बुधवार, नवंबर 04, 2020

मानवीय सभयता का स्थल पशुपति नाथ ...




वैदिक ग्रंथों तथा पौराणिक अख्यानों के अनुसार शैव धर्मावलंवियों के पाशुपत संप्रदाय , लिंगायत संप्रदाय ,नाथ संप्रदाय , वासव संप्रदाय तथा अघोर संप्रदाय का स्थल पशुपतिनाथ है। नेपाल की गंगा बागमती के किनारे निर्मित बाबा पशुपति नाथ मंदिर सनातन धर्मावलंवियों का महान आस्था केन्द्र है ।पशुपतिनाथ मंदिर तथा एतिहासिक स्थलों की परखने और दर्शन के लिए  दिनांक 11 अगस्त 2019 सुबह में मिथिला एक्सप्रेस से जहानाबाद ,मुजफ्फरपुर बेतिया होते हुए से भारत - नेपाल सीमा रक्सौल ( बिहार ) गया । रकसौल से टमटम द्वारा वीररगंज  (नेपाल ) गया । यह नेपाल यात्रा हमारे जीवन का पहला यात्रा दूसरे देश की राजधानी के लिए था । मैंने इसके पहले कभी भी  किसी देश की राजधानी में नहीं गया था । इस कारण से मेरे लिए रोमांचकारी यात्रा था । नेपाल का बीरगंज में बहुत से गाड़ियां काठमांडू के लिए चलती है । वीरगंज (नेपाल )  से बस एवं छोटी गाड़ी द्वारा काठमांडू जाया जा सकता है । मैंने बीरगंज से छोटी गाड़ी से सफर करना बेहतर समझा क्योंकि छोटी गाड़ी कम समय में काठमांडू शार्टकट रास्ते से ले जाती है और बड़ी गाड़ी रात्रि में ज्यादा चलती है और उसका रास्ता थोड़ा ज्यादा दूरी को बनता है छोटी गाड़ी भारतीय मुद्रा में ₹350 में बीरगंज से काठमांडू तक पहुंचा देती है छोटी गाड़ी लेना सही समझा ₹360 देकर के छोटी गाड़ी को मैंने अपना सीट आगे वाला बुक कराया और काठमांडू के लिए निकल पड़ा बीरगंज से काठमांडू के लिए 1:00 बजे दिन में गाड़ी खोला इसके पहले मैंने भारतीय मुद्रा को नेपाली मुद्रा में बदलवाया है ।  नेपाल में दोनों मुद्राए चलती है मगर नेपाली मुद्रा रख लेने से फायदा यह होता है कि किसी को भी देने में सहूलियत होती है भारतीय मुद्रा को नेपाली मुद्रा में बदलने के लिए बॉर्डर पर बहुत सारे लोग मुद्रा को लेकर बैठ जाते हैं ₹1000 को ₹1600देते हैं भारतीय मुद्रा ₹1000 का ₹1600 नेपाली मुद्रा में बदलावाया और गाड़ी 1:00 बजे यहां से चली रास्ते में बहुत सारे पेड़ पौधे नदियां झरन पर्वतें  खुबसुरत वादियां मिले । बीरगंज से काठमांडू  यात्रा करने के दौरान बहुत ही सुंदर  वादियां , काफी ऊंचे ऊंचे पहाड़ , पहाड़ों की वादियों में बसे हुए गांव लोगों का जीवन और होटल  काफी सुंदर है । यहां पर गर्मी बिल्कुल ही नहीं है तकरीबन 8:00 बजे रात में गाड़ी ने  काठमांडू  पहुचने के बाद काठमांडू का गोशाला के पशुपतिनाथ मंदिर के  समीप पहुंचा । जिसे गौशाला मोड कहा जाता है । मैंने ₹1000 में गोशाला स्थित होटल लिया और रात्रि विश्राम किया । 11 अगस्त 2019 को रात्रि विश्राम काठमांडू में लेने के बाद 12 अगस्त 2019  सुबह 5:00 बजे  स्नान ध्यान करके पशुपतिनाथ मंदिर के प्रांगण में प्रवेश किया सुबह में देखा कि यहां पर बहुत ही लंबी लाइन है । लगभग 4 किलोमीटर लंबी लाइन लगा हुआ था । क्योंकि सावन माह का अंतिम सोमवारी था । जिसके कारण देश विदेश के लोग पशुपति नाथ जी का दर्शन करने के लिए आए हुए थे । मैंने भी इस लाइन में अपना जगह बना लिया और पशुपति नाथ जी का दर्शन करने के लिए आगे बढ़ गया घंटों लाइन में खड़े होने के बाद मुझे भी मंदिर में प्रवेश करने का मौका मिला । पशुपतिनाथ के मुख्य मंदिर में कैमरा ले जाना मना था इस कारण से कोई भी अंदर की फोटोग्राफी नहीं कर पाया दर्शन करने के बाद मंदिर प्रांगण में भ्रमण किया जहां छोटे-छोटे बहुत सारे मंदिर बने हुए थे और भगवान शिव का शिवलिंग स्थापित था और इसके अगल बगल में साधुओं का कुटिया बना हुआ  है । साधु की कुटिया देखा और उनके जीवन को समझने का प्रयास किया यहां पर मंदिर के बगल में है बागमती नदी बहती है यहां का दृश्य काफी सुंदर लगा मंदिर में तकरीबन 2 घंटे को भ्रमण किया और जानने और समझने का कोशिश किया कि यह स्थल कैसे विकसित हुआ  होगा । क्योंकि पशुपतिनाथ प्रांगण मंदिर विश्व विरासत सूची में शामिल है और यहां पर देश-विदेश के लाखों श्रद्धालु देखने और पशुपति नाथ जी का दर्शन करते हैं शास्त्रों में कहा गया है कि जो व्यक्ति केदारनाथ का दर्शन किया हो और पशुपतिनाथ का दर्शन ना किया हो तो उसका पुण्य की प्राप्ति नहीं होता है  । मैं दो बार केदारनाथ भी हो चुका हूं और वहां भी दर्शन केदारनाथ में कर चुका । मेरे भी मन में बहुत दिन से  पशुपति नाथ जी का दर्शन करने की लालसा थी ।  मैंने  सालों से प्रयास कर रहा था लेकिन वह कहावत है कि जब जिसकी भगवान की मर्जी होगी तब वह अपने दरबार में बुला लेंगे । मुझे लगता है कि भगवान भोलेनाथ ने मुझे याद किया और मैं पशुपतिनाथ के लिए चला आया बहुत ही खूबसूरत और बेहतरीन है बहुत सारी चीजें हैं मंदिर हैं और मूर्तियां बनी हुई है । जिसे देखने के बाद मन प्रसन्न हो जाता है । काठमांडू पशुपतिनाथ जी का दर्शन जरूर करें और इस मंदिर के प्रांगण का भ्रमण भी जरूर करें । जिससे कि आपको समझ बनता है कि यह मंदिर कितना पुराना और प्राचीन है और यहां का माहौल वातावरण बहुत ही बेहतर है कुछ समय के लिए लगा कि मैं यहीं पर रुक जाऊ  और मगर पापी पेट का सवाल अपने कार्यक्षेत्र पर लौटना भी तो जरूरी है तो मैंने 1:00 बजे तक भ्रमण किया मंदिर प्रांगण का और यहां पर भंडारा चल रहा था उस भंडारे में खाना खाया और कुछ खरीदारी भी किया जैसे यहां का बना हुआ मूर्ति माला प्रसाद इत्यादि । इसके बाद 1:00 बजे गौशाला बस स्टैंड के पास आया और यहां से छोटी गाड़ियां नेपाल के विभिन्न जगहों पर जाने के लिए लगा हुआ था तो मैंने सोचा कि बीरगंज के रास्ते से आया हूं और वहां के नजारा देखा हूं कि बीरगंज से काठमांडू के रास्ते में किस प्रकार के प्राकृतिक नजारे हैं तो क्यों ना काठमांडू से इस बार जनकपुर के लिए जाया जाए ताकि इस रास्ते को भी समझे  और इस रास्ते में किस प्रकार का देखने लायक चीजें तो जनकपुर के लिए मैंने वहां से गाड़ी को छोटी गाड़ी को पकड़ लिया और ₹500 भारतीय मुद्रा में काठमांडू से 2:00 बजे गाड़ी और रात्रि 8:00 बजे जनकपुर पहुंचा दिया यह रास्ता बहुत ही बेहतरीन है  बहुत ही सुंदर बनी हुई है  । नजारे बीच रास्ते में बहुत खूबसूरत बने हुए हैं हिमालय के पर्वत श्रृंखलाओं के बीचो में रास्ते काटकर के बनाए हुए हैं रास्ता अच्छी अवस्था में है और नदी झरने का दर्शन होते हुए जनकपुर आता है काठमांडू से जनकपुर आते के क्रम में ऊंचाई पर एक होटल बना हुआ था । यहां का मौसम काफी ही सुनहरा और सुहावना और ठंडा था वहां पर खाना खाया और आपको बता दू  काठमांडू में मैं पहली बार गया था । यह मेरे जीवन का पहला विदेश यात्रा था किसी भी देश दूसरे देश की राजधानी में गया था तो जानकारी  अभाव था इस कारण से थोड़ा समस्या का सामना भी करना पड़ा लेकिन काठमांडू मुझे बहुत ही अच्छा शहर लगा यहां ठहरने खाने-पीने की व्यवस्था उत्तम है और रोड सड़कें चकाचक है पशुपतिनाथ ट्रस्ट द्वारा बनाया गया एक यहां पर धर्मशाला है । सस्ते  में है 1 दिन का ठहरने का कीमत यहां पर ₹80 है जो कम बजट में अच्छा है व्यवस्था अच्छा है और इसी धर्मशाला के प्रांगण में मारवाड़ी भाषा होटल बना हुआ है जहां पर शुद्ध शाकाहारी भोजन परोसा जाता है और बहुत ही कम शुल्क में  जिन्हें कम बजट में जाना हो और काठमांडू में पशुपतिनाथ जी का दर्शन करना हो इस धर्मशाला में ठहरा जा सकता है । यहां पर अनेक होटल बने हुए हैं । हर बजट का बना हुआ है । काठमांडू जाने के लिए बीरगंज और जनकपुर से फ्लाइट की भी सुविधा है मात्र ₹2555 में फ्लाइट  से  जनकपुर से काठमांडू तक लाता है जो 40 से 50 मिनट का सफर है तो जिनके पास पैसे हैं तो वे फ्लाइट का सहारा ले सकते हैं अगर  मैं यह बात कहूंगा कि काठमांडू जब आए तो फ्लाइट से आए लेकिन लौटे छोटी गाड़ी से ताकि प्राकृतिक नजारा को देखते हुए  की किस तरह से नेपाल हिमालय की गोद में बसा हुआ है और हिमालय में कितनी सुंदर सुंदर वादियां हैं इसके बाद 8:00 बजे रात्रि को काठमांडू से जनकपुर पहुंचा और थके होने के कारण रात्रि विश्राम 12 तारीख को रात्रि विश्राम  जनकपुर में किया । नेपाल की भाषा नेपाली , हिंदी और देवनागरी लिपि है। जनकपुर में नेपाली , हिंदी , मैथिली , मगही  तथा भोजपुरी भाषा है । पत्रकारिता मे समाचार पत्रों की भाषा नेपाली तथा देवनागरी लिपि मे प्रकाशित होते हैं। काठमांडू में 5  नेपाली साहित्यकारों से वार्ता में नेपाली सभ्यता तथा पुरातात्विक विरासत के सबंध मे हुई ।
काठमांडू (नेपाल ) का  पशुपतिनाथ मंदिर विश्व सांस्कृतिक विरासत  है । काठमांडू में  पाशुपत संप्रदाय की नीव लकुलीश डाले थे। लकुलीश भगवान् शिव के 18 अवतारों में माना जाता है । पाशुपत संप्रदाय के अनुयाई को पंचार्थिक कहा जाता हैं। पाशुपत संप्रदाय के श्रीकर पंडित आचार्य थे। ऋग्वेद , अथर्ववेद के अनुसार  भगवान शिव को पशुपति कहा जाता हैं।  