भारतीय संस्कृति में दिव्य ज्ञान एवं सामाजिक जीवन को सफलता का विशेष उल्लेख किया गया है । कजरी तीज स्त्रियों की संकल्पित और मनोकामनाएं पूर्ण भावनाएं समर्पित है । कजरी तीज के दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयू के लिए व्रत रखती है और अविवाहित लड़कियां इस पर्व पर अच्छा वर पाने के लिए व्रत रख कर जौ, चने, चावल और गेंहूं के सत्तू में घी और मेवा मिलाकर भोजन बनाते हैं। चंद्रमा की पूजा करने के बाद उपवास तोड़ते हैं। कजरी तीज के दिन गायों की पूजा की जाती है। साथ ही इस दिन घर में झूले लगाते है और महिलाएं इकठ्ठा होकर नाचती है और गाने गाती हैं। कजरी उत्सव पर नीम की पूजा कर चाँद को अर्घ्य देने की परंपरा हैं । भाद्रपद कृष्ण पक्ष तृतीय को कजरी तीज , बड़ी तीज, सातुड़ी तीज , कृष्ण तीज महिलाएं एवं लड़कियों द्वारा मनाई जाती है । माता पार्वती की पूजा कर महिलाएं कजरी तीज पर अखंड सौभाग्यवती एवं कुँवारी लड़कियां अच्छे वर के लिये , चतुर्दिक विकास प्राप्ति के लिए ब्रत रखती है । 108 जन्म लेने के बाद देवी पार्वती भगवान शिव से शादी करने में सफल हुई। कजरी तीज निस्वार्थ प्रेम के सम्मान के रूप में मनाया जाता है ।पौराणिकता के अनुसार, कजली घने जंगल क्षेत्र का राजा दादूरई द्वारा शासित था। कजली के लोग कजली गाने गाते थे ।कजली का राजा दादूरई का निधन होने के बाद उनकी पत्नी रानी नागमती ने खुद को सती में अर्पित कर दिया। नागमती द्वारा अपने पति कजली का राजा दादुरई के सती होने के स्थान कजली स्थान पर लोगों ने रानी नागमती को सम्मानित करने के लिए राग कजरी मनाना प्रारम्भ कर दिया था ।माता पार्वती भगवान् शिव की उपासना की थी। भगवान शिव ने पार्वती की भक्ति साबित करने के लिए कहा। पार्वती ने शिव द्वारा स्वीकार करने से पहले, 108 साल एक तपस्या करके माता पार्वती द्वारा भक्ति साबित की गयी थी ।भगवन शिव और पार्वती का दिव्य ज्ञान भाद्रपद महीने के कृष्णा पक्ष के दौरान हुआ था। बूंदी रियासत में गोठडा के राजा ठाकुर बलवंत सिंह के भरोसे वाले जांबाज सैनिक भावना से ओतप्रोत थे। राजा ठाकुर बलवंत सिंह द्वारा जयपुर के चहल-पहल वाले मैदान से तीज की सवारी, शाही तौर-तरीकों से निकल रही थी। ठाकुर बलवंत सिंह हाडा अपने जांबाज साथियों के पराक्रम से जयपुर की तीज को गोठडा ले आए थे ।कजली तीज माता की सवारी गोठडा में निकलने लगी। ठाकुर बलवंत सिंह की मृत्यु के बाद बूंदी के राव राजा रामसिंह उसे बूंदी ले आए और केवल से उनके शासन काल में तीज की सवारी भव्य रूप से निकलने लगी। इस सवारी को भव्यता प्रदान करने के लिए शाही सवारी भी निकलती थी। सैनिकों द्वारा शौर्य का प्रदर्शन किया गया था। सुहागिनें सजी-धजी व लहरिया पहन कर तीज महोत्सव में चार चाँद लगाती थीं। इक्कीस तोपों की सलामी के बाद नवल सागर झील के सुंदरघाट से तीजाइड प्रमुख रेस्तरां से होती हुई रानी जी की बावड़ी तक जाती थी। वहाँ पर सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। नृत्यांगनाएँ अपने नृत्य से दर्शकों का मनोरंजन करती थीं। करतब दिखाने वाले कलाकारों को सम्मानित किया जाता था और प्रशिक्षण का आत्मीय स्वागत किया जाता था। मान-सम्मान और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बाद तीज सवारी वापिस राजमहल में लौटती थी। दो दिवसीय तीज सवारी के अवसर पर विभिन्न प्रकार के जन मनोरंजन कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते थे, जिनमें दो मदमस्त हाथियों का युद्ध होता था, जिसे देखने वालों की भीड़ उमड़ती थी। पार्वतीजी स्वरूप कजली तीज माता का आशीर्वाद मिलता रहा।