सोमवार, दिसंबर 20, 2021

आध्यात्मिक चेतना के प्रणेता स्वामी विवेकानंद....


भारतीय आध्यात्मिक चेतना के प्रणेता स्वामी विवेकानन्द जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील विश्वनाथ दत्त की पत्नी भुवनेश्वरी देवी के गर्भ से कोलकाता में हुआ था ।  39 वर्षीय स्वामी विवेकानंद की मृत्यु ब्रिटिश राज्यक रियासत कोलकाता स्थित बेलूर मठ में 4 जुलाई 1902 को  हुई थी । वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक संत  स्वामी विवेकानंद का  नाम नरेन्द्र नाथ दत्त ने अमेरिका स्थित शिकागो में सन् 1893 में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। भारत का आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वेदान्त दर्शन अमेरिका और यूरोप के प्रत्येक  देश में स्वामी विवेकानन्द की वक्तृता के कारण पहुँचा था । उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना करने के पश्चात शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सभा में 2 मिनट भाषण का  संबोधन   "मेरे अमेरिकी बहनों एवं भाइयों" से किया था । विवेकानंद ने  कहा कि सम्पूर्ण जीवो मे स्वयं परमात्मा का  अस्तित्व हैं; इसलिए मानव जाति   दूसरे जरूरतमन्दो को   सेवा द्वारा परमात्मा की  सेवा की जा सकती है। रामकृष्ण की मृत्यु के बाद विवेकानन्द ने बड़े पैमाने पर भारतीय उपमहाद्वीप का दौरा किया और ब्रिटिश भारत में मौजूदा स्थितियों का प्रत्यक्ष ज्ञान हासिल किया। बाद में विश्व धर्म संसद 1893 में भारत का प्रतिनिधित्व करने, संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए प्रस्थान किया। विवेकानन्द ने संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड और यूरोप में हिंदू दर्शन के सिद्धान्तों का प्रसार किया और कई सार्वजनिक और  व्याख्यानों का आयोजन किया। भारत में विवेकानन्द को  देशभक्त सन्यासी  है। स्वामी विवेकानंद के  जन्मदिन को राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है । स्वामी विवेकानन्द अपने आश्रम में सो रहे थे। कि तभी एक व्यक्ति उनके पास आया जो कि बहुत दुखी था और आते ही स्वामी विवेकानन्द के चरणों में गिर पड़ा और बोला महाराज मैं अपने जीवन में खूब मेहनत करता हूँ हर काम खूब मन लगाकर भी करता हूँ फिर  आज तक मैं कभी सफल व्यक्ति नहीं बन पाया। उस व्यक्ति कि बाते सुनकर स्वामी विवेकानंद ने कहा ठीक है। आप मेरे इस पालतू कुत्ते को थोड़ी देर तक घुमाकर लाये तब तक आपके समस्या का समाधान ढूँढ़ता हूँ। इतना कहने के बाद वह व्यक्ति कुत्ते को घुमाने के लिए चल गया। और फिर कुछ समय बीतने के बाद वह व्यक्ति वापस आया। तो स्वामी विवेकानन्द ने उस व्यक्ति से पूछा की यह कुत्ता इतना हाँफ क्यों रहा है। जबकि तुम थोड़े से थके हुए नहीं लग रहे हो आखिर ऐसा क्या हुआ  है । इस पर उस व्यक्ति ने कहा कि मैं  सीधा अपने रास्ते पर चल रहा था जबकि यह कुत्ता इधर उधर रास्ते भर भागता रहा और कुछ भी देखता  उधर ही दौड़ जाता था. जिसके कारण यह इतना थक गया है । इसपर स्वामी विवेकानन्द ने मुस्कुराते हुए कहा बस यही तुम्हारे प्रश्नों का जवाब है । तुम्हारी सफलता की मंजिल  तुम्हारे सामने  होती है । परंतु  तुम अपने मंजिल के बजाय इधर उधर भागते हो जिससे तुम अपने जीवन में कभी सफल नही हो पाए. यह बात सुनकर उस व्यक्ति को समझ में आ गया था।  यदि सफल होना है  हमे अपने मंजिल पर ध्यान देना चाहिए था । स्वामी विवेकानन्द का विचार है कि  हम उस पर ध्यान नहीं देते है, और दूसरों को देखकर वैसा ही हम करने लगते है। जिसके कारण हम अपने सफलता के मंजिल के पास होते हुए दूर भटक जाते है। इसीलिए अगर जीवन में सफल होना है! हमेशा हमें अपने लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए । विवेकानन्द ने  विदेश में  समारोह में विदेशी लोग आये हुए थे ! उनके द्वारा दिए गए विचारों  से एक विदेशी महिला बहुत ही प्रभावित हुईं। और वह विवेकानन्द के पास आयी और स्वामी विवेकानन्द से बोली कि मैं आपसे शादी करना चाहती हूँ ताकि आपके जैसा ही मुझे गौरवशाली पुत्र की प्राप्ति हो।इसपर स्वामी विवेकानन्द बोले कि क्या आप जानती है। कि ” मै एक सन्यासी हूँ ” भला मै कैसे शादी कर सकता हूँ अगर आप चाहो  मुझे आप अपना पुत्र बना लो। इससे मेरा सन्यास नही टूटेगा और आपको मेरे जैसा पुत्र  मिल जाएगा। यह बात सुनते ही वह विदेशी महिला स्वामी विवेकानन्द के चरणों में गिर पड़ी और बोली कि आप धन्य है। आप ईश्वर के समान है !  