्टी खोदना वर्जित होता है।
घरों के बगीचों या गमलों की मिट्टी को भी नहीं छुआ जाता, न ही कोई नया पौधा रोपा जाता है और न ही पौधों की छंटाई की जाती है। इस परंपरा के पीछे अंधविश्वास नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम और कृतज्ञता का भाव है। जेठ और आषाढ़ की गर्मी से तपी धरती जब मानसून की पहली फुहारों से सराबोर होती है, तो उसे अपनी उपजाऊ शक्ति को पुनः संचित करने के लिए समय चाहिए होता है। यह तीन दिनों का 'कृषि निषेध' वास्तव में पृथ्वी को बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के खुद को पुनर्जीवित (Regenerate) करने का अवसर देता है। नंगे पैर चलने का संकल्प और खड़ाऊ का त्याग - इस पर्व के दौरान लोक-लोकाचार इतना संवेदनशील होता है कि लोग धरती माता को तनिक भी कष्ट नहीं देना चाहते। इसलिए:लोग इन तीन दिनों में अपने घरों और गाँवों में नंगे पैर चलते हैं। प्राचीन काल में लोग लकड़ी की चप्पलें (खड़ाऊ) पहनते थे, लेकिन अम्बुबाची के दौरान खड़ाऊ पहनने पर पूर्ण प्रतिबंध था, क्योंकि खड़ाऊ की ठक-ठक से धरती माता के विश्राम में विघ्न पड़ सकता था और उन्हें चोट लग सकती थी।
सावन की बुआई का वैज्ञानिक आधार - तीन-चार दिनों के इस पूर्ण विश्राम के बाद जब 'निवृत्ति' होती है, तो माना जाता है कि धरती माता अब पूर्णतः शुद्ध, वात्सल्यमयी और अत्यधिक उपजाऊ हो चुकी हैं। इसके बाद किसान अत्यंत उत्साह और उमंग के साथ सावन की नई फसलों की बुआई शुरू करते हैं। यह चक्र मनुष्य और प्रकृति के बीच के गहरे आत्मिक और पारिस्थितिकी संबंध को दर्शाता है । पारंपरिक बंगाली और हिंदू समाज में अम्बुबाची के दौरान महिलाओं के सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन के लिए बहुत कड़े, विशिष्ट और तपस्यापूर्ण नियम निर्धारित किए गए थे, जो महिलाओं की सामाजिक स्थिति और उनकी आंतरिक साधना को प्रकट करते हैं। प्राचीन और मध्यकाल से चली आ रही परंपरा के अनुसार, बंगाली हिंदू विधवा महिलाएं अम्बुबाची के तीन दिनों में एक उच्च कोटि के तपस्वी या संन्यासी जैसा जीवन व्यतीत करती थीं: जल का नियम: वे कुएं, तालाब या नदी का साधारण पानी पीना छोड़ देती थीं। इन दिनों वे केवल प्राकृतिक नारियल पानी (डाब का पानी) पीकर अपनी प्यास बुझाती थीं, क्योंकि नारियल का पानी प्रकृति द्वारा पूरी तरह सुरक्षित और शुद्ध माना जाता है। वे आग पर पका हुआ अन्न, नमक, तेल या किसी भी प्रकार के मसालों का पूर्ण त्याग कर देती थीं। इन तीन दिनों में उनका भोजन केवल कंद-मूल, मौसमी फल, और भीगे हुए चने तक सीमित रहता था। एक अत्यंत रोचक और विशिष्ट लोकाचार यह था कि चूंकि धरती को स्पर्श करने से उसे कष्ट हो सकता था, इसलिए कई विधवा महिलाएं इन दिनों नदी में नाव (नौका) पर जाकर रहा करती थीं ताकि वे धरती के सीधे संपर्क से बच सकें और पानी के ऊपर रहकर अपनी साधना पूरी कर सकें। वे पूर्णतः नंगे पैर रहती थीं। सधवा यानी सुहागिन महिलाओं के लिए भी इस अवधि में लोक-संस्कृति ने कई नियम बनाए थे:: इन तीन दिनों में सुहागिन महिलाएं अपने बाल नहीं धोती थीं और न ही अपने नाखून काटती थीं। : इस कालखंड में किसी भी प्रकार के नए मांगलिक कार्यों, विवाह की वार्ताओं, गहने-कपड़े खरीदने या किसी नए व्रत-अनुष्ठान की शुरुआत नहीं की जाती थी।  सधवा महिलाएं इन दिनों पूरी तरह से तामसिक भोजन का त्याग कर देती थीं। वे निरामिष करती थी ।
