रविवार, नवंबर 22, 2020

सर्वार्थ सिद्धि : गौपालन...


ग्रंथों ,उपनिषदों के अनुसार मानवीय जीवन, संस्कृति, इतिहास का अटूट अंग से  सृष्टि की रचना हुई है उसी काल से   गौ वंश प्रारम्भ होता है। आदिकाल में देव और दानवों ने अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन किया था। भगवान विष्णु ने  कच्छप अवतार लेकर सुमेरू पर्वत धारण किया और वासुकी नाग को रज्जू  ( मथनी ) समुद्र  मंथन किया गया जिसमें  हलाहल विष की ज्वाला से तारने के लिए कर्तिक शुक्ल अष्टमी को  रत्नस्वरूपा कामधेनू का प्रागट्य हुई थी । कामधेनु  मनोकामनाओं, संकल्प और आवश्यकता पूर्ण करने में सक्षम थी।ब्रह्मा जी ने स्वायम्भुव मनु को सृष्टि रचना का आदेश दिया था । प्रथम मनु स्वायम्भुव मन ने कामधेनु की उत्पन्न किया । वेन पुत्र राजा प्टथु द्वारा  कामधेनु की स्तुति करने केबाद जन कल्याण के लिए गौदोहन किया गया और पृथ्वी पर कृषि का प्रारंभ किया। पर्थु मनु के नाम से धरा पृथ्वी कहलाई है । गौमाता के दर्शन से बढ़कर न कोई देव स्थान है, न कोई जप-तप है, न ही कोई सुगम कल्याणकारी मार्ग है। न कोई योग-यज्ञ है और न कोई मोक्ष का साधन ही। तीर्थों में तीर्थराज प्रयाग, उसी प्रकार देवी-देवताओं में अग्रणी गौमाता को बताया गया है। गौमाता के रोम-रोम में देवी-देवताओं का एवं समस्त तीर्थों का वास है। साहत्यकार एवं इतिहासकार सत्येन्द्र कुमार पाठक ने कहा कि गौमाता  को एक ग्रास खिला दीजिए तो वह सभी देवी-देवताओं को पहुंच जाएगा। धर्मग्रंथ के अनुसार समस्त देवी-देवताओं एवं पितरों को एक साथ प्रसन्न करना हो तो गौभक्ति-गौसेवा से बढ़कर कोई अनुष्ठान नहीं है। गौमाता के दर्शन मात्र से ऐसा पुण्य प्राप्त होता है जो बड़े-बड़े यज्ञ, दान आदि कर्मों से भी नहीं प्राप्त हो सकता। ‘गौ मे माता ऋषभ: पिता में दिवं शर्म जगती मे प्रतिष्ठा।’ गाय मेरी माता और ऋषभ पिता हैं। धर्मशास्त्रों के अनुसार भगवान का अवतार ही गौमाता, संतों व धर्मरक्षा के लिए होता है। गोस्वामी तुलसीदासजी रामचरितमानस में लिखते हैं- ‘विप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार । निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गोपार ।।सनातन सत्य गौमाता में समस्त तीर्थ गाय, गोपाल, गीता, गायत्री तथा गंगा धर्मप्राण भारत के प्राण  हैं। पूजनीय गौमाता, हमारी ऐसी मां है जिसकी बराबरी न कोई देवी-देवता कर सकते हैं और न कोई तीर्थ है । गौमाता को भगवान कृष्ण नंगे पांव जंगल-जंगल चराते और  गोपाल नाम रख कर  उसकी रक्षा के लिए गौकुल में अवतार लिया है । राजा दिलीप गौसेवा के पर्याय और रामजन्म सुरभि गाय के दुग्ध द्वारा तैयार खीर से माना गया है । कृष्ण, गोपाल  नाम से जाने गए ने पूर्ण बृजक्षेत्र की रक्षा गोवर्धन पर्वत उठा कर की और माखनचोर कहलाये। औषधियों के स्वामी धनवंतरी ने गौभक्ति और गौसेवा कर आरोग्य प्रदायनी गौ दुग्ध, गौ घी, गौदधि, गौमूत्र और गोबर के मिश्रण से पंचगव्य की रचना की। यहां तक कि गाय के गोबर और मूत्र को एक पर्यावरण रक्षक के रूप में माना जाता था और फर्श और घरों की दिवारों रसोई में इस्तेमाल किया गया था, शुद्ध रहने के लिए हर घर और मानव शरीर पर गौमूत्र छिड़काव एक आम बात थी। गोकुल यानी जहां 10,000 से अधिक गौवंश हों और नन्द जो की हजारों गौवंश का अधिपति हो जाना जाता था। सनातन धर्म में कन्या को दुहिता का नाम दिया है, यानी दुग्ध को दोहन करने वाली, गाय का दान एक सबसे महान दान माना जाता था। शास्त्रों में कहा है सब योनियों में मनुष्य योनी श्रेष्ठ है। क्योंकि वह गौमाता की निर्मल आभा में अपने जीवन को धन्य कर सकते हैं। मानव संरक्षण, कृषि और अन्न उत्पादन में गौवंश का अटूट सहयोग और साथ रहा है। इसी कारण हमारे शास्त्र वेद पुराण गौ महिमा से भरे हुए हैं। अर्थववेद  के अनुसार -  मित्र ईक्षमाण आवृत आनंद:युज्यमानों , वैश्वदेवोयुक्त: प्रजापति विर्मुक्त: सर्पम्। एतद्वैविश्वरूपं सर्वरूपं गौरूपम् उपैनंविश्वरूपा: , सर्वरूपा: पशवस्तिष्ठन्ति य एवम् वेद।। अर्थात देखते समय गौ मित्र देवता है, पीठ फेरते समय आनंद है। हल तथा गाड़ी में जोतते समय(बैल) विश्वदेव, जाने पर प्रजापति तथा जब खुला हो तो सबकुछ बन जाता है। यही विश्वरूप अथवा सर्वरूप है, यही गौरूप है। जिसे इस विश्वरूप का यर्थाथ ज्ञान होता है उसके पास विविध प्रकार के पशु रहते हैं। अथर्ववेद में ही कहा गया है ब्राह्मण तथा क्षत्रिय विश्वरूप गौ के नितंब हैं। गंधर्व पिंडलियां तथा अप्सारायें छोटी हड्डियां हैं। देवता इसके गुदा हैं, मनुष्य आते, अन्य प्राणी अमाशय हैं। राक्षस रक्त तथा इतर मानव पैर हैं। गाय के संबंध में एक जगह कहा गया है- ।


प्रत्यंग तिष्ठन् धातोदड तिष्ठनन्रसविता तृणाणि प्राप्त: सोमों राजा।अर्थात् पश्चिमाभिमुख खड़े होते समय गाय विधाता उत्तराभिमुख खड़े होते समय सविता तथा घास चरते समय चंद्रमा है। विभिन्न ग्रंथों में कहा गया है कि गाय के अंगों में ईश्वर का वास है। उदाहरणार्थ-बृहत्पराशर स्मृति , पद्मपुराण सृष्टिखंड , अथर्ववेद में गायों को संपतियों का भंडार कहा गया है। यच्च गां पदा स्फुरति प्रत्यड् सूर्यं च मेहति, तस्य वृश्वामि तेमूलं च्छाया करवोपरम।। अर्थात जो गाय को पैर से ठुकराता है और जो सूर्य की ओर मुंह करके मूत्रोत्सर्ग करता है मैं उस पुरूष का मूल ही काट देता हूं संसार में फिर उसे छाया मिलना कठिन है। प्रभु राम के वनवास गमन के पश्चात जब भरत उनसे मिलने वन में गये तो प्रभु का पहला प्रशन भरत से यही था कि तुम्हारे राज्य में गाय तो ठीक से हैं न स्कंदपुराण (आवंत्यखंड रेखाखंड अध्याय-13) ब्रह्मांडपुराण (गोसावित्रीस्त्रोत) भविष्यपुराण (उत्तरपर्व बह्मवैर्वापुराण के श्रीकृष्णजन्म कांड आदि में गाय की महिमा का वर्णन है। गौवध का निषेध करते हुये वेद में कहा गया है- माता रूद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यनाममृत्स्य नाभि: प्रश्नु वोचं चिकितुषे जनायमा गामनागादितिं वधिष्ट। अर्थात गौ रूद्रों की माता वसुओं की पुत्री अदितिपुत्रों की बहन तथा धृतरूप अमृत का खजाना है। प्रत्येक विचारशील मनुष्य को मैंनें यही कहा है कि निरपराध व अवध्य गौ का कोई वध न करे।शास्त्रों के अनुसार गाय माता की महिमामयी और सभी प्रकार से पूज्य है। गौ माता की रक्षा करना  मनुष्‍य का परम कर्तव्य है।