सोमवार, अगस्त 23, 2021

कजरी तीज : दिव्य ज्ञान ...


        भारतीय संस्कृति में दिव्य ज्ञान एवं सामाजिक जीवन को सफलता का विशेष उल्लेख किया गया है । कजरी तीज स्त्रियों की संकल्पित और मनोकामनाएं पूर्ण भावनाएं समर्पित है । कजरी तीज के दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयू के लिए व्रत रखती है और अविवाहित लड़कियां इस पर्व पर अच्छा वर पाने के लिए व्रत रख कर जौ, चने, चावल और गेंहूं के सत्तू में घी और मेवा मिलाकर  भोजन बनाते हैं। चंद्रमा की पूजा करने के बाद उपवास तोड़ते हैं। कजरी तीज के दिन गायों की पूजा की जाती है। साथ ही इस दिन घर में झूले लगाते है और महिलाएं इकठ्ठा होकर नाचती है और गाने गाती हैं। कजरी  उत्सव पर नीम की पूजा कर  चाँद को अर्घ्य  देने की परंपरा हैं । भाद्रपद कृष्ण पक्ष तृतीय को कजरी तीज , बड़ी तीज, सातुड़ी तीज , कृष्ण तीज महिलाएं एवं लड़कियों द्वारा मनाई जाती है । माता  पार्वती  की पूजा कर महिलाएं कजरी तीज पर अखंड सौभाग्यवती एवं कुँवारी लड़कियां अच्छे वर के लिये , चतुर्दिक विकास  प्राप्ति के  लिए ब्रत रखती है । 108 जन्म लेने के बाद देवी पार्वती भगवान शिव से शादी करने में सफल हुई। कजरी तीज निस्वार्थ प्रेम के सम्मान के रूप में मनाया जाता है ।पौराणिकता के अनुसार, कजली घने जंगल क्षेत्र का राजा दादूरई द्वारा शासित था। कजली के लोग  कजली  गाने गाते थे ।कजली का  राजा दादूरई का निधन होने के बाद उनकी पत्नी रानी नागमती ने खुद को सती  में अर्पित कर दिया। नागमती द्वारा अपने पति कजली का राजा दादुरई के सती होने के स्थान कजली स्थान पर लोगों ने रानी नागमती को सम्मानित करने के लिए राग कजरी मनाना प्रारम्भ कर दिया था ।माता पार्वती भगवान् शिव की उपासना की थी। भगवान शिव ने पार्वती की भक्ति साबित करने के लिए कहा। पार्वती ने शिव द्वारा स्वीकार करने से पहले, 108 साल एक तपस्या करके माता पार्वती द्वारा भक्ति साबित की गयी थी ।भगवन शिव और पार्वती का दिव्य ज्ञान भाद्रपद महीने के कृष्णा पक्ष के दौरान हुआ था।  बूंदी रियासत में गोठडा के राजा ठाकुर बलवंत सिंह के भरोसे वाले  जांबाज सैनिक भावना से ओतप्रोत थे। राजा ठाकुर बलवंत सिंह द्वारा जयपुर के चहल-पहल वाले मैदान से तीज की सवारी, शाही तौर-तरीकों से निकल रही थी। ठाकुर बलवंत सिंह हाडा अपने जांबाज साथियों के पराक्रम से जयपुर की तीज को गोठडा ले आए थे ।कजली  तीज माता की सवारी गोठडा में निकलने लगी। ठाकुर बलवंत सिंह की मृत्यु के बाद बूंदी के राव राजा रामसिंह उसे बूंदी ले आए और केवल से उनके शासन काल में तीज की सवारी भव्य रूप से निकलने लगी। इस सवारी को भव्यता प्रदान करने के लिए शाही सवारी भी निकलती थी। सैनिकों द्वारा शौर्य का प्रदर्शन किया गया था। सुहागिनें सजी-धजी व लहरिया पहन कर तीज महोत्सव में चार चाँद लगाती थीं। इक्कीस तोपों की सलामी के बाद नवल सागर झील के सुंदरघाट से तीजाइड प्रमुख रेस्तरां से होती हुई रानी जी की बावड़ी तक जाती थी। वहाँ पर सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। नृत्यांगनाएँ अपने नृत्य से दर्शकों का मनोरंजन करती थीं। करतब दिखाने वाले कलाकारों को सम्मानित किया जाता था और प्रशिक्षण का आत्मीय स्वागत किया जाता था। मान-सम्मान और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बाद तीज सवारी वापिस राजमहल में लौटती थी। दो दिवसीय तीज सवारी के अवसर पर विभिन्न प्रकार के जन मनोरंजन कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते थे, जिनमें दो मदमस्त हाथियों का युद्ध होता था, जिसे देखने वालों की भीड़ उमड़ती थी। पार्वतीजी स्वरूप कजली तीज माता का आशीर्वाद मिलता रहा।