: ज्ञान की शाश्वत जननी मगध
सत्येन्द्र कुमार पाठक
जब भी विश्व इतिहास में प्राचीन भारतीय शिक्षा, दर्शन और मेधा की चर्चा होती है, तो अमूमन हमारा ध्यान नालंदा, विक्रमशिला और ओदंतपुरी जैसे महान बौद्ध महाविहारों की ओर जाता है। परंतु, इतिहास के पन्नों को यदि अधिक गहराई और सूक्ष्मता से पलटा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इन भव्य विश्वविद्यालयों का उदय कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। नालंदा की स्थापना से भी हजारों वर्ष पूर्व, मगध की यह पावन धरा सनातन वैदिक ऋषियों, मुनियों और मनीषियों की तपोभूमि तथा कर्मभूमि रह चुकी थी। यह वह क्षेत्र है जहाँ की माटी में केवल साम्राज्यों के उत्थान और पतन की कहानियां ही नहीं दफन हैं, बल्कि यहाँ मानव चेतना के उच्चतम शिखरों को छुआ गया है। च्यवन, दीर्घतमा, मतंग, याज्ञवल्क्य और शृंगी जैसे दिव्य ऋषियों ने इस भूमि पर ज्ञान के जो बीज बोए, वे ही कालांतर में पल्लवित और पुष्पित होकर वैश्विक विश्वविद्यालयों के रूप में पूरी दुनिया को आलोकित करने वाले बने। यही कारण है कि मगध को केवल एक भौगोलिक या राजनीतिक क्षेत्र मानना भूल होगी; यह वास्तव में "ज्ञान की शाश्वत जननी" है।
महर्षि च्यवन और देवकुंड: आयुर्वेद एवं अध्यात्म का उद्गम स्थल मगध की ऋषि-परंपरा में महर्षि च्यवन का नाम सबसे जाज्वल्यमान और अग्रणी माना जाता है। उन्होंने न केवल इस क्षेत्र को आध्यात्मिक रूप से समृद्ध किया, बल्कि मानव जाति को स्वास्थ्य का एक ऐसा अनुपम उपहार दिया जो आज भी आश्रम है ।
पौराणिक साक्ष्यों के अनुसार, महर्षि च्यवन का अत्यंत पवित्र आश्रम प्राचीन हिरण्य प्रदेश के अंतर्गत आने वाले वर्तमान बिहार के औरंगाबाद जिले के गोह प्रखंड के देवकुंड में स्थित था। यह स्थल उस कालखंड की एक अत्यंत पवित्र और महती वैदिक नदी हिरण्यबाहु (जिसे आधुनिक युग में सोन नदी के प्राचीन स्वरूप या उसकी सहायक धारा के रूप में भी देखा जाता है) के सुरम्य और शांत किनारे पर बसा हुआ था। देवकुंड की भूमि आज भी इस बात की गवाह है कि कैसे नदियों के किनारे ऋषियों ने प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित कर वेदों की ऋचाओं का साक्षात्कार किया। वैवस्वत मन्वंतर काल मे महर्षि च्यवन की कथा में उनकी अर्धांगिनी सुकन्या का चरित्र अत्यंत महत्वपूर्ण है। सुकन्या कोई साधारण स्त्री नहीं, बल्कि स्वयं वैवस्वत मनु के पुत्र राजा शरयाती की पुत्री और हिरण्य प्रदेश की राजकुमारी थीं। एक अनजानी भूल के कारण जब सुकन्या ने तपस्या में लीन वृद्ध ऋषि च्यवन की आँखों को अनजाने में बींध दिया, तो प्रायश्चित और क्षमा स्वरूप राजा शरयाती ने अपनी पुत्री का विवाह उनसे कर दिया। सुकन्या के पातिव्रत्य और सेवा भाव ने इस आश्रम को लोक-कल्याण का एक बड़ा केंद्र बना दिया। ऋषि च्यवन ने इसी देवकुंड की धरती पर अपनी वृद्धावस्था को पुन: यौवन और असीम