शुक्रवार, जून 10, 2022

प्रागेतिहासिक विरासत है वेद....

           ब्रह्मा  जी  ने    ऋषियों  के  अन्त:करण  और   समाधि  की  अवस्था  में  प्रत्यारोपित  कर  मानव  कल्याण   हेतु ईश्वरीय ज्ञान के लिए  वेद अग्रसारित  किया  है ।  भगवान विष्णु  के  चौबीस  अवतारों  में   '  सनक  ,  सनन्दन  ,  सनातन  एवं   सनत  कुमारों  '  के   द्वारा  वेद  की  रचना  प्रस्तुत  की  गई ।   श्रृष्टि  के  प्रारंभ  में  श्री  ब्रह्मा  जी  द्वारा  मानव  कल्याण  के  लिए  वेद  के  रुप  में  एक  संहिता  तैयार  कर   भविष्य  में  मानव   अनुसासित  तरीके  से  पृथ्वी  पर   जीवों  के  साथ  - साथ  पर्यावरण  को  अक्षुण्ण  रखते  हुए  विकास  की नींव रखी गयी थी ।    ऋषियों  के  अन्त:करण से ऋग्वेद, आयुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद की रचनाएं हुई थी ।
  ऋग्वेद के रचनाकार ऋषि अग्नि द्वारा ऋग्वेद में  १०५८९  मन्त्रों  के  साथ  '  ज्ञान  '  ,  आयुर्वेद के रचनाकार ऋषि वायु द्वारा  यजुर्वेद  में 1975   मन्त्रों  के  साथ  '  कर्म  काण्ड  '  , सामवेद के रचनाकार ऋषि  आदित्य द्वारा सामवेद  में  1875 मन्त्रों  के  साथ  '  उपासना  ' और अथर्वेद के रचनाकार ऋषि अंगिरा द्वारा  अथर्ववेद  में  5977  मन्त्रों  द्वारा  '  विज्ञान  '  अर्थात वेदों में 20416   मन्त्रों  के माध्यम से ज्ञान ,कर्मकांड और उपासना की नींव डाली गई थी ।
'  पुरणों '   में  इतिहास  ,  भूगोल  ,  दर्शन  ,  गणित  ,  कला  आदि    विषयों  का  समावेश  है ।  भारत  की  भौगोलिक  एकता  करोड़ों  वर्ष से   प्राचीन  महत्व  के  ज्ञान  के हिमाचल  ,  भरत  खंड  अथवा  जम्बूद्वीप  , शाकद्वीप , प्लक्ष द्वीप , क्रौंच द्वीप ,  सप्त  सिन्धु   में   दक्षिण  -  पूर्व   एशिया  ,  उत्तरपथ  ,  यूरोप  एवं  अफ्रीका  के     भू  - भागों  के   सन्दर्भ  आये  हैं । ब्रह्म  पुराण  में  उड़ीसा  के  क्षेत्र  , अग्नि  पुराण  में  गया  के  क्षेत्र  ; ब्रह्म वैवर्त  पुराण  में  वृन्दावन  एवं  गोकुल  क्षेत्र  ; स्कन्द  पुराण  में  काशी  ,  उड़ीसा  ,  नर्मदा  के  तीर्थ  ; वामन  पुराण  में  आन्ध्र  का  भौगोलिक  वितरण  ; विष्णु  पुराण  में  मौर्य  राजवंश  ; वायु  पुराण  में  गया  जी  तथा   गुप्त  वंश  का उल्लेख  हैं  । मत्स्य  पुराण  से  राजतंत्र  उत्तराधिकारी ,  सम्राट  के  अधिकार  एवं  दायित्वों  का  विवरण  ,   अमात्य  ,  मंत्री  व  अधिकारियों  के  कार्य  -  विभाजन  का   ज्ञान    है ।  अठारहों  पुराणों  से  भारत  के  इतिहास ,  भूगोल  ,  विज्ञान  ,  सामाजिक  समरसता  हैं । रामायण  में  उत्तर  भारत  एवं महाभारत  के  भीष्म  पर्व  ,  आदि  पर्व  तथा  सभा  पर्व  में  बृहत्तर  भारत  के  संदर्भ  हैं । ऋग्वेद  में    सिंधु  ,  सरस्वती  और  सरयू  एवं   २१  नदियों  एवं  अधिकतर  हिमालय  तथा  मंजुवन  पर्वतों  का  उल्लेख  है ।  वेद  से  सूत्र  ग्रंथों  में   १४  नदियों  तथा  महामेरु  और  विंध्य  पर्वत    आया  है ।अमेरिका  के बर्कले  स्थित  कैलिफोर्निया  विश्वविद्यालय  में  संस्कृत  के  एक  प्रोफ़ेसर  जो  प्राचीन  भारतीय  इतिहास  ,  पौराणिक  आख्यानों  व दन्तकथाओं  के  विशेषज्ञ  हैं  -  उन्होंने  रामायण  की  कथाओं  पर  भी  अनेक  खोजें  की  है ।  उन्होंने  एक  स्थान  पर  लिखा  है  कि  पावन  अनुभूति  की  तीव्रता  और  विशालता  प्राचीन  भारतीय  आख्यानों  की  सबसे  बड़ी  शक्ति  है । स्विट्जरलैंड  के विद्वान  एरिक  वान  डेनिके के अनुसार   प्राचीन  संस्कृत  ग्रंथों  में  विश्व  के  इतिहास  के  अनेक  संदर्भ  समाविष्ट  हैं ।   सन्  १९६९  में  डेमिके द्वारा  '  चेरियट्स  औफ  गौड्स  '  में  उल्लेख किया है कि  हजारों  साल  पहले  धरती  पर  दूसरे  लोकों  से  मानव  आये  थे  ,  तब  लोगों  में  उत्सुकता  बढ़ी है ।  भारत  यात्रा  के  दौरान  झारखंड के    जमशेदपुर  के  निकट  स्वर्ण रेखा  नदी  के  समीप   घाटशिला  की  पहाड़ी  पर  पांडवों  का रथ  के  पहिए  के  निशान  बहुत  दूर  तक  है  ,  जब  वह  उड़कर  आकाश  में  चला  गया  था ।  भारतीय  आख्यानों  को  दुनिया  के  प्राचीनतम  साक्ष्य    हैं ।  पाश्चात्य  इतिहासकार  डेनिकन  के  हचू  '   और  '  कौलीन  गैंटजर  '  के अनुसार  भारतीय  पुराण  निस्संदेह  दुनिया  के  सबसे  पुराने  एवं  अनमोल  दस्तावेज़  वेद एवं पुराण हैं ।  महाभारत  में  अर्जुन  की  इंद्रलोक  की  यात्रा  का    वर्णन  है ।  डेनिकन  के अनुसार  '  ओल्ड  टेस्टामेंट  '  बाइबिल   के  पुराने  आख्यान ,  हर  धर्म  में  प्रलय  के  वर्णन  भारतीय  महा -  जलप्लावन   आख्यानों  से  लिये  गये  हैं ।



