मंगलवार, अक्तूबर 12, 2021

ऐश्वर्य एवं शक्ति की माता महागौरी ...


पुरणों एवं शाक्तधर्म के देवीभागवत तथा दुर्गासप्तशती आदि ग्रंथों में माता महागौरी की महत्वपूर्ण वर्णन किया गया है। शक्ति की अष्टम रूप ऐश्वर्य और सौन्दर्य की माता महागौरी है ।ॐ महागौर्ये नमःअस्त्रत्रिशूल, डमरू, वर और अभय मुद्राजीवनसाथीशिवसवारीवृषभ श्वेते वृषे समारुढा श्वेताम्बरधरा शुचिः । महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा ।। गौर वर्णीय  एवं 8 वर्षीय  माता महा गौरी  की उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से दी गई है। अष्टवर्षा भवेद् गौरी।' माता महागौरी की  समस्त वस्त्र एवं आभूषण आदि  श्वेत ,  चार भुजाएँ , वाहन वृषभ ,  दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और नीचे वाले दाहिने हाथ में त्रिशूल , बाएँ हाथ में डमरू और नीचे के बाएँ हाथ में वर-मुद्रा अत्यंत शांत है। 




माँ महागौरी ने देवी पार्वती रूप में भगवान शिव को पति-रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी । एक बार भगवान भोलेनाथ ने पार्वती जी को देखकर कुछ कह देते हैं। जिससे देवी के मन का आहत होता है और पार्वती जी तपस्या में लीन हो जाती हैं। इस प्रकार वषों तक कठोर तपस्या करने पर जब पार्वती नहीं आती तो पार्वती को खोजते हुए भगवान शिव उनके पास पहुँचते हैं वहां पहुंचे तो वहां पार्वती को देखकर आश्चर्य चकित रह जाते हैं। पार्वती जी का रंग अत्यंत ओजपूर्ण एवं  छटा चांदनी के सामन श्वेत और कुन्द के फूल के समान धवल दिखाई ,  वस्त्र और आभूषण से प्रसन्न होकर देवी उमा को गौर वर्ण का वरदान देते हैं। भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी ने कठोर तपस्या की थी जिससे इनका शरीर काला पड़ जाता है। देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने माता गौरी को  स्वीकार कर और शिव जी इनके शरीर को गंगा-जल से धोते हैं तब देवी विद्युत के समान अत्यंत कांतिमान गौर वर्ण की हो जाती हैं तथा तभी से इनका नाम गौरी पड़ा। महागौरी रूप में देवी करूणामयी, स्नेहमयी, शांत और मृदुल दिखती हैं। माता गौरी देवी के रूप की प्रार्थना करते हुए देव और ऋषिगण कहते हैं “सर्वमंगल मंग्ल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके. शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते..”। भूखा सिंह  भोजन की तलाश करते हुए माता गौरी  तपस्या स्थल पर देवी को देखकर सिंह की भूख बढ़ गयी परंतु वह देवी के तपस्या से उठने का इंतजार करते हुए वहीं बैठ गया। इस इंतजार में वह काफी कमज़ोर हो गया। देवी जब तप से उठी तो सिंह की दशा देखकर उन्हें उस पर बहुत दया आती है और माँ उसे अपना सवारी बना लेती हैं क्योंकि एक प्रकार से उसने भी तपस्या की थी। देवी गौरी का वाहन बैल और सिंह दोनों ही हैं।अष्टमी के दिन महिलाएं अपने सुहाग के लिए देवी मां को चुनरी भेंट करती हैं। माँ महागौरी का ध्यान, स्मरण, पूजन-आराधना भक्तों के लिए सर्वविध कल्याणकारी है। या देवी सर्वभू‍तेषु माँ गौरी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। अर्थात : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और माँ गौरी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। हे माँ, मुझे सुख-समृद्धि प्रदान करें ।