ऊर्जा में बदलने के लिए कड़े अनुसंधान किए। उन्होंने अश्विनी कुमारों के सहयोग से वनस्पतियों, जड़ी-बूटियों और रसायनों का एक अनूठा योग तैयार किया, जिसे आज पूरी दुनिया "च्यवनप्राश" के नाम से जानती है। आयुर्वेद का यह महान आविष्कार मगध की ही देन है, जिसने यह सिद्ध किया कि प्राचीन गुरुकुल केवल धर्म की शिक्षा नहीं देते थे, बल्कि वे विज्ञान, चिकित्सा और मानव स्वास्थ्य के शीर्ष अनुसंधान केंद्र भी थे।
. ऋषिकुंड और शृंगी ऋषि: तपोबल से अकाल मुक्ति की गाथा - मगध और उसके समीपवर्ती अंग क्षेत्र की सीमाओं को अपने तप से सींचने वाले महर्षि शृंगी (या शृंग) का इतिहास अद्वितीय है। मुंगेर क्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध ऋषिकुंड आज भी उनकी तपोगाथा को जीवंत रूप में प्रदर्शित करता है। अंग देश की अकाल मुक्ति और शृंगी ऋषि का आगमन - पौराणिक इतिहास के अनुसार, एक समय अंग देश में लगातार 12 वर्षों तक भीषण अकाल पड़ा। नदियाँ सूख गईं, खेत बंजर हो गए और प्रजा त्राहि-त्राहि करने लगी। तब वहां के राजा रोमपाद ने महर्षि शृंगी को आमंत्रण दिया। जैसे ही इस महान तपस्वी के चरण अंग और मगध की सीमांत भूमि पर पड़े, वैसे ही प्रकृति निहाल हो उठी और घनघोर वर्षा हुई। उनके इसी तपोबल और आगमन की स्मृति में मुंगेर का वह क्षेत्र ऋषिकुंड के नाम से विख्यात हुआ। रामायण कालीन संबंध: राजा दशरथ के जामाता महर्षि शृंगी का संबंध सीधे त्रेतायुग के अयोध्या राजघराने से था। वे अयोध्या के चक्रवर्ती राजा दशरथ और माता कौशल्या की ज्येष्ठ पुत्री माता शांता के पति थे। इस नाते वे राजा दशरथ के दामाद थे। जब राजा दशरथ पुत्र प्राप्ति की कामना से व्याकुल थे, तब महर्षि शृंगी की ही देखरेख और आचार्यत्व में अयोध्या में अत्यंत प्रसिद्ध पुत्रकामेष्टि यज्ञ संपन्न हुआ था, जिसके फलस्वरूप प्रभु श्री राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म हुआ।
औषधीय गुणों से युक्त गर्म पानी का कुंड - आज भी मुंगेर के ऋषिकुंड में प्रकृति का एक अद्भुत चमत्कार देखा जा सकता है। यहाँ एक प्राकृतिक गर्म पानी का कुंड (सोता) विद्यमान है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी इस कुंड के पानी में कई प्रकार के खनिज और गंधक (सल्फर) पाए जाते हैं, जिसके कारण इसमें अद्वितीय औषधीय गुण हैं। चर्म रोगों और अन्य शारीरिक कष्टों से मुक्ति के लिए आज भी हजारों श्रद्धालु इस पावन कुंड में स्नान करने आते हैं, जो शृंगी ऋषि के तपोबल और प्रकृति के अंतर्संबंध को दर्शाता है।
मगध के अन्य दिव्य मनीषी और उनका कालजयी - केवल च्यवन या शृंगी ही नहीं, बल्कि विभिन्न कालखंडों में कई अन्य ऋषियों और विचारकों ने मगध की बौद्धिक और आध्यात्मिक रीढ़ को मजबूत किया। इनमें से कुछ प्रमुख विभूतियों का विवरण इस प्रकार है: महर्षि याज्ञवल्क्य: उपनिषद काल के शीर्ष दार्शनिक - उपनिषद काल (लगभग 8वीं-7वीं शताब्दी ईसा पूर्व), मिथिला और मगध का सीमावर्ती वैचारिक क्षेत्र। महर्षि याज्ञवल्क्य भारतीय दर्शन के आकाश में सूर्य के समान देदीप्यमान हैं। वे 'नेति-नेति' (यह भी नहीं, वह भी नहीं) के माध्यम से ब्रह्म को समझाने वाले परम ज्ञानी थे। राजा जनक की सभा में होने वाले महान शास्त्रार्थों में उनकी केंद्रीय भूमिका थी। उनके विचार 'बृहदारण्यक उपनिषद' में संकलित हैं। उन्होंने मगध के दार्शनिकों को तर्क, ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार की एक ऐसी कसौटी दी, जिसने आने वाली सदियों तक यहाँ के विचार प्रवाह को तय किया।
. ऋषि मुद्गल: वैदिक ऋचाओं के द्रष्टा - वैदिक काल, प्राचीन मगध का मैदानी भूभागमें : ऋग्वेद में ऋषि मुद्गल और उनके वंशज मुद्गलों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। उन्होंने कई वैदिक सूक्तों और ऋचाओं की रचना की। मगध क्षेत्र में शिक्षा की जो सबसे प्रारंभिक और बुनियादी संरचना खड़ी हुई, उसमें इनके गुरुकुलों का योगदान अप्रतिम था। वे शस्त्र और शास्त्र दोनों के समन्वय के प्रतीक थे।
दीर्घतमा और मतंग ऋषि: गुरुकुल परंपरा के विस्तारक मगध के घने वन और मैदानी क्षेत्र में महर्षि दीर्घतमा और मतंग ऋषि ने मगध के जंगलों को ज्ञान के आश्रमों में बदल दिया था। मतंग ऋषि (जिनका संबंध रामायण काल में शबरी की कथा से भी जुड़ता है) और दीर्घतमा ने समाज के हर वर्ग को शिक्षा और अध्यात्म से जोड़ने का महती कार्य किया। इनके गुरुकुलों में केवल वेदों का पाठ नहीं होता था, बल्कि प्रकृति, भूगोल, खगोल और समाजशास्त्र पर भी चिंतन होता था।
उर्वेला ऋषि: गया की आध्यात्मिक चेतना - उरुवेला (वर्तमान बोधगया/गया)। का गया के उरुवेला क्षेत्र में उर्वेला काश्यप और उनके भाइयों का बहुत बड़ा आश्रम था। वे जटिल साधनाओं और अग्नि-पूजा के लिए विख्यात थे। बाद में जब महात्मा बुद्ध ज्ञान की खोज में निकले, तो इसी क्षेत्र की आध्यात्मिक ऊर्जा ने उन्हें अपनी ओर आकर्षित किया। उर्वेला ऋषि की उपस्थिति ने गया को पहले से ही एक महान तपोस्थली के रूप में स्थापित कर रखा था।
बौद्ध काल में मगध का वैचारिक रूपांतरण - ईसा पूर्व छठी शताब्दी आते-आते मगध की वैदिक ज्ञान-गंगा में बौद्ध चिंतन की एक नई धारा आकर मिल गई। इस युग में भी मगध ने ऐसे मनीषियों को जन्म दिया जिन्होंने विश्व को करुणा और प्रज्ञा का मार्ग दिखाया।
सारिपुत्र: प्रज्ञा के अद्वितीय प्रतीक- ईसा पूर्व 6ठी शताब्दी (भगवान बुद्ध के समकालीन), नालंदा के समीप नालकग्राम।
सारिपुत्र भगवान बुद्ध के दो सबसे प्रमुख और शीर्ष शिष्यों (सारिपुत्र और महामौद्गल्यायन) में से एक थे। सारिपुत्र को बौद्ध संघ में 'धर्म सेनापति' और प्रज्ञा (बुद्धि) का साक्षात प्रतीक माना जाता था। उनका जन्म और महापरिनिर्वाण दोनों नालंदा के पास ही हुआ था। उनकी स्मृति में सम्राट अशोक ने वहां एक विशाल स्तूप का निर्माण करवाया था। यही स्तूप और उनका जन्मस्थान आगे चलकर नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना का मुख्य केंद्र बिंदु बना।
महाप्रजापती गौतमी: स्त्री शिक्षा और भिक्षुणी संघ की प्रणेता
समय और स्थान: ईसा पूर्व 6ठी शताब्दी, वैशाली और राजगृह (मगध)।
भगवान बुद्ध की विमाता और मौसी महाप्रजापती गौतमी का मगध के सामाजिक इतिहास में क्रांतिकारी योगदान है। उन्होंने बुद्ध से आग्रह करके महिलाओं के लिए 'भिक्षुणी संघ' की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। इसके माध्यम से प्राचीन मगध में महिलाओं को न केवल आध्यात्मिक साधना का अधिकार मिला, बल्कि उन्हें शिक्षा, शास्त्रार्थ और सामाजिक विमर्श में पुरुषों के समकक्ष खड़ा होने का अवसर प्राप्त हुआ।
नालंदा और विक्रमशिला का स्वर्णकाल: मध्यकालीन बौद्ध दार्शनिक
ईसा की प्रारंभिक सदियों से लेकर मध्यकाल तक मगध ज्ञान के मामले में पूरी दुनिया का सिरमौर बना रहा। ऋषियों की गुरुकुल परंपरा ने अब सुसंगठित विश्वविद्यालयों (महाविहारों) का रूप ले लिया था।
आचार्य नागार्जुन: शून्यवाद और आधुनिक विज्ञान के पुरोधा - दूसरी शताब्दी ईस्वी नालंदा महाविहार है । आचार्य नागार्जुन को बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय के अंतर्गत 'माध्यमिक' या 'शून्यवाद' दर्शन का जनक माना जाता है। तिब्बती परंपराओं के अनुसार, वे नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। नागार्जुन केवल एक दार्शनिक ही नहीं थे, बल्कि वे अपने समय के सबसे महान रसायनशास्त्री और चिकित्सक भी थे। उन्होंने 'रस-चिकित्सा' (पारद या पारे का औषधीय उपयोग) का आविष्कार किया। उनके ग्रंथों ने नालंदा को एक वैश्विक अनुसंधान केंद्र के रूप में स्थापित किया।
आचार्य गुणमति: तर्कशास्त्र के महारथी है। समय और स्थान: 5वीं-6ठी शताब्दी ईस्वी, नालंदा विश्वविद्यालय है।।आचार्य गुणमति अपने समय के प्रकांड बौद्ध न्यायविद और तर्कशास्त्री थे। जब चीनी यात्री ह्वेनसांग नालंदा आया, तो उसने अपने यात्रा वृत्तांत में आचार्य गुणमति की विद्वता और उनके द्वारा जीते गए कठिन शास्त्रार्थों का बहुत ही गौरवपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने विज्ञानवाद (योगाचार) दर्शन को समृद्ध किया और यह स्थापित किया कि मगध का तर्कशास्त्र दुनिया में सबसे अचूक है।
. भक्ति काल का आगमन: माध्वाचार्य और गया - तेरहवीं शताब्दी आते-आते जब भारत में सांस्कृतिक और धार्मिक पुनर्जागरण का दौर चल रहा था, तब मगध ने पुनः सुदूर दक्षिण की प्रतिभाओं को अपनी ओर आकर्षित किया।
माध्वाचार्य और गया का शास्त्रार्थ -13वीं शताब्दी ईस्वी (1238–1317 ईस्वी), गया (मगध)।दक्षिण भारत के उडुपी में जन्मे माध्वाचार्य 'द्वैतवाद' दर्शन के महान प्रवर्तक थे। अपनी संपूर्ण भारत की दिग्विजय यात्रा के दौरान वे मगध के प्रसिद्ध तीर्थ स्थल गया पहुंचे। गया में उन्होंने वहां के पारंपरिक गयापाल ब्राह्मणों और विद्वानों के साथ गहन शास्त्रार्थ किया। उनके तर्कों और भक्ति मार्ग से प्रभावित होकर गया के विद्वानों ने द्वैत संप्रदाय को अपनाया। इससे मगध क्षेत्र में वैष्णव दर्शन और भक्ति आंदोलन को एक नई और सुदृढ़ दिशा मिली।
