गुरुवार, मार्च 24, 2022

गुरुत्वाकर्षण के प्रणेता भास्कराचार्य.....


भारत के प्रसिद्ध गणितज्ञ एवं ज्योतिषी भास्कराचार्य का जन्म 1114 ई. में  सह्याद्री पर्वतीय क्षेत्र के विज्जलविड के निवासी शाकद्वीपीय ब्राह्मण शांडिल्य गोत्र वंशीय महेश्वर उपाध्याय  के पुत्र  के रूप में हुए एवं निधन 1185 ई. को उज्जैन में हुआ था । भास्कराचार्य  का जन्म कर्नाटक राज्य का विज्जरगी जिले के विजपुरेन्हा और महाराष्ट्र के परमानी जिले के बोरी एवं कर्नाटक के विजज्डविड जिले के पाटन  में शिक्षा ग्रहण तथा उज्जैन में खगोलीय कार्य किया था । भास्कराचार्य की पुत्री लीलावती द्वारा अंकगणित एवं पुत्र लोक समुद्र ने ज्योतिष शास्त्र के रचयिता समुद्री शास्त्र में ग्रहों , दिनमान , होड़ाचक्र , राशि पर उल्लेखनीय कार्य किया है । भास्कराचार्य  द्वारा रचित सिद्धान्त शिरोमणि में लीलावती, बीजगणित, ग्रहगणित तथा गोलाध्याय  भाग में अंकगणित, बीजगणित, ग्रहों की गति से सम्बन्धित गणित तथा गोले का उल्लेख किया है । भास्कराचार्य ने  ‘सिद्धांतशिरोमणि’ ग्रंथ में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के बारे में  ‘पृथ्वी आकाशीय पदार्थों को विशिष्ट शक्ति से अपनी ओर खींचने के कारण आकाशीय पिण्ड पृथ्वी पर गिरते हैं’। भास्कराचार्य ने करणकौतूहल  ग्रन्थ की  रचना थी। उज्जैन की वेधशाला के अध्यक्ष भास्कराचार्य  थे। भास्कराचार्य के जीवन का उल्लेख गोलध्याये प्रश्नध्याय: श्लोक 61 के अनुसार आसीत सह्यकुलाचलाश्रितपुरे त्रैविद्यविद्वज्जने। नाना जज्जनधाम्नि विज्जडविडे शाण्डिल्यगोत्रोद्विजः॥ श्रौतस्मार्तविचारसारचतुरो निःशेषविद्यानिधि।साधुर्नामवधिर्महेश्‍वरकृती दैवज्ञचूडामणि॥ श्लोक के अनुसार भास्कराचार्य शांडिल्य गोत्र के भट्ट ब्राह्मण  और सह्याद्रि क्षेत्र के विज्जलविड  स्थान के निवासी थे। डॉ. भाऊ दाजी (१८२२-१८७४ ई.) ने महाराष्ट्र के चालीसगाँव से लगभग १६ किलोमीटर दूर पाटण गाँव के एक मंदिर में  शिलालेख की खोज  के अनुसार भास्कराचार्य के पिता का नाम महेश्वर भट्ट  से भास्कराचार्य ने गणित, ज्योतिष, वेद, काव्य, व्याकरण आदि की शिक्षा प्राप्त की थी। भास्कराचार्य द्वारा रचित गोलाध्याय के प्रश्नाध्याय, श्लोक ५८ में उल्लेखनीय है कि  रसगुणपूर्णमही समशकनृपसमयेऽभवन्मोत्पत्तिः। रसगुणवर्षेण मया सिद्धान्तशिरोमणि रचितः॥ अर्थ : शक संवत १०३६ में मेरा जन्म हुआ और छत्तीस वर्ष की आयु में मैंने सिद्धान्तशिरोमणि की रचना की। भास्कराचार्य का जन्म शक – संवत १०३६, अर्थात ईस्वी संख्या १११४ में हुआ था और उन्होंने ३६ वर्ष की आयु में शक संवत १०७२, अर्थात ईस्वी संख्या ११५० में लीलावती की रचना की थी।
