रविवार, अक्तूबर 02, 2022

सशक्ति और ऐश्वर्य की देवी महागौरी ,,


 .पद्म पुराण , मार्कण्डेय पुराण , देवी भागवत और शाक्त धर्म के विभिन्न ग्रंथो में नव दुर्गाओं में अष्ठम एवं नारी, शक्ति, ऐश्वर्य और सौन्दर्य की देवी महागौरी है । कैलाश निवासी भगवान शिव के जीवन साथी माता महागौरी के अस्त्र त्रिशूल , डमरू ,वर और अभयमुद्रा और सवारी वृषम है ।
ॐ महागौर्ये नमः एवं प्रार्थना श्वेते वृषे समारुढा श्वेताम्बरधरा शुचिः | महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा || 
अर्थात माता महागौरी का वर्ण पूर्णतः गौर है। इस गौरता की उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से दी गई है। इनकी आयु आठ वर्ष की मानी गई है- 'अष्टवर्षा भवेद् गौरी के समस्त वस्त्र एवं आभूषण आदि  श्वेत हैं। महागौरी की चार भुजाएँ एवं वाहन वृषभ है। माता महागौरी के ऊपर के दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और नीचे वाले दाहिने हाथ में त्रिशूल ,  ऊपरवाले बाएँ हाथ में डमरू और नीचे के बाएँ हाथ में वर-मुद्रा हैं।  महागौरी देवताओं की प्रार्थना पर हिमालय की श्रृंखला मे शाकंभरी के  प्रकट हुई थी। माँ महागौरी ने देवी पार्वती रूप में भगवान शिव को पति-रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी । एक बार भगवान भोलेनाथ ने पार्वती जी को देखकर कहने से देवी के मन का आहत होकर माता  पार्वती जी तपस्या में लीन हो जाती हैं। वषों तक कठोर तपस्या करने पर जब पार्वती नहीं आती तब पार्वती को खोजते हुए भगवान शिव उनके पास पहुँच कर  पार्वती को देखकर आश्चर्य चकित रह जाते हैं। पार्वती जी का रंग अत्यंत ओजपूर्ण ,  छटा चांदनी के सामन श्वेत और कुन्द के फूल के समान धवल दिखाई पड़ती ,  वस्त्र और आभूषण से प्रसन्न होकर देवी उमा को गौर वर्ण का वरदान देते हैं। शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी ने कठोर तपस्या की थी जिससे इनका शरीर काला पड़ जाता है। देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान इन्हें स्वीकार करते हैं और शिव जी इनके शरीर को गंगा-जल से धोते हैं तब देवी विद्युत के समान अत्यंत कांतिमान गौर वर्ण की होने  से इनका नाम गौरी पड़ा। महागौरी रूप में देवी करूणामयी, स्नेहमयी, शांत और मृदुल दिखती हैं। देवी के इस रूप की प्रार्थना करते हुए देव और ऋषिगण कहते हैं “सर्वमंगल मंग्ल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके. शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते..”। महागौरी जी से संबंधित एक अन्य कथा भी प्रचलित है इसके जिसके अनुसार, एक सिंह काफी भूखा था, वह भोजन की तलाश में वहां पहुंचा जहां देवी उमा तपस्या कर रही होती हैं। देवी को देखकर सिंह की भूख बढ़ गयी परंतु वह देवी के तपस्या से उठने का इंतजार करते हुए वहीं बैठ गया। इस इंतजार में वह काफी कमज़ोर हो गया। देवी जब तप से उठी तो सिंह की दशा देखकर उन्हें उस पर बहुत दया आती है और माँ उसे अपना सवारी बना लेती हैं क्योंकि एक प्रकार से उसने भी तपस्या की थी। इसलिए देवी गौरी का वाहन बैल और सिंह दोनों ही हैं। एक अन्य कथा के अनुसार दुर्गम दानव के अत्याचारों से संतप्त जब देवता भगवती शाकंभरी की शरण मे आये तब माता ने त्रिलोकी को मुग्ध करने वाले महागौरी रूप का प्रादुर्भाव किया। यही माता महागौरी आसन लगाकर शिवालिक पर्वत के शिखर पर विराजमान है। माता  शाकंभरी देवी के पर्वत पर शाकंभरी मंदिर स्थल देवी शाकंभरी ने महागौरी का रूप धारण किया था।
अष्टमी के दिन महिलाएं अपने सुहाग के लिए देवी मां को चुनरी भेंट करती हैं। देवी गौरी की पूजा का विधान   है । अर्थात जिस प्रकार सप्तमी तिथि तक आपने मां की पूजा की है उसी प्रकार अष्टमी के दिन भी प्रत्येक दिन की तरह देवी की पंचोपचार सहित पूजा करते हैं। माँ महागौरी का ध्यान, स्मरण, पूजन-आराधना भक्तों के लिए सर्वविध कल्याणकारी है। हमें सदैव इनका ध्यान करना चाहिए। इनकी कृपा से अलौकिक सिद्धियों की प्राप्ति होती है। मन को अनन्य भाव से एकनिष्ठ कर मनुष्य को सदैव इनके ही पादारविन्दों का ध्यान करना चाहिए।मां महागौरी भक्तों का कष्ट अवश्य  दूर करती है। माता गौरी की  उपासना से अर्तजनों के असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।  पुराणों में माँ महागौरी की महिमा का प्रचुर आख्यान किया गया है।
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ गौरी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और माँ गौरी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। हे माँ, मुझे सुख-समृद्धि प्रदान करें । माता गौरी को समर्पित उत्तराखंड राज्य का रुद्रप्रयाग जिले के सोनप्रयाग से 8 किमि की दूरी पर गौरीकुंड , बिहार के गया का भष्मकुट पहाड़ी पर मंगलागौरी , उत्तरप्रदेश के काशी में मंगलागौरी ,पीलीभीत के देवहा और खकरा नदी संगम, भुवनेश्वर नेपाल , पाकिस्तान में माता मंगलागौरी मंदिर है ।



1 टिप्पणी: