शनिवार, अक्तूबर 17, 2020

मंगलकामनाएं पूर्ण करने का पर्व नवरात्रि...


        विश्व की  मानवीय जीवन में फैली अशांति की रेखा पर शांति का पर्व नवरात्रि है। सृष्टि और प्रकृति का समन्वय एवं सभी साधनों का मूल रूप शक्ति की उपासना है। भारतीय सांस्कृतिक एवं धार्मिक परम्पराओं की अक्षुन्न बनाने के लिए मानव की सभ्यता का उद्भव सौर धर्म, शाक्त धर्म, शैव धर्म, वैष्णव धर्म, भागवत धर्म, यवन धर्म, यहूदी धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, ईसाई धर्म, इस्लाम धर्म, सिख धर्म एवं अनेक धर्म का प्रादुर्भाव हुआ है । शाक्त धर्म के प्रादूर्भाव शक्ति आराधना से हुआ है। इस धर्म में जन्म एवं पालन करने वाली माता की आराधना प्रत्येक वर्ष में शुक्ल पक्ष का प्रतिपदा से नवमी तिथि तक चैत्र मास का वासंतीय नवरात्र, आषाढ़ का वर्षायी नवरात्र , तथा आश्विन मास की शारदीय नवरात माघीय नवरात्रि में की जाती है। विश्व की विभिन्न संबतो एवं मनवंतर में शक्ति की उपासना तथा शाक्त धर्म के सिद्धांत पर आधारित है । शाक्त धर्म में शारदीय नवरात्रि में शक्ति की उपासना के लिए प्रथम शैल पुत्री, द्वितीय ब्रह्मचारिणी, तृतीय चन्द्रघंटा , चतुर्थ कूष्माण्डा, पंचम स्कंध , षष्टी कात्यायनी, सप्तमी कालरात्रि, अष्टमी महागौरी तथा नवमी सिद्धिदात्री माता की आराधना की जाती है। आश्विन शुक्ल पक्ष प्रतपदा से नवमी तिथि तक नव दुर्गा शक्ति तक अनुष्ठान कर अपनी मनोकामाएं पूर्ण करते हैं। वैदिक काल में मातृ देवी की पूजा अर्चना की जाती रही थी । ऋग्वेद के दशम मंडल में तांत्रिक देवी सूक्त है। जिसमें शाक्त धर्म का रूप रेखा में समचाचारी मार्ग में शाक्तवाद में दक्षिण एशिया में देवी की पूजा, 108 देवी पीठ और 51 सिद्ध पीठ है वहीं कौलमार्गी संप्रदाय में पंचमकार में मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा एवम् मैथुन को शाक्त तंत्रवाद में शामिल किया गया है। सिंधु घाटी सभ्यता में मतृपुजन की प्रधानता है। विश्व में दुर्गा पूजा पर्व को विभिन्न क्षेत्रों में दुर्गा पूजा, अकलबोधन, शरदोत्सव, महालय, नवरात्रि, दशहरा, बांग्ला देश में भगवती पूजा एवं दक्षिण एशिया में नरिवादोन्मुख के नाम से जाना जाता है। शाक्तवाद की चर्चा देवी महात्म्य, देवी भागवत, देवी उपनिषद्, दुर्गा सप्तशती और दुर्गा चरित्र चंडी शतक में उल्लेख मिलता है। शक्ति उपासना 2000 ई. पू. से प्रारंभ हुआ है। राजा पुरुरवा काल तथा भगवान राम , कृष्ण काल में महामाया, महाविद्या, करोती, संचोरी सिंदूरी ऋषि मार्कण्डय के समय शक्ति की आराधना महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती के रूप में की जाती थी। संस्कृत साहित्य के विद्वान मम्मट ने अभिधा, लक्षण, व्यापार और विश्वनाथ ने शक्ति पूजन कहा है। शाक्त धर्म में तंत्र वाद तथा