शुक्रवार, मार्च 18, 2022

भागलपुर की सांस्कृतिक विरासत ....


पुरणों , स्मृतियों महाकाव्य रामायण में अयोध्या का राजा दशरथ की पत्नी कौशल्या की पुत्री एवं भगवान  श्री राम की बहन शांता का उल्लेख किया गया है । अयोध्या नरेश दशरथ की तीन पत्नियों कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी में से कौशल्या नंदनी शांता अत्यंत सुन्दर और सुशील , वेद, कला तथा शिल्प में पारंगत थीं।  राजा दशरथ को अपनी  पुत्री शांता पर बहुत गर्व था। रामायण  अनुसार रानी कौशल्या की बहन रानी वर्षिणी संतानहीन होने के कारण  दुखी रखती थी। अंगदेश का राजा रोमपद  की पत्नी वर्षिणी  रोमपद  अयोध्या आएं। राजा दशरथ और रानी कौशल्या से वर्षिणी और रोमपद का दुःख देखा न गया और उन्होंने निर्णय लिया कि वह शांता को उन्हें गोद दे देंगे। दशरथ के इस फैसले से रोमपद और वर्षिणी की काफी प्रसन्नता हुई थी ।अंगदेश का राजा रोमपद द्वारा शांता अंगदेश की राजकुमारी घोषित की गई थी । हिमाचल के कुल्लू से 50 कि. मि. पर  शृंग ऋषि एवं भगवान राम की बड़ी बहन शांता की पूजा होती है।  ब8हर का भागलपुर का श्रृंगेश्वर स्थान पर श्रृंगी ऋषि एवं शांता मंदिर , नवादा जिले का श्रृंगी पर्वत पर श्रृंगी ऋषि एवं शांता की उपासना स्थल है । पूर्वी भारतीय उपमहाद्वीप और सोलह महाजनपदों मे मगध के पूर्व  अंग आधुनिक भागलपुर है । अंग  की राजधानी चंपा नदी के तट पर राजा अंग द्वारा  चंपा और मालिनी नगर की स्थापना की गई थी । अंग को 6 ठी शताब्दी ई. पूर् . में मगध द्वारा कब्जा कर लिया गया था। उत्तर वैदिक काल 1100 ई. पु. से 500  ई. पु. तक अंग की राजधानी भागलपुर के समीप  चम्पापुरी और अंगराज ब्रह्मदत्त के समय मुंगेर के समीप मालिनी थी । लौह तथा काश्य युग  में अंग विकसित था । जैन  व्याख्यप्रज्ञप्ति एवं बौद्ध ग्रंथों का  अंगुत्तर निकाय के अनुसार "सोलह महान राष्ट्रों" में अंग का उल्लेख किया गया है । महाभारत  1 .104.53-54 और पौराणिक साहित्य के अनुसार, अंग प्रदेश  के संस्थापक राजकुमार अंग और बाली के पुत्र अंगद  के नाम पर रखा गया था ।  ऋषि दिर्घटामास प्रताप से राजा अंग की पत्नी रानी सुदेशना  के अंग पुत्रों का आशीर्वाद देने का अनुरोध किया। कहा जाता है कि ऋषि ने अपनी पत्नी, रानी सुदेसना द्वारा अंग , वंगा , कलिंग , सुम्हा और पुंड्रा जन्म दिया गया ।  महाभारत के अनुसार अंग महाजनपद के राजा कर्ण और भानुमति ने मगध साम्राज्य का राजा जरासंध द्वारा प्राप्त  बंजर भूमि को समृद्ध शहर निर्माण कर मालिनी नगर सपर्पित किया गया था ।  रामायण 1.23.14 के अनुसार   कामदेव को शिव ने जलाकर मार डालने के कारण कामदेव का  शरीर के अंग  बिखरे होने के कारण अंग स्थल कहा गया था । अथर्ववेद (वी.22.14) के अनुसार कीकट ,  मगध , गांधार , अंग, कलिंग , वंगा, पुंड्रा ,  पूर्वी बिहार , पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश का क्षेत्र , विदर्भ और विंध्य जनपदों शामिल थे ।हैं । महागोविंदा सुत्तंत के अनुसार  अंग राजा धतरथ को संदर्भित करता है। जैन ग्रंथों में अंग के शासक के रूप में धधिवाहन  , पुराण और हरिवंश राज्य के संस्थापक अंग के पुत्र और तत्काल उत्तराधिकारी के रूप में उनका प्रतिनिधित्व करते हैं । महाभारत आदि पर्व के अनुसार, दुर्योधन ने कर्ण को अंग का राजा नामित किया था। अंग का राज्य दुर्योधन द्वारा कर्ण को उपहार में दिया गया था। कर्ण को अंग साम्राज्य प्राप्त होने के बाद बंजर भूमि पर  भानुमति और कर्ण ने भूमि पर रहने वाले दैत्यों