शुक्रवार, अक्तूबर 08, 2021

नवरात्र और शाक्ति पूजा...


शास्त्र एवं शाक्त सम्प्रदाय ग्रंथो के अनुसारआश्विन शुक्ल शारदीय नवरात्र में मां का भोग लगाने की सामग्री - प्रतिपदा को मता शैलपुत्री की पूजा : घी का भोग लगाएं और दान करें, बीमारी दूर होती है। द्वितीया को  माता ब्रह्मचारिणी की  पूजा : शक्कर का भोग लगाएं और उसका दान करें, आयु लंबी होती है। तृतीय माता चंद्रघंटा। की   पूजा : दूध का भोग लगाएं और इसका दान करें, दु:खों से मुक्ति मिलती है। चतुर्थी को माता कुष्मांडा की पूजा : मालपुए का भोग लगाएं और दान करें, कष्टों से मुक्ति मिलती है। पंचमी को स्कंदमाता और षष्टी को कात्यायनी माता की  पूजा : केले व शहद का भोग लगाएं व दान करें, परिवार में सुख-शांति रहेगी और धन प्राप्ति के योग बनते हैं। सप्तमी को कालरात्रि माता की पूजा : गुड़ की चीजों का भोग लगाएं और दान भी करें, गरीबी दूर होती है। अष्टमी को माता गौरी की पूजा  नारियल का भोग लगाएं और दान करें, सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। नवमी को माता सिद्धिदात्री को  अनाजों का भोग लगाएं और दान करें ,सुख-शांति मिलती है। कन्या पूजन जिसे लोंगड़ा पूजन भी कहते है अष्टमी और नवमी दोनों ही दिन किया जा सकता है । जिसको करने की विधि कुछ इस प्रकार से है नौ कुँवारी कन्याओं को सादर पुर्वक आमंत्रित करे घर में प्रवेश करते ही कन्याओं के पाँव धोएं और उचित आसन पर बिठाए हाथ में मौली बांधे और माथे पर बिंदी लगाएं। उनकी थाली में हलवा-पूरी और चने परोसे जाते है । साहित्यकार व इतिहासकार सत्येन्द्र कुमार पाठक ने कहा है कि  कन्या पूजन के लिए पूजा की थाली जिसमें दो पूरी और हलवा-चने रख ले और बीच में आटे से बने एक दीपक को शुद्ध घी से जलाएं जाते है । कन्या पूजन के बाद सभी कन्याओं को अपनी थाली में से यही प्रसाद खिलाने के बाद कन्याओं को उचित उपहार तथा  राशि भेंट में दे कर  और चरण छुएं और कन्या  प्रस्थान के बाद स्वयं प्रसाद खाना है । कन्या पूजन के पश्चात एक पुष्प एवं चावल के कुछ दाने हथेली में लें और संकल्प लेना है । कलश में स्थापित नारियल और चढ़ावे के तौर पर सभी फल, मिष्ठान्न आदि को स्वयं भी ग्रहण करें और परिजनों को भी दें|घट के पवित्र जल का पूरे घर में छिडकाव करें और फिर सम्पूर्ण परिवार इसे प्रसाद स्वरुप ग्रहण करें| घट में रखें सिक्कों को अपने गुल्लक में रख सकते हैं, बरकत होती है| माता की चौकी से सिंहासन को पुनः अपने घर के मंदिर में उनके स्थान पर ही रख दें| श्रृंगार सामग्री में से साड़ी और जेवरात आदि को घर की महिला सदस्याएं प्रयोग कर सकती हैं| श्री गणेश की प्रतिमा को भी पुनः घर के मंदिर में उनके स्थान पर रख दे|चढ़ावे के तौर पर सभी फल, मिष्ठान्न आदि को भी परिवार में बांटें| चौकी और घट के ढक्कन पर रखें चावल एकत्रित कर पक्षियों को दें|माँ दुर्गे की प्रतिमा अथवा तस्वीर, घट में बोयें गए जौ एवं पूजा सामग्री, सब को प्रणाम करें और समुन्द्, नदी या सरोवर में विसर्जित कर दें| विसर्जन के पश्चात एक नारियल, दक्षिणा और चौकी के कपडें को किसी ब्राह्मण को दान करना है ।