मंत्र वाद का प्रादुर्भाव हुआ है। गुप्त काल में मातृ शक्ति के रूप में आदि शक्ति की उपासना करने वालों को शाक्त धर्म प्रचलित था। वेदों और पुराणों के अनुसार दक्ष प्रजापति का कनखल ( हरिद्वार) में वृहस्पति सर्व यज्ञ में माता सती ने अपने पति भगवान् शिव के अपमान के कारण यज्ञ अग्नि कुंड में कूद कर अपनी आहूति दे दी थी जिसके फलस्वरूप भगवान् शिव ने अपने भार्या माता सती के शरीर को अपने कंधोपर लेकर भू मंडल में विचरने लगे जिसके फलस्वरूप सम्पूर्ण भूमंडल कापने लगा । भगवान् विष्णु की ध्यान भगवान् शिव की रौद्र रूप को शांत करने के लिए माता सती के मृत शरीर पर सुदर्शन चक्र से 108 टुकड़े कर शक्ति पीठ स्थापित कर भगवान् शिव का रौद्र रूप शांत किया। शक्ति पीठ में हिमाचल के विलासपुर माता सती की नयन गिरने के कारण नयना देवी, उत्तराखंड मसूरी का धनौल्टी में माता सती की सिर का धड़, कराची ( पाकिस्तान) के हिंगुल में ब्रह्मरंध गिरने के कारण कोटरी शक्ति एवं भिमलोचन भैरव , पोखरा (नेपाल) माता सती की मस्तक गिरने के कारण गंडकी चंडी शक्ति एवं चक्रपाणि भैरव, असम के निलाचल पर्वत पर माता सती की योनि गिरने के कारण कामाख्या शक्ति तथा उमा नंद भैरव , जनकपुर नेपाल के माता सती के बाएं स्कंध के गिरने के कारण उमा शक्ति एवं महोदर भैरव , गया बिहार के ब्रह्म योनि पर्वत की मंगला चोटी पर माता सती की स्तन गिरने के कारण मंगला शक्ति सर्वमंगला देवी स्थान मंगला गौरी कहा जाता है। इस तरह 51 शक्ति पीठ एवं 108 देवी पीठ का निर्माण किया गया है। शाक्त धर्म के प्रणेता ऋषि वशिष्ठ के पौत्र शक्ति थे जिन्होंने शक्ति की उपासना का 108 केंद्र देवी पीठ का निर्माण किया है। बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में शाक्त धर्म का स्थान वैवश्वत मनु के पुत्र राजा करूष ने अरवल जिले के करपी में माता जगदम्बा ,चतुर्भुज, शिव लिंग , शिव पार्वती विहार , जहानाबाद जिले के बराबर पर्वत श्रखला का सिद्धेश्वर चोटी पर माता सिद्धेश्वरी , बागेश्वरी तथा सिद्धेश्वर नाथ शिव लिंग, पटना के नगर रक्षिता के रूप में छोटी पटन देवी , बड़ी पटन देवी ,1882 ई. में लंगर्टोली के बंगाली अखाड़ा में मा दुर्गा ,1911 ई. में गुलजार बाग में ,1918 ई. में कालीबाड़ी,1940 ई. को मारूफगंज में मा काली की मूर्ति स्थापना हुई थी। गया में मां बांग्ला, बागेश्वरी जमुई जिले के उलाई नदी के किनारे चंदेल राजा ने मां दुर्गा, दरभंगा के राजनगर का चिताभूमि पर श्यामा माई ,1418 ई. में भागलपुर के चंपानगर में महिषासुमर्दिनी , गोपालगंज के उचका का दहा नदी के तट पर शक्ति थावे भवानी , 1676 ई. में बेतिया का कलीबाग, दुर्गाबाग में राजा जगबहादुर सिह ने दस महाविद्या, काली की मूर्ति स्थापित की है। डुमरांव के राजगढ़, आरा में अरणी भवानी , भालुनी में यक्षणी भवानी