से लड़ाई की। भानुमति ने कर्ण को अपने कंधों पर उठा लिया और अपने वज्रस्त्र से दानव-भूमि को नष्ट कर उसे कृषि योग्य भूमि में बदल दिया। जल्द ही कर्ण ने पूरी पृथ्वी पर विजय प्राप्त कर लिया था । वत्स और अंग के दायरे के बीच, मगध रहते थे । अंग और उसके पूर्वी पड़ोसियों के बीच एक महान संघर्ष चला। विधुर पंडित जातक ने राजगृह (मगधन राजधानी) को अंग के शहर के रूप में वर्णित किया है और महाभारत में अंग के राजा द्वारा विष्णुपद ( गया में ) पर्वत पर किए गए बलिदान का  उल्लेख है।  6 वीं शताब्दी ई.  पू .  में, मगध के राजकुमार बिंबिसार ने अंग राजा ब्रह्मदत्त को मार डाला था और चंपा पर कब्जा कर लिया था। बिंबिसार ने चंपा पर मगध का  मुख्यालय बनाया था । अंग सबसे पूर्वी, वृज्जी के दक्षिण में और मगध के पूर्व में है । महाभारत के सभापर्व (II.44.9) एवं कथा-सरित-सागर के अनुसार अंग का  शहर विटंकापुर समुद्र के तट पर स्थित था।अंग उत्तर में कौशिकी नदी से घिरा था । अंग की राजधानी चंपा को  मालिनी  6 ठी शताब्दी ई.पू. सबसे महान शहरों में  था।चीनी भिक्षु फैक्सियन ने 4थी शताब्दी में   बौद्ध मंदिरों काचंपा को  चीनी में चानपो , पिनयिन : झांबी ; वेड-गाइल्स : चैनपो , तथा अंग को यांग्जिया , रोमापदा जाना जाता था। अंग के संस्थापक और राजा वली के पुत्र अंगद था । अंग देश का राजा बृहद्रथ: , कर्ण , वृषकेतु - पुत्र , ताम्रलिप्ता , त्रेतायुग में अयोध्या का राजा दशरथ का मित्र लोमपाद , चित्ररथ , वृहद्रथ:वसुहोमा , धतरथ ,धादिवाहन  , ब्रह्मदत्त - अंग के अंतिम राजा था । ब्रह्म पुराण  के अनुसार  स्वायम्भुव मन्वन्तर में स्वायम्भुव मनु एवं शतरूपा  के अंश से वीर ,प्रियव्रत और उत्तानपाद का जन्म हुआ था । प्रजापति अत्रि ने राजा उत्तानपाद को दतकपुत्र बनाया और उत्तानपाद का विवाह सूनृता से सम्पन्न किया था । चाक्षुष मन्वंतर इन चाक्षुष मनु की पत्नी वैराज प्रजापति की पुत्री नडवला का द्वितीय पुत्र पुरुकी पत्नी आग्रेयी का जेष्ठ पुत्र अंग द्वारा अंग प्रदेश की स्थापना की गई थी । अत्रि कुल में उत्पन्न एवं पुरु की पत्नी आग्रेयी के पुत्र अंग की पत्नी एवं मृत्यु कन्या सुनीता के गर्भ से वें का जन्म हुआ था । अंग देश का राजा वेन द्वारा अधर्म का साथ और धर्म का विरोध करने से जनता , प्रकृति , पृथिवी पर अत्याचार बढ़ाने लगे थे । अंग देश के ऋषियों द्वारा वेन के शरीर से मंथन कर पृथु  , मागध एवं सूत , निषद की उत्पत्ति कर अंग देश का विकास किया था । अंग देश का राजा भगवान विष्णु के अवतार के रूप में पृथु द्वारा धर्म एवं वेद , प्रकृति , पृथिवी का चतुर्दिक विकास किया गया । मागध द्वारा मगध और सूत द्वारा ओडिशा देश की स्थापना की गयी  थी । अंग देश का संस्थापक  एवं विकास का रूप राजा पृथु द्वारा किया गया था । 
 बिहार राज्य  का  गंगा के तट पर बसा  3100 वर्गमील  में फैले भागलपुर की 2011 जनगणना के अनुसार 3037776 आवादी वाला बंगाल अभिलेखाकार के अनुसार भागलपुर जिले की स्थापना 04 मई 1773 ई. है। 