मंगलवार, नवंबर 16, 2021

मानवीय जीवन का प्रकाशोत्सव कार्तिक पूर्णिमा...


    पुरणों एवं स्मृतियों में कार्तिक पूर्णिमा का महत्वपूर्ण उल्लेख किया गया है । कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा ,  गंगा स्नान , देव दिवाली , गुरु पूर्णिमा , गुरु नानक जयंती , गजेंद्र मोक्ष दिवस और कार्तिक पूर्णिमा  जाता है। कार्तिक पूर्णिमा को  पुर्णिमा को भगवान शिव  ने असुरराज  त्रिपुरासुर बध करने के बाद भगवान शिव को त्रिपुरारी के रूप में पूजित हुए थे।  कृतिका में शिव शंकर के दर्शन करने से सात जन्म तक व्यक्ति ज्ञानी और धनवान होता है। चन्द्र आकाश में उदित के  समय शिवा, संभूति, संतति, प्रीति, अनुसूया और क्षमा इन छ: कृतिकाओं का पूजन करने से शिव जी की प्रसन्नता प्राप्त होती है।  कार्तिक पूर्णिमा के दिन तमिलनाडु मै अरुणाचलम पर्वत की १३ किमी की परिक्रमा होती है। अरुणाचलम पर्वत पर कार्तिक स्वामी का आश्रम है वहां उन्होंने स्कंदपुराण का लिखान किया था । भगवान विष्णु ने प्रलय काल में वेदों की रक्षा के लिए तथा सृष्टि को बचाने के लिए मत्स्य अवतार धारण किया था। बिहार के सारण जिले का गंडक एवं गंगा के संगम स्थित सोनपुर में गजेंद्र मोक्ष एवं हरि ( विष्णु )  एवं हर (शिव )  का निवास बना कर मानव कल्याण किया था । हरिहर क्षेत्र के नाम से विख्यात बाबा हरिहर नाथ , गजेंद्र मोक्ष मंदिर का निर्माण कार्तिक पूर्णिमा को हुआ था । सिख धर्म के प्रणेता गुरु नानक का जन्म दिवस है ।

महाभारत काल में हुए १८ दिनों के विनाशकारी युद्ध में योद्धाओं और सगे संबंधियों को देखकर जब युधिष्ठिर कुछ विचलित हुए तो भगवान श्री कृष्ण पांडवों के साथ गढ़ खादर के विशाल रेतीले मैदान पर आए। कार्तिक शुक्ल अष्टमी को पांडवों ने स्नान किया और कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी तक गंगा किनारे यज्ञ किया। इसके बाद रात में दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए दीपदान करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की। इसलिए इस दिन गंगा स्नान का और विशेष रूप से गढ़मुक्तेश्वर तीर्थ नगरी में आकर स्नान करने का विशेष महत्व है।मान्यता यह भी है कि इस दिन पूरे दिन व्रत रखकर रात्रि में वृषदान यानी बछड़ा दान करने से शिवपद की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति इस दिन उपवास करके भगवान भोलेनाथ का भजन और गुणगान करता है उसे अग्निष्टोम नामक यज्ञ का फल प्राप्त होता है। इस पूर्णिमा को शैव मत में जितनी मान्यता मिली है उतनी ही वैष्णव मत में भी। कार्तिक पूर्णिमा को गोलोक के रासमण्डल में श्री कृष्ण ने श्री राधा का पूजन किया था। हमारे तथा अन्य सभी ब्रह्मांडों से परे जो सर्वोच्च गोलोक है वहां इस दिन राधा उत्सव मनाया जाता है तथा रासमण्डल का आयोजन होता है। कार्तिक पूर्णिमा को श्री हरि के बैकुण्ठ धाम में देवी तुलसी का मंगलमय पराकाट्य हुआ था। कार्तिक पूर्णिमा को ही देवी तुलसी ने पृथ्वी पर जन्म ग्रहण किया था। कार्तिक पूर्णिमा को राधिका जी की शुभ प्रतिमा का दर्शन और वन्दन करके मनुष्य जन्म के बंधन से मुक्त हो जाता है। इस दिन बैकुण्ठ के स्वामी श्री हरि को तुलसी पत्र अर्पण करते हैं। कार्तिक मास में विशेषतः श्री राधा और श्री कृष्ण का पूजन करना चाहिए। जो कार्तिक में तुलसी वृक्ष के नीचे श्री राधा और श्री कृष्ण की मूर्ति का पूजन (निष्काम भाव से) करते हैं उन्हें जीवनमुक्त समझना चाहिए। तुलसी के अभाव में हम आवंले के वृक्ष के नीचे भी बैठकर पूजा कर सकते है। कार्तिक मास में पराये अन्न, गाजर, दाल, चावल, मूली, बैंगन, घीया, तेल लगाना, तेल