जबलपुर में चौसठ योगिनी मंदिर में मूर्ति स्थापित किया गया है। गया जिले के केसपा में मांतरा , दुंगेश्चरी पर्वत पर दुंगेश्वरी माता , बेलागंज के माता विभुक्षणी ( काली), मुजफरपुर में दरभंगा राजा कामेश्वर सिंह ने 1935 ई. में मां काली की स्थापना , सोनपुर के गंडक एवं गंगा नदी के संगम तट पर माता काली की मूर्ति स्थापित कर शक्ति की उपासना की जाती है। उत्तरप्रदेश के मिर्जापुर जिले का विंध्याचल पर्वत एवं गंगा नदी के तट पर माता विंद्यवाशनी देवी , उत्तराखंड का माता ललिता देवी, जम्बू का वैष्णव देवी , अन्य जगह पर करणी माता, सतना में माता शारदे भवानी, चीन में बियांचैत्यान, जापान में वैजाईतेन, थाईलैंड में सुरसवदी , वर्मा में युयथदी के नाम से पूजे जाते हैं।चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से नवमी तिथि तक वसंती नवरात्र मानव सृष्टि का प्रारंभ काल और शारदीय नवरात्र आश्विन मास शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से नवमी तिथि तक मानवीय मूल्यों की शक्ति काल का प्रादुर्भाव कहा गया है। भगवान् राम की लंका पर विजय प्राप्ति आश्विन मास शुक्ल पक्ष दशमी तिथि को हुआ था और विजया दशमी या दशहरा के नाम से जाना गया है। मां की आराधना शारदीय नवरात्र आश्विन मास शुक्ल पक्ष प्रतिपदा  अभिजीत मुहूर्त में मां की आराधना के लिए कलश स्थापना एवं पूजन, दुर्गा सप्तशती का पाठ, नवरात्र प्रारंभ होता है । इस शारदीय नवरात्रि में मां हाथी पर सवार होकर भू लोक में पधारेगी, शैलपुत्री की उपासना ब्रह्मचारिणी की उपासना,चंद्रघंटा की पूजा अर्चना,कुष्मांडा की उपासना ,स्कंदमाता की उपासना, कात्यायनी माता की आराधना, काल रात्रि की आराधना ,महासप्तमी, महानिशा पूजा, दुर्गा पूजा, माता की पट खुलेगी , जैन धर्म का ओली प्रारंभ ,महाष्ठमी , गौरी पूजन, सिद्धिदात्री माता की आराधना, पूजन , महानवमी , कुवारी पूजन,हवन ,  विजया दशमी, शस्त्र पूजन, नीलकंठ का दर्शन करते है ।माँ दुर्गा के शक्ति पीठ और वंदना स्तुति तथा नौ रात्रि, अपार ख़ुशी दे माता है विश्वास और सहारा माँ भक्तो को मिलेगा आशीर्वाद और संबल ज़ब ज़ब धर्म धरा पर राक्षसी प्रवित्ति ने जन्म लिया । सृष्टि कल्याण के लिए माँ दुर्गा ने दानवों का संहार की है । नौ देवियाँ है :- शैलपुत्री - इसका अर्थ- पहाड़ों की पुत्री होता है। ब्रह्मचारिणी - इसका अर्थ- ब्रह्मचारीणी। चंद्रघंटा - इसका अर्थ- चाँद की तरह चमकने वाली। कूष्माण्डा - इसका अर्थ- पूरा जगत उनके पैर में है। स्कंदमाता - इसका अर्थ- कार्तिक स्वामी की माता। कात्यायनी - इसका अर्थ- कात्यायन आश्रम में जन्मि। कालरात्रि - इसका अर्थ- काल का नाश करने वली। महागौरी - इसका अर्थ- सफेद रंग वाली मां। सिद्धिदात्री - इसका अर्थ- सर्व सिद्धि देने वाली। इसके अतिरिक्त नौ देवियों की भी