किसी भी परिस्थिति में अपने धर्म के मार्ग से विचलित नहीं होते है। गौड़ मोहन मुखर्जी स्ट्रीट कोलकाता स्थित स्वामी विवेकानन्द का मूल जन्मस्थान जिसका पुनरुद्धार करके अब सांस्कृतिक केन्द्र है स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी सन् 1863 ,मकर संक्रान्ति संवत् 1920 को कलकत्ता में  कायस्थपरिवार में हुआ था। उनके बचपन का घर का नाम वीरेश्वर और बाद में औपचारिक नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। संस्कृत और फारसी भाषा के विद्वान दुर्गाचरण दत्त के पौत्र एवं कलकत्ता हाईकोर्ट के प्रसिद्ध वकील विश्वनाथ दत्त की पत्नी भुवनेश्वरी देवी के गर्भ से नरेन्द्रनाथ दत्त का जन्म हुआ था । नरेन्द्रनाथ दत्त ने  अपने परिवार को 25 की उम्र में छोड़ सन्यासी बन गए।बचपन से  नरेन्द्र अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि एवं  नटखट  थे। अपने साथी बच्चों के साथ वे खूब शरारत करते और मौका मिलने पर अपने अध्यापकों के साथ  शरारत करने से नहीं चूकते थे। उनके घर में नियमपूर्वक रोज पूजा-पाठ होता था धार्मिक प्रवृत्ति की होने के कारण माता भुवनेश्वरी देवी को पुराण,रामायण, महाभारत आदि की कथा सुनने का बहुत शौक था। कथावाचक बराबर इनके घर आते रहते थे। नियमित रूप से भजन-कीर्तन भी होता रहता था। परिवार के धार्मिक एवं आध्यात्मिक वातावरण के प्रभाव से बालक नरेन्द्र के मन में बचपन से ही धर्म एवं अध्यात्म के संस्कार गहरे होते गये। माता-पिता के संस्कारों और धार्मिक वातावरण के कारण बालक के मन में बचपन से ही ईश्वर को जानने और उसे प्राप्त करने की लालसा दिखायी देने लगी थी। ईश्वर के बारे में जानने की उत्सुकता में कभी-कभी वे ऐसे प्रश्न पूछ बैठते थे कि इनके माता-पिता और कथावाचक पण्डित तक आध्यात्मिक विचार  में पड़ जाते थे।
सन् 1871 में, आठ साल की उम्र में, नरेन्द्रनाथ ने ईश्वर चंद्र विद्यासागर के मेट्रोपोलिटन संस्थान में दाखिला लिया । 1877 में उनका परिवार रायपुर चला गया। 1879 में, कलकत्ता में अपने परिवार की वापसी के बाद प्रेसीडेंसी कॉलेज प्रवेश परीक्षा में प्रथम डिवीजन अंक प्राप्त किये। वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका स्थित शिकागो  में सन् 1893 में विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था । विश्व धर्म महासभा शिकागो में स्वामी विवेकानंद ने कहा कि मुझे गर्व है कि मैं हिन्दू  धर्म से हूं जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है. हम सिर्फ़ सार्वभौमिक सहिष्णुता पर ही विश्वास नहीं करते बल्कि, हम सभी धर्मों को सच के रूप में स्वीकार करते हैं । मुझे गर्व है कि मैं उस भारत  से हूं जिसने सभी धर्मों और सभी देशों के सताए गए लोगों को अपने यहां शरण दी है । मुझे गर्व है कि हमने अपने दिल में इसराइल की वो पवित्र यादें संजो रखी हैं जिनमें उनके धर्मस्थलों को रोमन हमलावरों ने तहस-नहस कर दिया था और फिर उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली. मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं जिसने पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और लगातार अब भी उनकी मदद कर रहा है । स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में दिया गया  ऐतिहासिक भाषण, भारतीयों को गर्व से भर देता है । स्वामी विवेकानंद ने कहा था- एक हिन्दू का धर्मान्तरण केवल एक हिंदू का कम होना नहीं, बल्कि एक शत्रु का बढ़ना है।  क्योंकि उन्हें अपने समय में सन्नाटे की कायरता ओढ़े समाज को झकझोर कर जगाने की निर्भीकता दिखायी और हिन्दू धर्म तथा उसके अनुयायियों की रक्षा की है । हिंदू धर्म का असली संदेश लोगों को अलग-अलग धर्म संप्रदायों के खांचों में बांटना नहीं, बल्कि पूरी मानवता को एक सूत्र में पिरोना. गीता में भगवान कृष्ण ने भी यही संदेश दिया था कि अवग-अलग कांच से होकर हम तक पहुंचने वाला प्रकाश  है । स्वामी विवेकानंद के जीवन आध्यात्मिक विचार भारत से बहार जाकर हिन्दू धर्म का व्याख्यां किया था ।  सभी धर्मों का सम्मान करते थे । वे  योग के बल पर दिव्यदृष्टि प्राप्त की थी । स्वामी विवेकनंद ने युवाओं को कहा कि  'उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य ना प्राप्त हो जाये। ' 'उठो मेरे शेरो, इस भ्रम को मिटा दो कि तुम निर्बल हो, तुम एक अमर आत्मा हो, स्वच्छंद जीव हो, धन्य हो, सनातन हो, तुम तत्व नहीं हो, ना ही शरीर हो, तत्व तुम्हारा सेवक है तुम तत्व के सेवक नहीं हो। शिक्षा से मानवीय शक्ति और आध्यात्मिक चेतना से मानव विकास करता है ।

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