श्रही सवारी भी निकलती थी। इसमें बूंदी रियासत के जागीरदार, ठाकुर व धनाढय लोग अपनी परम्परागत पोशाक पहनकर पूरी शानो-शौकत के साथ भाग लिया करते थे। सैनिकों द्वारा शौर्य का प्रदर्शन किया गया था।सुहागिनें सजी-धजी व लहरिया पहन कर तीज महोत्सव में चार चाँद लगाती थीं। इक्कीस तोपों की सलामी के बाद नवल सागर झील के सुंदरघाट से तीजाइड प्रमुख रेस्तरां से होती हुई रानी जी की बावड़ी तक जाती थी। वहाँ पर सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। नृत्यांगनाएँ अपने नृत्य से दर्शकों का मनोरंजन करती थीं। करतब दिखाने वाले कलाकारों को सम्मानित किया जाता था और प्रशिक्षण का आत्मीय स्वागत किया जाता था। मान-सम्मान और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बाद तीज सवारी वापिस राजमहल में लौटती थी। दो दिवसीय तीज सवारी के अवसर पर विभिन्न प्रकार के जन मनोरंजन कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते थे । कजरी तीज व्रत में शाम के समय में चद्रंमा को अर्ध्य देने के बाद ही कुछ खाया पीया जाता हैं। व्रत को सुहागन स्त्रियां अपने पति की लंबी उम्र के लिए एवं कुंवारी कन्याएं सुयोग्य वर पाने के लिए करती हैं। पौराणिक कथा के अनुसार भारत के मध्य भाग में कजली नाम का एक वन का राजा दादुरै था। राज्य में लोग अपने राज्य के नाम कजली पर गीत गाया करते थे। राज दादुरै की मृत्यु हो गई।जिसके बाद रानी नागमती सती हो गई। राजा और रानी के बाद उनकी प्रजा पूरी तरह से दुख में डूब गई। इसी कारण कजली के गीत पति और पत्नि के जन्म- जन्म के साथ के लिए गाए जाते हैं। लोकप्रिय कथा के अनुसार माता पार्वती भगवान शिव को पति रूप में पाना चाहती थी।लेकिन भगवान शिव ने उनके सामने एक शर्त रखी। जिसके अनुसार माता पार्वती को अपनी भक्ति और प्रेम सिद्ध करना था।जिसके बाद माता पार्वती ने 108 सालों तक भगवान शिव की तपस्या की और भगवान शिव को परीक्षा दी।जिसके बाद भगवान शिव ने माता पार्वती को इसी तीज पर अपनी पत्नी स्वीकार किया था। इसी कारण से इसे कजरी तीज भी कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार बुढ़ी तीज पर सभी देवी- देवता माता पार्वती और भगवान शिव की आराधना करते हैं। कजरी तीज में महिलाएं झूला झूलकर अपनी खुशी व्यक्त करती हैं। कजरी तीज के दिन सभी औरतें एक साथ होकर नाचती है और कजरी तीज के गीत गाती हैं। वाराणासी और मिर्जापुर में कजरी तीज के गीतों को वर्षागीतों के साथ गाया जाता है। राजस्थान के बूंदी शहर में तो इसे बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन ऊंट और हाथी की सवारी की जाती है। इसके साथ ही यहां पर लोक गीत कजरी तीज के दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयू के लिए व्रत रखती है और अविवाहित लड़कियां इस पर्व पर अच्छा वर पाने के लिए व्रत रखती हैं। इस दिन जौ, चने, चावल और गेंहूं के सत्तू बनाये जाते है और उसमें घी और मेवा मिलाकर कई प्रकार के भोजन बनाते हैं। चंद्रमा की पूजा करने के बाद उपवास तोड़ते हैं। कजरी तीज के दिन गायों की पूजा की जाती है। साथ ही इस दिन घर में झूले लगाते है और महिलाएं इकठ्ठा होकर नाचती है और गाने गाती हैं। कजरी उत्सव पर नीम की पूजा कर चाँद को अर्घ्य देने की परंपरा हैं । भाद्रपद कृष्ण पक्ष तृतीय को कजरी तीज , बड़ी तीज, सातुड़ी तीज , कृष्ण तीज महिलाएं एवं लड़कियों द्वारा मनाई जाती है । माता पार्वती की पूजा कर महिलाएं कजरी तीज पर अखंड सौभाग्यवती एवं कुँवारी लड़कियां अच्छे वर के लिये , चतुर्दिक विकास प्राप्ति के लिए ब्रत रखती है । 