श्रही सवारी भी निकलती थी। इसमें बूंदी रियासत के जागीरदार, ठाकुर व धनाढय लोग अपनी परम्परागत पोशाक पहनकर पूरी शानो-शौकत के साथ भाग लिया करते थे। सैनिकों द्वारा शौर्य का प्रदर्शन किया गया था।सुहागिनें सजी-धजी व लहरिया पहन कर तीज महोत्सव में चार चाँद लगाती थीं। इक्कीस तोपों की सलामी के बाद नवल सागर झील के सुंदरघाट से तीजाइड प्रमुख रेस्तरां से होती हुई रानी जी की बावड़ी तक जाती थी। वहाँ पर सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। नृत्यांगनाएँ अपने नृत्य से दर्शकों का मनोरंजन करती थीं। करतब दिखाने वाले कलाकारों को सम्मानित किया जाता था और प्रशिक्षण का आत्मीय स्वागत किया जाता था। मान-सम्मान और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बाद तीज सवारी वापिस राजमहल में लौटती थी। दो दिवसीय तीज सवारी के अवसर पर विभिन्न प्रकार के जन मनोरंजन कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते थे । कजरी तीज व्रत में शाम के समय में चद्रंमा को अर्ध्य देने के बाद ही कुछ खाया पीया जाता हैं। व्रत को सुहागन स्त्रियां अपने पति की लंबी उम्र के लिए एवं कुंवारी कन्याएं सुयोग्य वर पाने के लिए करती हैं। पौराणिक कथा के अनुसार भारत के मध्य भाग में कजली नाम का एक वन का राजा दादुरै  था। राज्य में लोग अपने राज्य के नाम कजली पर गीत गाया करते थे। राज दादुरै की मृत्यु हो गई।जिसके बाद रानी नागमती सती हो गई। राजा और रानी के बाद उनकी प्रजा पूरी तरह से दुख में डूब गई। इसी कारण कजली के गीत पति और पत्नि के जन्म- जन्म के साथ के लिए गाए जाते हैं। लोकप्रिय कथा के अनुसार माता पार्वती भगवान शिव को पति रूप में पाना चाहती थी।लेकिन भगवान शिव ने उनके सामने एक शर्त रखी। जिसके अनुसार माता पार्वती को अपनी भक्ति और प्रेम सिद्ध करना था।जिसके बाद माता पार्वती ने 108 सालों तक भगवान शिव की तपस्या की और भगवान शिव को परीक्षा दी।जिसके बाद भगवान शिव ने माता पार्वती को इसी तीज पर अपनी पत्नी स्वीकार किया था। इसी कारण से इसे कजरी तीज भी कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार बुढ़ी तीज पर सभी देवी- देवता माता पार्वती और भगवान शिव की आराधना करते हैं। कजरी तीज में महिलाएं झूला झूलकर अपनी खुशी व्यक्त करती हैं। कजरी तीज के दिन सभी औरतें एक साथ  होकर नाचती है और कजरी तीज के गीत गाती हैं। वाराणासी और मिर्जापुर में कजरी तीज के गीतों को वर्षागीतों के साथ गाया जाता है।  राजस्थान के बूंदी शहर में तो इसे बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन ऊंट और हाथी की सवारी की जाती है। इसके साथ ही यहां पर लोक गीत कजरी तीज के दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयू के लिए व्रत रखती है और अविवाहित लड़कियां इस पर्व पर अच्छा वर पाने के लिए व्रत रखती हैं। इस दिन जौ, चने, चावल और गेंहूं के सत्तू बनाये जाते है और उसमें घी और मेवा मिलाकर कई प्रकार के भोजन बनाते हैं। चंद्रमा की पूजा करने के बाद उपवास तोड़ते हैं। कजरी तीज के दिन गायों की पूजा की जाती है। साथ ही इस दिन घर में झूले लगाते है और महिलाएं इकठ्ठा होकर नाचती है और गाने गाती हैं। कजरी  उत्सव पर नीम की पूजा कर  चाँद को अर्घ्य  देने की परंपरा हैं । भाद्रपद कृष्ण पक्ष तृतीय को कजरी तीज , बड़ी तीज, सातुड़ी तीज , कृष्ण तीज महिलाएं एवं लड़कियों द्वारा मनाई जाती है । माता  पार्वती  की पूजा कर महिलाएं कजरी तीज पर अखंड सौभाग्यवती एवं कुँवारी लड़कियां अच्छे वर के लिये , चतुर्दिक विकास  प्राप्ति के  लिए ब्रत रखती है । 108 जन्म लेने के बाद देवी पार्वती भगवान शिव से शादी करने में सफल हुई। कजरी तीज निस्वार्थ प्रेम के सम्मान के रूप में मनाया जाता है ।पौराणिकता के अनुसार, कजली घने जंगल क्षेत्र का राजा दादूरई द्वारा शासित था। कजली के लोग  कजली  गाने गाते थे ।कजली का  राजा दादूरई का निधन होने के बाद उनकी पत्नी रानी नागमती ने खुद को सती  में अर्पित कर दिया। नागमती द्वारा अपने पति कजली का राजा दादुरई के सती होने के स्थान कजली स्थान पर लोगों ने रानी नागमती को सम्मानित करने के लिए राग कजरी मनाना प्रारम्भ कर दिया था ।माता पार्वती भगवान् शिव की उपासना की थी। भगवान शिव ने पार्वती की भक्ति साबित करने के लिए कहा। पार्वती ने शिव द्वारा स्वीकार करने से पहले, 108 साल एक तपस्या करके माता पार्वती द्वारा भक्ति साबित की गयी थी ।भगवन शिव और पार्वती का दिव्य ज्ञान भाद्रपद कृष्ण तृतीया पक्ष को  हुआ था।  बूंदी रियासत में गोठडा के राजा ठाकुर बलवंत सिंह के भरोसे वाले  जांबाज सैनिक भावना से ओतप्रोत थे। राजा ठाकुर बलवंत सिंह द्वारा जयपुर के चहल-पहल वाले मैदान से तीज की सवारी, शाही तौर-तरीकों से निकल रही थी। ठाकुर बलवंत सिंह हाडा अपने जांबाज साथियों के पराक्रम से जयपुर की तीज को गोठडा ले आए थे ।कजली  तीज माता की सवारी गोठडा में निकलने लगी। ठाकुर बलवंत सिंह की मृत्यु के बाद बूंदी के राव राजा रामसिंह उसे बूंदी ले आए और केवल से उनके शासन काल में तीज की सवारी भव्य रूप से निकलने लगी। इस सवारी को भव्यता प्रदान करने के लिए शाही सवारी भी निकलती थी। सैनिकों द्वारा शौर्य का प्रदर्शन किया गया था। सुहागिनें सजी-धजी व लहरिया पहन कर तीज महोत्सव में चार चाँद लगाती थीं। इक्कीस तोपों की सलामी के बाद नवल सागर झील के सुंदरघाट से तीजाइड प्रमुख रेस्तरां से होती हुई रानी जी की बावड़ी तक जाती थी। वहाँ पर सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। नृत्यांगनाएँ अपने नृत्य से दर्शकों का मनोरंजन करती थीं। करतब दिखाने वाले कलाकारों को सम्मानित किया जाता था और प्रशिक्षण का आत्मीय स्वागत किया जाता था। मान-सम्मान और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बाद तीज सवारी वापिस राजमहल में लौटती थी।  बूंदी रियासत के जागीरदार, ठाकुर व धनाढय लोग अपनी परम्परागत पोशाक पहनकर पूरी शानो-शौकत के साथ भाग लिया करते थे। सैनिकों द्वारा शौर्य का प्रदर्शन किया गया था।सुहागिनें सजी-धजी व लहरिया पहन कर तीज महोत्सव में चार चाँद लगाती थीं। इक्कीस तोपों की सलामी के बाद नवल सागर झील के सुंदरघाट से तीजाइड प्रमुख रेस्तरां से होती हुई रानी जी की बावड़ी तक जाती थी। नृत्यांगनाएँ अपने नृत्य से दर्शकों का मनोरंजन करती थीं। मान-सम्मान और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बाद तीज सवारी वापिस राजमहल में लौटती थी।  कजरी तीज व्रत में शाम के समय में चद्रंमा को अर्ध्य देने के बाद अन्न ग्रहण किया जाता हैं। व्रत को सुहागन स्त्रियां अपने पति की लंबी उम्र के हेतु एवं कुंवारी कन्याएं सुयोग्य वर पाने के लिए करती है ।शास्त्रों के अनुसार बुढ़ी तीज पर  देवी- देवता माता पार्वती और भगवान शिव की आराधना करते हैं। कजरी तीज में महिलाएं झूला झूलकर खुशी व्यक्त करती हैं। कजरी तीज के दिन औरतें एक साथ  होकर नाचती है और कजरी तीज के गीत गाती हैं। कजली गानों को विशेष महत्व दिया जाता है। कजली गीत के गाने ढोलक और मंजीरे के साथ गाए जाते हैं।  कजरी तीज के दिन गाय की विशेष पूजा और  आंटे की 7 रोटियां बनाकर गाय को गुड़ और चने के साथ खिलाई जाती है । राजस्थान , झारखंड ,छत्तीसगढ़ , उतरप्रदेश,बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड ,आदि राज्यों में मनाया जाता है। बिहार और उत्तर प्रदेश में कजरी गीत को नाव पर एवं वाराणासी और मिर्जापुर में कजरी तीज के गीतों को वर्षागीतों के साथ गाया जाता है।  राजस्थान में कजरी त्यौहार को  बूंदी शहर में  ऊंट और हाथी की सवारी एवं  लोक गीत और नृत्य  किया जाता है ।




कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें