गुरुवार, फ़रवरी 24, 2022

देवों का स्थल देवप्रयाग...


उत्तराखण्ड राज्य का टिहरी जिले का देवप्रयाग समुद्र सतह से 1500 फीट की ऊँचाई अलकनंदा तथा भागीरथी नदियों के संगम पर स्थित है। भागीरथी नदी एवं अलकनंदा नदी  संगम धारा 'गंगा' कहलाती है।  राजा भगीरथ को गंगा द्वारा  पृथ्वी पर उतरने के लिए 
          देवप्रयाग में स्थित भगरीथी नदी एवं अलकनंदा नदी का संगम , रघुनाथ मंदिर 
अनुमति देने  के बाद  ३३ कोटि  देवी-देवता गंगा के साथ स्वर्ग से आकर भागीरथी नदी एवं अलकनंदा नदी संगम पर स्थित देवप्रयाग में निवास स्थल किया था । गढ़वाल क्षेत्र में भागीरथी नदी को सास तथा अलकनंदा नदी को बहू कहा जाता है। देवप्रयाग  संगम पर  शिव मंदिर , द्रविड़ शैली में निर्मित  रघुनाथ मंदिर , डंडा नागराज मंदिर और चंद्रवदनी मंदिर  हैं। देवप्रयाग को 'सुदर्शन क्षेत्र' कहा जाता है । देवप्रयाग में कौवे दिखायी नहीं होती  है । .आचार्य श्री पं.चक्रधर जोशी नामक ज्योतिष्विद एवं खगोलशास्त्री ने १९४६ में नक्षत्र  वेधशाला की स्थापना दशरथांचल पर्वत पर की थी । वेधशाला दो बड़ी दूरबीनों (टेलीस्कोप) से सुसज्जित और खगोलशास्त्र  पुस्तक है। १६७७ ई से संग्रह की हुई ३००० विभिन्न संबंधित पांडुलिपियां सहेजी हुई हैं। प्राचीन उपकरण सूर्य घटी, जल घटी एवं ध्रुव घटी जैसे अनेक यंत्र व उपकरण हैं । रामायण में लंका विजय उपरांत भगवान राम के वापस लौटने पर जब एक धोबी ने माता सीता की पवित्रता पर संदेह किया, तो उन्होंने सीताजी का त्याग करने का मन बनाया और लक्ष्मण जी को सीताजी को वन में छोड़ आने को कहा। तब लक्ष्मण जी सीता जी को उत्तराखण्ड देवभूमि के ऋर्षिकेश से आगे तपोवन में छोड़कर चले गये। जिस स्थान पर लक्ष्मण जी ने सीता को विदा किया था वह स्थान देव प्रयाग के निकट ही ४ किलोमीटर आगे पुराने बद्रीनाथ मार्ग पर स्थित सीता विदा है । केदारखण्ड में रामचन्द्र जी का सीता और लक्ष्मण जी सहित देवप्रयाग पधारने का वर्णन मिलता है। बायें अलकनंदा और दायें भागीरथी नदियां देवप्रयाग में संगम बनाती हैं और यहां से गंगा नदी बनती है। अलकनंदा नदी उत्तराखंड के सतोपंथ और भागीरथ कारक हिमनदों से निकलकर इस प्रयाग को पहुंचती है। नदी का प्रमुख जलस्रोत गौमुख में गंगोत्री हिमनद के अंत से तथा कुछ अंश खाटलिंग हिमनद से निकलता है। यहां की औसत ऊंचाई ८३० मीटर (२,७२३ फीट) है। २००१ की भारतीय जनगणना के अनुसार[6] देवप्रयाग की कुल जनसंख्या २१४४ है, जिसमें ५२% पुरुशः और ४८% स्त्रियां हैं। यहां की औसत साक्षरता दर ७७% है, जो राष्ट्रीय साक्षरता दर ५९.५ से काफी अधिक है। इसमें पुरुष साक्षरता दर ८२% एवं महिला साक्षरता दर ७२% है। यहां की कुल जनसंख्या में से १३% ६ वर्ष की आयु से नीचे की है। यह कस्बा बद्रीनाथ धाम के पंडों का भी निवास स्थान है। यत्र ने जान्हवीं साक्षादल कनदा समन्विता। यत्र सम: स्वयं साक्षात्स सीतश्च सलक्ष्मण॥ सममनेन तीर्थेन भूतो न भविष्यति। पुनर्देवप्रयागे यत्रास्ते देव भूसुर:। आहयो भगवान विष्णु राम-रूपतामक: स्वयम्॥ राम भूत्वा महाभाग गतो देवप्रयागके। विश्वेश्वरे शिवे स्थाप्य पूजियित्वा यथाविधि॥ इत्युक्ता भगवन्नाम तस्यो देवप्रयाग के। लक्ष्मणेन सहभ्राता सीतयासह पार्वती॥ टिहरी जिले में भागीरथी – अलकनंदा नदी स्थित 30°-8′ अक्षांश तथा 78 °-39′ रेखांश पर स्थित देवप्रयाग समुद्रतल से 1600 फ़ीट की उचाई पर पर्वतों दशरथाचल ,गर्ध्रपर्वत और नरसिंह पर्वत के मध्य में स्थित है। 2 री शदी का  शिलालेख ऐतिहासिक साक्ष्य है।  केदारखंड के अनुसार भगवान राम,लक्ष्मण और सीता ने निवास किया था।सतयुग में  क्षेत्र में देवशर्मा  ब्राह्मण की तपस्या से प्रसंद होकर  भगवान विष्णु ने  कहा कि मैं त्रेता युग मे आऊँगा तथा भागरिथी नदी एवं अलकनंदा नदी का संगम स्थल को देव प्रयाग के प्रसिद्धि होगी ।  देवप्रयाग क्षेत्र क्षेत्र भगवान राम की तपस्थली के रूप में प्रसिद्ध है। रावण की ब्रह्म हत्या दोष से बचने के लिए भगवान राम ने देवप्रयाग में  तपस्या कर  विशेश्वर शिवलिंग की स्थापना की थी। भगवान राम का प्रसिद्ध मंदिर रघुनाथ मंदिर यहीं है। केदारखंड में भगवान राम ,लक्ष्मण और माता सीता सहित आने का उल्लेख है।  जब प्रजा के आरोप लगाने पर , भगवान राम ने माता सीता का त्याग किया तब लक्ष्मण जी ,माता सीता को ऋषिकेश के आगे तपोवन में छोड़ कर चले गए । पितृ पक्ष में देवप्रयाग में पिंडदान करने का विशेष महत्व बताया गया है। यहाँ देश के विभिन्न क्षेत्रों से लोग पिंडदान करने के लिए आते हैं। आनंद रामायण के अनुसार ,भगवान राम ने यहाँ ,श्राद्ध पक्ष में अपने पिता दशरथ का पिंडदान किया था। नेपाली धर्मग्रंथ हिमवत्स के अनुसार  देवप्रयाग में पितरों के तर्पण व पिंडदान का सर्वाधिक महत्व है। भागीरथी नदी को पितृ गंगा भी कहा जाता है।रघुनाथ मंदिर - देवप्रयाग का प्राचीन रघुनाथ मंदिर की स्थापना  देवशर्मा ब्राह्मण ने की थी। आदिशंकराचार्य जी ने चार धाम की स्थापना के अलावा ,108 विश्व मूर्ति मंदिरों की स्थापना की जिनमे भगवान ने स्वयं प्रकट होकर उस स्थान को सिद्ध किया है। इन 108 मंदिरों में देवप्रयाग का रघुनाथ मंदिर, जोशीमठ का नरसिंह मंदिर और बद्रीनाथ मंदिर भी है।
रघुनाथ मंदिर के शिलाओं पर खरोष्टि लिपि को  दूसरी या तीसरी शताब्दी का कहा  गया है। मंदिर में शिलालेख और ताम्रपत्र है । गढ़वाल के राजाओं के साथ साथ गोरखा सेनापतियों ने  मंदिर के निर्माण में सहयोग किया। इसका उल्लेख मंदिर के मुख्यद्ववार पर है। 1803 ई में  मंदिर का भूकंप द्वारा नष्ट होने पर दौलतराव सिंधिया ने  निर्माण करवाया था। रघुनाथ मंदिर के गर्भगृह के फर्श से मंदिर की शिखर तक की लंबाई लगभग 80 फ़ीट है। मंदिर के अंदर विष्णु भगवान की काले रंग की मूर्ति स्थापित है। मूर्ति भक्तों की पहुँच से बाहर है। शिखर पर लकड़ी की बनी विशाल छतरी को टिहरी की खरोटिया रानी ने बनवाया था। देवप्रयाग का रघुनाथ मंदिर द्रविड़ शैली में बना है। बसंतपंचमी , वैशाखी, रामनवमी और मकरसंक्रांति का मेला लगता है ।भरत मंदिर – रघुनाथ मंदिर के उत्तर में  भरत मंदिर  हैं।  वागीश्वर महादेव देवप्रयाग –वगीश्वर में वागीश्वर महादेव मंदिर है।