गुरुवार, जून 02, 2022

शैव स्थल पातालपुरी आँती...


         नवादा जिला मुख्यालय नवादा से सात किलोमीटर दूर डेढ़ वर्गकिमि क्षेत्रफल में 5000 आवादी वाले आँती पंचायत का मुख्यालय आंती या  आती का विजयनगर स्थित पातालपुरी शिवमंदिर में   भगवान शिवलिंग स्थापित है। जमीनी तल से करीब 20  फीट नीचे शिव¨लग विराजमान हैं। सीढि़यों के सहारे उतरकर लोग गर्भगृह में प्रवेश करते हैं और भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना करते हैं। इस मंदिर की एक खासियत यह भी है कि शिव¨लिंग  पर किये जाने वाले जलाभिषेक का पानी कहां जाता है, यह आज तक किसी को पता नहीं चल सका है। जबकि शिव¨लग के चारों ओर टाइल्स बिछा हुआ है। वहां पर छोटी  जगह से पानी का गायब हो जाना रहस्मयी है। इस मंदिर के प्रति ग्रामीणों की अटूट श्रद्धा है। गर्भगृह के चारों तरफ विभिन्न देवी-देवताओं की दर्जनों प्रतिमाएं है। में कई ¨क्वटल बेलपत्र, बेल आदि चढ़ाये जाते हैं। जिसे पूजा के बाद सकरी नदी में विसर्जित कर दिया जाता है। भारतीय वास्तु विज्ञान का प्रादुर्भाव मूर्ति कला आए वास्तु कला की कहानी धरोहर है ।पुरातन सभ्यता से लेकर ब्रिटिश शासन तक मूर्तियों और भवनों की स्वयं विरासत की कहानी है ।साम्राज्यों का उद्भव और पतन , विदेशी आक्रांताओं का आक्रमण विभिन्न संस्कृतियों और शैलियों का संगम मागधीय वास्तुकला एवं मूर्तिकला के विकास में परिलक्षित होते है । प्राचीन मगध को कीकट कहा गया है । नवादा जिले के आँती की मूर्तियां , पातालपुरी , विजयनगर में चाक्षुष मन्वंतर एवं वैवस्वत मन्वंतर काल में विकसित था । आँती की मूर्तियां मौर्यकालीन , गुप्तकालीन मूर्तियां , गढ़ , शिवलिंग एवं विदेशी आक्रांताओं द्वारा विक्षिप्त मूर्तियां है ।
 आँती का   रसातल में सहस्तरशीर्षा , कालाग्नि रुद्र शिवलिंग ,तथा कृतिवसा की मूर्तियां है । शांकरी नदी के किनारे ऋषि दधीचि के पुत्र अथर्वा ऋषि द्वारा अथर्ववेद की रचना की थी । कर्दम ऋषि की पत्नी एवं अथर्वा ऋषि की पुत्री  चिन्ति ज्ञानगुण सम्पन्न एवं तंत्र मंत्र की ज्ञाता थी । कर्दम ऋषि की पत्नी द्वारा चिन्ति नगर का निर्माण किया गया था  । आँती को चिन्ति , चिन्ति नगर ,पातालपुरी , विजयनगर , अन्तःपुर , आती, आँती , अन्ति कहा गया है। वैदिक ऋषि अथर्वा द्वारा आकाशीय उल्का पारद शिवलिंग की स्थापना शांकरी नदी के किनारे रसातल में कई गयी थी ।  नवादा जिले के नवादा प्रखंड का आँती स्थित विजय नगर का पातालपुरी में 20 फीट गहराई से युक्त 16 सीढ़ियों से पातालेश्वर या पारद रुद्र शिवलिंग एवं भगवान विष्णु , अथर्वा तथा माता चिन्ति  का दर्शन किया जाता है । पातालेश्वर मंदिर में भगवान विष्णु आदित्य , शिव पार्वती विहार , विष्णु  , बुद्ध अन्य देवी डिवॉन की मूर्तियां है । मंदिर परिसर में विशाल  एक मुखी शिवलिंग ,  विदेशी आक्रांताओं द्वारकी गयी क्षीण भिन्न की गई मूर्तियां है ।मंदिर के दक्षिण पश्चिम में 5 विघे का गढ़ में प्रचीन धरोहर छिपी है । अथर्वेद में भूपति कहा गया है । मत्स्य पुराण ,महाभारत वैन पर्व , तैतरीय आरण्यक , वामनपुराण ,, विष्णुपुराण , शिवपुराण शिवपुराण के अनुसार के अनुसार डेढ़ वर्ग किमि में फैले  आँती में काला मुख एवं लिंगायत और रुद्र सम्प्रदायके मानने वाले शुद्धाद्वैत का स्थल था । 1500 ई. पू. से 600 ई. तक शैव , वैष्णव , शाक्त एवं सौर सम्प्रदाय का स्थल था । वासव पुराण ,  गुप्त काल में वराह अवतार एवं शैव , सौर , विष्णु तथा शाक्त सम्प्रदाय के शिव लिंग ,विष्णु , सूर्य एवं शक्ति की उपासना स्थल का निर्माण हुआ था । 335 ई. में समुद्रगुप्त ,एवं गुप्त संबत का प्रारंभ कर्ता श्री गुप्त का पौत्र घटोत्कच का पुत्र चंद्रगुप्त प्रथम , चंदगुप्त द्वितीय 380 ई. में चांदी के सिक्के प्रारम्भ किया था । गोविंद गुप्त 415 ई. से 454 ई. तक , एवं स्कन्दगुप्त 456 ई. से 467 ई. में पातालेश्वर मंदिर का निर्माण कराया था । 629 ई. से 645 ई. तक हर्षवर्द्धन शासन काल में इतिहास के राजकुमार ह्वेनसांग की पुस्तक सि- यू - की में वर्णित है । 1921 ई. में दयाराम सहिनीं एवं 1990 - 91 में पुरातत्व विभाग के अधिकारी जयप्रकाश एवं अवधेश किशोर सिंह द्वारा पातालपुरी को मागध साम्राज्य का राजा विन्दुसार ने मंदिर का जीर्णोद्धार कार्य किया  गया था । आँती के विकास के लिए कृष्ण गुप्त , हर्ष गुप्त  माधव गुप्त तथा आदित्य सेन द्वारा किया गया । जेनरल कनिग्घम  द्वारा 1850 एवं 1863 ई. में गुप्त कालीन की धरोहर का भ्रमण किया था । द्वापर युग में मगध साम्राज्य के वृहद्रथ वंशीय जरासंध का धर्म , प्रद्योतवंशीय  अभ्रक , चंदगुप्त मौर्य वंशीय 298 ई.पू.  विन्दुसार , शुंगवंशीय शतकर्णिका एवं हलाहल राजा ने विकास किया था । गुप्त काल मे अन्तःपुर अवन्तिदेव की राजधानी थी । यहां के गढ़ों का उत्खनन से अर्द्धगोलाकार नाद , कौड़ी ,, गहने , चांदी के सिक्के , अन्न प्राप्त हुए हसि । 10 , 20 फीट की दीवारें 6 इंच की मोटी ईंटें है । यह क्षेत्र सैंधव काल की महल का रूप है । सैंधव केयाल में आंति विकसित था । भारतीय विरासत संगठन के अध्यक्ष सत्येन्द्र कुमार पाठक , जिला विरासत समिति नवादा के अध्यक्ष नरेंद्र प्रसाद सिंह एवं सचिव वीना मिश्रा द्वारा आंति का परिभ्रमण करने के दौरान पाया कि सतयुग , त्रेता ,द्वापर युग में विकसित गाँव आंति गुप्त काल , वैदिक काल में शैव , शाक्त , सौर एवं वैष्णव धर्म एवं तंत्र मंत्र का साधना का स्थल था । गौतम कुमार सरगम के अनुसार आंती का पातालपुरी एवं गढ़ के क्षेत्रों के उत्खनन से मागधीय की पुरातन  संस्कृति तथा धरोहर प्राप्त होते है ।