मत्स्य, शिव, वामन आदि पुराणों तथा महाभारत अनुशासन पर्व में पशुपति नाथ की उलेख है। शैव धर्म में लिंग पूजा की प्रधानता है। समुद्र तल से 2000 फीट की ऊंचाई पर स्थित नेपाल की राजधानी काठमांडू   बागमती नदी के किनारे देवपाटन वनकाली में वास्तु शास्त्र के अनुसार पगोड़ा शैली में भगवान् पशुपति नाथ मंदिर का निर्माण  सोमदेव राजवंश के पशुप्रेक्ष द्वारा 03 री सदी पूर्व  कराया गया था। पशुपति नाथ चतुर्मुखी शिवलिंग की स्थापना पशुपति नाथ मंदिर के गर्भगृह में की गई है। बाद में 1480 ई. में भक्तपुर, 1566 ई. में ललितपुर में अन्य मंदिर का निर्माण किया गया है। पशुपति नाथ मंदिर कई बार नष्ट हुए ।  15 वीं सदी में मंदिर का जीर्णोद्धार नेपाल का राजा प्रतापमल्ल तथा नरेश भूपतेंद्र मल्ल ने 1697 ई. में कराया था। पशुपति नाथ मंदिर में 4 पुजारी भट्ट तथा मुख्य पुजारी भट्ट रखे गए । पुजारी भट्ट द्वारा पशुपति नाथ की पूजा अर्चना, देख रेख की परंपरा कायम है। मंदिर का दस्तावेज 13 वीं सदी से उपलब्ध हैं। प्राचीन काल में काठमांडू को यल देश, रव्वाप देश, यंबू देश, यांबी देश, यंगला देश तथा काठ मंडप , मेरो पौरख , गौरव कहा जाता था। यहां की भाषा जिगुपौरख़, जिगुगौरव जिगु यें देय , मारुसता तथा नेवार भाषाई की परंपरा 1556 ई. में राजा लक्ष्मीनारायण मल्ल द्वारा कायम की गई थी तथा नेपाल की नेवार संस्कृति का उदय हुआ है। पशुपति नाथ मंदिर के इर्द गिर्द कापालिक संप्रदाय के भैरव, कालामुख संप्रदाय, लिंगायत संप्रदाय, नाथ सम्प्रदाय का प्राचीन स्थल है। यहां पर कापालिक संप्रदाय के अनुयाई नर कपाल में भोजन, पानी, सुरा पान करते हैं और शरीर पर चिता भाष्म मलते है। काठमांडू की परंपरा और ये: , नेवारी और नेपाली भाषा है। यहां पर 17 वीं सदी में राजा प्रतापमल ने कई मंदिर तथा दरबार का निर्माण किया जब कि 5 वीं सदी में भी दरबार बनाए गए थे। सभी दरबार विभिन्न सम्प्रदायों को दिए गए थे। नेपाल की राजधानी काठमांडू से तीन किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में बागमती नदी के किनारे देवपाटन ग्राम में स्थित पशुपति नाथ  मंदिर है। नेपाल के एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनने से पूर्व यह मंदिर राष्ट्रीय देवता, भगवान पशुपतिनाथ का मुख्य निवास माना जाता था। यह मंदिर यूनेस्को विश्व सांस्कृतिक विरासत स्थल की सूची में सूचीबद्ध है। पशुपतिनाथ में आस्था रखने वालों (मुख्य रूप से हिंदुओं) को मंदिर परिसर में प्रवेश करने की अनुमति है। गैर हिंदू आगंतुकों को इसे बाहर से बागमती नदी के दूसरे किनारे से देखने की अनुमति है। यह मंदिर नेपाल में शिव का सबसे पवित्र मंदिर माना जाता है। १५ वीं शताब्दी के राजा प्रताप मल्ल से शुरु हुई परंपरा है कि मंदिर में चार पुजारी भट्ट और एक मुख्य पुजारी मूल-भट्ट दक्षिण भारत के ब्राह्मणों में से रखे गये हैं। पशुपतिनाथ में शिवरात्रि पर्व विशेष महत्व के साथ मनाया जाता है । नेपाली संबत कार्तिक मास अमावस्या दीपावली का नया वर्ष का प्रारंभ है। नेपाली गीत ,विचार प्रिय रहता है ।



सोमवार, नवंबर 02, 2020

मानवीय उत्थान का द्योतक कुल देवी और कुल देवता ...