गौमाता की सेवा से बढ़कर कोई दूसरा महान पुण्य नहीं है। पुराणों में कहा गया है कि  मनुष्य गौ माता के खुर से उड़ी हुई धूलि को सिर पर धारण करता है उसे तीर्थ के जल में स्नान और उसे सभी पापों से छुटकारा मिल जाता है।गौमाता के बारे में  शुभ और पवित्र बातें जीवन में अपनाकर अपनी सभी परेशानियों से छुटकारा पाता  हैं। गौ माता (गाय) की पूजा करने से कुंडली के दोष समाप्त होंगे। प्रतिदिन गौ माता के नेत्र के दर्शन करें, जीवन में लाभ ही लाभ होगा। रास्ते में जाते समय गौ माता आती हुई दिखाई दें तो उन्हें अपने दाहिने से जाने दें, तो निश्‍चित ही आपकी यात्रा सफल होगी। यात्रा की शुरुआत करते समय गौ माता सामने से आती हुई दिखाई दें या बछड़े को दूध पिलाती हुई दिख जाए तो यात्रा सफल एवं संपन्न होती है। बुरे स्वप्न दिखाई देते हैं तो गौ माता का नाम ले, कुछ ही दिनों में बुरे स्वप्न दिखने बंद हो जाएंगे। गौ माता के दूध से बने घी का एक अन्य नाम 'आयु' भी है, इसीलिए उसे 'आयुर्वै घृतम्' कहा जाता है। अत: गौ माता के दूध एवं घी का उपयोग करने से व्यक्ति दीर्घायु होता है।  हस्त रेखा में आयु (उम्र की) रेखा टूटी हुई है तब गौ माता का पूजन करें तथा गाय का घी सेवन करने के साथ-साथ अन्य कामों में में सफलता मिलती है । जिस घर में गौ पालन किया जाता है, वहां का वास्तुदोष स्वत: ही समाप्त हो जाता है। पितृ दोष के कारण आपका संघर्षमयी जीवन हो तो गौ माता को प्रतिदिन रोटी, गुड़, हरा चारा आदि खिलाएं। अगर प्रतिदिन ना खिला सके तो सिर्फ हर अमावस्या के दिन खिलाने से भी पितृ दोष समाप्त होता है। ज्योतिष  शास्त्र में गोधू‍लि का समय शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम माना गया है। अत: विवाह के समय इस बात का ध्यान रखकर ही शुभ मांगलिक कार्य किए जाए तो जीवन में कभी भी दुखों से सामना नहीं होता है । गाय की घी , दूध , दही , मध , गुड मिला कर पंचाम्टत पान करने पर  भुक्ति तथा  गाग की गोबर , मूत्र , दूध , दही तथा घी मिला कर गव्य को शरीर , हाथ में लगा कर स्नान करने पर संक्रमण तथा रोगाणु से मुक्ति मिलती है ।
स्वायंभुव मनु के वंश में राजा पुरू की पत्नी आग्रयी के प्रपौत तथा राजा अंग की पत्नि सुनिथा के पौत्र राजा वेन दिहिने हाथ का मंथन रीषियों द्वारा करने पर राजा प्टथु का अवतरण हुआ था । राजा प्टथु द्वारा धरातल को सभी प्राणियों के चतुर्मुखी विकास के लिए ब्रह्मेष्टी यग्य कराने के पश्चात मागध और सूत का अवतरण हुआ था। राजा प्टथु ने मागध को मगध तथा सूत को अनुप देश प्रदान किया । गाय के रूप में धरती राजा प्टथु के सामने प्रकट हुई थी । राजा प्टथु द्वारा धरती रूप गाय को स्वायंभुव मनु को बछडा बनाकर दूहने पर अन्न की उत्पति ,, चंद्रमा बछडा बने तथा महर्षि ने दूहा  , देवता ,, पितर ,नाग , दैत्य ,गंधर्व ,यछ ,पर्वत , पेड, पूण्यजन  , व्टहस्पति ,सूर्य ,नाग ,विरोचन दूह कर धरती के प्राणियों सम्टद्ध बनाया है । द्वापर युग में भगवान गोपल बन कर गाय की सेवा की । भगवान क्टष्ण ने कार्तिक शुक्ल अष्टमी से गौ सेवा का ब्रत लिया । इस तिथि को गोपाष्टमी नाम से ख्याति प्रप्त है ।

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