बुधवार, जुलाई 29, 2026

नंदीश्वर द्वीप और जैन धर्म

नंदीश्वर द्वीप: स्वरूप, पर्वतीय संरचना
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
भारतीय उपमहाद्वीप विभिन्न दार्शनिक चिंतन-धाराओं, साधना-पद्धतियों एवं सांस्कृतिक मूल्यों का विशाल संगम रहा है। यहाँ अनादि काल से विविध मत-मतांतरों ने मानव जीवन को उन्नत बनाने, आचरण को पवित्र करने और परम तत्त्व की प्राप्ति के मार्ग दिखाए हैं। भारतीय चिंतन-धारा जहाँ एक ओर वैदिक, पौराणिक एवं तांत्रिक उपासना-धाराओं (सौर, शाक्त, ब्रह्म, शैव, वैष्णव) से समृद्ध हुई, वहीं दूसरी ओर ऋषि-परंपरा, देव-उपासना और मनु द्वारा निर्मित आचार-संहिताओं ने सामाजिक व्यवस्था को स्थायित्व प्रदान किया। इसी महासमुद्र में जैन दर्शन अपनी अनूठी अहिंसा, स्याद्वाद, कर्म-सिद्धांत और अकृत्रिम (शाश्वत) भूगोल की अवधारणा के साथ विशिष्ट स्थान रखता है। जैन ब्रह्मांड विज्ञान  के अनुसार, यह लोक (सृष्टि) तीन भागों—अधोलोक, मध्यलोक, और ऊर्ध्वलोक—में विभाजित है। मध्यलोक के असंख्य द्वीपों और समुद्रों की श्रृंखला में ८वाँ (आठवाँ) द्वीप 'नंदीश्वर द्वीप' कहलाता है। यह द्वीप अपनी अकृत्रिमता, अलौकिकता और 52 शाश्वत जिनालयों (चैत्यालयों) के कारण जैन धर्म में सर्वाधिक वंदनीय माना गया है।
भारतीय दार्शनिक परंपराएँ एवं जैन संस्कृति का समन्वय - भारतीय संस्कृति एकांगी न होकर बहुआयामी है। इसमें ईश्वर, प्रकृति, आत्मा और लोक-कल्याण के विविध दृष्टिकोण एक साथ प्रवाहित होते हैं: सौर परंपरा: भगवान सूर्य को प्रत्यक्ष देव और जगत् की आत्मा मानकर उनकी उपासना करने वाली धारा। 'गायत्री मंत्र' और 'सूर्य नमस्कार' इसी परंपरा के मूल आधार हैं। शाक्त परंपरा: आद्यशक्ति, जगज्जननी दुर्गा, महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के रूप में मातृ-शक्ति (सृजन एवं विनाश की ऊर्जा) की साधना। ब्रह्म (ब्राह्म) परंपरा: वेदांत दर्शन पर आधारित, जिसमें परब्रह्म (सृष्टिकर्ता ब्रह्मा एवं सर्वव्यापी निर्गुण-सगुण ब्रह्म) की उपासना का विधान है।शैव परंपरा: देवाधिदेव महादेव शिव, लिंग-पूजा, योग और वैराग्य की धारा, जो आत्म-साधना और कल्याणकारी तत्त्व पर बल देती है।वैष्णव परंपरा: जगत के पालनहार भगवान विष्णु एवं उनके पूर्णावतारों (श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि) की भक्ति और शरणागति की परंपरा , ऋषि: ज्ञान-परंपरा के वाहक और मंत्र-द्रष्टा, जिन्होंने सत्य की खोज की।।देव: प्राकृतिक और दिव्य शक्तियाँ जो ब्रह्मांडीय संतुलन बनाए रखती हैं। मनु: मानव सभ्यता के प्रथम पुरुष एवं समाज-शास्त्र (नीति व धर्म) के प्रवर्तक। है। 
जैन संस्कृति: वीतरागता, अहिंसा, अपरिग्रह और स्याद्वाद पर आधारित दर्शन। जैन मान्यता के अनुसार, यह लोक अकृत्रिम (किसी ईश्वर या व्यक्ति द्वारा अनिर्मित) है। इसमें आत्मा ही अपने कर्मों के अनुसार सुख-दुःख का भोग करती है और सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान व सम्यक् चरित्र द्वारा मोक्ष (पूर्ण शुद्धि) प्राप्त कर सकती है।