108 जन्म लेने के बाद देवी पार्वती भगवान शिव से शादी करने में सफल हुई। कजरी तीज निस्वार्थ प्रेम के सम्मान के रूप में मनाया जाता है ।पौराणिकता के अनुसार, कजली घने जंगल क्षेत्र का राजा दादूरई द्वारा शासित था। कजली के लोग कजली गाने गाते थे ।कजली का राजा दादूरई का निधन होने के बाद उनकी पत्नी रानी नागमती ने खुद को सती में अर्पित कर दिया। नागमती द्वारा अपने पति कजली का राजा दादुरई के सती होने के स्थान कजली स्थान पर लोगों ने रानी नागमती को सम्मानित करने के लिए राग कजरी मनाना प्रारम्भ कर दिया था ।माता पार्वती भगवान् शिव की उपासना की थी। भगवान शिव ने पार्वती की भक्ति साबित करने के लिए कहा। पार्वती ने शिव द्वारा स्वीकार करने से पहले, 108 साल एक तपस्या करके माता पार्वती द्वारा भक्ति साबित की गयी थी ।भगवन शिव और पार्वती का दिव्य ज्ञान भाद्रपद कृष्ण तृतीया पक्ष को हुआ था। बूंदी रियासत में गोठडा के राजा ठाकुर बलवंत सिंह के भरोसे वाले जांबाज सैनिक भावना से ओतप्रोत थे। राजा ठाकुर बलवंत सिंह द्वारा जयपुर के चहल-पहल वाले मैदान से तीज की सवारी, शाही तौर-तरीकों से निकल रही थी। ठाकुर बलवंत सिंह हाडा अपने जांबाज साथियों के पराक्रम से जयपुर की तीज को गोठडा ले आए थे ।कजली तीज माता की सवारी गोठडा में निकलने लगी। ठाकुर बलवंत सिंह की मृत्यु के बाद बूंदी के राव राजा रामसिंह उसे बूंदी ले आए और केवल से उनके शासन काल में तीज की सवारी भव्य रूप से निकलने लगी। इस सवारी को भव्यता प्रदान करने के लिए शाही सवारी भी निकलती थी। सैनिकों द्वारा शौर्य का प्रदर्शन किया गया था। सुहागिनें सजी-धजी व लहरिया पहन कर तीज महोत्सव में चार चाँद लगाती थीं। इक्कीस तोपों की सलामी के बाद नवल सागर झील के सुंदरघाट से तीजाइड प्रमुख रेस्तरां से होती हुई रानी जी की बावड़ी तक जाती थी। वहाँ पर सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। नृत्यांगनाएँ अपने नृत्य से दर्शकों का मनोरंजन करती थीं। करतब दिखाने वाले कलाकारों को सम्मानित किया जाता था और प्रशिक्षण का आत्मीय स्वागत किया जाता था। मान-सम्मान और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बाद तीज सवारी वापिस राजमहल में लौटती थी। बूंदी रियासत के जागीरदार, ठाकुर व धनाढय लोग अपनी परम्परागत पोशाक पहनकर पूरी शानो-शौकत के साथ भाग लिया करते थे। सैनिकों द्वारा शौर्य का प्रदर्शन किया गया था।सुहागिनें सजी-धजी व लहरिया पहन कर तीज महोत्सव में चार चाँद लगाती थीं। इक्कीस तोपों की सलामी के बाद नवल सागर झील के सुंदरघाट से तीजाइड प्रमुख रेस्तरां से होती हुई रानी जी की बावड़ी तक जाती थी। नृत्यांगनाएँ अपने नृत्य से दर्शकों का मनोरंजन करती थीं। मान-सम्मान और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बाद तीज सवारी वापिस राजमहल में लौटती थी। कजरी तीज व्रत में शाम के समय में चद्रंमा को अर्ध्य देने के बाद अन्न ग्रहण किया जाता हैं। व्रत को सुहागन स्त्रियां अपने पति की लंबी उम्र के हेतु एवं कुंवारी कन्याएं सुयोग्य वर पाने के लिए करती है ।