गुरुकुल से वैश्विक विश्वविद्यालयों का महासफर
यदि हम ऊपर वर्णित ऋषियों और आचार्यों के कालक्रम का बारीकी से अध्ययन करें, तो एक स्पष्ट वैचारिक सातत्य दिखाई देता है:।कालखंड ,प्रमुख विभूतियाँ ,मुख्य केंद्र (स्थान) ,मुख्य अवदान / विषय , वैदिक/पौराणिक काल ऋषि च्यवन, मुद्गल, दीर्घतमा देवकुंड, हिरण्यबाहु नदी तट आयुर्वेद (च्यवनप्राश), वैदिक ऋचाएं, प्रारंभिक गुरुकुल ,रामायण/उपनिषद काल शृंगी ऋषि, महर्षि याज्ञवल्क्य ऋषिकुंड (मुंगेर), मगध-मिथिला सीमा पुत्रकामेष्टि यज्ञ, ब्रह्म दर्शन ('नेति-नेति'), तर्कशास्त्र।, बौद्ध काल (6ठी सदी ई.पू.) सारिपुत्र, महाप्रजापती गौतमी, उर्वेला ऋषि नालकग्राम (नालंदा), राजगृह, गया ,बौद्ध संघ का विस्तार, स्त्री शिक्षा, प्रज्ञा और करुणा दर्शन , महाविहार काल (2-6वीं सदी ईस्वी) ,आचार्य नागार्जुन, आचार्य गुणमति नालंदा विश्वविद्यालय, विक्रमशिला शून्यवाद, रस-चिकित्सा (रसायन विज्ञान), उन्नत तर्कशास्त्र ,भक्ति काल (13वीं सदी ईस्वी) , जगद्गुरु माध्वाचार्य गया (मगध) , द्वैतवाद दर्शन का प्रसार, वैष्णव भक्ति आंदोलन है।
यह तालिका दर्शाती है कि नालंदा या विक्रमशिला विश्वविद्यालय रातों-रात या किसी एक शासक के दान से अचानक खड़े नहीं हो गए थे। इसके पीछे च्यवन और मतंग जैसे ऋषियों की वह गुरुकुल परंपरा थी, जिसने सदियों तक ज्ञान को सहेजा, परिष्कृत किया और उसे लोक-कल्याण का माध्यम बनाया। बौद्ध काल में इन्हीं गुरुकुलों ने महाविहारों का रूप ले लिया, जहाँ रहने, खाने और पढ़ने की निःशुल्क व्यवस्था सम्राटों के सहयोग से की गई। मूल चेतना वही प्राचीन ऋषि-परंपरा थी, जो केवल सत्य की खोज में विश्वास रखती थी।
मगध का इतिहास इस बात का जीवंत प्रमाण है कि ज्ञान कभी नष्ट नहीं होता, वह केवल अपना स्वरूप बदलता है। महर्षि च्यवन के आयुर्वेद-विज्ञान से शुरू हुई यह यात्रा, शृंगी ऋषि के तपोबल, याज्ञवल्क्य के उपनिषदिक चिंतन, सारिपुत्र की प्रज्ञा, नागार्जुन के शून्यवाद और माध्वाचार्य के भक्ति दर्शन से होते हुए निरंतर आगे बढ़ती रही। नालंदा बनने से हजारों साल पहले भी मगध ऋषियों की कर्मभूमि बनकर दुनिया का मार्गदर्शन कर रहा था और बाद में विश्वविद्यालयों के रूप में भी उसने इसी दायित्व को निभाया। ऋषियों और आचार्यों की यह महान विरासत ही मगध की असली पहचान है। आज भी इस भूमि का हर कण, हर विलुप्त नदी का किनारा और हर प्राचीन कुंड हमें याद दिलाता है कि भारत की आत्मा ज्ञान, विज्ञान और अध्यात्म के इसी सुदृढ़ स्तंभ पर टिकी हुई है, जिसने इसे अनादि काल से "विश्वगुरु" के पद पर आसीन कर रखा है।
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