आदिशक्ति स्वरूपा मां दुर्गा के 9 स्वरूपों की अभ्युदय का उल्लेख सनातन धर्म के शाक्त सम्प्रदाय गर्न्थो एवं पुरणों संहिताओं में है । देवता असुरों के अत्याचार से बेहद परेशान और दुखी रहने के कारण  देवताओ द्वारा  समाधान के लिए  ब्रह्मा जी के पास गए थे । ब्रह्मा जी ने देवों से कहा  कि दैत्यराज का वध  कुंवारी कन्या के हाथ से होनी निश्चित है।  देवताओं ने अपने तेज को एक जगह समाहित कर  मां दुर्गा उत्पत्ति की उत्पत्ति की है । भगवान  महादेव शिव  के तेज से माता का मुख , भगवान विष्णु के तेज से भुजाएं, ब्रह्मा जी के तेज से माता के दोनों चरण ,  यमराज के तेज से मस्तक के केश, चंद्रमा के तेज से स्तन, इंद्र के तेज से कमर, वरुण के तेज से जंघा, पृथ्वी के तेज से नितंब, सूर्य के तेज से दोनों पौरों की अंगुलियां, प्रजापति के तेज से सारे दांत, अग्नि के तेज से दोनों नेत्र, संध्या के तेज से भौंहें, वायु के तेज से कान तथा अन्य देवताओं के तेज से देवी के भिन्न-भिन्न अंग बने है । भगवान शिव ने माता दुर्गा को   त्रिशूल, भगवान विष्णु ने चक्र,  मरुत जी ने गदा, श्रीराम ने धनुष, अग्नि ने शक्ति व बाणों से भरे तरकश, वरुण ने दिव्य शंख, प्रजापति ने स्फटिक मणियों की माला, लक्ष्मीजी ने कमल का फूल, इंद्र ने वज्र, शेषनाग ने मणियों से सुशोभित नाग, वरुण देव ने पाश व तीर, ब्रह्माजी ने चारों वेद तथा हिमालय पर्वत ने माता को सवारी के लिए सिंह ,  मां दुर्गा को समुद्र से कभी न फटने वाले दिव्य वस्त्र, चूड़ामणि, उज्जवल हार, हाथों के कंगन, पैरों के नूपुर, दो कुंडल और अंगुठियां मिलीं। सभी अस्त्र-शस्त्र और माता दुर्गा ने अपनी 18 भुजाओं में धारण करने से दुर्गा सप्तशती एवं मार्कण्डेय पुराण के अनुसार महाकाली , महालक्ष्मी महासरस्वती  आदिशक्ति द्वारा  दैत्य ,दानव और असुरों में रक्त , बीज , महिषासुर , शुम्भ ,  निशुम्भ , चंद ,मुंड को समाप्त कर भूस्थलवालों को रक्षा एवं शांति प्रदान की गई थी ।कभी न फटने वाले दिव्य वस्त्र, चूड़ामणि, उज्जवल हार, हाथों के कंगन, पैरों के नूपुर, दो कुंडल और अंगुठियां मिलीं। इन सभी अस्त्र-शस्त्र और माता दुर्गा ने अपनी 18 भुजाओं में धारण करने से दुर्गा सप्तशती एवं मार्कण्डेय पुराण के अनुसार महाकाली , महालक्ष्मी महासरस्वती  आदिशक्ति द्वारा  दैत्य ,दानव और असुरों में रक्त , बीज , महिषासुर , शुम्भ ,  निशुम्भ , चंद ,मुंड को समाप्त कर भूस्थल पर रहने वालों को रक्षा एवं शांति प्रदान की गई थी ।


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