वागीश्वर  स्थान पर माता सरस्वती ने भगवान भोलेनाथ की तपस्या करके संगीत विद्या प्राप्त की थी। आदि विश्वेश्वर मंदिर देवप्रयाग – देवप्रयाग में पांच शिवमंदिर विशेष हैं। चार मंदिर इस क्षेत्र के चार कोनो पर चार दिगपाल देवताओं के मंदिर  स्थित हैं। पांचवा मंदिर मुख्य मंदिर  अधिष्ठाता के रूप में विराजित है।  मंदिर को आदि विशेश्वर मंदिर कहते हैं। दिग्पालों के मंदिर में धनेश्वर ,बिल्वेश्वर ,तुन्दीश्वर, और तांटेश्वर मंदिर है । धनेश्वर मंदिर – धनेश्वर मंदिर देवप्रयाग में अलकनंदा के बाएं तट पर बाह नामक स्थान से एक किलोमीटर दूर है। इस मंदिर के पास धनवती नदी अलकनंदा में मिलती है।  धनवती  वैश्या ने शिव की तपस्या की थी। मृत्यु के बाद वह नदी में परिवर्तित हो गई।  डंडिश्वर मंदिर स्थान पर  दशायनी दनु ने 5500 वर्ष तक एक पैर पर खड़े होकर भगवान शिव की तपस्या की थी। बिल्वेश्वर मंदिर –बिल्व तीर्थ पर स्थित शिवलिंग को  बिल्वेश्वर महादेव शिवलिंग छोटी सी गुफा में अवस्थित है। तुन्डिश्वर मंदिर –तुंडी कुंड से ऊपर विशाल टीले पर तुन्दीश्वर मंदिर  है। तुंडी  भील ने भगवांन भोलेनाथ की उपासना की थी। और महादेव ने प्रसन्न होकर उसे अपने गण के रूप में स्वीकार कर लिया था। तांटकेश्वर मंदिर देवप्रयाग – मंदिर को स्थानीय भाषा मे टाटेश्वर कहते हैं। पुरणों के अनुसार जब भगवान शिव माता सती की मृत देह लेकर घूम रहे थे, तब माता सती का तांतक ( कान का आभूषण ) इस स्थान पर गिरने के कारण  स्थान तांटकेश्वर मंदिर है । गंगा मंदिर –देवप्रयाग के संगम से  विशाल चपटी शिला पर छोटा सा मंदिर बना कर उसमे गंगा मूर्ति स्थापित की गई है। क्षेत्रपाल मंदिर देवप्रयाग –गरन्ध पर्वत पास रघुनाथ मंदिर के थोड़ा ऊपर  क्षेत्रपाल मंदिर भैरव हैं। इन्हें देवप्रयाग का रक्षक देवता कहा  जाता है। नागराजा मंदिर – देवप्रयाग से 5 किमी दूर पहाड़ी पर नागराजा मंदिर है। नरसिंह पर्वत पर नरसिंह मंदिर  और गरन्ध पर्वत पर  महिषमर्दिनी मंदिर अवस्थित है। संगम से ऊपर पुराने पत्थरों से बने रघुनाथ  मंदिर में  पिरामिड के रूप में गुम्बद है | पवित्र भागीरथी एवं अलकनंदा नदियों के संगम स्थल पर चट्टान के द्वारा दो पवित्र धाराओं के कुण्ड या घाटियों का निर्माण होता है ।  भागीरथी नदी पर ब्रह्म कुण्ड एवं अलकनंदा नदी पर वशिस्ठ कुण्ड हैं | सन 1803 में आये भूकंप के कारण मंदिर को नुकसान हुआ था । मंदिर का जीर्णोद्धार  का कार्य दौलत राव सिंधिया जी के द्वारा कराया गया था । रघुनाथजी के मंदिर के अलावा, बैताल कुंड, ब्रह्म कुंड, सूर्य कुंड और वाशिष्ठ कुंड ,  इन्द्राद्युम्न तीर्थ, पुश्यामल तीर्थ, वरह तीर्थ; पुष्प वाटिका; बैताल शिला और वरह शिला; भैरव, भूषण, दुर्गा और विश्वेश्वर के मंदिरों , भरत को समर्पित मंदिर  है| देवप्रयाग में  बैताल शिला पर स्नान से कुष्ठ रोग से मुक्ति होती  है। देवप्रयाग के दशरथान्चल पहाड़ी  पर चट्टान को दशरथ शिला कहा जाता है । दशरथ शिला पर अयोध्या के  राजा दशरथ ने ध्यान एवं तप किया था । दशरथांचल पर्वत  से जल धारा निरंतर प्रवाहित होने वाली  जलधारा राजा दशरथ की भार्या कौशल्या की पुत्री और भगवान राम की बहन एवं ऋषि श्रृंगी की भार्या शांता को समर्पित शांताधारा  है ।

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