1525 गाँवों को 16 प्रखंडों एवं 03 अनुमंडलों का क्षेत्र को पुराणों और महाभारत में  क्षेत्र को अंग प्रदेश कहा  गया है। भागलपुर के निकट स्थित चम्पानगर महान पराक्रमी शूरवीर कर्ण की राजधानी थी । भागलपुर सिल्क एवं तसर सिल्क का उत्पादन केंद्र है । पुराणों के अनुसार अंग राज भगदंत द्वारा भगदंतपुर नगर की स्थापना की थी । भगदंतपुर का आधुनिक  भागलपुर के नाम से विख्यात है । भागलपुर क्षेत्र में प्रमुख भाषा अंगिका और हिंदी है । भागलपुर नगर के  मुहल्लों में  1576 ई को  बादशाह अकबर के  मुलाज़िम मोजाहिद के नाम मोजाहिदपुर ,  बंगाल के सुल्तान सिकंदर ने सिकंदरपुर , अकबर काल मे कर्मचारी तातार खान ने ततारपुर ,  शाहजहाँ काल के काज़ी  काजवली ने कजवालीपुर ,   अकबर के शासन काल मे फकीर शाह कबीर ने कविरपुर के नाम पर पड़ा ,उनकी कब्र भी इसी मुहल्ले मे है । नरगा – इसका पुराना नाम नौगजा था यानी एक बड़ी कब्र । वख्त्यार खिलजी काल मे  युद्ध के शहीदो को  कब्र मे दफ़्नाके गए स्थल को नरगा , शाह मदार का मज़ार के कारण मदरोजा , अकबर के कार्यकाल मे युद्ध में  शाह मंसूर की कटी उँगलियाँ   कटी और मृत्यु होने के बाद दफनाए गए स्थल मंसूरगंज ,   अकबर के समय के आदम बेग और खंजर बेग को आदमपुर , खंजरपुर स्थल समर्पित है ।ये दोनों मुहल्ले रखे गए थे । मशाकचक – अकबर के काल के सूफी संत  मशाक बेग का  मज़ार होने से  मशाकचक पड़ा ।  जहांगीर काल में  बंगाल के गवर्नर इब्राहिम हुसैन के परिवार की जागीर होने से हुसैनगंज ,मुगलपुरा  मुहल्ले बस गए ।  सुल्तानपुर के 12 परिवार एक साथ आकर रहने से बरहपुरा , फ़तेहपुर – 1576 ई मे शाहँशाह अकबर और दाऊद खान के बीच हुई लड़ाई मे अकबर की सेना को फ़तह मिलने से  फ़तेहपुर ,  सराय – मुगल काल मे सरकारी कर्मचारिओ और आम रिआयासी स्थल  को   सराय ,  औरंगजेव के भाई शाह सूजा ने सूजा  गंज  में शाह सुजा की लड़की का मज़ार होने से  उर्दू बाज़ार , मुगल सेनाओं के स्थल को रकाबगंज ,  सूफीसंत दमडिया ने अपने महरूम पिता मखदूम सैयद हुसैन के नाम पर हुसैनपुर बसाया था । अकबर काल के ख्वाजा सैयद मोईनउद्दीन बलखी के नाम पर मोइनूद्दीनचक व मुंदीचक कहलाने लगा । जमालउल्लाह खलीफा स्थल को  खलीफा बाग,  शाह शुजा के काल मे सैयद मुर्तजा शाह आनंद वार्शा ने मुहल्ला असानंदपुर की स्थापना की थी ।
मंदार पहाड़ी -   भागलपुर से 48 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित  बांका जिले का 800 फीट ऊँचाई युक्त  मंदार पर्वत   है।  मंदार पहाड़ी के चारों ओर  शेषनाग के चिन्‍ह एवं पर्वत की चोटी पर भगवान विष्णु का पद चिह्न है । पहाड़ी पर देवी देवताओं का मंदिर , जैन के 12 वें तिर्थंकर का  निर्वाण स्थल प्राप्‍त किया था।  मंदार पर्वत की चोटी पर  झील व पहाड़ी के पापहरनी तलाब है । विक्रमशिला विश्वविद्यालय - भागलपुर से 38 किलोमीटर दूरी पर अन्तीचक में  पाल वंश के शासक धर्मपाल द्वारा  770-810 ई . में विक्रमशिला विश्वविद्यालय का निर्माण  करवाया गया था। कोसी और गंगा नदी से घीरा अंतीचक में तांत्रिक केंद्र में तंत्र और मंत्र का शिक्षा केन्द्र  में मां काली और भगवान शिव का मंदिर स्थित है।  कहलगांव - कहलगांव भागलपुर से 32 किलोमीटर की दूरी पर कहलगांव में  जाह्नु ऋषि के तप में गंगा की तीव्र धारा से व्‍यवधान पड़ा था। इससे क्रो‍धित होकर ऋषि ने गंगा को पी लिया। बाद में राजा भागीरथ के प्रार्थना के उपरांत उन्‍होंने गंगा को अपनी जांघ से निकाला। तत्पश्चात गंगा का नाम जाह्नवी कहलाया था । ऋषि जह्नु के कारण  गंगा की धाराएं दक्षिण से उत्‍तर की ओर गमन करने लगी है । सुल्तानगंज में गंगा के मध्य में अजगैवी पर्वत श्रृंखला पर  अजगैवी नाथ मंदिर  , ऋषि जह्नु का स्थल , उत्तरवाहिनी गंगा , कहलगांव स्थित गंगा में  में डॉल्‍फीन है। कुप्‍पा घाट, विषहरी स्‍थान, भागलपुर संग्रहालय, मनसा देवी का मंदिर, जैन मन्दिर, चम्पा, विसेशर स्थान, 25किलोमीटर दूर सुल्‍तानगंज आदि  है।

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