शास्त्रों के अनुसार बुढ़ी तीज पर देवी- देवता माता पार्वती और भगवान शिव की आराधना करते हैं। कजरी तीज में महिलाएं झूला झूलकर खुशी व्यक्त करती हैं। कजरी तीज के दिन औरतें एक साथ होकर नाचती है और कजरी तीज के गीत गाती हैं। कजली गानों को विशेष महत्व दिया जाता है। कजली गीत के गाने ढोलक और मंजीरे के साथ गाए जाते हैं। कजरी तीज के दिन गाय की विशेष पूजा और आंटे की 7 रोटियां बनाकर गाय को गुड़ और चने के साथ खिलाई जाती है । राजस्थान , झारखंड ,छत्तीसगढ़ , उतरप्रदेश,बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड ,आदि राज्यों में मनाया जाता है। बिहार और उत्तर प्रदेश में कजरी गीत को नाव पर एवं वाराणासी और मिर्जापुर में कजरी तीज के गीतों को वर्षागीतों के साथ गाया जाता है। राजस्थान में कजरी त्यौहार को बूंदी शहर में ऊंट और हाथी की सवारी एवं लोक गीत और नृत्य किया जाता है ।
मन की गति के प्रति ध्यान से उपलब्ध ज्योति को प्रकाश की ओर अग्रसर होने की प्रक्रिया मगध ज्योति है। विश्व , भारतीय और मागधीय सांस्कृतिक, सामाजिक , शैक्षणिक तथा पुरातात्विक महत्व की चेतना को जागृत करना मगध ज्योति है ।
सोमवार, अगस्त 23, 2021
शनिवार, अगस्त 21, 2021
संस्कृत : संस्कृति का द्योतक...
विश्व वाङ्गमय और भारतीय मानवीयता की आईना संस्कृत में मिलती है । संस्कृति चेतना एवं भाषा विकास का मूल संस्कृत है ।श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को विश्व संस्कृत दिवस मनाया जाता है । संस्कृत की प्राचीन भाषा और सांस्कृतिक चेतना की भाषा है । भारत सरकार ने वर्ष 1969 में श्रवण शुक्ल पूर्णिमा व रक्षा बंधन के अवसर पर विश्व संस्कृत दिवस मनाने का फैसला किया था । विश्व की पुरानी भाषाओं में संस्कृत भाषा हिंदी, गुजराती और बंगाली सहित संस्कृत में मिलती हैं। इंडो-आर्य भाषा संस्कृत की उत्पत्ति 3500 ई.पू. भारत में हुई थी।संस्कृत लिखित रूप में संस्कृत भाषा की उत्पत्ति 2 वीं सहस्त्राब्दी ई. पू . ऋग्वेद, भजनों का संग्रह लिखा गया था। भारत में प्रतिवर्ष श्रावणी पूर्णिमा के पावन अवसर को संस्कृत दिवस के रूप में मनाया जाता है। रक्षा बन्धन ऋषियों के स्मरण तथा पूजा और समर्पण का पर्व माना जाता है। वैदिक साहित्य में श्रावणी कहा जाता था। गुरुकुलों में वेदाध्ययन कराने से पहले यज्ञोपवीत धारण कराया जाता है। इस संस्कार को उपनयन अथवा उपाकर्म संस्कार कहते हैं । ऋषि ही संस्कृत साहित्य के आदि स्रोत हैं, इसलिए श्रावणी पूर्णिमा को ऋषि पर्व और संस्कृत दिवस के रूप में मनाया जाता है। राज्य तथा जिला स्तरों पर संस्कृत दिवस आयोजित किए जाते हैं। 1969 ई. में भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के आदेश से केन्द्रीय तथा राज्य स्तर पर संस्कृत दिवस मनाने का निर्देश जारी किया गया था। भारत में संस्कृत दिवस श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। प्राचीन भारत में शिक्षण सत्र शुरू , वेद पाठ का आरंभ और छात्र शास्त्रों के अध्ययन का प्रारंभ किया करते थे। गुरुकुलों में श्रावण पूर्णिमा से वेदाध्ययन प्रारम्भ किया जाता है । संस्कृत दिवस के रूप से मनाया जाता है। आजकल देश में ही नहीं, विदेश में भी संस्कृत उत्सव बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इसमें केन्द्र तथा राज्य सरकारों का भी योगदान उल्लेखनीय है। जिस सप्ताह संस्कृत दिवस आता है, वह सप्ताह कुछ वर्षों से संस्कृत सप्ताह के रूप में मनाया जाता है। सीबीएसई विद्यालयों और देश के समस्त विद्यालयों में इसे धूमधाम से मनाया जाता है। उत्तराखण्ड में संस्कृत आधिकारिक भाषा घोषित होने से संस्कृत