खाना, मदिरा, कांजी का त्याग करें। कार्तिक मास में अन्न का दान अवश्य करें। कार्तिक पूर्णिमा को बहुत अधिक मान्यता मिली है। इस पूर्णिमा को महाकार्तिकी भी कहा गया है। यदि इस पूर्णिमा के दिन भरणी नक्षत्र हो तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। अगर रोहिणी नक्षत्र हो तो इस पूर्णिमा का महत्व कई गुणा बढ़ जाता है। इस दिन कृतिका नक्षत्र पर चन्द्रमा और बृहस्पति हो तो यह महापूर्णिमा कहलाती है। कृतिका नक्षत्र पर चन्द्रमा और विशाखा पर सूर्य हो तो "पद्मक योग" बनता है जिसमें गंगा स्नान करने से पुष्कर से भी अधिक उत्तम फल की प्राप्ति होती है।कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान, दीप दान, हवन, यज्ञ आदि करने से सांसारिक पाप और ताप का शमन होता है। इस दिन किये जाने वाले अन्न, धन एव वस्त्र दान का भी बहुत महत्व बताया गया है। इस दिन जो भी दान किया जाता हैं उसका कई गुणा लाभ मिलता है। मान्यता यह भी है कि इस दिन व्यक्ति जो कुछ दान करता है वह उसके लिए स्वर्ग में संरक्षित रहता है जो मृत्यु लोक त्यागने के बाद स्वर्ग में उसे पुनःप्राप्त होता है। शास्त्रों के  कार्तिक पुर्णिमा के दिन पवित्र नदी व सरोवर एवं धर्म स्थान में जैसे, गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा, गंडक, कुरूक्षेत्र, अयोध्या, काशी में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। कार्तिक माह की पूर्णिमा तिथि पर व्यक्ति को बिना स्नान किए नहीं रहना चाहिए ।महर्षि अंगिरा ने स्नान के प्रसंग में लिखा है कि यदि स्नान में कुशा और दान करते समय हाथ में जल व जप करते समय संख्या का संकल्प नहीं किया जाए तो कर्म फल की प्राप्ति नहीं होती है। शास्त्र के नियमों का पालन करते हुए इस दिन स्नान करते समय पहले हाथ पैर धो लें फिर आचमन करके हाथ में कुशा लेकर स्नान करें, इसी प्रकार दान देते समय में हाथ में जल लेकर दान करें। आप यज्ञ और जप कर रहे हैं तो पहले संख्या का संकल्प कर लें फिर जप और यज्ञादि कर्म करें। सिख सम्प्रदाय में कार्तिक पूर्णिमा का दिन प्रकाशोत्सव के रूप में मनाया जाता है।  सिख सम्प्रदाय के संस्थापक गुरू नानक देव का जन्म हुआ था।  सिख सम्प्रदाय के अनुयायी सुबह स्नान कर गुरूद्वारों में जाकर गुरूवाणी सुनते हैं और नानक जी के बताये रास्ते पर चलने की सौगंध लेते हैं। इसे गुरु पर्व भी कहा जाता है। कार्तिक पूर्णिमा 2078 दिनांक 18 नवंबर 2021एवं 19 नवंबर 2021 को कार्तिक पूर्णिमा मुहूर्त: मुहूर्त का समय: पूर्णिमा तिथि 18 नवंबर को दोपहर 12:00 बजे शुरू होती है और 19 नवंबर को दोपहर 2:26 बजे समाप्त होती है। पुरणों  के अनुसार, भगवान शिव ने  त्रिपुरारी का अवतार लेकर, सामूहिक रूप से त्रिपुरासुर के रूप में जानी जाने वाली राक्षस तिकड़ी का नाश किया था। इस प्रकार, उनकी क्रूरता को समाप्त करके, भगवान शिव ने शांति और धर्म की फिर से स्थापना की। इसलिए, देवताओं ने दिवाली मनाकर बुराई पर अच्छाई की जीत को चिह्नित किया। इसलिए इस दिन काशी की पवित्र नगरी में श्रद्धालु गंगा के घाटों पर तेल के दीपक जलाकर देव दीपावली मनाते हैं। वैकुंठ चतुर्दशी तिथि का व्रत रखते हैं, वे भगवान शिव और विष्णु की पूजा करते हैं और अगले दिन यानी कार्तिक पूर्णिमा को अपना उपवास तोड़ते हैं। तुलसी विवाह उत्सव मनाने वाले कार्तिक पूर्णिमा को समारोह का समापन करते हैं। दक्षिण भारत में भगवान शिव और  कार्तिकेय की पूजा की जाती है। कार्तिगई पूर्णिमा को मनाए जाने वाले त्योहार को कार्तिगई दीपम  जाना जाता है। यह दिन जैन और सिख समुदायों के लिए महत्वपूर्ण है।सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी का जन्म कार्तिक पूर्णिमा तिथि को हुआ था।  गुरु नानक देव जी की 552वीं जयंती मनाई जाएगी। कार्तिक पूर्णिमा जैनियों के लिए  पालिताना की तीर्थयात्रा शुरू कर  भगवान आदिनाथ की पूजा करते है। चातुर्मास के दौरान बंद रहने वाले मंदिर भक्तों के लिए खुलते हैं। , कार्तिक पूर्णिमा तिथि पवित्र चातुर्मास अवधि  पूर्णिमा  दिन है।  कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा  शुक्रवार  विक्रम संबत 2078 , दिनांक 19 नवंबर 2021 को 580 वर्ष के बाद चंद्र ग्रहण की अवधि लंबी होगी । भारत में चंद्र ग्रहण का समय दोपहर 12 बजकर 48 मिनट से लेकर शाम 4 बजकर 17 मिनट तक अर्थात 3 घंटे 29 मिनट की होगी । इससे पहले इतनी लंबी अवधि का चंद्र ग्रहण 18 फरवरी 1440 को लगा था । भविष्य में चंद्र ग्रहण की ऐसी घटना 8 फरवरी 2669 में देखने को मिलेगी । खगोलविदों के अनुसार  धरती से चंद्रमा की अधिक दूरी होने के कारण आगामी चंद्र ग्रहण की अवधि लंबी होने वाली है । 19 नवंबर 2021  को लगने वाला चंद्र ग्रहण भारत में मणिपुर की राजधानी इंफाल और उसकी सीमाओं से लगे इलाकों से देखा जा सकेगा. असम ,  अरुणाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों से भी ये चंद्र ग्रहण दिखाई दे सकता है. हालांकि, चंद्र ग्रहण यहां पूरी तरह दिखने की बजाए हल्की सी रेखा के रूप में नजर आएगा । चंद्र ग्रहण अमेरिका, उत्तरी यूरोप, पूर्वी एशिया, ऑस्ट्रेलिया, अंटार्कटिका और प्रशांत महासागर देखगा । आंशिक चंद्र ग्रहण होने की वजह से इसके लिए सूतक काल भी मान्य नहीं होगा । भगवान शिव ने राक्षस त्रिपुरासुर का वध किया था। पूर्णिमा पर देव दिवाली भी मनाई जाती है । पुरणों  के अनुसार असुरराज तारकासुर के तारकाक्ष , कमला ,और विद्युतमालि पुत्र थे। भगवान शिव के  पुत्र कार्तिक ने तारकासुर का वध करने के बाद तारकासुर के पुत्रों ने ब्रह्माजी से वरदान मांगने के लिए घोर तपस्या करने के दौरान ब्रह्माजी से तीन अलग नगरों का निर्माण करवाने के लिए कहा, जिसमें सभी बैठकर सारी पृथ्वी और आकाश में घूमा जा सके। एक हज़ार साल बाद जब हम मिलें और हम तीनों के नगर मिलकर एक हो जाएं, और जो देवता तीनों नगरों को एक ही बाण से नष्ट करने की क्षमता रखता हो, वही हमारी मृत्यु का कारण हो। ब्रह्माजी ने उन्हें ये वरदान दे दिया। ब्रह्माजी के कहने पर मयदानव ने उनके लिए तीन नगरों का निर्माण किया। तारकक्ष के लिए सोने का, कमला के लिए चांदी का और विद्युन्माली के लिए लोहे का नगर बनाया गया। तीनों ने मिलकर तीनों लोकों पर अपना अधिकार जमा लिया।देवराज  इंद्र  राक्षसों से भयभीत होते हुए भगवान शंकर की शरण में गए। इंद्र की बात सुन भगवान शिव ने  दानवों का नाश करने के लिए एक दिव्य रथ का निर्माण किया था । दिव्य रथ की हर एक चीज़ देवताओं से बनीं। चंद्रमा और सूर्य से पहिए बने। इंद्र, वरुण, यम और कुबेर रथ के चाल घोड़े बनें। हिमालय धनुष बने और शेषनाग प्रत्यंचा बनें। भगवान शिव खुद बाण बनें और बाण की नोक बने अग्निदेव थे ।  दिव्य रथ पर सवार  भगवान शिव और तीनों भाइयों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। जैसे ही ये तीनों रथ एक सीध में आए, भगवान शिव ने बाण छोड़ तीनों का नाश कर दिया। इसी वध के बाद भगवान शिव को त्रिपुरारी कहा जाने लगा।  मय दानव का वध कार्तिक मास की पूर्णिमा को हुआ था । कार्तिक मास को कुमार , कार्तिकेय , कार्तिक , मुरगन अस कहा गया है । कार्तिक पूर्णिमा को गंगा स्नान एवं देवो द्वारा मनाई गई दिवाली को देव दिवाली कहा जाता है । 




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