मानवीय मूल्यों की आत्मा कुलदेवता और कुल देवी के रूप में अंगिकार किया गया है । इस संसार में अनेक सम्प्रदाय, धर्म में सौर धर्म, शाक्त धर्म, शैव धर्म, वैष्णव धर्म, ब्राह्मण धर्म, भागवत धर्म, बौद्ध धर्म, जैंन धर्म, सिख धर्म, यहूदी धर्म, ईसाई धर्म, यवन धर्म, ईस्लाम धर्म तथा अनेक सम्प्रदाय का उदय हुआ ज़िसमें कुलदेवता और कुल देवी की याद में व्यक्ति द्वारा अपने परिवार के साथ मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए तत्पर रहते हैं । यहां की संस्कृति एवं सभ्यता का प्रादूर्भाव कुलदेवता और कुल देवी द्वारा ही संभव हो पाया है । भारतीय पौराणिक ग्रंथ पुराणों, उपनिषद, रामायण, महाभारत, गीता, रामायण, महाभारत, वेदों में कुल देव और देवी का स्थान सर्वोपरि है । व्यक्ति अपने परिवार के साथ मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए भारतीय संस्कृति में प्रत्येक वर्ष आश्विन माह की कृष्ण पक्ष कुलदेवता और देवी को समर्पित किया है जिसमें पितृपक्ष में पितरों को तर्पण कर पिण्ड अर्पित कर याद करते हैं । व्यक्ति  के स्थानांतरित होकर कहीं और बस जाने के कारण अथवा संयुक्त परिवार के विघटन या अलग शहरों में रहने की परंपरा अथवा आधुनिकता की दौड़ में मूल संस्कार भूलने की परंपरा से बहुत अधिक लोगों और परिवारों को यह तक पता नहीं है की उनके कुलदेवता या कुलदेवी कौन हैं ,| इनकी कैसे पूजा होती है यह तो बाद की बात है |ऐसे में जब यह लोग समस्याओं में घिरते हैं ,पतन को प्राप्त होते हैं ,परिवार खराब होने लगता है तब खोज शुरू होती है कारण की और तब कुलदेवता /कुलदेवी की याद आती है जो उन्हें नहीं पता होता है |भारतीय परंपरा में कुलदेवता एक अहम् कड़ी होते हैं क्योंकि यहाँ साकार ईष्ट /देवी .पित्र ,वैदिक ज्योतिष ,साकार ईष्ट परिकल्पना ,विभिन्न धार्मिक क्रियाएं सनातन ब्रह्मांडीय सूत्रों पर आधारित विज्ञान हैं जिन्होंने हमें वह उन्नति दी है जिससे  सूत्रों पर ऊर्जा का उपयोग होता है । मनुष्य को सुखी और संतुष्ट बनाते हैं |कुलदेवता /देवी इन सूत्रों की एक कड़ी हैं जिन्हें आधुनिक लोग भूल गए |कुलदेवता /देवी की असंतुष्टि या पूजा न होने या इनके रुष्ट होने से तीन तरह के परिणाम एक साथ आते हैं जो पतन ,तबाही और कष्ट के कारण बन जाते हैं | पहला यह की आप कोई भी पूजा -अनुष्ठान -जप करें या कराएं वह आपके उस ईष्ट तक नहीं पहुँचता भले आप खुद को सांत्वना दें की पूजा ईष्ट तक पहुँच रही |कोई भी पूजा -आराधना कुलदेवता /देवी द्वारा ही ईष्ट तक पहुँचती है और यह मनुष्य तथा ईश्वर के बीच की कड़ी होते हैं |दूसरा आपके पित्र लोग स्थायी रूप से असंतुष्ट हो जाते हैं और स्थायी पित्र दोष परिवार में उत्पन्न हो जाता है क्योंकि पित्र लोग कुलदेवता /देवी को पूजते आये होते हैं ,उन्होंने इन्हें स्थान दिया होता है अतः वह असंतुष्ट हो जाते हैं |पितरों की संतुष्टि के लिए किया गया कोई कार्य सफल नहीं होता क्योंकि उन्हें जिन देवताओं के माध्यम से तृप्ति मिलती है उन तक पूजा नहीं पहुँचती | तीसरा परिणाम कुलदेवता की रुष्टता