उत्तरप्रदेश के काशी में महागौरी मंदिर है ।बिहार के कैमूर जिले की पंवरा पहाड़ी पर मां मुंडेश्वरी वाराही , गोपालगंज जिले  के थावे में मां भवानी , रोहतास जिले के  सासाराम में कैमूर पहाड़ी की प्राकृतिक गुफा में मां तारा , भोजपुर जिले का  आरा में माता आरण्य देवी मंदिर , वैशाली के र्गोंवदपुर का देवी स्थल शक्तिपीठ के रूप में जाना जाता है।  दिघवारा के आमी ,  हाजीपुर के बुढ़िया माई  मंदिर है । कैमूर जिले का पंवरा पहाड़ी पर मां मुंडेश्वरी वाराही का वाहन महिष है। मुंडेश्वरी  मंदिर भूमितल से  600 फीट की उंचाई पर है। इसकी नक्काशी और मूर्ति उत्तर गुप्तकालीन पत्थर से बना मंदिर अष्टकोणीय है। मुंडेश्वरी भवनी मंदिर  शिलालेख के अनुसार 389 ई. में मंदिर का निर्माण हुआ  है। मंदिर में प्रवेश के चार द्वार में एकद्वार  को बंद कर दिया गया है।  1812 से  1904 ई. के बीच ब्रिटिश यात्री आरएन मार्टिन, फ्रांसिस बुकानन और ब्लाक ने मुंडेश्वरी मंदिर का भ्रमण किया था। इस मंदिर के मध्य भाग में चतुर्मुखी शिर्वंलग स्थापित है। कहते हैं कि जिस पत्थर से यह शिर्वंलग निर्मित किया गया है, उसमें सूर्य की स्थिति के साथ-साथ पत्थर का रंग भी बदलते रहता है। मुख्य मंदिर के पश्चिम में पूर्वाभिमुख विशाल नंदी की मूर्ति  अक्षुण्ण है। भक्तों की कामनाओं के पूरा होने के बाद बकरे की बलि चढ़ाई जाती है पर, माता रक्त की बलि नहीं लेतीं, बल्कि बलि चढ़ने के समय भक्तों में माता के प्रति आश्चर्यजनक आस्था पनपती है। जब बकरे को माता की मूर्ति के सामने लाया जाता है तब पुजारी अक्षत (चावल के दाने) को मूर्ति से स्पर्श कराकर बकरे पर फेंकते हैं। बकरा तत्क्षण अचेत, मृतप्राय हो जाता है। थोड़ी देर के बाद अक्षत फेंकने की प्रक्रिया करने के बाद  बकरा उठ खड़ा होता है। बलि की क्रिया माता के प्रति आस्था को बढ़ाती है। मंदिर के रास्ते में सिक्के भी मिले हैं और तमिल सहली भाषा में पहाड़ी के पत्थरों पर शिलालेख हैं। कैमूर पहाड़ी की प्राकृतिक गुफा में मां तारा की  पाषाण प्रतिमा में चार हाथ हैं। दाहिने ओर की हाथों में खड्ग और कैंची है। जबकि बायें वालों में मुंड और कमल युक्त भगवान शिव के वक्ष स्थल पर बायां पैर आगे है। देवी नाटी ,  लंबोदर और नील वर्ण तथा कटि में ब्याघ्र चर्म लिपटा है। मां तारा को सासाराम के अलावा पूरे रोहतास जिला के लोग मां ताराचंडी कहते हैं। माता तारा चंडी बौद्धों के व्रजयान धारा के साधकों की भी अराध्या  हैं।  