अम्बुबाची के चौथे दिन का सूर्योदय समाज में एक अभूतपूर्व ऊर्जा, पवित्रता और उल्लास लेकर आता है। इसे 'अम्बुबाची निवृत्ति' का दिन कहा जाता है। चौथे दिन का महाशुद्धिकरण (गृहशुद्धि) होती है। पंचांग के अनुसार निवृत्ति का समय आता है, प्रत्येक घर में उत्सव और सफाई का महाभियान शुरू हो जाता है: धुलाई और पवित्रीकरण: घर के कोने-कोने को साफ किया जाता है। सभी बिस्तरों, चादरों, कपड़ों और बर्तनों की अच्छी तरह से धुलाई की जाती है। पूरे घर में गंगाजल या पवित्र नदी के जल का छिड़काव करके शुद्धिकरण किया जाता है। इसके बिना घर में कोई भी शुभ कार्य दोबारा शुरू नहीं हो सकता।
नीलांचल पर्वत पर भी इसी दिन मां कामाख्या के मंदिर के पट खोले जाते हैं। कपाट खुलते ही पुजारियों द्वारा मंदिर की सफाई की जाती है, माता के पवित्र घट (कलश) को साफ कर पुनः स्थापित किया जाता है। इसके बाद माता की शिला और अन्य सभी देवी-देवताओं की मूर्तियों व चित्रों को पवित्र जल से स्नान कराया जाता है। उन्हें नए वस्त्र, आभूषण पहनाए जाते हैं और सुगंधित फूलों (विशेषकर लाल जपाकुसुम या गुड़हल के फूलों) से सजाकर भव्य महापूजा और आरती की जाती है। इसी समय देश-विदेश से आए लाखों भक्तों को 'रक्त वस्त्र' का प्रसाद वितरित किया जाता है।
कई परिवारों में महिलाएं इन तीन दिनों तक कड़ा उपवास रखती हैं। निवृत्ति के बाद वे अपना उपवास खोलती हैं। इस दिन का एक विशेष पारंपरिक व्यंजन और लोकाचार अत्यंत प्रसिद्ध है: तीसरे दिन के अंत में या चौथे दिन सुबह, महिलाएं स्नान करके, नए वस्त्र धारण कर, माथे पर सिंदूर और पैरों में आलता (लाल रंग) लगाकर भगवान के सम्मुख बैठती हैं। वे साक्षात पके हुए आम और दूध को मिलाकर देवी को अर्पित करती हैं।: इस दूध और आम के मिश्रण को बाद में परिवार के सभी सदस्य मुख्य भोजन के रूप में पके हुए चावल (भात) के साथ या ऐसे ही ग्रहण करते हैं। आषाढ़ के महीने में आम अपनी पूर्ण मिठास पर होता है, और दूध के साथ इसका संयोग शरीर को ऊर्जा और शीतलता प्रदान करता है। 
अम्बुबाची मेले और इसके साथ जुड़े लोकाचारों का गहन विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि यह पर्व कोई रूढ़िवादिता या अंधविश्वास नहीं है। इसके विपरीत, यह पर्व आधुनिक दौर में भी संपूर्ण मानवता को तीन महान संदेश देता है: जहाँ दुनिया के कई हिस्सों में स्त्री के प्राकृतिक शारीरिक चक्र को वर्जित माना गया, वहीं सनातन संस्कृति ने उसे जगज्जननी के रूप में पूजनीय बनाया। यह महिला सशक्तिकरण और स्त्री देह की पवित्रता का सबसे बड़ा आध्यात्मिक उद्घोष है। धरती को तीन दिनों के लिए पूरी तरह छोड़ देना, कृषि कार्य रोक देना और पौधों को न छूना — यह दर्शाता है कि हमारे पूर्वज प्रकृति के 'सस्टेनेबल यूज़' और उसे 'हील' होने का समय देने की कला जानते थे। यह आज के 'ग्लोबल वार्मिंग' और 'क्लाइमेट चेंज' के युग में बेहद प्रासंगिक है।।यह पर्व पूर्वोत्तर भारत (असम) को शेष भारत और वैश्विक आध्यात्मिक चेतना से जोड़ता है। जहाँ एक ओर बंगाली पंचांग के सूक्ष्म नियमों का पालन होता है, वहीं दूसरी ओर असमिया संस्कृति के सान्निध्य में लाखों अघोरी, साधु और गृहस्थ एक धागे में पिरोए नजर आते हैं।
अम्बुबाची मेला आस्था की पराकाष्ठा, लोक-लोकाचार का अनुशासन और मनुष्य व प्रकृति के बीच के उस आत्मिक संबंध का जीवंत उत्सव है, जो हमें हमारी जड़ों से जोड़े रखता है और एक बेहतर, संवेदनशील विश्व के निर्माण की प्रेरणा देता है।
संदर्भ -  कालिका पुराण – शक्तिपीठ स्थापना और नीलांचल पर्वत महात्म्य खंड।।देवी भागवत पुराण – 51 शक्तिपीठों की उत्पत्ति और सती चरित्र। बंगाली पंचांग (विशुद्ध सिद्धांत पांजी / नवयुग पांजी) – अम्बुबाची प्रवृत्ति-निवृत्ति गणना सूत्र। असम का सांस्कृतिक इतिहास – लोक-लोकाचार, विधवा और सधवा स्त्रियों के पारंपरिक नियम। शाक्त परंपरा और कौल मत – कामरूप कामाख्या तंत्र साधना पद्धति और अम्बुबाची वस्त्र महत्व ।
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