या अनुपस्थिति से यह आता है की परिवार और व्यक्तियों की सुरक्षा समाप्त हो जाती है जिससे कोई भी नकारात्मक ऊर्जा ,हानिकारक शक्ति ,तांत्रिक अभिचार ,किया -कराया ,टोना -टोटका ,बाधा आदि सीधे परिवार और लोगों को प्रभावित करने लगता है |इनसे बचाने वाली कोई शक्ति नहीं होती |भूत -प्रेत जैसी वायव्य बाधाएं बेरोकटोक घर में आ सकती हैं या प्रभावित कर सकती हैं |कुलदेवता /देवी की अनुपस्थिति या रुष्टता से खानदान में गया श्राद्ध ,नाशिक या हरिद्वार श्राद्ध आदि की प्रक्रियाएं कर देने पर भी पित्र दोष के प्रभाव समाप्त नहीं होते |आपके ईष्ट तक आपकी पूजा नहीं पहुँचती जिससे आपके सारे पूजा -पाठ व्यर्थ जाते हैं |आपकी मुक्ति का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है |पित्र दोष की उपस्थिति वाली समस्त समस्याएं अपने आप उपस्थित होती रहती हैं चूंकि इनका सीधा सम्बन्ध पितरों से होता है ,जैसे -मानसिक अवसाद होता है ,चिंताएं घेरे रहती हैं |व्यापार में नुक्सान होता है ,सबकुछ ठीक लगने पर भी उपयुक्त आय नहीं होती |अनायास हानि हो जाती है |धोखा मिलता है |परिश्रम के अनुसार फल नहीं मिलता ,उन्नति के मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं |सभी प्रकार की योग्यता ,क्षमता होने पर भी उपयुक्त उन्नति नहीं होती |वैवाहिक जीवन में समस्याएं,अथवा विवाह न होना ,विवाह बाद भी अलगाव हो जाना ,जीवनसाथी के साथ कलहपूर्ण जीवन होना है  ।कुलदेवता की अनुपस्थिति में  अनुकूल ग्रहों की स्थिति ,गोचर ,दशाएं होने पर भी शुभ फल नहीं मिल पाते, कितना भी पूजा पाठ ,देवी ,देवताओं की अर्चना की जाए , उसका शुभ फल नहीं मिल पाता |क्योंकि देवताओं तक उपाय और पूजा नहीं पहुँचता |आय -व्यय में सदैव असंतुलन बना रहता है | मांगलिक कार्यों में बाधा आती है |बच्चों के विवाह नहीं हो पाते |उनकी उच्च शिक्षा में बाधा आती है |उनका दाम्पत्य जीवन सुखी नहीं होता | अनायास के खर्चे आते हैं |दुर्घटनाएं और बीमारियाँ होती है |बिना किसी उपयुक्त कारण के गंभीर बीमारी हो जाती है या ऐसी बीमारी हो जाती है जो चिकित्सकीय रूप से बीमारी ही नहीं होती या चिकित्सक पकड नहीं पाते की समस्या कहाँ और क्या है |व्यापार /व्यवसाय में लगाया हुआ रुपया डूब जाता है |व्यवसाय बंद हो जाता है या हानि के कारण अथवा विवाद के कारण बंद करना पड़ जाता है | प्रापर्टी ,जमीन -जायदाद विवाद में फंस जाती है |अनावश्यक मुकदमे ,विवाद का सामना करना पड़ता है | घर में घुसते ही सर भारी हो जाता है |पूजा -पाठ का कोई परिणाम भी नहीं मिलता और स्थितियां जटिल ही होती जाती हैं |अनायास और अनावश्यक कर्ज की स्थिति उत्पन्न होती है संतानें विकारयुक्त और भाग्य में पित्र दोष लिए उत्पन्न होती हैं |इस कारण खानदान पतन की ओर अग्रसर हो जाता है |कुछ पीढ़ियों बाद खानदान का नाम लेने वाला तक नहीं बचता |ऐसी संताने उत्पन्न होती हैं जो खानदान को कलंकित करती हैं ,दुर्व्यसनी ,दुर्जन होती हैं जिन्हें समाज तिरस्कृत कर देता है और जो दंड पाती हैं |अंततः विनष्ट हो जाता है परिवार अथवा बिखर जाता है |कोई बाहरी शक्तिशाली शक्ति घर में स्थायी वास बना सकती है ,किये जा रहे पूजा पाठ लेकर अपनी शक्ति बढ़ा सकती है ,फिर घर -परिवार पर मनमानी कर सकती है अथवा अपनी तृप्ति करवा सकती है |पीढ़ियों तक स्थायी हो पूरे खानदान को तबाह कर सकती है अथवा देवता का स्थान ले सकती है |