भास्कराचार्य ने ग्रंथ करण-कुतूहल की रचना ६९ वर्ष की आयु में ११८३ ई. में की थी। इससे स्पष्ट है कि भास्कराचार्य को लम्बी आयु मिली थी। उन्होंने गोलाध्याय में ऋतुओं का सरस वर्णन किया है । प्राचीन वैज्ञानिक परंपरा को आगे बढ़ाने वाले गणितज्ञ भास्कराचार्य के नाम से भारत ने 7 जून 1979 को छोड़े उपग्रह का नाम भास्कर-1 तथा 20 नवम्बर 1981 को छोड़े प्रथम और द्वितीय उपग्रह का नाम भास्कर-2 रखा है। सन् 1150 ई० में भास्कराचार्य ने संस्कृत भाषा में  सिद्धान्त शिरोमणि ,  पाटीगणिताध्याय या लीलावती, बीजगणिताध्याय, ग्रहगणिताध्याय, तथा गोलाध्याय ,  करणकुतूहल और वासनाभाष्य  तथा भास्कर व्यवहार और भास्कर विवाह पटल ज्योतिष ग्रंथ  हैं।  सिद्धान्तशिरोमणि से भारतीय ज्योतिष शास्त्र का सम्यक् तत्व  है। भास्कराचार्य द्वारा ६९ वर्ष की आयु में  करणकुतूहल में खगोल विज्ञान की गणना  लिखी गयी है । कारण कुतूहल पुस्तक से पंचांग या कैलेंडर का निर्माण किये जाते  है। भास्कर  मौलिक विचारक  एवं प्रथम गणितज्ञ थे  । गुप्तवंशीय ब्रह्मगुप्त काल में भास्कर ने  बीजगणित में गेलोयस, यूलर और लगरांज द्वारा चक्रवात को  `इनवर्स साइक्लिक' कहा था । त्रिकोणमिति के कुछ महत्वपूर्ण सूत्र, प्रमेय तथा क्रमचय और संचय का विवरण  है। अंकगणितीय क्रियाओं का अपरिमेय राशियों में प्रयोग किया। गणित को इनकी सर्वोत्तम देन चक्रीय विधि द्वारा आविष्कृत, अनिश्चित एकघातीय और वर्ग समीकरण के व्यापक हल हैं। भास्कराचार्य के ग्रंथ की अन्यान्य नवीनताओं में त्रिप्रश्नाधिकार की नई रीतियाँ, उदयांतर काल का  विवेचन आदि है।भास्करचार्य को अनंत तथा कलन के कुछ सूत्रों का ज्ञान था।भास्कर को अवकल गणित का संस्थापक कह सकते हैं। उन्होंने इसकी अवधारणा आइज़ैक न्यूटन और गोटफ्राइड लैब्नीज से कई शताब्दियों पहले की थी। भास्कराचार्य पश्चिम में अवकल गणित  के संस्थापक माने जाते हैं। भास्कराचार्य  अपने गोलाध्याय ग्रंथ में 'माध्यकर्षणतत्व' के नाम से गुरुत्वाकर्षण के नियमों की विवेचना की है। ये प्रथम व्यक्ति हैं, जिन्होंने दशमलव प्रणाली की क्रमिक रूप से व्याख्या की है। गोलाध्याय के ज्योत्पत्ति भाग के  श्लोकों में चापयोरिष्टयोर्दोर्ज्ये मिथःकोटिज्यकाहते। त्रिज्याभक्ते तयोरैक्यं स्याच्चापैक्यस्य दोर्ज्यका ॥ २१ ॥ चापान्तरस्य जीवा स्यात् तयोरन्तरसंमिता ॥२१ १/२ ।। भास्कराचार्य ने कैलकुलस पर अमरगति  पहला उल्लेख भास्कराचार्य ने  किया है। भास्कर  यस्तियंत्र नामक एक मापन यंत्र का उपयोग करते थे। 

1 टिप्पणी:

  1. सादर आभार आदरणीय पाठक जी ,इतनी मूल्यवान ,ज्ञानवर्धक जानकारी उपलब्ध कराने हेतु ।

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