. नंदीश्वर द्वीप: स्थिति, स्वरूप एवं अलौकिक विस्तार - जैन आगम ग्रंथों (जैसे तिलोयपण्णत्ती, त्रिलोकसार, एवं तत्वार्थसूत्र) के अनुसार, मध्यलोक में लवण समुद्र, धातकीखंड आदि को पार करने के बाद ८वाँ द्वीप नंदीश्वर द्वीप आता है। अकृत्रिमता: जैन दर्शन के अनुसार यह द्वीप अनादि-निधन है; इसका निर्माण किसी मनुष्य, ईश्वर या तीर्थंकर ने नहीं किया। : तिलोयपण्णत्ती के अनुसार, जम्बूद्वीप से आगे प्रत्येक द्वीप और समुद्र का विस्तार दूना-दूना होता जाता है। नंदीश्वर द्वीप का व्यास 1 अरब 63 करोड़ 84 लाख योजन (1,63,84,00000 योजन) है।
मानव-रहित क्षेत्र: जैन आगमों के अनुसार, मनुष्य केवल धातकीखंड द्वीप और पुष्करवर द्वीप के आधे भाग (मानुषोत्तर पर्वत) तक ही निवास कर सकते हैं। मानुषोत्तर पर्वत के पार (जिसमें नंदीश्वर द्वीप शामिल है) मनुष्यों, पशु-पक्षियों या तिर्यंचों का सशरीर प्रवेश संभव नहीं है।  नंदीश्वर द्वीप में चारों निकायों के देवगण (भवनवासी, व्यंतर, ज्योतिषी, और कल्पवासी) ही गमन करते हैं। अत: यहाँ कोई मानवीय जाति या वर्ण व्यवस्था (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) नहीं है। अष्टाह्निका पर्व: वर्ष में तीन बार (कार्तिक, फाल्गुन, और आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से पूर्णिमा तक) ८-८ दिनों का अष्टाह्निका पर्व मनाया जाता है।देवों की महापूजा: इन आठ दिनों में चारों निकायों के देव-देवियाँ नंदीश्वर द्वीप जाकर ५२ शाश्वत जिनालयों में अष्टद्रव्य (जल, चंदन, अक्षत, पुष्प, दीप, धूप, फल, अर्घ्य) से महापूजा एवं उत्सव मनाते हैं। मनुष्यों द्वारा परोक्ष वंदना: चूँकि मनुष्य सशरीर वहाँ नहीं पहुँच सकते, इसलिए श्रावक-श्राविकाएँ मंदिरों में 'नंदीश्वर विधान' और व्रत करके नंदीश्वर द्वीप के जिनालयों की परोक्ष वंदना (भाव-पूजा) करते हैं।
५२ अकृत्रिम पर्वतों (गिरी) एवं चैत्यालयों की भौगोलिक संरचना - नंदीश्वर द्वीप में चारों दिशाओं (पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर) में कुल 52 पर्वत स्थित हैं, और प्रत्येक पर्वत की चोटी पर एक-एक शाश्वत (अकृत्रिम) जिन-मंदिर (चैत्यालय) विराजमान है। पर्वतों का वर्गीकरण (प्रति दिशा रचना) में  अंजनगिरि पर इंद्रनील मणि सदृश (गहरा नीला/काला) 1 4 संख्या प्रति दिशा रचना , दधिमुख पर्वत (स्फटिक/दही सदृश (निर्मल श्वेत) 4 1, रतिकर पर्वत (Ratikar) तपाये स्वर्ण सदृश (स्वर्णमयी पीला) 8 32 कुल योग 13 प्रति दिशा 52 पर्वत (52 जिनालय) , दिशा-वार भौगोलिक विन्यास में अंजनगिरि: प्रत्येक दिशा के केंद्र में 1 विशाल 'अंजनगिरि' पर्वत स्थित है (चारों दिशाओं में 4 अंजनगिरि)। बावड़ियाँ (वापिकाएँ): अंजनगिरि पर्वत के चारों तरफ जल से भरी 4 बावड़ियाँ (नंदा, नंदोत्तर, आनंद, और वर्धमाना) हैं। दधिमुख पर्वत: इन बावड़ियों के बीच में 4 'दधिमुख' पर्वत स्थित हैं (4 × 4 = 16 दधिमुख)। रतिकर पर्वत: बावड़ियों के बाह्य कोनों पर 8 'रतिकर' पर्वत स्थित हैं (8 × 4 = 32 रतिकर)। रचना समीकरण: 1 दिशा = 1 अंजनगिरि + 4 दधिमुख + 8 रतिकर = 13 पर्वत। कुल: 13 पर्वत × 4 दिशाएँ = 52 अकृत्रिम चैत्यालय है। 