   कुलदेवता का यदि पता हो तो सम्पूर्ण पूजन प्रक्रिया परम्परानुसार ही होनी चाहिए किन्तु यदि बहुत कोशिश पर भी उनका पता न लगे  तब या करने पर  कुलदेवता ,पित्र की संतुष्टि होती है और नकारात्मक शक्तियाँ हटती हैं |यह प्रक्रिया एक साथ तीनो क्षेत्रों में कार्य करती है चूंकि तीनो तरह की समस्याएं एक दूसरे से जुडी होती हैं |इसमें प्रथमतः कुलदेवता और देवी दोनों की स्थापना आवश्यक होती है क्योंकि यह पता नहीं होता की खानदान में कुलदेवता की परंपरा रही है या कुलदेवी की |किसी सिद्ध व्यक्ति या तांत्रिक -पंडित से इनका पता लगाना अँधेरे में तीर मारने जैसा होता है । क्योंकि कुलदेवता और देवी स्थानीय परम्परानुसार स्थानिक शतियों के रूप में पूजनीय है । इसके लिए दो चांदी की सुपारियाँ बनवानी होती हैं जिनमे एक पर मौली या कलावे के तीन घेरे बना उन्हें कुलदेवता के रूप में स्थापित किया जाता है और दुसरे सुपारी को मौली या कलावे से पूर्ण रूप से वेष्ठित कर उन्हें कुलदेवी के रूप में स्थापित किया जाता है |तात्कालिक रूप से इनकी पूजा विधिवत कर इन्हें अपने कुलानुसार भोज्य आदि प्रदान किया जाता है और इन्हें किसी डिब्बी आदि में अगले दिन रख दिया जाता है | मूल पूजा हर नवरात्र में इनकी होती है जिसके लिए पूर्ण पूजन  प्रक्रिया दो चरण की है जिनमे कुलदेवता /देवी की इस स्थापना के साथ एक ऐसी ऊर्जा की भी स्थापना करनी होती है । कुलदेवता /देवी की शक्ति को भी बढाए और नकारात्मक ऊर्जा भी हटाये |इस हेतु एक डिब्बी जिसे दिव्य गुटिका कहते हैं की भी स्थापना कुछ वर्ष के लिए होती है |  प्रक्रिया के बाद पित्र शान्ति ,विभिन्न -पूजा -पाठ ,अभिचार मुक्ति आदि के लिए पूजा पाठ आवश्यक नहीं होते यद्यपि इच्छानुसार कोई कुछ भी करा सकता है |इस प्रक्रिया में किसी बाहरी व्यक्ति और पंडित -तांत्रिक आदि की भी कोई आवश्यकता नहीं होती हैै। कुलदेवता की स्थापना के साथ ही सबसे अधिक ध्यान देना होता है नकारात्मक शक्तियों उर्जाओं पर और अकाल मृत्यु को प्राप्त पितरों पर |इन पितरों के साथ जुडी बाहरी शक्तियों पर  कुलदेवता /देवी की अनुपस्थिति में यह शक्तिशाली हो गए होते हैं और इन्हें कुलदेवता /देवी की स्थापना से दिक्कत होती है जबकि कुलदेवता /देवी में अभी बहुत ऊर्जा नहीं होती क्योंकि ऊनकी तो अभी स्थापना ही हुई है |उनकी ऊर्जा बढने में समय लगता है जबकि नकारात्मक शक्तियों आदि में विक्षोभ तुरंत शुरू हो जाता है ।  