सप्ताह में प्रतिदिन संस्कृत भाषा में अलग अलग कार्यक्रम व प्रतियोगिताएं होती हैं। संस्कृत के छात्र-छात्राओं द्वारा ग्रामों अथवा शहरों में झांकियाँ निकाली जाती हैं। संस्कृत दिवस एवं संस्कृत सप्ताह मनाने का मूल उद्देश्य संस्कृत भाषा का प्रचार प्रसार करना है। संस्कृत दिवस प्रत्येक वर्ष श्रावण पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस वर्ष संस्कृत दिवस 2021 में 22 अगस्त को मनाया जाएगा। संस्कृत दिवस और रक्षा बंधन का त्योहार एक साथ मनाया जाता है। भारत में संस्कृत भाषा की उत्पत्ति लगभग 4 हजार साल पहले हुई। सनातन संस्कृति में संस्कृत के मंत्रों को उपयोग सैकड़ों वर्षों से किया जा रहा है। संस्कृत का अर्थ दो शब्दों से मिलकर बना है, 'सम' का अर्थ है 'संपूर्ण' और 'कृत' का अर्थ है 'किया हुआ' को शब्द मिलकर संस्कृत शब्द की उतपत्ति करते हैं। भारत में वेदों की रचना 1000 से 500 ईसा पूर्व की अवधि में हुई। वैदिक संस्कृति में ऋग्वेद, पुराणों और उपनिषदों का बहुत महत्व है। वेद अलग-अलग चार खंडों में ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद शामिल है । पुराण, महापुराण और उपनिषद है। संस्कृत बहुत प्राचीन और व्यापक है । विश्व संस्कृत दिवस व संस्कृत दिवस को विश्व संस्कृत दिनम से जाना जाता है । संस्कृत भाषा को देव वाणी कहा जाता है। संस्कृत भाषा का पता दूसरी सहस्राब्दी ई. पू. से है । संस्कृत भाषा को उत्तराखंड की दूसरी आधिकारिक भाषा के रूप में घोषित किया गया था। संस्कृत भाषा में 102 अरब 78 करोड़ 50 लाख शब्दों की सबसे बड़ी शब्दावली है। विश्व संस्कृत दिवस या संस्कृत दिवस पहली बार 1969 में मनाया गया था। यह प्राचीन भारतीय भाषा को जागरूकता फैलाने, बढ़ावा देने और पुनर्जीवित करने के लिए मनाया जाता है। यह भारत की समृद्ध संस्कृति को दर्शाता है। जैसा कि हम जानते हैं कि हिंदू संस्कृति में पूजा और मंत्रों का उच्चारण संस्कृत में किया जाता है। संस्कृत सभी भारतीय भाषाओं की जननी है और भारत में बोली जाने वाली प्राचीन भाषाओं में पहली है। संस्कृत सबसे अधिक कंप्यूटर के अनुकूल भाषा है।संस्कृत दिवस में कई कार्यक्रम और पूरे दिन के सेमिनार शामिल होते हैं जो संस्कृत भाषा के महत्व, इसके प्रभाव और इस खूबसूरत भाषा संस्कृत को बढ़ावा देने के बारे में बात करते हैं। संस्कृत दिवसपर सेमिनार सहित कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। संस्कृत भारत की समृद्ध संस्कृति का प्रतीक है। भारत की लोक कथाएं, कहानियां संस्कृत भाषा में हैं। संस्कृत भाषा के बारे में मुख्य तथ्यइस भाषा की एक संगठित व्याकरणिक संरचना है। यहां तक कि स्वर और व्यंजन भी वैज्ञानिक पैटर्न में व्यवस्थित होते हैं ।कर्नाटक का शिमोगा जिले के मत्तूर के निवासी संस्कृत में बात करते है।संस्कृत को उत्तराखंड की आधिकारिक भाषा घोषित किया गया है।शास्त्रीय संगीत कर्नाटक और हिंदुस्तानी में संस्कृत का प्रयोग किया जाता है।संस्कृतका उपयोग बौद्ध धर्म, जैन धर्म, सिख धर्म के साथ-साथ हिंदू धर्म के दार्शनिक प्रवचनों के लिए किया जाता था। संस्कृत भाषा का प्रयोग सुसंस्कृत, परिष्कृत और समझदार लोगों द्वारा किया जाता था। शोधकर्ताओं ने संस्कृत को दो खंडों में वैदिक संस्कृत और शास्त्रीय संस्कृत वर्गीकृत किया है ।। संस्कृत में पारंगत संस्कृति तथा मानवीय जीवन की वास्तविक रूप और समन्वय का द्योतक है ।
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