प्रत्येक चैत्यालय में भगवान ऋषभदेव, चंद्रप्रभ, वारिषेण और वर्धमान स्वामी आदि तीर्थंकरों की 108-108 शाश्वत पद्मासन मुद्रा में विराजमान अकृत्रिम जिन-प्रतिमाएँ स्थापित हैं। विश्व एवं भारत के विभिन्न राज्यों एवं विश्व में नंदीश्वर मंदिरों का निर्माण - चूँकि वास्तविक नंदीश्वर द्वीप मध्यलोक में स्थित है, इसलिए जैन मतावलंबियों ने भाव-वंदना हेतु पृथ्वी पर नंदीश्वर द्वीप की प्रतिकृतियाँ (त्रिविम मॉडल, नंदीश्वर पट्ट, एवं विशाल मंदिर) निर्मित किए है। उत्तर प्रदेश का हस्तिनापुर (मेरठ): 1980 के दशक में गणिनी प्रमुख आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से 'जंबूद्वीप' परिसर के भीतर विशाल नंदीश्वर द्वीप और जिनालयों का भव्य निर्माण कराया गया। देवबंद, आगरा व मथुरा: मध्यकालीन (मुगल एवं स्थानीय रजवाड़ों के काल) और आधुनिक काल में निर्मित कई नंदीश्वर पट्ट व मंदिर स्थित हैं। मध्य प्रदेश का इंदौर (काँच मंदिर): 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में प्रसिद्ध उद्योगपति सर सेठ हुकमचंद (होलकर राज्य काल) द्वारा इंदौर के काँच मंदिर में काँच-चित्रित और धातु-निर्मित नंदीश्वर द्वीप की अद्भुत प्रतिकृति स्थापित की गई। खनियाधाना (शिवपुरी): यहाँ संगमरमर का विशाल त्रिविम (3D) पंचमेरू एवं नंदीश्वर जिनालय स्थित है।सोनागिरी (दतिया): बुंदेला राजाओं के काल एवं आधुनिक समय में निर्मित नंदीश्वर पट्टिकाएँ एवं जिनालय विद्यमान हैं। राजस्थान का।जालौर, तिजारा (अलवर), जयपुर, अजमेर व उदयपुर: राजपूत काल (चौहान, राठौड़ व कछवाहा राजवंश) से लेकर आधुनिक काल तक 52 जिनालयों की प्रतिकृतियाँ और नंदीश्वर विधान मंडप निर्मित किए गए। अजमेर के 'सोनी जी की नसियाँ' में स्वर्णमयी जैन भूगोल रचना में इसका सुंदर दिग्दर्शन है। झारखंड में सम्मेद शिखरजी (मधुबन): 19वीं और 20वीं सदी में जैन महासंघों द्वारा तेरहपंथी कोठी एवं बीसपंथी कोठी परिसर में विशाल नंदीश्वर द्वीप जिनालयों का निर्माण कराया गया। गुजरात का पाटन, गिरनार, पालिताना व सोनगढ़: सोलंकी साम्राज्य (11वीं-12वीं शताब्दी) के समय से ही नंदीश्वर पट्ट उकेरे जाने की परंपरा रही। आधुनिक काल में सोनगढ़ में विशाल 'श्री पंचमेरु नंदीश्वर जिनालय' निर्मित है।।बिहार - कुंडलपुर (नालंदा) व राजगीर: प्राचीन काल (गुप्त व पाल राजवंशों के काल) से जैन कला के अवशेष रहे हैं। कुंडलपुर में  युग में भव्य नंदीश्वर जिनालय का निर्माण कराया गया। दक्षिण भारत कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना का राजवंश: राष्ट्रकूट, गंगा, और चालुक्य राजवंशों (8वीं से 12वीं शताब्दी) के दौरान पत्थरों पर 52 जिनालयों के नक्काशीदार 'नंदीश्वर पट्ट' बनाने की परंपरा रही (उदा. राजा रचमल्ल के संरक्षण में)।  