यात्रा की जाती है जोकि दुर्गा देवी के विभिन्न स्वरूपों व अवतारों का प्रतिनिधित्व करती है: माता वैष्णो देवी जम्मू कटरा माता चामुण्डा देवी हिमाचल प्रदेश माँ वज्रेश्वरी कांगड़ा वाली माँ ज्वालामुखी देवी हिमाचल प्रदेश माँ चिंतापुरनी उना माँ नयना देवी बिलासपुर माँ मनसा देवी पंचकुला माँ कालिका देवी कालका माँ शाकम्भरी देवी सहारनपुर नवरात्रि भारत के विभिन्न भागों में अलग ढंग से मनायी जाती है। गुजरात में इस त्योहार को बड़े पैमाने से मनाया जाता है। गुजरात में नवरात्रि समारोह डांडिया और गरबा के रूप में जान पड़ता है। यह पूरी रात भर चलता है। डांडिया का अनुभव बड़ा ही असाधारण है। देवी के सम्मान में भक्ति प्रदर्शन के रूप में गरबा, 'आरती' से पहले किया जाता है और डांडिया समारोह उसके बाद। पश्चिम बंगाल के राज्य में बंगालियों के मुख्य त्यौहारो में दुर्गा पूजा बंगाली कैलेंडर में, सबसे अलंकृत रूप में उभरा है। इस अदभुत उत्सव का जश्न नीचे दक्षिण, मैसूर के राजसी क्वार्टर को पूरे महीने प्रकाशित करके मनाया जाता है। महत्वसंपादित करें नवरात्रि उत्सव देवी अंबा (विद्युत) का प्रतिनिधित्व है। वसंत की शुरुआत और शरद ऋतु की शुरुआत, जलवायु और सूरज के प्रभावों का महत्वपूर्ण संगम माना जाता है। इन दो समय मां दुर्गा की पूजा के लिए पवित्र अवसर माने जाते है। त्योहार की तिथियाँ चंद्र कैलेंडर के अनुसार निर्धारित होती हैं। नवरात्रि पर्व, माँ-दुर्गा की अवधारणा भक्ति और परमात्मा की शक्ति (उदात्त, परम, परम रचनात्मक ऊर्जा) की पूजा का सबसे शुभ और अनोखा अवधि माना जाता है। यह पूजा वैदिक युग से पहले, प्रागैतिहासिक काल से चला आ रहा है। ऋषि के वैदिक युग के बाद से, नवरात्रि के दौरान की भक्ति प्रथाओं में से मुख्य रूप गायत्री साधना का हैं। नवरात्रि में देवी के शक्तिपीठ और सिद्धपीठों पर भारी मेले लगते हैं । माता के सभी शक्तिपीठों का महत्व अलग-अलग हैं। लेकिन माता का स्वरूप एक ही है। कहीं पर जम्मू कटरा के पास वैष्णो देवी बन जाती है। तो कहीं पर चामुंडा रूप में पूजी जाती है। बिलासपुर हिमाचल प्रदेश मे नैना देवी नाम से माता के मेले लगते हैं तो वहीं सहारनपुर में शाकुंभरी देवी के नाम से माता का भारी मेला लगता है। नवरात्रि के पहले तीन दिनसंपादित करें नवरात्रि के पहले तीन दिन देवी दुर्गा की पूजा करने के लिए समर्पित किए गए हैं। यह पूजा उसकी ऊर्जा और शक्ति की की जाती है। प्रत्येक दिन दुर्गा के एक अलग रूप को समर्पित है। प्रत्येक दिन दुर्गा सप्तशती का पाठ नहीं कर सकते तो इस प्रकार से सात दिनों में तेरहों अध्यायों का पाठ किया जा सकता है --- पहले दिन एक अध्याय , दूसरे दिन दो अध्याय , तीसरे दिन एक अध्याय  , चौथे दिन चार अध्याय  , पाँचवे दिन दो अध्याय  , छठवें दिन एक अध्याय  , सातवें दिन दो