तंत्र शास्त्रों में मां तारा की महिमा का बखान है। नारद पंचरात्र के अनुसार दक्ष गृह में जो सती नाम से उत्पन्न हुईं, उनके केवलत्व देने वाली होने के कारण एकजटा कहते हैं। तारक होने के कारण वह सर्वदा तारा हैं। भोजपुर जिले का आरा  में माता आरण्य देवी  मंदिर स्थित है। मां आरण्य देवी आरा नगर की अधिष्ठात्री हैं। इस मंदिर में वर्ष 1953 में भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, सीता, भरत, शत्रुघ्न   व हनुमान जी के अलावा अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा स्थापित की गयी है।  पांडवों और भगवान राम ने मां आदिशक्ति की पूजा की थी। रांची के माता काली मंदिर , बांग्ला मंदिर , पटना के पटनदेवी प्रसिद्ध है । गया जिले का गया स्थित भष्मकुट गिरी पर  मां मंगलागौरी देवी मंदिर है। देवी भागवत पुराण के अनुसार यह मंदिर 51 प्रधान सिद्धपीठों में एक है। पालन पीठ माता मंगलागौरी  मंदिर के गर्भगृह में वर्षों से अखंड ज्योति जल रही है। नीम के पेड़ की शीतल छांव में गुफानुमा मंदिर में मां सिंह पर पद्मासन की मुद्रा में आसीन हैं। मुजफ्फरपुर जिले के कटरा मैन माता चामुंडा  , कांटी में क्षीण मस्तिके , नेपाल का जनकपुर में माता गौरी , नवादा जिले के रूपौ स्थित शक्तिपीठ मां चामुण्डा देवी के दरबार में भक्तों की गहरी आस्था है। मार्कण्डेय पुराण में मां चामुण्डा देवी के शौर्य का वर्णन है। भगवान शिव जब देवी सती का पार्थिव शरीर लेकर तांडव कर रहे थे, तब सती के शरीर के हिस्से अलग-अलग स्थान पर गिरे थे। जिसमें नाभि का भाग इसी स्थान पर गिरा था। मां चामुण्डा देवी का मंदिर के गर्भगृह में स्थित पिंडी को सती के नाभि का भाग माना जाता है। बिहार के तीन शक्ति स्थलों में गया की मंगलागौरी , बांग्ला माता , वागेश्वरी माता , शीतल माता , काली माता , बेलागंज प्रखण्ड का बेल की काली मंदिर ,  जहानाबाद जिले के बराबर पर्वत समूह का सूर्यान्क गिरी पर माता सिद्धेश्वरी , माता बागेश्वरी  चरुई की काली मंदिर , अरवल जिले का करपी जगदम्बा स्थान , झारखंड के रामगढ़ जिले के रजरप्पा स्थित  छिन्न मस्तिका, चतरा जिले का इटखोरी स्थित माता भद्रकाली ,  सारण जिले का  दिघवारा स्थित अम्बिका भवानी आमी  मंदिर इन साधकों को सिद्धियां एवं श्रद्धालुओं की मुरादें  पूरी करती हैं । पशुपतिनाथ, काठमांडू, नेपाल, रावणेश्वर महादेव बैद्यनाथ धाम, विश्वेश्वर महादेव वाराणसी में माता महागौरी  है।  उत्तराखंड का रुद्रप्रयाग जिले के मंदाकनी नदी के किनारे गौरी कुंड एवं माता गौरी स्थित है । आमी मंदिर  गदाई सराय में  चावल की लाई अर्थात मूढ़ी ,  चीनी का लड्डू चढ़ाते हैं। माता की पिंडी कपड़े से नहीं, बल्कि सिंदूर से ढंकी होती है। जब कभी यह सिंदूर खत्म हो जाता है तो माता पुजारी या किसी को भी स्वप्न देकर उसे सिंदूर से ढंकने का आदेश देती हैं। बराबर पर्वत समूह स्थित असुरराज बाणासुर की पुत्री उषा और विभाण्ड कि पुत्री दिव्य ज्ञान की चित्रलेखा की आराध्या माता गौरी एवं सिद्धेश्वरी ,बागेश्वरी तथा विभूक्षणी माता थी ।

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