ऐसी शक्ति घर में उत्पन्न करनी होती है जो कुलदेवता /देवी को भी बल दे ,पित्र को संतुष्ट करें ,अकाल मृत्यु को प्राप्त पितरों ,बाहर से आई शक्तियों और नकारात्मक शक्तियों की ऊर्जा का ह्रास करता है  ,जिसमे 25 तरह की दुर्लभ तांत्रिक वस्तुएं हैं तथा जो काली ,चामुंडा ,लक्ष्मी ,शिव ,गणेश का प्रतिनिधित्व करते हैं | सभी कुलदेवता /देवी शिव परिवार से ही सम्बन्धित होने से इस डिब्बी के पूजन से कुलदेवता /देवी को बल मिलता है |दिव्य गुटिका विशेषतः नकारात्मक ऊर्जा हटाने और उग्र दैवीय शक्तियों की ऊर्जा /शक्ति बढाने का कार्य करती है जिससे कुलदेवता /देवी की संतुष्टि होती है ,उन्हें बल मिलता है |नकारात्मक शक्तियों का ह्रास होता है |पित्र संतुष्ट होते हैं ,जो अतृप्त पित्र और बाधाएं हैं उनके दुष्प्रभाव का शमन होता है |अतः कुलदेवता /देवी की स्थापना के साथ ही डिब्बी की भी स्थापना करनी होती है |इस डिब्बी की कम से कम 5 वर्ष पूजा होनी चाहिए जब तक की कुलदेवता /देवी शक्ति न प्राप्त कर लें और पुनः अपना स्थान न ले लें |इसके बाद इसे हटाया जा सकता है ,यद्यपि इसके लाभ इतने अधिक हैं और इसका क्षेत्र इतना व्यापक है की इसे कोई जीवन भर नहीं हटाना चाहेगा | कुलदेवता  की पूजा एक बार अभी करने के बाद मात्र नवरात्र -नवरात्र ही होगी |कुलदेवता /देवी की स्थापना पूजन गृह में नहीं होगी चूंकि इनको जलाया दीपक कन्याएं नहीं देखती जिनका विवाह कल को दुसरे कुलों और गोत्रों में होना है | इन्हें अलग डिब्बी में सुरक्षित रख दिया जाता है और नवरात्र -नवरात्र निकाल इनकी पूजा की जाती है |  कुलदेवता /देवी की स्थापना और दिव्य गुटिका के पूजन से कुलदेवता /देवी की समस्या का स्थायी निदान हो जाता है और वह स्थायी रूप से परिवार से जुड़ जाते हैं |पित्रर दोष समाप्त हो पित्रर संतुष्टि होती है तथा सभी नकारात्मक शक्तियों ,उर्जाओं ,अभिचार ,किये कराये ,टोन टोटके से बचाव होता है |अतः जो लोग कुलदेवता /देवी को भूल चुके हैं या जिनको कुलदेवता देवी का पता न लग रहा हो वह इस प्रक्रिया को अपना अपने कुलदेवता /देवी की स्थापना कर उनकी कृपा पुनः प्राप्त कर सकते हैं | भारतीय संस्कृति और सभ्यता की प्रचीन परम्पराओं में कुल देव और देवी दोनों की आराधना का मूलभूत रूप दिया गया है । मनुमय सृष्टि 1955885121वर्ष के दौरान प्रकृति की उपासाना का संकल्प लिया गया है । इस अवसर पर कुलदेवता की स्थापना की गई थी । वैवश्वत मनु के पुत्र राजा करूष, शर्याती, गय तथा राजा इक्ष्वाकु वंशीय, सोम वंशीय, चन्द्र वंशीय, सूर्य वंशीय शाक्य वंशीय  राजाओं में भगवान राम और कृष्ण, बुद्ध, महर्षि वशिष्ठ, विश्वामित्र, भारद्वाज, अगस्त, च्यवन, कश्यप, वत्स, मिहिर, मयूर, चाणक्य, कुन्ती, साम्ब आदि कुल है ।  व्यक्ति अपने पूर्वजों की याद कुल देवता और कुल देवी की उपासना शादी व्याह तथा पितरपछ में करते है ।सनातन धर्म में शुभ कार्यों मे यथा शादी व्याह मे कुल देवी और कुलदेवता को नान्दी मुख श्राद्ध , पूजा अर्चना उपासना करते है ।आधुनिक काल में अपने पूर्वजों को पूण्य दिवस के रूप मे श्रद्धा सुमन अर्पित करते है । विश्व मे विभिन्न धर्मावलंबी अपने पूर्वजों की याद भि्न्न तरीके से श्रद्धा सुमन , दीप प्रज्वलित , कैण्डल , अगरबत्ती जला कर उपासना करते है ।
सत्येन्द्र कुमार पाठक 
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