अध्याय पाठ कर सात दिनों में श्रीदुर्गा-सप्तशती के तीनो चरितों का पाठ कर सकते हैं । श्रीदुर्गा-सप्तशती-पाठ विधि :------ सबसे पहले अपने सामने ‘गुरु’ और गणेश जी आदि को मन-ही-मन प्रणाम करते हुए दीपक को जलाकर स्थापित करना चाहिए। पुन: उस दीपक की ज्योति में भगवती दुर्गा का ध्यान करना चाहिए । ध्यान --- ॐ विद्युद्दाम-सम-प्रभां मृग-पति-स्कन्ध-स्थितां भीषणाम्। कन्याभिः करवाल-खेट-विलसद्-हस्ताभिरासेविताम् ।। हस्तैश्चक्र-गदाऽसि-खेट-विशिखांश्चापं गुणं तर्जनीम्। विभ्राणामनलात्मिकां शशि-धरां दुर्गां त्रिनेत्रां भजे ।। ध्यान के पश्चात् पंचोपचार , दशोपचार ,  षोडशोपचार से माता का पूजन करें । उक्त वर्णित विधि के अनुसार शप्तशती का पाठ करें  ।  पंचोपचार पूजन , दशोपचार पूजन , षोडशोपचार पूजन आत्मशुद्धि संकल्प शापोद्धार कवच अर्गला कीलक शप्तशती पाठ  तत्पश्चात माता से क्षमा प्रार्थना करें । --- क्षमा प्रार्थना द्वारा ज्ञान की सातों भूमिकाओं  में शुभेच्छा , विचारणा ,  तनु-मानसा  , सत्त्वापति ,  असंसक्ति ,  पदार्थाभाविनी ,  तुर्यगा सहज रुप से परिष्कृत एवं संवर्धित होती है। इसके अतिरिक्त किस प्रकार कि समस्या निवारण के लिए कितने पाठ करें इसका विवरण निम्न प्रकार है :--ग्रह शान्ति हेतु --- ५ बार , महा-भयनिवारण हेतु--- ७ बार , सम्पत्ति प्राप्ति हेतु--- ११ बार , पुत्र-पौत्र प्राप्ति हेतु--- १६ बार राज-भय निवारण - --- १७ या १८ बार शत्रु-स्तम्भन हेतु - --- १८ बार , भीषण संकट --- १०० बार , असाध्य रोग - ---१०० बार , वंश-नाश - ---१०० बार , मृत्यु ----१०० बार , धन-नाशादि उपद्रव शान्ति के लिए--- १०० बार , दुर्गा शप्तशती के अध्याय और कामना पूर्ति  करते है। दुर्गा शप्तशती के विभिन्न अध्याय से कामना कि पूर्ति होती है  -प्रथम अध्याय-- हर प्रकार की चिंता मिटाने के लिए। द्वितीय अध्याय-- मुकदमा झगडा आदि में विजय पाने के लिए , तृतीय अध्याय-- शत्रु से छुटकारा पाने के लिये ,  चतुर्थ अध्याय-- भक्ति शक्ति तथा दर्शन के लिये , पंचम अध्याय-- भक्ति शक्ति तथा दर्शन के लिए , षष्ठम अध्याय-- डर, शक, बाधा हटाने के लिये , सप्तम अध्याय-- हर कामना पूर्ण करने के लिये ,  अष्टम अध्याय-- मिलाप व वशीकरण के लिये ,नवम अध्याय-- गुमशुदा की तलाश, हर प्रकार की कामना एवं पुत्र आदि के लिये ,दशम अध्याय-- गुमशुदा की तलाश, हर प्रकार की कामना एवं पुत्र आदि के लिये। एकादश अध्याय-- व्यापार व सुख-संपत्ति की प्राप्ति के लिये। द्वादश अध्याय-- मान-सम्मान तथा लाभ प्राप्ति के लिये। त्रयोदश अध्याय-- भक्ति प्राप्ति के लिये। माँदुर्गा सप्तशती पाठ की विधि- नवरात्रि में सात दिनों में श्रीदुर्गासप्तशती के पाठ की वाकार विधि में तेरह अध्यायों को नौ दिनों में पाठ का एक और सरल विधान है. प्रथम दिन एक पाठ प्रथम अध्याय का