श्रवणबेलगोला, हम्बुज (हुमचा), मूडबिद्री और वारंगा के पार्श्वनाथ बसदि में मध्यकालीन नंदीश्वर पट्टिकाएँ सुरक्षित हैं। महाराष्ट्र का मुंबई, पुणे, कारंजा (अकोला): मराठा काल के पश्चात एवं आधुनिक काल में दानवीरों व जैन संघों द्वारा भव्य नंदीश्वर जिनालयों की स्थापना की गई।: दिल्ली के चांदनी चौक स्थित लाल मंदिर, रोहतक, अंबाला और देहरादून में 20वीं-21वीं सदी में नंदीश्वर रचनाएँ स्थापित की गईं। पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, छत्तीसगढ़: कोलकाता (बड़ा बाज़ार व पारसनाथ मंदिर) में 19वीं सदी में मारवाड़ी व ओसवाल जैनों द्वारा नंदीश्वर पट्ट स्थापित किए गए।जम्मू-कश्मीर: जम्मू शहर के दिगंबर जैन मंदिर में नंदीश्वर पट्ट विराजमान है। असम व नागालैंड: गुवाहाटी और डिमापुर में 20वीं सदी के उत्तरार्ध में प्रवासी जैन समुदायों द्वारा निर्मित मंदिरों में नंदीश्वर जिनालय स्थापित हैं। जैन धर्मशास्त्रों के अनुसार वास्तविक नंदीश्वर द्वीप मध्यलोक में है। पृथ्वी पर भारत से बाहर ऐतिहासिक प्राचीन साम्राज्यों द्वारा पृथक नंदीश्वर मंदिरों का निर्माण दर्ज नहीं है, परंतु 20वीं और 21वीं सदी में प्रवासी भारतीय जैन संघों  द्वारा वैश्विक स्तर पर प्रतिकृति जिनालय एवं नंदीश्वर पट्ट स्थापित किए गए हैं: नेपाल: काठमांडू स्थित जैन भवन/मंदिर में 52 जिनालयों का नंदीश्वर पट्ट स्थापित है। संयुक्त राज्य अमेरिका में : 20वीं सदी के अंत और 21वीं सदी में प्रवासी भारतीय जैन समाज द्वारा 'सिद्धद्धांतम वर्ल्ड जैन सेंटर' (न्यू जर्सी) तथा विभिन्न जैन सेंटर्स (जैसे शिकागो, लॉस एंजिल्स) में 52 जिनालयों की पट्टिकाएँ और नंदीश्वर जिनालय स्थापित किए गए। यूनाइटेड किंगडम : लेस्टर  जैन मंदिर में संगमरमर और धातु पर उकेरी गई नंदीश्वर द्वीप की भव्य प्रतिकृति विराजमान है।
भारतीय संस्कृति की जननी धारा जहाँ सौर, शाक्त, ब्रह्म, शैव, वैष्णव, और वैदिक ज्ञान-परंपरा से पोषित हुई है, वहीं जैन दर्शन ने इसमें आत्म-विशुद्धि, अहिंसा और लोक-भूगोल की अद्वितीय वैज्ञानिक व आध्यात्मिक चेतना जोड़ी है। नंदीश्वर द्वीप और उसके 52 अकृत्रिम चैत्यालय जैन धर्मावलंबियों के लिए निष्काम भक्ति, वीतरागता और परम शांति के प्रतीक हैं। चूँकि मनुष्य भौतिक रूप से इस अलौकिक द्वीप तक नहीं पहुँच सकता, इसलिए भारत के प्राचीन राजवंशों (राष्ट्रकूट, चालुक्य, सोलंकी, बुंदेला, राजपूत) से लेकर आधुनिक काल के प्रवासी भारतीय जैन संघों तक ने पत्थरों, संगमरमर, काँच और धातुओं पर इसकी भव्य प्रतिकृतियाँ निर्मित की हैं। ये निर्माण श्रद्धालुओं को घर बैठे ही अष्टाह्निका पर्व पर नंदीश्वर द्वीप की भाव-वंदना करने का सुअवसर प्रदान करते हैं।

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