करें. दूसरे दिन दो अध्याय द्वितीय अध्याय एवं तृतीय अध्याय का पाठ करें. तीसरे दिन चतुर्थ अध्याय का पाठ करें. चौथे दिन पंचम, षष्ठ, सप्तम व अष्टम अध्याय का पाठ करें. पांचवें दिन नवम एवं दशम अध्याय का पाठ कर सकते हैं. छठे दिन ग्यारहवें अध्याय का पाठ कर सकते हैं. सातवें दिन द्वादश एवं त्रयोदश अध्याय का पाठ कर सकते हैं. इस प्रकार सात दिनों में सप्तशती के तेरह अध्यायों का पाठ पूर्ण हो जाता है. पाठ का एक और तरीका भी है जिससे तीन हिस्सों में नवरात्रि के तीन दिनों में पूरी सप्तशती का पाठ किया जा सकता है. एक दिन प्रथम चरित, दूसरे दिन द्वितीय चरित और तीसरे दिन तृतीय चरित इस प्रकार करते हुए भी पूरी दुर्गासप्तशती का एक पाठ तो कर ही लेना चाहिए. यदि समय की एकदमी कमी है तो सप्तश्लोकी दुर्गा या  सिद्धकुंजिका स्तोत्रम् का पाठ करें. इसका पाठ भी सप्तशती के पाठ के बराबर माहात्म्य का माना जाता है. सप्तशती पाठ या माता के किसी भी साधना की निश्चित संख्या पूरी हो जाने के बाद हवन, कन्या पूजन एवं ब्राह्मण भोजन अवश्य करा देना चाहिए| श्रीदुर्गा उपासना के दौरान सावधानियां नवरात्रि में श्रीदुर्गा की विशेष आराधना व्रत-उपवास के साथ करने का ज्यादा महात्म्य कहा गया है. सप्तशती के पाठ की अवधि में एक समय सात्विक भोजन या फलाहार करना चाहिए. ब्रह्मचर्य का पालन होना चाहिए. व्रती को भूमि पर सोना चाहिए. मन, कर्म, वचन की शुद्धता होनी चाहिए- न किसी का बुरा सोचें न कोई बुरी बात कहें. पराए अन्न का सेवन, धूम्रपान, मांस-मदिरा जैसी तामसिक चीजों का पूर्णतः त्याग, झूठ, कपट और स्त्री सान्निध्य से पूरी तरह मुक्त रहना चाहिए. यदि इन चीजों में लिप्त रहकर सप्तशती का पाठ करते हैं तब प्रतिकूल प्रभाव भी हो सकता है. घी का दीपकः पाठ के दौरान शुद्ध घी का दीपक जलाए रखना चाहिए. दीप को पुस्तक की दक्षिण दिशा में भूमि पर रोली का षटचक्र बनाकर स्थापित करना चाहिए. पाठ अपूर्ण न रहेः जब तक अध्याय का पाठ पूर्ण न हो जाए तब तक पाठ को बीच में बंद न करें. यदि किसी अपरिहार्य कारण से पाठ के बीच में व्यवधान पड़ ही गया है तो पाठ को पुनः आरंभ करें. सप्तशती का पाठ न तो बहुत शीघ्रता में और न ही बहुत सुस्ती के साथ करना चाहिए. पाठ मध्यम गति से और मध्यम स्वर में करना चाहिए। । शाक्त धर्म के अनुयायी माता की आराधना प्रत्येक दिन करते है । माता की उपासना का प्रत्येक वर्ष वासंती नवरात्र  चैत्र मास , गुप्त नवरात्र आषाढ मास , शारदीय नवरात्र आश्विन मास का शुक्ल की प्रथमा से नवमी तिथि तकप्रावधान है । शाक्त संप्रदाय के उपासक लाल वस्त्र , पुष्प , रक्त चंदन , लाल चंदन , नारियल का उपयोग करते है । तंत्रवाद तथा मंत्रवाद , शाक्तवाद के उपासक के लिए महापर्व  नवरात्र है।

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